कोटिरुद्र संहिता · अध्याय 23
काशी विश्वेश्वर ज्योतिर्लिंग की महिमा
श्लोक 1 (shiva.kotirudra.23.1)
ऋषय ऊचुः । एवं वाराणसी पुण्या यदि सूत महापुरी । तत्प्रभावं वदास्माकमविमुक्तस्य च प्रभो ॥ 23.1 ॥
ṛṣaya ūcuḥ evaṁ vārāṇasī puṇyā yadi sūta mahāpurī tatprabhāvaṁ vadāsmākamavimuktasya ca prabho
ऋषियों ने कहा — हे सूत! यदि वाराणसी इतनी पुण्यमयी महानगरी है, तो हे प्रभो! हमें अविमुक्त क्षेत्र के उस प्रभाव को भी बताइए।
श्लोक 2 (shiva.kotirudra.23.2)
सूत उवाच । वक्ष्ये सङ्क्षेपतः सम्यग्वाराणस्याः सुशोभनम् । विश्वेश्वरस्य माहात्म्यं श्रूयतां च मुनीश्वराः ॥ 23.2 ॥
sūta uvāca vakṣye saṅkṣepataḥ samyagvārāṇasyāḥ suśobhanam viśveśvarasya māhātmyaṁ śrūyatāṁ ca munīśvarāḥ
सूत जी ने कहा — मैं संक्षेप में वाराणसी के उस सुन्दर विश्वेश्वर-माहात्म्य का भलीभाँति वर्णन करूँगा; हे मुनीश्वरो! सुनिए।
श्लोक 3 (shiva.kotirudra.23.3)
कदाचित्पार्वती देवी शङ्करं परया मुदा । लोककामनयापृच्छन्माहात्म्यमविमुक्तयोः ॥ 23.3 ॥
kadācitpārvatī devī śaṅkaraṁ parayā mudā lokakāmanayāpṛcchanmāhātmyamavimuktayoḥ
एक बार देवी पार्वती ने अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक, लोक-कल्याण की कामना से शंकर से अविमुक्त-क्षेत्र की महिमा पूछी।
श्लोक 4 (shiva.kotirudra.23.4)
पार्वत्युवाच । अस्य क्षेत्रस्य माहात्म्यं वक्तुमर्हस्यशेषतः । ममोपरि कृपां कृत्वा लोकानां हितकाम्यया ॥ 23.4 ॥
pārvatyuvāca asya kṣetrasya māhātmyaṁ vaktumarhasyaśeṣataḥ mamopari kṛpāṁ kṛtvā lokānāṁ hitakāmyayā
पार्वती ने कहा — मुझ पर कृपा करके और लोगों के हित की कामना से आप इस क्षेत्र की महिमा को पूर्ण रूप से कहने योग्य हैं।
श्लोक 5 (shiva.kotirudra.23.5)
सूत उवाच । देव्यास्तद्वचनं श्रुत्वा देवदेवो जगत्प्रभुः । प्रत्युवाच भवानीं तां जीवानां प्रियहेतवे ॥ 23.5 ॥
sūta uvāca devyāstadvacanaṁ śrutvā devadevo jagatprabhuḥ pratyuvāca bhavānīṁ tāṁ jīvānāṁ priyahetave
सूत जी ने कहा — देवी के इस वचन को सुनकर, जगत्प्रभु देवदेव ने प्राणियों के हित के लिए उस भवानी को उत्तर दिया।
श्लोक 6 (shiva.kotirudra.23.6)
परमेश्वर उवाच । साधु पृष्टं त्वया भद्रे लोकानां सुखदं शुभम् । कथयामि यथार्थं वै माहात्म्यमविमुक्तयोः ॥ 23.6 ॥
parameśvara uvāca sādhu pṛṣṭaṁ tvayā bhadre lokānāṁ sukhadaṁ śubham kathayāmi yathārthaṁ vai māhātmyamavimuktayoḥ
परमेश्वर ने कहा — हे कल्याणी! तुमने लोगों को सुख देने वाला यह शुभ प्रश्न भलीभाँति पूछा है; मैं अविमुक्त-क्षेत्र की महिमा को यथार्थ रूप से कहता हूँ।
श्लोक 7 (shiva.kotirudra.23.7)
इदं गुह्यतमं क्षेत्रं सदा वाराणसी मम । सर्वेषामेव जन्तूना हेतुर्मोक्षस्य सर्वथा ॥ 23.7 ॥
idaṁ guhyatamaṁ kṣetraṁ sadā vārāṇasī mama sarveṣāmeva jantūnā heturmokṣasya sarvathā
यह वाराणसी मेरा सदा का अत्यन्त गुह्य क्षेत्र है, जो समस्त प्राणियों के लिए हर प्रकार से मोक्ष का कारण है।
