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कोटिरुद्र संहिता · अध्याय 32

सुदेहा और सुधर्मा के चरित्र का वर्णन

अध्याय 31अध्याय-सूचीअध्याय 33

श्लोक 1 (shiva.kotirudra.32.1)

सूत उवाच । अतः परं च घुश्मेशं ज्योतिर्लिङ्गमुदाहृतम् । तस्यैव च सुमाहात्म्यं श्रूयतामृषिसत्तमाः ॥ 32.1 ॥

sūta uvāca ataḥ paraṁ ca ghuśmeśaṁ jyotirliṅgamudāhṛtam tasyaiva ca sumāhātmyaṁ śrūyatāmṛṣisattamāḥ

सूत ने कहा — अब इसके पश्चात् घुश्मेश नामक ज्योतिर्लिंग का वर्णन किया गया है; हे मुनिश्रेष्ठो! उसकी उत्तम महिमा सुनिए।

श्लोक 2 (shiva.kotirudra.32.2)

दक्षिणस्यां दिशि श्रेष्ठो गिरिर्देवेति संज्ञकः । महाशोभान्वितो नित्यं राजतेऽद्भुतदर्शनः ॥ 32.2 ॥

dakṣiṇasyāṁ diśi śreṣṭho girirdeveti saṁjñakaḥ mahāśobhānvito nityaṁ rājate’dbhutadarśanaḥ

दक्षिण दिशा में "देव" नामक एक श्रेष्ठ पर्वत है; वह महान शोभा से युक्त, अद्भुत दर्शन वाला और सदा देदीप्यमान है।

श्लोक 3 (shiva.kotirudra.32.3)

तस्यैव निकटे कश्चिद्भारद्वाजकुलोद्भवः । सुधर्मा नाम विप्रश्च न्यवसद् ब्रह्मवित्तमः ॥ 32.3 ॥

tasyaiva nikaṭe kaścidbhāradvājakulodbhavaḥ sudharmā nāma vipraśca nyavasad brahmavittamaḥ

उसी पर्वत के निकट भारद्वाज कुल में उत्पन्न सुधर्मा नामक एक ब्राह्मण, जो ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ था, निवास करता था।

श्लोक 4 (shiva.kotirudra.32.4)

तस्य प्रिया सुदेहा च शिवधर्मपरायणा । पतिसेवापरा नित्यं गृहकर्मविचक्षणा ॥ 32.4 ॥

tasya priyā sudehā ca śivadharmaparāyaṇā patisevāparā nityaṁ gṛhakarmavicakṣaṇā

उसकी प्रिय पत्नी सुदेहा थी, जो शिवधर्मपरायण, सदा पति-सेवा में तत्पर तथा गृहकार्य में निपुण थी।

श्लोक 5 (shiva.kotirudra.32.5)

सुधर्मा च द्विजश्रेष्ठो देवतातिथिपूजकः । वेदमार्गपरो नित्यमग्निसेवापरायणः ॥ 32.5 ॥

sudharmā ca dvijaśreṣṭho devatātithipūjakaḥ vedamārgaparo nityamagnisevāparāyaṇaḥ

सुधर्मा, वह श्रेष्ठ द्विज, देवताओं और अतिथियों का पूजक था, सदा वेदमार्ग में तत्पर तथा अग्निसेवा में निरत रहता था।

श्लोक 6 (shiva.kotirudra.32.6)

त्रिकालसन्ध्यया युक्तः सूर्यरूपसमद्युतिः । शिष्याणां पाठकश्चैव वेदशास्त्रविचक्षणः ॥ 32.6 ॥

trikālasandhyayā yuktaḥ sūryarūpasamadyutiḥ śiṣyāṇāṁ pāṭhakaścaiva vedaśāstravicakṣaṇaḥ

वह त्रिकाल संध्या करने वाला, सूर्य के समान तेजस्वी, शिष्यों का अध्यापक तथा वेदशास्त्रों में निपुण था।

श्लोक 7 (shiva.kotirudra.32.7)

धनवांश्च परो दाता सौजन्यगुणभाजनः । शिवकर्मरतो नित्यं शैवः शैवजनप्रियः ॥ 32.7 ॥

dhanavāṁśca paro dātā saujanyaguṇabhājanaḥ śivakarmarato nityaṁ śaivaḥ śaivajanapriyaḥ

