कोटिरुद्र संहिता · अध्याय 25
गौतम की प्रायश्चित्त-व्यवस्था का वर्णन
श्लोक 1 (shiva.kotirudra.25.1)
सूत उवाच । कदाचिद्गौतमेनैव जलार्थं प्रेषिता निजाः । शिष्यास्तत्र गता भक्त्या कमण्डलुकरा द्विजाः ॥ 25.1 ॥
sūta uvāca kadācidgautamenaiva jalārthaṁ preṣitā nijāḥ śiṣyāstatra gatā bhaktyā kamaṇḍalukarā dvijāḥ
सूत ने कहा — एक बार गौतम ने अपने शिष्यों को जल लाने के लिए भेजा; कमण्डलु हाथ में लिए वे द्विज शिष्य भक्तिपूर्वक वहाँ गए।
श्लोक 2 (shiva.kotirudra.25.2)
शिष्यान् जलसमीपे तु गतान्दृष्ट्वा न्यषेधयन् । जलार्थमागतास्तत्र चर्षिपत्न्योऽप्यनेकशः ॥ 25.2 ॥
śiṣyān jalasamīpe tu gatāndṛṣṭvā nyaṣedhayan jalārthamāgatāstatra carṣipatnyo’pyanekaśaḥ
जल के समीप पहुँचे शिष्यों को देखकर, जल लेने के लिए वहाँ आई हुई अनेक ऋषि-पत्नियों ने भी उन्हें रोक दिया।
श्लोक 3 (shiva.kotirudra.25.3)
ऋषिपत्न्यो वयं पूर्वं ग्रहीष्यामो विदूरतः । पश्चाच्चैव जलं ग्राह्यमित्येवं पर्यभर्त्सयन् ॥ 25.3 ॥
ṛṣipatnyo vayaṁ pūrvaṁ grahīṣyāmo vidūrataḥ paścāccaiva jalaṁ grāhyamityevaṁ paryabhartsayan
"हम ऋषि-पत्नियाँ पहले दूर से जल भर लेंगी, उसके बाद ही जल लिया जाए" — इस प्रकार उन्होंने उन्हें डाँटकर कहा।
श्लोक 4 (shiva.kotirudra.25.4)
परावृत्य तदा तैश्च ऋषिपत्न्यै निवेदितम् । सा चापि तान्समादाय समाश्वास्य च तैः स्वयम् ॥ 25.4 ॥
parāvṛtya tadā taiśca ṛṣipatnyai niveditam sā cāpi tānsamādāya samāśvāsya ca taiḥ svayam
तब लौटकर उन शिष्यों ने यह बात गौतम की पत्नी से निवेदन की; और उसने भी उन्हें साथ लेकर स्वयं सांत्वना देकर,
श्लोक 5 (shiva.kotirudra.25.5)
जलं नीत्वा ददौ तस्मै गौतमाय तपस्विनी । नित्यं निर्वाहयामास जलेन ऋषिसत्तमः ॥ 25.5 ॥
jalaṁ nītvā dadau tasmai gautamāya tapasvinī nityaṁ nirvāhayāmāsa jalena ṛṣisattamaḥ
जल लाकर उसे गौतम को दिया; इस प्रकार वह तपस्विनी नित्य जल से उस श्रेष्ठ ऋषि का निर्वाह करती रही।
श्लोक 6 (shiva.kotirudra.25.6)
ताश्चैवमृषिपत्न्यस्तु क्रुद्धास्तां पर्यभर्त्सयन् । परावृत्य गताः सर्वास्तूटजान्कुटिलाशयाः ॥ 25.6 ॥
tāścaivamṛṣipatnyastu kruddhāstāṁ paryabhartsayan parāvṛtya gatāḥ sarvāstūṭajānkuṭilāśayāḥ
यह देखकर वे ऋषि-पत्नियाँ क्रुद्ध होकर उसे भला-बुरा कहने लगीं, और कुटिल हृदय वाली वे सब लौटकर अपनी कुटियों में चली गईं।
श्लोक 7 (shiva.kotirudra.25.7)
स्वाम्यग्रे विपरीतं च तद्वृत्तं निखिलं ततः । दुष्टाशयाभिः स्त्रीभिश्च ताभिर्वै विनिवेदितम् ॥ 25.7 ॥
svāmyagre viparītaṁ ca tadvṛttaṁ nikhilaṁ tataḥ duṣṭāśayābhiḥ strībhiśca tābhirvai viniveditam
फिर उन दुष्ट हृदय वाली स्त्रियों ने उस पूरे वृत्तान्त को अपने-अपने पतियों के समक्ष विपरीत रूप में कह सुनाया।
श्लोक 8 (shiva.kotirudra.25.8)
