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उमा संहिता · अध्याय 13

पुराण-माहात्म्य का वर्णन

अध्याय 12अध्याय-सूचीअध्याय 14

श्लोक 1 (shiva.uma.13.1)

सनत्कुमार उवाच । तपस्तपति योऽरण्ये वन्यमूलफलाशनः । योऽधीते ऋचमेकां हि फलं स्यात्तत्समं मुने

sanatkumāra uvāca tapastapati yo'raṇye vanyamūlaphalāśanaḥ yo'dhīte ṛcamekāṁ hi phalaṁ syāttatsamaṁ mune

सनत्कुमार जी ने कहा — हे मुने! जो वन में कंद-मूल-फल खाकर तप करता है, और जो केवल एक ऋचा का अध्ययन करता है — दोनों का फल समान होता है।

श्लोक 2 (shiva.uma.13.2)

श्रुतेरध्ययनात्पुण्यं यदाप्नोति द्विजोत्तमः । तदध्यापनतश्चापि द्विगुणं फलमश्नुते

śruteradhyayanātpuṇyaṁ yadāpnoti dvijottamaḥ tadadhyāpanataścāpi dviguṇaṁ phalamaśnute

श्रुति के अध्ययन से श्रेष्ठ द्विज जो पुण्य प्राप्त करता है, उसे दूसरों को पढ़ाने से उसका दुगुना फल प्राप्त होता है।

श्लोक 3 (shiva.uma.13.3)

जगद्यथा निरालोकं जायतेऽशशिभास्करम् । विना तथा पुराणं ह्यध्येयमस्मान्मुने सदा

jagadyathā nirālokaṁ jāyate'śaśibhāskaram vinā tathā purāṇaṁ hyadhyeyamasmānmune sadā

हे मुने! जैसे चंद्रमा और सूर्य के बिना संसार प्रकाशरहित हो जाता है, वैसे ही पुराण के बिना [ज्ञान का जगत् अंधकारमय हो जाता है]; इसलिए इसका अध्ययन सदा करना चाहिए।

श्लोक 4 (shiva.uma.13.4)

तप्यमानं सदाज्ञानान्निरये योऽपि शास्त्रतः । सम्बोधयति लोकं तं तस्मात् पूज्यः पुराणगः

tapyamānaṁ sadājñānānniraye yo'pi śāstrataḥ sambodhayati lokaṁ taṁ tasmāt pūjyaḥ purāṇagaḥ

जो शास्त्र के द्वारा अज्ञान से सदा संतप्त नरक में पड़े लोगों को सम्यक बोध देता है, इसलिए पुराण का पाठ करने वाला पूज्य है।

श्लोक 5 (shiva.uma.13.5)

सर्वेषां चैव पात्राणां मध्ये श्रेष्ठः पुराणवित् । पतनात् त्रायते यस्मात् तस्मात्पात्रमुदाहृतम्

sarveṣāṁ caiva pātrāṇāṁ madhye śreṣṭhaḥ purāṇavit patanāt trāyate yasmāt tasmātpātramudāhṛtam

समस्त पात्रों में पुराण-वेत्ता ही श्रेष्ठ है; क्योंकि वह लोगों को पतन से बचाता है, इसीलिए उसे सर्वोत्तम पात्र कहा गया है।

श्लोक 6 (shiva.uma.13.6)

मर्त्यबुद्धिर्न कर्तव्या पुराणज्ञे कदाचन । पुराणज्ञः सर्ववेत्ता ब्रह्मा विष्णुर्हरो गुरुः

martyabuddhirna kartavyā purāṇajñe kadācana purāṇajñaḥ sarvavettā brahmā viṣṇurharo guruḥ

पुराण-ज्ञाता के प्रति कभी भी मर्त्य (साधारण मनुष्य) की बुद्धि नहीं रखनी चाहिए; पुराण-ज्ञाता सर्वज्ञ है, वह ब्रह्मा, विष्णु, हर और गुरु के समान है।

श्लोक 7 (shiva.uma.13.7)

धनं धान्यं हिरण्यं च वासांसि विविधानि च । देयं पुराणविज्ञाय परत्रेह च शर्मणे

dhanaṁ dhānyaṁ hiraṇyaṁ ca vāsāṁsi vividhāni ca deyaṁ purāṇavijñāya paratreha ca śarmaṇe