वह धनवान, उदार दाता, सौजन्यगुण से सम्पन्न था; सदा शिव-कर्मों में रत, सच्चा शैव और शैवजनों का प्रिय था।

श्लोक 8 (shiva.kotirudra.32.8)

आयुर्बहु व्यतीयाय तस्य धर्मं प्रकुर्वतः । पुत्रश्च नाभवत्तस्य ऋतुः स्यादफलः स्त्रियाः ॥ 32.8 ॥

āyurbahu vyatīyāya tasya dharmaṁ prakurvataḥ putraśca nābhavattasya ṛtuḥ syādaphalaḥ striyāḥ

इस प्रकार धर्म का पालन करते हुए उसकी बहुत आयु बीत गई; परन्तु उसे कोई पुत्र नहीं हुआ, क्योंकि उसकी पत्नी का ऋतुकाल निष्फल ही रहता था।

श्लोक 9 (shiva.kotirudra.32.9)

तेन दुःखं कृतं नैव वस्तुज्ञानपरेण हि । आत्मनस्तारकश्चात्मा ह्यात्मनः पावनश्च सः ॥ 32.9 ॥

tena duḥkhaṁ kṛtaṁ naiva vastujñānapareṇa hi ātmanastārakaścātmā hyātmanaḥ pāvanaśca saḥ

सत्य वस्तु के ज्ञान में तत्पर होने के कारण उसने इसका कोई दुःख नहीं माना; क्योंकि आत्मा ही अपना तारक है, और आत्मा ही अपना पावन करने वाला है।

श्लोक 10 (shiva.kotirudra.32.10)

इत्येवं मानसं धृत्वा दुःखं न कृतवान्स्तदा । सुदेहा च तदा दुःखं चकारापुत्रसम्भवम् ॥ 32.10 ॥

ityevaṁ mānasaṁ dhṛtvā duḥkhaṁ na kṛtavānstadā sudehā ca tadā duḥkhaṁ cakārāputrasambhavam

ऐसा मन में धारण कर वह दुःखी नहीं हुआ; परन्तु सुदेहा तब पुत्रहीनता के कारण दुःखी हुई।

श्लोक 11 (shiva.kotirudra.32.11)

नित्यं च स्वामिनं सा वै प्रार्थयद्यत्नसाधने । पुत्रोत्पादनहेतोश्च सर्वविद्याविशारदम् ॥ 32.11 ॥

nityaṁ ca svāminaṁ sā vai prārthayadyatnasādhane putrotpādanahetośca sarvavidyāviśāradam

वह नित्य ही अपने पति से, जो सब विद्याओं में निपुण था, प्रयत्नपूर्वक पुत्र उत्पन्न करने के लिए प्रार्थना करती रहती थी।

श्लोक 12 (shiva.kotirudra.32.12)

सोऽपि स्त्रियं तदाभर्त्स्य किं पुत्रश्च करिष्यति । का माता कः पिता पुत्रः को बन्धुश्च प्रियश्च कः ॥ 32.12 ॥

so’pi striyaṁ tadābhartsya kiṁ putraśca kariṣyati kā mātā kaḥ pitā putraḥ ko bandhuśca priyaśca kaḥ

उसने भी अपनी पत्नी को समझाते हुए कहा — "पुत्र से क्या होगा? कौन माता, कौन पिता, कौन पुत्र, कौन बन्धु और कौन प्रिय है?"

श्लोक 13 (shiva.kotirudra.32.13)

सर्वं स्वार्थपरं देवि त्रिलोक्यां नात्र संशयः । जानीहि त्वं विशेषेण बुद्ध्या शोकं न वै कुरु ॥ 32.13 ॥

sarvaṁ svārthaparaṁ devi trilokyāṁ nātra saṁśayaḥ jānīhi tvaṁ viśeṣeṇa buddhyā śokaṁ na vai kuru

"हे देवि! तीनों लोकों में सब कुछ स्वार्थपरक है, इसमें संदेह नहीं। तुम इसे बुद्धि से भलीभाँति समझो, और शोक मत करो।"

श्लोक 14 (shiva.kotirudra.32.14)

