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कोटिरुद्र संहिता · अध्याय 30

नागेश्वर ज्योतिर्लिंग की उत्पत्ति की महिमा का वर्णन

अध्याय 29अध्याय-सूचीअध्याय 31

श्लोक 1 (shiva.kotirudra.30.1)

सूत उवाच । कदाचित्सेवकस्तस्य राक्षसस्य दुरात्मनः । तदग्रे सुन्दरं रूपं शङ्करस्य ददर्श ह ॥ 30.1 ॥

sūta uvāca kadācitsevakastasya rākṣasasya durātmanaḥ tadagre sundaraṁ rūpaṁ śaṅkarasya dadarśa ha

सूत ने कहा — एक बार उस दुरात्मा राक्षस के एक सेवक ने उसके सामने शंकर का सुन्दर रूप देखा।

श्लोक 2 (shiva.kotirudra.30.2)

तस्मै निवेदितं राज्ञे राक्षसानां यथार्थकम् । सर्वं तच्चरितं तेन सकौतुकमथाद्भुतम् ॥ 30.2 ॥

tasmai niveditaṁ rājñe rākṣasānāṁ yathārthakam sarvaṁ taccaritaṁ tena sakautukamathādbhutam

उसने राक्षसों के राजा को यह सम्पूर्ण अद्भुत और कौतुकपूर्ण वृत्तान्त यथार्थ रूप से बताया।

श्लोक 3 (shiva.kotirudra.30.3)

राजापि तत्र चागत्य राक्षसानां स दारुकः । विह्वलः सबलः शीघ्रं पर्यपृच्छच्च तं शिवम् ॥ 30.3 ॥

rājāpi tatra cāgatya rākṣasānāṁ sa dārukaḥ vihvalaḥ sabalaḥ śīghraṁ paryapṛcchacca taṁ śivam

राक्षसों का वह राजा दारुक भी वहाँ स्वयं आकर, व्याकुल होकर, अपनी सेना सहित शीघ्र ही उस शिव से पूछने लगा।

श्लोक 4 (shiva.kotirudra.30.4)

दारुक उवाच । किं ध्यायसि हि वैश्य त्वं सत्यं वद ममाग्रतः । एवं सति न मृत्युस्ते मम वाक्यं च नान्यथा ॥ 30.4 ॥

dāruka uvāca kiṁ dhyāyasi hi vaiśya tvaṁ satyaṁ vada mamāgrataḥ evaṁ sati na mṛtyuste mama vākyaṁ ca nānyathā

दारुक ने कहा — "हे वैश्य! तू क्या ध्यान कर रहा है? मेरे समक्ष सत्य कह। ऐसा करने पर तेरी मृत्यु नहीं होगी, मेरा यह वचन अन्यथा नहीं होगा।"

श्लोक 5 (shiva.kotirudra.30.5)

सूत उवाच । तेनोक्तं च न जानामि तच्छ्रुत्वा कुपितः स वै । राक्षसान्प्रेरयामास हन्यतां राक्षसा अयम् ॥ 30.5 ॥

sūta uvāca tenoktaṁ ca na jānāmi tacchrutvā kupitaḥ sa vai rākṣasānprerayāmāsa hanyatāṁ rākṣasā ayam

सूत ने कहा — उसने कहा, "मैं नहीं जानता"; यह सुनकर क्रुद्ध होकर दारुक ने राक्षसों को आज्ञा दी — "हे राक्षसो! इसे मार डालो!"

