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उमा संहिता · अध्याय 17

जम्बूद्वीप-वर्ष वर्णन

अध्याय 16अध्याय-सूचीअध्याय 18

श्लोक 1 (shiva.uma.17.1)

सनत्कुमार उवाच । पाराशर्य सुसङ्क्षेपाच्छृणु त्वं वदतो मम । मण्डलं च भुवः सम्यक् सप्तद्वीपादिसंयुतम्

sanatkumāra uvāca pārāśarya susaṅkṣepācchṛṇu tvaṁ vadato mama maṇḍalaṁ ca bhuvaḥ samyak saptadvīpādisaṁyutam

सनत्कुमार जी ने कहा -- हे पाराशर्य! अब सुनो, मैं तुम्हें संक्षेप में सातों द्वीपों सहित पृथ्वी के मण्डल का सम्यक् वर्णन करता हूँ।

श्लोक 2 (shiva.uma.17.2)

जम्बूः प्लक्षः शाल्मलिश्च कुशः क्रौञ्चश्च शाककः । पुष्करः सप्तमः सर्वे समुद्रैः सप्तभिर्वृताः

jambūḥ plakṣaḥ śālmaliśca kuśaḥ krauñcaśca śākakaḥ puṣkaraḥ saptamaḥ sarve samudraiḥ saptabhirvṛtāḥ

जम्बू, प्लक्ष, शाल्मलि, कुश, क्रौञ्च और शाक, तथा सातवाँ पुष्कर -- ये सभी द्वीप सात समुद्रों से घिरे हुए हैं।

श्लोक 3 (shiva.uma.17.3)

लवणेक्षुरसौ सर्पिर्दधिदुग्धजलाशयाः । जम्बुद्वीपः समस्तानामेतेषां मध्यतः स्थितः

lavaṇekṣurasau sarpirdadhidugdhajalāśayāḥ jambudvīpaḥ samastānāmeteṣāṁ madhyataḥ sthitaḥ

वे समुद्र क्रमशः लवण, इक्षुरस, घृत, दधि, दुग्ध और मीठे जल के हैं; जम्बूद्वीप इन सबके ठीक मध्य में स्थित है।

श्लोक 4 (shiva.uma.17.4)

तस्यापि मेरुः कालेय मध्ये कनकपर्वतः । प्रविष्टः षोडशाधस्ताद्योजनैस्तस्य चोच्छ्रयः

tasyāpi meruḥ kāleya madhye kanakaparvataḥ praviṣṭaḥ ṣoḍaśādhastādyojanaistasya cocchrayaḥ

हे काल्येय! उस जम्बूद्वीप के मध्य में स्वर्णमय मेरु पर्वत है, जो सोलह हजार योजन पृथ्वी में धँसा हुआ है, और उसकी ऊँचाई --

श्लोक 5 (shiva.uma.17.5)

चतुरशीतिमानैस्तैर्द्वात्रिंशन्मूर्ध्नि विस्तृतः । भूमिपृष्ठस्थशैलोऽयं विस्तरस्तस्य सर्वतः

caturaśītimānaistairdvātriṁśanmūrdhni vistṛtaḥ bhūmipṛṣṭhasthaśailo'yaṁ vistarastasya sarvataḥ

-- चौरासी हजार योजन है तथा शिखर पर उसका विस्तार बत्तीस हजार योजन है; पृथ्वी की सतह पर स्थित इस पर्वत का विस्तार सब ओर आगे बताया गया है।

श्लोक 6 (shiva.uma.17.6)

मूले षोडशसाहस्त्र कर्णिकाकारसंस्थितः । हिमवान् हेमकूटश्च निषधश्चास्य दक्षिणे

mūle ṣoḍaśasāhastra karṇikākārasaṁsthitaḥ himavān hemakūṭaśca niṣadhaścāsya dakṣiṇe

मूल में यह सोलह हजार योजन विस्तृत है और कमल की कर्णिका के समान आकार का है; इसके दक्षिण में हिमवान्, हेमकूट और निषध पर्वत हैं।

श्लोक 7 (shiva.uma.17.7)

नीलः श्वेतश्च शृङ्गी च उत्तरे वर्षपर्वताः । दशसाहस्रिका ह्येते रत्नवन्तोऽरुणप्रभाः

nīlaḥ śvetaśca śṛṅgī ca uttare varṣaparvatāḥ daśasāhasrikā hyete ratnavanto'ruṇaprabhāḥ