श्लोक 8 (shiva.kotirudra.23.8)
अस्मिन्सिद्धाः सदा क्षेत्रे मदीयं व्रतमाश्रिताः । नानालिङ्गधरा नित्यं मम लोकाभिकाङ्क्षिणः ॥ 23.8 ॥
asminsiddhāḥ sadā kṣetre madīyaṁ vratamāśritāḥ nānāliṅgadharā nityaṁ mama lokābhikāṅkṣiṇaḥ
इस क्षेत्र में सिद्ध पुरुष सदा मेरे व्रत का आश्रय लिये हुए, नाना प्रकार के लिंग-चिह्न धारण किये हुए, नित्य मेरे लोक की कामना करते हुए रहते हैं।
श्लोक 9 (shiva.kotirudra.23.9)
अभ्यस्यन्ति महायोगं जितात्मानो जितेन्द्रियाः । परं पाशुपतं श्रौतं भुक्तिमुक्तिफलप्रदम् ॥ 23.9 ॥
abhyasyanti mahāyogaṁ jitātmāno jitendriyāḥ paraṁ pāśupataṁ śrautaṁ bhuktimuktiphalapradam
जितेन्द्रिय और जितात्मा वे लोग वहाँ महान योग का, श्रुति-सम्मत परम पाशुपत-व्रत का अभ्यास करते हैं, जो भोग और मोक्ष दोनों फल देने वाला है।
श्लोक 10 (shiva.kotirudra.23.10)
रोचते मे सदा वासो वाराणस्यां महेश्वरि । हेतुना येन सर्वाणि विहाय शृणु तद् ध्रुवम् ॥ 23.10 ॥
rocate me sadā vāso vārāṇasyāṁ maheśvari hetunā yena sarvāṇi vihāya śṛṇu tad dhruvam
हे महेश्वरी! वाराणसी में मेरा निवास सदा प्रिय लगता है; किस कारण मैंने अन्य सब स्थानों को त्यागकर इसे चुना है, वह निश्चय ही सुनो।
श्लोक 11 (shiva.kotirudra.23.11)
यो मे भक्तश्च विज्ञानी तावुभौ मुक्तिभागिनौ । तीर्थापेक्षा च न तयोर्विहिताविहिते समौ ॥ 23.11 ॥
yo me bhaktaśca vijñānī tāvubhau muktibhāginau tīrthāpekṣā ca na tayorvihitāvihite samau
जो मेरा भक्त है और जो ज्ञानी है, वे दोनों ही मुक्ति के भागी हैं; उन दोनों को किसी तीर्थ की अपेक्षा नहीं रहती, विहित और अविहित दोनों उनके लिए समान हैं।
श्लोक 12 (shiva.kotirudra.23.12)
जीवन्मुक्तौ तु तौ ज्ञेयौ यत्र कुत्रापि वै मृतौ । प्राप्नुतो मोक्षमाश्वेव मयोक्तं निश्चितं वचः ॥ 23.12 ॥
jīvanmuktau tu tau jñeyau yatra kutrāpi vai mṛtau prāpnuto mokṣamāśveva mayoktaṁ niścitaṁ vacaḥ
वे दोनों जीवन्मुक्त ही जानने चाहिए; वे चाहे जहाँ कहीं भी मरें, तत्काल ही मोक्ष प्राप्त करते हैं — यह मेरा निश्चित वचन है।
श्लोक 13 (shiva.kotirudra.23.13)
अत्र तीर्थे विशेषोऽस्त्यविमुक्ताख्ये परोत्तमे । श्रूयतां तत्त्वया देवि परशक्ते सुचित्तया ॥ 23.13 ॥
atra tīrthe viśeṣo’styavimuktākhye parottame śrūyatāṁ tattvayā devi paraśakte sucittayā
किन्तु इस अविमुक्त नामक परम उत्तम तीर्थ में एक विशेषता है; हे देवी! हे परमशक्ति! उसे सुचित्त होकर सुनो।
श्लोक 14 (shiva.kotirudra.23.14)
सर्वे वर्णा आश्रमाश्च बालयौवनवार्धकाः । अस्यां पुर्यां म्रुताश्चेत्स्युर्मुक्ता एव न संशयः ॥ 23.14 ॥
sarve varṇā āśramāśca bālayauvanavārdhakāḥ asyāṁ puryāṁ mrutāścetsyurmuktā eva na saṁśayaḥ
समस्त वर्णों, आश्रमों तथा बाल्य, यौवन और वृद्धावस्था के लोग — यदि वे इस नगरी में मरें, तो वे निःसंदेह मुक्त ही होते हैं।
श्लोक 15 (shiva.kotirudra.23.15)
