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कोटिरुद्र संहिता · अध्याय 36

शिव-सहस्रनाम-स्तोत्र का फल

अध्याय 35अध्याय-सूचीअध्याय 37

श्लोक 1 (shiva.kotirudra.36.1)

सूत उवाच । श्रुत्वा विष्णुकृतं दिव्यं परनामविभूषितम् । सहस्रनाम स्वस्तोत्रं प्रसन्नोऽभून्महेश्वरः ॥ 36.1 ॥

sūta uvāca śrutvā viṣṇukṛtaṁ divyaṁ paranāmavibhūṣitam sahasranāma svastotraṁ prasanno'bhūnmaheśvaraḥ

सूत जी ने कहा — विष्णु द्वारा रचित उस दिव्य, परम नामों से अलंकृत सहस्रनाम-स्तोत्र को सुनकर महेश्वर प्रसन्न हो गए।

श्लोक 2 (shiva.kotirudra.36.2)

परीक्षार्थं हरेरीशः कमलेषु महेश्वरः । गोपयामास कमलं तदैकं भुवनेश्वरः ॥ 36.2 ॥

parīkṣārthaṁ harerīśaḥ kamaleṣu maheśvaraḥ gopayāmāsa kamalaṁ tadaikaṁ bhuvaneśvaraḥ

विष्णु की परीक्षा लेने के लिए भुवनेश्वर महेश्वर ने उन कमलों में से एक कमल को गुप्त रूप से छिपा दिया।

श्लोक 3 (shiva.kotirudra.36.3)

पङ्कजेषु तदा तेषु सहस्रेषु बभूव च । न्यूनमेकं तदा विष्णुर्विह्वलः शिवपूजने ॥ 36.3 ॥

paṅkajeṣu tadā teṣu sahasreṣu babhūva ca nyūnamekaṁ tadā viṣṇurvihvalaḥ śivapūjane

तब उन हज़ार कमलों में से एक कम पाया गया; शिव-पूजन में लीन विष्णु व्याकुल हो उठे।

श्लोक 4 (shiva.kotirudra.36.4)

हृदा विचारितं तेन कुतो वै कमलं गतम् । यातं यातु सुखेनैव मन्नेत्रं कमलं न किम् ॥ 36.4 ॥

hṛdā vicāritaṁ tena kuto vai kamalaṁ gatam yātaṁ yātu sukhenaiva mannetraṁ kamalaṁ na kim

उन्होंने मन में विचार किया — कमल कहाँ चला गया? जाए तो जाए, सुखपूर्वक जाए; क्या मेरा नेत्र कमल-सदृश नहीं है?

श्लोक 5 (shiva.kotirudra.36.5)

ज्ञात्वेति नेत्रमुद्धृत्य सर्वसत्त्वावलम्बनात् । पूजयामास भावेन स्तवयामास तेन च ॥ 36.5 ॥

jñātveti netramuddhṛtya sarvasattvāvalambanāt pūjayāmāsa bhāvena stavayāmāsa tena ca

ऐसा जानकर, समस्त प्राणियों के आश्रयस्वरूप विष्णु ने अपना नेत्र निकाल लिया और भावपूर्वक पूजा करते हुए उसी से स्तवन किया।

श्लोक 6 (shiva.kotirudra.36.6)

ततस्तुतमथो दृष्ट्वा तथाभूतं हरो हरिम् । मा मेति व्याहरन्नेव प्रादुरासीज्जगद्गुरुः ॥ 36.6 ॥

tatastutamatho dṛṣṭvā tathābhūtaṁ haro harim mā meti vyāharanneva prādurāsījjagadguruḥ

यह देखकर हर उस प्रकार स्तुति करते हुए हरि को देखकर 'ऐसा मत करो' कहते हुए तत्काल प्रकट हो गए, वे जगद्गुरु शिव।

श्लोक 7 (shiva.kotirudra.36.7)

तस्मादवतताराशु मण्डलात्पार्थिवस्य च । प्रतिष्ठितस्य हरिणा स्वलिङ्गस्य महेश्वरः ॥ 36.7 ॥

tasmādavatatārāśu maṇḍalātpārthivasya ca pratiṣṭhitasya hariṇā svaliṅgasya maheśvaraḥ