तस्माद्देवि त्वया दुःखं त्यजनीयं सुनिश्चितम् । नित्यं मह्यं त्वया नैव कथनीयं शुभव्रते ॥ 32.14 ॥

tasmāddevi tvayā duḥkhaṁ tyajanīyaṁ suniścitam nityaṁ mahyaṁ tvayā naiva kathanīyaṁ śubhavrate

"अतः हे देवि! तुम्हें यह दुःख अवश्य त्याग देना चाहिए; और हे शुभव्रते! तुम्हें मुझसे यह बात फिर कभी नहीं कहनी चाहिए।"

श्लोक 15 (shiva.kotirudra.32.15)

एवं तां सन्निवार्यैव भगवद्धर्मतत्परः । आसीत्परमसन्तुष्टो द्वन्द्वदुःखं समत्यजत् ॥ 32.15 ॥

evaṁ tāṁ sannivāryaiva bhagavaddharmatatparaḥ āsītparamasantuṣṭo dvandvaduḥkhaṁ samatyajat

इस प्रकार उसे रोककर, भगवद्धर्म में तत्पर वह परम संतुष्ट रहा, और द्वन्द्व के दुःख को त्याग दिया।

श्लोक 16 (shiva.kotirudra.32.16)

कदाचिच्च सुदेहा वै गेहे च सहवासिनः । जगाम प्रियगोष्ठ्यर्थं विवादस्तत्र सङ्गतः ॥ 32.16 ॥

kadācicca sudehā vai gehe ca sahavāsinaḥ jagāma priyagoṣṭhyarthaṁ vivādastatra saṅgataḥ

एक बार सुदेहा अपनी पड़ोसिन के घर मित्रवत् बातचीत के लिए गई; वहाँ एक विवाद उत्पन्न हुआ।

श्लोक 17 (shiva.kotirudra.32.17)

तत्पत्नी स्त्रीस्वभावाच्च भर्त्सिता सा तया तदा । उक्ता चेति दुरुक्त्या वै सुदेहा विप्रकामिनी ॥ 32.17 ॥

tatpatnī strīsvabhāvācca bhartsitā sā tayā tadā uktā ceti duruktyā vai sudehā viprakāminī

उस पड़ोसिन ने स्त्री-स्वभाव के कारण उसे तब भला-बुरा कहा; और वह ब्राह्मणी सुदेहा इस प्रकार कटु वचनों से कही गई।

श्लोक 18 (shiva.kotirudra.32.18)

पत्न्युवाच । अपुत्रिणि कथं गर्वं कुरुषे पुत्रिणी ह्यहम् । मद्धनं भोक्ष्यते पुत्रो धनं ते कश्च भोक्ष्यते ॥ 32.18 ॥

patnyuvāca aputriṇi kathaṁ garvaṁ kuruṣe putriṇī hyaham maddhanaṁ bhokṣyate putro dhanaṁ te kaśca bhokṣyate

उस पत्नी ने कहा — "हे पुत्रहीन! तू किस बात का गर्व करती है? मैं ही पुत्रवती हूँ। मेरा पुत्र मेरे धन को भोगेगा — तेरे धन को कौन भोगेगा?"

श्लोक 19 (shiva.kotirudra.32.19)

नूनं हरिष्यते राजा त्वद्धनं नात्र संशयः । धिग्धिक्त्वां ते धनं धिक्च धिक् ते मानं हि वन्ध्यके ॥ 32.19 ॥

nūnaṁ hariṣyate rājā tvaddhanaṁ nātra saṁśayaḥ dhigdhiktvāṁ te dhanaṁ dhikca dhik te mānaṁ hi vandhyake

"निश्चय ही राजा तेरा धन छीन लेगा, इसमें कोई संदेह नहीं। तुझ पर धिक्कार है, तेरे धन पर धिक्कार है, और हे बाँझ! तेरे अभिमान पर भी धिक्कार है!"

