कोटिरुद्र संहिता · अध्याय 35
शिव सहस्रनाम
श्लोक 1 (shiva.kotirudra.35.1)
सूत उवाच । श्रूयतां भो ऋषिश्रेष्ठा येन तुष्टो महेश्वरः । तदहं कथयाम्यद्य शैवं नामसहस्रकम् ॥ 35.1 ॥
sūta uvāca śrūyatāṁ bho ṛṣiśreṣṭhā yena tuṣṭo maheśvaraḥ tadahaṁ kathayāmyadya śaivaṁ nāmasahasrakam
सूत जी ने कहा — हे श्रेष्ठ ऋषियो! सुनिए, जिस स्तवन से महेश्वर प्रसन्न हुए, वह शिव-सहस्रनाम मैं आज आपको सुनाता हूँ।
श्लोक 2 (shiva.kotirudra.35.2)
श्रीविष्णुरुवाच । शिवो हरो मृडो रुद्रः पुष्करः पुष्पलोचनः । अर्थिगम्यः सदाचारः शर्वः शम्भुर्महेश्वरः ॥ 35.2 ॥
śrīviṣṇuruvāca śivo haro mṛḍo rudraḥ puṣkaraḥ puṣpalocanaḥ arthigamyaḥ sadācāraḥ śarvaḥ śambhurmaheśvaraḥ
श्रीविष्णु ने कहा — शिव, हर, मृड (सहज कृपालु), रुद्र, पुष्कर (पोषण करने वाले), पुष्पलोचन (पुष्प के समान नेत्रों वाले), अर्थिगम्य (याचकों को सुलभ), सदाचार (सदा सदाचारी), शर्व, शम्भु और महेश्वर — इन नामों से मैं उनकी वंदना करता हूँ।
श्लोक 3 (shiva.kotirudra.35.3)
चन्द्रापीडश्चन्द्रमौलिर्विश्वं विश्वम्भरेश्वरः । वेदान्तसारसन्दोहः कपाली नीललोहितः ॥ 35.3 ॥
candrāpīḍaścandramaulirviśvaṁ viśvambhareśvaraḥ vedāntasārasandohaḥ kapālī nīlalohitaḥ
चन्द्रापीड (चन्द्रमा को शिरोभूषण बनाने वाले), चन्द्रमौलि (चन्द्र-शेखर), विश्व (स्वयं जगत्-स्वरूप), विश्वम्भरेश्वर (जगत् को धारण करने वाले ईश्वर), वेदान्तसारसन्दोह (वेदांत के सार का समूह), कपाली (कपाल धारण करने वाले) और नीललोहित (नीले-लाल वर्ण वाले)।
श्लोक 4 (shiva.kotirudra.35.4)
ध्यानाधारोऽपरिच्छेद्यो गौरीभर्ता गणेश्वरः । अष्टमूर्तिर्विश्वमूर्तिस्त्रिवर्गस्वर्गसाधनः ॥ 35.4 ॥
dhyānādhāro'paricchedyo gaurībhartā gaṇeśvaraḥ aṣṭamūrtirviśvamūrtistrivargasvargasādhanaḥ
ध्यानाधार (ध्यान के आधार), अपरिच्छेद्य (जिनका कोई विभाजन नहीं), गौरीभर्ता (गौरी के पति), गणेश्वर (गणों के स्वामी), अष्टमूर्ति (आठ रूपों वाले), विश्वमूर्ति (जगत्-रूप) और त्रिवर्गस्वर्गसाधन (धर्म-अर्थ-काम तथा स्वर्ग के साधक)।
श्लोक 5 (shiva.kotirudra.35.5)
ज्ञानगम्यो दृढप्रज्ञो देवदेवस्त्रिलोचनः । वामदेवो महादेवः पटुः परिवृढो दृढः ॥ 35.5 ॥
jñānagamyo dṛḍhaprajño devadevastrilocanaḥ vāmadevo mahādevaḥ paṭuḥ parivṛḍho dṛḍhaḥ
ज्ञानगम्य (ज्ञान से प्राप्त होने योग्य), दृढप्रज्ञ (स्थिर बुद्धि वाले), देवदेव (देवों के देव), त्रिलोचन (तीन नेत्रों वाले), वामदेव, महादेव, पटु (कुशल), परिवृढ (सर्वश्रेष्ठ) और दृढ (अटल)।
श्लोक 6 (shiva.kotirudra.35.6)
विश्वरूपो विरूपाक्षो वागीशः शुचिसत्तमः । सर्वप्रमाणसंवादी वृषाङ्को वृषवाहनः ॥ 35.6 ॥
viśvarūpo virūpākṣo vāgīśaḥ śucisattamaḥ sarvapramāṇasaṁvādī vṛṣāṅko vṛṣavāhanaḥ
विश्वरूप (जगत्-रूप), विरूपाक्ष (विषम नेत्रों वाले), वागीश (वाणी के स्वामी), शुचिसत्तम (पवित्रों में परम पवित्र), सर्वप्रमाणसंवादी (सभी प्रमाणों से संगत), वृषांक (वृषभ-चिह्न वाले) और वृषवाहन (वृषभ पर सवार होने वाले)।
श्लोक 7 (shiva.kotirudra.35.7)
ईशः पिनाकी खट्वाङ्गी चित्रवेषश्चिरन्तनः । तमोहरो महायोगी गोप्ता ब्रह्मा च धूर्जटिः ॥ 35.7 ॥
īśaḥ pinākī khaṭvāṅgī citraveṣaścirantanaḥ tamoharo mahāyogī goptā brahmā ca dhūrjaṭiḥ
ईश, पिनाकी (पिनाक धनुष धारण करने वाले), खट्वांगी (खट्वांग धारण करने वाले), चित्रवेष (विचित्र वेष वाले), चिरन्तन (सनातन), तमोहर (अंधकार को हरने वाले), महायोगी, गोप्ता (रक्षक), ब्रह्मा और धूर्जटि (भारी जटाओं वाले)।
श्लोक 8 (shiva.kotirudra.35.8)
कालकालः कृत्तिवासाः सुभगः प्रणवात्मकः । उन्नध्रः पुरुषो जुष्यो दुर्वासाः पुरशासनः ॥ 35.8 ॥
kālakālaḥ kṛttivāsāḥ subhagaḥ praṇavātmakaḥ unnadhraḥ puruṣo juṣyo durvāsāḥ puraśāsanaḥ
कालकाल (काल के भी काल), कृत्तिवासा (गजचर्म धारण करने वाले), सुभग (सौभाग्यशाली), प्रणवात्मक (ॐकार-स्वरूप), उन्नध्र (उन्नत, उभरे हुए ऐश्वर्य वाले), पुरुष, जुष्य (प्रीतिकर), दुर्वासा (कठोर वस्त्रधारी) और पुरशासन (त्रिपुर के दमनकर्ता)।
श्लोक 9 (shiva.kotirudra.35.9)
दिव्यायुधः स्कन्दगुरुः परमेष्ठी परात्परः । अनादिमध्यनिधनो गिरीशो गिरिजाधवः ॥ 35.9 ॥
divyāyudhaḥ skandaguruḥ parameṣṭhī parātparaḥ anādimadhyanidhano girīśo girijādhavaḥ
दिव्यायुध (दिव्य अस्त्रों वाले), स्कन्दगुरु (स्कन्द के पिता-गुरु), परमेष्ठी (परम पद में स्थित), परात्पर (परे से भी परे), अनादिमध्यनिधन (जिनका आदि-मध्य-अंत नहीं), गिरीश (पर्वतों के स्वामी) और गिरिजाधव (गिरिजा के पति)।
श्लोक 10 (shiva.kotirudra.35.10)
कुबेरबन्धुः श्रीकण्ठो लोकवर्णोत्तमो मृदुः । समाधिवेद्यः कोदण्डी नीलकण्ठः परश्वधी ॥ 35.10 ॥
kuberabandhuḥ śrīkaṇṭho lokavarṇottamo mṛduḥ samādhivedyaḥ kodaṇḍī nīlakaṇṭhaḥ paraśvadhī
कुबेरबन्धु (कुबेर के मित्र), श्रीकण्ठ (सुंदर कंठ वाले), लोकवर्णोत्तम (लोकों में वर्ण से श्रेष्ठ), मृदु (कोमल), समाधिवेद्य (समाधि से ही जाने जाने योग्य), कोदण्डी (धनुर्धारी), नीलकण्ठ और परश्वधी (फरसाधारी)।
श्लोक 11 (shiva.kotirudra.35.11)
विशालाक्षो मृगव्याधः सुरेशः सूर्यतापनः । धर्मधाम क्षमाक्षेत्रं भगवान् भगनेत्रभित् ॥ 35.11 ॥
viśālākṣo mṛgavyādhaḥ sureśaḥ sūryatāpanaḥ dharmadhāma kṣamākṣetraṁ bhagavān bhaganetrabhit
विशालाक्ष (विशाल नेत्रों वाले), मृगव्याध (मृगों के आखेटक), सुरेश (देवताओं के स्वामी), सूर्यतापन (सूर्य के द्वारा तपाने वाले), धर्मधाम (धर्म के आश्रय), क्षमाक्षेत्र (क्षमा की भूमि), भगवान् और भगनेत्रभित् (भग के नेत्र का नाश करने वाले)।
श्लोक 12 (shiva.kotirudra.35.12)
उग्रः पशुपतिस्तार्क्ष्यः प्रियभक्तः परन्तपः । दाता दयाकरो दक्षः कपर्दी कामशासनः ॥ 35.12 ॥
ugraḥ paśupatistārkṣyaḥ priyabhaktaḥ parantapaḥ dātā dayākaro dakṣaḥ kapardī kāmaśāsanaḥ
उग्र (भयंकर), पशुपति (जीवों के स्वामी), तार्क्ष्य (गरुड़-सम वेगवान), प्रियभक्त (भक्तों को प्रिय), परन्तप (शत्रुओं को संतप्त करने वाले), दाता, दयाकर (दयालु), दक्ष (कुशल), कपर्दी (जटाजूटधारी) और कामशासन (काम को दंड देने वाले)।
श्लोक 13 (shiva.kotirudra.35.13)
श्मशाननिलयः सूक्ष्मः श्मशानस्थो महेश्वरः । लोककर्ता मृगपतिर्महाकर्ता महौषधिः ॥ 35.13 ॥
śmaśānanilayaḥ sūkṣmaḥ śmaśānastho maheśvaraḥ lokakartā mṛgapatirmahākartā mahauṣadhiḥ
श्मशाननिलय (श्मशान में निवास करने वाले), सूक्ष्म (अत्यंत सूक्ष्म), श्मशानस्थ (श्मशान में स्थित), महेश्वर, लोककर्ता (जगत् के रचयिता), मृगपति (पशुओं के स्वामी), महाकर्ता (महान रचयिता) और महौषधि (महान औषधि-स्वरूप)।
श्लोक 14 (shiva.kotirudra.35.14)
उत्तरो गोपतिर्गोप्ता ज्ञानगम्यः पुरातनः । नीतिः सुनीतिः शुद्धात्मा सोमः सोमरतः सुखी ॥ 35.14 ॥
uttaro gopatirgoptā jñānagamyaḥ purātanaḥ nītiḥ sunītiḥ śuddhātmā somaḥ somarataḥ sukhī
उत्तर (सर्वोच्च), गोपति (गोओं/पृथ्वी के स्वामी), गोप्ता (रक्षक), ज्ञानगम्य, पुरातन (सनातन), नीति (नीति-स्वरूप), सुनीति (सुंदर आचरण वाले), शुद्धात्मा, सोम (उमा-सहित), सोमरत (उमा में रत) और सुखी (सदा प्रसन्न)।
श्लोक 15 (shiva.kotirudra.35.15)
सोमपोऽमृतपः सौम्यो महातेजा महाद्युतिः । तेजोमयोऽमृतमयोऽन्नमयश्च सुधापतिः ॥ 35.15 ॥
somapo'mṛtapaḥ saumyo mahātejā mahādyutiḥ tejomayo'mṛtamayo'nnamayaśca sudhāpatiḥ
सोमप (सोमरस पीने वाले), अमृतप (अमृतपान करने वाले), सौम्य (शांत-मधुर), महातेजा (महातेजस्वी), महाद्युति (महाकांतिमान), तेजोमय, अमृतमय, अन्नमय और सुधापति (अमृत के स्वामी)।
श्लोक 16 (shiva.kotirudra.35.16)
अजातशत्रुरालोकः सम्भाव्यो हव्यवाहनः । लोककरो वेदकरः सूत्रकारः सनातनः ॥ 35.16 ॥
ajātaśatrurālokaḥ sambhāvyo havyavāhanaḥ lokakaro vedakaraḥ sūtrakāraḥ sanātanaḥ
अजातशत्रु (जिनका कोई शत्रु नहीं जन्मा), आलोक (स्वयं प्रकाश-स्वरूप), सम्भाव्य (आदर के योग्य), हव्यवाहन (हवि को वहन करने वाले अग्नि-स्वरूप), लोककर (लोकों के निर्माता), वेदकर (वेदों के रचयिता), सूत्रकार (सृष्टि-सूत्र के रचयिता) और सनातन।
श्लोक 17 (shiva.kotirudra.35.17)
महर्षिकपिलाचार्यो विश्वदीप्तिस्त्रिलोचनः । पिनाकपाणिर्भूदेवः स्वस्तिदः स्वस्तिकृत्सुधीः ॥ 35.17 ॥
maharṣikapilācāryo viśvadīptistrilocanaḥ pinākapāṇirbhūdevaḥ svastidaḥ svastikṛtsudhīḥ