अथ तासां वचः श्रुत्वा भाविकर्मवशात्तदा । गौतमाय च सङ्क्रुद्धाश्चासंस्ते परमर्षयः ॥ 25.8 ॥
atha tāsāṁ vacaḥ śrutvā bhāvikarmavaśāttadā gautamāya ca saṅkruddhāścāsaṁste paramarṣayaḥ
उनकी बात सुनकर, भावी कर्म के वशीभूत होकर, वे महर्षि गौतम पर अत्यन्त क्रुद्ध हो उठे।
श्लोक 9 (shiva.kotirudra.25.9)
विघ्नार्थं गौतमस्यैव नानापूजोपहारकैः । गणेशं पूजयामासुः सङ्क्रुद्धास्ते कुबुद्धयः ॥ 25.9 ॥
vighnārthaṁ gautamasyaiva nānāpūjopahārakaiḥ gaṇeśaṁ pūjayāmāsuḥ saṅkruddhāste kubuddhayaḥ
गौतम के लिए विघ्न उत्पन्न करने हेतु, उन क्रुद्ध एवं कुबुद्धि ऋषियों ने अनेक पूजा-उपहारों से गणेश की आराधना की।
श्लोक 10 (shiva.kotirudra.25.10)
आविर्बभूव च तदा प्रसन्नो हि गणेश्वरः । उवाच वचनं तत्र भक्ताधीनः फलप्रदः ॥ 25.10 ॥
āvirbabhūva ca tadā prasanno hi gaṇeśvaraḥ uvāca vacanaṁ tatra bhaktādhīnaḥ phalapradaḥ
तब प्रसन्न होकर गणेश्वर वहाँ प्रकट हुए; भक्तों के अधीन रहने वाले और फल देने वाले उन्होंने वहाँ यह वचन कहा।
श्लोक 11 (shiva.kotirudra.25.11)
गणेश उवाच । प्रसन्नोऽस्मि वरं ब्रूत यूयं किं करवाण्यहम् । तदीयं तद्वचः श्रुत्वा ऋषयस्तेऽब्रुवंस्तदा ॥ 25.11 ॥
gaṇeśa uvāca prasanno’smi varaṁ brūta yūyaṁ kiṁ karavāṇyaham tadīyaṁ tadvacaḥ śrutvā ṛṣayaste’bruvaṁstadā
गणेश ने कहा — "मैं प्रसन्न हूँ, वर माँगो; मैं तुम्हारे लिए क्या करूँ?" उनका यह वचन सुनकर तब ऋषियों ने कहा —
श्लोक 12 (shiva.kotirudra.25.12)
ऋषय ऊचुः । त्वया यदि वरो देयो गौतमः स्वाश्रमाद बहिः । निष्काश्यमानो ऋषिभिः परिभर्त्स्य तथा कुरु ॥ 25.12 ॥
ṛṣaya ūcuḥ tvayā yadi varo deyo gautamaḥ svāśramāda bahiḥ niṣkāśyamāno ṛṣibhiḥ paribhartsya tathā kuru
ऋषियों ने कहा — "यदि आप वर देना चाहते हैं, तो ऐसा कीजिए कि गौतम को ऋषियों द्वारा फटकारकर उसके अपने ही आश्रम से बाहर निकलवा दिया जाए।"
श्लोक 13 (shiva.kotirudra.25.13)
सूत उवाच । स एवं प्रार्थितस्तैस्तु विहस्य वचनं पुनः । प्रोवाचेभमुखः प्रीत्या बोधयंस्तान्सतां गतिः ॥ 25.13 ॥
sūta uvāca sa evaṁ prārthitastaistu vihasya vacanaṁ punaḥ provācebhamukhaḥ prītyā bodhayaṁstānsatāṁ gatiḥ
सूत ने कहा — इस प्रकार उनके द्वारा प्रार्थना किए जाने पर, गजमुख गणेश, जो सज्जनों के आश्रयदाता हैं, मुस्कराते हुए पुनः प्रेमपूर्वक उन्हें समझाते हुए बोले।
श्लोक 14 (shiva.kotirudra.25.14)
गणेश उवाच । श्रूयतामृषयः सर्वे युक्तं न क्रियतेऽधुना । अपराधं विना तस्मै क्रुध्यतां हानिरेव च ॥ 25.14 ॥
gaṇeśa uvāca śrūyatāmṛṣayaḥ sarve yuktaṁ na kriyate’dhunā aparādhaṁ vinā tasmai krudhyatāṁ hānireva ca
गणेश ने कहा — "हे समस्त ऋषियो! सुनिए, अभी जो किया जा रहा है वह उचित नहीं है। बिना किसी अपराध के उस पर क्रोध करना केवल हानि ही है।"
श्लोक 15 (shiva.kotirudra.25.15)
