कोटिरुद्र संहिता · अध्याय 27
त्र्यम्बकेश्वर ज्योतिर्लिंग की महिमा का वर्णन
श्लोक 1 (shiva.kotirudra.27.1)
ऋषय ऊचुः । गङ्गा च जलरूपेण कुतो जाता वद प्रभो । तन्माहात्म्यं विशेषेण कुतो जातं वद प्रभो ॥ 27.1 ॥
ṛṣaya ūcuḥ gaṅgā ca jalarūpeṇa kuto jātā vada prabho tanmāhātmyaṁ viśeṣeṇa kuto jātaṁ vada prabho
ऋषियों ने कहा — "हे प्रभो! बताइए, गंगा जल-रूप में कहाँ से उत्पन्न हुई? हे प्रभो! उसकी विशेष महिमा कहाँ से उत्पन्न हुई, यह भी बताइए।"
श्लोक 2 (shiva.kotirudra.27.2)
यैर्विप्रैर्गौतमायैव दुःखं दत्तं दुरात्मभिः । तेषां किं च ततो जातमुच्यतां व्याससद्गुरो ॥ 27.2 ॥
yairviprairgautamāyaiva duḥkhaṁ dattaṁ durātmabhiḥ teṣāṁ kiṁ ca tato jātamucyatāṁ vyāsasadguro
"तथा जिन दुरात्मा ब्राह्मणों ने गौतम को दुःख दिया था, उनका आगे क्या हुआ — हे व्याससत्शिष्य! यह भी बताइए।"
श्लोक 3 (shiva.kotirudra.27.3)
सूत उवाच । एवं सम्प्रार्थिता गङ्गा गौतमेन तदा स्वयम् । ब्रह्मणश्च गिरेर्विप्रा द्रुतं तस्मादवातरत् ॥ 27.3 ॥
sūta uvāca evaṁ samprārthitā gaṅgā gautamena tadā svayam brahmaṇaśca girerviprā drutaṁ tasmādavātarat
सूत ने कहा — इस प्रकार स्वयं गौतम द्वारा प्रार्थना किए जाने पर, हे विप्रो! गंगा शीघ्र ही ब्रह्मगिरि से उतर आई।
श्लोक 4 (shiva.kotirudra.27.4)
औदुम्बरस्य शाखायास्तत्प्रवाहो विनिःसृतः । तत्र स्नानं मुदा चक्रे गौतमो विश्रुतो मुनिः ॥ 27.4 ॥
audumbarasya śākhāyāstatpravāho viniḥsṛtaḥ tatra snānaṁ mudā cakre gautamo viśruto muniḥ
उसकी धारा एक औदुम्बर (गूलर) वृक्ष की शाखा से प्रवाहित हुई; वहाँ विख्यात मुनि गौतम ने आनन्दपूर्वक स्नान किया।
श्लोक 5 (shiva.kotirudra.27.5)
गौतमस्य च ये शिष्या अन्ये चैव महर्षयः । समागताश्च ते तत्र स्नानं चक्रुर्मुदान्विताः ॥ 27.5 ॥
gautamasya ca ye śiṣyā anye caiva maharṣayaḥ samāgatāśca te tatra snānaṁ cakrurmudānvitāḥ
गौतम के शिष्य तथा अन्य महर्षि भी वहाँ एकत्रित होकर आनन्दपूर्वक स्नान करने लगे।
श्लोक 6 (shiva.kotirudra.27.6)
गङ्गाद्वारं च तन्नाम प्रसिद्धमभवत्तदा । सर्वपापहरं रम्यं दर्शनान्मुनिसत्तमाः ॥ 27.6 ॥
gaṅgādvāraṁ ca tannāma prasiddhamabhavattadā sarvapāpaharaṁ ramyaṁ darśanānmunisattamāḥ
वह स्थान "गंगाद्वार" नाम से प्रसिद्ध हुआ, हे श्रेष्ठ मुनियो! जो अपने दर्शन मात्र से सब पापों को हरने वाला मनोहर तीर्थ है।