महर्षि कपिल के आचार्य, विश्वदीप्ति (जगत् के तेज-स्वरूप), त्रिलोचन, पिनाकपाणि (हाथ में पिनाक धनुष धारण करने वाले), भूदेव (पृथ्वी के देवता), स्वस्तिद (कल्याण देने वाले), स्वस्तिकृत् (कल्याण करने वाले) और सुधी (सुबुद्धि वाले)।
श्लोक 18 (shiva.kotirudra.35.18)
धातृधामा धामकरः सर्वगः सर्वगोचरः । ब्रह्मसृग्विश्वसृक्सर्गः कर्णिकारप्रियः कविः ॥ 35.18 ॥
dhātṛdhāmā dhāmakaraḥ sarvagaḥ sarvagocaraḥ brahmasṛgviśvasṛksargaḥ karṇikārapriyaḥ kaviḥ
धातृधामा (ब्रह्मा के आश्रय), धामकर (तेज के रचयिता), सर्वग (सर्वव्यापी), सर्वगोचर (सबकी दृष्टि में आने वाले), ब्रह्मसृक् (ब्रह्मा को उत्पन्न करने वाले), विश्वसृक्सर्ग (जगत् की सृष्टि करने वाले), कर्णिकारप्रिय (कर्णिकार पुष्प के प्रिय) और कवि (द्रष्टा-कवि)।
श्लोक 19 (shiva.kotirudra.35.19)
शाखो विशाखो गोशाखः शिवो भिषगनुत्तमः । गङ्गाप्लवोदको भव्यः पुष्कलः स्थपतिः स्थिरः ॥ 35.19 ॥
śākho viśākho gośākhaḥ śivo bhiṣaganuttamaḥ gaṅgāplavodako bhavyaḥ puṣkalaḥ sthapatiḥ sthiraḥ
शाख, विशाख, गोशाख (स्कन्द के विविध रूपों के पिता), शिव, भिषगनुत्तम (श्रेष्ठ वैद्य), गंगाप्लवोदक (गंगा की धारा को धारण करने वाले), भव्य (भव्यरूप), पुष्कल (परिपूर्ण), स्थपति (शिल्पकार) और स्थिर (अचल)।
श्लोक 20 (shiva.kotirudra.35.20)
विजितात्मा विधेयात्मा भूतवाहनसारथिः । सगणो गणकायश्च सुकीर्तिशिछन्नसंशयः ॥ 35.20 ॥
vijitātmā vidheyātmā bhūtavāhanasārathiḥ sagaṇo gaṇakāyaśca sukīrtiśichannasaṁśayaḥ
विजितात्मा (जिनकी आत्मा पूर्णतः वश में है), विधेयात्मा (आज्ञाकारी आत्मा वाले), भूतवाहनसारथि (भूतों के वाहन के सारथि), सगण (गणों सहित), गणकाय (गणों को ही देह मानने वाले), सुकीर्ति (सुयश वाले) और छिन्नसंशय (जिनके संशय कट चुके हैं)।
श्लोक 21 (shiva.kotirudra.35.21)
कामदेवः कामपालो भस्मोद्धूलितविग्रहः । भस्मप्रियो भस्मशायी कामी कान्तः कृतागमः ॥ 35.21 ॥
kāmadevaḥ kāmapālo bhasmoddhūlitavigrahaḥ bhasmapriyo bhasmaśāyī kāmī kāntaḥ kṛtāgamaḥ
कामदेव, कामपाल (काम के पालक), भस्मोद्धूलितविग्रह (भस्म से आच्छादित शरीर वाले), भस्मप्रिय (भस्म को प्रिय मानने वाले), भस्मशायी (भस्म पर शयन करने वाले), कामी, कान्त (मनोहर) और कृतागम (आगम-शास्त्रों के रचयिता)।
श्लोक 22 (shiva.kotirudra.35.22)
समावर्तोऽनिवृत्तात्मा धर्मपुञ्जः सदाशिवः । अकल्मषश्चतुर्बाहुर्दुरावासो दुरासदः ॥ 35.22 ॥
samāvarto'nivṛttātmā dharmapuñjaḥ sadāśivaḥ akalmaṣaścaturbāhurdurāvāso durāsadaḥ
समावर्त (सृष्टि-चक्र में लौटने वाले), अनिवृत्तात्मा (कभी निवृत्त न होने वाली आत्मा), धर्मपुंज (धर्म के समूह-स्वरूप), सदाशिव, अकल्मष (निष्पाप), चतुर्बाहु (चार भुजाओं वाले), दुरावास (दुर्गम निवास वाले) और दुरासद (जिन तक पहुँचना कठिन है)।
श्लोक 23 (shiva.kotirudra.35.23)
दुर्लभो दुर्गमो दुर्गः सर्वायुधविशारदः । अध्यात्मयोगनिलयः सुतन्तुस्तन्तुवर्धनः ॥ 35.23 ॥
durlabho durgamo durgaḥ sarvāyudhaviśāradaḥ adhyātmayoganilayaḥ sutantustantuvardhanaḥ
दुर्लभ (दुर्लभ रूप से प्राप्त होने वाले), दुर्गम (दुर्गम), दुर्ग (दुर्ग के समान अभेद्य), सर्वायुधविशारद (समस्त शस्त्रविद्या में निपुण), अध्यात्मयोगनिलय (अध्यात्म-योग के आश्रय), सुतन्तु (सुंदर संतति वाले) और तन्तुवर्धन (संतति को बढ़ाने वाले)।
श्लोक 24 (shiva.kotirudra.35.24)
शुभाङ्गो लोकसारङ्गो जगदीशो जनार्दनः । भस्मशुद्धिकरो मेरुरोजस्वी शुद्धविग्रहः ॥ 35.24 ॥
śubhāṅgo lokasāraṅgo jagadīśo janārdanaḥ bhasmaśuddhikaro merurojasvī śuddhavigrahaḥ
शुभांग (सुंदर अंगों वाले), लोकसारंग (लोक के सारभूत), जगदीश, जनार्दन (मनुष्यों को कष्ट से मुक्त करने वाले), भस्मशुद्धिकर (भस्म से शुद्ध करने वाले), मेरु (मेरु पर्वत के समान), ओजस्वी (बलशाली) और शुद्धविग्रह (शुद्ध देहधारी)।
श्लोक 25 (shiva.kotirudra.35.25)
असाध्यः साधुसाध्यश्च भृत्यमर्कटरूपधृक् । हिरण्यरेताः पौराणो रिपुजीवहरो बली ॥ 35.25 ॥
asādhyaḥ sādhusādhyaśca bhṛtyamarkaṭarūpadhṛk hiraṇyaretāḥ paurāṇo ripujīvaharo balī
असाध्य (जो साधनों से वश में नहीं आते), साधुसाध्य (जो साधुता से ही वश में आते हैं), भृत्यमर्कटरूपधृक् (सेवक के लिए वानर-रूप धारण करने वाले), हिरण्यरेता (स्वर्ण-तेज वाले), पौराण (पुराण-पुरुष), रिपुजीवहर (शत्रुओं के प्राण हरने वाले) और बली (बलशाली)।
श्लोक 26 (shiva.kotirudra.35.26)
महाह्रदो महागर्तः सिद्धवृन्दारवन्दितः । व्याघ्रचर्माम्बरो व्याली महाभूतो महानिधिः ॥ 35.26 ॥
mahāhrado mahāgartaḥ siddhavṛndāravanditaḥ vyāghracarmāmbaro vyālī mahābhūto mahānidhiḥ
महाह्रद (महान सरोवर-स्वरूप), महागर्त (महान गर्त-स्वरूप), सिद्धवृन्दारवन्दित (सिद्धों के समूह से वंदित), व्याघ्रचर्माम्बर (व्याघ्रचर्म धारण करने वाले), व्याली (सर्पों को धारण करने वाले), महाभूत (महाभूत-स्वरूप) और महानिधि (महान निधि-स्वरूप)।
श्लोक 27 (shiva.kotirudra.35.27)
अमृताशोऽमृतवपुः पाञ्चजन्यः प्रभञ्जनः । पञ्चविंशतितत्त्वस्थः पारिजातः परावरः ॥ 35.27 ॥
amṛtāśo'mṛtavapuḥ pāñcajanyaḥ prabhañjanaḥ pañcaviṁśatitattvasthaḥ pārijātaḥ parāvaraḥ
अमृताश (अमृत के भोक्ता), अमृतवपु (अमृतमय देह वाले), पांचजन्य (शंख-स्वरूप), प्रभंजन (वायु के समान वेगशाली), पंचविंशतितत्त्वस्थ (पच्चीस तत्त्वों में स्थित), पारिजात (पारिजात वृक्ष के समान) और परावर (श्रेष्ठ और अवर दोनों में व्याप्त)।
श्लोक 28 (shiva.kotirudra.35.28)
सुलभः सुव्रतः शूरो ब्रह्मवेदनिधिर्निधिः । वर्णाश्रमगुरुर्वर्णी शत्रुजिच्छत्रुतापनः ॥ 35.28 ॥
sulabhaḥ suvrataḥ śūro brahmavedanidhirnidhiḥ varṇāśramagururvarṇī śatrujicchatrutāpanaḥ
सुलभ (सहज ही प्राप्त होने वाले), सुव्रत (उत्तम व्रत वाले), शूर (वीर), ब्रह्मवेदनिधि (ब्रह्मज्ञान और वेद के भंडार), निधि (स्वयं निधि-स्वरूप), वर्णाश्रमगुरु (वर्णाश्रमों के गुरु), वर्णी (ब्रह्मचारी) और शत्रुजित् (शत्रुओं को जीतने वाले), शत्रुतापन (शत्रुओं को संतप्त करने वाले)।
श्लोक 29 (shiva.kotirudra.35.29)
आश्रमः क्षपणः क्षामो ज्ञानवानचलेश्वरः । प्रमाणभूतो दुर्ज्ञेयः सुपर्णो वायुवाहनः ॥ 35.29 ॥
āśramaḥ kṣapaṇaḥ kṣāmo jñānavānacaleśvaraḥ pramāṇabhūto durjñeyaḥ suparṇo vāyuvāhanaḥ
आश्रम (आश्रम-स्वरूप), क्षपण (पापों को नष्ट करने वाले), क्षाम (क्षीण होने वाले, संहारकारी), ज्ञानवान्, अचलेश्वर (पर्वतों के स्वामी), प्रमाणभूत (स्वयं प्रमाण-स्वरूप), दुर्ज्ञेय (कठिनता से जानने योग्य), सुपर्ण (गरुड़-स्वरूप) और वायुवाहन (वायु को वाहन बनाने वाले)।
श्लोक 30 (shiva.kotirudra.35.30)
धनुर्धरो धनुर्वेदो गुणराशिर्गुणाकरः । सत्यः सत्यपरोऽदीनो धर्माङ्गो धर्मसाधनः ॥ 35.30 ॥
dhanurdharo dhanurvedo guṇarāśirguṇākaraḥ satyaḥ satyaparo'dīno dharmāṅgo dharmasādhanaḥ
धनुर्धर (धनुर्धारी), धनुर्वेद (धनुर्विद्या-स्वरूप), गुणराशि (गुणों की राशि), गुणाकर (गुणों की खान), सत्य, सत्यपर (सत्य में तत्पर), अदीन (कभी दीन न होने वाले), धर्मांग (धर्म के अंगस्वरूप) और धर्मसाधन (धर्म का साधन)।
श्लोक 31 (shiva.kotirudra.35.31)
अनन्तदृष्टिरानन्दो दण्डो दमयिता दमः । अभिवाद्यो महामायो विश्वकर्मविशारदः ॥ 35.31 ॥
anantadṛṣṭirānando daṇḍo damayitā damaḥ abhivādyo mahāmāyo viśvakarmaviśāradaḥ
अनन्तदृष्टि (अनंत दृष्टि वाले), आनन्द, दण्ड (दंडदाता), दमयिता (इंद्रियों को वश में करने वाले), दम (संयम-स्वरूप), अभिवाद्य (नमन के योग्य), महामाय (महान मायावी) और विश्वकर्मविशारद (जगत् के सभी कर्मों में निपुण)।
श्लोक 32 (shiva.kotirudra.35.32)
वीतरागो विनीतात्मा तपस्वी भूतभावनः । उन्मत्तवेषः प्रच्छन्नो जितकामोऽजितप्रियः ॥ 35.32 ॥
vītarāgo vinītātmā tapasvī bhūtabhāvanaḥ unmattaveṣaḥ pracchanno jitakāmo'jitapriyaḥ
वीतराग (आसक्ति-रहित), विनीतात्मा (विनम्र आत्मा वाले), तपस्वी, भूतभावन (प्राणियों के पालनकर्ता), उन्मत्तवेष (उन्मत्त के समान वेष धारण करने वाले), प्रच्छन्न (गुप्त रहने वाले), जितकाम (काम को जीतने वाले) और अजितप्रिय (अजेय को भी प्रिय)।
श्लोक 33 (shiva.kotirudra.35.33)
कल्याणप्रकृतिः कल्पः सर्वलोकप्रजापतिः । तरस्वी तारको धीमान् प्रधानः प्रभुरव्ययः ॥ 35.33 ॥
kalyāṇaprakṛtiḥ kalpaḥ sarvalokaprajāpatiḥ tarasvī tārako dhīmān pradhānaḥ prabhuravyayaḥ
