कोटिरुद्र संहिता · अध्याय 24
गौतम मुनि का प्रभाव
श्लोक 1 (shiva.kotirudra.24.1)
सूत उवाच । श्रूयतामृषयः श्रेष्ठाः कथां पापप्रणाशिनीम् । कथयामि यथा व्यासात्सद्गुरोश्च श्रुता मया ॥ 24.1 ॥
sūta uvāca śrūyatāmṛṣayaḥ śreṣṭhāḥ kathāṁ pāpapraṇāśinīm kathayāmi yathā vyāsātsadgurośca śrutā mayā
सूत जी ने कहा — हे श्रेष्ठ ऋषियो! सुनिए, मैं वह पाप-नाशक कथा कहता हूँ, जैसी मैंने अपने सद्गुरु व्यास जी से सुनी है।
श्लोक 2 (shiva.kotirudra.24.2)
पुरा ऋषिवरश्चासीद्गौतमो नाम विश्रुतः । अहल्या नाम तस्यासीत्पत्नी परमधार्मिकी ॥ 24.2 ॥
purā ṛṣivaraścāsīdgautamo nāma viśrutaḥ ahalyā nāma tasyāsītpatnī paramadhārmikī
प्राचीन काल में गौतम नामक एक विख्यात श्रेष्ठ ऋषि थे; उनकी पत्नी परम धार्मिक अहल्या नामक थीं।
श्लोक 3 (shiva.kotirudra.24.3)
दक्षिणस्यां दिशि हि यो गिरिर्ब्रह्मेति संज्ञकः । तत्र तेन तपस्तप्तं वर्षाणामयुतं तथा ॥ 24.3 ॥
dakṣiṇasyāṁ diśi hi yo girirbrahmeti saṁjñakaḥ tatra tena tapastaptaṁ varṣāṇāmayutaṁ tathā
दक्षिण दिशा में जो पर्वत ब्रह्मगिरि नाम से जाना जाता है, वहाँ उन्होंने दस हजार वर्षों तक तप किया।
श्लोक 4 (shiva.kotirudra.24.4)
कदाचिच्च ह्यनावृष्टिरभवत्तत्र सुव्रताः । वर्षाणां च शतं रौद्री लोका दुःखमुपागताः ॥ 24.4 ॥
kadācicca hyanāvṛṣṭirabhavattatra suvratāḥ varṣāṇāṁ ca śataṁ raudrī lokā duḥkhamupāgatāḥ
हे सुव्रतो! एक बार वहाँ सौ वर्षों तक भयंकर अनावृष्टि हो गया, जिससे लोग अत्यन्त दुःख को प्राप्त हुए।
श्लोक 5 (shiva.kotirudra.24.5)
आर्द्रं च पल्लवं न स्म दृश्यते पृथिवीतले । कुतो जलं विदृश्येत जीवानां प्राणधारकम् ॥ 24.5 ॥
ārdraṁ ca pallavaṁ na sma dṛśyate pṛthivītale kuto jalaṁ vidṛśyeta jīvānāṁ prāṇadhārakam
पृथ्वी पर कहीं भी कोई हरा पत्ता नहीं दिखायी देता था; फिर प्राणियों का प्राण धारण करने वाला जल कहाँ से दिखायी दे सकता था?