श्लोक 7 (shiva.kotirudra.27.7)
गौतमस्पर्द्धिनस्ते च ऋषयस्तत्र चागताः । स्नानार्थं तांश्च सा दृष्ट्वा ह्यन्तर्धानं गता द्रुतम् ॥ 27.7 ॥
gautamasparddhinaste ca ṛṣayastatra cāgatāḥ snānārthaṁ tāṁśca sā dṛṣṭvā hyantardhānaṁ gatā drutam
गौतम से ईर्ष्या रखने वाले वे ऋषि भी स्नान के लिए वहाँ आए; परन्तु उन्हें देखते ही गंगा तुरन्त अन्तर्धान हो गई।
श्लोक 8 (shiva.kotirudra.27.8)
मा मेति गौतमस्तत्र व्याजहार वचो द्रुतम् । मुहुर्मुहुः स्तुवन् गङ्गां साञ्जलिर्नतमस्तकः ॥ 27.8 ॥
mā meti gautamastatra vyājahāra vaco drutam muhurmuhuḥ stuvan gaṅgāṁ sāñjalirnatamastakaḥ
"ऐसा मत करो!" — गौतम ने वहाँ तुरन्त यह वचन कहा, और हाथ जोड़कर, सिर झुकाकर बार-बार गंगा की स्तुति की।
श्लोक 9 (shiva.kotirudra.27.9)
गौतम उवाच । इमे च श्रीमदान्धाश्च साधवो वाप्यसाधवः । एतत्पुण्यप्रभावेण दर्शनं दीयतां त्वया ॥ 27.9 ॥
gautama uvāca ime ca śrīmadāndhāśca sādhavo vāpyasādhavaḥ etatpuṇyaprabhāveṇa darśanaṁ dīyatāṁ tvayā
गौतम ने कहा — "चाहे ये लोग ऐश्वर्य के मद से अंधे हों, चाहे साधु हों या असाधु, फिर भी इस पुण्य के प्रभाव से तुम इन्हें अपना दर्शन दो।"
श्लोक 10 (shiva.kotirudra.27.10)
सूत उवाच । ततो वाणी समुत्पन्ना गङ्गाया व्योममण्डलात् । तच्छृणुध्वमृषिश्रेष्ठा गङ्गावचनमुत्तमम् ॥ 27.10 ॥
sūta uvāca tato vāṇī samutpannā gaṅgāyā vyomamaṇḍalāt tacchṛṇudhvamṛṣiśreṣṭhā gaṅgāvacanamuttamam
सूत ने कहा — तब आकाशमण्डल से गंगा की वाणी उत्पन्न हुई; हे श्रेष्ठ ऋषियो! गंगा का वह उत्तम वचन सुनिए।
श्लोक 11 (shiva.kotirudra.27.11)
एते दुष्टतमाश्चैव कृतघ्नाः स्वामिद्रोहिणः । जाल्माः पाखण्डिनश्चैव द्रष्टुं वर्ज्याश्च सर्वदा ॥ 27.11 ॥
ete duṣṭatamāścaiva kṛtaghnāḥ svāmidrohiṇaḥ jālmāḥ pākhaṇḍinaścaiva draṣṭuṁ varjyāśca sarvadā
"ये अत्यन्त दुष्ट, कृतघ्न, अपने स्वामी के द्रोही, नीच और पाखण्डी हैं — इन्हें देखना सदा वर्जित है।"
श्लोक 12 (shiva.kotirudra.27.12)
गौतम उवाच । मातश्च श्रूयतामेतन्महतां गिर एव च । तस्मात्त्वया च कर्त्तव्यं सत्यं च भगवद् वचः ॥ 27.12 ॥
gautama uvāca mātaśca śrūyatāmetanmahatāṁ gira eva ca tasmāttvayā ca karttavyaṁ satyaṁ ca bhagavad vacaḥ
गौतम ने कहा — "हे माता! सुनिए — यह महापुरुषों की भी वाणी है। अतः आपको यह भी करना चाहिए, जिससे भगवान का यह वचन सत्य सिद्ध हो।"