श्लोक 6 (shiva.kotirudra.30.6)

तदुक्तास्ते तदा हन्तुं नानायुधधरा गताः । द्रुतं तं वैश्यशार्दूलं शङ्करासक्तचेतसम् ॥ 30.6 ॥

taduktāste tadā hantuṁ nānāyudhadharā gatāḥ drutaṁ taṁ vaiśyaśārdūlaṁ śaṅkarāsaktacetasam

ऐसी आज्ञा पाकर वे नाना शस्त्र धारण किए हुए, शंकर में मन लगाए उस वैश्यश्रेष्ठ को मारने के लिए शीघ्र गए।

श्लोक 7 (shiva.kotirudra.30.7)

तानागतांस्तदा दृष्ट्वा भयवित्रस्तलोचनः । शिवं सस्मार सुप्रीत्या तन्नामानि जगौ मुहुः ॥ 30.7 ॥

tānāgatāṁstadā dṛṣṭvā bhayavitrastalocanaḥ śivaṁ sasmāra suprītyā tannāmāni jagau muhuḥ

उन्हें आते देखकर, भय से काँपती हुई आँखों वाले उस वैश्य ने प्रेमपूर्वक शिव का स्मरण किया, और बार-बार उनके नामों का जप किया।

श्लोक 8 (shiva.kotirudra.30.8)

वैश्यपतिरुवाच । पाहि शङ्कर देवेश पाहि शम्भो शिवेति च । दुष्टादस्मात्त्रिलोकेश खलहन् भक्तवत्सल ॥ 30.8 ॥

vaiśyapatiruvāca pāhi śaṅkara deveśa pāhi śambho śiveti ca duṣṭādasmāttrilokeśa khalahan bhaktavatsala

वैश्यपति ने कहा — "हे देवेश शंकर! रक्षा कीजिए। हे शम्भो! हे शिव! रक्षा कीजिए। हे त्रिलोकेश! हे खलहन्ता! हे भक्तवत्सल! इस दुष्ट से मेरी रक्षा कीजिए।"

श्लोक 9 (shiva.kotirudra.30.9)

सर्वस्वं च भवानद्य मम देव त्वमेव हि । त्वदधीनस्त्वदीयोऽहं त्वत्प्राणः सर्वदा प्रभो ॥ 30.9 ॥

sarvasvaṁ ca bhavānadya mama deva tvameva hi tvadadhīnastvadīyo’haṁ tvatprāṇaḥ sarvadā prabho

"हे देव! आज आप ही मेरा सर्वस्व हैं। मैं आपके अधीन हूँ, आपका ही हूँ, हे प्रभो! मेरे प्राण सदा आपके ही हैं।"

श्लोक 10 (shiva.kotirudra.30.10)

सूत उवाच । इति सम्प्रार्थितः शम्भुर्विवरान्निर्गतस्तदा । भवनेनोत्तमेनाथ चतुर्द्वारयुतेन च ॥ 30.10 ॥

sūta uvāca iti samprārthitaḥ śambhurvivarānnirgatastadā bhavanenottamenātha caturdvārayutena ca

सूत ने कहा — इस प्रकार प्रार्थना किए जाने पर शम्भु तब एक बिल से, चार द्वारों वाले उत्तम भवन सहित, प्रकट हुए।

श्लोक 11 (shiva.kotirudra.30.11)

मध्य ज्योतिःस्वरूपं च शिवरूपं तदद्भुतम् । परिवारसमायुक्तं दृष्ट्वा चापूजयत्स वै ॥ 30.11 ॥

madhya jyotiḥsvarūpaṁ ca śivarūpaṁ tadadbhutam parivārasamāyuktaṁ dṛṣṭvā cāpūjayatsa vai

उसके मध्य उस अद्भुत ज्योतिस्वरूप शिवरूप को, अपने परिवार सहित देखकर, उसने उसकी पूजा की।

श्लोक 12 (shiva.kotirudra.30.12)

पूजितश्च तदा शम्भुः प्रसन्नो ह्यभवत्स्वयम् । अस्त्रं पाशुपतं नाम दत्त्वा राक्षसपुङ्गवान् ॥ 30.12 ॥

pūjitaśca tadā śambhuḥ prasanno hyabhavatsvayam astraṁ pāśupataṁ nāma dattvā rākṣasapuṅgavān

पूजित होकर शम्भु स्वयं प्रसन्न हुए, और उसे पाशुपत नामक अस्त्र प्रदान कर राक्षस-प्रमुखों के विरुद्ध सामर्थ्यवान बनाया।

श्लोक 13 (shiva.kotirudra.30.13)