धन, धान्य, सुवर्ण तथा विविध वस्त्र — यह सब पुराण-ज्ञाता को इस लोक तथा परलोक में अपने कल्याण के लिए देना चाहिए।

श्लोक 8 (shiva.uma.13.8)

यो ददाति महाप्रीत्या पुराणज्ञाय सज्जनः । पात्राय शुभवस्तूनि स याति परमां गतिम्

yo dadāti mahāprītyā purāṇajñāya sajjanaḥ pātrāya śubhavastūni sa yāti paramāṁ gatim

जो सज्जन पुराण-ज्ञाता रूपी पात्र को अत्यंत प्रेम से शुभ वस्तुएँ देता है, वह परम गति को प्राप्त होता है।

श्लोक 9 (shiva.uma.13.9)

महीं गां वा स्यन्दनांश्च गजानश्वांश्च शोभनान् । यः प्रयच्छति पात्राय तस्य पुण्यफलं शृणु

mahīṁ gāṁ vā syandanāṁśca gajānaśvāṁśca śobhanān yaḥ prayacchati pātrāya tasya puṇyaphalaṁ śṛṇu

जो पृथ्वी, गौ, रथ, हाथी अथवा सुंदर घोड़े उस पात्र को दान करता है, उसके पुण्यफल को सुनो।

श्लोक 10 (shiva.uma.13.10)

अक्षयान्सर्वकामांश्च परत्रेह च जन्मनि । अश्वमेधमखस्यापि स फलं लभते पुमान्

akṣayānsarvakāmāṁśca paratreha ca janmani aśvamedhamakhasyāpi sa phalaṁ labhate pumān

वह पुरुष इस लोक तथा अगले जन्म में अक्षय समस्त कामनाओं को प्राप्त करता है, और अश्वमेध यज्ञ का फल भी प्राप्त करता है।

श्लोक 11 (shiva.uma.13.11)

महीं ददाति यस्तस्मै कृष्टां फलवतीं शुभाम् । स तारयति वै वंश्यान्दश पूर्वान् दशापरान्

mahīṁ dadāti yastasmai kṛṣṭāṁ phalavatīṁ śubhām sa tārayati vai vaṁśyāndaśa pūrvān daśāparān

जो उसे जुती हुई, फलदायी, शुभ भूमि दान करता है, वह अपने दस पीढ़ी पहले और दस पीढ़ी बाद के वंशजों को तार देता है।

श्लोक 12 (shiva.uma.13.12)

इह भुक्त्वाखिलान् कामानन्ते दिव्यशरीरवान् । विमानेन च दिव्येन शिवलोकं स गच्छति

iha bhuktvākhilān kāmānante divyaśarīravān vimānena ca divyena śivalokaṁ sa gacchati

यहाँ समस्त कामनाओं को भोगकर, अंत में दिव्य शरीर धारण कर, वह दिव्य विमान द्वारा शिवलोक जाता है।

श्लोक 13 (shiva.uma.13.13)

न यज्ञैस्तुष्टिमायान्ति देवाः प्रोक्षणकैरपि । बलिभिः पुष्पपूजाभिर्यथा पुस्तकवाचनैः

na yajñaistuṣṭimāyānti devāḥ prokṣaṇakairapi balibhiḥ puṣpapūjābhiryathā pustakavācanaiḥ

देवता यज्ञों से, प्रोक्षण-कर्मों से, बलियों से या पुष्प-पूजाओं से भी उतनी तुष्टि नहीं पाते, जितनी पुस्तक-वाचन (शास्त्र-पाठ) से पाते हैं।

श्लोक 14 (shiva.uma.13.14)

शम्भोरायतने यस्तु कारयेद्धर्मपुस्तकम् । विष्णोरर्कस्य कस्यापि शृणु तस्यापि तत्फलम्

śambhorāyatane yastu kārayeddharmapustakam viṣṇorarkasya kasyāpi śṛṇu tasyāpi tatphalam

जो शंभु, विष्णु, सूर्य अथवा किसी भी देवता के मंदिर में धर्म-ग्रंथ लिखवाता है, उसका फल भी सुनो।

