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उमा संहिता · अध्याय 14

सामान्य दान का वर्णन

अध्याय 13अध्याय-सूचीअध्याय 15

श्लोक 1 (shiva.uma.14.1)

सनत्कुमार उवाच । शस्तानि घोरदानानि महादानानि नित्यशः । पात्रेभ्यस्तु प्रदेयानि आत्मानं तारयन्ति च

sanatkumāra uvāca śastāni ghoradānāni mahādānāni nityaśaḥ pātrebhyastu pradeyāni ātmānaṁ tārayanti ca

सनत्कुमार जी ने कहा — घोर पापों को भी नष्ट करने वाले महादान सदा प्रशंसनीय हैं, जो सुपात्रों को दिए जाने चाहिए; वे दाता को स्वयं तार देते हैं।

श्लोक 2 (shiva.uma.14.2)

हिरण्यदानं गोदानं भूमिदानं द्विजोत्तम । गृह्णन्तो वै पवित्राणि तारयन्ति स्वमेव तम्

hiraṇyadānaṁ godānaṁ bhūmidānaṁ dvijottama gṛhṇanto vai pavitrāṇi tārayanti svameva tam

हे द्विजोत्तम! सुवर्ण-दान, गौ-दान तथा भूमि-दान — इन पवित्र दानों को ग्रहण करने वाले ही उस दाता को तार देते हैं।

श्लोक 3 (shiva.uma.14.3)

सुवर्णदानं गोदानं पृथिवीदानमेव च । एतानि श्रेष्ठदानानि कृत्वा पापैः प्रमुच्यते

suvarṇadānaṁ godānaṁ pṛthivīdānameva ca etāni śreṣṭhadānāni kṛtvā pāpaiḥ pramucyate

सुवर्ण-दान, गौ-दान तथा पृथ्वी-दान — इन श्रेष्ठ दानों को करके मनुष्य पापों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 4 (shiva.uma.14.4)

तुलादानानि शस्तानि गावः पृथ्वी सरस्वती । द्वे तु तुल्यबले शस्ते ह्यधिका च सरस्वती

tulādānāni śastāni gāvaḥ pṛthvī sarasvatī dve tu tulyabale śaste hyadhikā ca sarasvatī

तुला पर तौले जाने योग्य दान प्रशंसित हैं — गौ, पृथ्वी तथा सरस्वती (विद्या); इनमें से दो का बल तो समान बताया गया है, परंतु सरस्वती का दान उनसे भी अधिक है।

श्लोक 5 (shiva.uma.14.5)

नित्य ह्यनुडुहो गावच्छत्रं वस्त्रमुपानहौ । देयानि याचमानेभ्यः पानमन्नं तथैव च

nitya hyanuḍuho gāvacchatraṁ vastramupānahau deyāni yācamānebhyaḥ pānamannaṁ tathaiva ca

बैल-गौएँ, छत्र, वस्त्र और जूते सदा याचकों को देने चाहिए, तथा इसी प्रकार जल और अन्न भी।

श्लोक 6 (shiva.uma.14.6)

सङ्कल्पविहितो योऽर्थो ब्राह्मणेभ्यः प्रदीयते । अर्थिभ्योऽपीडितेभ्यश्च मनस्वी तेन जायते

saṅkalpavihito yo'rtho brāhmaṇebhyaḥ pradīyate arthibhyo'pīḍitebhyaśca manasvī tena jāyate

संकल्पपूर्वक निश्चित किया गया जो धन ब्राह्मणों को तथा पीड़ारहित याचकों को दिया जाता है, उससे मनुष्य उदार-हृदय बनता है।

श्लोक 7 (shiva.uma.14.7)

कनकं च तिला नागाः कन्या दासी गृहं रथः । मणयः कपिला गावो महादानानि वै दश

kanakaṁ ca tilā nāgāḥ kanyā dāsī gṛhaṁ rathaḥ maṇayaḥ kapilā gāvo mahādānāni vai daśa