श्लोक 13 (shiva.kotirudra.27.13)
अपकारिषु यो लोक उपकारं करोति वै । तेन पूतो भवाम्यत्र भगवद्वचनं त्विदम् ॥ 27.13 ॥
apakāriṣu yo loka upakāraṁ karoti vai tena pūto bhavāmyatra bhagavadvacanaṁ tvidam
"जो व्यक्ति अपकार करने वालों पर भी उपकार करता है, उसी से मैं यहाँ पवित्र होता हूँ — यह तो भगवान का ही वचन है।"
श्लोक 14 (shiva.kotirudra.27.14)
सूत उवाच । इति श्रुत्वा मुनेर्वाक्यं गौतमस्य महात्मनः । पुनर्वाणी समुत्पन्ना गङ्गाया व्योममण्डलात् ॥ 27.14 ॥
sūta uvāca iti śrutvā munervākyaṁ gautamasya mahātmanaḥ punarvāṇī samutpannā gaṅgāyā vyomamaṇḍalāt
सूत ने कहा — महात्मा मुनि गौतम का यह वचन सुनकर, पुनः आकाशमण्डल से गंगा की वाणी उत्पन्न हुई।
श्लोक 15 (shiva.kotirudra.27.15)
कथ्यते हि त्वया सत्यं गौतमर्षे शिवं वचः । तथापि सङ्ग्रहार्थं च प्रायश्चित्तं चरन्तु वै ॥ 27.15 ॥
kathyate hi tvayā satyaṁ gautamarṣe śivaṁ vacaḥ tathāpi saṅgrahārthaṁ ca prāyaścittaṁ carantu vai
"हे गौतम ऋषि! तुम जो सत्य और शुभ वचन कहते हो, वह ठीक है; फिर भी लोक-मर्यादा बनाए रखने के लिए इन्हें प्रायश्चित्त करना चाहिए।"
श्लोक 16 (shiva.kotirudra.27.16)
शतमेकोत्तरं चात्र कार्यं प्रक्रमणं गिरेः । भवच्छासनतस्त्वेतैस्त्वदधीनैर्विशेषतः ॥ 27.16 ॥
śatamekottaraṁ cātra kāryaṁ prakramaṇaṁ gireḥ bhavacchāsanatastvetaistvadadhīnairviśeṣataḥ
"यहाँ इन्हें पर्वत की एक सौ एक परिक्रमाएँ करनी होंगी — तुम्हारी आज्ञा से, विशेषतः क्योंकि ये तुम्हारे अधीन हैं।"
श्लोक 17 (shiva.kotirudra.27.17)
ततश्चैवाधिकारश्च जायते दुष्टकारिणाम् । मद्दर्शने विशेषेण सत्यमुक्तं मया मुने ॥ 27.17 ॥
tataścaivādhikāraśca jāyate duṣṭakāriṇām maddarśane viśeṣeṇa satyamuktaṁ mayā mune
"तत्पश्चात् ही इन दुष्कर्मियों को, विशेषतः मेरे दर्शन का अधिकार प्राप्त होगा — हे मुने! यह मैंने सत्य कहा है।"
श्लोक 18 (shiva.kotirudra.27.18)
इति श्रुत्वा वचस्तस्याश्चक्रुर्वै ते तथाखिलाः । सम्प्रार्थ्य गौतमं दीनाः क्षन्तव्यो नोऽपराधकः ॥ 27.18 ॥
iti śrutvā vacastasyāścakrurvai te tathākhilāḥ samprārthya gautamaṁ dīnāḥ kṣantavyo no’parādhakaḥ
उसका यह वचन सुनकर, उन सबने वैसा ही किया; और दीन बनकर गौतम से प्रार्थना की — "हमारा अपराध क्षमा किया जाए।"
श्लोक 19 (shiva.kotirudra.27.19)