श्लोक 6 (shiva.kotirudra.24.6)
तदा ते मुनयश्चैव मनुष्याः पशवस्तथा । पक्षिणश्च मृगास्तत्र गताश्चैव दिशो दश ॥ 24.6 ॥
tadā te munayaścaiva manuṣyāḥ paśavastathā pakṣiṇaśca mṛgāstatra gatāścaiva diśo daśa
तब वे मुनि, मनुष्य, पशु, पक्षी और मृग सभी वहाँ से दसों दिशाओं में चले गये।
श्लोक 7 (shiva.kotirudra.24.7)
तां दृष्ट्वा चर्षयो विप्राः प्राणायामपरायणाः । ध्यानेन च तदा केचित्कालं निन्युः सुदारुणम् ॥ 24.7 ॥
tāṁ dṛṣṭvā carṣayo viprāḥ prāṇāyāmaparāyaṇāḥ dhyānena ca tadā kecitkālaṁ ninyuḥ sudāruṇam
हे विप्रो! उस दुर्दशा को देखकर कुछ ऋषि प्राणायाम में तत्पर होकर, ध्यान के सहारे ही उस अत्यन्त भयंकर समय को व्यतीत करने लगे।
श्लोक 8 (shiva.kotirudra.24.8)
गौतमोऽपि स्वयं तत्र वरुणार्थे तपः शुभम् । चकार चैव षण्मासं प्राणायामपरायणः ॥ 24.8 ॥
gautamo’pi svayaṁ tatra varuṇārthe tapaḥ śubham cakāra caiva ṣaṇmāsaṁ prāṇāyāmaparāyaṇaḥ
गौतम मुनि ने भी स्वयं वहाँ वरुण देव को लक्ष्य करके, प्राणायाम में तत्पर होकर छः मास तक शुभ तप किया।
श्लोक 9 (shiva.kotirudra.24.9)
ततश्च वरुणस्तस्मै वरं दातुं समागतः । प्रसन्नोऽस्मि वरं ब्रूहि ददामि च वचोऽब्रवीत् ॥ 24.9 ॥
tataśca varuṇastasmai varaṁ dātuṁ samāgataḥ prasanno’smi varaṁ brūhi dadāmi ca vaco’bravīt
तब वरुण देव उन्हें वर देने के लिए वहाँ आये और बोले — 'मैं प्रसन्न हूँ, वर माँगो, मैं दूँगा।'
श्लोक 10 (shiva.kotirudra.24.10)
ततश्च गौतमस्तं वै वृष्टिं च प्रार्थयत्तदा । ततः स वरुणस्तं वै प्रत्युवाच मुनिं द्विजाः ॥ 24.10 ॥
tataśca gautamastaṁ vai vṛṣṭiṁ ca prārthayattadā tataḥ sa varuṇastaṁ vai pratyuvāca muniṁ dvijāḥ
तब गौतम ने उनसे वृष्टि की प्रार्थना की; हे द्विजो! तब वरुण ने उस मुनि को यह उत्तर दिया।
श्लोक 11 (shiva.kotirudra.24.11)
वरुण उवाच । देवाज्ञां च समुल्लङ्घ्य कथं कुर्यामहं च ताम् । अन्यत्प्रार्थय सुज्ञोऽसि यदहं करवाणि ते ॥ 24.11 ॥
varuṇa uvāca devājñāṁ ca samullaṅghya kathaṁ kuryāmahaṁ ca tām anyatprārthaya sujño’si yadahaṁ karavāṇi te
वरुण ने कहा — देवताओं की आज्ञा का उल्लंघन करके मैं वह कैसे कर सकता हूँ? तुम स्वयं बुद्धिमान हो, अन्य कुछ माँगो, जो मैं तुम्हारे लिए कर सकूँ।
श्लोक 12 (shiva.kotirudra.24.12)
सूत उवाच । इत्येतद्वचनं तस्य वरुणस्य महात्मनः । परोपकारी तच्छ्रुत्वा गौतमो वाक्यमब्रवीत् ॥ 24.12 ॥
sūta uvāca ityetadvacanaṁ tasya varuṇasya mahātmanaḥ paropakārī tacchrutvā gautamo vākyamabravīt
सूत जी ने कहा — महात्मा वरुण के इस वचन को सुनकर परोपकारी गौतम ने यह वचन कहा।
श्लोक 13 (shiva.kotirudra.24.13)