सुवर्ण, तिल, हाथी, कन्या, दासी, घर, रथ, मणि तथा कपिला गाय — ये दस महादान हैं।

श्लोक 8 (shiva.uma.14.8)

गृहीत्वैतानि सर्वाणि ब्राह्मणो ज्ञानवित्सदा । वदान्यांस्तारयेत्सद्यो ह्यात्मानं च न संशयः

gṛhītvaitāni sarvāṇi brāhmaṇo jñānavitsadā vadānyāṁstārayetsadyo hyātmānaṁ ca na saṁśayaḥ

इन सबको ग्रहण करके ज्ञानवान ब्राह्मण सदा उदार दाता को और स्वयं को भी तत्काल तार देता है, इसमें कोई संशय नहीं।

श्लोक 9 (shiva.uma.14.9)

सुवर्णं ये प्रयच्छन्ति नराः शुद्धेन चेतसा । देवतास्तं प्रयच्छन्ति समन्तादिति मे श्रुतम्

suvarṇaṁ ye prayacchanti narāḥ śuddhena cetasā devatāstaṁ prayacchanti samantāditi me śrutam

जो मनुष्य शुद्ध चित्त से सुवर्ण दान करते हैं, मैंने सुना है कि देवता भी सब ओर से उन्हें प्रदान करते हैं।

श्लोक 10 (shiva.uma.14.10)

अग्निर्हि देवताः सर्वाः सुवर्णं च हुताशनः । तस्मात् सुवर्णं दत्त्वा च दत्ताः स्युः सर्वदेवताः

agnirhi devatāḥ sarvāḥ suvarṇaṁ ca hutāśanaḥ tasmāt suvarṇaṁ dattvā ca dattāḥ syuḥ sarvadevatāḥ

अग्नि ही समस्त देवता हैं, और सुवर्ण भी अग्नि ही है; इसलिए सुवर्ण दान करने से समस्त देवताओं को दान दिया हुआ माना जाता है।

श्लोक 11 (shiva.uma.14.11)

पृथ्वीदानं महाश्रेष्ठं सर्वकामफलप्रदम् । सौवर्णं च विशेषेण यत्कृतं पृथुना पुरा

pṛthvīdānaṁ mahāśreṣṭhaṁ sarvakāmaphalapradam sauvarṇaṁ ca viśeṣeṇa yatkṛtaṁ pṛthunā purā

पृथ्वी-दान अत्यंत श्रेष्ठ और सर्वकामना-फलदायी है, विशेषतः सुवर्णमयी पृथ्वी का दान, जैसा कि प्राचीन काल में राजा पृथु ने किया था।

श्लोक 12 (shiva.uma.14.12)

दीयमानां प्रपश्यन्ति पृथ्वीं रुक्मसमन्विताम् । सर्वपापविनिर्मुक्तास्ते यान्ति परमां गतिम्

dīyamānāṁ prapaśyanti pṛthvīṁ rukmasamanvitām sarvapāpavinirmuktāste yānti paramāṁ gatim

जो लोग सुवर्ण से युक्त पृथ्वी को दान में दिए जाते हुए देखते हैं, वे भी समस्त पापों से मुक्त होकर परम गति को प्राप्त होते हैं।

श्लोक 13 (shiva.uma.14.13)

अथान्यच्च प्रवक्ष्यामि दानं सर्वोत्तमं मुने । कान्तारं यन्न पश्यन्ति यमस्य बहुदुःखदम्

athānyacca pravakṣyāmi dānaṁ sarvottamaṁ mune kāntāraṁ yanna paśyanti yamasya bahuduḥkhadam

हे मुने! अब मैं एक और सर्वोत्तम दान बताऊँगा, जिसके प्रभाव से मनुष्य यम के अत्यंत दुःखदायी विशाल वन को नहीं देखता।

श्लोक 14 (shiva.uma.14.14)