श्लोक 20 (shiva.kotirudra.32.20)

सूत उवाच । भर्त्सिता ताभिरिति सा गृहमागत्य दुःखिता । स्वामिने कथयामास तदुक्तं सर्वमादरात् ॥ 32.20 ॥

sūta uvāca bhartsitā tābhiriti sā gṛhamāgatya duḥkhitā svāmine kathayāmāsa taduktaṁ sarvamādarāt

सूत ने कहा — इस प्रकार उनके द्वारा भर्त्सित होकर, दुःखी होकर वह घर आई, और आदरपूर्वक अपने पति से वह सब कही हुई बात बताई।

श्लोक 21 (shiva.kotirudra.32.21)

ब्राह्मणोऽपि तदा दुःखं न चकार सुबुद्धिमान् । कथितं कथ्यतामेव यद्भावि तद्भवेत्प्रिये ॥ 32.21 ॥

brāhmaṇo’pi tadā duḥkhaṁ na cakāra subuddhimān kathitaṁ kathyatāmeva yadbhāvi tadbhavetpriye

उस बुद्धिमान ब्राह्मण ने भी इस पर कोई दुःख नहीं माना, और कहा — "जो कहा गया वह कहा गया; हे प्रिये! जो होना है वही होगा।"

श्लोक 22 (shiva.kotirudra.32.22)

इत्येवं च तदा तेन ह्याश्वस्तापि पुनः पुनः । न तदा सात्यजद्दुःखं ह्याग्रहं कृतवत्यसौ ॥ 32.22 ॥

ityevaṁ ca tadā tena hyāśvastāpi punaḥ punaḥ na tadā sātyajadduḥkhaṁ hyāgrahaṁ kṛtavatyasau

इस प्रकार उसके द्वारा बार-बार सांत्वना दिए जाने पर भी, उसने तब भी अपना दुःख नहीं छोड़ा, और हठ करने लगी।

श्लोक 23 (shiva.kotirudra.32.23)

सुदेहोवाच ॥ यथा तथा त्वया पुत्रः समुत्पाद्यः प्रियोऽसि मे । त्यक्षयामि ह्यन्यथाहं च देहं देहभृतां वर ॥ 32.23 ॥

sudehovāca yathā tathā tvayā putraḥ samutpādyaḥ priyo’si me tyakṣayāmi hyanyathāhaṁ ca dehaṁ dehabhṛtāṁ vara

सुदेहा ने कहा — "जिस किसी भी प्रकार तुम्हें पुत्र उत्पन्न करना ही होगा — तुम मुझे प्रिय हो। अन्यथा, हे देहधारियों में श्रेष्ठ! मैं अपने प्राण त्याग दूँगी।"

श्लोक 24 (shiva.kotirudra.32.24)

सूत उवाच । एवमुक्तं तया श्रुत्वा सुधर्मा ब्राह्मणोत्तमः । शिवं सस्मार मनसा तदाग्रहनिपीडितः ॥ 32.24 ॥

sūta uvāca evamuktaṁ tayā śrutvā sudharmā brāhmaṇottamaḥ śivaṁ sasmāra manasā tadāgrahanipīḍitaḥ

सूत ने कहा — उसके इस वचन को सुनकर, उसके हठ से पीड़ित होकर, श्रेष्ठ ब्राह्मण सुधर्मा ने मन ही मन शिव का स्मरण किया।

श्लोक 25 (shiva.kotirudra.32.25)

अग्नेरग्रेऽक्षिपत्पुष्पद्वयं विप्रो ह्यतन्द्रितः । मनसा दक्षिणं पुष्पं तन्मेने पुत्रकामदम् ॥ 32.25 ॥

agneragre’kṣipatpuṣpadvayaṁ vipro hyatandritaḥ manasā dakṣiṇaṁ puṣpaṁ tanmene putrakāmadam

उस सावधान ब्राह्मण ने अग्नि के सम्मुख दो पुष्प रखे, और मन में यह निश्चय किया कि दायाँ पुष्प पुत्र-प्राप्ति का सूचक होगा।

श्लोक 26 (shiva.kotirudra.32.26)

एवं कृत्वा पणं पत्नीमुवाच ब्राह्मणः स च । अनयोर्ग्राह्यमेकं ते पुष्पं पुत्रफलाप्तये ॥ 32.26 ॥

evaṁ kṛtvā paṇaṁ patnīmuvāca brāhmaṇaḥ sa ca anayorgrāhyamekaṁ te puṣpaṁ putraphalāptaye