गौतम उवाच । यदि प्रसन्नो देवेश यदि देयो वरो मम । यदहं प्रार्थयाम्यद्य कर्तव्यं हि त्वया तथा ॥ 24.13 ॥
gautama uvāca yadi prasanno deveśa yadi deyo varo mama yadahaṁ prārthayāmyadya kartavyaṁ hi tvayā tathā
गौतम ने कहा — हे देवेश! यदि आप प्रसन्न हैं, यदि आप मुझे वर देना चाहते हैं, तो आज मैं जो कुछ माँगता हूँ, वह आपको अवश्य पूर्ण करना होगा।
श्लोक 14 (shiva.kotirudra.24.14)
यतस्त्वं जलराशीशस्तस्माद्देयं जलं मम । अक्षयं सर्वदेवेश दिव्यं नित्यफलप्रदम् ॥ 24.14 ॥
yatastvaṁ jalarāśīśastasmāddeyaṁ jalaṁ mama akṣayaṁ sarvadeveśa divyaṁ nityaphalapradam
चूँकि आप जल-राशि के स्वामी हैं, इसलिए मुझे जल ही दीजिए — हे सर्वदेवेश! अक्षय, दिव्य और सदा फल देने वाला जल।
श्लोक 15 (shiva.kotirudra.24.15)
सूत उवाच । इति सम्प्रार्थितस्तेन वरुणो गौतमेन वै । उवाच वचनं तस्मै गर्तश्च क्रियतां त्वया ॥ 24.15 ॥
sūta uvāca iti samprārthitastena varuṇo gautamena vai uvāca vacanaṁ tasmai gartaśca kriyatāṁ tvayā
सूत जी ने कहा — गौतम द्वारा इस प्रकार प्रार्थना किये जाने पर वरुण ने उनसे कहा — तुम एक गड्ढा खोदो।
श्लोक 16 (shiva.kotirudra.24.16)
इत्युक्ते च कृतस्तेन गर्तो हस्तप्रमाणतः । जलेन पूरितस्तेन दिव्येन वरुणेन सः ॥ 24.16 ॥
ityukte ca kṛtastena garto hastapramāṇataḥ jalena pūritastena divyena varuṇena saḥ
ऐसा कहे जाने पर उन्होंने एक हाथ प्रमाण का गड्ढा खोदा, जिसे उस वरुण देव ने दिव्य जल से भर दिया।
श्लोक 17 (shiva.kotirudra.24.17)
अथोवाच मुनिं देवो वरुणो हि जलाधिपः । गौतमं मुनिशार्दूलं परोपकृतिशालिनम् ॥ 24.17 ॥
athovāca muniṁ devo varuṇo hi jalādhipaḥ gautamaṁ muniśārdūlaṁ paropakṛtiśālinam
तत्पश्चात् जल के स्वामी देव वरुण ने परोपकार-शील उस मुनिश्रेष्ठ गौतम से कहा।
श्लोक 18 (shiva.kotirudra.24.18)
वरुण उवाच । अक्षयं च जलं तेऽस्तु तीर्थभूतं महामुने । तव नाम्ना च विख्यातं क्षितावेतद्भविष्यति ॥ 24.18 ॥
varuṇa uvāca akṣayaṁ ca jalaṁ te’stu tīrthabhūtaṁ mahāmune tava nāmnā ca vikhyātaṁ kṣitāvetadbhaviṣyati
वरुण ने कहा — हे महामुने! यह तुम्हारा अक्षय जल तीर्थस्वरूप हो जाए; और यह पृथ्वी पर तुम्हारे ही नाम से प्रसिद्ध होगा।
श्लोक 19 (shiva.kotirudra.24.19)
अत्र दत्तं हुतं तप्तं सुराणां यजनं कृतम् । पितॄणां च कृतं श्राद्धं सर्वमेवाक्षयं भवेत् ॥ 24.19 ॥
atra dattaṁ hutaṁ taptaṁ surāṇāṁ yajanaṁ kṛtam pitṝṇāṁ ca kṛtaṁ śrāddhaṁ sarvamevākṣayaṁ bhavet
यहाँ किया गया दान, हवन, तप, देवताओं का यजन और पितरों का किया गया श्राद्ध — यह सब अक्षय हो जायेगा।
श्लोक 20 (shiva.kotirudra.24.20)