कल्याणप्रकृति (कल्याणकारी स्वभाव वाले), कल्प (कल्प-स्वरूप), सर्वलोकप्रजापति (सभी लोकों की प्रजा के स्वामी), तरस्वी (वेगवान), तारक (तारने वाले), धीमान् (बुद्धिमान), प्रधान (सर्वप्रधान) और अव्यय (अविनाशी) प्रभु।
श्लोक 34 (shiva.kotirudra.35.34)
लोकपालोऽन्तर्हितात्मा कल्पादिः कमलेक्षणः । वेदशास्त्रार्थतत्त्वज्ञोऽनियमो नियताश्रयः ॥ 35.34 ॥
lokapālo'ntarhitātmā kalpādiḥ kamalekṣaṇaḥ vedaśāstrārthatattvajño'niyamo niyatāśrayaḥ
लोकपाल (लोकों के रक्षक), अन्तर्हितात्मा (गुप्त आत्मा वाले), कल्पादि (कल्प के आदि-स्वरूप), कमलेक्षण (कमल के समान नेत्रों वाले), वेदशास्त्रार्थतत्त्वज्ञ (वेद-शास्त्रों के अर्थ-तत्त्व के ज्ञाता), अनियम (नियमों से परे) और नियताश्रय (नियमों के आश्रयस्वरूप)।
श्लोक 35 (shiva.kotirudra.35.35)
चन्द्रः सूर्यः शनिः केतुर्वराङ्गो विद्रुमच्छविः । भक्तिवश्यः परब्रह्म मृगबाणार्पणोऽनघः ॥ 35.35 ॥
candraḥ sūryaḥ śaniḥ keturvarāṅgo vidrumacchaviḥ bhaktivaśyaḥ parabrahma mṛgabāṇārpaṇo'naghaḥ
चन्द्र, सूर्य, शनि, केतु, वराङ्ग (सुंदर अंगों वाले), विद्रुमच्छवि (मूँगे के समान कांतिवाले), भक्तिवश्य (भक्ति से वश में होने वाले), परब्रह्म और मृगबाणार्पण (मृग-रूपी बाण चलाने वाले), अनघ (निष्पाप)।
श्लोक 36 (shiva.kotirudra.35.36)
अद्रिरद्र्यालयः कान्तः परमात्मा जगद्गुरुः । सर्वकर्मालयस्तुष्टो मङ्गल्यो मङ्गलावृतः ॥ 35.36 ॥
adriradryālayaḥ kāntaḥ paramātmā jagadguruḥ sarvakarmālayastuṣṭo maṅgalyo maṅgalāvṛtaḥ
अद्रि (पर्वत-स्वरूप), अद्र्यालय (पर्वत को निवास बनाने वाले), कान्त (सुंदर), परमात्मा, जगद्गुरु, सर्वकर्मालय (सभी कर्मों के आश्रय), तुष्ट (संतुष्ट), मंगल्य (मंगलकारी) और मंगलावृत (मंगल से आवृत)।
श्लोक 37 (shiva.kotirudra.35.37)
महातपा दीर्घतपाः स्थविष्ठः स्थविरो ध्रुवः । अहः संवत्सरो व्याप्तिः प्रमाणं परमं तपः ॥ 35.37 ॥
mahātapā dīrghatapāḥ sthaviṣṭhaḥ sthaviro dhruvaḥ ahaḥ saṁvatsaro vyāptiḥ pramāṇaṁ paramaṁ tapaḥ
महातपा (महान तपस्वी), दीर्घतपा (दीर्घकाल तक तप करने वाले), स्थविष्ठ (अत्यंत स्थूल), स्थविर (वृद्ध, प्राचीन), ध्रुव (अटल), अहः (दिन-स्वरूप), संवत्सर (वर्ष-स्वरूप), व्याप्ति (सर्वव्यापकता), प्रमाण (स्वयं प्रमाण) और परम तप।
श्लोक 38 (shiva.kotirudra.35.38)
संवत्सरकरो मन्त्रप्रत्ययः सर्वदर्शनः । अजः सर्वेश्वरः सिद्धो महारेता महाबलः ॥ 35.38 ॥
saṁvatsarakaro mantrapratyayaḥ sarvadarśanaḥ ajaḥ sarveśvaraḥ siddho mahāretā mahābalaḥ
संवत्सरकर (वर्ष के रचयिता), मन्त्रप्रत्यय (मंत्रों में विश्वास-स्वरूप), सर्वदर्शन (सर्वदर्शी), अज (अजन्मा), सर्वेश्वर, सिद्ध, महारेता (महान वीर्यवान), महाबल (महान बलशाली)।
श्लोक 39 (shiva.kotirudra.35.39)
योगी योग्यो महातेजाः सिद्धिः सर्वादिरग्रहः । वसुर्वसुमनाः सत्यः सर्वपापहरो हरः ॥ 35.39 ॥
yogī yogyo mahātejāḥ siddhiḥ sarvādiragrahaḥ vasurvasumanāḥ satyaḥ sarvapāpaharo haraḥ
योगी, योग्य (योग के योग्य), महातेजा (महान तेजस्वी), सिद्धि, सर्वादि (सबका आदि), अग्रह (ग्रहरहित/अजेय), वसु, वसुमना (उदार मन वाले), सत्य, सर्वपापहर (सभी पापों को हरने वाले) और हर।
श्लोक 40 (shiva.kotirudra.35.40)
सुकीर्तिशोभनः श्रीमान् वेदाङ्गो वेदविन्मुनिः । भ्राजिष्णुर्भोजनं भोक्ता लोकनाथो दुराधरः ॥ 35.40 ॥
sukīrtiśobhanaḥ śrīmān vedāṅgo vedavinmuniḥ bhrājiṣṇurbhojanaṁ bhoktā lokanātho durādharaḥ
सुकीर्तिशोभन (सुयश से सुशोभित), श्रीमान्, वेदांग (वेद के अंगस्वरूप), वेदविन्मुनि (वेदज्ञ मुनि), भ्राजिष्णु (देदीप्यमान), भोजन (भोग्य-स्वरूप), भोक्ता (भोगने वाले), लोकनाथ और दुराधर (जिन्हें वश में करना कठिन है)।
श्लोक 41 (shiva.kotirudra.35.41)
अमृतः शाश्वतः शान्तो बाणहस्तः प्रतापवान् । कमण्डलुधरो धन्वी अवाङ्मनसगोचरः ॥ 35.41 ॥
amṛtaḥ śāśvataḥ śānto bāṇahastaḥ pratāpavān kamaṇḍaludharo dhanvī avāṅmanasagocaraḥ
अमृत, शाश्वत, शान्त, बाणहस्त (हाथ में बाण धारण करने वाले), प्रतापवान्, कमण्डलुधर (कमंडल धारण करने वाले), धन्वी (धनुर्धारी) और अवाङ्मनसगोचर (वाणी और मन की पहुँच से परे)।
श्लोक 42 (shiva.kotirudra.35.42)
अतीन्द्रियो महामायः सर्वावासश्चतुष्पथः । कालयोगी महानादो महोत्साहो महाबलः ॥ 35.42 ॥
atīndriyo mahāmāyaḥ sarvāvāsaścatuṣpathaḥ kālayogī mahānādo mahotsāho mahābalaḥ
अतीन्द्रिय (इंद्रियों से परे), महामाय, सर्वावास (सबका निवासस्थान), चतुष्पथ (चौराहे-स्वरूप), कालयोगी, महानाद (महाध्वनि-स्वरूप), महोत्साह (महान उत्साह वाले) और महाबल।
श्लोक 43 (shiva.kotirudra.35.43)
महाबुद्धिर्महावीर्यो भूतचारी पुरन्दरः । निशाचरः प्रेतचारी महाशक्तिर्महाद्युतिः ॥ 35.43 ॥
mahābuddhirmahāvīryo bhūtacārī purandaraḥ niśācaraḥ pretacārī mahāśaktirmahādyutiḥ
महाबुद्धि (महान बुद्धि वाले), महावीर्य (महान वीर्यशाली), भूतचारी (भूतों के बीच विचरण करने वाले), पुरन्दर (नगरों को नष्ट करने वाले), निशाचरी (रात्रि में विचरण करने वाले), प्रेतचारी (प्रेतों के बीच विचरण करने वाले), महाशक्ति और महाद्युति।
श्लोक 44 (shiva.kotirudra.35.44)
अनिर्देश्यवपुः श्रीमान् सर्वाचार्यो मनोगतिः । बहुश्रुतोऽमहामायो नियतात्मा ध्रुवोऽध्रुवः ॥ 35.44 ॥
anirdeśyavapuḥ śrīmān sarvācāryo manogatiḥ bahuśruto'mahāmāyo niyatātmā dhruvo'dhruvaḥ
अनिर्देश्यवपु (अनिर्वचनीय देह वाले), श्रीमान्, सर्वाचार्य (सबके आचार्य), मनोगति (मन की गति-स्वरूप), बहुश्रुत (बहुज्ञानी), अमहामाय (सच्ची माया से रहित), नियतात्मा (नियमित आत्मा वाले), ध्रुव और अध्रुव (स्थिर भी, अस्थिर भी)।
श्लोक 45 (shiva.kotirudra.35.45)
ओजस्तेजोद्युतिधरो जनकः सर्वशासनः । नृत्यप्रियो नित्यनृत्यः प्रकाशात्मा प्रकाशकः ॥ 35.45 ॥
ojastejodyutidharo janakaḥ sarvaśāsanaḥ nṛtyapriyo nityanṛtyaḥ prakāśātmā prakāśakaḥ
ओजस्तेजोद्युतिधर (ओज, तेज और द्युति के धारक), जनक (उत्पन्न करने वाले), सर्वशासन (सबको शासित करने वाले), नृत्यप्रिय (नृत्य को प्रिय मानने वाले), नित्यनृत्य (सदा नृत्यरत), प्रकाशात्मा और प्रकाशक (प्रकाश देने वाले)।
श्लोक 46 (shiva.kotirudra.35.46)
स्पष्टाक्षरो बुधो मन्त्रः समानः सारसम्प्लवः । युगादिकृद्युगावर्तो गम्भीरो वृषवाहनः ॥ 35.46 ॥
spaṣṭākṣaro budho mantraḥ samānaḥ sārasamplavaḥ yugādikṛdyugāvarto gambhīro vṛṣavāhanaḥ
स्पष्टाक्षर (स्पष्ट उच्चारण वाले), बुध (ज्ञानी), मन्त्र (स्वयं मंत्र-स्वरूप), समान (सम-भाव वाले), सारसम्प्लव (सार में सबको समाहित करने वाले), युगादिकृत् (युगों का आरम्भ करने वाले), युगावर्त (युगों के परिवर्तक), गम्भीर और वृषवाहन।
श्लोक 47 (shiva.kotirudra.35.47)
इष्टोऽविशिष्टः शिष्टेष्टः सुलभः सारशोधनः । तीर्थरूपस्तीर्थनामा तीर्थदृश्यस्तु तीर्थदः ॥ 35.47 ॥
iṣṭo'viśiṣṭaḥ śiṣṭeṣṭaḥ sulabhaḥ sāraśodhanaḥ tīrtharūpastīrthanāmā tīrthadṛśyastu tīrthadaḥ
इष्ट (सबके अभीष्ट), अविशिष्ट (सर्वसाधारण में समान रूप से व्याप्त), शिष्टेष्ट (सज्जनों के प्रिय), सुलभ, सारशोधन (सार को शुद्ध करने वाले), तीर्थरूप, तीर्थनामा, तीर्थदृश्य और तीर्थद (तीर्थ प्रदान करने वाले)।
श्लोक 48 (shiva.kotirudra.35.48)
अपान्निधिरधिष्ठानं दुर्जयो जयकालवित् । प्रतिष्ठितः प्रमाणज्ञो हिरण्यकवचो हरिः ॥ 35.48 ॥
apānnidhiradhiṣṭhānaṁ durjayo jayakālavit pratiṣṭhitaḥ pramāṇajño hiraṇyakavaco hariḥ
अपांनिधि (जलों की निधि), अधिष्ठान (सबका आधार), दुर्जय (अजेय), जयकालवित् (विजय के काल को जानने वाले), प्रतिष्ठित (सुस्थापित), प्रमाणज्ञ (प्रमाणों के ज्ञाता), हिरण्यकवच (स्वर्ण-कवचधारी) और हरि।
श्लोक 49 (shiva.kotirudra.35.49)
विमोचनः सुरगणो विद्येशो बिन्दुसंश्रयः । बालरूपोऽबलोन्मत्तोऽविकर्ता गहनो गुहः ॥ 35.49 ॥
vimocanaḥ suragaṇo vidyeśo bindusaṁśrayaḥ bālarūpo'balonmatto'vikartā gahano guhaḥ
विमोचन (मुक्ति देने वाले), सुरगण (देवगणों-स्वरूप), विद्येश (विद्या के स्वामी), बिन्दुसंश्रय (बिन्दु के आश्रय), बालरूप (बालक-रूपधारी), अबल (शक्तिरहित भी), उन्मत्त, अविकर्ता (विकाररहित), गहन (गूढ़) और गुह (गुप्त)।
श्लोक 50 (shiva.kotirudra.35.50)
करणं कारणं कर्ता सर्वबन्धविमोचनः । व्यवसायो व्यवस्थानः स्थानदो जगदादिजः ॥ 35.50 ॥
