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कोटिरुद्र संहिता · अध्याय 41

मुक्ति का निरूपण

अध्याय 40अध्याय-सूचीअध्याय 42

श्लोक 1 (shiva.kotirudra.41.1)

ऋषय ऊचुः । मुक्तिर्नाम त्वया प्रोक्ता तस्यां किं नु भवेदिह । अवस्था कीदृशी तत्र भवेदिति वदस्व नः ॥ 41.1 ॥

ṛṣaya ūcuḥ muktirnāma tvayā proktā tasyāṁ kiṁ nu bhavediha avasthā kīdṛśī tatra bhavediti vadasva naḥ

ऋषियों ने कहा — आपने जिसे मुक्ति कहा है, उसमें वास्तव में क्या होता है? वहाँ कैसी अवस्था होती है, हमें बताइए।

श्लोक 2 (shiva.kotirudra.41.2)

सूत उवाच । मुक्तिश्चतुर्विधा प्रोक्ता श्रूयतां कथयामि वः । संसारक्लेशसंहर्त्री परमानन्ददायिनी ॥ 41.2 ॥

sūta uvāca muktiścaturvidhā proktā śrūyatāṁ kathayāmi vaḥ saṁsārakleśasaṁhartrī paramānandadāyinī

सूत जी ने कहा — मुक्ति चार प्रकार की कही गई है, सुनिए मैं आपको बताता हूँ; यह संसार के क्लेशों का नाश करने वाली और परम आनंद देने वाली है।

श्लोक 3 (shiva.kotirudra.41.3)

सारूप्या चैव सालोक्या सान्निध्या च तथा परा । सायुज्या च चतुर्थी सा व्रतेनानेन या भवेत् ॥ 41.3 ॥

sārūpyā caiva sālokyā sānnidhyā ca tathā parā sāyujyā ca caturthī sā vratenānena yā bhavet

सारूप्य, सालोक्य, तथा परम सान्निध्य — और चौथी सायुज्य, जो इसी व्रत से प्राप्त होती है।

श्लोक 4 (shiva.kotirudra.41.4)

मुक्तेर्दाता मुनिश्रेष्ठाः केवलं शिव उच्यते । ब्रह्माद्या न हि ते ज्ञेयाः केवलं च त्रिवर्गदाः ॥ 41.4 ॥

mukterdātā muniśreṣṭhāḥ kevalaṁ śiva ucyate brahmādyā na hi te jñeyāḥ kevalaṁ ca trivargadāḥ

हे मुनिश्रेष्ठो! मुक्ति के दाता केवल शिव ही कहे जाते हैं; ब्रह्मा आदि को ऐसा नहीं जानना चाहिए — वे केवल धर्म-अर्थ-काम इन तीनों को ही देने वाले हैं।

श्लोक 5 (shiva.kotirudra.41.5)

ब्रह्माद्यास्त्रिगुणाधीशाः शिवस्त्रिगुणतः परः । निर्विकारी परब्रह्म तुर्यः प्रकृतितः परः ॥ 41.5 ॥

brahmādyāstriguṇādhīśāḥ śivastriguṇataḥ paraḥ nirvikārī parabrahma turyaḥ prakṛtitaḥ paraḥ

ब्रह्मा आदि तीनों गुणों के अधीश्वर हैं, परंतु शिव तीनों गुणों से परे हैं — विकाररहित परब्रह्म, तुरीय, प्रकृति से भी परे।

श्लोक 6 (shiva.kotirudra.41.6)

ज्ञानरूपोऽव्ययः साक्षी ज्ञानगम्योऽद्वयः स्वयम् । कैवल्यमुक्तिदः सोऽत्र त्रिवर्गस्य प्रदोऽपि हि ॥ 41.6 ॥

jñānarūpo'vyayaḥ sākṣī jñānagamyo'dvayaḥ svayam kaivalyamuktidaḥ so'tra trivargasya prado'pi hi

ज्ञान-स्वरूप, अविनाशी, साक्षी, ज्ञान से ही प्राप्य, स्वयं अद्वैत — वे ही यहाँ कैवल्य-मुक्ति के दाता हैं, और तीनों (धर्म-अर्थ-काम) के भी दाता हैं।

श्लोक 7 (shiva.kotirudra.41.7)

