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कोटिरुद्र संहिता · अध्याय 34

विष्णु द्वारा सुदर्शन चक्र की प्राप्ति

अध्याय 33अध्याय-सूचीअध्याय 35

श्लोक 1 (shiva.kotirudra.34.1)

व्यास उवाच । इति श्रुत्वा वचस्तस्य सूतस्य च मुनीश्वराः । समूचुस्तं सुप्रशस्य लोकानां हितकाम्यया ॥ 34.1 ॥

vyāsa uvāca iti śrutvā vacastasya sūtasya ca munīśvarāḥ samūcustaṁ supraśasya lokānāṁ hitakāmyayā

व्यास जी ने कहा — सूत जी के इन वचनों को सुनकर महामुनियों ने लोकों के हित की कामना से उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए उनसे कहा।

श्लोक 2 (shiva.kotirudra.34.2)

ऋषय ऊचुः । सूत सर्वं विजानासि ततः पृच्छामहे वयम् । हरीश्वरस्य लिङ्गस्य महिमानं वद प्रभो ॥ 34.2 ॥

ṛṣaya ūcuḥ sūta sarvaṁ vijānāsi tataḥ pṛcchāmahe vayam harīśvarasya liṅgasya mahimānaṁ vada prabho

ऋषियों ने कहा — हे सूत! आप सब कुछ जानते हैं, अतः हम पूछते हैं — हे प्रभो! हरीश्वर के उस लिंग की महिमा हमें सुनाइए।

श्लोक 3 (shiva.kotirudra.34.3)

चक्रं सुदर्शनं प्राप्तं विष्णुनेति श्रुतं पुरा । तदाराधनतस्तात तत्कथां च विशेषतः ॥ 34.3 ॥

cakraṁ sudarśanaṁ prāptaṁ viṣṇuneti śrutaṁ purā tadārādhanatastāta tatkathāṁ ca viśeṣataḥ

हे तात! हमने पहले सुना है कि विष्णु ने उसी की आराधना से सुदर्शन चक्र प्राप्त किया था; वह कथा हमें विशेष रूप से सुनाइए।

श्लोक 4 (shiva.kotirudra.34.4)

सूत उवाच । श्रूयतां च ऋषिश्रेष्ठा हरीश्वरकथा शुभा । यतः सुदर्शनं लब्धं विष्णुना शङ्करात्पुरा ॥ 34.4 ॥

sūta uvāca śrūyatāṁ ca ṛṣiśreṣṭhā harīśvarakathā śubhā yataḥ sudarśanaṁ labdhaṁ viṣṇunā śaṅkarātpurā

सूत जी ने कहा — हे श्रेष्ठ ऋषियो! हरीश्वर की वह शुभ कथा सुनिए, जिसके द्वारा विष्णु ने पूर्वकाल में शंकर से सुदर्शन चक्र प्राप्त किया था।

श्लोक 5 (shiva.kotirudra.34.5)

कस्मिंश्चित्समये दैत्याः सञ्जाता बलवत्तराः । लोकांस्ते पीडयामासुर्धर्मलोपं च चक्रिरे ॥ 34.5 ॥

kasmiṁścitsamaye daityāḥ sañjātā balavattarāḥ lokāṁste pīḍayāmāsurdharmalopaṁ ca cakrire

किसी समय दैत्य अत्यंत बलवान हो गए; उन्होंने लोकों को पीड़ित किया और धर्म का लोप कर दिया।

श्लोक 6 (shiva.kotirudra.34.6)

ते देवाः पीडिता दैत्यैर्महाबलपराक्रमैः । स्वं दुःखं कथयामासुर्विष्णुं निर्जररक्षकम् ॥ 34.6 ॥

te devāḥ pīḍitā daityairmahābalaparākramaiḥ svaṁ duḥkhaṁ kathayāmāsurviṣṇuṁ nirjararakṣakam

महाबली और पराक्रमी दैत्यों से पीड़ित उन देवताओं ने देवरक्षक विष्णु को अपना दुःख सुनाया।

श्लोक 7 (shiva.kotirudra.34.7)

देवा ऊचुः । कृपां कुरु प्रभो त्वं च दैत्यैः सम्पीडिता भृशम् । कुत्र यामश्च किं कुर्मः शरण्यं त्वां समाश्रिताः ॥ 34.7 ॥

devā ūcuḥ kṛpāṁ kuru prabho tvaṁ ca daityaiḥ sampīḍitā bhṛśam kutra yāmaśca kiṁ kurmaḥ śaraṇyaṁ tvāṁ samāśritāḥ