उत्तर में नील, श्वेत और शृंगी नामक वर्ष-पर्वत हैं; ये सभी दस-दस हजार योजन के हैं, रत्नमय और अरुण-आभा वाले हैं।

श्लोक 8 (shiva.uma.17.8)

सहस्रयोजनोत्सेधास्तावद्विस्तारिणश्च ते । भारतं प्रथमं वर्षं ततः किम्पुरुषं स्मृतम्

sahasrayojanotsedhāstāvadvistāriṇaśca te bhārataṁ prathamaṁ varṣaṁ tataḥ kimpuruṣaṁ smṛtam

ये पर्वत एक हजार योजन ऊँचे और उतने ही चौड़े हैं; इनसे आगे प्रथम वर्ष भारत कहलाता है, उसके बाद किम्पुरुष कहा गया है।

श्लोक 9 (shiva.uma.17.9)

हरिवर्षं ततोऽन्यद्वै मेरोर्दक्षिणतो मुने । रम्यकं चोत्तरे पार्श्वे तस्यांशे तु हिरण्मयम्

harivarṣaṁ tato'nyadvai merordakṣiṇato mune ramyakaṁ cottare pārśve tasyāṁśe tu hiraṇmayam

हे मुने! उससे आगे मेरु के दक्षिण में हरिवर्ष है; उत्तर की ओर रम्यक है, और उसके भी उस पार हिरण्मय वर्ष है।

श्लोक 10 (shiva.uma.17.10)

उत्तरे कुरवश्चैव यथा वै भारतं तथा । नवसाहस्रमेकैकमेतेषां मुनिसत्तम

uttare kuravaścaiva yathā vai bhārataṁ tathā navasāhasramekaikameteṣāṁ munisattama

उत्तर में कुरु-वर्ष है, जो भारत के समान ही विस्तार वाला है; हे मुनिश्रेष्ठ! इनमें से प्रत्येक नौ-नौ हजार योजन का है।

श्लोक 11 (shiva.uma.17.11)

इलावृतं तु तन्मध्ये तन्मध्ये मेरुरुच्छ्रितः । मेरोश्चतुर्दिशं तत्र नवसाहस्रमुच्छ्रितम्

ilāvṛtaṁ tu tanmadhye tanmadhye merurucchritaḥ meroścaturdiśaṁ tatra navasāhasramucchritam

इनके बीचोंबीच इलावृत वर्ष है और उसके भी मध्य में मेरु पर्वत ऊँचा खड़ा है; मेरु से चारों दिशाओं में यह वर्ष नौ-नौ हजार योजन तक फैला है।

श्लोक 12 (shiva.uma.17.12)

इलावृतमृषिश्रेष्ठ चत्वारश्चात्र पर्वताः । विष्कम्भा रचिता मेरोर्योजिताः पुनरुच्छ्रिताः

ilāvṛtamṛṣiśreṣṭha catvāraścātra parvatāḥ viṣkambhā racitā meroryojitāḥ punarucchritāḥ

हे ऋषिश्रेष्ठ! इस इलावृत वर्ष में चार पर्वत हैं, जो मेरु के आधार-स्तंभ के रूप में रचे गए हैं और उससे जुड़े हुए ऊँचे उठे हैं।

श्लोक 13 (shiva.uma.17.13)

पूर्वे हि मन्दरो नाम दक्षिणे गन्धमादनः । विपुलः पश्चिमे भागे सुपार्श्वश्चोत्तरे स्थितः

pūrve hi mandaro nāma dakṣiṇe gandhamādanaḥ vipulaḥ paścime bhāge supārśvaścottare sthitaḥ

पूर्व में मन्दर नामक पर्वत है, दक्षिण में गन्धमादन है; पश्चिम दिशा में विपुल है और उत्तर में सुपार्श्व स्थित है।

श्लोक 14 (shiva.uma.17.14)

कदम्बो जम्बुवृक्षश्च पिप्पलो वट एव च । एकादशशतायामाः पादपा गिरिकेतवः

kadambo jambuvṛkṣaśca pippalo vaṭa eva ca ekādaśaśatāyāmāḥ pādapā giriketavaḥ

कदम्ब, जम्बू वृक्ष, पीपल और वट -- ये वृक्ष, प्रत्येक ग्यारह सौ योजन विस्तार वाले, इन पर्वतों की ध्वजा के समान सुशोभित हैं।