उपस्कृतं पुरा यैस्तु तेभ्यो दुःखं हितं न हि । यदा च दीयते दुःखं तदा नाशो भवेदिह ॥ 25.15 ॥
upaskṛtaṁ purā yaistu tebhyo duḥkhaṁ hitaṁ na hi yadā ca dīyate duḥkhaṁ tadā nāśo bhavediha
जिन्होंने पूर्व में हमारा उपकार किया हो, उन्हें दुःख देना हितकर नहीं है; जब ऐसे व्यक्ति को दुःख दिया जाता है, तब यहाँ विनाश ही होता है।
श्लोक 16 (shiva.kotirudra.25.16)
ईदृशं च तपः कृत्वा साध्यते फलमुत्तमम् । शुभं फलं स्वयं हित्वा साध्यते नाहितं पुनः ॥ 25.16 ॥
īdṛśaṁ ca tapaḥ kṛtvā sādhyate phalamuttamam śubhaṁ phalaṁ svayaṁ hitvā sādhyate nāhitaṁ punaḥ
ऐसी तपस्या करने से उत्तम फल की प्राप्ति होती है; शुभ फल को स्वयं त्यागकर अहितकर फल पुनः प्राप्त नहीं करना चाहिए।
श्लोक 17 (shiva.kotirudra.25.17)
सूत उवाच । इत्येवं वचनं श्रुत्वा तस्य ते मुनिसत्तमाः । बुद्धिमोहं तदा प्राप्ता इदमेव वचोऽब्रुवन् ॥ 25.17 ॥
sūta uvāca ityevaṁ vacanaṁ śrutvā tasya te munisattamāḥ buddhimohaṁ tadā prāptā idameva vaco’bruvan
सूत ने कहा — उनका यह वचन सुनकर वे श्रेष्ठ मुनि बुद्धि-मोह को प्राप्त होकर यही वचन बोले।
श्लोक 18 (shiva.kotirudra.25.18)
ऋषय ऊचुः ॥ कर्तव्यं हि त्वया स्वामिन्निदमेव न चान्यथा । इत्युक्तस्तु तदा देवो गणेशो वाक्यमब्रवीत् ॥ 25.18 ॥
ṛṣaya ūcuḥ kartavyaṁ hi tvayā svāminnidameva na cānyathā ityuktastu tadā devo gaṇeśo vākyamabravīt
ऋषियों ने कहा — "हे स्वामिन्! आपको यही करना होगा, अन्यथा नहीं।" ऐसा कहे जाने पर तब भगवान गणेश ने यह वचन कहा।
श्लोक 19 (shiva.kotirudra.25.19)
गणेश उवाच । असाधुः साधुतां चैव साधुश्चासाधुतां तथा । कदाचिदपि नाप्नोति ब्रह्मोक्तमिति निश्चितम् ॥ 25.19 ॥
gaṇeśa uvāca asādhuḥ sādhutāṁ caiva sādhuścāsādhutāṁ tathā kadācidapi nāpnoti brahmoktamiti niścitam
गणेश ने कहा — "यह निश्चित है, जैसा ब्रह्मा ने कहा है, कि दुष्ट व्यक्ति कभी साधुता को नहीं प्राप्त होता और साधु कभी दुष्टता को नहीं प्राप्त होता।"
श्लोक 20 (shiva.kotirudra.25.20)
यदा च भवतां दुःखं जातं चानशनात्पुरा । तदा सुखं प्रदत्तं वै गौतमेन महर्षिणा ॥ 25.20 ॥
yadā ca bhavatāṁ duḥkhaṁ jātaṁ cānaśanātpurā tadā sukhaṁ pradattaṁ vai gautamena maharṣiṇā
जब पूर्वकाल में उपवास के कारण तुम्हें दुःख हुआ था, तब महर्षि गौतम ने ही तुम्हें सुख प्रदान किया था।
श्लोक 21 (shiva.kotirudra.25.21)
इदानीं वै भवद्भिश्च तस्मै दुःखं प्रदीयते । नैतद्युक्ततमं लोके सर्वथा सुविचार्यताम् ॥ 25.21 ॥
idānīṁ vai bhavadbhiśca tasmai duḥkhaṁ pradīyate naitadyuktatamaṁ loke sarvathā suvicāryatām
अब तुम उसे ही दुःख दे रहे हो; यह संसार में सर्वथा उचित नहीं है — इस पर भलीभाँति विचार करो।
श्लोक 22 (shiva.kotirudra.25.22)
स्त्रीबलान्मोहिता यूयं न मे वाक्यं करिष्यथ । एतद्धिततमं तस्य भविष्यति न संशयः ॥ 25.22 ॥