एवं कृते तदा तेन गौतमेन तदाज्ञया । कुशावर्तं नाम चक्रे गङ्गाद्वारादधोगतम् ॥ 27.19 ॥
evaṁ kṛte tadā tena gautamena tadājñayā kuśāvartaṁ nāma cakre gaṅgādvārādadhogatam
ऐसा होने पर, तब गौतम की आज्ञा से गंगाद्वार के नीचे "कुशावर्त" नामक स्थान बनाया गया।
श्लोक 20 (shiva.kotirudra.27.20)
ततः प्रादुरभूत्तत्र सा तस्य प्रीतये पुनः । कुशावर्तं च विख्यातं तीर्थमासीदनुत्तमम् ॥ 27.20 ॥
tataḥ prādurabhūttatra sā tasya prītaye punaḥ kuśāvartaṁ ca vikhyātaṁ tīrthamāsīdanuttamam
तब उसकी प्रसन्नता के लिए गंगा वहाँ पुनः प्रकट हुई; और कुशावर्त एक अत्यन्त उत्तम, विख्यात तीर्थ बन गया।
श्लोक 21 (shiva.kotirudra.27.21)
तत्र स्नातो नरो यस्तु मोक्षाय परिकल्पते । त्यक्त्वा सर्वानघान्सद्यो विज्ञानं प्राप्य दुर्लभम् ॥ 27.21 ॥
tatra snāto naro yastu mokṣāya parikalpate tyaktvā sarvānaghānsadyo vijñānaṁ prāpya durlabham
वहाँ स्नान करने वाला मनुष्य मोक्ष के योग्य हो जाता है, तत्काल समस्त पापों को त्यागकर उस दुर्लभ ज्ञान को प्राप्त करता है।
श्लोक 22 (shiva.kotirudra.27.22)
गौतमो ऋषयश्चान्ये मिलिताश्च परस्परम् । लज्जितास्ते तदा ये च कृतघ्ना ह्यभवन्पुरा ॥ 27.22 ॥
gautamo ṛṣayaścānye militāśca parasparam lajjitāste tadā ye ca kṛtaghnā hyabhavanpurā
गौतम और अन्य ऋषि परस्पर मिले; और जो पहले कृतघ्न बने थे, वे अब लज्जित हुए।
श्लोक 23 (shiva.kotirudra.27.23)
ऋषय ऊचुः ॥ अस्माभिरन्यथा सूत श्रुतं तद्वर्णयामहे । गौतमस्तान्द्विजान् क्रुद्धः शशापेति प्रबुध्यताम् ॥ 27.23 ॥
ṛṣaya ūcuḥ asmābhiranyathā sūta śrutaṁ tadvarṇayāmahe gautamastāndvijān kruddhaḥ śaśāpeti prabudhyatām
ऋषियों ने कहा — "हे सूत! हमने यह कथा भिन्न प्रकार से सुनी है, वह हम बताते हैं — कि गौतम ने क्रुद्ध होकर उन ब्राह्मणों को शाप दिया था, यह समझा जाए।"
श्लोक 24 (shiva.kotirudra.27.24)
सूत उवाच । द्विजास्तदपि सत्यं वै कल्पभेदसमाश्रयात् । वर्णयामि विशेषेण तां कथामपि सुव्रताः ॥ 27.24 ॥
sūta uvāca dvijāstadapi satyaṁ vai kalpabhedasamāśrayāt varṇayāmi viśeṣeṇa tāṁ kathāmapi suvratāḥ
सूत ने कहा — हे विप्रो! वह भी सत्य है, कल्प-भेद के आधार पर; हे सुव्रतो! मैं वह कथा भी विशेष रूप से सुनाता हूँ।
श्लोक 25 (shiva.kotirudra.27.25)
गौतमोऽपि ऋषीन्दृष्ट्वा तदा दुर्भिक्षपीडितान् । तपश्चकार सुमहद्वरुणस्य महात्मनः ॥ 27.25 ॥