ऐसी शर्त बनाकर उस ब्राह्मण ने अपनी पत्नी से कहा — "इन दोनों में से एक पुष्प तुम पुत्र-प्राप्ति के लिए ले लो।"

श्लोक 27 (shiva.kotirudra.32.27)

तया च मनसा धृत्वा पुत्रश्चैव भवेन्मम । तदा च स्वामिना यच्च धृतं पुष्पं समेतु माम् ॥ 32.27 ॥

tayā ca manasā dhṛtvā putraścaiva bhavenmama tadā ca svāminā yacca dhṛtaṁ puṣpaṁ sametu mām

और उसने मन में यह विचार किया — "मुझे पुत्र प्राप्त हो; जो पुष्प मेरे पति ने निश्चित किया है, वही मुझे प्राप्त हो।"

श्लोक 28 (shiva.kotirudra.32.28)

इत्युक्त्वा च तया तत्र नमस्कृत्य शिवं तदा । नत्वा चाग्निं पुनः प्रार्थ्य गृहीतं पुष्पमेककम् ॥ 32.28 ॥

ityuktvā ca tayā tatra namaskṛtya śivaṁ tadā natvā cāgniṁ punaḥ prārthya gṛhītaṁ puṣpamekakam

ऐसा सोचकर उसने वहाँ शिव को प्रणाम किया, और अग्नि को भी नमन कर, पुनः प्रार्थना करके एक पुष्प उठा लिया।

श्लोक 29 (shiva.kotirudra.32.29)

स्वामिना चिन्तितं यच्च तद् गृहीतं तया न हि । सुदेहया विमोहेन शिवेच्छासम्भवेन वै ॥ 32.29 ॥

svāminā cintitaṁ yacca tad gṛhītaṁ tayā na hi sudehayā vimohena śivecchāsambhavena vai

परन्तु जो पुष्प उसके पति ने निश्चित किया था, वही उसके हाथ नहीं आया; सुदेहा के मोहवश तथा शिव की इच्छा से ही ऐसा हुआ।

श्लोक 30 (shiva.kotirudra.32.30)

तद् दृष्ट्वा पुरुषश्चैव निःश्वासं पर्यमोचयत् । स्मृत्वा शिवपदाम्भोजमुवाच निजकामिनीम् ॥ 32.30 ॥

tad dṛṣṭvā puruṣaścaiva niḥśvāsaṁ paryamocayat smṛtvā śivapadāmbhojamuvāca nijakāminīm

यह देखकर उस पुरुष ने एक दीर्घ श्वास छोड़ी; और शिव के चरणकमलों का स्मरण कर अपनी प्रियतमा से कहा।

श्लोक 31 (shiva.kotirudra.32.31)

सुधर्मोवाच । निर्मितं चेश्वरेणैव कथं चैवान्यथा भवेत् । आशां त्यज प्रिये त्वं च परिचर्यां कुरु प्रभोः ॥ 32.31 ॥

sudharmovāca nirmitaṁ ceśvareṇaiva kathaṁ caivānyathā bhavet āśāṁ tyaja priye tvaṁ ca paricaryāṁ kuru prabhoḥ

सुधर्मा ने कहा — "जो ईश्वर द्वारा ही निर्धारित है, वह अन्यथा कैसे हो सकता है? हे प्रिये! तुम आशा त्याग दो, और प्रभु की सेवा करो।"

श्लोक 32 (shiva.kotirudra.32.32)

इत्युक्त्वा तु स्वयं विप्र आशां परिविहाय च । धर्मकार्यरतः सोऽभूच्छङ्करध्यानतत्परः ॥ 32.32 ॥

ityuktvā tu svayaṁ vipra āśāṁ parivihāya ca dharmakāryarataḥ so’bhūcchaṅkaradhyānatatparaḥ

ऐसा कहकर वह ब्राह्मण स्वयं भी सारी आशा त्यागकर, धर्मकार्य में रत तथा शंकर के ध्यान में तत्पर हो गया।

श्लोक 33 (shiva.kotirudra.32.33)

सा सुदेहाग्रहं नैव मुमोचात्मजकाम्यया । प्रत्युवाच पतिं प्रेम्णा साञ्जलिर्नतमस्तका ॥ 32.33 ॥

sā sudehāgrahaṁ naiva mumocātmajakāmyayā pratyuvāca patiṁ premṇā sāñjalirnatamastakā

