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उमा संहिता · अध्याय 11

अन्नदान-माहात्म्य का वर्णन

अध्याय 10अध्याय-सूचीअध्याय 12

श्लोक 1 (shiva.uma.11.1)

व्यास उवाच । कृतपापा नरा यान्ति दुःखेन महतान्विताः । यममार्गे सुखं यैश्च तान्धर्मान्वद मे प्रभो

vyāsa uvāca kṛtapāpā narā yānti duḥkhena mahatānvitāḥ yamamārge sukhaṁ yaiśca tāndharmānvada me prabho

व्यास जी ने कहा — पाप करने वाले मनुष्य महान दुःख से युक्त होकर यमलोक जाते हैं; हे प्रभो! उन धर्मों को भी बताइए जिनसे यम-मार्ग में सुख प्राप्त होता है।

श्लोक 2 (shiva.uma.11.2)

सनत्कुमार उवाच । अवश्यं हि कृतं कर्म भोक्तव्यमविचारतः । शुभाशुभमथो वक्ष्ये तान्धर्मान् सुखदायकान्

sanatkumāra uvāca avaśyaṁ hi kṛtaṁ karma bhoktavyamavicārataḥ śubhāśubhamatho vakṣye tāndharmān sukhadāyakān

सनत्कुमार जी ने कहा — किया हुआ कर्म चाहे शुभ हो या अशुभ, उसे बिना विचार किए अवश्य भोगना पड़ता है; अब मैं उन सुखदायी धर्मों का वर्णन करूँगा।

श्लोक 3 (shiva.uma.11.3)

अत्र ये शुभकर्माणः सौम्यचित्ता दयान्विताः । सुखेन ते नरा यान्ति यममार्गं भयावहम्

atra ye śubhakarmāṇaḥ saumyacittā dayānvitāḥ sukhena te narā yānti yamamārgaṁ bhayāvaham

जो पुरुष यहाँ शुभ कर्म करने वाले, सौम्य चित्त वाले और दया से युक्त होते हैं, वे उस भयावह यम-मार्ग पर भी सुखपूर्वक जाते हैं।

श्लोक 4 (shiva.uma.11.4)

यः प्रदद्याद् द्विजेन्द्राणामुपानत्काष्ठपादुके । स नरोऽश्वेन महता सुखं याति यमालयम्

yaḥ pradadyād dvijendrāṇāmupānatkāṣṭhapāduke sa naro'śvena mahatā sukhaṁ yāti yamālayam

जो श्रेष्ठ ब्राह्मणों को जूते या काठ की खड़ाऊँ दान करता है, वह पुरुष महान अश्व पर सवार होकर सुखपूर्वक यमलोक जाता है।

श्लोक 5 (shiva.uma.11.5)

छत्रदानेन गच्छन्ति यथा छत्रेण देहिनः । शिबिकायाः प्रदानेन तद्रथेन सुखं व्रजेत्

chatradānena gacchanti yathā chatreṇa dehinaḥ śibikāyāḥ pradānena tadrathena sukhaṁ vrajet

छत्र-दान से प्राणी वहाँ छत्र की छाया पाकर जाते हैं; पालकी के दान से वह उसी प्रकार के रथ पर सुखपूर्वक जाता है।

श्लोक 6 (shiva.uma.11.6)

शय्यासनप्रदानेन सुखं याति सुविश्रमम् । आरामच्छायाकर्तारो मार्गे वा वृक्षरोपकाः । व्रजन्ति यमलोकं च आतपेऽति गतक्लमाः

śayyāsanapradānena sukhaṁ yāti suviśramam ārāmacchāyākartāro mārge vā vṛkṣaropakāḥ vrajanti yamalokaṁ ca ātape'ti gataklamāḥ

शय्या और आसन के दान से सुखपूर्वक विश्राम करते हुए जाता है; जो उद्यान की छाया बनाते हैं या मार्ग में वृक्ष लगाते हैं, वे धूप में भी बिना थके यमलोक जाते हैं।