श्लोक 15 (shiva.uma.17.15)

जम्बूद्वीपस्य नाम्नो वै हेतुं शृणु महामुने । विराजन्ते महावृक्षास्तत्स्वभावं वदामि ते

jambūdvīpasya nāmno vai hetuṁ śṛṇu mahāmune virājante mahāvṛkṣāstatsvabhāvaṁ vadāmi te

हे महामुने! अब जम्बूद्वीप के नाम का कारण सुनो; ये महान वृक्ष वहाँ शोभायमान हैं, मैं उनका स्वभाव तुम्हें बताता हूँ।

श्लोक 16 (shiva.uma.17.16)

महागजप्रमाणानि जम्ब्वास्तस्याः फलानि च । पतन्ति भूभृतः पृष्ठे शीर्यमाणानि सर्वतः

mahāgajapramāṇāni jambvāstasyāḥ phalāni ca patanti bhūbhṛtaḥ pṛṣṭhe śīryamāṇāni sarvataḥ

उस जम्बू वृक्ष के फल विशाल गजराज के समान बड़े होते हैं, और वे पर्वत की चोटी पर गिरकर सब ओर बिखर जाते हैं।

श्लोक 17 (shiva.uma.17.17)

रसेन तेषां विख्याता तत्र जम्बूनदीति वै । परितो वर्तते तत्र पीयते तन्निवासिभिः

rasena teṣāṁ vikhyātā tatra jambūnadīti vai parito vartate tatra pīyate tannivāsibhiḥ

उनके रस से वहाँ जम्बू नदी नाम से प्रसिद्ध एक नदी बहती है, जो सब ओर घूमती है और वहाँ के निवासियों द्वारा पी जाती है।

श्लोक 18 (shiva.uma.17.18)

न स्वेदो न च दौर्गन्ध्यं न जरा चेन्द्रियग्रहः । तस्यास्तटे स्थितानां तु जनानां तन्न जायते

na svedo na ca daurgandhyaṁ na jarā cendriyagrahaḥ tasyāstaṭe sthitānāṁ tu janānāṁ tanna jāyate

उस नदी के तट पर रहने वाले लोगों को न पसीना आता है, न दुर्गन्ध होती है, न बुढ़ापा सताता है और न ही इन्द्रियों का क्षय होता है।

श्लोक 19 (shiva.uma.17.19)

तीरमृत्स्नां च सम्प्राप्य सुखवायुविशोषिताम् । जाम्बूनदाख्यं भवति सुवर्णं सिद्धभूषणम्

tīramṛtsnāṁ ca samprāpya sukhavāyuviśoṣitām jāmbūnadākhyaṁ bhavati suvarṇaṁ siddhabhūṣaṇam

उसके तट की मिट्टी, जब सुखद वायु से सूख जाती है, तो जाम्बूनद नामक स्वर्ण बन जाती है, जो सिद्धों का आभूषण है।

श्लोक 20 (shiva.uma.17.20)

भद्राश्वं पूर्वतो मेरोः केतुमालं च पश्चिमे । वर्षे द्वे तु मुनिश्रेष्ठ तयोर्मध्य इलावृतम्

bhadrāśvaṁ pūrvato meroḥ ketumālaṁ ca paścime varṣe dve tu muniśreṣṭha tayormadhya ilāvṛtam

मेरु के पूर्व में भद्राश्व वर्ष है और पश्चिम में केतुमाल; हे मुनिश्रेष्ठ! इन दोनों वर्षों के बीच इलावृत स्थित है।

श्लोक 21 (shiva.uma.17.21)

वनं चैत्ररथं पूर्वे दक्षिणे गन्धमादनः । विभ्राजं पश्चिमे तद्वदुत्तरे नन्दनं स्मृतम्

vanaṁ caitrarathaṁ pūrve dakṣiṇe gandhamādanaḥ vibhrājaṁ paścime tadvaduttare nandanaṁ smṛtam

पूर्व में चैत्ररथ नामक वन है, दक्षिण में गन्धमादन वन है; उसी प्रकार पश्चिम में विभ्राज वन है और उत्तर में नन्दन वन कहा गया है।

श्लोक 22 (shiva.uma.17.22)