हरि द्वारा स्थापित उस पार्थिव लिंग के मंडल से महेश्वर शीघ्र ही प्रकट हुए।

श्लोक 8 (shiva.kotirudra.36.8)

यथोक्तरूपिणं शम्भुं तेजोराशिसमुत्थितम् । नमस्कृत्य पुरः स्थित्वा स तुष्टाव विशेषतः ॥ 36.8 ॥

yathoktarūpiṇaṁ śambhuṁ tejorāśisamutthitam namaskṛtya puraḥ sthitvā sa tuṣṭāva viśeṣataḥ

तेजोराशि से प्रकट हुए, उसी वर्णित रूप वाले शम्भु को नमस्कार करके, उनके सामने खड़े होकर विष्णु ने विशेष रूप से उनकी स्तुति की।

श्लोक 9 (shiva.kotirudra.36.9)

तदा प्राह महादेवः प्रसन्नः प्रहसन्निव । सम्प्रेक्ष्य कृपया विष्णुं कृताञ्जलिपुटं स्थितम् ॥ 36.9 ॥

tadā prāha mahādevaḥ prasannaḥ prahasanniva samprekṣya kṛpayā viṣṇuṁ kṛtāñjalipuṭaṁ sthitam

तब महादेव प्रसन्न होकर, मुस्कुराते हुए, हाथ जोड़कर खड़े विष्णु को कृपापूर्वक देखकर बोले।

श्लोक 10 (shiva.kotirudra.36.10)

शङ्कर उवाच । ज्ञातं मयेदं सकलं तव चित्तेप्सितं हरे । देवकार्यं विशेषेण देवकार्यरतात्मनः ॥ 36.10 ॥

śaṅkara uvāca jñātaṁ mayedaṁ sakalaṁ tava cittepsitaṁ hare devakāryaṁ viśeṣeṇa devakāryaratātmanaḥ

शंकर ने कहा — हे हरि! मैं तुम्हारे मन की यह समस्त इच्छा जानता हूँ, विशेषकर देवकार्य को, क्योंकि तुम्हारी आत्मा सदा देवकार्य में रत रहती है।

श्लोक 11 (shiva.kotirudra.36.11)

देवकार्यस्य सिद्ध्यर्थं दैत्यनाशाय चाश्रमम् । सुदर्शनाख्यं चक्रं च ददामि तव शोभनम् ॥ 36.11 ॥

devakāryasya siddhyarthaṁ daityanāśāya cāśramam sudarśanākhyaṁ cakraṁ ca dadāmi tava śobhanam

देवकार्य की सिद्धि और दैत्यों के नाश के लिए मैं तुम्हें यह सुंदर सुदर्शन नामक चक्र प्रदान करता हूँ।

श्लोक 12 (shiva.kotirudra.36.12)

यद्रूपं भवता दृष्टं सर्वलोकसुखावहम् । हिताय तव देवेश धृतं भावय तद्ध्रुवम् ॥ 36.12 ॥

yadrūpaṁ bhavatā dṛṣṭaṁ sarvalokasukhāvaham hitāya tava deveśa dhṛtaṁ bhāvaya taddhruvam

हे देवेश! मेरा जो यह रूप तुमने देखा है, जो समस्त लोकों को सुख देने वाला है, तुम्हारे हित के लिए धारण किया गया है, इसका सदा ध्यान करना।

श्लोक 13 (shiva.kotirudra.36.13)

रणाजिरे स्मृतं तद्वै देवानां दुःखनाशनम् । इदं चक्रमिदं रूपमिदं नामसहस्रकम् ॥ 36.13 ॥

raṇājire smṛtaṁ tadvai devānāṁ duḥkhanāśanam idaṁ cakramidaṁ rūpamidaṁ nāmasahasrakam

युद्ध के मैदान में स्मरण किए जाने पर यह देवताओं के दुःख का नाश करता है — यह चक्र, यह रूप, और यह सहस्रनाम।

श्लोक 14 (shiva.kotirudra.36.14)