श्लोक 15 (shiva.uma.13.15)

राजसूयाश्वमेधानां फलमाप्नोति मानवः । सूर्यलोकं च भित्त्वाशु ब्रह्मलोकं स गच्छति

rājasūyāśvamedhānāṁ phalamāpnoti mānavaḥ sūryalokaṁ ca bhittvāśu brahmalokaṁ sa gacchati

वह मनुष्य राजसूय और अश्वमेध यज्ञों का फल प्राप्त करता है; वह शीघ्र ही सूर्यलोक को पार कर ब्रह्मलोक जाता है।

श्लोक 16 (shiva.uma.13.16)

स्थित्वा कल्पशतान्यत्र राजा भवति भूतले । भुङ्क्ते निष्कण्टकं भोगान्नात्र कार्या विचारणा

sthitvā kalpaśatānyatra rājā bhavati bhūtale bhuṅkte niṣkaṇṭakaṁ bhogānnātra kāryā vicāraṇā

वहाँ सैकड़ों कल्पों तक रहकर वह पृथ्वी पर राजा बनता है, और निष्कंटक भोगों को भोगता है — इसमें कोई संदेह नहीं करना चाहिए।

श्लोक 17 (shiva.uma.13.17)

अश्वमेधसहस्रस्य यत्फलं समुदाहृतम् । तत्फलं समावाप्नोति देवाग्रे यो जपं चरेत्

aśvamedhasahasrasya yatphalaṁ samudāhṛtam tatphalaṁ samāvāpnoti devāgre yo japaṁ caret

जो देवता के सम्मुख जप करता है, उसे वही फल प्राप्त होता है जो सहस्र अश्वमेध यज्ञों का फल बताया गया है।

श्लोक 18 (shiva.uma.13.18)

इतिहासपुराणाभ्यां शम्भोरायतने शुभे । नान्यत्प्रीतिकरं शम्भोस्तथान्येषां दिवौकसाम्

itihāsapurāṇābhyāṁ śambhorāyatane śubhe nānyatprītikaraṁ śambhostathānyeṣāṁ divaukasām

शंभु के शुभ मंदिर में इतिहास और पुराण के समान शंभु को तथा अन्य स्वर्गवासियों को भी और कुछ प्रिय नहीं है।

श्लोक 19 (shiva.uma.13.19)

तस्मात्सर्वप्रयत्नेन कार्यं पुस्तकवाचनम् । तथास्य श्रवणं प्रेम्णा सर्वकामफलप्रदम्

tasmātsarvaprayatnena kāryaṁ pustakavācanam tathāsya śravaṇaṁ premṇā sarvakāmaphalapradam

इसलिए पूरे प्रयत्न से पुस्तक-वाचन करना चाहिए, और उसी प्रकार प्रेमपूर्वक उसे सुनना चाहिए — यह समस्त कामनाओं के फल देने वाला है।

श्लोक 20 (shiva.uma.13.20)

पुराणश्रवणात् शम्भोर्निष्पापो जायते नरः । भुक्त्वा भोगान् सुविपुलान् शिवलोकमवाप्नुयात्

purāṇaśravaṇāt śambhorniṣpāpo jāyate naraḥ bhuktvā bhogān suvipulān śivalokamavāpnuyāt

शंभु के पुराण के श्रवण से मनुष्य पापरहित हो जाता है; विपुल भोगों को भोगकर वह शिवलोक को प्राप्त होता है।

श्लोक 21 (shiva.uma.13.21)

राजसूयेन यत्पुण्यमग्निष्टोमशतेन च । तत्पुण्यं लभते शम्भोः कथाश्रवणमात्रतः

rājasūyena yatpuṇyamagniṣṭomaśatena ca tatpuṇyaṁ labhate śambhoḥ kathāśravaṇamātrataḥ

राजसूय यज्ञ से तथा सौ अग्निष्टोम यज्ञों से जो पुण्य होता है, वह पुण्य केवल शंभु की कथा सुनने मात्र से प्राप्त हो जाता है।

श्लोक 22 (shiva.uma.13.22)