strībalānmohitā yūyaṁ na me vākyaṁ kariṣyatha etaddhitatamaṁ tasya bhaviṣyati na saṁśayaḥ
स्त्रियों के बल से मोहित होकर तुम मेरी बात नहीं मानोगे; परन्तु निःसंदेह यही उसके लिए परम हितकर सिद्ध होगा।
श्लोक 23 (shiva.kotirudra.25.23)
पुनश्चायमृषिश्रेष्ठो दास्यते वः सुखं ध्रुवम् । तारणं न च युक्तं स्याद्वरमन्यं वृणीत वै ॥ 25.23 ॥
punaścāyamṛṣiśreṣṭho dāsyate vaḥ sukhaṁ dhruvam tāraṇaṁ na ca yuktaṁ syādvaramanyaṁ vṛṇīta vai
तथा यह श्रेष्ठ ऋषि निश्चय ही तुम्हें पुनः सुख देगा; इस कार्य में सहायता करना उचित नहीं होगा — तुम कोई अन्य वर माँग लो।
श्लोक 24 (shiva.kotirudra.25.24)
सूत उवाच । इत्येवं वचनं तेन गणेशेन महात्मना । यद्यप्युक्तमृषिभ्यश्च तदप्येते न मेनिरे ॥ 25.24 ॥
sūta uvāca ityevaṁ vacanaṁ tena gaṇeśena mahātmanā yadyapyuktamṛṣibhyaśca tadapyete na menire
सूत ने कहा — महात्मा गणेश द्वारा ऋषियों से इस प्रकार कहे जाने पर भी, उन्होंने इसे स्वीकार नहीं किया।
श्लोक 25 (shiva.kotirudra.25.25)
भक्ताधीनतया सोऽथ शिवपुत्रोऽब्रवीत्तदा । उदासीनेन मनसा तानृषीन्दुष्टशेमुषीन् ॥ 25.25 ॥
bhaktādhīnatayā so’tha śivaputro’bravīttadā udāsīnena manasā tānṛṣīnduṣṭaśemuṣīn
तब भक्तों के अधीन होने के कारण शिवपुत्र गणेश ने उदासीन मन से उन दुष्टबुद्धि ऋषियों से कहा।
श्लोक 26 (shiva.kotirudra.25.26)
गणेश उवाच । भवद्भिः प्रार्थ्यते यच्च करिष्येऽहं तथा खलु । पश्चाद्भावि भवेदेव इत्युक्त्वान्तर्दधे पुनः ॥ 25.26 ॥
gaṇeśa uvāca bhavadbhiḥ prārthyate yacca kariṣye’haṁ tathā khalu paścādbhāvi bhavedeva ityuktvāntardadhe punaḥ
गणेश ने कहा — "तुम जो चाहते हो, मैं वही करूँगा; आगे जो होना है वह अवश्य होकर रहेगा।" ऐसा कहकर वे पुनः अन्तर्धान हो गए।
श्लोक 27 (shiva.kotirudra.25.27)
गौतमः स न जानाति मुनीनां वै दुराशयम् । आनन्दमनसा नित्यं पत्न्या कर्म चकार तत् ॥ 25.27 ॥
gautamaḥ sa na jānāti munīnāṁ vai durāśayam ānandamanasā nityaṁ patnyā karma cakāra tat
गौतम को ऋषियों के दुर्भाव का कुछ भी ज्ञान नहीं था; वे प्रसन्न मन से नित्य अपनी पत्नी के साथ अपने नित्यकर्म करते रहे।
श्लोक 28 (shiva.kotirudra.25.28)
तदन्तरे च यज्जातं चरित्रं वरयोगतः । तद्दुष्टर्षिप्रभावात्तु श्रूयतां तन्मुनीश्वराः ॥ 25.28 ॥
tadantare ca yajjātaṁ caritraṁ varayogataḥ tadduṣṭarṣiprabhāvāttu śrūyatāṁ tanmunīśvarāḥ
इसी बीच वर के प्रभाव से तथा उन दुष्ट ऋषियों के प्रभाव से जो घटना घटी, हे मुनीश्वरो! उसे सुनिए।
श्लोक 29 (shiva.kotirudra.25.29)
गौतमस्य च केदारे तत्रासन्व्रीहयो यवाः । गणेशस्तत्र गौर्भूत्वा जगाम किल दुर्बला ॥ 25.29 ॥
gautamasya ca kedāre tatrāsanvrīhayo yavāḥ gaṇeśastatra gaurbhūtvā jagāma kila durbalā