अरुणोदं महाभद्रं शीतोदं मानसं स्मृतम् । सरांस्येतानि चत्वारि देवभोग्यानि सर्वशः

aruṇodaṁ mahābhadraṁ śītodaṁ mānasaṁ smṛtam sarāṁsyetāni catvāri devabhogyāni sarvaśaḥ

अरुणोद, महाभद्र, शीतोद और मानस -- ये चार सरोवर देवताओं के भोग के लिए हैं।

श्लोक 23 (shiva.uma.17.23)

शीताञ्जनः कुरुङ्गश्च कुररो माल्यवांस्तथा । एकैकप्रमुखा मेरोः पूर्वतः केसराचलाः

śītāñjanaḥ kuruṅgaśca kuraro mālyavāṁstathā ekaikapramukhā meroḥ pūrvataḥ kesarācalāḥ

शीताञ्जन, कुरुंग, कुरर तथा माल्यवान् -- ये मेरु के पूर्व में स्थित केसर-पर्वतों में प्रमुख हैं।

श्लोक 24 (shiva.uma.17.24)

त्रिकूटः शिशिरश्चैव पतङ्गो रुचकस्तथा । निषधः कपिलाद्याश्च दक्षिणे केसराचलाः

trikūṭaḥ śiśiraścaiva pataṅgo rucakastathā niṣadhaḥ kapilādyāśca dakṣiṇe kesarācalāḥ

त्रिकूट, शिशिर, पतंग तथा रुचक, निषध, कपिल आदि -- ये दक्षिण दिशा के केसर-पर्वत हैं।

श्लोक 25 (shiva.uma.17.25)

सिनीवासः कुसुम्भश्च कपिलो नारदस्तथा । नागादयश्च गिरयः पश्चिमे केसराचलाः

sinīvāsaḥ kusumbhaśca kapilo nāradastathā nāgādayaśca girayaḥ paścime kesarācalāḥ

सिनीवास, कुसुम्भ, कपिल तथा नारद, नाग आदि पर्वत -- ये पश्चिम दिशा के केसर-पर्वत हैं।

श्लोक 26 (shiva.uma.17.26)

शङ्खचूडोऽथ ऋषभो हंसो नाम महीधरः । कालञ्जराद्याश्च तथा उत्तरे केसराचलाः

śaṅkhacūḍo'tha ṛṣabho haṁso nāma mahīdharaḥ kālañjarādyāśca tathā uttare kesarācalāḥ

शंखचूड, ऋषभ, हंस नामक पर्वत तथा कालंजर आदि -- ये उत्तर दिशा के केसर-पर्वत हैं।

श्लोक 27 (shiva.uma.17.27)

मेरोरुपरि मध्ये हि शातकौम्भं विधेः पुरम् । चतुर्दशसहस्राणि योजनानि च सङ्ख्यया

merorupari madhye hi śātakaumbhaṁ vidheḥ puram caturdaśasahasrāṇi yojanāni ca saṅkhyayā

मेरु के ऊपर बीचोंबीच ब्रह्मा जी की स्वर्णमयी पुरी है, जो चौदह हजार योजन विस्तार की है।

श्लोक 28 (shiva.uma.17.28)

अष्टानां लोकपालानां परितस्तदनुक्रमात् । यथादिशं यथारूपं पुरोऽष्टावुपकल्पिताः

aṣṭānāṁ lokapālānāṁ paritastadanukramāt yathādiśaṁ yathārūpaṁ puro'ṣṭāvupakalpitāḥ

उसके चारों ओर, क्रमानुसार, दिशा और स्वरूप के अनुरूप, आठों लोकपालों की आठ पुरियाँ बसाई गई हैं।

श्लोक 29 (shiva.uma.17.29)

तस्यां च ब्रह्मणः पुर्यां प्लावयित्वेन्दुमण्डलम् । विष्णुपादविनिष्क्रान्ता गङ्गा पतति वै नदी

tasyāṁ ca brahmaṇaḥ puryāṁ plāvayitvendumaṇḍalam viṣṇupādaviniṣkrāntā gaṅgā patati vai nadī

ब्रह्मा जी की उस पुरी में, चन्द्रमण्डल को आप्लावित करती हुई, विष्णु के चरणों से निकली हुई गंगा नदी गिरती है।

श्लोक 30 (shiva.uma.17.30)