karaṇaṁ kāraṇaṁ kartā sarvabandhavimocanaḥ vyavasāyo vyavasthānaḥ sthānado jagadādijaḥ
करण (साधन-स्वरूप), कारण (कारण-स्वरूप), कर्ता (करने वाले), सर्वबन्धविमोचन (सभी बंधनों से मुक्त करने वाले), व्यवसाय (उद्यम-स्वरूप), व्यवस्थान (व्यवस्था देने वाले), स्थानद (स्थान देने वाले) और जगदादिज (जगत् के आदि से उत्पन्न)।
श्लोक 51 (shiva.kotirudra.35.51)
गुरुदो ललितोऽभेदो भावात्मात्मनि संस्थितः । वीरेश्वरो वीरभद्रो वीरासनविधिर्विराट् ॥ 35.51 ॥
gurudo lalito'bhedo bhāvātmātmani saṁsthitaḥ vīreśvaro vīrabhadro vīrāsanavidhirvirāṭ
गुरुद (गुरु प्रदान करने वाले), ललित (सुंदर), अभेद (अभिन्न), भावात्मा (भाव-स्वरूप), आत्मनि संस्थित (अपने आप में स्थित), वीरेश्वर (वीरों के स्वामी), वीरभद्र, वीरासनविधि (वीरासन में स्थित) और विराट् (विशाल स्वरूप)।
श्लोक 52 (shiva.kotirudra.35.52)
वीरचूडामणिर्वेत्ता चिदानन्दो नदीधरः । आज्ञाधारस्त्रिशूली च शिपिविष्टः शिवालयः ॥ 35.52 ॥
vīracūḍāmaṇirvettā cidānando nadīdharaḥ ājñādhārastriśūlī ca śipiviṣṭaḥ śivālayaḥ
वीरचूडामणि (वीरों के शिरोमणि), वेत्ता (जानने वाले), चिदानन्द (चेतना और आनंद-स्वरूप), नदीधर (नदियों को धारण करने वाले), आज्ञाधार (आज्ञा के आधार), त्रिशूली, शिपिविष्ट (किरणों में प्रविष्ट) और शिवालय (शिव का निवास)।
श्लोक 53 (shiva.kotirudra.35.53)
बालखिल्यो महाचापस्तिग्मांशुर्बधिरः खगः । अभिरामः सुशरणः सुब्रह्मण्यः सुधापतिः ॥ 35.53 ॥
bālakhilyo mahācāpastigmāṁśurbadhiraḥ khagaḥ abhirāmaḥ suśaraṇaḥ subrahmaṇyaḥ sudhāpatiḥ
बालखिल्य (बालखिल्य ऋषिगणों के रूप में), महाचाप (महान धनुष धारण करने वाले), तिग्मांशु (तीव्र किरणों वाले), बधिर (श्रवणातीत), खग (आकाशचारी), अभिराम (मनोहर), सुशरण (उत्तम शरण देने वाले), सुब्रह्मण्य और सुधापति।
श्लोक 54 (shiva.kotirudra.35.54)
मघवान्कौशिको गोमान्विरामः सर्वसाधनः । ललाटाक्षो विश्वदेहः सारः संसारचक्रभृत् ॥ 35.54 ॥
maghavānkauśiko gomānvirāmaḥ sarvasādhanaḥ lalāṭākṣo viśvadehaḥ sāraḥ saṁsāracakrabhṛt
मघवान् (इंद्र-स्वरूप), कौशिक (विश्वामित्र-स्वरूप), गोमान् (गौओं वाले), विराम (विश्राम-स्वरूप), सर्वसाधन (सबके सिद्धि-साधन), ललाटाक्ष (ललाट में नेत्र वाले), विश्वदेह (विश्व ही जिनकी देह है), सार और संसारचक्रभृत् (संसार-चक्र को धारण करने वाले)।
श्लोक 55 (shiva.kotirudra.35.55)
अमोघदण्डो मध्यस्थो हिरण्यो ब्रह्मवर्चसी । परमार्थः परो मायी शम्बरो व्याघ्रलोचनः ॥ 35.55 ॥
amoghadaṇḍo madhyastho hiraṇyo brahmavarcasī paramārthaḥ paro māyī śambaro vyāghralocanaḥ
अमोघदण्ड (जिनका दंड कभी व्यर्थ नहीं जाता), मध्यस्थ (सम-भाव में स्थित), हिरण्य (स्वर्ण-स्वरूप), ब्रह्मवर्चसी (ब्राह्मतेज से युक्त), परमार्थ, पर (श्रेष्ठ), मायी (माया के स्वामी), शम्बर (मेघ-स्वरूप) और व्याघ्रलोचन (व्याघ्र-नेत्र वाले)।
श्लोक 56 (shiva.kotirudra.35.56)
रुचिर्विरञ्चिः स्वर्बन्धुर्वाचस्पतिरहर्पतिः । रविर्विरोचनः स्कन्दः शास्ता वैवस्वतो यमः ॥ 35.56 ॥
rucirvirañciḥ svarbandhurvācaspatiraharpatiḥ ravirvirocanaḥ skandaḥ śāstā vaivasvato yamaḥ
रुचि (कांति-स्वरूप), विरंचि (ब्रह्मा-स्वरूप), स्वर्बन्धु (स्वर्ग के बन्धु), वाचस्पति (वाणी के स्वामी), अहर्पति (दिन के स्वामी सूर्य-स्वरूप), रवि, विरोचन, स्कन्द, शास्ता, वैवस्वत और यम।
श्लोक 57 (shiva.kotirudra.35.57)
युक्तिरुन्नतकीर्तिश्च सानुरागः परञ्जयः । कैलासाधिपतिः कान्तः सविता रविलोचनः ॥ 35.57 ॥
yuktirunnatakīrtiśca sānurāgaḥ parañjayaḥ kailāsādhipatiḥ kāntaḥ savitā ravilocanaḥ
युक्ति (उपाय-स्वरूप), उन्नतकीर्ति (उन्नत यश वाले), सानुराग (अनुराग सहित), परञ्जय (महान विजयी), कैलासाधिपति (कैलास के स्वामी), कान्त, सविता (सूर्यदेव-स्वरूप) और रविलोचन (सूर्य ही जिनका नेत्र है)।
श्लोक 58 (shiva.kotirudra.35.58)
विद्वत्तमो वीतभयो विश्वभर्त्तानिवारितः । नित्यो नियतकल्याणः पुण्यश्रवणकीर्तनः ॥ 35.58 ॥
vidvattamo vītabhayo viśvabharttānivāritaḥ nityo niyatakalyāṇaḥ puṇyaśravaṇakīrtanaḥ
विद्वत्तम (परम विद्वान), वीतभय (भयरहित), विश्वभर्ता (विश्व के पालक), अनिवारित (जिन्हें कोई रोक नहीं सकता), नित्य, नियतकल्याण (सदा कल्याणकारी) और पुण्यश्रवणकीर्तन (जिनका श्रवण-कीर्तन ही पुण्यदायक है)।
श्लोक 59 (shiva.kotirudra.35.59)
दूरश्रवा विश्वसहो ध्येयो दुःस्वप्ननाशनः । उत्तारणो दुष्कृतिहा विज्ञेयो दुःसहोऽभवः ॥ 35.59 ॥
dūraśravā viśvasaho dhyeyo duḥsvapnanāśanaḥ uttāraṇo duṣkṛtihā vijñeyo duḥsaho'bhavaḥ
दूरश्रवा (दूर तक सुनने वाले), विश्वसह (सब कुछ सहने वाले), ध्येय (ध्यान करने योग्य), दुःस्वप्ननाशन (बुरे स्वप्नों का नाश करने वाले), उत्तारण (पार उतारने वाले), दुष्कृतिहा (दुष्कर्मों का नाश करने वाले), विज्ञेय (जानने योग्य), दुःसह (असह्य) और अभव (जन्मरहित)।
श्लोक 60 (shiva.kotirudra.35.60)
अनादिर्भूर्भुवो लक्ष्मीः किरीटी त्रिदशाधिपः । विश्वगोप्ता विश्वकर्ता सुवीरो रुचिराङ्गदः ॥ 35.60 ॥
anādirbhūrbhuvo lakṣmīḥ kirīṭī tridaśādhipaḥ viśvagoptā viśvakartā suvīro rucirāṅgadaḥ
अनादि (आदिरहित), भूः-भुवः-लक्ष्मी (पृथ्वी, अंतरिक्ष और श्री-स्वरूप), किरीटी (मुकुटधारी), त्रिदशाधिप (देवताओं के स्वामी), विश्वगोप्ता (विश्व के रक्षक), विश्वकर्ता, सुवीर (उत्तम वीर) और रुचिराङ्गद (सुंदर बाजूबंद धारण करने वाले)।
श्लोक 61 (shiva.kotirudra.35.61)
जननो जनजन्मादिः प्रीतिमान्नीतिमान्धवः । वसिष्ठः कश्यपो भानुर्भीमो भीमपराक्रमः ॥ 35.61 ॥
janano janajanmādiḥ prītimānnītimāndhavaḥ vasiṣṭhaḥ kaśyapo bhānurbhīmo bhīmaparākramaḥ
जनन (जन्मदाता), जनजन्मादि (प्राणियों के जन्म का आदि-कारण), प्रीतिमान् (प्रेमपूर्ण), नीतिमान् (नीतिवान्), धव (स्वामी), वसिष्ठ, कश्यप, भानु (सूर्य-स्वरूप), भीम और भीमपराक्रम (भयंकर पराक्रम वाले)।
श्लोक 62 (shiva.kotirudra.35.62)
प्रणवः सत्पथाचारो महाकोशो महाधनः । जन्माधिपो महादेवः सकलागमपारगः ॥ 35.62 ॥
praṇavaḥ satpathācāro mahākośo mahādhanaḥ janmādhipo mahādevaḥ sakalāgamapāragaḥ
प्रणव (ॐकार-स्वरूप), सत्पथाचार (सन्मार्ग पर चलने वाले), महाकोश (महान भंडार), महाधन (महान धनवान), जन्माधिप (जन्म के स्वामी), महादेव और सकलागमपारग (समस्त आगम-शास्त्रों के पारगामी)।
श्लोक 63 (shiva.kotirudra.35.63)
तत्त्वं तत्त्वविदेकात्मा विभुर्विश्वविभूषणः । ऋषिर्ब्राह्मण ऐश्वर्यजन्ममृत्युजरातिगः ॥ 35.63 ॥
tattvaṁ tattvavidekātmā vibhurviśvavibhūṣaṇaḥ ṛṣirbrāhmaṇa aiśvaryajanmamṛtyujarātigaḥ
तत्त्व (परमतत्त्व), तत्त्ववित् (तत्त्वों के ज्ञाता), एकात्मा (एक ही आत्मा), विभु (सर्वव्यापी), विश्वविभूषण (जगत् के आभूषण), ऋषि, ब्राह्मण, ऐश्वर्य और जन्म-मृत्यु-जरा से रहित।
श्लोक 64 (shiva.kotirudra.35.64)
पञ्चयज्ञसमुत्पत्तिर्विश्वेशो विमलोदयः । आत्मयोनिरनाद्यन्तो वत्सलो भक्तलोकधृक् ॥ 35.64 ॥
pañcayajñasamutpattirviśveśo vimalodayaḥ ātmayoniranādyanto vatsalo bhaktalokadhṛk
पंचयज्ञसमुत्पत्ति (पाँच यज्ञों की उत्पत्ति के कारण), विश्वेश, विमलोदय (निर्मल उदय वाले), आत्मयोनि (स्वयं से उत्पन्न), अनाद्यन्त (आदि-अंतरहित), वत्सल (स्नेहमय) और भक्तलोकधृक् (भक्तजनों को धारण करने वाले)।
श्लोक 65 (shiva.kotirudra.35.65)
गायत्रीवल्लभः प्रांशुर्विश्वावासः प्रभाकरः । शिशुर्गिरिरतः सम्राट् सुषेणः सुरशत्रुहा ॥ 35.65 ॥
gāyatrīvallabhaḥ prāṁśurviśvāvāsaḥ prabhākaraḥ śiśurgirirataḥ samrāṭ suṣeṇaḥ suraśatruhā
गायत्रीवल्लभ (गायत्री के प्रिय), प्रांशु (उन्नत), विश्वावास (विश्व में निवास करने वाले), प्रभाकर (प्रकाश देने वाले), शिशु (बालक-स्वरूप), गिरिरत (पर्वत में रमने वाले), सम्राट्, सुषेण (सुंदर सेना वाले) और सुरशत्रुहा (देवताओं के शत्रुओं का नाश करने वाले)।
श्लोक 66 (shiva.kotirudra.35.66)
अमोघोऽरिष्टनेमिश्च कुमुदो विगतज्वरः । स्वयञ्ज्योतिस्तनुज्योतिरात्मज्योतिरचञ्चलः ॥ 35.66 ॥
amogho'riṣṭanemiśca kumudo vigatajvaraḥ svayañjyotistanujyotirātmajyotiracañcalaḥ
अमोघ (अचूक), अरिष्टनेमि (जिनकी परिधि अशुभ को दूर करती है), कुमुद (कुमुद-पुष्प के समान), विगतज्वर (संताप-रहित), स्वयंज्योति (स्वयं-प्रकाश), तनुज्योति (देह में प्रकाशमान), आत्मज्योति (आत्मा में प्रकाशमान) और अचंचल (अडिग)।