ये शृण्वन्ति सदा भक्त्या सिद्धिः स्यादनपायिनी । कामानां सकलानां च प्रसादान्मम सुव्रत ॥ 36.14 ॥

ye śaṛṇvanti sadā bhaktyā siddhiḥ syādanapāyinī kāmānāṁ sakalānāṁ ca prasādānmama suvrata

हे सुव्रत! जो सदा भक्तिपूर्वक इसे सुनते हैं, उन्हें मेरी कृपा से समस्त कामनाओं की अटूट सिद्धि प्राप्त होती है।

श्लोक 15 (shiva.kotirudra.36.15)

सूत उवाच । एवमुक्त्वा ददौ चक्रं सूर्यायुतसमप्रभम् । सुदर्शनं स्वपादोत्थं सर्वशत्रुविनाशनम् ॥ 36.15 ॥

sūta uvāca evamuktvā dadau cakraṁ sūryāyutasamaprabham sudarśanaṁ svapādotthaṁ sarvaśatruvināśanam

सूत जी ने कहा — ऐसा कहकर उन्होंने दस हज़ार सूर्यों के समान तेजस्वी, अपने ही चरण से उत्पन्न, समस्त शत्रुओं का नाश करने वाला सुदर्शन चक्र प्रदान किया।

श्लोक 16 (shiva.kotirudra.36.16)

विष्णुश्चापि सुसंस्कृत्य जग्राहोदङ्मुखस्तदा । नमस्कृत्य महादेवं विष्णुर्वचनमब्रवीत् ॥ 36.16 ॥

viṣṇuścāpi susaṁskṛtya jagrāhodaṅmukhastadā namaskṛtya mahādevaṁ viṣṇurvacanamabravīt

विष्णु ने भी उसे भलीभाँति संस्कारित करके उत्तराभिमुख होकर ग्रहण किया; और महादेव को नमस्कार करके विष्णु ने यह वचन कहा।

श्लोक 17 (shiva.kotirudra.36.17)

विष्णुरुवाच । शृणु देव मया ध्येयं पठनीयं च किं प्रभो । दुःखानां नाशनार्थं हि वद त्वं लोकशङ्कर ॥ 36.17 ॥

viṣṇuruvāca śaṛṇu deva mayā dhyeyaṁ paṭhanīyaṁ ca kiṁ prabho duḥkhānāṁ nāśanārthaṁ hi vada tvaṁ lokaśaṅkara

विष्णु ने कहा — हे देव! सुनिए, मुझे क्या ध्यान करना चाहिए, क्या पढ़ना चाहिए? हे प्रभो, हे लोकशंकर! दुःखों के नाश के लिए मुझे बताइए।

श्लोक 18 (shiva.kotirudra.36.18)

सूत उवाच । इति पृष्टस्तदा तेन सन्तुष्टस्तु शिवोऽब्रवीत् । प्रसन्नमानसो भूत्वा विष्णुं देवसहायकम् ॥ 36.18 ॥

sūta uvāca iti pṛṣṭastadā tena santuṣṭastu śivo'bravīt prasannamānaso bhūtvā viṣṇuṁ devasahāyakam

सूत जी ने कहा — इस प्रकार पूछे जाने पर संतुष्ट शिव प्रसन्नचित्त होकर देवताओं के सहायक विष्णु से बोले।

श्लोक 19 (shiva.kotirudra.36.19)

शिव उवाच । रूपं ध्येयं हरे मे हि सर्वानर्थप्रशान्तये । अनेकदुःखनाशार्थं पठ नामसहस्रकम् ॥ 36.19 ॥

śiva uvāca rūpaṁ dhyeyaṁ hare me hi sarvānarthapraśāntaye anekaduḥkhanāśārthaṁ paṭha nāmasahasrakam

शिव ने कहा — हे हरि! सभी अनर्थों की शांति के लिए मेरे इस रूप का ध्यान करो, और अनेक दुःखों के नाश के लिए यह सहस्रनाम पढ़ो।

श्लोक 20 (shiva.kotirudra.36.20)