कुर्यात् कान्तारदानं हि विधिना शुद्धमानसः । न्यायार्जितेन द्रव्येण वित्तशाठ्यविवर्जितः

kuryāt kāntāradānaṁ hi vidhinā śuddhamānasaḥ nyāyārjitena dravyeṇa vittaśāṭhyavivarjitaḥ

शुद्ध मन वाला, धन के प्रति कंजूसी से रहित पुरुष न्यायपूर्वक अर्जित धन से विधिपूर्वक 'कान्तार-दान' करे।

श्लोक 15 (shiva.uma.14.15)

तिलप्रस्थमयीं कृत्वा धेनुं सर्वगुणान्विताम् । धेनुवत्सं सुवर्णं च सुदिव्यं सर्वलक्षणम्

tilaprasthamayīṁ kṛtvā dhenuṁ sarvaguṇānvitām dhenuvatsaṁ suvarṇaṁ ca sudivyaṁ sarvalakṣaṇam

तिलों से बनी हुई, समस्त गुणों से युक्त, बछड़े सहित एक गाय, तथा सुवर्ण की एक अत्यंत दिव्य, सर्वलक्षणयुक्त गाय भी बनवाकर,

श्लोक 16 (shiva.uma.14.16)

पद्ममष्टदलं कृत्वा कुङ्कुमाक्ताक्षतैः शुभैः । पूजयेत्तत्र रुद्रादीन्सर्वान्देवान्सुभक्तितः

padmamaṣṭadalaṁ kṛtvā kuṅkumāktākṣataiḥ śubhaiḥ pūjayettatra rudrādīnsarvāndevānsubhaktitaḥ

आठ पंखुड़ियों वाला कमल बनाकर, केसर से रँगे हुए शुभ अक्षतों से वहाँ रुद्र आदि समस्त देवताओं का भक्तिपूर्वक पूजन करे।

श्लोक 17 (shiva.uma.14.17)

एवं सम्पूज्य तां दद्याद् ब्राह्मणाय स्वशक्तितः । सरत्नां सहिरण्यां च सर्वाभरणभूषिताम्

evaṁ sampūjya tāṁ dadyād brāhmaṇāya svaśaktitaḥ saratnāṁ sahiraṇyāṁ ca sarvābharaṇabhūṣitām

इस प्रकार पूजन करके अपनी सामर्थ्य के अनुसार उस गाय को रत्नों, सुवर्ण और समस्त आभूषणों से सजाकर ब्राह्मण को दान दे।

श्लोक 18 (shiva.uma.14.18)

ततो नक्तं समश्नीयाद्दीपान् दद्यात्तु विस्तरात् । कार्तिक्यामिति कर्तव्यं पूर्णिमायां प्रयत्नतः

tato naktaṁ samaśnīyāddīpān dadyāttu vistarāt kārtikyāmiti kartavyaṁ pūrṇimāyāṁ prayatnataḥ

फिर रात्रि में एक बार भोजन करे और यथाशक्ति दीपदान करे — यह सब कार्तिक की पूर्णिमा को पूरे प्रयत्न से करना चाहिए।

श्लोक 19 (shiva.uma.14.19)

एवं यः कुरुते सम्यग्विधानेन स्वशक्तितः । यममार्गभयं घोरं नरकं च न पश्यति

evaṁ yaḥ kurute samyagvidhānena svaśaktitaḥ yamamārgabhayaṁ ghoraṁ narakaṁ ca na paśyati

जो इस प्रकार विधिपूर्वक अपनी सामर्थ्य के अनुसार करता है, उसे यम-मार्ग का भयंकर भय और नरक दिखाई नहीं देते।

श्लोक 20 (shiva.uma.14.20)

कृत्वा पापान्यशेषाणि सबन्धुः ससुहृज्जनः । दिवि सङ्क्रीडते व्यास यावदिन्द्राश्चतुर्दश

kṛtvā pāpānyaśeṣāṇi sabandhuḥ sasuhṛjjanaḥ divi saṅkrīḍate vyāsa yāvadindrāścaturdaśa