परन्तु वह सुदेहा पुत्र-कामना के कारण अपना हठ नहीं छोड़ पाई; हाथ जोड़कर, सिर झुकाकर उसने प्रेमपूर्वक अपने पति को उत्तर दिया।

श्लोक 34 (shiva.kotirudra.32.34)

सुदेहोवाच । मयि पुत्रो न चास्त्वन्यां पत्नीं कुरु मदाज्ञया । तस्यां नूनं सुतश्चैव भविष्यति न संशयः ॥ 32.34 ॥

sudehovāca mayi putro na cāstvanyāṁ patnīṁ kuru madājñayā tasyāṁ nūnaṁ sutaścaiva bhaviṣyati na saṁśayaḥ

सुदेहा ने कहा — "जब मुझसे पुत्र नहीं होगा, तो मेरी आज्ञा से तुम दूसरा विवाह कर लो; उससे निश्चय ही पुत्र होगा, इसमें संदेह नहीं।"

श्लोक 35 (shiva.kotirudra.32.35)

सूत उवाच । तदैव प्रर्थितो वै स ब्रह्मणः शैवसत्तमः । उवाच स्वप्रियां तां च सुदेहां धर्मतत्परः ॥ 32.35 ॥

sūta uvāca tadaiva prarthito vai sa brahmaṇaḥ śaivasattamaḥ uvāca svapriyāṁ tāṁ ca sudehāṁ dharmatatparaḥ

सूत ने कहा — इस प्रकार प्रार्थना किए जाने पर, धर्मपरायण शैवश्रेष्ठ उस ब्राह्मण ने अपनी प्रिया सुदेहा से कहा।

श्लोक 36 (shiva.kotirudra.32.36)

सुधर्मोवाच । त्वदीयं च मदीयं च सर्वं दुःखं गतं ध्रुवम् । तस्मात्त्वं धर्मविघ्नं च प्रिये मा कुरु साम्प्रतम् ॥ 32.36 ॥

sudharmovāca tvadīyaṁ ca madīyaṁ ca sarvaṁ duḥkhaṁ gataṁ dhruvam tasmāttvaṁ dharmavighnaṁ ca priye mā kuru sāmpratam

सुधर्मा ने कहा — "तुम्हारा और मेरा — दोनों का दुःख निश्चय ही दूर हो जाएगा। अतः हे प्रिये! अब तुम धर्म में विघ्न मत डालो।"

श्लोक 37 (shiva.kotirudra.32.37)

सूत उवाच । इत्येवं वारिता सा च स्वमातुः पुत्रिकां तदा । गृहमानीय भर्तारं वृणु त्वेनामिदं जगौ ॥ 32.37 ॥

sūta uvāca ityevaṁ vāritā sā ca svamātuḥ putrikāṁ tadā gṛhamānīya bhartāraṁ vṛṇu tvenāmidaṁ jagau

सूत ने कहा — इस प्रकार रोके जाने पर भी उसने अपनी बहन को घर बुलाया, और अपने पति से कहा — "इससे विवाह करो" — ऐसा उसने कहा।

श्लोक 38 (shiva.kotirudra.32.38)

सुधर्मोवाच । इदानीं वदसि त्वं च मत्प्रियेयं ततः पुनः । पुत्रसूश्च यदा स्याद्वै तदा स्पर्धां करिष्यसि ॥ 32.38 ॥

sudharmovāca idānīṁ vadasi tvaṁ ca matpriyeyaṁ tataḥ punaḥ putrasūśca yadā syādvai tadā spardhāṁ kariṣyasi

सुधर्मा ने कहा — "अभी तो तुम कहती हो कि 'यह मुझे प्रिय है', परन्तु जब यह पुत्रवती हो जाएगी, तब तुम ईर्ष्या करने लगोगी।"

श्लोक 39 (shiva.kotirudra.32.39)

सूत उवाच । इत्युक्ता तेन पतिना सा सुदेहा च तत्प्रिया । पुनः प्राह करौ बद्ध्वा सुधर्माणं पतिं द्विजाः ॥ 32.39 ॥

sūta uvāca ityuktā tena patinā sā sudehā ca tatpriyā punaḥ prāha karau baddhvā sudharmāṇaṁ patiṁ dvijāḥ