गौतम के खेत में धान और जौ खड़े थे; वहाँ गणेश एक दुर्बल गाय का रूप धारण कर पहुँचे।
श्लोक 30 (shiva.kotirudra.25.30)
कम्पमाना च सा गत्वा तत्र तद्वरयोगतः । व्रीहीन्सम्भक्षयामास यवांश्च मुनिसत्तमाः ॥ 25.30 ॥
kampamānā ca sā gatvā tatra tadvarayogataḥ vrīhīnsambhakṣayāmāsa yavāṁśca munisattamāḥ
वह काँपती हुई गाय वहाँ पहुँचकर, उस वर के प्रभाव से, हे श्रेष्ठ मुनियो! धान और जौ को खा गई।
श्लोक 31 (shiva.kotirudra.25.31)
एतस्मिन्नन्तरे दैवाद् गौतमस्तत्र चागतः । स दयालुस्तृणस्तम्बैर्वारयामास तां तदा ॥ 25.31 ॥
etasminnantare daivād gautamastatra cāgataḥ sa dayālustṛṇastambairvārayāmāsa tāṁ tadā
इसी बीच दैवयोग से गौतम वहाँ आ पहुँचे; दयालु स्वभाव के कारण उन्होंने उसे तब तृण के गुच्छे से हटाने का प्रयत्न किया।
श्लोक 32 (shiva.kotirudra.25.32)
तृणस्तम्बेन सा स्पृष्टा पपात पृथिवीतले । मृता च तत्क्षणादेव तदृषेः पश्यतस्तदा ॥ 25.32 ॥
tṛṇastambena sā spṛṣṭā papāta pṛthivītale mṛtā ca tatkṣaṇādeva tadṛṣeḥ paśyatastadā
तृण के गुच्छे के स्पर्श मात्र से वह गाय पृथ्वी पर गिर पड़ी, और उस ऋषि के देखते-देखते उसी क्षण मर गई।
श्लोक 33 (shiva.kotirudra.25.33)
ऋषयश्छन्नरूपास्ते ऋषिपत्न्यस्तथाशुभाः । ऊचुस्तत्र तदा सर्वे किं कृतं गौतमेन च ॥ 25.33 ॥
ṛṣayaśchannarūpāste ṛṣipatnyastathāśubhāḥ ūcustatra tadā sarve kiṁ kṛtaṁ gautamena ca
वे छद्मरूपधारी ऋषि तथा वे अशुभ ऋषि-पत्नियाँ सब वहाँ उपस्थित होकर बोल उठे — "गौतम ने यह क्या कर डाला!"
श्लोक 34 (shiva.kotirudra.25.34)
गौतमोऽपि तथाहल्यामाहूयासीत्सुविस्मितः । उवाच दुःखतो विप्रा दूयमानेन चेतसा ॥ 25.34 ॥
gautamo’pi tathāhalyāmāhūyāsītsuvismitaḥ uvāca duḥkhato viprā dūyamānena cetasā
अत्यन्त विस्मित गौतम ने भी अहल्या को बुलाया और, हे विप्रो! व्यथित हृदय से दुःखपूर्वक कहा।
श्लोक 35 (shiva.kotirudra.25.35)
गौतम उवाच । किं जातं च कथं देवि कुपितः परमेश्वरः । किं कर्तव्यं क्व गन्तव्यं हत्या च समुपस्थिता ॥ 25.35 ॥
gautama uvāca kiṁ jātaṁ ca kathaṁ devi kupitaḥ parameśvaraḥ kiṁ kartavyaṁ kva gantavyaṁ hatyā ca samupasthitā
गौतम ने कहा — "हे देवि! यह क्या हो गया, और कैसे? क्या परमेश्वर कुपित हो गए हैं? अब क्या करना चाहिए, कहाँ जाना चाहिए — यह गोहत्या तो हम पर आ पड़ी है।"
श्लोक 36 (shiva.kotirudra.25.36)
सूत उवाच । एतस्मिन्नन्तरे विप्रा गौतमं पर्यभर्त्सयन् । विप्रपत्न्यस्तथाहल्यां दुर्वचोभिर्व्यथां ददुः ॥ 25.36 ॥
sūta uvāca etasminnantare viprā gautamaṁ paryabhartsayan viprapatnyastathāhalyāṁ durvacobhirvyathāṁ daduḥ
सूत ने कहा — इसी बीच ब्राह्मणों ने गौतम को भला-बुरा कहा, और ब्राह्मण-पत्नियों ने कटु वचनों से अहल्या को भी व्यथित किया।
श्लोक 37 (shiva.kotirudra.25.37)