हे व्यास! समस्त पाप करके भी वह अपने बंधु-बांधवों और मित्रों सहित चौदह इन्द्रों के काल तक स्वर्ग में क्रीड़ा करता है।

श्लोक 21 (shiva.uma.14.21)

विधितो गोश्च दानं वै सर्वोत्तममिह स्मृतम् । न तेन सदृशं व्यास परं दानं प्रकीर्तितम्

vidhito gośca dānaṁ vai sarvottamamiha smṛtam na tena sadṛśaṁ vyāsa paraṁ dānaṁ prakīrtitam

विधिपूर्वक किया गया गौ-दान ही यहाँ सर्वश्रेष्ठ माना गया है; हे व्यास! उसके समान कोई श्रेष्ठ दान नहीं कहा गया है।

श्लोक 22 (shiva.uma.14.22)

प्रयच्छते यः कपिलां सवत्सां स्वर्णशृङ्गिकाम् । कांस्यपात्रां रौप्यखुरां सर्वलक्षणलक्षिताम्

prayacchate yaḥ kapilāṁ savatsāṁ svarṇaśṛṅgikām kāṁsyapātrāṁ raupyakhurāṁ sarvalakṣaṇalakṣitām

जो पुरुष बछड़े सहित कपिला गाय — जिसके सींग सोने के हों, जो काँसे के पात्र में दुही जाए, जिसके खुर चाँदी के हों, तथा जो समस्त शुभ लक्षणों से युक्त हो — दान करता है,

श्लोक 23 (shiva.uma.14.23)

तैस्तैर्गुणैः कामदुघा भूत्वा सा गौरुपैति तम् । प्रदातारं नरं व्यास परत्रेह च जन्मनि

taistairguṇaiḥ kāmadughā bhūtvā sā gaurupaiti tam pradātāraṁ naraṁ vyāsa paratreha ca janmani

हे व्यास! वह गाय उन्हीं गुणों के कारण कामधेनु बनकर, उस दाता पुरुष के पास इस लोक तथा अगले जन्म में भी आ पहुँचती है।

श्लोक 24 (shiva.uma.14.24)

यद्यदिष्टतमं लोके तदस्ति दयितं गृहे । तत्तद् गुणवते देयं तदेवाक्षयमिच्छता

yadyadiṣṭatamaṁ loke tadasti dayitaṁ gṛhe tattad guṇavate deyaṁ tadevākṣayamicchatā

संसार में जो भी वस्तु सर्वाधिक प्रिय हो, जो घर में सबसे प्यारी हो, अक्षय फल चाहने वाले को वही वस्तु सुयोग्य पात्र को देनी चाहिए।

श्लोक 25 (shiva.uma.14.25)

तुलापुरुषदानं हि दानानां दानमुत्तमम् । तुलासंरोहणं कार्यं यदीच्छेच्छ्रेय आत्मनः

tulāpuruṣadānaṁ hi dānānāṁ dānamuttamam tulāsaṁrohaṇaṁ kāryaṁ yadīcchecchreya ātmanaḥ

तुलापुरुष-दान ही समस्त दानों में सबसे श्रेष्ठ दान है; जो अपना कल्याण चाहे, उसे तुला पर चढ़ने का यह कार्य करना चाहिए।

श्लोक 26 (shiva.uma.14.26)

यत्कृत्वा मुच्यते पापैर्वधबन्धकृतोद्भवैः । तुलादानं महत्पुण्यं सर्वपापक्षयङ्करम्

yatkṛtvā mucyate pāpairvadhabandhakṛtodbhavaiḥ tulādānaṁ mahatpuṇyaṁ sarvapāpakṣayaṅkaram

इसे करने से मनुष्य वध और बंधन से उत्पन्न पापों से भी मुक्त हो जाता है; तुला-दान महान पुण्यकारी और समस्त पापों का नाश करने वाला है।

श्लोक 27 (shiva.uma.14.27)

