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उमा संहिता · अध्याय 22

देहोत्पत्ति वर्णन

अध्याय 21अध्याय-सूचीअध्याय 23

श्लोक 1 (shiva.uma.22.1)

व्यास उवाच । विधिं तात वदेदानीं जीवजन्म विधानतः । गर्भे स्थितिं च तस्यापि वैराग्यार्थं मुनीश्वर

vyāsa uvāca vidhiṁ tāta vadedānīṁ jīvajanma vidhānataḥ garbhe sthitiṁ ca tasyāpi vairāgyārthaṁ munīśvara

व्यास जी ने कहा -- हे तात! अब जीव के जन्म की विधि विधिपूर्वक बताइए, तथा हे मुनीश्वर! वैराग्य के लिए गर्भ में उसकी स्थिति का वर्णन भी कीजिए।

श्लोक 2 (shiva.uma.22.2)

सनत्कुमार उवाच । शृणु व्यास समासेन शास्त्रसारमशेषतः । वदिष्यामि सुवैराग्यं मुमुक्षोर्भवबन्धकृत्

sanatkumāra uvāca śṛṇu vyāsa samāsena śāstrasāramaśeṣataḥ vadiṣyāmi suvairāgyaṁ mumukṣorbhavabandhakṛt

सनत्कुमार जी ने कहा -- हे व्यास! संक्षेप में किन्तु पूर्ण रूप से शास्त्र का सार सुनो; मैं मुमुक्षु के लिए संसार-बंधन उत्पन्न होने की प्रक्रिया, अर्थात् सच्चा वैराग्य, बताता हूँ।

श्लोक 3 (shiva.uma.22.3)

पाकपात्रस्य मध्ये तु पृथगन्नं पृथग्जलम् । अग्नेरूर्ध्वं जलं स्थाप्यं तदन्नं च जलोपरि

pākapātrasya madhye tu pṛthagannaṁ pṛthagjalam agnerūrdhvaṁ jalaṁ sthāpyaṁ tadannaṁ ca jalopari

किसी पाक-पात्र के मध्य में अलग से अन्न और अलग से जल रखा जाता है; अग्नि के ऊपर जल रखा जाता है, और उस जल के ऊपर अन्न।

श्लोक 4 (shiva.uma.22.4)

जलस्याधः स चाग्निर्हि स्थितोऽग्निं धमते शनैः । वायुना धम्यमानोऽग्निरत्युष्णं कुरुते जलम्

jalasyādhaḥ sa cāgnirhi sthito'gniṁ dhamate śanaiḥ vāyunā dhamyamāno'gniratyuṣṇaṁ kurute jalam

जल के नीचे वह अग्नि स्थित रहती है, जिसे धीरे-धीरे धौंका जाता है; वायु द्वारा धौंकी गई अग्नि जल को अत्यंत गर्म कर देती है।

श्लोक 5 (shiva.uma.22.5)

तदन्नमुष्णतोयेन समन्तात्पच्यते पुनः । द्विधा भवति तत्पक्वं पृथक्किट्टं पृथग्रसः

tadannamuṣṇatoyena samantātpacyate punaḥ dvidhā bhavati tatpakvaṁ pṛthakkiṭṭaṁ pṛthagrasaḥ

उस गर्म जल से वह अन्न सब ओर से पुनः पकता है; पकने पर वह दो भागों में बँट जाता है -- अलग किट्ट अर्थात् मल और अलग रस।

श्लोक 6 (shiva.uma.22.6)

मलैर्द्वादशभिः किट्टं भिन्नं देहाद्बहिर्भवेत् । रसस्तु देहे सरति स पुष्टस्तेन जायते

malairdvādaśabhiḥ kiṭṭaṁ bhinnaṁ dehādbahirbhavet rasastu dehe sarati sa puṣṭastena jāyate

बारह मलों के रूप में किट्ट भिन्न होकर शरीर से बाहर निकल जाता है; परन्तु रस शरीर में प्रवाहित होता है, और उसी से पुष्टि होती है।

श्लोक 7 (shiva.uma.22.7)