देवताओं ने कहा — हे प्रभो! हम दैत्यों से अत्यंत पीड़ित हैं, हम पर कृपा कीजिए। हम कहाँ जाएँ, क्या करें? आपकी शरण में आए हैं, आप ही हमारे रक्षक हैं।

श्लोक 8 (shiva.kotirudra.34.8)

सूत उवाच । इत्येवं वचनं श्रुत्वा देवानां दुःखितात्मनाम् । स्मृत्वा शिवपदाम्भोजं विष्णुर्वचनमब्रवीत् ॥ 34.8 ॥

sūta uvāca ityevaṁ vacanaṁ śrutvā devānāṁ duḥkhitātmanām smṛtvā śivapadāmbhojaṁ viṣṇurvacanamabravīt

सूत जी ने कहा — दुःखी देवताओं के इन वचनों को सुनकर, शिव के चरण-कमलों का स्मरण करते हुए विष्णु ने यह वचन कहा।

श्लोक 9 (shiva.kotirudra.34.9)

विष्णुरुवाच । करिष्यामि च वः कार्यमाराध्य गिरिशं सुराः । बलिष्ठाः शत्रवो ह्येते विजेतव्याः प्रयत्नतः ॥ 34.9 ॥

viṣṇuruvāca kariṣyāmi ca vaḥ kāryamārādhya giriśaṁ surāḥ baliṣṭhāḥ śatravo hyete vijetavyāḥ prayatnataḥ

विष्णु ने कहा — हे देवो! गिरीश की आराधना करके मैं तुम्हारा कार्य सिद्ध करूँगा; ये शत्रु अत्यंत बलवान हैं, इन्हें पूरे प्रयत्न से जीतना होगा।

श्लोक 10 (shiva.kotirudra.34.10)

सूत उवाच । इत्युक्तास्ते सुराः सर्वे विष्णुना प्रभविष्णुना । मत्वा दैत्यान्हतान्दुष्टान्ययुर्धाम स्वकं स्वकम् ॥ 34.10 ॥

sūta uvāca ityuktāste surāḥ sarve viṣṇunā prabhaviṣṇunā matvā daityānhatānduṣṭānyayurdhāma svakaṁ svakam

सूत जी ने कहा — प्रभावशाली विष्णु के ऐसा कहने पर सभी देवता दुष्ट दैत्यों को मानो मरा हुआ ही मानकर अपने-अपने धाम को लौट गए।

श्लोक 11 (shiva.kotirudra.34.11)

विष्णुरप्यमराणां तु जयार्थमभजच्छिवम् । सर्वामराणामधिपं सर्वसाक्षिणमव्ययम् ॥ 34.11 ॥

viṣṇurapyamarāṇāṁ tu jayārthamabhajacchivam sarvāmarāṇāmadhipaṁ sarvasākṣiṇamavyayam

विष्णु ने भी देवताओं की विजय के लिए सर्वदेवाधिप, सबके साक्षी, अविनाशी शिव की आराधना आरम्भ की।

श्लोक 12 (shiva.kotirudra.34.12)

गत्वा कैलासनिकटे तपस्तेपे हरिः स्वयम् । कृत्वा कुण्डं च संस्थाप्य जातवेदसमग्रतः ॥ 34.12 ॥

gatvā kailāsanikaṭe tapastepe hariḥ svayam kṛtvā kuṇḍaṁ ca saṁsthāpya jātavedasamagrataḥ

कैलास के निकट जाकर हरि ने स्वयं तपस्या की; एक कुण्ड बनाकर उसमें अग्नि को स्थापित किया।

श्लोक 13 (shiva.kotirudra.34.13)

पार्थिवेन विधानेन मन्त्रैर्नानाविधैरपि । स्तोत्रैश्चैवाप्यनेकैश्च गिरिशं चाभजन्मुदा ॥ 34.13 ॥

pārthivena vidhānena mantrairnānāvidhairapi stotraiścaivāpyanekaiśca giriśaṁ cābhajanmudā

पार्थिवलिंग-विधि से, नाना प्रकार के मंत्रों से तथा अनेक स्तोत्रों से उन्होंने आनन्दपूर्वक गिरीश की आराधना की।

श्लोक 14 (shiva.kotirudra.34.14)

कमलैः सरसो जातैर्मानसाख्यान्मुनीश्वराः । बद्ध्वा चैवासनं तत्र न चचाल हरिः स्वयम् ॥ 34.14 ॥

kamalaiḥ saraso jātairmānasākhyānmunīśvarāḥ baddhvā caivāsanaṁ tatra na cacāla hariḥ svayam