अशुचिश्च शुचिर्वापि कन्या परिणता तथा । विधवा वाथ वा वन्ध्या रजोदोषयुतापि वा ॥ 23.15 ॥
aśuciśca śucirvāpi kanyā pariṇatā tathā vidhavā vātha vā vandhyā rajodoṣayutāpi vā
अशुद्ध हो या शुद्ध, कन्या हो या विवाहिता, विधवा हो या वन्ध्या, अथवा रजोदोष से युक्त हो —
श्लोक 16 (shiva.kotirudra.23.16)
प्रसूतासंस्कृता कापि यादृशी तादृशी द्विजाः । अत्र क्षेत्रे मृता चेत्स्यान्मोक्षभाङ्नात्र संशयः ॥ 23.16 ॥
prasūtāsaṁskṛtā kāpi yādṛśī tādṛśī dvijāḥ atra kṣetre mṛtā cetsyānmokṣabhāṅnātra saṁśayaḥ
प्रसूता हो या असंस्कृत, हे द्विजो! जैसी भी कोई स्त्री हो, यदि वह इस क्षेत्र में मरे, तो वह निःसंदेह मोक्ष की भागी होती है।
श्लोक 17 (shiva.kotirudra.23.17)
स्वेदजश्चाण्डजो वापि ह्युद्भिज्जोऽथ जरायुजः । मृतो मोक्षमवाप्नोति यथात्र न तथा क्वचित् ॥ 23.17 ॥
svedajaścāṇḍajo vāpi hyudbhijjo’tha jarāyujaḥ mṛto mokṣamavāpnoti yathātra na tathā kvacit
स्वेदज हो, अण्डज हो, उद्भिज हो अथवा जरायुज हो — यहाँ मरा हुआ प्राणी जिस प्रकार मोक्ष प्राप्त करता है, वैसा अन्यत्र कहीं नहीं होता।
श्लोक 18 (shiva.kotirudra.23.18)
ज्ञानापेक्षा न चात्रैव भक्त्यपेक्षा न वै पुनः । कर्मापेक्षा न देव्यत्र दानापेक्षा न चैव हि ॥ 23.18 ॥
jñānāpekṣā na cātraiva bhaktyapekṣā na vai punaḥ karmāpekṣā na devyatra dānāpekṣā na caiva hi
हे देवी! यहाँ न तो ज्ञान की अपेक्षा है, न भक्ति की अपेक्षा है, न कर्म की अपेक्षा है, और न ही दान की अपेक्षा है।
श्लोक 19 (shiva.kotirudra.23.19)
संस्कृत्यपेक्षा नैवात्र ध्यानापेक्षा न कर्हिचित् । नामापेक्षार्चनापेक्षा सुजातीनां तथात्र न ॥ 23.19 ॥
saṁskṛtyapekṣā naivātra dhyānāpekṣā na karhicit nāmāpekṣārcanāpekṣā sujātīnāṁ tathātra na
यहाँ न तो संस्कारों की अपेक्षा है, न कभी ध्यान की अपेक्षा है; न ही नाम की, न पूजा की, और न ही उत्तम जाति में उत्पन्न होने की कोई अपेक्षा है।
श्लोक 20 (shiva.kotirudra.23.20)
मम क्षेत्रे मोक्षदे हि यो वा वसति मानवः । यथा तथा मृतः स्याच्चेन्मोक्षमाप्नोति निश्चितम् ॥ 23.20 ॥
mama kṣetre mokṣade hi yo vā vasati mānavaḥ yathā tathā mṛtaḥ syāccenmokṣamāpnoti niścitam
जो भी मनुष्य मेरे इस मोक्षदायी क्षेत्र में निवास करता है, वह चाहे जैसे भी मरे, वह निश्चय ही मोक्ष प्राप्त करता है।
श्लोक 21 (shiva.kotirudra.23.21)
एतन्मम पुरं दिव्यं गुह्याद् गुह्यतरं प्रिये । ब्रह्मादयोऽपि जानन्ति माहात्म्यं नास्य पार्वति ॥ 23.21 ॥
etanmama puraṁ divyaṁ guhyād guhyataraṁ priye brahmādayo’pi jānanti māhātmyaṁ nāsya pārvati
हे प्रिये! यह मेरी दिव्य नगरी गुह्य से भी अधिक गुह्य है; हे पार्वती! इसकी महिमा को ब्रह्मा आदि भी पूर्ण रूप से नहीं जानते।
श्लोक 22 (shiva.kotirudra.23.22)
महत्क्षेत्रमिदं तस्मादविमुक्तमिति स्मृतम् । सर्वेभ्यो नैमिषादिभ्यः परं मोक्षप्रदं मृते ॥ 23.22 ॥