जघान सोपकरणांस्तान्सर्वान्सगणान्द्रुतम् । अरक्षच्च स्वभक्तं वै दुष्टहा स हि शङ्करः ॥ 30.13 ॥

jaghāna sopakaraṇāṁstānsarvānsagaṇāndrutam arakṣacca svabhaktaṁ vai duṣṭahā sa hi śaṅkaraḥ

उस अस्त्र से उसने उन सबको, उनके शस्त्रों और गणों सहित, शीघ्र ही मार डाला; और दुष्टों के नाशक शंकर ने अपने भक्त की रक्षा की।

श्लोक 14 (shiva.kotirudra.30.14)

सर्वांस्तांश्च तदा हत्वा वरं प्रादाद्वनस्य च । अत्यद्भुतकरः शम्भुः स्वलीलात्तसुविग्रहः ॥ 30.14 ॥

sarvāṁstāṁśca tadā hatvā varaṁ prādādvanasya ca atyadbhutakaraḥ śambhuḥ svalīlāttasuvigrahaḥ

उन सबको मारकर, अत्यन्त अद्भुत कार्य करने वाले, अपनी लीला से सुन्दर रूप धारण किए हुए शम्भु ने उस वन को भी वरदान प्रदान किया।

श्लोक 15 (shiva.kotirudra.30.15)

अस्मिन्वने सदा वर्णधर्मा वै सम्भवन्तु च । ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां हि तथैव च ॥ 30.15 ॥

asminvane sadā varṇadharmā vai sambhavantu ca brāhmaṇakṣatriyaviśāṁ śūdrāṇāṁ hi tathaiva ca

"इस वन में सदा वर्णधर्म प्रवृत्त हों — ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्रों के भी।"

श्लोक 16 (shiva.kotirudra.30.16)

भवन्त्वत्र मुनिश्रेष्ठास्तामसा न कदाचन । शिवधर्मप्रवक्तारः शिवधर्मप्रवर्तकाः ॥ 30.16 ॥

bhavantvatra muniśreṣṭhāstāmasā na kadācana śivadharmapravaktāraḥ śivadharmapravartakāḥ

"हे मुनिश्रेष्ठो! यहाँ कभी तामसिक जन न हों, अपितु शिवधर्म के प्रवक्ता तथा शिवधर्म के प्रवर्तक ही निवास करें।"

श्लोक 17 (shiva.kotirudra.30.17)

सूत उवाच । एतस्मिन्समये सा वै राक्षसी दारुकाह्वया । देव्याः स्तुतिं चकारासौ पार्वत्या दीनमानसा ॥ 30.17 ॥

sūta uvāca etasminsamaye sā vai rākṣasī dārukāhvayā devyāḥ stutiṁ cakārāsau pārvatyā dīnamānasā

सूत ने कहा — इसी समय दारुका नामक वह राक्षसी, दीन मन से, देवी पार्वती की स्तुति करने लगी।

श्लोक 18 (shiva.kotirudra.30.18)

प्रसन्ना च तदा देवी किं करोमीत्युवाच हि । साप्युवाच पुनस्तत्र वंशो मे रक्ष्यतां त्वया ॥ 30.18 ॥

prasannā ca tadā devī kiṁ karomītyuvāca hi sāpyuvāca punastatra vaṁśo me rakṣyatāṁ tvayā

तब प्रसन्न होकर देवी ने कहा — "मैं क्या करूँ?" और उसने पुनः कहा — "मेरे वंश की आप रक्षा कीजिए।"

श्लोक 19 (shiva.kotirudra.30.19)

रक्षयिष्यामि ते वंशं सत्यं च कथ्यते मया । इत्युक्त्वा च शिवेनैव विग्रहं सा चकार ह ॥ 30.19 ॥

rakṣayiṣyāmi te vaṁśaṁ satyaṁ ca kathyate mayā ityuktvā ca śivenaiva vigrahaṁ sā cakāra ha