कर्णाक्षिनासिका जिह्वा दन्ताः शिश्नो गुदं नखाः । मलाश्रयः कफः स्वेदो विण्मूत्रं द्वादश स्मृताः

karṇākṣināsikā jihvā dantāḥ śiśno gudaṁ nakhāḥ malāśrayaḥ kaphaḥ svedo viṇmūtraṁ dvādaśa smṛtāḥ

कान, आँख, नाक, जीभ, दाँत, लिंग, गुदा और नाखून, तथा मल के आश्रय कफ, स्वेद, विष्ठा और मूत्र -- ये बारह मल कहे गए हैं।

श्लोक 8 (shiva.uma.22.8)

हृत्पद्मे प्रतिबद्धाश्च सर्वनाड्यः समन्ततः । ज्ञेया रसप्रवाहिन्यस्तत्प्रकारं ब्रुवे मुने

hṛtpadme pratibaddhāśca sarvanāḍyaḥ samantataḥ jñeyā rasapravāhinyastatprakāraṁ bruve mune

हृदय-कमल में बँधी हुई समस्त नाड़ियाँ सब ओर रस को प्रवाहित करने वाली जाननी चाहिए; हे मुने! अब मैं उनका प्रकार बताता हूँ।

श्लोक 9 (shiva.uma.22.9)

तासां मुखेषु तं सूक्ष्मं प्राणः स्थापयेत् रसम् । रसेन तेन नाडीस्ताः प्राणं पूरयते पुनः

tāsāṁ mukheṣu taṁ sūkṣmaṁ prāṇaḥ sthāpayet rasam rasena tena nāḍīstāḥ prāṇaṁ pūrayate punaḥ

उन नाड़ियों के मुखों में प्राण उस सूक्ष्म रस को स्थापित करता है; उस रस से प्राण उन नाड़ियों को पुनः भर देता है।

श्लोक 10 (shiva.uma.22.10)

पुनः प्रयान्ति सम्पूर्णाः ताश्च देहं समन्ततः । ततः स नाडीमध्यस्थः शरीरेणात्मना रसः

punaḥ prayānti sampūrṇāḥ tāśca dehaṁ samantataḥ tataḥ sa nāḍīmadhyasthaḥ śarīreṇātmanā rasaḥ

भरी हुई वे नाड़ियाँ फिर सब ओर शरीर में फैल जाती हैं; तब वह रस, नाड़ियों के मध्य में स्थित होकर, शरीर के रूप में स्वयं परिणत हो जाता है।

श्लोक 11 (shiva.uma.22.11)

पच्यते पच्यमानाच्च भवेत्पाकद्वयं पुनः । त्वक् तया वेष्ट्यते पूर्वं रुधिरं च प्रजायते

pacyate pacyamānācca bhavetpākadvayaṁ punaḥ tvak tayā veṣṭyate pūrvaṁ rudhiraṁ ca prajāyate

वह पुनः पकता है, और पुनः पकने से दो प्रकार के परिणाम होते हैं; पहले उससे त्वचा बनकर उसे लपेट लेती है, और रक्त उत्पन्न होता है।

श्लोक 12 (shiva.uma.22.12)

रक्ताल्लोमानि मांसं च केशाः स्नायुश्च मांसतः । स्नायुतश्च तथास्थीनि नखा मज्जास्थिसम्भवाः

raktāllomāni māṁsaṁ ca keśāḥ snāyuśca māṁsataḥ snāyutaśca tathāsthīni nakhā majjāsthisambhavāḥ

रक्त से रोम और मांस उत्पन्न होते हैं, मांस से केश और स्नायु; स्नायु से हड्डियाँ, और हड्डी से नाखून और मज्जा उत्पन्न होते हैं।

श्लोक 13 (shiva.uma.22.13)

मज्जाकारणवैकल्यं शुक्रं हि प्रसवात्मकम् । इति द्वादशधान्नस्य परिणामः प्रकीर्तिताः

majjākāraṇavaikalyaṁ śukraṁ hi prasavātmakam iti dvādaśadhānnasya pariṇāmaḥ prakīrtitāḥ

मज्जा के सार-तत्व से वीर्य उत्पन्न होता है, जो सृजन का साधन है। इस प्रकार अन्न के बारह प्रकार के परिणाम कहे गए हैं।

श्लोक 14 (shiva.uma.22.14)