कैवल्याख्या पञ्चमी च दुर्लभा सर्वथा नृणाम् । तल्लक्षणं प्रवक्ष्यामि श्रूयतामृषिसत्तमाः ॥ 41.7 ॥

kaivalyākhyā pañcamī ca durlabhā sarvathā nṛṇām tallakṣaṇaṁ pravakṣyāmi śrūyatāmṛṣisattamāḥ

कैवल्य नाम की पाँचवीं मुक्ति मनुष्यों के लिए सर्वथा दुर्लभ है; उसका लक्षण मैं बताता हूँ, हे श्रेष्ठ ऋषियो! सुनिए।

श्लोक 8 (shiva.kotirudra.41.8)

उत्पद्यते यतः सर्वं येनैतत्पाल्यते जगत् । यस्मिंश्च लीयते तद्धि येन सर्वमिदं ततम् ॥ 41.8 ॥

utpadyate yataḥ sarvaṁ yenaitatpālyate jagat yasmiṁśca līyate taddhi yena sarvamidaṁ tatam

जिससे सब कुछ उत्पन्न होता है, जिससे यह जगत पालित होता है, जिसमें वह लीन होता है, और जिससे यह सब कुछ व्याप्त है —

श्लोक 9 (shiva.kotirudra.41.9)

तदेव शिवरूपं हि पठ्यते च मुनीश्वराः । सकलं निष्कलं चेति द्विविधं वेदवर्णितम् ॥ 41.9 ॥

tadeva śivarūpaṁ hi paṭhyate ca munīśvarāḥ sakalaṁ niṣkalaṁ ceti dvividhaṁ vedavarṇitam

— वही, हे मुनीश्वरो! शिव का स्वरूप कहा जाता है; वेदों में वह सकल और निष्कल — इन दो प्रकार से वर्णित है।

श्लोक 10 (shiva.kotirudra.41.10)

विष्णुना तच्च न ज्ञातं ब्रह्मणा न च तत्तथा । कुमाराद्यैश्च न ज्ञातं न ज्ञातं नारदेन वै ॥ 41.10 ॥

viṣṇunā tacca na jñātaṁ brahmaṇā na ca tattathā kumārādyaiśca na jñātaṁ na jñātaṁ nāradena vai

उसे न विष्णु जानते हैं, और न ही ब्रह्मा; न कुमार आदि ने जाना, और न ही नारद ने जाना।

श्लोक 11 (shiva.kotirudra.41.11)

शुकेन व्यासपुत्रेण व्यासेन च मुनीश्वरैः । तत्पूर्वैश्चाखिलैर्देवैर्वेदैः शास्त्रैस्तथा न हि ॥ 41.11 ॥

śukena vyāsaputreṇa vyāsena ca munīśvaraiḥ tatpūrvaiścākhilairdevairvedaiḥ śāstraistathā na hi

व्यास-पुत्र शुक ने, व्यास ने, तथा अन्य मुनीश्वरों ने और उनसे पूर्व के समस्त देवताओं, वेदों तथा शास्त्रों ने भी उसे नहीं जाना।

श्लोक 12 (shiva.kotirudra.41.12)

सत्यं ज्ञानमनन्तं च सच्चिदानन्दसंज्ञितम् । निर्गुणो निरुपाधिश्चाव्ययः शुद्धो निरञ्जनः ॥ 41.12 ॥

satyaṁ jñānamanantaṁ ca saccidānandasaṁjñitam nirguṇo nirupādhiścāvyayaḥ śuddho nirañjanaḥ

वह सत्य, ज्ञान, अनंत तथा सच्चिदानंद कहलाता है; निर्गुण, उपाधिरहित, अविनाशी, शुद्ध और निर्मल है।

श्लोक 13 (shiva.kotirudra.41.13)

न रक्तो नैव पीतश्च न श्वेतो नील एव च । न ह्रस्वो न च दीर्घश्च न स्थूलः सूक्ष्म एव च ॥ 41.13 ॥

na rakto naiva pītaśca na śveto nīla eva ca na hrasvo na ca dīrghaśca na sthūlaḥ sūkṣma eva ca

न लाल, न पीला, न सफेद, न नीला; न छोटा, न लंबा, न स्थूल, न सूक्ष्म।

श्लोक 14 (shiva.kotirudra.41.14)

यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह । तदेव परमं प्रोक्तं ब्रह्मैव शिवसंज्ञकम् ॥ 41.14 ॥

yato vāco nivartante aprāpya manasā saha tadeva paramaṁ proktaṁ brahmaiva śivasaṁjñakam