mahatkṣetramidaṁ tasmādavimuktamiti smṛtam sarvebhyo naimiṣādibhyaḥ paraṁ mokṣapradaṁ mṛte
इसीलिए यह महान क्षेत्र 'अविमुक्त' नाम से स्मरण किया जाता है; यह नैमिष आदि समस्त तीर्थों से बढ़कर, मरने पर परम मोक्ष देने वाला है।
श्लोक 23 (shiva.kotirudra.23.23)
धर्मस्योपनिषत्सत्यं मोक्षस्योपनिषत्समम् । क्षेत्रतीर्थोपनिषदमविमुक्तं विदुर्बुधाः ॥ 23.23 ॥
dharmasyopaniṣatsatyaṁ mokṣasyopaniṣatsamam kṣetratīrthopaniṣadamavimuktaṁ vidurbudhāḥ
धर्म का गुह्य सार सत्य है, मोक्ष का गुह्य सार समता है; अविमुक्त को बुद्धिमान लोग समस्त क्षेत्रों और तीर्थों का गुह्य सार जानते हैं।
श्लोक 24 (shiva.kotirudra.23.24)
कामं भुञ्जन्स्वपन्क्रीडन्कुर्वन्हि विविधाः क्रियाः । अविमुक्ते त्यजन्प्राणाञ्जन्तुर्मोक्षाय कल्पते ॥ 23.24 ॥
kāmaṁ bhuñjansvapankrīḍankurvanhi vividhāḥ kriyāḥ avimukte tyajanprāṇāñjanturmokṣāya kalpate
चाहे भोग भोगते हुए, सोते हुए, क्रीड़ा करते हुए, अथवा नाना प्रकार के कर्म करते हुए ही क्यों न हो — अविमुक्त में प्राण त्यागने वाला प्राणी मोक्ष के योग्य हो जाता है।
श्लोक 25 (shiva.kotirudra.23.25)
कृत्वा पापसहस्राणि पिशाचत्वं वरं नृणाम् । न च क्रतुसहस्रत्वं स्वर्गे काशीं पुरीं विना ॥ 23.25 ॥
kṛtvā pāpasahasrāṇi piśācatvaṁ varaṁ nṛṇām na ca kratusahasratvaṁ svarge kāśīṁ purīṁ vinā
सहस्रों पाप करके भी मनुष्यों के लिए काशी में मरकर पिशाच होना भी श्रेष्ठ है, बनिस्बत काशी नगरी के बिना सहस्रों यज्ञों के फलस्वरूप स्वर्ग प्राप्त करने के।
श्लोक 26 (shiva.kotirudra.23.26)
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन सेव्यते काशिका पुरी । अव्यक्तलिङ्गं मुनिभिर्ध्यायते च सदाशिवः ॥ 23.26 ॥
tasmātsarvaprayatnena sevyate kāśikā purī avyaktaliṅgaṁ munibhirdhyāyate ca sadāśivaḥ
इसलिए सम्पूर्ण प्रयत्न से काशी नगरी की सेवा करनी चाहिए; मुनिजन उस अव्यक्त-लिंग सदाशिव का ध्यान करते हैं।
श्लोक 27 (shiva.kotirudra.23.27)
यद्यत्फलं समुद्दिश्य तपन्त्यत्र नराः प्रिये । तेभ्यश्चाहं प्रयच्छामि सम्यक्तत्तत्फलं ध्रुवम् ॥ 23.27 ॥
yadyatphalaṁ samuddiśya tapantyatra narāḥ priye tebhyaścāhaṁ prayacchāmi samyaktattatphalaṁ dhruvam
हे प्रिये! यहाँ मनुष्य जिस-जिस फल का लक्ष्य रखकर तप करते हैं, मैं उन्हें वह-वह फल निश्चय ही भलीभाँति प्रदान करता हूँ।
श्लोक 28 (shiva.kotirudra.23.28)
सायुज्यमात्मनः पश्चादीप्सितं स्थानमेव च । न कुतश्चित्कर्मबन्धस्त्यजतामत्र वै तनुम् ॥ 23.28 ॥
sāyujyamātmanaḥ paścādīpsitaṁ sthānameva ca na kutaścitkarmabandhastyajatāmatra vai tanum
और उसके पश्चात् वे अपने ही स्वरूप में सायुज्य अथवा अपने इच्छित स्थान को प्राप्त करते हैं; यहाँ शरीर त्यागने वालों को किसी भी कर्म का बन्धन नहीं रहता।
श्लोक 29 (shiva.kotirudra.23.29)
ब्रह्मा देवर्षिभिः सार्धं विष्णुर्वापि दिवाकरः । उपासते महात्मानः सर्वे मामिह चापरे ॥ 23.29 ॥