सर्वतीर्थावगाहेन गवां कोटिप्रदानतः । तत् फलं लभते शम्भोः कथाश्रवणतो मुने

sarvatīrthāvagāhena gavāṁ koṭipradānataḥ tat phalaṁ labhate śambhoḥ kathāśravaṇato mune

हे मुने! समस्त तीर्थों में स्नान करने और करोड़ों गौओं के दान से जो फल मिलता है, वह फल शंभु की कथा सुनने से प्राप्त होता है।

श्लोक 23 (shiva.uma.13.23)

ये शृण्वन्ति कथां शम्भोः सदा भुवनपावनीम् । ते मनुष्या न मन्तव्या रुद्रा एव न संशयः

ye śṛṇvanti kathāṁ śambhoḥ sadā bhuvanapāvanīm te manuṣyā na mantavyā rudrā eva na saṁśayaḥ

जो सदा जगत्-पावनी शंभु की कथा को सुनते हैं, उन्हें साधारण मनुष्य नहीं मानना चाहिए — वे साक्षात् रुद्र ही हैं, इसमें संशय नहीं।

श्लोक 24 (shiva.uma.13.24)

शृण्वतां शिवसत्कीर्तिं सतां कीर्तयतां च ताम् । पादाम्बुजरजांस्येव तीर्थानि मुनयो विदुः

śṛṇvatāṁ śivasatkīrtiṁ satāṁ kīrtayatāṁ ca tām pādāmbujarajāṁsyeva tīrthāni munayo viduḥ

शिव की सत्कीर्ति को सुनने वाले और कीर्तन करने वाले सज्जनों के चरण-कमलों की धूलि को ही मुनि तीर्थ मानते हैं।

श्लोक 25 (shiva.uma.13.25)

गन्तुं निःश्रेयसं स्थानं येऽभिवाञ्छन्ति देहिनः । कथां पौराणिकीं शैवीं भक्त्या शृण्वन्तु ते सदा

gantuṁ niḥśreyasaṁ sthānaṁ ye'bhivāñchanti dehinaḥ kathāṁ paurāṇikīṁ śaivīṁ bhaktyā śṛṇvantu te sadā

जो प्राणी परम कल्याण के स्थान को प्राप्त करना चाहते हैं, उन्हें सदा भक्तिपूर्वक शिव की पौराणिक कथा सुननी चाहिए।

श्लोक 26 (shiva.uma.13.26)

कथां पौराणिकीं श्रोतुं यद्यशक्तः सदा भवेत् । नियतात्मा प्रतिदिनं शृणुयाद्वा मुहूर्तकम्

kathāṁ paurāṇikīṁ śrotuṁ yadyaśaktaḥ sadā bhavet niyatātmā pratidinaṁ śṛṇuyādvā muhūrtakam

यदि कोई पौराणिक कथा सुनने में सदा असमर्थ हो, तो उसे नियमित रूप से कम से कम प्रतिदिन थोड़ी देर के लिए भी सुनना चाहिए।

श्लोक 27 (shiva.uma.13.27)

यदि प्रतिदिनं श्रोतुमशक्तो मानवो भवेत् । पुण्यमासादिषु मुने शृणुयाच्छाङ्करीं कथाम्

yadi pratidinaṁ śrotumaśakto mānavo bhavet puṇyamāsādiṣu mune śṛṇuyācchāṅkarīṁ kathām

हे मुने! यदि मनुष्य प्रतिदिन सुनने में असमर्थ हो, तो उसे पुण्य महीनों आदि में शांकरी कथा अवश्य सुननी चाहिए।

श्लोक 28 (shiva.uma.13.28)

शैवीं कथां हि शृण्वानः पुरुषो हि मुनीश्वर । स निस्तरति संसारं दग्ध्वा कर्ममहाटवीम्

śaivīṁ kathāṁ hi śṛṇvānaḥ puruṣo hi munīśvara sa nistarati saṁsāraṁ dagdhvā karmamahāṭavīm

हे मुनीश्वर! जो पुरुष शैव कथा को सुनता है, वह कर्मों के महावन को जलाकर संसार से पार हो जाता है।

श्लोक 29 (shiva.uma.13.29)