सूत उवाच । इत्युक्तान्तर्दधे देवः स्तुतस्तेन महर्षिणा । गौतमोऽपि सुखं प्राप कृत्वान्योपकृतिं मुनिः ॥ 24.20 ॥
sūta uvāca ityuktāntardadhe devaḥ stutastena maharṣiṇā gautamo’pi sukhaṁ prāpa kṛtvānyopakṛtiṁ muniḥ
सूत जी ने कहा — ऐसा कहकर, उस महर्षि द्वारा स्तुत हुए वरुण देव अन्तर्धान हो गये; गौतम मुनि भी दूसरों का उपकार करके सुख को प्राप्त हुए।
श्लोक 21 (shiva.kotirudra.24.21)
महतो ह्याश्रयः पुंसां महत्त्वायोपजायते । महान्तस्तत्स्वरूपं च पश्यन्ति नेतरेऽशुभाः ॥ 24.21 ॥
mahato hyāśrayaḥ puṁsāṁ mahattvāyopajāyate mahāntastatsvarūpaṁ ca paśyanti netare’śubhāḥ
महापुरुषों का आश्रय ही मनुष्यों की महानता का कारण बनता है; महापुरुषों के उस वास्तविक स्वरूप को महान लोग ही देख पाते हैं, अशुभ लोग नहीं।
श्लोक 22 (shiva.kotirudra.24.22)
यादृङ्नरं च सेवेत तादृशं फलमश्नुते । महतः सेवयोच्चत्वं क्षुद्रस्य क्षुद्रतां तथा ॥ 24.22 ॥
yādṛṅnaraṁ ca seveta tādṛśaṁ phalamaśnute mahataḥ sevayoccatvaṁ kṣudrasya kṣudratāṁ tathā
मनुष्य जैसे व्यक्ति की सेवा करता है, वैसा ही फल पाता है; महान की सेवा से उच्चता प्राप्त होती है, और क्षुद्र की सेवा से क्षुद्रता।
श्लोक 23 (shiva.kotirudra.24.23)
सिंहस्य मन्दिरे सेवा मुक्ताफलकरी मता । शृगालमन्दिरे सेवा त्वस्थिलाभकरी स्मृता ॥ 24.23 ॥
siṁhasya mandire sevā muktāphalakarī matā śṛgālamandire sevā tvasthilābhakarī smṛtā
सिंह के भवन में सेवा करने से मोती-प्राप्ति मानी गयी है, जबकि सियार के बिल में सेवा करने से केवल हड्डी-प्राप्ति ही स्मरण की गयी है।
श्लोक 24 (shiva.kotirudra.24.24)
उत्तमानां स्वभावोऽयं परदुःखासहिष्णुता । स्वयं दुःखं च सम्प्राप्तं मन्यतेऽन्यस्य वार्यते ॥ 24.24 ॥
uttamānāṁ svabhāvo’yaṁ paraduḥkhāsahiṣṇutā svayaṁ duḥkhaṁ ca samprāptaṁ manyate’nyasya vāryate
उत्तम पुरुषों का यह स्वभाव है कि वे दूसरों के दुःख को सहन नहीं कर पाते; वे दूसरों का दुःख देखकर उसे अपना ही दुःख मानते हैं और उसे दूर करने का प्रयत्न करते हैं।
श्लोक 25 (shiva.kotirudra.24.25)
वृक्षाश्च हाटकं चैव चन्दनं चेक्षुकस्तथा । एते भुवि परार्थे च दक्षा एवं न केचन ॥ 24.25 ॥
vṛkṣāśca hāṭakaṁ caiva candanaṁ cekṣukastathā ete bhuvi parārthe ca dakṣā evaṁ na kecana
वृक्ष, स्वर्ण, चन्दन और गन्ना — ये सब इस पृथ्वी पर दूसरों के हित के लिए ही समर्पित रहने में कुशल हैं; ऐसे अन्य कोई नहीं।
श्लोक 26 (shiva.kotirudra.24.26)
दयालुरमदस्पर्श उपकारी जितेन्द्रियः । एतैश्च पुण्यस्तम्भैस्तु चतुर्भिर्धार्यते मही ॥ 24.26 ॥
dayāluramadasparśa upakārī jitendriyaḥ etaiśca puṇyastambhaistu caturbhirdhāryate mahī