brahmā devarṣibhiḥ sārdhaṁ viṣṇurvāpi divākaraḥ upāsate mahātmānaḥ sarve māmiha cāpare
ब्रह्मा, देवर्षियों सहित, विष्णु, और सूर्य भी — वे सभी महात्मा और अन्य लोग भी यहाँ मेरी उपासना करते हैं।
श्लोक 30 (shiva.kotirudra.23.30)
विषयासक्तचित्तोऽपि त्यक्तधर्मरुचिर्नरः । इह क्षेत्रे मृतो यो वै संसारं न पुनर्विशेत् ॥ 23.30 ॥
viṣayāsaktacitto’pi tyaktadharmarucirnaraḥ iha kṣetre mṛto yo vai saṁsāraṁ na punarviśet
चाहे मनुष्य का चित्त विषयों में आसक्त ही क्यों न हो और उसने धर्म में रुचि भी त्याग दी हो — इस क्षेत्र में मरने वाला मनुष्य पुनः संसार में प्रवेश नहीं करता।
श्लोक 31 (shiva.kotirudra.23.31)
किं पुनर्निर्ममा धीराः सत्त्वस्था दम्भवर्जिताः । कृतिनश्च निरारम्भाः सर्वे ते मयि भाविताः ॥ 23.31 ॥
kiṁ punarnirmamā dhīrāḥ sattvasthā dambhavarjitāḥ kṛtinaśca nirārambhāḥ sarve te mayi bhāvitāḥ
फिर उन धीर पुरुषों की तो बात ही क्या, जो ममता-रहित, सत्त्वस्थ, पाखण्ड-रहित, कृतकृत्य और आरम्भ-रहित हैं — वे सभी मुझमें ही भावित हैं।
श्लोक 32 (shiva.kotirudra.23.32)
जन्मान्तरसहस्रेषु जन्म योगी समाप्नुयात् । तदिहैव परं मोक्षं मरणादधिगच्छति ॥ 23.32 ॥
janmāntarasahasreṣu janma yogī samāpnuyāt tadihaiva paraṁ mokṣaṁ maraṇādadhigacchati
जो सिद्धि योगी को सहस्रों जन्मों में प्राप्त होती है, वही सिद्धि यहाँ काशी में मरने मात्र से परम मोक्ष के रूप में प्राप्त हो जाती है।
श्लोक 33 (shiva.kotirudra.23.33)
अत्र लिङ्गान्यनेकानि भक्तैः संस्थापितानि हि । सर्वकामप्रदानीह मोक्षदानि च पार्वति ॥ 23.33 ॥
atra liṅgānyanekāni bhaktaiḥ saṁsthāpitāni hi sarvakāmapradānīha mokṣadāni ca pārvati
हे पार्वती! यहाँ भक्तों द्वारा अनेक लिंग स्थापित किये गये हैं, जो समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाले और मोक्ष देने वाले हैं।
श्लोक 34 (shiva.kotirudra.23.34)
पञ्चक्रोशं चतुर्द्दिक्षु क्षेत्रमेतत्प्रकीर्तितम् । समन्ताच्च तथा जन्तोर्मृतिकालेऽमृतप्रदम् ॥ 23.34 ॥
pañcakrośaṁ caturddikṣu kṣetrametatprakīrtitam samantācca tathā jantormṛtikāle’mṛtapradam
यह क्षेत्र चारों दिशाओं में पाँच कोस के विस्तार में कहा गया है; यह सर्वत्र प्राणी को मृत्युकाल में अमृत प्रदान करने वाला है।
श्लोक 35 (shiva.kotirudra.23.35)
अपापश्च मृतो यो वै सद्यो मोक्षं समश्नुते । सपापश्च मृतो यः स्यात्कायव्यूहान्समश्नुते ॥ 23.35 ॥
apāpaśca mṛto yo vai sadyo mokṣaṁ samaśnute sapāpaśca mṛto yaḥ syātkāyavyūhānsamaśnute
जो पापरहित होकर मरता है, वह तत्काल मोक्ष प्राप्त करता है; जो पापयुक्त होकर मरता है, वह अनेक शरीरों के व्यूह से गुजरता है।
श्लोक 36 (shiva.kotirudra.23.36)
यातनां सोऽनुभूयैव पश्चान्मोक्षमवाप्नुयात् । पातकं योऽविमुक्ताख्ये क्षेत्रेऽस्मिन्कुरुते ध्रुवम् ॥ 23.36 ॥