शुक्रोऽन्नाज्जायते शुक्राद्दिव्यदेहस्य सम्भवः । ऋतुकाले यदा शुक्रं निर्दोषं योनिसंस्थितम्

śukro'nnājjāyate śukrāddivyadehasya sambhavaḥ ṛtukāle yadā śukraṁ nirdoṣaṁ yonisaṁsthitam

वीर्य अन्न से उत्पन्न होता है, और वीर्य से दिव्य देह की उत्पत्ति होती है। जब ऋतुकाल में निर्दोष वीर्य योनि में स्थित होता है --

श्लोक 15 (shiva.uma.22.15)

तदा तद् वायुसंस्पृष्टं स्त्रीरक्तेनैकतां व्रजेत् । विसर्गकाले शुक्रस्य जीवः कारणसंयुतः

tadā tad vāyusaṁspṛṣṭaṁ strīraktenaikatāṁ vrajet visargakāle śukrasya jīvaḥ kāraṇasaṁyutaḥ

-- तब वायु से स्पर्शित होकर वह स्त्री के रज अर्थात् रक्त के साथ एक हो जाता है। वीर्य के विसर्जन के समय, अपने कारणों सहित जीव --

श्लोक 16 (shiva.uma.22.16)

संवृतः प्रविशेद्योनिं कर्मभिः स्वैर्नियोजितः । तच्छुक्ररक्तमेकस्थमेकाहात्कललं भवेत्

saṁvṛtaḥ praviśedyoniṁ karmabhiḥ svairniyojitaḥ tacchukraraktamekasthamekāhātkalalaṁ bhavet

-- अपने ही कर्मों द्वारा नियोजित होकर, आवृत होकर योनि में प्रवेश करता है। वह वीर्य और रज एक स्थान पर मिलकर एक दिन में कललरूप बन जाते हैं।

श्लोक 17 (shiva.uma.22.17)

पञ्चरात्रेण कललं बुद्बुदाकारतां व्रजेत् । बुद्बुदः सप्तरात्रेण मांसपेशी भवेत् पुनः

pañcarātreṇa kalalaṁ budbudākāratāṁ vrajet budbudaḥ saptarātreṇa māṁsapeśī bhavet punaḥ

पाँच रात्रियों में कलल बुलबुले के आकार को प्राप्त होता है; और वह बुलबुला सात रात्रियों में मांस-पिंड बन जाता है।

श्लोक 18 (shiva.uma.22.18)

ग्रीवा शिरश्च स्कन्धौ च पृष्ठवंशस्तथोदरम् । पाणिपादं तथा पार्श्वे कटिर्गात्रं तथैव च

grīvā śiraśca skandhau ca pṛṣṭhavaṁśastathodaram pāṇipādaṁ tathā pārśve kaṭirgātraṁ tathaiva ca

गर्दन, सिर, कंधे, रीढ़ की हड्डी तथा पेट; हाथ-पैर, बगलें, कमर और अंग भी --

श्लोक 19 (shiva.uma.22.19)

द्विमासाभ्यन्तरेणैव क्रमशः शम्भवेदिह । त्रिभिर्मासैः प्रजायन्ते सर्वे ह्यङ्कुरसन्धयः

dvimāsābhyantareṇaiva kramaśaḥ śambhavediha tribhirmāsaiḥ prajāyante sarve hyaṅkurasandhayaḥ

-- ये सब क्रमशः दो महीनों के भीतर बनते हैं; तीन महीनों में सभी अंकुरित जोड़ बन जाते हैं।

श्लोक 20 (shiva.uma.22.20)

मासैश्चतुर्भिरङ्गुल्यः प्रजायन्ते यथाक्रमम् । मुखं नासा च कर्णौ मासैः पञ्चभिरेव च

māsaiścaturbhiraṅgulyaḥ prajāyante yathākramam mukhaṁ nāsā ca karṇau māsaiḥ pañcabhireva ca

चार महीनों में उंगलियाँ क्रमशः बनती हैं; पाँच महीनों में मुख, नाक और कान बनते हैं।

श्लोक 21 (shiva.uma.22.21)