धार्यं चक्रं सदा मे हि सर्वाभीष्टस्य सिद्धये । त्वया विष्णो प्रयत्नेन सर्वचक्रवरं त्विदम् ॥ 36.20 ॥

dhāryaṁ cakraṁ sadā me hi sarvābhīṣṭasya siddhaye tvayā viṣṇo prayatnena sarvacakravaraṁ tvidam

हे विष्णु! समस्त अभीष्टों की सिद्धि के लिए तुम सदा प्रयत्नपूर्वक मेरा यह चक्र धारण करना — यह सभी चक्रों में सर्वश्रेष्ठ है।

श्लोक 21 (shiva.kotirudra.36.21)

अन्ये च ये पठिष्यन्ति पाठयिष्यन्ति नित्यशः । तेषां दुःखं न स्वप्नेऽपि जायते नात्र संशयः ॥ 36.21 ॥

anye ca ye paṭhiṣyanti pāṭhayiṣyanti nityaśaḥ teṣāṁ duḥkhaṁ na svapne'pi jāyate nātra saṁśayaḥ

और भी जो लोग इसे नित्य पढ़ेंगे या पढ़वाएँगे, उन्हें स्वप्न में भी दुःख नहीं होगा, इसमें कोई संदेह नहीं है।

श्लोक 22 (shiva.kotirudra.36.22)

राज्ञां च सङ्कटे प्राप्ते शतावृत्तिं चरेद्यदा । साङ्गं च विधिसंयुक्तं कल्याणं लभते नरः ॥ 36.22 ॥

rājñāṁ ca saṅkaṭe prāpte śatāvṛttiṁ caredyadā sāṅgaṁ ca vidhisaṁyuktaṁ kalyāṇaṁ labhate naraḥ

राजाओं पर संकट आने पर जब कोई इसका सौ बार, अंगों सहित तथा विधिपूर्वक, पाठ करता है, तो वह मनुष्य कल्याण प्राप्त करता है।

श्लोक 23 (shiva.kotirudra.36.23)

रोगनाशकरं ह्येतद्विद्यावित्तदमुत्तमम् । सर्वकामप्रदं पुण्यं शिवभक्तिप्रदं सदा ॥ 36.23 ॥

roganāśakaraṁ hyetadvidyāvittadamuttamam sarvakāmapradaṁ puṇyaṁ śivabhaktipradaṁ sadā

यह रोगों का नाश करने वाला, विद्या और धन देने वाला उत्तम स्तोत्र है, सभी कामनाओं को पूर्ण करने वाला, पुण्यदायक और सदा शिव-भक्ति देने वाला है।

श्लोक 24 (shiva.kotirudra.36.24)

यदुद्दिश्य फलं श्रेष्ठं पठिष्यन्ति नरास्त्विह । लप्स्यन्ते नात्र सन्देहः फलं तत्सत्यमुत्तमम् ॥ 36.24 ॥

yaduddiśya phalaṁ śreṣṭhaṁ paṭhiṣyanti narāstviha lapsyante nātra sandehaḥ phalaṁ tatsatyamuttamam

जिस श्रेष्ठ फल की कामना से मनुष्य यहाँ इसका पाठ करेंगे, उन्हें वह फल अवश्य प्राप्त होगा — इसमें संदेह नहीं, वह फल सत्य और उत्तम है।

श्लोक 25 (shiva.kotirudra.36.25)

यश्च प्रातः समुत्थाय पूजां कृत्वा मदीयिकाम् । पठते मत्समक्षं वै नित्यं सिद्धिर्न दूरतः ॥ 36.25 ॥

yaśca prātaḥ samutthāya pūjāṁ kṛtvā madīyikām paṭhate matsamakṣaṁ vai nityaṁ siddhirna dūrataḥ

और जो प्रातः उठकर मेरी पूजा करके मेरे समक्ष नित्य इसका पाठ करता है, उसकी सिद्धि दूर नहीं है।

श्लोक 26 (shiva.kotirudra.36.26)

ऐहिकीं सिद्धिमाप्नोति निखिलां सर्वकामिकाम् । अन्ते सायुज्यमुक्तिं वै प्राप्नोत्यत्र न संशयः ॥ 36.26 ॥

aihikīṁ siddhimāpnoti nikhilāṁ sarvakāmikām ante sāyujyamuktiṁ vai prāpnotyatra na saṁśayaḥ