श्लोक 7 (shiva.uma.11.7)

यान्ति पुष्पकयानेन पुष्पारामकरा नराः । देवायतनकर्तारः क्रीडन्ति च गृहोदरे

yānti puṣpakayānena puṣpārāmakarā narāḥ devāyatanakartāraḥ krīḍanti ca gṛhodare

फूलों के उद्यान लगाने वाले पुरुष पुष्पक-विमान से जाते हैं; देवमंदिर बनवाने वाले [स्वर्ग के] भवनों में क्रीड़ा करते हैं।

श्लोक 8 (shiva.uma.11.8)

कर्तारश्च तथा ये च यतीनामाश्रमस्य च । अनाथमण्डपानां तु क्रीडन्ति च गृहोदरे

kartāraśca tathā ye ca yatīnāmāśramasya ca anāthamaṇḍapānāṁ tu krīḍanti ca gṛhodare

और इसी प्रकार जो यतियों के आश्रम तथा अनाथों के लिए मण्डप बनवाते हैं, वे भी भवनों में क्रीड़ा करते हैं।

श्लोक 9 (shiva.uma.11.9)

देवाग्निगुरुविप्राणां मातापित्रोश्च पूजकाः । पूज्यमाना नरा यान्ति कामुकेन यथासुखम्

devāgniguruviprāṇāṁ mātāpitrośca pūjakāḥ pūjyamānā narā yānti kāmukena yathāsukham

देवता, अग्नि, गुरु, ब्राह्मण तथा माता-पिता के पूजक स्वयं भी पूजे जाते हुए इच्छानुसार सुखपूर्वक जाते हैं।

श्लोक 10 (shiva.uma.11.10)

द्योतयन्तो दिशः सर्वा यान्ति दीपप्रदायिनः । प्रतिश्रयप्रदानेन सुखं यान्ति निरामयाः

dyotayanto diśaḥ sarvā yānti dīpapradāyinaḥ pratiśrayapradānena sukhaṁ yānti nirāmayāḥ

दीपदान करने वाले सभी दिशाओं को प्रकाशित करते हुए जाते हैं; आश्रय-दान से वे रोगरहित होकर सुखपूर्वक जाते हैं।

श्लोक 11 (shiva.uma.11.11)

विश्राम्यमाणा गच्छन्ति गुरुशुश्रूषका नराः । आतोद्यविप्रदातारः सुखं यान्ति स्वके गृहे

viśrāmyamāṇā gacchanti guruśuśrūṣakā narāḥ ātodyavipradātāraḥ sukhaṁ yānti svake gṛhe

गुरु-सेवा करने वाले पुरुष विश्राम करते हुए जाते हैं; वाद्य-यंत्र दान करने वाले मानो अपने ही घर में सुखपूर्वक जाते हैं।

श्लोक 12 (shiva.uma.11.12)

सर्वकामसमृद्धेन यथा गच्छन्ति गोप्रदाः । अत्र दत्तान्नपानानि तान्याप्नोति नरः पथि

sarvakāmasamṛddhena yathā gacchanti gopradāḥ atra dattānnapānāni tānyāpnoti naraḥ pathi

गौ-दान करने वाले मानो समस्त कामनाओं से समृद्ध होकर जाते हैं; इस लोक में दिया हुआ अन्न-पान उसे उसी मार्ग पर पुनः प्राप्त होता है।

श्लोक 13 (shiva.uma.11.13)

पादशौचप्रदानेन सजलेन पथा व्रजेत् । पादाभ्यङ्गं च यः कुर्यादश्वपृष्ठेन गच्छति

pādaśaucapradānena sajalena pathā vrajet pādābhyaṅgaṁ ca yaḥ kuryādaśvapṛṣṭhena gacchati