"मैं तेरे वंश की रक्षा करूँगी; यह मैं सत्य कहती हूँ।" ऐसा कहकर देवी ने शिव के साथ विवाद किया।

श्लोक 20 (shiva.kotirudra.30.20)

शिवोऽपि कुपितां देवीं दृष्ट्वा वरवशः प्रभुः । प्रत्युवाचेति सुप्रीत्या यथेच्छसि तथा कुरु ॥ 30.20 ॥

śivo’pi kupitāṁ devīṁ dṛṣṭvā varavaśaḥ prabhuḥ pratyuvāceti suprītyā yathecchasi tathā kuru

शिव ने भी देवी को कुपित देखकर, अपने ही वरदान के वशीभूत प्रभु ने प्रेमपूर्वक उत्तर दिया — "जैसी तुम्हारी इच्छा हो, वैसा करो।"

श्लोक 21 (shiva.kotirudra.30.21)

सूत उवाच । इति श्रुत्वा वचस्तस्य स्वपतेः शङ्करस्य वै । सुप्रसन्ना विहस्याशु पार्वती वाक्यमब्रवीत् ॥ 30.21 ॥

sūta uvāca iti śrutvā vacastasya svapateḥ śaṅkarasya vai suprasannā vihasyāśu pārvatī vākyamabravīt

सूत ने कहा — अपने पति शंकर का यह वचन सुनकर, अत्यन्त प्रसन्न होकर, मुस्कराते हुए पार्वती ने शीघ्र यह वचन कहा।

श्लोक 22 (shiva.kotirudra.30.22)

पार्वत्युवाच । भवदीयं वचस्तथ्यं युगान्ते सम्भविष्यति । तावच्च तामसी सृष्टिर्भवत्विति मतं मम ॥ 30.22 ॥

pārvatyuvāca bhavadīyaṁ vacastathyaṁ yugānte sambhaviṣyati tāvacca tāmasī sṛṣṭirbhavatviti mataṁ mama

पार्वती ने कहा — "आपका वचन युगान्त में सत्य होगा; तब तक यहाँ तामसी सृष्टि बनी रहे — यह मेरा मत है।"

श्लोक 23 (shiva.kotirudra.30.23)

अन्यथा प्रलयः स्याद्वै सत्यं मे व्याहृतं शिव । प्रमाणीक्रियतां नाथ त्वदीयास्मि त्वदाश्रया ॥ 30.23 ॥

anyathā pralayaḥ syādvai satyaṁ me vyāhṛtaṁ śiva pramāṇīkriyatāṁ nātha tvadīyāsmi tvadāśrayā

"अन्यथा मेरे वचन का प्रलय हो जाएगा; हे शिव! मैंने जो कहा है वह सत्य है। हे नाथ! इसे प्रमाणित कीजिए; मैं आपकी हूँ, आपके ही आश्रित हूँ।"

श्लोक 24 (shiva.kotirudra.30.24)

इयं च दारुका देवी राक्षसी शक्तिका मम । बलिष्ठा राक्षसीनां च रक्षोराज्यं प्रशास्तु च ॥ 30.24 ॥

iyaṁ ca dārukā devī rākṣasī śaktikā mama baliṣṭhā rākṣasīnāṁ ca rakṣorājyaṁ praśāstu ca

"हे देव! यह दारुका, जो मेरी शक्ति से सम्पन्न, राक्षसियों में सबसे बलशाली है, राक्षस-राज्य पर शासन करे।"

श्लोक 25 (shiva.kotirudra.30.25)

इमा राक्षसपत्न्यस्तु प्रसविष्यन्ति पुत्रकान् । ते सर्वे मिलिताश्चैव वने वासाय मे मताः ॥ 30.25 ॥

imā rākṣasapatnyastu prasaviṣyanti putrakān te sarve militāścaiva vane vāsāya me matāḥ

"ये राक्षस-पत्नियाँ पुत्रों को जन्म देंगी; वे सब मिलकर इस वन में निवास करें, ऐसा मेरा मत है।"

श्लोक 26 (shiva.kotirudra.30.26)