वह इस लोक में समस्त कामनाओं वाली पूर्ण सिद्धि प्राप्त करता है, और अंत में निश्चय ही सायुज्य-मुक्ति को प्राप्त होता है, इसमें कोई संदेह नहीं।

श्लोक 27 (shiva.kotirudra.36.27)

सूत उवाच । एवमुक्त्वा तदा विष्णुं शङ्करः प्रीतमानसः । उपस्पृश्य कराभ्यां तमुवाच गिरिशः पुनः ॥ 36.27 ॥

sūta uvāca evamuktvā tadā viṣṇuṁ śaṅkaraḥ prītamānasaḥ upaspṛśya karābhyāṁ tamuvāca giriśaḥ punaḥ

सूत जी ने कहा — विष्णु से ऐसा कहकर, प्रीतचित्त शंकर ने अपने दोनों हाथों से उन्हें स्पर्श किया और गिरीश पुनः बोले।

श्लोक 28 (shiva.kotirudra.36.28)

शिव उवाच । वरदोऽस्मि सुरश्रेष्ठ वरान्वृणु यथेप्सितान् । भक्त्या वशीकृतो नूनं स्तवेनानेन सुव्रत ॥ 36.28 ॥

śiva uvāca varado'smi suraśreṣṭha varānvṛṇu yathepsitān bhaktyā vaśīkṛto nūnaṁ stavenānena suvrata

शिव ने कहा — हे देवश्रेष्ठ! मैं वरदाता हूँ, जैसी इच्छा हो वैसे वर माँगो; हे सुव्रत! इस स्तवन से तुमने मुझे निश्चय ही अपनी भक्ति से वश में कर लिया है।

श्लोक 29 (shiva.kotirudra.36.29)

सूत उवाच । इत्युक्तो देवदेवेन देवदेवं प्रणम्य तम् । सुप्रसन्नतरो विष्णुः साञ्जलिर्वाक्यमब्रवीत् ॥ 36.29 ॥

sūta uvāca ityukto devadevena devadevaṁ praṇamya tam suprasannataro viṣṇuḥ sāñjalirvākyamabravīt

सूत जी ने कहा — देवाधिदेव द्वारा ऐसा कहे जाने पर, उन देवाधिदेव को प्रणाम करके अत्यंत प्रसन्न विष्णु ने हाथ जोड़कर यह वचन कहा।

श्लोक 30 (shiva.kotirudra.36.30)

विष्णुरुवाच । यथेदानीं कृपा नाथ क्रियते चान्यतः परा । कार्या चैव विशेषेण कृपालुत्वात्त्वया प्रभो ॥ 36.30 ॥

viṣṇuruvāca yathedānīṁ kṛpā nātha kriyate cānyataḥ parā kāryā caiva viśeṣeṇa kṛpālutvāttvayā prabho

विष्णु ने कहा — हे नाथ! जैसे अभी यह परम कृपा आपने की है, वैसे ही आगे भी विशेष रूप से की जाए, हे प्रभो, आपकी करुणा के कारण।

श्लोक 31 (shiva.kotirudra.36.31)

त्वयि भक्तिर्महादेव प्रसीद वरमुत्तमम् । नान्यमिच्छामि भक्तानामार्त्तयो नैव यत्प्रभो ॥ 36.31 ॥

tvayi bhaktirmahādeva prasīda varamuttamam nānyamicchāmi bhaktānāmārttayo naiva yatprabho

हे महादेव! आप में मेरी भक्ति बनी रहे, यही सर्वोत्तम वर देकर प्रसन्न होइए; मैं और कुछ नहीं चाहता — आपके भक्तों को कभी पीड़ा न हो, हे प्रभो।

श्लोक 32 (shiva.kotirudra.36.32)

सूत उवाच । तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य दयावान्सुतरां भवः । पस्पर्श च तदङ्गं वै प्राह शीतांशुशेखरः ॥ 36.32 ॥

sūta uvāca tacchrutvā vacanaṁ tasya dayāvānsutarāṁ bhavaḥ pasparśa ca tadaṅgaṁ vai prāha śītāṁśuśekharaḥ