दुर्बुद्धयश्च तच्छिष्याः सुतास्तेषां तथैव च । गौतमं परिभर्त्स्यैव प्रत्यूचुर्धिग्वचो मुहुः ॥ 25.37 ॥
durbuddhayaśca tacchiṣyāḥ sutāsteṣāṁ tathaiva ca gautamaṁ paribhartsyaiva pratyūcurdhigvaco muhuḥ
उनके दुर्बुद्धि शिष्यों तथा पुत्रों ने भी गौतम की भर्त्सना करते हुए बार-बार धिक्कार के वचन कहे।
श्लोक 38 (shiva.kotirudra.25.38)
ऋषय ऊचुः । मुखं न दर्शनीयं ते गम्यतां गम्यतामिति । दृष्ट्वा गोघ्नमुखं सद्यः सचैलं स्नानमाचरेत् ॥ 25.38 ॥
ṛṣaya ūcuḥ mukhaṁ na darśanīyaṁ te gamyatāṁ gamyatāmiti dṛṣṭvā goghnamukhaṁ sadyaḥ sacailaṁ snānamācaret
ऋषियों ने कहा — "तेरा मुख देखने योग्य नहीं है, दूर हट, दूर हट! जिसने गोहन्ता का मुख देख लिया हो, उसे तुरन्त वस्त्र सहित स्नान करना चाहिए।"
श्लोक 39 (shiva.kotirudra.25.39)
यावदाश्रममध्ये त्वं तावदेव हविर्भुजः । पितरश्च न गृह्णन्ति ह्यस्मद्दत्तं हि किञ्चन ॥ 25.39 ॥
yāvadāśramamadhye tvaṁ tāvadeva havirbhujaḥ pitaraśca na gṛhṇanti hyasmaddattaṁ hi kiñcana
जब तक तू इस आश्रम में है, तब तक अग्निदेव और पितर हमारे द्वारा दिया गया कुछ भी ग्रहण नहीं करेंगे।
श्लोक 40 (shiva.kotirudra.25.40)
तस्माद्गच्छान्यतस्त्वं च परिवारसमन्वितः । विलम्बं कुरु नैव त्वं धेनुहन्पापकारक ॥ 25.40 ॥
tasmādgacchānyatastvaṁ ca parivārasamanvitaḥ vilambaṁ kuru naiva tvaṁ dhenuhanpāpakāraka
अतः तू अपने परिवार सहित कहीं और चला जा; हे गोहत्यारे पापी! विलम्ब मत कर।
श्लोक 41 (shiva.kotirudra.25.41)
सूत उवाच । इत्युक्त्वा ते च तं सर्वे पाषाणैः समताडयन् । व्यथां ददुरतीवास्मै त्वहल्यां च दुरुक्तिभिः ॥ 25.41 ॥
sūta uvāca ityuktvā te ca taṁ sarve pāṣāṇaiḥ samatāḍayan vyathāṁ daduratīvāsmai tvahalyāṁ ca duruktibhiḥ
सूत ने कहा — ऐसा कहकर उन सबने उसे पत्थरों से मारा और अत्यन्त पीड़ा पहुँचाई, तथा कटु वचनों से अहल्या को भी व्यथित किया।
श्लोक 42 (shiva.kotirudra.25.42)
ताडितो भर्त्सितो दुष्टैर्गौतमो गिरमब्रवीत् । इतो गच्छामि मुनयो ह्यन्यत्र निवसाम्यहम् ॥ 25.42 ॥
tāḍito bhartsito duṣṭairgautamo giramabravīt ito gacchāmi munayo hyanyatra nivasāmyaham
उन दुष्टों द्वारा मारे और फटकारे जाने पर गौतम ने कहा — "हे मुनियो! मैं यहाँ से जाता हूँ, अन्यत्र निवास करूँगा।"
श्लोक 43 (shiva.kotirudra.25.43)
इत्युक्त्वा गौतमस्तस्मात्स्थानाच्च निर्गतस्तदा । गत्वा क्रोशं तदा चक्रे ह्याश्रमं तदनुज्ञया ॥ 25.43 ॥
ityuktvā gautamastasmātsthānācca nirgatastadā gatvā krośaṁ tadā cakre hyāśramaṁ tadanujñayā
ऐसा कहकर गौतम उस स्थान से निकल गए, और लगभग एक कोस दूर जाकर, उनकी अनुमति से वहाँ एक आश्रम बना लिया।
श्लोक 44 (shiva.kotirudra.25.44)
यावच्चैवाभिशापो वै तावत्कार्यं न किञ्चन । न कर्मण्यधिकारोऽस्ति दैवे पित्र्येऽथ वैदिके ॥ 25.44 ॥