पैर धोने के लिए जल देने से वह जल-युक्त मार्ग से जाता है; और जो पैरों की मालिश करता है, वह अश्व की पीठ पर बैठकर जाता है।

श्लोक 14 (shiva.uma.11.14)

पादशौचं तथाभ्यङ्गं दीपमन्नं प्रतिश्रयम् । यो ददाति सदा व्यास नोपसर्पति तं यमः

pādaśaucaṁ tathābhyaṅgaṁ dīpamannaṁ pratiśrayam yo dadāti sadā vyāsa nopasarpati taṁ yamaḥ

हे व्यास! जो सदा पैर धोने का जल, पैरों की मालिश, दीपक, अन्न और आश्रय देता है, यम उसके निकट भी नहीं आता।

श्लोक 15 (shiva.uma.11.15)

हेमरत्नप्रदानेन याति दुर्गाणि निस्तरन् । रौप्यानडुत्प्रदानेन यमलोकं सुखेन सः

hemaratnapradānena yāti durgāṇi nistaran raupyānaḍutpradānena yamalokaṁ sukhena saḥ

सोना और रत्न दान करने से वह दुर्गम स्थानों को पार करता हुआ जाता है; चाँदी अथवा बैल के दान से वह सुखपूर्वक यमलोक जाता है।

श्लोक 16 (shiva.uma.11.16)

इत्येवमादिभिर्दानैः सुखं यान्ति यमालयम् । स्वर्गे तु विविधान्भोगान् प्राप्नुवन्ति सदा नराः

ityevamādibhirdānaiḥ sukhaṁ yānti yamālayam svarge tu vividhānbhogān prāpnuvanti sadā narāḥ

इस प्रकार के अन्य दानों से भी मनुष्य सुखपूर्वक यमलोक जाते हैं, और स्वर्ग में सदा विविध भोगों को प्राप्त करते हैं।

श्लोक 17 (shiva.uma.11.17)

सर्वेषामेव दानानामन्नदानं परं स्मृतम् । सद्यः प्रीतिकरं हृद्यं बलबुद्धिविवर्धनम्

sarveṣāmeva dānānāmannadānaṁ paraṁ smṛtam sadyaḥ prītikaraṁ hṛdyaṁ balabuddhivivardhanam

समस्त दानों में अन्नदान सर्वश्रेष्ठ माना गया है — यह तुरंत प्रीति उत्पन्न करने वाला, हृदय को प्रिय, तथा बल और बुद्धि को बढ़ाने वाला है।

श्लोक 18 (shiva.uma.11.18)

नान्नदानसमं दानं विद्यते मुनिसत्तम । अन्नाद्भवन्ति भूतानि तदभावे म्रियन्ति च

nānnadānasamaṁ dānaṁ vidyate munisattama annādbhavanti bhūtāni tadabhāve mriyanti ca

हे मुनिश्रेष्ठ! अन्नदान के समान कोई दान नहीं है; अन्न से ही प्राणी उत्पन्न होते हैं, और उसके अभाव में मर जाते हैं।

श्लोक 19 (shiva.uma.11.19)

रक्तं मांसं वसा शुक्रं क्रमादन्नात्प्रवर्धते । शुक्राद्भवन्ति भूतानि तस्मादन्नमयं जगत्

raktaṁ māṁsaṁ vasā śukraṁ kramādannātpravardhate śukrādbhavanti bhūtāni tasmādannamayaṁ jagat

अन्न से क्रमशः रक्त, मांस, वसा और शुक्र बढ़ते हैं; शुक्र से प्राणी उत्पन्न होते हैं, अतः यह संसार अन्नमय है।

श्लोक 20 (shiva.uma.11.20)

हेमरत्नाश्वनागेन्द्रैर्नारीस्रक्चन्दनादिभिः । समस्तैरपि सम्प्राप्तैर्न रमन्ति बुभुक्षिताः

hemaratnāśvanāgendrairnārīsrakcandanādibhiḥ samastairapi samprāptairna ramanti bubhukṣitāḥ