दयालु, अहंकार-रहित, उपकारी और जितेन्द्रिय — इन चार पुण्य-स्तम्भों के द्वारा ही यह पृथ्वी धारण की जाती है।
श्लोक 27 (shiva.kotirudra.24.27)
ततश्च गौतमस्तत्र जलं प्राप्य सुदुर्लभम् । नित्यनैमित्तिकं कर्म चकार विधिवत्तदा ॥ 24.27 ॥
tataśca gautamastatra jalaṁ prāpya sudurlabham nityanaimittikaṁ karma cakāra vidhivattadā
तत्पश्चात् गौतम मुनि ने वहाँ वह दुर्लभ जल प्राप्त करके नित्य और नैमित्तिक कर्मों को विधिपूर्वक करना आरम्भ किया।
श्लोक 28 (shiva.kotirudra.24.28)
ततो व्रीहीन् यवांश्चैव नीवारानप्यनेकधा । वापयामास तत्रैव हवनार्थं मुनीश्वरः ॥ 24.28 ॥
tato vrīhīn yavāṁścaiva nīvārānapyanekadhā vāpayāmāsa tatraiva havanārthaṁ munīśvaraḥ
तत्पश्चात् उस मुनिश्रेष्ठ ने हवन के लिए वहीं धान, जौ और नाना प्रकार के नीवार भी बोये।
श्लोक 29 (shiva.kotirudra.24.29)
धान्यानि विविधानीह वृक्षाश्च विविधास्तथा । पुष्पाणि च फलान्येव ह्यासंस्तत्राप्यनेकशः ॥ 24.29 ॥
dhānyāni vividhānīha vṛkṣāśca vividhāstathā puṣpāṇi ca phalānyeva hyāsaṁstatrāpyanekaśaḥ
वहाँ नाना प्रकार के धान्य, नाना प्रकार के वृक्ष तथा पुष्प और फल भी अनेक प्रकार के उत्पन्न हुए।
श्लोक 30 (shiva.kotirudra.24.30)
तच्छ्रुत्वा ऋषयश्चान्ये तत्रायाताः सहस्रशः । पशवः पक्षिणश्चान्ये जीवाश्च बहवोऽगमन् ॥ 24.30 ॥
tacchrutvā ṛṣayaścānye tatrāyātāḥ sahasraśaḥ paśavaḥ pakṣiṇaścānye jīvāśca bahavo’gaman
यह सुनकर अन्य ऋषिगण भी सहस्रों की संख्या में वहाँ आये; पशु, पक्षी और अन्य अनेक जीव भी वहाँ आ गये।
श्लोक 31 (shiva.kotirudra.24.31)
तद्वनं सुन्दरं ह्यासीत्पृथिव्यां मण्डले परम् । तदक्षयजलायोगादनावृष्टिर्न दुःखदा ॥ 24.31 ॥
tadvanaṁ sundaraṁ hyāsītpṛthivyāṁ maṇḍale param tadakṣayajalāyogādanāvṛṣṭirna duḥkhadā
वह वन पृथ्वी-मण्डल पर परम सुन्दर हो गया; उस अक्षय जल के संयोग से अनावृष्टि भी अब दुःखदायी नहीं रह गयी।
श्लोक 32 (shiva.kotirudra.24.32)
ऋषयोऽपि वने तत्र शुभकर्मपरायणाः । वासं चक्रुरनेके च शिष्यभार्यासुतान्विताः ॥ 24.32 ॥
ṛṣayo’pi vane tatra śubhakarmaparāyaṇāḥ vāsaṁ cakruraneke ca śiṣyabhāryāsutānvitāḥ
शुभ कर्मों में तत्पर अनेक ऋषि भी अपने शिष्यों, पत्नियों और पुत्रों सहित उस वन में निवास करने लगे।
श्लोक 33 (shiva.kotirudra.24.33)
धान्यानि वापयामासुः कालक्रमणहेतवे । आनन्दस्तद्वने ह्यासीत्प्रभावाद्गौतमस्य च ॥ 24.33 ॥
dhānyāni vāpayāmāsuḥ kālakramaṇahetave ānandastadvane hyāsītprabhāvādgautamasya ca
उन्होंने अपना समय व्यतीत करने के लिए वहाँ धान्य बोये; गौतम के ही प्रभाव से उस वन में सर्वत्र आनन्द व्याप्त हो गया।