सूत उवाच । इत्येवं वचनं श्रुत्वा पार्वत्याः स्वस्त्रियाः प्रभुः । प्रसन्नमानसो भूत्वा शङ्करो वाक्यमब्रवीत् ॥ 30.26 ॥

sūta uvāca ityevaṁ vacanaṁ śrutvā pārvatyāḥ svastriyāḥ prabhuḥ prasannamānaso bhūtvā śaṅkaro vākyamabravīt

सूत ने कहा — अपनी पत्नी पार्वती का यह वचन सुनकर, प्रसन्नचित्त होकर प्रभु शंकर ने यह वचन कहा।

श्लोक 27 (shiva.kotirudra.30.27)

शङ्कर उवाच । इति ब्रवीषि त्वं वै चेच्छृणु मद्वचनं प्रिये । स्थास्याम्यस्मिन्वने प्रीत्या भक्तानां पालनाय च ॥ 30.27 ॥

śaṅkara uvāca iti bravīṣi tvaṁ vai cecchṛṇu madvacanaṁ priye sthāsyāmyasminvane prītyā bhaktānāṁ pālanāya ca

शंकर ने कहा — "यदि तुम ऐसा कहती हो, तो हे प्रिये! मेरा भी वचन सुनो — मैं इस वन में भक्तों के पालन हेतु प्रेमपूर्वक निवास करूँगा।"

श्लोक 28 (shiva.kotirudra.30.28)

अत्र मे वर्णधर्मस्थो दर्शनं प्रीतिसंयुतम् । करिष्यति च यो वै स चक्रवर्ती भविष्यति ॥ 30.28 ॥

atra me varṇadharmastho darśanaṁ prītisaṁyutam kariṣyati ca yo vai sa cakravartī bhaviṣyati

"यहाँ अपने वर्णधर्म में स्थित रहकर जो कोई प्रेमपूर्वक मेरा दर्शन करेगा, वह चक्रवर्ती सम्राट बनेगा।"

श्लोक 29 (shiva.kotirudra.30.29)

अन्यथा कलिपर्याये सत्यस्यादौ नृपेश्वरः । महासेनयुतो यो वै वीरसेनेति विश्रुतः ॥ 30.29 ॥

anyathā kaliparyāye satyasyādau nṛpeśvaraḥ mahāsenayuto yo vai vīraseneti viśrutaḥ

"अन्यथा कलियुग के क्रम में, सत्ययुग के आरम्भ में, महासेना से युक्त 'वीरसेन' नाम से विख्यात एक राजा होगा।"

श्लोक 30 (shiva.kotirudra.30.30)

स मे भक्त्यातिविक्रान्तो दर्शनं मे करिष्यति । दर्शनं मे स कृत्वैव चक्रवर्ती भविष्यति ॥ 30.30 ॥

sa me bhaktyātivikrānto darśanaṁ me kariṣyati darśanaṁ me sa kṛtvaiva cakravartī bhaviṣyati

"वह अत्यन्त पराक्रमी, मेरा भक्त, मेरा दर्शन करेगा; और मेरा दर्शन करके ही वह चक्रवर्ती सम्राट बनेगा।"

श्लोक 31 (shiva.kotirudra.30.31)

सूत उवाच । इत्येवं दम्पती तौ च कृत्वा हास्यं परस्परम् । स्थितौ तत्र स्वयं साक्षान्महोतीकारकौ द्विजाः ॥ 30.31 ॥

sūta uvāca ityevaṁ dampatī tau ca kṛtvā hāsyaṁ parasparam sthitau tatra svayaṁ sākṣānmahotīkārakau dvijāḥ

सूत ने कहा — हे विप्रो! इस प्रकार वह दिव्य दम्पति, परस्पर हँसी-विनोद करते हुए, स्वयं साक्षात् महान चमत्कार करने वाले, वहीं स्थित हो गए।

श्लोक 32 (shiva.kotirudra.30.32)