सोना, रत्न, अश्व, श्रेष्ठ हाथी, स्त्री, माला, चंदन आदि — यह सब कुछ मिलने पर भी भूखा प्राणी उनमें रमण नहीं कर पाता।

श्लोक 21 (shiva.uma.11.21)

गर्भस्था जायमानाश्च बालवृद्धाश्च मध्यमाः । आहारमभिकाङ्क्षन्ति देवदानवराक्षसाः

garbhasthā jāyamānāśca bālavṛddhāśca madhyamāḥ āhāramabhikāṅkṣanti devadānavarākṣasāḥ

गर्भस्थ, जन्म लेते हुए, बालक, वृद्ध, युवा — तथा देवता, दानव और राक्षस — सभी आहार की ही कामना करते हैं।

श्लोक 22 (shiva.uma.11.22)

क्षुधा निःशेषरोगाणां व्याधिः श्रेष्ठतमः स्मृतः । स चान्नौषधिलेपेन नश्यतीह न संशयः

kṣudhā niḥśeṣarogāṇāṁ vyādhiḥ śreṣṭhatamaḥ smṛtaḥ sa cānnauṣadhilepena naśyatīha na saṁśayaḥ

क्षुधा को समस्त रोगों में सबसे बड़ा व्याधि माना गया है, और वह निःसंदेह अन्नरूपी औषधि के लेप से ही नष्ट होती है।

श्लोक 23 (shiva.uma.11.23)

नास्ति क्षुधासमं दुःखं नास्ति रोगः क्षुधासमः । नास्त्यरोगसमं सौख्यं नास्ति क्रोधसमो रिपुः

nāsti kṣudhāsamaṁ duḥkhaṁ nāsti rogaḥ kṣudhāsamaḥ nāstyarogasamaṁ saukhyaṁ nāsti krodhasamo ripuḥ

भूख के समान कोई दुःख नहीं है, भूख के समान कोई रोग नहीं है; नीरोगता के समान कोई सुख नहीं है, क्रोध के समान कोई शत्रु नहीं है।

श्लोक 24 (shiva.uma.11.24)

अन्त एव महत्पुण्यमन्नदाने प्रकीर्तितम् । तथा क्षुधाग्निना तप्ता म्रियन्ते सर्वदेहिनः

anta eva mahatpuṇyamannadāne prakīrtitam tathā kṣudhāgninā taptā mriyante sarvadehinaḥ

इसीलिए अंततः अन्नदान में महान पुण्य कहा गया है, क्योंकि क्षुधा की अग्नि से संतप्त होकर समस्त प्राणी मर ही जाते हैं।

श्लोक 25 (shiva.uma.11.25)

अन्नदः प्राणदः प्रोक्तः प्राणदश्चापि सर्वदः । तस्मादन्नप्रदानेन सर्वदानफलं लभेत्

annadaḥ prāṇadaḥ proktaḥ prāṇadaścāpi sarvadaḥ tasmādannapradānena sarvadānaphalaṁ labhet

अन्नदाता को प्राणदाता कहा गया है, और प्राणदाता ही सब कुछ देने वाला है; इसलिए अन्नदान से समस्त दानों का फल प्राप्त होता है।

श्लोक 26 (shiva.uma.11.26)

यस्यान्नपानपुष्टाङ्गः कुरुते पुण्यसञ्चयम् । अन्नप्रदातुस्तस्यार्धं कर्तुश्चार्धं न संशयः

yasyānnapānapuṣṭāṅgaḥ kurute puṇyasañcayam annapradātustasyārdhaṁ kartuścārdhaṁ na saṁśayaḥ

जिसका शरीर अन्न-पान से पुष्ट होकर पुण्य-संचय करता है, उसके पुण्य का आधा भाग निःसंदेह अन्नदाता को और आधा भाग स्वयं करने वाले को मिलता है।