सीता चालकनन्दा च चक्षुर्भद्रा च वै क्रमात् । सा तत्र पतिता दिक्षु चतुर्धा प्रत्यपद्यत

sītā cālakanandā ca cakṣurbhadrā ca vai kramāt sā tatra patitā dikṣu caturdhā pratyapadyata

वही गंगा सीता, अलकनन्दा, चक्षु और भद्रा नाम से क्रमशः चार धाराओं में विभक्त होकर वहाँ गिरती है।

श्लोक 31 (shiva.uma.17.31)

सीता पूर्वेण शैलं हि नन्दा चैव तु दक्षिणे । सा चक्षुः पश्चिमे चैव भद्रा चोत्तरतो व्रजेत्

sītā pūrveṇa śailaṁ hi nandā caiva tu dakṣiṇe sā cakṣuḥ paścime caiva bhadrā cottarato vrajet

सीता पर्वत के पूर्व की ओर बहती है, नन्दा अर्थात् अलकनन्दा दक्षिण की ओर; चक्षु पश्चिम की ओर जाती है और भद्रा उत्तर की ओर।

श्लोक 32 (shiva.uma.17.32)

गिरीनतीत्य सकलांश्चतुर्दिक्षु महाम्बुधिम् । सा ययौ प्रयता भूता गङ्गा त्रिपथगामिनी

girīnatītya sakalāṁścaturdikṣu mahāmbudhim sā yayau prayatā bhūtā gaṅgā tripathagāminī

चारों दिशाओं के समस्त पर्वतों को लांघकर वह पवित्र, साक्षात् प्रकट गंगा, तीन मार्गों में बहने वाली, महासागर की ओर चली गई।

श्लोक 33 (shiva.uma.17.33)

सुनीलनिषधौ यौ तौ माल्यवद्गन्धमादनौ । तेषां मध्यगतो मेरुः कर्णिकाकारसंस्थितः

sunīlaniṣadhau yau tau mālyavadgandhamādanau teṣāṁ madhyagato meruḥ karṇikākārasaṁsthitaḥ

सुनील और निषध, तथा माल्यवान् और गन्धमादन -- इन सबके बीचोंबीच मेरु कमल की कर्णिका के समान स्थित है।

श्लोक 34 (shiva.uma.17.34)

भारतः केतुमालश्च भद्राश्वः कुरवस्तथा । पत्राणि लोकपद्मस्य मर्यादालोकपर्वताः

bhārataḥ ketumālaśca bhadrāśvaḥ kuravastathā patrāṇi lokapadmasya maryādālokaparvatāḥ

भारत, केतुमाल, भद्राश्व तथा कुरु -- ये लोक-रूपी कमल की पंखुड़ियाँ हैं, और वर्ष-पर्वत ही उसकी सीमा-रेखा हैं।

श्लोक 35 (shiva.uma.17.35)

जठरं देवकूटश्च आयामे दक्षिणोत्तरे । गन्धमादनकैलासौ पूर्वपश्चिमतो गतौ

jaṭharaṁ devakūṭaśca āyāme dakṣiṇottare gandhamādanakailāsau pūrvapaścimato gatau

जठर और देवकूट दक्षिण से उत्तर तक फैले हुए हैं; गन्धमादन और कैलास पूर्व से पश्चिम तक विस्तृत हैं।

श्लोक 36 (shiva.uma.17.36)

पूर्वपश्चिमतो मेरोर्निषधो नीलपर्वतः । दक्षिणोत्तरमायातौ कर्णिकान्तर्व्यवस्थितौ

pūrvapaścimato merorniṣadho nīlaparvataḥ dakṣiṇottaramāyātau karṇikāntarvyavasthitau

मेरु के पूर्व-पश्चिम में निषध और नील पर्वत हैं; दक्षिण-उत्तर की ओर फैले पर्वत कर्णिका के भीतर स्थित हैं।

श्लोक 37 (shiva.uma.17.37)

जठराद्याः स्थिता मेरोर्येषां द्वौ द्वौ व्यवस्थितौ । केसराः पर्वता एते श्वेताद्याः सुमनोरमाः

jaṭharādyāḥ sthitā meroryeṣāṁ dvau dvau vyavasthitau kesarāḥ parvatā ete śvetādyāḥ sumanoramāḥ

जठर आदि पर्वत मेरु के चारों ओर, दो-दो की संख्या में, स्थित हैं; ये श्वेत आदि केसर-पर्वत अत्यंत मनोरम हैं।