gautamo’pi ṛṣīndṛṣṭvā tadā durbhikṣapīḍitān tapaścakāra sumahadvaruṇasya mahātmanaḥ
गौतम ने भी उस समय सूखे से पीड़ित ऋषियों को देखकर महात्मा वरुण की महान तपस्या की।
श्लोक 26 (shiva.kotirudra.27.26)
अक्षय्यं कल्पयामास जलं वरुणदायया । ततो व्रीहीन् यवांश्चैव वापयामास भूरिशः ॥ 27.26 ॥
akṣayyaṁ kalpayāmāsa jalaṁ varuṇadāyayā tato vrīhīn yavāṁścaiva vāpayāmāsa bhūriśaḥ
वरुण के वरदान से उन्होंने अक्षय जल की व्यवस्था की; फिर प्रचुर मात्रा में धान और जौ बोए।
श्लोक 27 (shiva.kotirudra.27.27)
एवं परोपकारी स गौतमो मुनिसत्तमः । आहारं कल्पयामास तेभ्यः स्वतपसो बलात् ॥ 27.27 ॥
evaṁ paropakārī sa gautamo munisattamaḥ āhāraṁ kalpayāmāsa tebhyaḥ svatapaso balāt
इस प्रकार परोपकारी गौतम मुनि ने अपनी तपस्या के बल से उनके लिए आहार की व्यवस्था की।
श्लोक 28 (shiva.kotirudra.27.28)
कदाचित्तत्स्त्रियो दुष्टा जलार्थमपमानिताः । ऊचुः पतिभ्यस्ताः क्रुद्धा गौतमेर्ष्याकरं वचः ॥ 27.28 ॥
kadācittatstriyo duṣṭā jalārthamapamānitāḥ ūcuḥ patibhyastāḥ kruddhā gautamerṣyākaraṁ vacaḥ
एक बार उन दुष्ट स्त्रियों ने, जल के विषय में अपमानित होने पर, क्रुद्ध होकर अपने-अपने पतियों से गौतम के प्रति ईर्ष्या उत्पन्न करने वाले वचन कहे।
श्लोक 29 (shiva.kotirudra.27.29)
ततस्ते भिन्नमतयो गां कृत्वा कृत्रिमां द्विजाः । तद्धान्यभक्षणासक्तां चक्रुस्तां कुटिलाशयाः ॥ 27.29 ॥
tataste bhinnamatayo gāṁ kṛtvā kṛtrimāṁ dvijāḥ taddhānyabhakṣaṇāsaktāṁ cakrustāṁ kuṭilāśayāḥ
तब उन कुटिल हृदय वाले, विरुद्ध मति वाले ब्राह्मणों ने एक कृत्रिम गाय बनाकर उसे उस अन्न को खाने में लगा दिया।
श्लोक 30 (shiva.kotirudra.27.30)
स्वधान्यभक्षणासक्तां गां दृष्ट्वा गौतमस्तदा । तृणेन ताडयामास शनैस्तां सन्निवारयन् ॥ 27.30 ॥
svadhānyabhakṣaṇāsaktāṁ gāṁ dṛṣṭvā gautamastadā tṛṇena tāḍayāmāsa śanaistāṁ sannivārayan
अपने अन्न को खाती हुई गाय को देखकर, गौतम ने धीरे से तिनके से मारकर उसे रोकने का प्रयत्न किया।
श्लोक 31 (shiva.kotirudra.27.31)
तृणसंस्पर्शमात्रेण सा भूमौ पतिता च गौः । मृता ह्यभूत्क्षणं विप्रा भाविकर्मवशात्तदा ॥ 27.31 ॥
tṛṇasaṁsparśamātreṇa sā bhūmau patitā ca gauḥ mṛtā hyabhūtkṣaṇaṁ viprā bhāvikarmavaśāttadā
तिनके के स्पर्श मात्र से वह गाय पृथ्वी पर गिर पड़ी और, हे विप्रो! भावी कर्म के वशीभूत होकर उसी क्षण मर गई।