श्लोक 27 (shiva.uma.11.27)

त्रैलोक्ये यानि रत्नानि भोगस्त्रीवाहनानि च । अन्नदानप्रदः सर्वमिहामुत्र च तल्लभेत्

trailokye yāni ratnāni bhogastrīvāhanāni ca annadānapradaḥ sarvamihāmutra ca tallabhet

त्रिलोक में जो भी रत्न, भोग, स्त्रियाँ और वाहन हैं, वह सब अन्नदान करने वाला इस लोक और परलोक दोनों में प्राप्त करता है।

श्लोक 28 (shiva.uma.11.28)

धर्मार्थकाममोक्षाणां देहः परमसाधनम् । तस्मादन्नेन पानेन पालयेद्देहमात्मनः

dharmārthakāmamokṣāṇāṁ dehaḥ paramasādhanam tasmādannena pānena pālayeddehamātmanaḥ

धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का यह शरीर ही परम साधन है; इसलिए मनुष्य को अन्न-पान से अपने शरीर का पालन करना चाहिए।

श्लोक 29 (shiva.uma.11.29)

अन्नमेव प्रशंसन्ति सर्वमन्ने प्रतिष्ठितम् । अन्नेन सदृशं दानं न भूतं न भविष्यति

annameva praśaṁsanti sarvamanne pratiṣṭhitam annena sadṛśaṁ dānaṁ na bhūtaṁ na bhaviṣyati

लोग अन्न की ही प्रशंसा करते हैं, सब कुछ अन्न पर ही आधारित है; अन्न के समान कोई दान न हुआ है, न होगा।

श्लोक 30 (shiva.uma.11.30)

अन्नेन धार्यते सर्वं विश्वं जगदिदं मुने । अन्नमूर्जस्करं लोके प्राणा ह्यन्ने प्रतिष्ठिताः

annena dhāryate sarvaṁ viśvaṁ jagadidaṁ mune annamūrjaskaraṁ loke prāṇā hyanne pratiṣṭhitāḥ

हे मुने! यह सारा विश्व-जगत अन्न से ही धारण किया जाता है; अन्न ही लोक में शक्ति देने वाला है, क्योंकि प्राण अन्न पर ही आधारित हैं।

श्लोक 31 (shiva.uma.11.31)

दातव्यं भिक्षवे चान्नं ब्राह्मणाय महात्मने । कुटुम्बं पीडयित्वापि ह्यात्मनो भूतिमिच्छता

dātavyaṁ bhikṣave cānnaṁ brāhmaṇāya mahātmane kuṭumbaṁ pīḍayitvāpi hyātmano bhūtimicchatā

जो अपनी सच्ची समृद्धि चाहता है, उसे भिक्षुक तथा महात्मा ब्राह्मण को — अपने परिवार को कष्ट सहकर भी — अन्न देना चाहिए।

श्लोक 32 (shiva.uma.11.32)

विददाति निधिश्रेष्ठं यो दद्यादन्नमर्थिने । ब्राह्मणायार्तरूपाय पारलौकिकमात्मनः

vidadāti nidhiśreṣṭhaṁ yo dadyādannamarthine brāhmaṇāyārtarūpāya pāralaukikamātmanaḥ

जो याचक को या दुःखी दिखने वाले ब्राह्मण को अन्न देता है, वह अपने लिए परलोक का श्रेष्ठतम निधि प्राप्त कर लेता है।

श्लोक 33 (shiva.uma.11.33)

अर्चयेद्भूतिमन्विच्छन्काले द्विजमुपस्थितम् । श्रान्तमध्वनि वृत्त्यर्थं गृहस्थो गृहमागतम्

arcayedbhūtimanvicchankāle dvijamupasthitam śrāntamadhvani vṛttyarthaṁ gṛhastho gṛhamāgatam