ज्योतिर्लिङ्गस्वरूपो हि नाम्ना नागेश्वरः शिवः । नागेश्वरी शिवा देवी बभूव च सतां प्रियौ ॥ 30.32 ॥

jyotirliṅgasvarūpo hi nāmnā nāgeśvaraḥ śivaḥ nāgeśvarī śivā devī babhūva ca satāṁ priyau

शिव ज्योतिर्लिंग-स्वरूप में "नागेश्वर" नाम से हुए, और देवी शिवा "नागेश्वरी" नाम से हुईं; और यह दिव्य युगल सज्जनों को प्रिय हो गया।

श्लोक 33 (shiva.kotirudra.30.33)

ऋषय ऊचुः । वीरसेनः कथं तत्र यास्यते दारुकावने । कथमर्चिष्यति शिवं त्वं तद्वद महामते ॥ 30.33 ॥

ṛṣaya ūcuḥ vīrasenaḥ kathaṁ tatra yāsyate dārukāvane kathamarciṣyati śivaṁ tvaṁ tadvada mahāmate

ऋषियों ने कहा — "वीरसेन दारुकावन में कैसे जाएगा? वह शिव की पूजा कैसे करेगा? हे महामते! यह हमें बताइए।"

श्लोक 34 (shiva.kotirudra.30.34)

सूत उवाच । निषधे सुन्दरे देशे क्षत्रियाणां कुले च सः । महासेनसुतो वीरसेनश्चैव शिवप्रियः ॥ 30.34 ॥

sūta uvāca niṣadhe sundare deśe kṣatriyāṇāṁ kule ca saḥ mahāsenasuto vīrasenaścaiva śivapriyaḥ

सूत ने कहा — सुन्दर निषध देश में, क्षत्रिय कुल में, महासेन के पुत्र और शिवभक्त वीरसेन का जन्म हुआ।

श्लोक 35 (shiva.kotirudra.30.35)

पार्थिवेशार्चनं कृत्वा तपः परमदुष्करम् । चकार वीरसेनो वै वर्षाणां द्वादशावधिः ॥ 30.35 ॥

pārthiveśārcanaṁ kṛtvā tapaḥ paramaduṣkaram cakāra vīraseno vai varṣāṇāṁ dvādaśāvadhiḥ

पार्थिवेश्वर की अर्चना करते हुए वीरसेन ने बारह वर्षों तक अत्यन्त कठिन तपस्या की।

श्लोक 36 (shiva.kotirudra.30.36)

ततः प्रसन्नो देवेशः प्रत्यक्षं प्राह शङ्करः । काष्ठस्य मत्स्यिकां कृत्वा त्रपुधातुविलेपनाम् ॥ 30.36 ॥

tataḥ prasanno deveśaḥ pratyakṣaṁ prāha śaṅkaraḥ kāṣṭhasya matsyikāṁ kṛtvā trapudhātuvilepanām

तब प्रसन्न होकर देवेश शंकर प्रत्यक्ष प्रकट हुए और बोले — काठ की एक मछली बनाकर उसे टीन धातु से लेपित करो।

श्लोक 37 (shiva.kotirudra.30.37)

विधाय योगमायां च दास्यामि वीरसेनक । तां गृहीत्वा प्रविश्यैनं नौभिः सह व्रजाधुना ॥ 30.37 ॥

vidhāya yogamāyāṁ ca dāsyāmi vīrasenaka tāṁ gṛhītvā praviśyainaṁ naubhiḥ saha vrajādhunā

"इसे योगमाया से सिद्ध कर मैं तुम्हें प्रदान करूँगा, हे वीरसेन। उसे लेकर तथा नावों सहित इसमें प्रवेश कर अब जाओ।"

श्लोक 38 (shiva.kotirudra.30.38)

ततस्त्वं तत्र गत्वा च विवरे च कृते मया । प्रविश्य च तदा पूजां कृत्वा नागेश्वरस्य च ॥ 30.38 ॥

tatastvaṁ tatra gatvā ca vivare ca kṛte mayā praviśya ca tadā pūjāṁ kṛtvā nāgeśvarasya ca