कथां शैवीं मुहूर्तं वा तदर्धं वा क्षणं च वा । ये शृण्वन्ति नरा भक्त्या न तेषां दुर्गतिर्भवेत्

kathāṁ śaivīṁ muhūrtaṁ vā tadardhaṁ vā kṣaṇaṁ ca vā ye śṛṇvanti narā bhaktyā na teṣāṁ durgatirbhavet

जो मनुष्य भक्तिपूर्वक शैव कथा को एक मुहूर्त, अथवा उसके आधे समय, अथवा केवल एक क्षण भी सुनते हैं, उनकी दुर्गति नहीं होती।

श्लोक 30 (shiva.uma.13.30)

यत्पुण्यं सर्वदानेषु सर्वयज्ञेषु वा मुने । शम्भोः पुराणश्रवणात्तत्फलं निश्चलं भवेत्

yatpuṇyaṁ sarvadāneṣu sarvayajñeṣu vā mune śambhoḥ purāṇaśravaṇāttatphalaṁ niścalaṁ bhavet

हे मुने! समस्त दानों और समस्त यज्ञों में जो पुण्य है, वह फल शंभु के पुराण-श्रवण से अटल हो जाता है।

श्लोक 31 (shiva.uma.13.31)

विशेषतः कलौ व्यास पुराणश्रवणादृते । परो धर्मो न पुंसां हि मुक्तिध्यानपरः स्मृतः

viśeṣataḥ kalau vyāsa purāṇaśravaṇādṛte paro dharmo na puṁsāṁ hi muktidhyānaparaḥ smṛtaḥ

हे व्यास! विशेषतः कलियुग में, पुराण-श्रवण के अतिरिक्त, मनुष्यों के लिए मुक्ति के ध्यान में तत्पर कोई अन्य श्रेष्ठ धर्म नहीं माना गया है।

श्लोक 32 (shiva.uma.13.32)

पुराणश्रवणं शम्भोर्नामसङ्कीर्तनं तथा । कल्पद्रुमफलं रम्यं मनुष्याणां न संशयः

purāṇaśravaṇaṁ śambhornāmasaṅkīrtanaṁ tathā kalpadrumaphalaṁ ramyaṁ manuṣyāṇāṁ na saṁśayaḥ

शंभु के पुराण का श्रवण तथा उनके नामों का संकीर्तन — यह मनुष्यों के लिए साक्षात् कल्पवृक्ष का ही सुंदर फल है, इसमें संशय नहीं।

श्लोक 33 (shiva.uma.13.33)

कलौ दुर्मेधसां पुंसां धर्माचारोज्झितात्मनाम् । हिताय विदधे शम्भुः पुराणाख्यं सुधारसम्

kalau durmedhasāṁ puṁsāṁ dharmācārojjhitātmanām hitāya vidadhe śambhuḥ purāṇākhyaṁ sudhārasam

कलियुग में धर्माचार से भ्रष्ट, दुर्बुद्धि मनुष्यों के हित के लिए शंभु ने पुराण नामक अमृत-रस की रचना की।

श्लोक 34 (shiva.uma.13.34)

एकोऽजरामरः स्याद्वै पिबन्नेवामृतं पुमान् । शम्भोः कथामृतापानात् कुलमेवाजरामरम्

eko'jarāmaraḥ syādvai pibannevāmṛtaṁ pumān śambhoḥ kathāmṛtāpānāt kulamevājarāmaram

अमृत पीने वाला मनुष्य स्वयं अकेला ही अजर-अमर होता है, परंतु शंभु की कथा-रूपी अमृत का पान करने से संपूर्ण कुल ही अजर-अमर हो जाता है।

श्लोक 35 (shiva.uma.13.35)

या गतिः पुण्यशीलानां यज्विनां च तपस्विनाम् । सा गतिः सहसा तात पुराणश्रवणात्खलु

yā gatiḥ puṇyaśīlānāṁ yajvināṁ ca tapasvinām sā gatiḥ sahasā tāta purāṇaśravaṇātkhalu

हे तात! पुण्यशील, यज्ञ करने वाले और तपस्वी जनों की जो गति होती है, वही गति पुराण-श्रवण से शीघ्र ही प्राप्त हो जाती है।

श्लोक 36 (shiva.uma.13.36)