श्लोक 67 (shiva.kotirudra.35.67)
पिङ्गलः कपिलश्मश्रुर्भालनेत्रस्त्रयीतनुः । ज्ञानस्कन्दो महानीतिर्विश्वोत्पत्तिरुपप्लवः ॥ 35.67 ॥
piṅgalaḥ kapilaśmaśrurbhālanetrastrayītanuḥ jñānaskando mahānītirviśvotpattirupaplavaḥ
पिंगल (पीत-वर्ण), कपिलश्मश्रु (कपिल रंग की दाढ़ी वाले), भालनेत्र (ललाट-नेत्र वाले), त्रयीतनु (तीनों वेदों की देह वाले), ज्ञानस्कन्द (ज्ञान के भंडार), महानीति (महान नीति-स्वरूप), विश्वोत्पत्ति (विश्व की उत्पत्ति के कारण) और उपप्लव (उथल-पुथल के कारण भी)।
श्लोक 68 (shiva.kotirudra.35.68)
भगो विवस्वानादित्यो योगपारो दिवस्पतिः । कल्याणगुणनामा च पापहा पुण्यदर्शनः ॥ 35.68 ॥
bhago vivasvānādityo yogapāro divaspatiḥ kalyāṇaguṇanāmā ca pāpahā puṇyadarśanaḥ
भग (ऐश्वर्यशाली), विवस्वान् (सूर्य-स्वरूप), आदित्य, योगपार (योग के पारगामी), दिवस्पति (आकाश के स्वामी), कल्याणगुणनामा (कल्याणकारी गुणों के नामवाले), पापहा (पापनाशक) और पुण्यदर्शन (जिनका दर्शन पुण्यदायक है)।
श्लोक 69 (shiva.kotirudra.35.69)
उदारकीर्तिरुद्योगी सद्योगी सदसन्मयः । नक्षत्रमाली नाकेशः स्वाधिष्ठानपदाश्रयः ॥ 35.69 ॥
udārakīrtirudyogī sadyogī sadasanmayaḥ nakṣatramālī nākeśaḥ svādhiṣṭhānapadāśrayaḥ
उदारकीर्ति (उदार यश वाले), उद्योगी (सतत उद्यमी), सद्योगी (सच्चे योगी), सदसन्मय (सत् और असत् दोनों में व्याप्त), नक्षत्रमाली (नक्षत्रों की माला धारण करने वाले), नाकेश (स्वर्ग के स्वामी) और स्वाधिष्ठानपदाश्रय (स्वाधिष्ठान चक्र के आश्रय)।
श्लोक 70 (shiva.kotirudra.35.70)
पवित्रः पापहारी च मणिपूरो नभोगतिः । हृत्पुण्डरीकमासीनः शक्रः शान्तो वृषाकपिः ॥ 35.70 ॥
pavitraḥ pāpahārī ca maṇipūro nabhogatiḥ hṛtpuṇḍarīkamāsīnaḥ śakraḥ śānto vṛṣākapiḥ
पवित्र, पापहारी, मणिपूर (मणिपूर चक्र-स्वरूप), नभोगति (आकाश में गति वाले), हृत्पुण्डरीकमासीन (हृदय-कमल में विराजमान), शक्र (इंद्र-स्वरूप), शान्त और वृषाकपि (वृषभ-रूपधारी)।
श्लोक 71 (shiva.kotirudra.35.71)
उष्णो गृहपतिः कृष्णः समर्थोऽनर्थनाशनः । अधर्मशत्रुरज्ञेयः पुरुहूतः पुरुश्रुतः ॥ 35.71 ॥
uṣṇo gṛhapatiḥ kṛṣṇaḥ samartho'narthanāśanaḥ adharmaśatrurajñeyaḥ puruhūtaḥ puruśrutaḥ
उष्ण (तेजयुक्त), गृहपति (गृहस्थों के स्वामी), कृष्ण, समर्थ (सामर्थ्यवान), अनर्थनाशन (अनर्थों का नाश करने वाले), अधर्मशत्रु (अधर्म के शत्रु), अज्ञेय (अज्ञात रहने वाले), पुरुहूत (जिन्हें बार-बार पुकारा जाता है) और पुरुश्रुत (जिनकी बहुत ख्याति है)।
श्लोक 72 (shiva.kotirudra.35.72)
ब्रह्मगर्भो बृहद्गर्भो धर्मधेनुर्धनागमः । जगद्धितैषी सुगतः कुमारः कुशलागमः ॥ 35.72 ॥
brahmagarbho bṛhadgarbho dharmadhenurdhanāgamaḥ jagaddhitaiṣī sugataḥ kumāraḥ kuśalāgamaḥ
ब्रह्मगर्भ (ब्रह्मा को गर्भ में धारण करने वाले), बृहद्गर्भ (महान गर्भ वाले), धर्मधेनु (धर्म-रूपी गाय), धनागम (धन के आगमन-स्रोत), जगद्धितैषी (जगत् का हित चाहने वाले), सुगत (शुभगामी), कुमार और कुशलागम (कुशलता के स्रोत)।
श्लोक 73 (shiva.kotirudra.35.73)
हिरण्यवर्णो ज्योतिष्मान्नानाभूतरतो ध्वनिः । अरागो नयनाध्यक्षो विश्वामित्रो धनेश्वरः ॥ 35.73 ॥
hiraṇyavarṇo jyotiṣmānnānābhūtarato dhvaniḥ arāgo nayanādhyakṣo viśvāmitro dhaneśvaraḥ
हिरण्यवर्ण (स्वर्ण-वर्ण), ज्योतिष्मान् (प्रकाशमान), नानाभूतरत (विविध भूतों में रमण करने वाले), ध्वनि (नाद-स्वरूप), अराग (आसक्तिरहित), नयनाध्यक्ष (नेत्रों के अधिष्ठाता), विश्वामित्र और धनेश्वर (धन के स्वामी)।
श्लोक 74 (shiva.kotirudra.35.74)
ब्रह्मज्योतिर्वसुधामा महाज्योतिरनुत्तमः । मातामहो मातरिश्वा नभस्वान्नागहारधृक् ॥ 35.74 ॥
brahmajyotirvasudhāmā mahājyotiranuttamaḥ mātāmaho mātariśvā nabhasvānnāgahāradhṛk
ब्रह्मज्योति (ब्रह्म का तेज), वसुधामा (पृथ्वी के आश्रय), महाज्योति, अनुत्तम (सर्वोत्तम), मातामह (नाना-स्वरूप), मातरिश्वा (वायु-स्वरूप), नभस्वान् (आकाश-स्वरूप) और नागहारधृक् (नागों की माला धारण करने वाले)।
श्लोक 75 (shiva.kotirudra.35.75)
पुलस्त्यः पुलहोऽगस्त्यो जातूकर्ण्यः पराशरः । निरावरणनिर्वारो वैरञ्च्यो विष्टरश्रवाः ॥ 35.75 ॥
pulastyaḥ pulaho'gastyo jātūkarṇyaḥ parāśaraḥ nirāvaraṇanirvāro vairañcyo viṣṭaraśravāḥ
पुलस्त्य, पुलह, अगस्त्य, जातूकर्ण्य, पराशर — इन ऋषियों के रूप वाले, निरावरण (आवरणरहित), निर्वार (रोक-टोक से मुक्त), वैरंच्य (ब्रह्मा-संबंधी) और विष्टरश्रवा (व्यापक कीर्ति वाले)।
श्लोक 76 (shiva.kotirudra.35.76)
आत्मभूरनिरुद्धोऽत्रिर्ज्ञानमूर्तिर्महायशाः । लोकवीराग्रणीर्वीरश्चण्डः सत्यपराक्रमः ॥ 35.76 ॥
ātmabhūraniruddho'trirjñānamūrtirmahāyaśāḥ lokavīrāgraṇīrvīraścaṇḍaḥ satyaparākramaḥ
आत्मभू (स्वयंभू), अनिरुद्ध, अत्रि, ज्ञानमूर्ति (ज्ञान-स्वरूप), महायशा (महान यश वाले), लोकवीराग्रणी (लोक के वीरों में अग्रगण्य), वीर, चण्ड (उग्र) और सत्यपराक्रम (सत्य-पराक्रमी)।
श्लोक 77 (shiva.kotirudra.35.77)
व्यालकल्पो महाकल्पः कल्पवृक्षः कलाधरः । अलङ्करिष्णुरचलो रोचिष्णुर्विक्रमोन्नतः ॥ 35.77 ॥
vyālakalpo mahākalpaḥ kalpavṛkṣaḥ kalādharaḥ alaṅkariṣṇuracalo rociṣṇurvikramonnataḥ
व्यालकल्प (सर्पों को आभूषण बनाने वाले), महाकल्प (महान कल्प-स्वरूप), कल्पवृक्ष, कलाधर (कलाओं के धारक चंद्रमा-स्वरूप), अलंकरिष्णु (अलंकृत करने वाले), अचल (अटल), रोचिष्णु (कांतिमान) और विक्रमोन्नत (उन्नत पराक्रम वाले)।
श्लोक 78 (shiva.kotirudra.35.78)
आयुःशब्दपतिर्वेगी प्लवनः शिखिसारथिः । असंसृष्टोऽतिथिः शक्रप्रमाथी पादपासनः ॥ 35.78 ॥
āyuḥśabdapatirvegī plavanaḥ śikhisārathiḥ asaṁsṛṣṭo'tithiḥ śakrapramāthī pādapāsanaḥ
आयुःशब्दपति (आयु और शब्द के स्वामी), वेगी (वेगवान), प्लवन (तैरने वाले), शिखिसारथि (अग्नि के सारथि, या मयूर के सवार), असंसृष्ट (असंग), अतिथि, शक्रप्रमाथी (इंद्र को भी मथने वाले) और पादपासन (वृक्षों में आसन जमाने वाले)।
श्लोक 79 (shiva.kotirudra.35.79)
वसुश्रवा हव्यवाहः प्रतप्तो विश्वभोजनः । जप्यो जरादिशमनो लोहितात्मा तनूनपात् ॥ 35.79 ॥
vasuśravā havyavāhaḥ pratapto viśvabhojanaḥ japyo jarādiśamano lohitātmā tanūnapāt
वसुश्रवा (वसुओं में विख्यात), हव्यवाह (अग्नि-स्वरूप), प्रतप्त (तपायमान), विश्वभोजन (विश्व का पोषण करने वाले), जप्य (जप के योग्य), जरादिशमन (वृद्धावस्था आदि को शांत करने वाले), लोहितात्मा (लाल वर्ण की आत्मा वाले) और तनूनपात् (अग्नि-स्वरूप)।
श्लोक 80 (shiva.kotirudra.35.80)
बृहदश्वो नभोयोनिः सुप्रतीकस्तमिस्रहा । निदाघस्तपनो मेघः स्वक्षः परपुरञ्जयः ॥ 35.80 ॥
bṛhadaśvo nabhoyoniḥ supratīkastamisrahā nidāghastapano meghaḥ svakṣaḥ parapurañjayaḥ
बृहदश्व (महान अश्व वाले), नभोयोनि (आकाश जिनका उद्गम है), सुप्रतीक (सुंदर मूर्ति वाले), तमिस्रहा (अंधकार का नाश करने वाले), निदाघ (ग्रीष्म-स्वरूप), तपन (तपाने वाले), मेघ और स्वक्ष (सुंदर नेत्रों वाले), परपुरंजय (शत्रुओं के नगरों को जीतने वाले)।
श्लोक 81 (shiva.kotirudra.35.81)
सुखानिलः सुनिष्पन्नः सुरभिः शिशिरात्मकः । वसन्तो माधवो ग्रीष्मो नभस्यो बीजवाहनः ॥ 35.81 ॥
sukhānilaḥ suniṣpannaḥ surabhiḥ śiśirātmakaḥ vasanto mādhavo grīṣmo nabhasyo bījavāhanaḥ
सुखानिल (सुखद वायु-स्वरूप), सुनिष्पन्न (भलीभाँति सिद्ध), सुरभि (सुगंधित), शिशिरात्मक (शीत ऋतु-स्वरूप), वसन्त, माधव, ग्रीष्म, नभस्य (वर्षा ऋतु-स्वरूप) और बीजवाहन (बीज को धारण करने वाले)।
श्लोक 82 (shiva.kotirudra.35.82)
अङ्गिरा गुरुरात्रेयो विमलो विश्ववाहनः । पावनः सुमतिर्विद्वांस्त्रैविद्यो वरवाहनः ॥ 35.82 ॥
aṅgirā gururātreyo vimalo viśvavāhanaḥ pāvanaḥ sumatirvidvāṁstraividyo varavāhanaḥ
अंगिरा, गुरु, आत्रेय — इन ऋषिरूपों में, विमल (निर्मल), विश्ववाहन (विश्व को धारण करने वाले), पावन (पवित्र करने वाले), सुमति (उत्तम बुद्धि वाले), विद्वान्, त्रैविद्य (त्रिवेद के ज्ञाता) और वरवाहन (उत्तम वाहन वाले)।
श्लोक 83 (shiva.kotirudra.35.83)
मनोबुद्धिरहङ्कारः क्षेत्रज्ञः क्षेत्रपालकः । जमदग्निर्बलनिधिर्विगालो विश्वगालवः ॥ 35.83 ॥
manobuddhirahaṅkāraḥ kṣetrajñaḥ kṣetrapālakaḥ jamadagnirbalanidhirvigālo viśvagālavaḥ