"तत्पश्चात् वहाँ पहुँचकर, मेरे द्वारा बनाए गए बिल में प्रवेश कर, नागेश्वर की पूजा करो।"

श्लोक 39 (shiva.kotirudra.30.39)

ततः पाशुपतं प्राप्य हत्वा च राक्षसीमुखान् । मयि दृष्टे तदा किञ्चिन्न्यूनं ते न भविष्यति ॥ 30.39 ॥

tataḥ pāśupataṁ prāpya hatvā ca rākṣasīmukhān mayi dṛṣṭe tadā kiñcinnyūnaṁ te na bhaviṣyati

"तत्पश्चात् पाशुपत अस्त्र प्राप्त कर राक्षसी-नेताओं का वध करके, मेरा दर्शन प्राप्त होने पर तुम्हें कुछ भी न्यून नहीं रहेगा।"

श्लोक 40 (shiva.kotirudra.30.40)

पार्वत्याश्च बलं चैव सम्पूर्णं वै भविष्यति । अन्ये च म्लेच्छरूपा ये भविष्यन्ति वने शुभाः ॥ 30.40 ॥

pārvatyāśca balaṁ caiva sampūrṇaṁ vai bhaviṣyati anye ca mleccharūpā ye bhaviṣyanti vane śubhāḥ

"और पार्वती का रक्षित बल भी पूर्णतः शान्त हो जाएगा; तथा वन में जो अन्य म्लेच्छ-रूप प्राणी होंगे, वे भी शुभ बन जाएँगे।"

श्लोक 41 (shiva.kotirudra.30.41)

इत्युक्त्वा शङ्करस्तत्र वीरसेनं हि दुःखहा । कृत्वा कृपां च महतीं तत्रैवान्तर्दधे प्रभुः ॥ 30.41 ॥

ityuktvā śaṅkarastatra vīrasenaṁ hi duḥkhahā kṛtvā kṛpāṁ ca mahatīṁ tatraivāntardadhe prabhuḥ

ऐसा कहकर, दुःखहर्ता शंकर ने वीरसेन पर महान कृपा करके, वहीं अन्तर्धान हो गए।

श्लोक 42 (shiva.kotirudra.30.42)

इति दत्तवरः सोऽपि शिवेन परमात्मना । शक्तः सर्वं तदा कर्तुं सम्बभूव न संशयः ॥ 30.42 ॥

iti dattavaraḥ so’pi śivena paramātmanā śaktaḥ sarvaṁ tadā kartuṁ sambabhūva na saṁśayaḥ

इस प्रकार परमात्मा शिव द्वारा वरदान प्राप्त कर, वह भी सब कुछ करने में समर्थ हो गया — इसमें कोई संदेह नहीं।

श्लोक 43 (shiva.kotirudra.30.43)

एवं नागेश्वरो देव उत्पन्नो ज्योतिषां पतिः । लिङ्गरूपस्त्रिलोकस्य सर्वकामप्रदः सदा ॥ 30.43 ॥

evaṁ nāgeśvaro deva utpanno jyotiṣāṁ patiḥ liṅgarūpastrilokasya sarvakāmapradaḥ sadā

इस प्रकार ज्योतियों के स्वामी भगवान नागेश्वर लिंग-रूप में उत्पन्न हुए, जो सदा तीनों लोकों की सब कामनाओं को पूर्ण करने वाले हैं।

श्लोक 44 (shiva.kotirudra.30.44)

एतद्यः शृणुयान्नित्यं नागेशोद्भवमादरात् । सर्वान्कामानियाद्धीमान्महापातकनाशनान् ॥ 30.44 ॥

etadyaḥ śṛṇuyānnityaṁ nāgeśodbhavamādarāt sarvānkāmāniyāddhīmānmahāpātakanāśanān

जो बुद्धिमान व्यक्ति नित्य आदरपूर्वक इस नागेश-उत्पत्ति की कथा को सुनता है, वह अपनी सब कामनाओं को प्राप्त करता है, और उसके महापातक भी नष्ट हो जाते हैं।

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