सूत ने कहा — हे विप्रो! अपने पति द्वारा ऐसा कहे जाने पर, प्रिया सुदेहा ने हाथ जोड़कर पुनः अपने पति सुधर्मा से कहा।

श्लोक 40 (shiva.kotirudra.32.40)

नाहं स्पर्धां भगिन्या वै करिष्ये द्विजसत्तम । उपयच्छस्व पुत्रार्थमिमामाज्ञापयामि च ॥ 32.40 ॥

nāhaṁ spardhāṁ bhaginyā vai kariṣye dvijasattama upayacchasva putrārthamimāmājñāpayāmi ca

"हे द्विजश्रेष्ठ! मैं अपनी बहन से कभी ईर्ष्या नहीं करूँगी। पुत्र-प्राप्ति के लिए इससे विवाह कर लो — यह मैं आज्ञा देती हूँ।"

श्लोक 41 (shiva.kotirudra.32.41)

इत्येवं प्रार्थितः सोऽपि सुधर्मा प्रियया तया । घुश्मां तां समुपायंस्त विवाहविधिना द्विजः ॥ 32.41 ॥

ityevaṁ prārthitaḥ so’pi sudharmā priyayā tayā ghuśmāṁ tāṁ samupāyaṁsta vivāhavidhinā dvijaḥ

अपनी प्रिया द्वारा इस प्रकार प्रार्थना किए जाने पर, ब्राह्मण सुधर्मा ने विवाह-विधि से घुश्मा से विवाह कर लिया।

श्लोक 42 (shiva.kotirudra.32.42)

ततस्तां परिणीयाथ प्रार्थयामास तां द्विजः । त्वदीयेयं कनिष्ठा हि सदा पोष्याऽनघे प्रिये ॥ 32.42 ॥

tatastāṁ pariṇīyātha prārthayāmāsa tāṁ dvijaḥ tvadīyeyaṁ kaniṣṭhā hi sadā poṣyā’naghe priye

फिर उससे विवाह करने के बाद, उस ब्राह्मण ने सुदेहा से प्रार्थना की — "हे निष्पाप प्रिये! यह छोटी बहन तुम्हारी ही है, इसे सदा पालना।"

श्लोक 43 (shiva.kotirudra.32.43)

उक्त्वैवं स च धर्मात्मा सुधर्मा शैवसत्तमः । यथायोग्यं चकाराशु धर्मसङ्ग्रहमात्मनः ॥ 32.43 ॥

uktvaivaṁ sa ca dharmātmā sudharmā śaivasattamaḥ yathāyogyaṁ cakārāśu dharmasaṅgrahamātmanaḥ

ऐसा कहकर धर्मात्मा, शैवश्रेष्ठ सुधर्मा ने यथायोग्य रूप से शीघ्र ही अपने धर्म-संग्रह का कार्य जारी रखा।

श्लोक 44 (shiva.kotirudra.32.44)

सा चापि मातृपुत्रीं तां सखीवत्पर्यवर्त्तत । परित्यज्य विरोधं हि पुपोषाहर्निशं प्रिया ॥ 32.44 ॥

sā cāpi mātṛputrīṁ tāṁ sakhīvatparyavarttata parityajya virodhaṁ hi pupoṣāharniśaṁ priyā

और वह प्रिया सुदेहा भी अपनी माता की उस पुत्री के साथ सखी के समान व्यवहार करने लगी; विरोध त्यागकर वह रात-दिन उसका पालन-पोषण करती रही।

श्लोक 45 (shiva.kotirudra.32.45)

कनिष्ठा चैव या पत्नी स्वस्रनुज्ञामवाप्य च । पार्थिवान्सा चकाराशु नित्यमेकोत्तरं शतम् ॥ 32.45 ॥

kaniṣṭhā caiva yā patnī svasranujñāmavāpya ca pārthivānsā cakārāśu nityamekottaraṁ śatam

और वह छोटी पत्नी, अपनी बड़ी बहन की अनुमति पाकर, नित्य एक सौ एक पार्थिव-लिंग बनाने लगी।

श्लोक 46 (shiva.kotirudra.32.46)