सूत जी ने कहा — उसका यह वचन सुनकर अत्यंत दयालु भव ने उसके अंग का स्पर्श किया और चंद्रशेखर बोले।

श्लोक 33 (shiva.kotirudra.36.33)

शिव उवाच । मयि भक्तिः सदा ते तु हरे स्यादनपायिनी । सदा वन्द्यश्च पूज्यश्च लोके भव सुरैरपि ॥ 36.33 ॥

śiva uvāca mayi bhaktiḥ sadā te tu hare syādanapāyinī sadā vandyaśca pūjyaśca loke bhava surairapi

शिव ने कहा — हे हरि! मुझ में तुम्हारी भक्ति सदा अटूट रहेगी; और तुम इस लोक में देवताओं द्वारा भी सदा वंदनीय और पूज्य होगे।

श्लोक 34 (shiva.kotirudra.36.34)

विश्वम्भरेति ते नाम सर्वपापहरं परम् । भविष्यति न सन्देहो मत्प्रसादात्सुरोत्तम ॥ 36.34 ॥

viśvambhareti te nāma sarvapāpaharaṁ param bhaviṣyati na sandeho matprasādātsurottama

हे देवश्रेष्ठ! मेरी कृपा से तुम्हारा नाम 'विश्वंभर' सभी पापों को हरने वाला और सर्वोच्च हो जाएगा, इसमें कोई संदेह नहीं।

श्लोक 35 (shiva.kotirudra.36.35)

सूत उवाच । इत्युक्त्वान्तर्दधे रुद्रः सर्वदेवेश्वरः प्रभुः । पश्यतस्तस्य विष्णोस्तु तत्रैव च मुनीश्वराः ॥ 36.35 ॥

sūta uvāca ityuktvāntardadhe rudraḥ sarvadeveśvaraḥ prabhuḥ paśyatastasya viṣṇostu tatraiva ca munīśvarāḥ

सूत जी ने कहा — ऐसा कहकर सर्वदेवेश्वर प्रभु रुद्र वहीं अंतर्धान हो गए, हे मुनीश्वरो! जबकि विष्णु स्वयं देखते ही रह गए।

श्लोक 36 (shiva.kotirudra.36.36)

जनार्दनोऽपि भगवान् वचनाच्छङ्करस्य च । प्राप्य चक्रं शुभं तद्वै जहर्षाति स्वचेतसि ॥ 36.36 ॥

janārdano'pi bhagavān vacanācchaṅkarasya ca prāpya cakraṁ śubhaṁ tadvai jaharṣāti svacetasi

भगवान जनार्दन भी शंकर के वचन से वह शुभ चक्र पाकर अपने हृदय में अत्यंत हर्षित हुए।

श्लोक 37 (shiva.kotirudra.36.37)

कृत्वा ध्यानं च तच्छम्भोः स्तोत्रमेतन्निरन्तरम् । पपाठाध्यापयामास भक्तेभ्यस्तदुपादिशत् ॥ 36.37 ॥

kṛtvā dhyānaṁ ca tacchambhoḥ stotrametannirantaram papāṭhādhyāpayāmāsa bhaktebhyastadupādiśat

शम्भु का उस रूप में ध्यान करते हुए उन्होंने निरंतर इस स्तोत्र का पाठ किया, दूसरों को पढ़ाया, और अपने भक्तों को इसका उपदेश दिया।

श्लोक 38 (shiva.kotirudra.36.38)

इति पृष्टं मयाख्यातं शृण्वतां पापहारकम् । अतः परं च किं श्रेष्ठाः प्रष्टुमिच्छथ वै पुनः ॥ 36.38 ॥

iti pṛṣṭaṁ mayākhyātaṁ śaṛṇvatāṁ pāpahārakam ataḥ paraṁ ca kiṁ śreṣṭhāḥ praṣṭumicchatha vai punaḥ

इस प्रकार जो पूछा गया था, वह मैंने बता दिया — यह सुनने वालों के पाप का नाश करने वाला है। हे श्रेष्ठ ऋषियो! अब इसके आगे आप और क्या पूछना चाहते हैं?

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