दन्तपङ्क्तिस्तथा गुह्यं जायन्ते च नखाः पुनः । कर्णयोस्तु भवेच्छिद्रं षण्मासाभ्यन्तरेण तु

dantapaṅktistathā guhyaṁ jāyante ca nakhāḥ punaḥ karṇayostu bhavecchidraṁ ṣaṇmāsābhyantareṇa tu

दाँतों की पंक्तियाँ, तथा गुह्य अंग और नाखून भी उत्पन्न होते हैं; छह महीनों के भीतर कानों के छिद्र बनते हैं।

श्लोक 22 (shiva.uma.22.22)

पायुर्मेहमुपस्थं च नाभिश्चाभ्युपजायते । सन्धयो ये च गात्रेषु मासैर्जायन्ति सप्तभिः

pāyurmehamupasthaṁ ca nābhiścābhyupajāyate sandhayo ye ca gātreṣu māsairjāyanti saptabhiḥ

गुदा, मूत्र-मार्ग, उपस्थ और नाभि भी उत्पन्न होते हैं; सात महीनों में अंगों के जोड़ बनते हैं।

श्लोक 23 (shiva.uma.22.23)

अङ्गप्रत्यङ्गसम्पूर्णः परिपक्वः स तिष्ठति । उदरे मातुराच्छन्नो जरायौ मुनिसत्तम

aṅgapratyaṅgasampūrṇaḥ paripakvaḥ sa tiṣṭhati udare māturācchanno jarāyau munisattama

हे मुनिश्रेष्ठ! अंग-प्रत्यंग से पूर्ण, पूर्ण रूप से विकसित होकर वह जरायु में लिपटा हुआ माता के उदर में स्थित रहता है।

श्लोक 24 (shiva.uma.22.24)

मातुराहारचौर्येण षड्विधेन रसेन तु । नाभिनालनिबद्धेन वर्द्धते स दिने दिने

māturāhāracauryeṇa ṣaḍvidhena rasena tu nābhinālanibaddhena varddhate sa dine dine

माता के आहार से मानो चोरी करके, नाभि-नाल से बँधे षड्रस से, वह दिन-प्रतिदिन बढ़ता है।

श्लोक 25 (shiva.uma.22.25)

ततः स्मृतिं लभेज्जीवः सम्पूर्णेऽस्मिन् शरीरके । सुखं दुःखं विजानाति निद्रास्वप्नं पुराकृतम्

tataḥ smṛtiṁ labhejjīvaḥ sampūrṇe'smin śarīrake sukhaṁ duḥkhaṁ vijānāti nidrāsvapnaṁ purākṛtam

फिर जब यह शरीर पूर्ण हो जाता है, तब जीव को स्मृति प्राप्त होती है; वह सुख-दुःख, नींद-स्वप्न तथा पूर्व-जन्मों के कर्मों को जान लेता है।

श्लोक 26 (shiva.uma.22.26)

मृतश्चाहं पुनर्जातो जातश्चाहं पुनर्मृतः । नानायोनिसहस्राणि मया दृष्टानि जायता

mṛtaścāhaṁ punarjāto jātaścāhaṁ punarmṛtaḥ nānāyonisahasrāṇi mayā dṛṣṭāni jāyatā

वह सोचता है -- 'मैं मरकर पुनः जन्मा, और जन्मकर पुनः मरा; बार-बार जन्म लेते हुए मैंने हजारों प्रकार की योनियाँ देखी हैं।'

श्लोक 27 (shiva.uma.22.27)

अधुना जातमात्रोऽहं प्राप्तसंस्कार एव च । श्रेयोऽमुना करिष्यामि येन गर्भे न सम्भवः

adhunā jātamātro'haṁ prāptasaṁskāra eva ca śreyo'munā kariṣyāmi yena garbhe na sambhavaḥ

'अभी-अभी जन्मा हूँ, फिर भी पूर्व-संस्कारों से युक्त हूँ; अब मैं वह कल्याण करूँगा, जिससे पुनः गर्भ में न आना पड़े।'

श्लोक 28 (shiva.uma.22.28)

गर्भस्थश्चिन्तयन्नेवमहं गर्भाद्विनिःसृतः । अन्वेष्यामि शिवज्ञानं संसारविनिवर्तकम्

garbhasthaścintayannevamahaṁ garbhādviniḥsṛtaḥ anveṣyāmi śivajñānaṁ saṁsāravinivartakam