श्लोक 38 (shiva.uma.17.38)

शैलानामन्तरे द्रोण्यः सिद्धचारणसेविताः । सुरम्याणि तथा तासु काननानि पुराणि च

śailānāmantare droṇyaḥ siddhacāraṇasevitāḥ suramyāṇi tathā tāsu kānanāni purāṇi ca

इन पर्वतों के बीच घाटियाँ हैं, जो सिद्धों और चारणों द्वारा सेवित हैं; उनमें सुरम्य वन और नगर भी हैं।

श्लोक 39 (shiva.uma.17.39)

सर्वेषां चैव देवानां यक्षगन्धर्वरक्षसाम् । क्रीडन्ति देवदैतेयाः शैलप्रायेष्वहर्निशम्

sarveṣāṁ caiva devānāṁ yakṣagandharvarakṣasām krīḍanti devadaiteyāḥ śailaprāyeṣvaharniśam

वहाँ समस्त देवता, यक्ष, गन्धर्व और राक्षस, देवता और दैत्य सभी, इन पर्वतों की ढलानों पर रात-दिन क्रीड़ा करते हैं।

श्लोक 40 (shiva.uma.17.40)

धर्मिणामालया ह्येते भौमाः स्वर्गाः प्रकीर्तिताः । न तेषु पापकर्तारो यान्ति पश्यन्ति कुत्रचित्

dharmiṇāmālayā hyete bhaumāḥ svargāḥ prakīrtitāḥ na teṣu pāpakartāro yānti paśyanti kutracit

ये सब धार्मिकों के निवास-स्थान हैं, जिन्हें भूलोक के स्वर्ग कहा गया है; पापी लोग वहाँ न तो कभी जाते हैं और न ही उन्हें कहीं देख पाते हैं।

श्लोक 41 (shiva.uma.17.41)

यानि किम्पुरुषादीनि वर्षाण्यष्टौ महामुने । न तेषु शोको नापत्त्यो नोद्वेगः क्षुद्भयादिकम्

yāni kimpuruṣādīni varṣāṇyaṣṭau mahāmune na teṣu śoko nāpattyo nodvegaḥ kṣudbhayādikam

हे महामुने! किम्पुरुष आदि उन आठों वर्षों में न शोक है, न विपत्ति, न उद्वेग और न भूख-भय आदि कुछ भी है।

श्लोक 42 (shiva.uma.17.42)

स्वस्थाः प्रजा निरातङ्काः सर्वदुःखविवर्जिताः । दशद्वादशवर्षाणां सहस्राणि स्थिरायुषः

svasthāḥ prajā nirātaṅkāḥ sarvaduḥkhavivarjitāḥ daśadvādaśavarṣāṇāṁ sahasrāṇi sthirāyuṣaḥ

वहाँ की प्रजा स्वस्थ, निराकुल और समस्त दुःखों से रहित होती है; उनकी आयु दस से बारह हजार वर्ष तक स्थिर रहती है।

श्लोक 43 (shiva.uma.17.43)

कृतत्रेतादिकाश्चैव भौमान्यम्भांसि सर्वतः । न तेषु वर्षते देवस्तेषु स्थानेषु कल्पना

kṛtatretādikāścaiva bhaumānyambhāṁsi sarvataḥ na teṣu varṣate devasteṣu sthāneṣu kalpanā

कृत, त्रेता आदि युग और पार्थिव जल अन्यत्र सर्वत्र विद्यमान हैं, परन्तु उन स्थानों में वर्षा नहीं होती -- वहाँ इस प्रकार की कोई गणना लागू नहीं होती।

श्लोक 44 (shiva.uma.17.44)

सप्तस्वेतेषु नद्यश्च सुजाताः स्वर्णवालुकाः । शतशः सन्ति क्षुद्राश्च तासु क्रीडेच्छुभो जनः

saptasveteṣu nadyaśca sujātāḥ svarṇavālukāḥ śataśaḥ santi kṣudrāśca tāsu krīḍecchubho janaḥ

इन सातों वर्षों में सुन्दर नदियाँ हैं जिनकी बालू स्वर्ण की है, तथा सैकड़ों छोटी-छोटी नदियाँ भी हैं, जिनमें शुभ लोग क्रीड़ा करते हैं।

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