yātanāṁ so’nubhūyaiva paścānmokṣamavāpnuyāt pātakaṁ yo’vimuktākhye kṣetre’sminkurute dhruvam
वह उन कष्टों को भोगकर ही अन्त में मोक्ष प्राप्त करता है; जो कोई इस अविमुक्त नामक क्षेत्र में पाप करता है, उसे निश्चय ही यह भोगना पड़ता है —
श्लोक 37 (shiva.kotirudra.23.37)
भैरवीं यातनां प्राप्य वर्षाणामयुते पुनः । ततो मोक्षमवाप्नोति भुक्त्वा पापं च सुन्दरि ॥ 23.37 ॥
bhairavīṁ yātanāṁ prāpya varṣāṇāmayute punaḥ tato mokṣamavāpnoti bhuktvā pāpaṁ ca sundari
हे सुन्दरी! वह दस हजार वर्षों तक भैरव की भयंकर यातना को भोगकर, अपने पाप को भोग चुकने के पश्चात् ही मोक्ष प्राप्त करता है।
श्लोक 38 (shiva.kotirudra.23.38)
इति ते च समाख्याता पापाचारे च या गतिः । एवं ज्ञात्वा नरः सम्यक्सेवयेदविमुक्तकम् ॥ 23.38 ॥
iti te ca samākhyātā pāpācāre ca yā gatiḥ evaṁ jñātvā naraḥ samyaksevayedavimuktakam
इस प्रकार पापाचरण की जो गति है, वह मैंने तुम्हें बता दी; इसे भलीभाँति जानकर मनुष्य को अविमुक्त-क्षेत्र की सेवा करनी चाहिए।
श्लोक 39 (shiva.kotirudra.23.39)
कृतकर्मक्षयो नास्ति कल्पकोटिशतैरपि । अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम् ॥ 23.39 ॥
kṛtakarmakṣayo nāsti kalpakoṭiśatairapi avaśyameva bhoktavyaṁ kṛtaṁ karma śubhāśubham
किये गये कर्म का क्षय सैकड़ों करोड़ कल्पों में भी नहीं होता; किया गया शुभ या अशुभ कर्म अवश्य ही भोगना पड़ता है।
श्लोक 40 (shiva.kotirudra.23.40)
केवलं चाशुभं कर्म नरकाय भवेदिह । शुभं स्वर्गाय जायेत द्वाभ्यां मानुष्यमीरितम् ॥ 23.40 ॥
kevalaṁ cāśubhaṁ karma narakāya bhavediha śubhaṁ svargāya jāyeta dvābhyāṁ mānuṣyamīritam
केवल अशुभ कर्म यहाँ नरक का कारण बनता है, और शुभ कर्म स्वर्ग का कारण बनता है; इन दोनों के मिश्रण से मनुष्य-योनि की प्राप्ति कही गयी है।
श्लोक 41 (shiva.kotirudra.23.41)
जन्म सम्यगसम्यक् च न्यूनाधिक्ये भवेदिह । उभयोश्च क्षयो मुक्तिर्भवेत्सत्यं हि पार्वति ॥ 23.41 ॥
janma samyagasamyak ca nyūnādhikye bhavediha ubhayośca kṣayo muktirbhavetsatyaṁ hi pārvati
यहाँ शुभ और अशुभ के न्यूनाधिक होने से ही अच्छा या बुरा जन्म प्राप्त होता है; हे पार्वती! दोनों के ही क्षय हो जाने पर सचमुच मुक्ति प्राप्त होती है।
श्लोक 42 (shiva.kotirudra.23.42)
कर्म च त्रिविधं प्रोक्तं कर्मकाण्डे महेश्वरि । सञ्चितं क्रियमाणं च प्रारब्धं चेति बन्धकृत् ॥ 23.42 ॥
karma ca trividhaṁ proktaṁ karmakāṇḍe maheśvari sañcitaṁ kriyamāṇaṁ ca prārabdhaṁ ceti bandhakṛt
हे महेश्वरी! कर्मकाण्ड में कर्म को तीन प्रकार का कहा गया है — संचित, क्रियमाण और प्रारब्ध — जो बन्धन उत्पन्न करने वाले हैं।
श्लोक 43 (shiva.kotirudra.23.43)
पूर्वजन्मसमुद्भूतं सञ्चितं समुदाहृतम् । भुज्यते च शरीरेण प्रारब्धं परिकीर्तितम् ॥ 23.43 ॥
pūrvajanmasamudbhūtaṁ sañcitaṁ samudāhṛtam bhujyate ca śarīreṇa prārabdhaṁ parikīrtitam