मनोबुद्धि-अहंकार-स्वरूप, क्षेत्रज्ञ (क्षेत्र के ज्ञाता), क्षेत्रपालक (क्षेत्र के रक्षक), जमदग्नि, बलनिधि (बल के भंडार), विगाल और विश्वगालव — इन ऋषिरूपों वाले।
श्लोक 84 (shiva.kotirudra.35.84)
अघोरोऽनुत्तरो यज्ञः श्रेष्ठो निःश्रेयसप्रदः । शैलो गगनकुन्दाभो दानवारिररिन्दमः ॥ 35.84 ॥
aghoro'nuttaro yajñaḥ śreṣṭho niḥśreyasapradaḥ śailo gaganakundābho dānavārirarindamaḥ
अघोर, अनुत्तर (सर्वोच्च), यज्ञ (यज्ञ-स्वरूप), श्रेष्ठ, निःश्रेयसप्रद (परम कल्याण देने वाले), शैल (पर्वत-स्वरूप), गगनकुन्दाभ (आकाश में कुन्द पुष्प के समान उज्ज्वल), दानवारि (दानवों के शत्रु) और अरिन्दम (शत्रुओं का दमन करने वाले)।
श्लोक 85 (shiva.kotirudra.35.85)
रजनीजनकश्चारुर्निःशल्यो लोकशल्यधृक् । चतुर्वेदश्चतुर्भावश्चतुरश्चतुरप्रियः ॥ 35.85 ॥
rajanījanakaścārurniḥśalyo lokaśalyadhṛk caturvedaścaturbhāvaścaturaścaturapriyaḥ
रजनीजनक (रात्रि को उत्पन्न करने वाले), चारु (सुंदर), निःशल्य (शल्यरहित), लोकशल्यधृक् (लोक के शल्य को धारण करने वाले), चतुर्वेद, चतुर्भाव (चार भावों वाले), चतुर (चतुर) और चतुरप्रिय (चतुरों को प्रिय)।
श्लोक 86 (shiva.kotirudra.35.86)
आम्नायोऽथ समाम्नायस्तीर्थदेवशिवालयः । बहुरूपो महारूपः सर्वरूपश्चराचरः ॥ 35.86 ॥
āmnāyo'tha samāmnāyastīrthadevaśivālayaḥ bahurūpo mahārūpaḥ sarvarūpaścarācaraḥ
आम्नाय (वेद-परम्परा), समाम्नाय (सम्पूर्ण वेद-परम्परा), तीर्थदेवशिवालय (तीर्थों, देवताओं और शिवालयों के रूप वाले), बहुरूप, महारूप, सर्वरूप और चराचर (चर-अचर सब कुछ)।
श्लोक 87 (shiva.kotirudra.35.87)
न्यायनिर्मायको न्यायी न्यायगम्यो निरञ्जनः । सहस्रमूर्धा देवेन्द्रः सर्वशस्त्रप्रभञ्जनः ॥ 35.87 ॥
nyāyanirmāyako nyāyī nyāyagamyo nirañjanaḥ sahasramūrdhā devendraḥ sarvaśastraprabhañjanaḥ
न्यायनिर्मायक (न्याय की रचना करने वाले), न्यायी (न्यायपूर्ण), न्यायगम्य (न्याय से प्राप्त होने योग्य), निरंजन (निर्मल), सहस्रमूर्धा (सहस्र सिरों वाले), देवेन्द्र और सर्वशस्त्रप्रभंजन (सभी शस्त्रों को तोड़ने वाले)।
श्लोक 88 (shiva.kotirudra.35.88)
मुण्डो विरूपो विक्रान्तो दण्डी दान्तो गुणोत्तमः । पिङ्गलाक्षो जनाध्यक्षो नीलग्रीवो निरामयः ॥ 35.88 ॥
muṇḍo virūpo vikrānto daṇḍī dānto guṇottamaḥ piṅgalākṣo janādhyakṣo nīlagrīvo nirāmayaḥ
मुण्ड (मुंडित सिर वाले), विरूप, विक्रान्त (पराक्रमी), दण्डी, दान्त (संयमी), गुणोत्तम, पिंगलाक्ष (पीत नेत्रों वाले), जनाध्यक्ष (जनों के अधिष्ठाता), नीलग्रीव और निरामय (रोगरहित)।
श्लोक 89 (shiva.kotirudra.35.89)
सहस्रबाहुः सर्वेशः शरण्यः सर्वलोकधृक् । पद्मासनः परं ज्योतिः पारम्पर्यफलप्रदः ॥ 35.89 ॥
sahasrabāhuḥ sarveśaḥ śaraṇyaḥ sarvalokadhṛk padmāsanaḥ paraṁ jyotiḥ pāramparyaphalapradaḥ
सहस्रबाहु (सहस्र भुजाओं वाले), सर्वेश, शरण्य (शरण देने वाले), सर्वलोकधृक् (सभी लोकों को धारण करने वाले), पद्मासन, परं ज्योति (परम प्रकाश-स्वरूप) और पारम्पर्यफलप्रद (परम्परागत फल देने वाले)।
श्लोक 90 (shiva.kotirudra.35.90)
पद्मगर्भो महागर्भो विश्वगर्भो विचक्षणः । परावरज्ञो वरदो वरेण्यश्च महास्वनः ॥ 35.90 ॥
padmagarbho mahāgarbho viśvagarbho vicakṣaṇaḥ parāvarajño varado vareṇyaśca mahāsvanaḥ
पद्मगर्भ (कमल-गर्भ), महागर्भ, विश्वगर्भ, विचक्षण (सूक्ष्मदर्शी), परावरज्ञ (श्रेष्ठ और निकृष्ट दोनों के ज्ञाता), वरद (वरदाता), वरेण्य (वरण करने योग्य) और महास्वन (महान् गर्जना वाले)।
श्लोक 91 (shiva.kotirudra.35.91)
देवासुरगुरुर्देवो देवासुरनमस्कृतः । देवासुरमहामित्रो देवासुरमहेश्वरः ॥ 35.91 ॥
devāsuragururdevo devāsuranamaskṛtaḥ devāsuramahāmitro devāsuramaheśvaraḥ
देवासुरगुरु (देवों और असुरों के गुरु), देव, देवासुरनमस्कृत (देवों और असुरों दोनों से नमस्कृत), देवासुरमहामित्र (देवों-असुरों दोनों के महामित्र) और देवासुरमहेश्वर (देवों-असुरों दोनों के महेश्वर)।
श्लोक 92 (shiva.kotirudra.35.92)
देवासुरेश्वरो दिव्यो देवासुरमहाश्रयः । देवदेवमयोऽचिन्त्यो देवदेवात्मसम्भवः ॥ 35.92 ॥
devāsureśvaro divyo devāsuramahāśrayaḥ devadevamayo'cintyo devadevātmasambhavaḥ
देवासुरेश्वर (देवों-असुरों के ईश्वर), दिव्य, देवासुरमहाश्रय (देवों-असुरों के महान आश्रय), देवदेवमय (देवाधिदेव-स्वरूप), अचिन्त्य (चिंतन से परे) और देवदेवात्मसम्भव (देवाधिदेव से ही जिनकी उत्पत्ति है)।
श्लोक 93 (shiva.kotirudra.35.93)
सद्योनिरसुरव्याघ्रो देवसिंहो दिवाकरः । विबुधाग्रचरश्रेष्ठः सर्वदेवोत्तमोत्तमः ॥ 35.93 ॥
sadyonirasuravyāghro devasiṁho divākaraḥ vibudhāgracaraśreṣṭhaḥ sarvadevottamottamaḥ
सद्योनि (सत्-योनि से उत्पन्न), असुरव्याघ्र (असुरों के लिए व्याघ्र-समान), देवसिंह (देवताओं में सिंह-समान), दिवाकर (सूर्य-स्वरूप), विबुधाग्रचरश्रेष्ठ (विद्वानों में अग्रगण्य श्रेष्ठ) और सर्वदेवोत्तमोत्तम (सभी देवों में सर्वोच्च)।
श्लोक 94 (shiva.kotirudra.35.94)
शिवज्ञानरतः श्रीमान् शिखिश्रीपर्वतप्रियः । वज्रहस्तः सिद्धखङ्गो नरसिंहनिपातनः ॥ 35.94 ॥
śivajñānarataḥ śrīmān śikhiśrīparvatapriyaḥ vajrahastaḥ siddhakhaṅgo narasiṁhanipātanaḥ
शिवज्ञानरत (शिव-ज्ञान में रत), श्रीमान्, शिखिश्रीपर्वतप्रिय (शिखि और श्रीपर्वत को प्रिय मानने वाले), वज्रहस्त (हाथ में वज्र धारण करने वाले), सिद्धखड्ग (सिद्ध खड्गधारी) और नरसिंहनिपातन (नरसिंह को भी गिराने वाले)।
श्लोक 95 (shiva.kotirudra.35.95)
ब्रह्मचारी लोकचारी धर्मचारी धनाधिपः । नन्दी नन्दीश्वरोऽनन्तो नग्नव्रतधरः शुचिः ॥ 35.95 ॥
brahmacārī lokacārī dharmacārī dhanādhipaḥ nandī nandīśvaro'nanto nagnavratadharaḥ śuciḥ
ब्रह्मचारी, लोकचारी (लोक में विचरण करने वाले), धर्मचारी, धनाधिप (धन के स्वामी), नन्दी, नन्दीश्वर, अनन्त, नग्नव्रतधर (नग्न व्रत धारण करने वाले) और शुचि (पवित्र)।
श्लोक 96 (shiva.kotirudra.35.96)
लिङ्गाध्यक्षः सुराध्यक्षो योगाध्यक्षो युगावहः । स्वधर्मा स्वर्गतः स्वर्गस्वरः स्वरमयस्वनः ॥ 35.96 ॥
liṅgādhyakṣaḥ surādhyakṣo yogādhyakṣo yugāvahaḥ svadharmā svargataḥ svargasvaraḥ svaramayasvanaḥ
लिंगाध्यक्ष (लिंग के अधिष्ठाता), सुराध्यक्ष (देवताओं के अधिष्ठाता), योगाध्यक्ष (योग के अधिष्ठाता), युगावह (युगों को लाने वाले), स्वधर्मा, स्वर्गत (स्वर्ग में स्थित), स्वर्गस्वर और स्वरमयस्वन (स्वरमय ध्वनि वाले)।
श्लोक 97 (shiva.kotirudra.35.97)
बाणाध्यक्षो बीजकर्ता धर्मकृद्धर्मसम्भवः । दम्भो लोभोऽर्थविच्छम्भुः सर्वभूतमहेश्वरः ॥ 35.97 ॥
bāṇādhyakṣo bījakartā dharmakṛddharmasambhavaḥ dambho lobho'rthavicchambhuḥ sarvabhūtamaheśvaraḥ
बाणाध्यक्ष (बाणासुर के अधिष्ठाता), बीजकर्ता (बीज के रचयिता), धर्मकृत् (धर्म का सृजन करने वाले), धर्मसम्भव (धर्म से उत्पन्न), दम्भ, लोभ, अर्थवित् (अर्थ के ज्ञाता), शम्भु और सर्वभूतमहेश्वर।
श्लोक 98 (shiva.kotirudra.35.98)
श्मशाननिलयस्त्र्यक्षः सेतुरप्रतिमाकृतिः । लोकोत्तरस्फुटालोकस्त्र्यम्बको नागभूषणः ॥ 35.98 ॥
śmaśānanilayastryakṣaḥ seturapratimākṛtiḥ lokottarasphuṭālokastryambako nāgabhūṣaṇaḥ
श्मशाननिलय, त्र्यक्ष (तीन नेत्रों वाले), सेतु (पुल-स्वरूप), अप्रतिमाकृति (अनुपम आकृति वाले), लोकोत्तरस्फुटालोक (लोकोत्तर स्पष्ट प्रकाश वाले), त्र्यम्बक और नागभूषण (नागों को आभूषण बनाने वाले)।
श्लोक 99 (shiva.kotirudra.35.99)
अन्धकारिर्मखद्वेषी विष्णुकन्धरपातनः । हीनदोषोऽक्षयगुणो दक्षारिः पूषदन्तभित् ॥ 35.99 ॥
andhakārirmakhadveṣī viṣṇukandharapātanaḥ hīnadoṣo'kṣayaguṇo dakṣāriḥ pūṣadantabhit
अन्धकारि (अंधक का शत्रु), मखद्वेषी (यज्ञ के प्रति द्वेष रखने वाले, दक्ष-यज्ञ-विध्वंसक), विष्णुकन्धरपातन (विष्णु के कंधे को गिराने वाले), हीनदोष (दोषरहित), अक्षयगुण (अक्षय गुणों वाले), दक्षारि (दक्ष के शत्रु) और पूषदन्तभित् (पूषा के दाँत तोड़ने वाले)।
श्लोक 100 (shiva.kotirudra.35.100)
धूर्जटिः खण्डपरशुः सकलो निष्कलोऽनघः । अकालः सकलाधारः पाण्डुराभो मृडो नटः ॥ 35.100 ॥
dhūrjaṭiḥ khaṇḍaparaśuḥ sakalo niṣkalo'naghaḥ akālaḥ sakalādhāraḥ pāṇḍurābho mṛḍo naṭaḥ
धूर्जटि, खण्डपरशु (टूटा हुआ फरसा धारण करने वाले), सकल, निष्कल, अनघ, अकाल (कालरहित), सकलाधार (सबका आधार), पाण्डुराभ (श्वेत कांतिवाले), मृड और नट (नृत्यकार)।
श्लोक 101 (shiva.kotirudra.35.101)