अपनी समृद्धि चाहने वाला गृहस्थ, मार्ग से थके-हारे तथा जीविका के लिए घर आए हुए ब्राह्मण का उचित समय पर सत्कार करे।

श्लोक 34 (shiva.uma.11.34)

अन्नदः पूजयेद् व्यास सुशीलस्तु विमत्सरः । क्रोधमुत्पतितं हित्वा दिवि चेह महत्सुखम्

annadaḥ pūjayed vyāsa suśīlastu vimatsaraḥ krodhamutpatitaṁ hitvā divi ceha mahatsukham

हे व्यास! अन्नदाता सुशील और ईर्ष्यारहित होकर, उठते हुए क्रोध को त्यागकर अतिथि का सत्कार करे — इससे स्वर्ग और यहाँ दोनों जगह महान सुख मिलता है।

श्लोक 35 (shiva.uma.11.35)

नाभिनिन्देदधिगतं न प्रणुद्यात्कथञ्चन । अपि श्वपाके शुनि वा नान्नदानं प्रणश्यति

nābhinindedadhigataṁ na praṇudyātkathañcana api śvapāke śuni vā nānnadānaṁ praṇaśyati

प्राप्त हुए [अन्न] की निंदा न करे और किसी भी प्रकार से याचक को दुत्कारे नहीं; चाण्डाल को या कुत्ते को दिया गया अन्नदान भी कभी व्यर्थ नहीं जाता।

श्लोक 36 (shiva.uma.11.36)

श्रान्तायादृष्टपूर्वाय ह्यन्नमध्वनि वर्तते । यो दद्यादपरिक्लिष्टः स समृद्धिमवाप्नुयात

śrāntāyādṛṣṭapūrvāya hyannamadhvani vartate yo dadyādaparikliṣṭaḥ sa samṛddhimavāpnuyāta

जो व्यक्ति मार्ग में थके हुए, पहले कभी न देखे हुए अजनबी को बिना संकोच के अन्न देता है, वह समृद्धि प्राप्त करता है।

श्लोक 37 (shiva.uma.11.37)

पितॄन् देवांस्तथा विप्रानतिथींश्च महामुने । यो नरः प्रीणयत्यन्नैः तस्य पुण्यफलं महत्

pitṝn devāṁstathā viprānatithīṁśca mahāmune yo naraḥ prīṇayatyannaiḥ tasya puṇyaphalaṁ mahat

हे महामुने! जो पुरुष पितरों, देवताओं, ब्राह्मणों और अतिथियों को अन्न से तृप्त करता है, उसे महान पुण्यफल प्राप्त होता है।

श्लोक 38 (shiva.uma.11.38)

अन्नं पानं च शूद्रेऽपि ब्राह्मणे च विशिष्यते । न पृच्छेद्गोत्रचरणं स्वाध्यायं देशमेव च

annaṁ pānaṁ ca śūdre'pi brāhmaṇe ca viśiṣyate na pṛcchedgotracaraṇaṁ svādhyāyaṁ deśameva ca

शूद्र को अथवा ब्राह्मण को दिया गया अन्न-पान समान रूप से पुण्यकारी है; भूखे से गोत्र, आचार, स्वाध्याय अथवा देश नहीं पूछना चाहिए।

श्लोक 39 (shiva.uma.11.39)

भिक्षितो ब्राह्मणेनेह दद्यादन्नं च यः पुमान् । स याति परमं स्वर्गं यावदाभूतसम्प्लवम्

bhikṣito brāhmaṇeneha dadyādannaṁ ca yaḥ pumān sa yāti paramaṁ svargaṁ yāvadābhūtasamplavam

जो पुरुष यहाँ ब्राह्मण द्वारा माँगे जाने पर अन्न देता है, वह प्रलयकाल तक परम स्वर्ग में निवास करता है।

श्लोक 40 (shiva.uma.11.40)