yāvaccaivābhiśāpo vai tāvatkāryaṁ na kiñcana na karmaṇyadhikāro’sti daive pitrye’tha vaidike
जब तक यह दोष बना रहे, तब तक कोई भी कर्म नहीं करना चाहिए; न दैव कर्म में, न पितृ कर्म में, न ही वैदिक कर्म में अधिकार रहता है।
श्लोक 45 (shiva.kotirudra.25.45)
मासार्धं च ततो नीत्वा मुनीन्सम्प्रार्थयत्तदा । गौतमो मुनिवर्यः स तेन दुःखेन दुखितः ॥ 25.45 ॥
māsārdhaṁ ca tato nītvā munīnsamprārthayattadā gautamo munivaryaḥ sa tena duḥkhena dukhitaḥ
तत्पश्चात् आधा माह बीत जाने पर, उस दुःख से दुखी होकर श्रेष्ठ मुनि गौतम ने ऋषियों से प्रार्थना की।
श्लोक 46 (shiva.kotirudra.25.46)
गौतम उवाच । अनुकम्प्यो भवद्भिश्च कथ्यतां क्रियते मया । यथा मदीयं पापं च गच्छत्विति निवेद्यताम् ॥ 25.46 ॥
gautama uvāca anukampyo bhavadbhiśca kathyatāṁ kriyate mayā yathā madīyaṁ pāpaṁ ca gacchatviti nivedyatām
गौतम ने कहा — "आप लोग मुझ पर अनुकम्पा करें और बताएँ कि मुझे क्या करना चाहिए, जिससे मेरा यह पाप दूर हो जाए — कृपया मुझे बताइए।"
श्लोक 47 (shiva.kotirudra.25.47)
सूत उवाच । इत्युक्तास्ते तदा विप्रा नोचुश्चैव परस्परम् । अत्यन्तं सेवया पृष्टा मिलिता ह्येकतः स्थिताः ॥ 25.47 ॥
sūta uvāca ityuktāste tadā viprā nocuścaiva parasparam atyantaṁ sevayā pṛṣṭā militā hyekataḥ sthitāḥ
सूत ने कहा — इस प्रकार कहे जाने पर वे ब्राह्मण आपस में कुछ न बोले; उसकी सेवा से अत्यन्त प्रभावित होकर वे सब एकत्र होकर साथ खड़े हो गए।
श्लोक 48 (shiva.kotirudra.25.48)
गौतमो दूरतः स्थित्वा नत्वा तानृषिसत्तमान् । पप्रच्छ विनयाविष्टः किं कार्यं हि मयाधुना ॥ 25.48 ॥
gautamo dūrataḥ sthitvā natvā tānṛṣisattamān papraccha vinayāviṣṭaḥ kiṁ kāryaṁ hi mayādhunā
गौतम ने दूर खड़े होकर उन श्रेष्ठ ऋषियों को प्रणाम कर, विनयपूर्वक पूछा — "अब मुझे क्या करना चाहिए?"
श्लोक 49 (shiva.kotirudra.25.49)
इत्युक्ते मुनिना तेन गौतमेन महात्मना । मिलिताः सकलास्ते वै मुनयो वाक्यमब्रुवन् ॥ 25.49 ॥
ityukte muninā tena gautamena mahātmanā militāḥ sakalāste vai munayo vākyamabruvan
महात्मा मुनि गौतम के ऐसा कहने पर, वे सब एकत्रित मुनि मिलकर यह वचन बोले।
श्लोक 50 (shiva.kotirudra.25.50)
ऋषय ऊचुः । निष्कृतिं हि विना शुद्धिर्जायते न कदाचन । तस्मात्त्वं देहशुद्ध्यर्थं प्रायश्चित्तं समाचर ॥ 25.50 ॥
ṛṣaya ūcuḥ niṣkṛtiṁ hi vinā śuddhirjāyate na kadācana tasmāttvaṁ dehaśuddhyarthaṁ prāyaścittaṁ samācara
ऋषियों ने कहा — "प्रायश्चित्त के बिना शुद्धि कभी नहीं होती। अतः शरीर की शुद्धि के लिए तुम प्रायश्चित्त करो।"
श्लोक 51 (shiva.kotirudra.25.51)
त्रिवारं पृथिवीं सर्वां क्रम पापं प्रकाशयन् । पुनरागत्य चात्रैव चर मासव्रतं तथा ॥ 25.51 ॥
trivāraṁ pṛthivīṁ sarvāṁ krama pāpaṁ prakāśayan punarāgatya cātraiva cara māsavrataṁ tathā