श्लोक 32 (shiva.kotirudra.27.32)
गौर्हता गौतमेनेति तदा ते कुटिलाशयाः । एकत्रीभूय तत्रत्याः सकला ऋषयोऽवदन् ॥ 27.32 ॥
gaurhatā gautameneti tadā te kuṭilāśayāḥ ekatrībhūya tatratyāḥ sakalā ṛṣayo’vadan
"गौतम ने गाय को मार डाला!" — ऐसा कहकर वहाँ उपस्थित वे सब कुटिल हृदय वाले ऋषि एकत्र होकर बोलने लगे।
श्लोक 33 (shiva.kotirudra.27.33)
ततः स गौतमो भीतो गौर्हतेति बभूव ह । चकार विस्मयं नार्यहल्याशिष्यैः शिवानुगः ॥ 27.33 ॥
tataḥ sa gautamo bhīto gaurhateti babhūva ha cakāra vismayaṁ nāryahalyāśiṣyaiḥ śivānugaḥ
तब "गाय मारी गई" यह सुनकर शिवभक्त गौतम भयभीत हो गए, और अपनी पत्नी अहल्या तथा शिष्यों सहित विस्मित हो उठे।
श्लोक 34 (shiva.kotirudra.27.34)
ततः स गौतमो ज्ञात्वा तां गां क्रोधसमाकुलः । शशाप तानृषीन् सर्वान् गौतमो मुनिसत्तमः ॥ 27.34 ॥
tataḥ sa gautamo jñātvā tāṁ gāṁ krodhasamākulaḥ śaśāpa tānṛṣīn sarvān gautamo munisattamaḥ
तत्पश्चात् उस गाय के सत्य को जानकर, क्रोध से भरे हुए मुनिश्रेष्ठ गौतम ने उन सब ऋषियों को शाप दे दिया।
श्लोक 35 (shiva.kotirudra.27.35)
गौतम उवाच । यूयं सर्वे दुरात्मानो दुःखदा मे विशेषतः । शिवभक्तस्य सततं स्युर्वेदविमुखाः सदा ॥ 27.35 ॥
gautama uvāca yūyaṁ sarve durātmāno duḥkhadā me viśeṣataḥ śivabhaktasya satataṁ syurvedavimukhāḥ sadā
गौतम ने कहा — "तुम सब दुरात्मा हो, जिन्होंने मुझ शिवभक्त को विशेष रूप से दुःख दिया है; तुम सदा के लिए वेद से विमुख हो जाओ।"
श्लोक 36 (shiva.kotirudra.27.36)
अद्यप्रभृति वेदोक्ते सत्कर्मणि विशेषतः । मा भूयाद्भवतां श्रद्धा शैवमार्गे विमुक्तिदे ॥ 27.36 ॥
adyaprabhṛti vedokte satkarmaṇi viśeṣataḥ mā bhūyādbhavatāṁ śraddhā śaivamārge vimuktide
"आज से लेकर, विशेष रूप से वेदोक्त सत्कर्मों में तथा मुक्तिदायक शैवमार्ग में तुम्हारी श्रद्धा न रहे।"
श्लोक 37 (shiva.kotirudra.27.37)
अद्यप्रभृति दुर्मार्गे तत्र श्रद्धा भवेत्तु वः । मोक्षमार्गविहीने हि सदा श्रुतिबहिर्मुखे ॥ 27.37 ॥
adyaprabhṛti durmārge tatra śraddhā bhavettu vaḥ mokṣamārgavihīne hi sadā śrutibahirmukhe
"आज से तुम्हारी श्रद्धा उस कुमार्ग में हो, जो मोक्षमार्ग से रहित है और सदा वेद से विमुख है।"
श्लोक 38 (shiva.kotirudra.27.38)
अद्यप्रभृति भालानि मृल्लिप्तानि भवन्तु वः । स्रंसध्वं नरके यूयं भालमृल्लेपना द्विजाः ॥ 27.38 ॥