जो पूर्वजन्मों से उत्पन्न हुआ है, उसे संचित कहा जाता है; और जो इस शरीर के द्वारा भोगा जा रहा है, वह प्रारब्ध कहलाता है।
श्लोक 44 (shiva.kotirudra.23.44)
अनेन जन्मना यच्च क्रियते कर्म साम्प्रतम् । शुभाशुभं च देवेशि क्रियमाणं विदुर्बुधाः ॥ 23.44 ॥
anena janmanā yacca kriyate karma sāmpratam śubhāśubhaṁ ca deveśi kriyamāṇaṁ vidurbudhāḥ
हे देवेशी! जो शुभ या अशुभ कर्म इस वर्तमान जन्म में किया जाता है, उसे बुद्धिमान लोग क्रियमाण कहते हैं।
श्लोक 45 (shiva.kotirudra.23.45)
प्रारब्धकर्मणो भोगात्क्षयश्चैव न चान्यथा । उपायेन द्वयोर्नाशः कर्मणोः पूजनादिना ॥ 23.45 ॥
prārabdhakarmaṇo bhogātkṣayaścaiva na cānyathā upāyena dvayornāśaḥ karmaṇoḥ pūjanādinā
प्रारब्ध कर्म का क्षय केवल उसे भोगने से ही होता है, अन्यथा नहीं; किन्तु शेष दोनों कर्मों का नाश पूजा आदि उपायों से हो सकता है।
श्लोक 46 (shiva.kotirudra.23.46)
सर्वेषां कर्मणां नाशो नास्ति काशीं पुरीं विना । सर्वं च सुलभं तीर्थं दुर्लभा काशिका पुरी ॥ 23.46 ॥
sarveṣāṁ karmaṇāṁ nāśo nāsti kāśīṁ purīṁ vinā sarvaṁ ca sulabhaṁ tīrthaṁ durlabhā kāśikā purī
काशी नगरी के बिना समस्त कर्मों का नाश सम्भव नहीं है; अन्य समस्त तीर्थ सुलभ हैं, किन्तु काशी नगरी दुर्लभ है।
श्लोक 47 (shiva.kotirudra.23.47)
पूर्वजन्मकृतं चेद्वै काशीदर्शनमादरात् । तदा काशीं च सम्प्राप्य लभेन्मृत्युं न चान्यथा ॥ 23.47 ॥
pūrvajanmakṛtaṁ cedvai kāśīdarśanamādarāt tadā kāśīṁ ca samprāpya labhenmṛtyuṁ na cānyathā
यदि पूर्वजन्म में आदरपूर्वक काशी का दर्शन किया गया हो, तभी मनुष्य काशी को प्राप्त करके यहीं मृत्यु प्राप्त कर पाता है, अन्यथा नहीं।
श्लोक 48 (shiva.kotirudra.23.48)
काशीं प्राप्य नरो यस्तु गङ्गायां स्नानमाचरेत् । तदा च क्रियमाणस्य सञ्चितस्यापि सङ्क्षयः ॥ 23.48 ॥
kāśīṁ prāpya naro yastu gaṅgāyāṁ snānamācaret tadā ca kriyamāṇasya sañcitasyāpi saṅkṣayaḥ
जो मनुष्य काशी को प्राप्त करके गंगा में स्नान करता है, तब उसके क्रियमाण और संचित दोनों कर्मों का भी नाश हो जाता है।
श्लोक 49 (shiva.kotirudra.23.49)
प्रारब्धं न विना भोगं नश्यतीति सुनिश्चितम् । मृतिश्च तस्य सञ्जाता तदा तस्य क्षयो भवेत् ॥ 23.49 ॥
prārabdhaṁ na vinā bhogaṁ naśyatīti suniścitam mṛtiśca tasya sañjātā tadā tasya kṣayo bhavet
यह भलीभाँति निश्चित है कि प्रारब्ध कर्म भोगे बिना नष्ट नहीं होता; किन्तु उसकी मृत्यु हो जाने पर, वह प्रारब्ध भी उसी क्षण नष्ट हो जाता है।
श्लोक 50 (shiva.kotirudra.23.50)
पूर्वं चैव कृता काशी पश्चात्पापं समाचरेत् । तद्बीजेन बलवता नीयते काशिका पुनः ॥ 23.50 ॥
pūrvaṁ caiva kṛtā kāśī paścātpāpaṁ samācaret tadbījena balavatā nīyate kāśikā punaḥ
जिसने पहले काशी का सेवन किया हो, और बाद में पाप का आचरण भी कर लिया हो, तो उसी पूर्वकृत बीज के बल से वह पुनः काशी में लाया जाता है।
श्लोक 51 (shiva.kotirudra.23.51)