सम्पूर्ण पृथ्वी की तीन बार परिक्रमा करो, अपने पाप को सर्वत्र प्रकट करते हुए, और पुनः यहाँ लौटकर एक मास का व्रत करो।
श्लोक 52 (shiva.kotirudra.25.52)
शतमेकोत्तरं चैव ब्रह्मणोऽस्य गिरेस्तथा । प्रक्रमणं विधायैवं शुद्धिस्ते च भविष्यति ॥ 25.52 ॥
śatamekottaraṁ caiva brahmaṇo’sya girestathā prakramaṇaṁ vidhāyaivaṁ śuddhiste ca bhaviṣyati
तथा इस ब्रह्मगिरि की एक सौ एक परिक्रमाएँ करो; ऐसा करने से तुम्हारी शुद्धि हो जाएगी।
श्लोक 53 (shiva.kotirudra.25.53)
अथवा त्वं समानीय गङ्गास्नानं समाचर । पार्थिवानां तथा कोटिं कृत्वा देवं निषेवय ॥ 25.53 ॥
athavā tvaṁ samānīya gaṅgāsnānaṁ samācara pārthivānāṁ tathā koṭiṁ kṛtvā devaṁ niṣevaya
अथवा गंगा को यहाँ लाकर उसमें स्नान करो, और करोड़ पार्थिव-शिवलिंग बनाकर भगवान की आराधना करो।
श्लोक 54 (shiva.kotirudra.25.54)
गङ्गायां च ततः स्नात्वा पुतश्चैव भविष्यसि । पुरा दश तथा चैकं गिरेस्त्वं क्रमणं कुरु ॥ 25.54 ॥
gaṅgāyāṁ ca tataḥ snātvā putaścaiva bhaviṣyasi purā daśa tathā caikaṁ girestvaṁ kramaṇaṁ kuru
तत्पश्चात् गंगा में स्नान करने पर तुम पवित्र हो जाओगे; उससे पहले पर्वत की ग्यारह परिक्रमाएँ करो।
श्लोक 55 (shiva.kotirudra.25.55)
शतकुम्म्भैस्तथा स्नात्वा पार्थिवं निष्कृतिर्भवेत् । इति तैरॄषिभिः प्रोक्तस्तथेत्योमिति तद्वचः ॥ 25.55 ॥
śatakummbhaistathā snātvā pārthivaṁ niṣkṛtirbhavet iti tairṝṣibhiḥ proktastathetyomiti tadvacaḥ
तथा पार्थिव लिंग पर सौ कलशों से स्नान कराने पर प्रायश्चित्त पूर्ण हो जाएगा। इस प्रकार उन ऋषियों द्वारा कहे जाने पर, गौतम ने उस वचन को "तथास्तु, ॐ" कहकर स्वीकार किया।
श्लोक 56 (shiva.kotirudra.25.56)
पार्थिवानां तथा पूजां गिरेः प्रक्रमणं तथा । करिष्यामि मुनिश्रेष्ठा आज्ञया श्रीमतामिह ॥ 25.56 ॥
pārthivānāṁ tathā pūjāṁ gireḥ prakramaṇaṁ tathā kariṣyāmi muniśreṣṭhā ājñayā śrīmatāmiha
"हे श्रेष्ठ मुनियो! आपकी आज्ञा से यहाँ मैं पार्थिव-लिंगों की पूजा और पर्वत की परिक्रमा करूँगा।"
श्लोक 57 (shiva.kotirudra.25.57)
इत्युक्त्वा सर्षिवर्यश्च कृत्वा प्रक्रमणं गिरेः । पूजयामास निर्माय पार्थिवान्मुनिसत्तमः ॥ 25.57 ॥
ityuktvā sarṣivaryaśca kṛtvā prakramaṇaṁ gireḥ pūjayāmāsa nirmāya pārthivānmunisattamaḥ
ऐसा कहकर वह श्रेष्ठ मुनि पर्वत की परिक्रमा करके, पार्थिव-लिंगों का निर्माण कर उनकी पूजा करने लगे।
श्लोक 58 (shiva.kotirudra.25.58)
अहल्या च ततः साध्वी तच्च सर्वं चकार सा । शिष्याश्च प्रतिशिष्याश्च चक्रुः सेवां तयोस्तदा ॥ 25.58 ॥
ahalyā ca tataḥ sādhvī tacca sarvaṁ cakāra sā śiṣyāśca pratiśiṣyāśca cakruḥ sevāṁ tayostadā
और तत्पश्चात् साध्वी अहल्या ने भी वह सब कुछ किया; तथा शिष्यों और प्रशिष्यों ने उन दोनों की सेवा की।