गर्भ में स्थित यह सोचता हुआ कहता है -- 'गर्भ से बाहर निकलकर मैं संसार से निवृत्ति देने वाले शिव-ज्ञान को खोजूँगा।'

श्लोक 29 (shiva.uma.22.29)

एवं स गर्भदुःखेन महता परिपीडितः । जीवः कर्मवशादास्ते मोक्षोपायं विचिन्तयन्

evaṁ sa garbhaduḥkhena mahatā paripīḍitaḥ jīvaḥ karmavaśādāste mokṣopāyaṁ vicintayan

इस प्रकार वह जीव गर्भ के महान दुःख से अत्यंत पीड़ित होकर, अपने कर्मों के वशीभूत होकर वहाँ रहता है, और मोक्ष के उपाय पर विचार करता रहता है।

श्लोक 30 (shiva.uma.22.30)

यथा गिरिवराक्रान्तः कश्चिद्दुःखेन तिष्ठति । तथा जरायुणा देही दुःखं तिष्ठति वेष्टितः

yathā girivarākrāntaḥ kaścidduḥkhena tiṣṭhati tathā jarāyuṇā dehī duḥkhaṁ tiṣṭhati veṣṭitaḥ

जैसे किसी विशाल पर्वत के नीचे दबा हुआ व्यक्ति दुःख से पीड़ित रहता है, वैसे ही देही जरायु से लिपटा हुआ दुःखपूर्वक स्थित रहता है।

श्लोक 31 (shiva.uma.22.31)

पतितः सागरे यद्वद्दुःखमास्ते समाकुलः । गर्भोदकेन सिक्ताङ्गः सर्वदाकुलितस्तदा

patitaḥ sāgare yadvadduḥkhamāste samākulaḥ garbhodakena siktāṅgaḥ sarvadākulitastadā

जैसे समुद्र में गिरा हुआ व्यक्ति व्याकुल होकर दुःख भोगता है, वैसे ही गर्भ-जल से भीगे अंगों वाला वह सदा व्याकुल रहता है।

श्लोक 32 (shiva.uma.22.32)

लोहकुम्भे यथा न्यस्तः पच्यते कश्चिदग्निना । गर्भकुम्भे तथा क्षिप्तः पच्यते जठराग्निना

lohakumbhe yathā nyastaḥ pacyate kaścidagninā garbhakumbhe tathā kṣiptaḥ pacyate jaṭharāgninā

जैसे किसी को लोहे के पात्र में रखकर अग्नि से पकाया जाता है, वैसे ही गर्भ-रूपी पात्र में डाला गया वह जठराग्नि से पकाया जाता है।

श्लोक 33 (shiva.uma.22.33)

सूचीभिरग्निवर्णाभिर्निर्भिन्नस्य निरन्तरम् । यद्दुःखं जायते तस्य तत्र संस्थस्य चाधिकम्

sūcībhiragnivarṇābhirnirbhinnasya nirantaram yadduḥkhaṁ jāyate tasya tatra saṁsthasya cādhikam

अग्नि के समान लाल सुइयों से निरंतर बींधे जाने पर जो दुःख होता है, उससे भी अधिक दुःख वहाँ स्थित उस जीव को होता है।

श्लोक 34 (shiva.uma.22.34)

गर्भावासात्परं दुःखं कष्टं नैवास्ति कुत्रचित् । देहिनां दुःखबहुलं सुघोरमतिसङ्कटम्

garbhāvāsātparaṁ duḥkhaṁ kaṣṭaṁ naivāsti kutracit dehināṁ duḥkhabahulaṁ sughoramatisaṅkaṭam

गर्भ-वास से बढ़कर कोई कष्ट कहीं भी नहीं है; यह देहधारियों के लिए अत्यंत दुःखमय, अत्यंत भयंकर और अत्यंत संकटपूर्ण है।

श्लोक 35 (shiva.uma.22.35)

इत्येतत्सुमहद्दुःखं पापिनां परिकीर्तितम् । केवलं धर्मबुध्दीनां सप्तमासैर्भवः सदा

ityetatsumahadduḥkhaṁ pāpināṁ parikīrtitam kevalaṁ dharmabudhdīnāṁ saptamāsairbhavaḥ sadā