जिससे वाणी मन सहित लौट आती है, उसे पाए बिना — वही परम कहा गया है, वही ब्रह्म है, जिसे शिव नाम से जाना जाता है।

श्लोक 15 (shiva.kotirudra.41.15)

आकाशं व्यापकं यद्वत्तथैव व्यापकं त्विदम् । मायातीतं परात्मानं द्वन्द्वातीतं विमत्सरम् ॥ 41.15 ॥

ākāśaṁ vyāpakaṁ yadvattathaiva vyāpakaṁ tvidam māyātītaṁ parātmānaṁ dvandvātītaṁ vimatsaram

जैसे आकाश व्यापक है, वैसे ही यह भी व्यापक है — माया से परे, परमात्मा, द्वंद्वों से परे, ईर्ष्यारहित।

श्लोक 16 (shiva.kotirudra.41.16)

तत्प्राप्तिश्च भवेदत्र शिवज्ञानोदयाद् ध्रुवम् । भजनाद्वा शिवस्यैव सूक्ष्ममत्या सतां द्विजाः ॥ 41.16 ॥

tatprāptiśca bhavedatra śivajñānodayād dhruvam bhajanādvā śivasyaiva sūkṣmamatyā satāṁ dvijāḥ

हे द्विजो! उसकी प्राप्ति यहाँ निश्चय ही शिव-ज्ञान के उदय से होती है, अथवा सज्जनों की सूक्ष्म बुद्धि से शिव के ही भजन से होती है।

श्लोक 17 (shiva.kotirudra.41.17)

ज्ञानं तु दुष्करं लोके भजनं सुकरं मतम् । तस्माच्छिवं च भजत मुक्त्यर्थमपि सत्तमाः ॥ 41.17 ॥

jñānaṁ tu duṣkaraṁ loke bhajanaṁ sukaraṁ matam tasmācchivaṁ ca bhajata muktyarthamapi sattamāḥ

परंतु संसार में ज्ञान दुष्कर है, भजन सुकर माना गया है; इसलिए हे सत्तमो! मुक्ति के लिए भी शिव का भजन करो।

श्लोक 18 (shiva.kotirudra.41.18)

शिवो हि भजनाधीनो ज्ञानात्मा मोक्षदः परः । भक्त्यैव बहवः सिद्धा मुक्तिं प्रापुः परां मुदा ॥ 41.18 ॥

śivo hi bhajanādhīno jñānātmā mokṣadaḥ paraḥ bhaktyaiva bahavaḥ siddhā muktiṁ prāpuḥ parāṁ mudā

ज्ञान-स्वरूप, परम मोक्षदाता शिव भजन के ही अधीन हैं; भक्ति से ही अनेक सिद्ध पुरुषों ने परम आनंद के साथ मुक्ति प्राप्त की।

श्लोक 19 (shiva.kotirudra.41.19)

ज्ञानमाता शम्भुभक्तिर्मुक्तिभुक्तिप्रदा सदा । सुलभा यत्प्रसादाद्धि सत्प्रेमाङ्कुरलक्षणा ॥ 41.19 ॥

jñānamātā śambhubhaktirmuktibhuktipradā sadā sulabhā yatprasādāddhi satpremāṅkuralakṣaṇā

शम्भु की भक्ति ज्ञान की जननी है, सदा मुक्ति और भुक्ति देने वाली है; उनकी कृपा से ही यह सुलभ होती है, और सच्चे प्रेम के अंकुर का लक्षण रखती है।

श्लोक 20 (shiva.kotirudra.41.20)

सा भक्तिर्विविधा ज्ञेया सगुणा निर्गुणा द्विजाः । वैधी स्वाभाविकी या या वरा सा सा स्मृता परा ॥ 41.20 ॥

sā bhaktirvividhā jñeyā saguṇā nirguṇā dvijāḥ vaidhī svābhāvikī yā yā varā sā sā smṛtā parā

हे द्विजो! वह भक्ति अनेक प्रकार की जाननी चाहिए — सगुण और निर्गुण, विधिपूर्वक और स्वाभाविक; जो-जो श्रेष्ठ है, वही उत्तम मानी गई है।

श्लोक 21 (shiva.kotirudra.41.21)