हे मुनीश्वरो! मानसरोवर में उत्पन्न कमलों से पूजन करते हुए, वहाँ आसन जमाकर हरि स्वयं वहाँ से तनिक भी विचलित न हुए।

श्लोक 15 (shiva.kotirudra.34.15)

प्रसादावधि चैवात्र स्थेयं वै सर्वथा मया । इत्येवं निश्चयं कृत्वा समानर्च शिवं हरिः ॥ 34.15 ॥

prasādāvadhi caivātra stheyaṁ vai sarvathā mayā ityevaṁ niścayaṁ kṛtvā samānarca śivaṁ hariḥ

'जब तक कृपा प्राप्त न हो, मैं यहीं सर्वथा बना रहूँगा' — ऐसा दृढ़ निश्चय करके हरि ने शिव की आराधना की।

श्लोक 16 (shiva.kotirudra.34.16)

यदा नैव हरस्तुष्टो बभूव हरये द्विजाः । तदा स भगवान्विष्णुर्विचारे तत्परोऽभवत् ॥ 34.16 ॥

yadā naiva harastuṣṭo babhūva haraye dvijāḥ tadā sa bhagavānviṣṇurvicāre tatparo'bhavat

हे द्विजो! जब हर हरि से प्रसन्न नहीं हुए, तब भगवान विष्णु गहन विचार में लीन हो गए।

श्लोक 17 (shiva.kotirudra.34.17)

विचार्यैवं स्वमनसि सेवनं बहुधा कृतम् । तथापि न हरस्तुष्टो बभूवोतिकरः प्रभुः ॥ 34.17 ॥

vicāryaivaṁ svamanasi sevanaṁ bahudhā kṛtam tathāpi na harastuṣṭo babhūvotikaraḥ prabhuḥ

अपने मन में यह विचार करते हुए कि उन्होंने अनेक प्रकार से सेवा की है, फिर भी वे प्रभु हर प्रसन्न न हुए।

श्लोक 18 (shiva.kotirudra.34.18)

ततः सुविस्मितो विष्णुर्भक्त्या परमयान्वितः । सहस्रैर्नामभिः प्रीत्या तुष्टाव परमेश्वरम् ॥ 34.18 ॥

tataḥ suvismito viṣṇurbhaktyā paramayānvitaḥ sahasrairnāmabhiḥ prītyā tuṣṭāva parameśvaram

तब अत्यंत विस्मित विष्णु ने परम भक्ति से युक्त होकर प्रेमपूर्वक सहस्र नामों से परमेश्वर की स्तुति की।

श्लोक 19 (shiva.kotirudra.34.19)

प्रत्येकं कमलं तस्मै नाममन्त्रमुदीर्य च । पूजयामास वै शम्भुं शरणागतवत्सलम् ॥ 34.19 ॥

pratyekaṁ kamalaṁ tasmai nāmamantramudīrya ca pūjayāmāsa vai śambhuṁ śaraṇāgatavatsalam

प्रत्येक नाम-मंत्र का उच्चारण करते हुए, प्रत्येक नाम पर एक-एक कमल चढ़ाकर, उन्होंने शरणागतवत्सल शम्भु की पूजा की।

श्लोक 20 (shiva.kotirudra.34.20)

परीक्षार्थं विष्णुभक्तेस्तदा वै शङ्करेण ह । कमलानां सहस्रात्तु हृतमेकं च नीरजम् ॥ 34.20 ॥

parīkṣārthaṁ viṣṇubhaktestadā vai śaṅkareṇa ha kamalānāṁ sahasrāttu hṛtamekaṁ ca nīrajam

तब शंकर ने विष्णु की भक्ति की परीक्षा लेने के लिए उन एक हज़ार कमलों में से एक कमल गुप्त रूप से हटा दिया।

श्लोक 21 (shiva.kotirudra.34.21)

न ज्ञातं विष्णुना तच्च मायाकारणमद्भुतम् । न्यूनं तच्चापि संज्ञाय तदन्वेषणतत्परः ॥ 34.21 ॥

na jñātaṁ viṣṇunā tacca māyākāraṇamadbhutam nyūnaṁ taccāpi saṁjñāya tadanveṣaṇatatparaḥ

विष्णु को शिव की उस अद्भुत माया का पता नहीं चला; परंतु एक कमल की कमी जानकर वे उसकी खोज में तत्पर हो गए।

श्लोक 22 (shiva.kotirudra.34.22)

बभ्राम सकलां पृथ्वीं तत्प्रीत्यै सुदृढव्रतः । तदप्राप्य विशुद्धात्मा नेत्रमेकमुदाहरत् ॥ 34.22 ॥

babhrāma sakalāṁ pṛthvīṁ tatprītyai sudṛḍhavrataḥ tadaprāpya viśuddhātmā netramekamudāharat