ज्ञानावाप्तिर्यदा न स्याद्योगशास्त्राणि यत्नतः । अध्येतव्यानि पौराणं शास्त्रं श्रोतव्यमेव च

jñānāvāptiryadā na syādyogaśāstrāṇi yatnataḥ adhyetavyāni paurāṇaṁ śāstraṁ śrotavyameva ca

जब [साक्षात्] ज्ञान की प्राप्ति संभव न हो, तब योगशास्त्रों का यत्नपूर्वक अध्ययन करना चाहिए; और इसी प्रकार पौराणिक शास्त्र भी अवश्य सुनना चाहिए।

श्लोक 37 (shiva.uma.13.37)

पापं सङ्क्षीयते नित्यं धर्मश्चैव विवर्धते । पुराणश्रवणाज्ज्ञानी न संसारं प्रपद्यते

pāpaṁ saṅkṣīyate nityaṁ dharmaścaiva vivardhate purāṇaśravaṇājjñānī na saṁsāraṁ prapadyate

इससे पाप सदा क्षीण होता है और धर्म बढ़ता है; पुराण-श्रवण से ज्ञानी पुरुष पुनः संसार में नहीं पड़ता।

श्लोक 38 (shiva.uma.13.38)

अतएव पुराणानि श्रोतव्यानि प्रयत्नतः । धर्मार्थकामलाभाय मोक्षमार्गाप्तये तथा

ataeva purāṇāni śrotavyāni prayatnataḥ dharmārthakāmalābhāya mokṣamārgāptaye tathā

इसलिए धर्म, अर्थ और काम की प्राप्ति के लिए, तथा मोक्ष-मार्ग को पाने के लिए भी, पुराणों को यत्नपूर्वक सुनना चाहिए।

श्लोक 39 (shiva.uma.13.39)

यज्ञैर्दानैस्तपोभिस्तु यत्फलं तीर्थसेवया । तत्फलं समवाप्नोति पुराणश्रवणान्नरः

yajñairdānaistapobhistu yatphalaṁ tīrthasevayā tatphalaṁ samavāpnoti purāṇaśravaṇānnaraḥ

यज्ञों, दानों, तपों तथा तीर्थ-सेवा से जो फल मिलता है, मनुष्य वही फल पुराण-श्रवण से प्राप्त कर लेता है।

श्लोक 40 (shiva.uma.13.40)

न भवेयुः पुराणानि धर्ममार्गेक्षणानि तु । यद्यत्र यद् व्रती स्थाता कोऽत्र पारत्रिकीं कथाम्

na bhaveyuḥ purāṇāni dharmamārgekṣaṇāni tu yadyatra yad vratī sthātā ko'tra pāratrikīṁ kathām

यदि धर्म-मार्ग को दिखाने वाले पुराण न होते, तो यहाँ व्रतपालन में स्थित रहने वाला भी परलोक की कथा को कैसे जान पाता?

श्लोक 41 (shiva.uma.13.41)

षड्विंशति पुराणानां मध्येऽप्येकं शृणोति यः । पठेद्वा भक्तियुक्तस्तु स मुक्तो नात्र संशयः

ṣaḍviṁśati purāṇānāṁ madhye'pyekaṁ śṛṇoti yaḥ paṭhedvā bhaktiyuktastu sa mukto nātra saṁśayaḥ

जो छब्बीस पुराणों में से एक को भी भक्तिपूर्वक सुनता है या पढ़ता है, वह मुक्त हो जाता है, इसमें कोई संशय नहीं।

श्लोक 42 (shiva.uma.13.42)

अन्यो न दृष्टः सुखदो हि मार्गः पुराणमार्गो हि सदा वरिष्ठः । शास्त्रं विना सर्वमिदं न भाति सूर्येण हीना इव जीवलोकाः

anyo na dṛṣṭaḥ sukhado hi mārgaḥ purāṇamārgo hi sadā variṣṭhaḥ śāstraṁ vinā sarvamidaṁ na bhāti sūryeṇa hīnā iva jīvalokāḥ

इससे बढ़कर सुखदायी कोई अन्य मार्ग नहीं देखा गया — पुराण-मार्ग ही सदा सर्वश्रेष्ठ है। शास्त्र के बिना यह सब कुछ वैसे ही प्रकाशहीन है, जैसे सूर्य से रहित संसार।

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