कृत्वा पापान्यशेषाणि तुलादानं करोति यः । सर्वैस्तु पातकैर्मुक्तः स दिवं यात्यसंशयम्

kṛtvā pāpānyaśeṣāṇi tulādānaṁ karoti yaḥ sarvaistu pātakairmuktaḥ sa divaṁ yātyasaṁśayam

समस्त पाप करके भी जो पुरुष तुला-दान करता है, वह समस्त पापों से मुक्त होकर निःसंदेह स्वर्ग जाता है।

श्लोक 28 (shiva.uma.14.28)

पापं कृतं यद्दिवसे निशायां द्विसन्ध्ययोर्मध्यदिने निशान्ते । कालत्रये कायमनोवचोभिः तुलापुमान्वै तदपाकरोति

pāpaṁ kṛtaṁ yaddivase niśāyāṁ dvisandhyayormadhyadine niśānte kālatraye kāyamanovacobhiḥ tulāpumānvai tadapākaroti

"दिन में, रात में, दोनों संध्याओं में, मध्याह्न में, रात्रि के अंत में, तथा भूत-भविष्य-वर्तमान तीनों कालों में शरीर, मन और वाणी से जो पाप किया गया है, उसे यह तुलापुरुष दूर कर देता है।"

श्लोक 29 (shiva.uma.14.29)

बालेन वृद्धेन मया हि यूना विजानता ज्ञानपरेण पापम् । तत्सर्वमेवाशु कृतं मदीयं तुलापुमान् वै हरतु स्मरारिः

bālena vṛddhena mayā hi yūnā vijānatā jñānapareṇa pāpam tatsarvamevāśu kṛtaṁ madīyaṁ tulāpumān vai haratu smarāriḥ

"बालक, वृद्ध अथवा युवा रहते हुए, जानते-बूझते या ज्ञान में तत्पर रहते हुए भी मैंने जो पाप शीघ्र किया हो, उस सबको यह तुलापुरुष तथा कामारि शिव हर लें।"

श्लोक 30 (shiva.uma.14.30)

पात्रे प्रयुक्तं द्रविणं मयाद्य प्रमाणपूर्णं निहितं तुलायाम् । तेनैव सार्धं तु ममावशेषं कृताकृतं यत्सुकृतं समेतु

pātre prayuktaṁ draviṇaṁ mayādya pramāṇapūrṇaṁ nihitaṁ tulāyām tenaiva sārdhaṁ tu mamāvaśeṣaṁ kṛtākṛtaṁ yatsukṛtaṁ sametu

"आज मैंने जो धन पूरे प्रमाण में तुला पर रखकर सुपात्र को अर्पित किया है, उसी के साथ मेरा जो भी शेष पुण्य, किया या अनकिया, हो, वह सब मुझे प्राप्त हो।"

श्लोक 31 (shiva.uma.14.31)

सनत्कुमार उवाच । एवमुच्चार्य तं दद्यात् द्विजेभ्यः सर्वदा हितः । नैकस्यापि प्रदातव्यं न निस्तारस्ततो भवेत्

sanatkumāra uvāca evamuccārya taṁ dadyāt dvijebhyaḥ sarvadā hitaḥ naikasyāpi pradātavyaṁ na nistārastato bhavet

सनत्कुमार जी ने कहा — इस प्रकार उच्चारण करके सदा हितैषी पुरुष उस धन को ब्राह्मणों को [बाँटकर] दे; उसे किसी एक को ही न दे, अन्यथा उससे उद्धार नहीं होता।

श्लोक 32 (shiva.uma.14.32)

ददात्येवं तु यो व्यास तुलापुरुषमुत्तमम् । हत्वा पापं दिव्यं तिष्ठेद्यावदिन्द्राश्चतुर्दश

dadātyevaṁ tu yo vyāsa tulāpuruṣamuttamam hatvā pāpaṁ divyaṁ tiṣṭhedyāvadindrāścaturdaśa

हे व्यास! जो इस प्रकार उत्तम तुलापुरुष-दान करता है, वह अपने पाप को नष्ट करके चौदह इन्द्रों के काल तक दिव्य लोक में निवास करता है।

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