पूर्णः पूरयिता पुण्यः सुकुमारः सुलोचनः । सामगेयप्रियोऽक्रूरः पुण्यकीर्तिरनामयः ॥ 35.101 ॥
pūrṇaḥ pūrayitā puṇyaḥ sukumāraḥ sulocanaḥ sāmageyapriyo'krūraḥ puṇyakīrtiranāmayaḥ
पूर्ण, पूरयिता (पूर्ण करने वाले), पुण्य, सुकुमार (कोमल), सुलोचन (सुंदर नेत्रों वाले), सामगेयप्रिय (सामगान को प्रिय मानने वाले), अक्रूर (क्रूरतारहित), पुण्यकीर्ति और अनामय (रोगरहित)।
श्लोक 102 (shiva.kotirudra.35.102)
मनोजवस्तीर्थकरो जटिलो जीवितेश्वरः । जीवितान्तकरो नित्यो वसुरेता वसुप्रदः ॥ 35.102 ॥
manojavastīrthakaro jaṭilo jīviteśvaraḥ jīvitāntakaro nityo vasuretā vasupradaḥ
मनोजव (मन के समान वेगवान), तीर्थकर (तीर्थ बनाने वाले), जटिल (जटाधारी), जीवितेश्वर (प्राणों के स्वामी), जीवितान्तकर (प्राणों का अंत करने वाले), नित्य, वसुरेता (वसुओं के वीर्य-स्वरूप) और वसुप्रद (वसु प्रदान करने वाले)।
श्लोक 103 (shiva.kotirudra.35.103)
सद्गतिः सत्कृतिः सिद्धिः सज्जातिः खलकण्टकः । कलाधरो महाकालभूतः सत्यपरायणः ॥ 35.103 ॥
sadgatiḥ satkṛtiḥ siddhiḥ sajjātiḥ khalakaṇṭakaḥ kalādharo mahākālabhūtaḥ satyaparāyaṇaḥ
सद्गति (सद्गति देने वाले), सत्कृति (सत्कर्म-स्वरूप), सिद्धि, सज्जाति (उत्तम जन्म देने वाले), खलकण्टक (दुष्टों के लिए कांटे-समान), कलाधर, महाकालभूत (महाकाल-स्वरूप) और सत्यपरायण (सत्य में तत्पर)।
श्लोक 104 (shiva.kotirudra.35.104)
लोककल्याणकर्ता च लोकोत्तरसुखालयः । चन्द्रसञ्जीवनः शास्ता लोकगूढो महाधिपः ॥ 35.104 ॥
lokakalyāṇakartā ca lokottarasukhālayaḥ candrasañjīvanaḥ śāstā lokagūḍho mahādhipaḥ
लोककल्याणकर्ता (लोक-कल्याण करने वाले), लोकोत्तरसुखालय (लोकोत्तर सुख के आश्रय), चन्द्रसंजीवन (चंद्रमा को जीवित करने वाले), शास्ता, लोकगूढ (लोक में छिपे हुए) और महाधिप (महान अधिपति)।
श्लोक 105 (shiva.kotirudra.35.105)
लोकबन्धुर्लोकनाथः कृतज्ञः कीर्तिभूषणः । अनपायोऽक्षरः कान्तः सर्वशस्त्रभृतां वरः ॥ 35.105 ॥
lokabandhurlokanāthaḥ kṛtajñaḥ kīrtibhūṣaṇaḥ anapāyo'kṣaraḥ kāntaḥ sarvaśastrabhṛtāṁ varaḥ
लोकबन्धु (लोक के बन्धु), लोकनाथ, कृतज्ञ (कृतज्ञता जानने वाले), कीर्तिभूषण (कीर्ति से अलंकृत), अनपाय (क्षयरहित), अक्षर (अविनाशी), कान्त और सर्वशस्त्रभृतां वर (सभी शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ)।
श्लोक 106 (shiva.kotirudra.35.106)
तेजोमयो द्युतिधरो लोकानामग्रणीरणुः । शुचिस्मितः प्रसन्नात्मा दुर्जेयो दुरतिक्रमः ॥ 35.106 ॥
tejomayo dyutidharo lokānāmagraṇīraṇuḥ śucismitaḥ prasannātmā durjeyo duratikramaḥ
तेजोमय, द्युतिधर (कांति धारण करने वाले), लोकानामग्रणी (लोकों में अग्रगण्य), अणु (सूक्ष्मतम), शुचिस्मित (पवित्र मुस्कान वाले), प्रसन्नात्मा, दुर्जेय (जीतने में कठिन) और दुरतिक्रम (जिन्हें लांघना कठिन है)।
श्लोक 107 (shiva.kotirudra.35.107)
ज्योतिर्मयो जगन्नाथो निराकारो जलेश्वरः । तुम्बवीणो महाकोपो विशोकः शोकनाशनः ॥ 35.107 ॥
jyotirmayo jagannātho nirākāro jaleśvaraḥ tumbavīṇo mahākopo viśokaḥ śokanāśanaḥ
ज्योतिर्मय, जगन्नाथ, निराकार, जलेश्वर (जल के स्वामी), तुम्बवीणी (तुम्बे की वीणा धारण करने वाले), महाकोप (महान क्रोधी), विशोक (शोकरहित) और शोकनाशन (शोक का नाश करने वाले)।
श्लोक 108 (shiva.kotirudra.35.108)
त्रिलोकपस्त्रिलोकेशः सर्वशुद्धिरधोक्षजः । अव्यक्तलक्षणो देवो व्यक्ताव्यक्तो विशाम्पतिः ॥ 35.108 ॥
trilokapastrilokeśaḥ sarvaśuddhiradhokṣajaḥ avyaktalakṣaṇo devo vyaktāvyakto viśāmpatiḥ
त्रिलोकप (तीनों लोकों के पालक), त्रिलोकेश, सर्वशुद्धि (सर्वथा शुद्ध), अधोक्षज (इंद्रियों से परे), अव्यक्तलक्षण (अव्यक्त लक्षण वाले), देव, व्यक्ताव्यक्त (व्यक्त और अव्यक्त दोनों) और विशांपति (प्रजा के स्वामी)।
श्लोक 109 (shiva.kotirudra.35.109)
वरशीलो वरगुणः सारो मानधनो मयः । ब्रह्मा विष्णुः प्रजापालो हंसो हंसगतिर्वयः ॥ 35.109 ॥
varaśīlo varaguṇaḥ sāro mānadhano mayaḥ brahmā viṣṇuḥ prajāpālo haṁso haṁsagatirvayaḥ
वरशील (उत्तम स्वभाव वाले), वरगुण (उत्तम गुणों वाले), सार, मानधन (सम्मान ही जिनका धन है), मय (मय-स्वरूप), ब्रह्मा, विष्णु, प्रजापाल (प्रजा के पालक), हंस, हंसगति और वयः (आयु-स्वरूप)।
श्लोक 110 (shiva.kotirudra.35.110)
वेधा विधाता धाता च स्रष्टा हर्ता चतुर्मुखः । कैलासशिखरावासी सर्वावासी सदागतिः ॥ 35.110 ॥
vedhā vidhātā dhātā ca sraṣṭā hartā caturmukhaḥ kailāsaśikharāvāsī sarvāvāsī sadāgatiḥ
वेधा, विधाता, धाता, स्रष्टा (सृष्टिकर्ता), हर्ता (संहारकर्ता), चतुर्मुख (चार मुखों वाले), कैलासशिखरावासी (कैलास शिखर पर निवास करने वाले), सर्वावासी (सर्वत्र निवास करने वाले) और सदागति (सदा गतिशील)।
श्लोक 111 (shiva.kotirudra.35.111)
हिरण्यगर्भो द्रुहिणो भूतपालोऽथ भूपतिः । सद्योगी योगविद्योगी वरदो ब्राह्मणप्रियः ॥ 35.111 ॥
hiraṇyagarbho druhiṇo bhūtapālo'tha bhūpatiḥ sadyogī yogavidyogī varado brāhmaṇapriyaḥ
हिरण्यगर्भ, द्रुहिण (ब्रह्मा-स्वरूप), भूतपाल (प्राणियों के पालक), भूपति (पृथ्वी के स्वामी), सद्योगी, योगविद् (योग के ज्ञाता), योगी, वरद और ब्राह्मणप्रिय (ब्राह्मणों को प्रिय)।
श्लोक 112 (shiva.kotirudra.35.112)
देवप्रियो देवनाथो देवज्ञो देवचिन्तकः । विषमाक्षो विशालाक्षो वृषदो वृषवर्धनः ॥ 35.112 ॥
devapriyo devanātho devajño devacintakaḥ viṣamākṣo viśālākṣo vṛṣado vṛṣavardhanaḥ
देवप्रिय, देवनाथ, देवज्ञ (देवों के ज्ञाता), देवचिन्तक (देवों के हितचिंतक), विषमाक्ष (विषम नेत्रों वाले), विशालाक्ष, वृषद (वृषभ के समान) और वृषवर्धन (धर्म को बढ़ाने वाले)।
श्लोक 113 (shiva.kotirudra.35.113)
निर्ममो निरहङ्कारो निर्मोहो निरुपद्रवः । दर्पहा दर्पदो दृप्तः सर्वर्तुपरिवर्तकः ॥ 35.113 ॥
nirmamo nirahaṅkāro nirmoho nirupadravaḥ darpahā darpado dṛptaḥ sarvartuparivartakaḥ
निर्मम (ममतारहित), निरहंकार (अहंकाररहित), निर्मोह (मोहरहित), निरुपद्रव (उपद्रवरहित), दर्पहा (अभिमान का नाश करने वाले), दर्पद (अभिमान देने वाले भी), दृप्त (गर्वित) और सर्वर्तुपरिवर्तक (सभी ऋतुओं को बदलने वाले)।
श्लोक 114 (shiva.kotirudra.35.114)
सहस्रजित् सहस्रार्चिः स्निग्धप्रकृतिदक्षिणः । भूतभव्यभवन्नाथः प्रभवो भूतिनाशनः ॥ 35.114 ॥
sahasrajit sahasrārciḥ snigdhaprakṛtidakṣiṇaḥ bhūtabhavyabhavannāthaḥ prabhavo bhūtināśanaḥ
सहस्रजित् (सहस्रों को जीतने वाले), सहस्रार्चि (सहस्र किरणों वाले), स्निग्धप्रकृति (स्निग्ध स्वभाव वाले), दक्षिण (उदार), भूतभव्यभवन्नाथ (भूत-भविष्य-वर्तमान के स्वामी), प्रभव (उत्पत्ति-स्थान) और भूतिनाशन (ऐश्वर्य का नाश करने वाले भी)।
श्लोक 115 (shiva.kotirudra.35.115)
अर्थोऽनर्थो महाकोशः परकार्यैकपण्डितः । निष्कण्टकः कृतानन्दो निर्व्याजो व्याजमर्दनः ॥ 35.115 ॥
artho'nartho mahākośaḥ parakāryaikapaṇḍitaḥ niṣkaṇṭakaḥ kṛtānando nirvyājo vyājamardanaḥ
अर्थ (प्रयोजन-स्वरूप), अनर्थ (अनर्थ-स्वरूप भी), महाकोश (महान भंडार), परकार्यैकपण्डित (परहित के कार्यों में निपुण), निष्कण्टक (कंटकरहित), कृतानन्द (आनंद उत्पन्न करने वाले), निर्व्याज (छलरहित) और व्याजमर्दन (छल का मर्दन करने वाले)।
श्लोक 116 (shiva.kotirudra.35.116)
सत्त्ववान्सात्त्विकः सत्यकीर्तिः स्नेहकृतागमः । अकम्पितो गुणग्राही नैकात्मा नैककर्मकृत् ॥ 35.116 ॥
sattvavānsāttvikaḥ satyakīrtiḥ snehakṛtāgamaḥ akampito guṇagrāhī naikātmā naikakarmakṛt
सत्त्ववान् (सत्त्वगुणी), सात्त्विक, सत्यकीर्ति (सच्ची कीर्तिवाले), स्नेहकृतागम (स्नेह से आगम-शास्त्रों की रचना करने वाले), अकम्पित (अडिग), गुणग्राही (गुणों को ग्रहण करने वाले), नैकात्मा (अनेक आत्माओं वाले) और नैककर्मकृत् (अनेक कर्म करने वाले)।
श्लोक 117 (shiva.kotirudra.35.117)
सुप्रीतः सुमुखः सूक्ष्मः सुकरो दक्षिणानिलः । नन्दिस्कन्धधरो धुर्यः प्रकटः प्रीतिवर्धनः ॥ 35.117 ॥
suprītaḥ sumukhaḥ sūkṣmaḥ sukaro dakṣiṇānilaḥ nandiskandhadharo dhuryaḥ prakaṭaḥ prītivardhanaḥ
सुप्रीत (भलीभाँति प्रसन्न), सुमुख (सुंदर मुख वाले), सूक्ष्म, सुकर (सरलता से किया जाने वाला), दक्षिणानिल (दक्षिण दिशा की वायु-स्वरूप), नन्दिस्कन्धधर (नंदी के कंधे पर बैठने वाले), धुर्य (धुरी उठाने वाले) और प्रीतिवर्धन (प्रेम बढ़ाने वाले)।