adyaprabhṛti bhālāni mṛlliptāni bhavantu vaḥ sraṁsadhvaṁ narake yūyaṁ bhālamṛllepanā dvijāḥ
"आज से तुम्हारे माथे मिट्टी से लिप्त रहें; हे द्विजो! इसी मिट्टी-लेपित माथे के साथ तुम नरक में गिरो।"
श्लोक 39 (shiva.kotirudra.27.39)
भवन्तो मा भविष्यन्तु शिवैकपरदैवताः । अन्यदेव समत्वेन जानन्तु शिवमद्वयम् ॥ 27.39 ॥
bhavanto mā bhaviṣyantu śivaikaparadaivatāḥ anyadeva samatvena jānantu śivamadvayam
"तुम शिव को एकमात्र परम देवता न मानो; अद्वैत शिव को किसी अन्य देवता के समान समझो।"
श्लोक 40 (shiva.kotirudra.27.40)
मा भूयाद्भवतां प्रीतिः शिवपूजादिकर्मणि । शिवनिष्ठेषु भक्तेषु शिवपर्वसु सर्वदा ॥ 27.40 ॥
mā bhūyādbhavatāṁ prītiḥ śivapūjādikarmaṇi śivaniṣṭheṣu bhakteṣu śivaparvasu sarvadā
"शिव-पूजा आदि कर्मों में, शिव-निष्ठ भक्तों में, और शिव के पर्वों में तुम्हारी कभी प्रीति न हो।"
श्लोक 41 (shiva.kotirudra.27.41)
अद्य दत्ता मया शापा यावन्तो दुःखदायकाः । तावन्तः सन्तु भवतां सन्ततावपि सर्वदा ॥ 27.41 ॥
adya dattā mayā śāpā yāvanto duḥkhadāyakāḥ tāvantaḥ santu bhavatāṁ santatāvapi sarvadā
"आज मैंने जितने दुःखदायी शाप दिए हैं, उतने ही तुम्हारी सन्तति में भी सदा बने रहें।"
श्लोक 42 (shiva.kotirudra.27.42)
अशैवाः सन्तु भवतां पुत्रपौत्रादयो द्विजाः । पुत्रैः सहैव तिष्ठन्तु भवन्तो नरके ध्रुवम् ॥ 27.42 ॥
aśaivāḥ santu bhavatāṁ putrapautrādayo dvijāḥ putraiḥ sahaiva tiṣṭhantu bhavanto narake dhruvam
"हे द्विजो! तुम्हारे पुत्र-पौत्र आदि अशैव हों; और तुम अपने पुत्रों सहित निश्चय ही नरक में निवास करो।"
श्लोक 43 (shiva.kotirudra.27.43)
ततो भवन्तु चाण्डाला दुःखदारिद्र्यपीडिताः । शठा निन्दाकराः सर्वे तप्तमुद्राङ्किताः सदा ॥ 27.43 ॥
tato bhavantu cāṇḍālā duḥkhadāridryapīḍitāḥ śaṭhā nindākarāḥ sarve taptamudrāṅkitāḥ sadā
"इसके बाद तुम चाण्डाल बनो, दुःख और दरिद्रता से पीड़ित, धूर्त, निन्दक, और सदा तप्त चिह्नों से अंकित रहो।"
श्लोक 44 (shiva.kotirudra.27.44)
सूत उवाच । इति शप्त्वा मुनीन् सर्वान् गौतमः स्वाश्रमं ययौ । शिवभक्तिं चकाराति स बभूव सुपावनः ॥ 27.44 ॥
sūta uvāca iti śaptvā munīn sarvān gautamaḥ svāśramaṁ yayau śivabhaktiṁ cakārāti sa babhūva supāvanaḥ
सूत ने कहा — इस प्रकार सब मुनियों को शाप देकर गौतम अपने आश्रम को चले गए; उन्होंने अत्यन्त शिवभक्ति की और परम पवित्र हो गए।