विधानपूर्वकं घुश्मा सोपचारसमन्वितम् । कृत्वा तान्प्राक्षिपत्तत्र तडागे निकटस्थिते ॥ 32.46 ॥

vidhānapūrvakaṁ ghuśmā sopacārasamanvitam kṛtvā tānprākṣipattatra taḍāge nikaṭasthite

घुश्मा उन्हें विधिपूर्वक, उपचार सहित बनाकर, समीपस्थ एक तालाब में विसर्जित कर देती थी।

श्लोक 47 (shiva.kotirudra.32.47)

एवं नित्यं सा चकार शिवपूजां स्वकामदाम् । विसृज्य पुनरावाह्य तत्सपर्य्याविधानतः ॥ 32.47 ॥

evaṁ nityaṁ sā cakāra śivapūjāṁ svakāmadām visṛjya punarāvāhya tatsaparyyāvidhānataḥ

इस प्रकार वह नित्य अपनी इच्छापूर्ति करने वाली शिवपूजा करती रही, विसर्जन और पुनः आवाहन की विधिपूर्वक पूजा-प्रक्रिया से।

श्लोक 48 (shiva.kotirudra.32.48)

कुर्वन्त्या नित्यमेवं हि तस्याः शङ्करपूजनम् । लक्षसङ्ख्याभवत्पूर्णा सर्वकामफलप्रदा ॥ 32.48 ॥

kurvantyā nityamevaṁ hi tasyāḥ śaṅkarapūjanam lakṣasaṅkhyābhavatpūrṇā sarvakāmaphalapradā

इस प्रकार नित्य शंकर की पूजा करते-करते उसकी संख्या एक लाख पूर्ण हो गई — जो सब कामनाओं का फल देने वाली थी।

श्लोक 49 (shiva.kotirudra.32.49)

कृपया शङ्करस्यैव तस्याः पुत्रो व्यजायत । सुन्दरः सुभगश्चैव कल्याणगुणभाजनः ॥ 32.49 ॥

kṛpayā śaṅkarasyaiva tasyāḥ putro vyajāyata sundaraḥ subhagaścaiva kalyāṇaguṇabhājanaḥ

शंकर की कृपा से ही उसे एक पुत्र प्राप्त हुआ — जो सुन्दर, सौभाग्यशाली और कल्याणकारी गुणों से सम्पन्न था।

श्लोक 50 (shiva.kotirudra.32.50)

तं दृष्ट्वा परमप्रीतः स विप्रो धर्मवित्तमः । अनासक्तः सुखं भेजे ज्ञानधर्मपरायणः ॥ 32.50 ॥

taṁ dṛṣṭvā paramaprītaḥ sa vipro dharmavittamaḥ anāsaktaḥ sukhaṁ bheje jñānadharmaparāyaṇaḥ

उसे देखकर वह धर्मवेत्ता ब्राह्मण परम प्रसन्न हुआ, और अनासक्त, ज्ञान-धर्म में परायण रहते हुए सुख का अनुभव करने लगा।

श्लोक 51 (shiva.kotirudra.32.51)

सुदेहा तावदस्यास्तु स्पर्धामुग्रां चकार सा । प्रथमं शीतलं तस्या हृदयं ह्यसिवत्पुनः ॥ 32.51 ॥

sudehā tāvadasyāstu spardhāmugrāṁ cakāra sā prathamaṁ śītalaṁ tasyā hṛdayaṁ hyasivatpunaḥ

परन्तु सुदेहा उसके प्रति तीव्र ईर्ष्या करने लगी; उसका हृदय, जो पहले शीतल था, अब पुनः तलवार के समान तीक्ष्ण हो गया।

श्लोक 52 (shiva.kotirudra.32.52)

ततः परं च यज्जातं कुत्सितं कर्म दुःखदम् । सावधानेन मनसा श्रूयतां तन्मुनीश्वराः ॥ 32.52 ॥

tataḥ paraṁ ca yajjātaṁ kutsitaṁ karma duḥkhadam sāvadhānena manasā śrūyatāṁ tanmunīśvarāḥ

हे मुनीश्वरो! इसके आगे जो निन्दनीय और दुःखदायी कर्म घटित हुआ, उसे सावधान चित्त से सुनिए।

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