तदा सर्वाणि पापानि भस्मसाच्च भवन्ति हि । तस्मात्काशीं नरः सेवेत्कर्मनिर्मूलनीं ध्रुवम् ॥ 23.51 ॥
tadā sarvāṇi pāpāni bhasmasācca bhavanti hi tasmātkāśīṁ naraḥ sevetkarmanirmūlanīṁ dhruvam
तब उसके समस्त पाप भस्म हो जाते हैं; इसलिए मनुष्य को कर्मों को समूल नष्ट करने वाली काशी की सेवा निश्चय ही करनी चाहिए।
श्लोक 52 (shiva.kotirudra.23.52)
एकोऽपि ब्राह्मणो येन काश्यां संवासितः प्रिये । काशीवासमवाप्यैव ततो मुक्तिं स विन्दति ॥ 23.52 ॥
eko’pi brāhmaṇo yena kāśyāṁ saṁvāsitaḥ priye kāśīvāsamavāpyaiva tato muktiṁ sa vindati
हे प्रिये! जिस किसी ने भी एक ब्राह्मण को भी काशी में बसाया हो, वह भी काशी-वास प्राप्त करके ही मुक्ति पाता है।
श्लोक 53 (shiva.kotirudra.23.53)
काश्यां यो वै मृतश्चैव तस्य जन्म पुनर्न हि । समुद्दिश्य प्रयागे च मृतस्य कामनाफलम् ॥ 23.53 ॥
kāśyāṁ yo vai mṛtaścaiva tasya janma punarna hi samuddiśya prayāge ca mṛtasya kāmanāphalam
जो काशी में मरता है, उसका पुनर्जन्म नहीं होता; परन्तु प्रयाग में किसी विशेष कामना को लक्ष्य करके मरने वाले को उस कामना का फल प्राप्त होता है।
श्लोक 54 (shiva.kotirudra.23.54)
संयोगश्च तयोश्चेत्स्यात्काशीजन्यं फलं वृथा । यदि न प्राप्यते तच्च तीर्थराजफलं वृथा ॥ 23.54 ॥
saṁyogaśca tayoścetsyātkāśījanyaṁ phalaṁ vṛthā yadi na prāpyate tacca tīrtharājaphalaṁ vṛthā
यदि दोनों (काशी और प्रयाग) का संयोग हो जाए, और काशी से उत्पन्न फल प्राप्त न हो, तो वह व्यर्थ है; और यदि तीर्थराज (प्रयाग) का फल प्राप्त न हो, तो वह भी व्यर्थ है।
श्लोक 55 (shiva.kotirudra.23.55)
तस्मान्मच्छासनाद्विष्णुः सृष्टिं साक्षाद्धि नूतनाम् । विधाय मनसोद्दिष्टां तत्सिद्धिं यच्छति ध्रुवम् ॥ 23.55 ॥
tasmānmacchāsanādviṣṇuḥ sṛṣṭiṁ sākṣāddhi nūtanām vidhāya manasoddiṣṭāṁ tatsiddhiṁ yacchati dhruvam
इसीलिए मेरी ही आज्ञा से विष्णु प्रत्यक्ष नूतन सृष्टि रचकर, मन में जो कुछ लक्ष्य किया गया हो, उसकी सिद्धि निश्चय ही प्रदान करते हैं।
श्लोक 56 (shiva.kotirudra.23.56)
सूत उवाच । इत्यादि बहुमाहात्म्यं काश्या वै मुनिसत्तमाः । तथा विश्वेश्वरस्यापि भुक्तिमुक्तिप्रदं सताम् ॥ 23.56 ॥
sūta uvāca ityādi bahumāhātmyaṁ kāśyā vai munisattamāḥ tathā viśveśvarasyāpi bhuktimuktipradaṁ satām
सूत जी ने कहा — हे मुनिश्रेष्ठो! इस प्रकार काशी की और विश्वेश्वर की भी यह विपुल महिमा, जो सज्जनों को भोग और मोक्ष दोनों प्रदान करने वाली है, मैंने कह दी।
श्लोक 57 (shiva.kotirudra.23.57)
अतः परं प्रवक्ष्यामि माहात्म्यं त्र्यम्बकस्य च । यच्छ्रुत्वा सर्वपापेभ्यो मुच्यते मानवः क्षणात् ॥ 23.57 ॥
ataḥ paraṁ pravakṣyāmi māhātmyaṁ tryambakasya ca yacchrutvā sarvapāpebhyo mucyate mānavaḥ kṣaṇāt
अब इसके आगे मैं त्र्यम्बक की महिमा का वर्णन करूँगा, जिसे सुनकर मनुष्य क्षणभर में समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।