श्लोक 45 (shiva.kotirudra.27.45)
ततस्तैः खिन्नहृदया ऋषयस्तेऽखिला द्विजाः । काञ्च्यां चक्रुर्निवासं हि शैवधर्मबहिष्कृताः ॥ 27.45 ॥
tatastaiḥ khinnahṛdayā ṛṣayaste’khilā dvijāḥ kāñcyāṁ cakrurnivāsaṁ hi śaivadharmabahiṣkṛtāḥ
तत्पश्चात् उन सब खिन्न हृदय वाले ऋषियों ने, शैव धर्म से बहिष्कृत होकर, काञ्ची में निवास किया।
श्लोक 46 (shiva.kotirudra.27.46)
तत्पुत्राश्चाभवन्सर्वे शैवधर्मबहिष्कृताः । अग्रे तद्वद्भविष्यन्ति कलौ बहुजनाः खलाः ॥ 27.46 ॥
tatputrāścābhavansarve śaivadharmabahiṣkṛtāḥ agre tadvadbhaviṣyanti kalau bahujanāḥ khalāḥ
उनके पुत्र भी सब शैव धर्म से बहिष्कृत हुए; और आगे कलियुग में उसी प्रकार अनेक दुष्ट जन उत्पन्न होंगे।
श्लोक 47 (shiva.kotirudra.27.47)
इति प्रोक्तमशेषेण तद्वृत्तं मुनिसत्तमाः । पूर्ववृत्तमपि प्राज्ञाः श्रुतं सर्वैस्तु चादरात् ॥ 27.47 ॥
iti proktamaśeṣeṇa tadvṛttaṁ munisattamāḥ pūrvavṛttamapi prājñāḥ śrutaṁ sarvaistu cādarāt
हे श्रेष्ठ मुनियो! इस प्रकार वह सम्पूर्ण वृत्तान्त, पूर्व वृत्तान्त सहित, कह दिया गया है; हे प्राज्ञो! यह सबने आदरपूर्वक सुना।
श्लोक 48 (shiva.kotirudra.27.48)
इति वश्च समाख्यातो गौतम्याश्च समुद्भवः । माहात्म्यमुत्तमं चैव सर्वपापहरं परम् ॥ 27.48 ॥
iti vaśca samākhyāto gautamyāśca samudbhavaḥ māhātmyamuttamaṁ caiva sarvapāpaharaṁ param
इस प्रकार तुम्हें गौतमी की उत्पत्ति तथा उसकी सर्वपापहारी परम उत्तम महिमा बता दी गई।
श्लोक 49 (shiva.kotirudra.27.49)
त्र्यम्बकस्य च माहात्म्यं ज्योतिर्लिङ्गस्य कीर्तितम् । यच्छ्रुत्वा सर्वपापेभ्यो मुच्यते नात्र संशयः ॥ 27.49 ॥
tryambakasya ca māhātmyaṁ jyotirliṅgasya kīrtitam yacchrutvā sarvapāpebhyo mucyate nātra saṁśayaḥ
तथा त्र्यम्बक ज्योतिर्लिंग की महिमा का वर्णन किया गया; इसे सुनकर मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाता है, इसमें कोई संदेह नहीं।
श्लोक 50 (shiva.kotirudra.27.50)
अतः परं प्रवक्ष्यामि वैद्यनाथेश्वरस्य हि । ज्योतिर्लिङ्गस्य माहात्म्यं श्रूयतां पापहारकम् ॥ 27.50 ॥
ataḥ paraṁ pravakṣyāmi vaidyanātheśvarasya hi jyotirliṅgasya māhātmyaṁ śrūyatāṁ pāpahārakam
अब इसके बाद मैं वैद्यनाथेश्वर ज्योतिर्लिंग की महिमा बताऊँगा; उसे सुनिए, जो पापों को हरने वाली है।