अत्यंत दृढ़ व्रतधारी विष्णु उसकी खोज के लिए सारी पृथ्वी पर घूमे; न पाकर, विशुद्ध आत्मा उस विष्णु ने अपने ही एक नेत्र को निकाल लिया।

श्लोक 23 (shiva.kotirudra.34.23)

तं दृष्ट्वा स प्रसन्नोऽभूच्छङ्करः सर्वदुःखहा । आविर्बभूव तत्रैव जगाद वचनं हरिम् ॥ 34.23 ॥

taṁ dṛṣṭvā sa prasanno'bhūcchaṅkaraḥ sarvaduḥkhahā āvirbabhūva tatraiva jagāda vacanaṁ harim

यह देखकर समस्त दुःखों को हरने वाले शंकर प्रसन्न हो गए; वे वहीं प्रकट होकर हरि से यह वचन कहने लगे।

श्लोक 24 (shiva.kotirudra.34.24)

शिव उवाच । प्रसन्नोऽस्मि हरे तुभ्यं वरं ब्रूहि यथेप्सितम् । मनोऽभिलषितं दद्मि नादेयं विद्यते तव ॥ 34.24 ॥

śiva uvāca prasanno'smi hare tubhyaṁ varaṁ brūhi yathepsitam mano'bhilaṣitaṁ dadmi nādeyaṁ vidyate tava

शिव ने कहा — हे हरे! मैं तुमसे प्रसन्न हूँ, जैसा चाहो वैसा वर माँगो; तुम्हारे मन का अभीष्ट मैं दूँगा, तुम्हें कुछ भी अदेय नहीं है।

श्लोक 25 (shiva.kotirudra.34.25)

सूत उवाच । तच्छ्रुत्वा शम्भुवचनं केशवः प्रीतमानसः । महाहर्षसमापन्नो ह्यब्रवीत्साञ्जलिः शिवम् ॥ 34.25 ॥

sūta uvāca tacchrutvā śambhuvacanaṁ keśavaḥ prītamānasaḥ mahāharṣasamāpanno hyabravītsāñjaliḥ śivam

सूत जी ने कहा — शम्भु के इस वचन को सुनकर प्रसन्नचित्त केशव अत्यंत हर्ष से भरकर हाथ जोड़कर शिव से बोले।

श्लोक 26 (shiva.kotirudra.34.26)

विष्णुरुवाच । वाच्यं किं मे त्वदग्रे वै ह्यन्तर्यामी त्वमास्थितः । तथापि कथ्यते नाथ तव शासनगौरवात् ॥ 34.26 ॥

viṣṇuruvāca vācyaṁ kiṁ me tvadagre vai hyantaryāmī tvamāsthitaḥ tathāpi kathyate nātha tava śāsanagauravāt

विष्णु ने कहा — मुझे आपके सामने क्या कहना है, आप तो स्वयं अंतर्यामी होकर विराजमान हैं; फिर भी हे नाथ! आपकी आज्ञा के गौरव के कारण मैं कहता हूँ।

श्लोक 27 (shiva.kotirudra.34.27)

दैत्यैश्च पीडितं विश्वं सुखं नो नः सदाशिव । दैत्यान् हन्तुं मम स्वामिन्स्वायुधं न प्रवर्तते ॥ 34.27 ॥

daityaiśca pīḍitaṁ viśvaṁ sukhaṁ no naḥ sadāśiva daityān hantuṁ mama svāminsvāyudhaṁ na pravartate

हे सदाशिव! यह विश्व दैत्यों से पीड़ित है, हमें कोई सुख नहीं है। हे स्वामिन्! दैत्यों को मारने में मेरे अपने शस्त्र सफल नहीं होते।

श्लोक 28 (shiva.kotirudra.34.28)

किं करोमि क्व गच्छामि नान्यो मे रक्षकः परः । अतोऽहं परमेशान शरणं त्वां समागतः ॥ 34.28 ॥

kiṁ karomi kva gacchāmi nānyo me rakṣakaḥ paraḥ ato'haṁ parameśāna śaraṇaṁ tvāṁ samāgataḥ

मैं क्या करूँ, कहाँ जाऊँ? आपके अतिरिक्त मेरा कोई और रक्षक नहीं है; अतः हे परमेश्वर! मैं आपकी शरण में आया हूँ।

श्लोक 29 (shiva.kotirudra.34.29)