अन्नदस्य च वृक्षाश्च सर्वकामफलान्विताः । भवन्तीह यथा विप्रा हर्षयुक्तास्त्रिविष्टपे

annadasya ca vṛkṣāśca sarvakāmaphalānvitāḥ bhavantīha yathā viprā harṣayuktāstriviṣṭape

अन्नदाता के लिए वहाँ सर्वकाम-फलदायी वृक्ष उत्पन्न होते हैं, जैसे ब्राह्मणजन स्वर्ग में हर्षयुक्त होकर रहते हैं।

श्लोक 41 (shiva.uma.11.41)

अन्नदानेन ये लोकाः स्वर्गे विरचिता मुने । अन्नदातुर्महादिव्यास्तान् शृणुष्व महामुने

annadānena ye lokāḥ svarge viracitā mune annadāturmahādivyāstān śṛṇuṣva mahāmune

हे महामुने! अन्नदान से स्वर्ग में जो लोक रचे गए हैं, अन्नदाता के उन महादिव्य लोकों को सुनिए।

श्लोक 42 (shiva.uma.11.42)

भवनानि प्रकाशन्ते दिवि तेषां महात्मनाम् । नानासंस्थानरूपाणि नानाकामान्वितानि च

bhavanāni prakāśante divi teṣāṁ mahātmanām nānāsaṁsthānarūpāṇi nānākāmānvitāni ca

उन महात्माओं के भवन स्वर्ग में अनेक प्रकार की आकृतियों तथा समस्त कामनाओं से युक्त होकर प्रकाशित होते हैं।

श्लोक 43 (shiva.uma.11.43)

सर्वकामफलाश्चापि वृक्षा भवनसंस्थिताः । हेमवाप्यः शुभाः कूपा दीर्घिकाश्चैव सर्वशः

sarvakāmaphalāścāpi vṛkṣā bhavanasaṁsthitāḥ hemavāpyaḥ śubhāḥ kūpā dīrghikāścaiva sarvaśaḥ

उन भवनों में सर्वकाम-फलदायी वृक्ष, सुवर्णमयी बावड़ियाँ, शुभ कुएँ और सब ओर सरोवर स्थित हैं।

श्लोक 44 (shiva.uma.11.44)

घोषयन्ति च पानानि शुभान्यथ सहस्रशः । भक्ष्यभोज्यमयाः शैला वासांस्याभरणानि च

ghoṣayanti ca pānāni śubhānyatha sahasraśaḥ bhakṣyabhojyamayāḥ śailā vāsāṁsyābharaṇāni ca

वहाँ हजारों शुभ पेय पदार्थ मिलते हैं, तथा भक्ष्य-भोज्य पदार्थों के पर्वत, वस्त्र और आभूषण भी।

श्लोक 45 (shiva.uma.11.45)

क्षीरं स्रवन्त्यः सरितस्तथैवाज्यस्य पर्वताः । प्रासादाः पाण्डुराभासाः शय्याश्च कनकोज्ज्वलाः

kṣīraṁ sravantyaḥ saritastathaivājyasya parvatāḥ prāsādāḥ pāṇḍurābhāsāḥ śayyāśca kanakojjvalāḥ

दूध बहाती हुई नदियाँ तथा घी के पर्वत हैं; श्वेत आभा वाले प्रासाद और स्वर्ण से चमकती हुई शय्याएँ हैं।

श्लोक 46 (shiva.uma.11.46)

तानन्नदाश्च गच्छन्ति तस्मादन्नप्रदो भवेत् । यदीच्छेदात्मनो भव्यमिह लोके परत्र च

tānannadāśca gacchanti tasmādannaprado bhavet yadīcchedātmano bhavyamiha loke paratra ca

उन लोकों में अन्नदाता ही जाते हैं। इसलिए इस लोक और परलोक में अपना कल्याण चाहने वाले को अन्नदाता बनना चाहिए।

श्लोक 47 (shiva.uma.11.47)