नैष्ठिक्यनैष्ठिकीभेदाद् द्विविधैव हि कीर्तिता । षड्विधा नैष्ठिकी ज्ञेया द्वितीयैकविधा स्मृता ॥ 41.21 ॥

naiṣṭhikyanaiṣṭhikībhedād dvividhaiva hi kīrtitā ṣaḍvidhā naiṣṭhikī jñeyā dvitīyaikavidhā smṛtā

नैष्ठिकी और अनैष्ठिकी के भेद से वह दो प्रकार की कही गई है; नैष्ठिकी को छह प्रकार का जानना चाहिए, दूसरी एक ही प्रकार की मानी गई है।

श्लोक 22 (shiva.kotirudra.41.22)

विहिताविहिताभेदात्तामनेकां विदुर्बुधाः । तयोर्बहुविधत्वाच्च विस्तारो न हि वर्ण्यते ॥ 41.22 ॥

vihitāvihitābhedāttāmanekāṁ vidurbudhāḥ tayorbahuvidhatvācca vistāro na hi varṇyate

विहित और अविहित के भेद से विद्वान इसे अनेक प्रकार का जानते हैं; दोनों की बहुविधता के कारण उसका विस्तार यहाँ वर्णित नहीं किया गया है।

श्लोक 23 (shiva.kotirudra.41.23)

ते नवाङ्गे उभे ज्ञेये श्रवणादिकभेदतः । सुदुष्करे तत्प्रसादं विना च सुकरे ततः ॥ 41.23 ॥

te navāṅge ubhe jñeye śravaṇādikabhedataḥ suduṣkare tatprasādaṁ vinā ca sukare tataḥ

वे दोनों श्रवण आदि नौ अंगों के भेद से जानने योग्य हैं; शिव की कृपा के बिना अत्यंत दुष्कर हैं, और उनकी कृपा से सुकर हो जाती हैं।

श्लोक 24 (shiva.kotirudra.41.24)

भक्तिज्ञाने न भिन्ने हि शम्भुना वर्णिते द्विजाः । तस्माद्भेदो न कर्तव्यः तत्कर्तुः सर्वदा सुखम् ॥ 41.24 ॥

bhaktijñāne na bhinne hi śambhunā varṇite dvijāḥ tasmādbhedo na kartavyaḥ tatkartuḥ sarvadā sukham

हे द्विजो! शम्भु द्वारा वर्णित भक्ति और ज्ञान अलग नहीं हैं; इसलिए इनमें भेद नहीं करना चाहिए — जो ऐसा न करे, उसे सदा सुख प्राप्त होता है।

श्लोक 25 (shiva.kotirudra.41.25)

विज्ञानं न भवत्येव द्विजा भक्तिविरोधिनः । शम्भुभक्तिकरस्यैव भवेज्ज्ञानोदयो द्रुतम् ॥ 41.25 ॥

vijñānaṁ na bhavatyeva dvijā bhaktivirodhinaḥ śambhubhaktikarasyaiva bhavejjñānodayo drutam

हे द्विजो! भक्ति का विरोध करने वालों को कभी सच्चा ज्ञान नहीं होता; परंतु शम्भु की भक्ति करने वाले को शीघ्र ही ज्ञान का उदय होता है।

श्लोक 26 (shiva.kotirudra.41.26)

तस्माद्भक्तिर्महेशस्य साधनीया मुनीश्वराः । तयैव निखिलं सिद्धं भविष्यति न संशयः ॥ 41.26 ॥

tasmādbhaktirmaheśasya sādhanīyā munīśvarāḥ tayaiva nikhilaṁ siddhaṁ bhaviṣyati na saṁśayaḥ

इसलिए हे मुनीश्वरो! महेश की भक्ति ही साधनीय है; उसी से समस्त कार्य सिद्ध होंगे, इसमें कोई संशय नहीं।

श्लोक 27 (shiva.kotirudra.41.27)

इति पृष्टं भवद्भिर्यत्तदेव कथितं मया । तच्छुत्वा सर्वपापेभ्यो मुच्यते नात्र संशयः ॥ 41.27 ॥

iti pṛṣṭaṁ bhavadbhiryattadeva kathitaṁ mayā tacchutvā sarvapāpebhyo mucyate nātra saṁśayaḥ

इस प्रकार जो आपने पूछा था, वही मैंने बता दिया; इसे सुनकर मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाता है, इसमें कोई संशय नहीं।

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