सूत उवाच । इत्युक्त्वा च नमस्कृत्य शिवाय परमात्मने । स्थितश्चैवाग्रतः शम्भोः स्वयं च पुरुपीडितः ॥ 34.29 ॥

sūta uvāca ityuktvā ca namaskṛtya śivāya paramātmane sthitaścaivāgrataḥ śambhoḥ svayaṁ ca purupīḍitaḥ

सूत जी ने कहा — ऐसा कहकर और परमात्मा शिव को नमस्कार करके, अत्यंत पीड़ित विष्णु स्वयं शम्भु के सामने खड़े रहे।

श्लोक 30 (shiva.kotirudra.34.30)

सूत उवाच । इति श्रुत्वा वचो विष्णोर्देवदेवो महेश्वरः । ददौ तस्मै स्वकं चक्रं तेजोराशिं सुदर्शनम् ॥ 34.30 ॥

sūta uvāca iti śrutvā vaco viṣṇordevadevo maheśvaraḥ dadau tasmai svakaṁ cakraṁ tejorāśiṁ sudarśanam

सूत जी ने कहा — विष्णु के इस वचन को सुनकर देवाधिदेव महेश्वर ने उन्हें अपना तेजपुंज सुदर्शन चक्र प्रदान किया।

श्लोक 31 (shiva.kotirudra.34.31)

तत्प्राप्य भगवान्विष्णुर्दैत्यांस्तान्बलवत्तरान् । जघान तेन चक्रेण द्रुतं सर्वान्विना श्रमम् ॥ 34.31 ॥

tatprāpya bhagavānviṣṇurdaityāṁstānbalavattarān jaghāna tena cakreṇa drutaṁ sarvānvinā śramam

उसे पाकर भगवान विष्णु ने उस चक्र से उन सभी अत्यंत बलवान दैत्यों को बिना किसी परिश्रम के शीघ्र ही मार डाला।

श्लोक 32 (shiva.kotirudra.34.32)

जगत्स्वास्थ्यं परं लेभे बभूवुः सुखिनः सुराः । सुप्रीतः स्वायुधं प्राप्य हरिरासीन्महासुखी ॥ 34.32 ॥

jagatsvāsthyaṁ paraṁ lebhe babhūvuḥ sukhinaḥ surāḥ suprītaḥ svāyudhaṁ prāpya harirāsīnmahāsukhī

जगत को परम शांति प्राप्त हुई, देवता सुखी हो गए, और अपना नया आयुध पाकर हरि भी अत्यंत प्रसन्न और परम सुखी हुए।

श्लोक 33 (shiva.kotirudra.34.33)

ऋषय ऊचुः ॥ किं तन्नामसहस्रं वै कथय त्वं हि शाङ्करम् । येन तुष्टो ददौ चक्रं हरये स महेश्वरः ॥ 34.33 ॥

ṛṣaya ūcuḥ kiṁ tannāmasahasraṁ vai kathaya tvaṁ hi śāṅkaram yena tuṣṭo dadau cakraṁ haraye sa maheśvaraḥ

ऋषियों ने कहा — वह शंकर का सहस्र-नाम कौन-सा है, जिससे प्रसन्न होकर उन महेश्वर ने हरि को चक्र प्रदान किया, वह हमें सुनाइए।

श्लोक 34 (shiva.kotirudra.34.34)

तन्माहात्म्यं मम ब्रूहि शिवसंवादपूर्वकम् । कृपालुत्वं च शम्भोर्हि विष्णूपरि यथातथम् ॥ 34.34 ॥

tanmāhātmyaṁ mama brūhi śivasaṁvādapūrvakam kṛpālutvaṁ ca śambhorhi viṣṇūpari yathātatham

उसकी महिमा शिव के साथ हुए संवाद सहित हमें सुनाइए, और यह भी कि शम्भु की कृपालुता विष्णु के प्रति ठीक-ठीक किस प्रकार प्रकट हुई।

श्लोक 35 (shiva.kotirudra.34.35)

व्यास उवाच । इति तेषां वचः श्रुत्वा मुनीनां भावितात्मनाम् । स्मृत्वा शिवपदाम्भोजं सूतो वचनमब्रवीत् ॥ 34.35 ॥

vyāsa uvāca iti teṣāṁ vacaḥ śrutvā munīnāṁ bhāvitātmanām smṛtvā śivapadāmbhojaṁ sūto vacanamabravīt

व्यास जी ने कहा — शुद्ध अंतःकरण वाले उन मुनियों के इन वचनों को सुनकर, शिव के चरण-कमलों का स्मरण करते हुए सूत जी ने यह कहना आरम्भ किया।

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