श्लोक 118 (shiva.kotirudra.35.118)
अपराजितः सर्वसत्त्वो गोविन्दः सत्त्ववाहनः । अधृतः स्वधृतः सिद्धः पूतमूर्तिर्यशोधनः ॥ 35.118 ॥
aparājitaḥ sarvasattvo govindaḥ sattvavāhanaḥ adhṛtaḥ svadhṛtaḥ siddhaḥ pūtamūrtiryaśodhanaḥ
अपराजित (अपराजेय), सर्वसत्त्व (सभी प्राणियों में व्याप्त), गोविन्द, सत्त्ववाहन (सत्त्व को वाहन बनाने वाले), अधृत (अस्थिर भी), स्वधृत (स्वयं में स्थित), सिद्ध, पूतमूर्ति (पवित्र देह वाले) और यशोधन (यश ही जिनका धन है)।
श्लोक 119 (shiva.kotirudra.35.119)
वाराहशृङ्गधृक्छृङ्गी बलवानेकनायकः । श्रुतिप्रकाशः श्रुतिमानेकबन्धुरनेककृत् ॥ 35.119 ॥
vārāhaśaṛṅgadhṛkchṛṅgī balavānekanāyakaḥ śrutiprakāśaḥ śrutimānekabandhuranekakṛt
वाराहशृंगधृक् (वराह के सींग धारण करने वाले), शृंगी (सींगवाले), बलवान्, एकनायक (अद्वितीय नायक), श्रुतिप्रकाश (वेदों में प्रकाशित), श्रुतिमान्, एकबन्धु (सबके एकमात्र बन्धु) और अनेककृत् (अनेक कार्य करने वाले)।
श्लोक 120 (shiva.kotirudra.35.120)
श्रीवत्सलशिवारम्भः शान्तभद्रः समो यशः । भूशयो भूषणो भूतिर्भूतकृद् भूतभावनः ॥ 35.120 ॥
śrīvatsalaśivārambhaḥ śāntabhadraḥ samo yaśaḥ bhūśayo bhūṣaṇo bhūtirbhūtakṛd bhūtabhāvanaḥ
श्रीवत्सलशिवारम्भ (श्री और शिव दोनों में स्नेहपूर्वक आरंभ करने वाले), शान्तभद्र (शांत और कल्याणकारी), सम (समभावी), यशः (यश-स्वरूप), भूशय (पृथ्वी पर शयन करने वाले), भूषण, भूति (ऐश्वर्य-स्वरूप), भूतकृत् (प्राणियों को उत्पन्न करने वाले) और भूतभावन (प्राणियों का पालन करने वाले)।
श्लोक 121 (shiva.kotirudra.35.121)
अकम्पो भक्तिकायस्तु कालहा नीललोहितः । सत्यव्रतमहात्यागी नित्यशान्तिपरायणः ॥ 35.121 ॥
akampo bhaktikāyastu kālahā nīlalohitaḥ satyavratamahātyāgī nityaśāntiparāyaṇaḥ
अकम्प (अडिग), भक्तिकाय (भक्ति ही जिनकी देह है), कालहा (काल का भी नाश करने वाले), नीललोहित, सत्यव्रतमहात्यागी (सत्य-व्रत के महान त्यागी), नित्यशान्तिपरायण (सदा शांति में लीन)।
श्लोक 122 (shiva.kotirudra.35.122)
परार्थवृत्तिर्वरदो विरक्तस्तु विशारदः । शुभदः शुभकर्ता च शुभनामा शुभः स्वयम् ॥ 35.122 ॥
parārthavṛttirvarado viraktastu viśāradaḥ śubhadaḥ śubhakartā ca śubhanāmā śubhaḥ svayam
परार्थवृत्ति (दूसरों के हित में लगे रहने वाले), वरद, विरक्त (वैराग्यवान), विशारद (निपुण), शुभद (शुभ देने वाले), शुभकर्ता (शुभ करने वाले), शुभनामा (शुभ नामवाले) और स्वयं शुभ।
श्लोक 123 (shiva.kotirudra.35.123)
अनर्थितोऽगुणः साक्षी ह्यकर्ता कनकप्रभः । स्वभावभद्रो मध्यस्थः शत्रुघ्नो विघ्ननाशनः ॥ 35.123 ॥
anarthito'guṇaḥ sākṣī hyakartā kanakaprabhaḥ svabhāvabhadro madhyasthaḥ śatrughno vighnanāśanaḥ
अनर्थित (जो किसी की कामना नहीं करते), अगुण (गुणातीत), साक्षी, अकर्ता (अकर्ता-स्वरूप), कनकप्रभ (स्वर्ण-कांतिवाले), स्वभावभद्र (स्वभाव से कल्याणकारी), मध्यस्थ, शत्रुघ्न (शत्रुओं का नाश करने वाले) और विघ्ननाशन।
श्लोक 124 (shiva.kotirudra.35.124)
शिखण्डी कवची शूली जटी मुण्डी च कुण्डली । अमृत्युः सर्वदृक्सिंहस्तेजोराशिर्महामणिः ॥ 35.124 ॥
śikhaṇḍī kavacī śūlī jaṭī muṇḍī ca kuṇḍalī amṛtyuḥ sarvadṛksiṁhastejorāśirmahāmaṇiḥ
शिखण्डी (शिखा धारण करने वाले), कवची (कवचधारी), शूली, जटी, मुण्डी और कुण्डली — इन रूपों वाले, अमृत्यु (मृत्युरहित), सर्वदृक् (सबको देखने वाले), सिंह-स्वरूप, तेजोराशि और महामणि (महान मणि-स्वरूप)।
श्लोक 125 (shiva.kotirudra.35.125)
असङ्ख्येयोऽप्रमेयात्मा वीर्यवान् वीर्यकोविदः । वेद्यश्चैव वियोगात्मा परावरमुनीश्वरः ॥ 35.125 ॥
asaṅkhyeyo'prameyātmā vīryavān vīryakovidaḥ vedyaścaiva viyogātmā parāvaramunīśvaraḥ
असंख्येय (असंख्य), अप्रमेयात्मा (अगम्य आत्मा वाले), वीर्यवान्, वीर्यकोविद (शक्ति के ज्ञाता), वेद्य (जानने योग्य), वियोगात्मा (वियोग-रहित आत्मा वाले) और परावरमुनीश्वर (श्रेष्ठ-निकृष्ट सभी मुनियों के ईश्वर)।
श्लोक 126 (shiva.kotirudra.35.126)
अनुत्तमो दुराधर्षो मधुरप्रियदर्शनः । सुरेशः शरणं सर्वः शब्दब्रह्म सतां गतिः ॥ 35.126 ॥
anuttamo durādharṣo madhurapriyadarśanaḥ sureśaḥ śaraṇaṁ sarvaḥ śabdabrahma satāṁ gatiḥ
अनुत्तम (सर्वश्रेष्ठ), दुराधर्ष (जिन्हें दबाया नहीं जा सकता), मधुरप्रियदर्शन (मधुर और प्रिय दर्शन वाले), सुरेश, शरणं सर्वः (सबके शरण-स्वरूप), शब्दब्रह्म (नाद-ब्रह्म) और सतां गति (सज्जनों की गति)।
श्लोक 127 (shiva.kotirudra.35.127)
कालपक्षः कालकालः कङ्कणीकृतवासुकिः । महेष्वासो महीभर्ता निष्कलङ्को विशृङ्खलः ॥ 35.127 ॥
kālapakṣaḥ kālakālaḥ kaṅkaṇīkṛtavāsukiḥ maheṣvāso mahībhartā niṣkalaṅko viśaṛṅkhalaḥ
कालपक्ष (काल के पक्षधर), कालकाल, कंकणीकृतवासुकि (वासुकि नाग को कंकण बनाने वाले), महेष्वास (महान धनुर्धर), महीभर्ता (पृथ्वी के पालक), निष्कलंक (कलंकरहित) और विशृंखल (बंधनरहित)।
श्लोक 128 (shiva.kotirudra.35.128)
द्युमणिस्तरणिर्धन्यः सिद्धिदः सिद्धिसाधनः । विश्वतः संवृतः स्तुत्यो व्यूढोरस्को महाभुजः ॥ 35.128 ॥
dyumaṇistaraṇirdhanyaḥ siddhidaḥ siddhisādhanaḥ viśvataḥ saṁvṛtaḥ stutyo vyūḍhorasko mahābhujaḥ
द्युमणि (सूर्य-स्वरूप), तरणि (नौका-स्वरूप, या सूर्य-स्वरूप), धन्य (धन्यवाद के योग्य), सिद्धिद, सिद्धिसाधन, विश्वतः संवृत (सर्वत्र से आवृत), स्तुत्य (स्तुति के योग्य), व्यूढोरस्क (विशाल वक्षस्थल वाले) और महाभुज (महान भुजाओं वाले)।
श्लोक 129 (shiva.kotirudra.35.129)
सर्वयोनिर्निरातङ्को नरनारायणप्रियः । निर्लेपो निष्प्रपञ्चात्मा निर्व्यङ्गो व्यङ्गनाशनः ॥ 35.129 ॥
sarvayonirnirātaṅko naranārāyaṇapriyaḥ nirlepo niṣprapañcātmā nirvyaṅgo vyaṅganāśanaḥ
सर्वयोनि (सबकी योनि-स्वरूप), निरातंक (भयरहित), नरनारायणप्रिय (नर-नारायण को प्रिय मानने वाले), निर्लेप (निर्लिप्त), निष्प्रपंचात्मा (प्रपंचरहित आत्मा वाले), निर्व्यंग (त्रुटिरहित) और व्यंगनाशन (त्रुटियों का नाश करने वाले)।
श्लोक 130 (shiva.kotirudra.35.130)
स्तव्यः स्तवप्रियः स्तोता व्यासमूर्तिर्निरङ्कुशः । निरवद्यमयोपायो विद्याराशी रसप्रियः ॥ 35.130 ॥
stavyaḥ stavapriyaḥ stotā vyāsamūrtirniraṅkuśaḥ niravadyamayopāyo vidyārāśī rasapriyaḥ
स्तव्य (स्तुति के योग्य), स्तवप्रिय (स्तुति को प्रिय मानने वाले), स्तोता (स्वयं स्तोता), व्यासमूर्ति (व्यास-स्वरूप), निरंकुश (अंकुशरहित), निरवद्यमयोपाय (निर्दोष उपाय वाले), विद्याराशि (विद्या की राशि) और रसप्रिय (रस को प्रिय मानने वाले)।
श्लोक 131 (shiva.kotirudra.35.131)
प्रशान्तबुद्धिरक्षुण्णः सङ्ग्रही नित्यसुन्दरः । वैयाघ्रधुर्यो धात्रीशः शाकल्यः शर्वरीपतिः ॥ 35.131 ॥
praśāntabuddhirakṣuṇṇaḥ saṅgrahī nityasundaraḥ vaiyāghradhuryo dhātrīśaḥ śākalyaḥ śarvarīpatiḥ
प्रशान्तबुद्धि (शांत बुद्धि वाले), अक्षुण्ण (अक्षुण्ण, अखंडित), संग्रही (संग्रह करने वाले), नित्यसुन्दर (सदा सुंदर), वैयाघ्रधुर्य (व्याघ्रचर्म को धारण करने में अग्रणी), धात्रीश (पृथ्वी के स्वामी), शाकल्य (शाकल्य-स्वरूप) और शर्वरीपति (रात्रि के स्वामी)।
श्लोक 132 (shiva.kotirudra.35.132)
परमार्थगुरुर्दत्तः सूरिराश्रितवत्सलः । सोमो रसज्ञो रसदः सर्वसत्त्वावलम्बनः ॥ 35.132 ॥
paramārthagururdattaḥ sūrirāśritavatsalaḥ somo rasajño rasadaḥ sarvasattvāvalambanaḥ
परमार्थगुरु (परमार्थ के गुरु), दत्त, सूरि (विद्वान्), आश्रितवत्सल (शरणागतों को प्रिय मानने वाले), सोम, रसज्ञ (रस के ज्ञाता), रसद (रस देने वाले) और सर्वसत्त्वावलम्बन (सभी प्राणियों के आश्रयस्वरूप)।
श्लोक 133 (shiva.kotirudra.35.133)
एवं नाम्नां सहस्रेण तुष्टाव हि हरं हरिः । प्रार्थयामास शम्भुं वै पूजयामास पङ्कजैः ॥ 35.133 ॥
evaṁ nāmnāṁ sahasreṇa tuṣṭāva hi haraṁ hariḥ prārthayāmāsa śambhuṁ vai pūjayāmāsa paṅkajaiḥ
इस प्रकार हरि ने एक हज़ार नामों से हर की स्तुति की; उन्होंने शम्भु से प्रार्थना की और कमलों से उनकी पूजा की।
श्लोक 134 (shiva.kotirudra.35.134)
ततः स कौतुकी शम्भुश्चकार चरितं द्विजाः । महद्भुतं सुखकरं तदेव शृणुतादरात् ॥ 35.134 ॥
tataḥ sa kautukī śambhuścakāra caritaṁ dvijāḥ mahadbhutaṁ sukhakaraṁ tadeva śaṛṇutādarāt
हे द्विजो! तत्पश्चात् कौतुकप्रिय शम्भु ने वह अत्यंत अद्भुत और सुखकारी चरित्र किया, जिसे अब आदरपूर्वक सुनिए।