एते लोकाः पुण्यकृतामन्नदानां महाप्रभाः । तस्मादन्नं विशेषेण दातव्यं मानवैर्ध्रुवम्

ete lokāḥ puṇyakṛtāmannadānāṁ mahāprabhāḥ tasmādannaṁ viśeṣeṇa dātavyaṁ mānavairdhruvam

अन्नदान करने वाले पुण्यात्माओं के ये महातेजस्वी लोक हैं। इसलिए मनुष्यों को विशेष रूप से निश्चित रूप से अन्नदान करना चाहिए।

श्लोक 48 (shiva.uma.11.48)

अन्नं प्रजापतिः साक्षादन्नं विष्णुः स्वयं हरः । तस्मादन्नसमं दानं न भूतं न भविष्यति

annaṁ prajāpatiḥ sākṣādannaṁ viṣṇuḥ svayaṁ haraḥ tasmādannasamaṁ dānaṁ na bhūtaṁ na bhaviṣyati

अन्न साक्षात् प्रजापति है, अन्न विष्णु है, अन्न स्वयं शिव है; इसलिए अन्न के समान कोई दान न हुआ है, न होगा।

श्लोक 49 (shiva.uma.11.49)

कृत्वापि सुमहत्पापं यः पश्चादन्नदो भवेत् । विमुक्तः सर्वपापेभ्यः स्वर्गलोकं स गच्छति

kṛtvāpi sumahatpāpaṁ yaḥ paścādannado bhavet vimuktaḥ sarvapāpebhyaḥ svargalokaṁ sa gacchati

अत्यंत बड़ा पाप करके भी जो बाद में अन्नदाता बन जाता है, वह समस्त पापों से मुक्त होकर स्वर्गलोक जाता है।

श्लोक 50 (shiva.uma.11.50)

अन्नपानाश्वगोवस्त्रशय्याच्छत्रासनानि च । प्रेतलोके प्रशस्तानि दानान्यष्टौ विशेषतः

annapānāśvagovastraśayyācchatrāsanāni ca pretaloke praśastāni dānānyaṣṭau viśeṣataḥ

अन्न, जल, अश्व, गौ, वस्त्र, शय्या, छत्र और आसन — ये आठ दान प्रेतलोक में विशेष रूप से प्रशस्त माने गए हैं।

श्लोक 51 (shiva.uma.11.51)

एवं दानविशेषेण धर्मराजपुरं नरः । यस्माद्याति विमानेन तस्माद्दानं समाचरेत्

evaṁ dānaviśeṣeṇa dharmarājapuraṁ naraḥ yasmādyāti vimānena tasmāddānaṁ samācaret

इस प्रकार विशेष दान के प्रभाव से मनुष्य विमान द्वारा धर्मराज की नगरी को जाता है; इसलिए दान का आचरण करना चाहिए।

श्लोक 52 (shiva.uma.11.52)

एतदाख्यानमनघमन्नदानप्रभावतः । यः पठेत्पाठयेदन्यान्स समृद्धः प्रजायते

etadākhyānamanaghamannadānaprabhāvataḥ yaḥ paṭhetpāṭhayedanyānsa samṛddhaḥ prajāyate

अन्नदान के प्रभाव का यह पवित्र आख्यान जो पढ़ता है अथवा दूसरों को पढ़ाता है, वह समृद्धिशाली होता है।

श्लोक 53 (shiva.uma.11.53)

शृणुयाच्छ्रावयेच्छ्राद्धे ब्राह्मणान्यो महामुने । अक्षय्यमन्नदानं च पितॄणामुपतिष्ठति

śṛṇuyācchrāvayecchrāddhe brāhmaṇānyo mahāmune akṣayyamannadānaṁ ca pitṝṇāmupatiṣṭhati

हे महामुने! जो श्राद्ध में इसे सुनता है या ब्राह्मणों को सुनाता है, उसके लिए पितरों को दिया गया अन्नदान अक्षय हो जाता है।

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