यह अत्यंत महान दुःख पापियों के लिए कहा गया है; परन्तु जिनकी बुद्धि केवल धर्म में लगी है, उन्हें सातवें महीने में ही सदा ज्ञान प्राप्त हो जाता है।

श्लोक 36 (shiva.uma.22.36)

गर्भात्सुदुर्लभं दुःखं योनियन्त्रनिपीडनात् । भवेत्पापात्मनां व्यास न हि धर्मयुतात्मनाम्

garbhātsudurlabhaṁ duḥkhaṁ yoniyantranipīḍanāt bhavetpāpātmanāṁ vyāsa na hi dharmayutātmanām

हे व्यास! गर्भ से उत्पन्न वह अत्यंत दुर्लभ दुःख, योनि-रूपी यंत्र के दबाव से, पापी आत्माओं को होता है, धर्मयुक्त आत्माओं को नहीं।

श्लोक 37 (shiva.uma.22.37)

इक्षुवत्पीड्यमानस्य यन्त्रेणैव समन्ततः । शिरसा ताड्यमानस्य पापमुद्गरकेण च

ikṣuvatpīḍyamānasya yantreṇaiva samantataḥ śirasā tāḍyamānasya pāpamudgarakeṇa ca

जैसे गन्ने को यंत्र से सब ओर से दबाया जाता है, वैसे ही वह पीड़ित होता है, तथा जैसे सिर पर पाप-रूपी मुद्गर से आघात किया जा रहा हो।

श्लोक 38 (shiva.uma.22.38)

यन्त्रेण पीडिता यद्वन्निःसाराः स्स्युस्तिलाः क्षणात् । तथा शरीरं निस्सारं योनियन्त्रनिपीडनात्

yantreṇa pīḍitā yadvanniḥsārāḥ ssyustilāḥ kṣaṇāt tathā śarīraṁ nissāraṁ yoniyantranipīḍanāt

जैसे यंत्र से दबाए गए तिल क्षणभर में सार-रहित हो जाते हैं, वैसे ही योनि-रूपी यंत्र के दबाव से शरीर सार-रहित हो जाता है।

श्लोक 39 (shiva.uma.22.39)

अस्थिपादतुलास्तम्भं स्नायुबन्धेन यन्त्रितम् । रक्तमांसमृदालिप्तं विण्मूत्रद्रव्यभाजनम्

asthipādatulāstambhaṁ snāyubandhena yantritam raktamāṁsamṛdāliptaṁ viṇmūtradravyabhājanam

यह शरीर हड्डियों के खम्भों और शहतीरों से बना है, स्नायुओं के बंधन से यंत्रित है, रक्त-मांस रूपी मिट्टी से लीपा हुआ है, और विष्ठा-मूत्र का पात्र है।

श्लोक 40 (shiva.uma.22.40)

केशरोमनखच्छन्नं रोगायतनमातुरम् । वदनैकमहाद्वारं गवाक्षाष्टकभूषितम्

keśaromanakhacchannaṁ rogāyatanamāturam vadanaikamahādvāraṁ gavākṣāṣṭakabhūṣitam

यह केश, रोम और नाखूनों से ढका हुआ, रोगों का आश्रय, रुग्ण, मुख रूपी एक महाद्वार वाला तथा आठ गवाक्षों अर्थात् इन्द्रिय-छिद्रों से सुशोभित है।

श्लोक 41 (shiva.uma.22.41)

ओष्ठद्वयकपाटं च तथा जिह्वार्गलान्वितम् । भोगतृष्णातुरं मूढं रागद्वेषवशानुगम्

oṣṭhadvayakapāṭaṁ ca tathā jihvārgalānvitam bhogatṛṣṇāturaṁ mūḍhaṁ rāgadveṣavaśānugam

इसके दोनों ओष्ठ इसके किवाड़ हैं, और जीभ इसकी अर्गला है; यह भोग की तृष्णा से पीड़ित, मूढ़ तथा राग-द्वेष के वशीभूत है।

श्लोक 42 (shiva.uma.22.42)

संवर्तिताङ्गप्रत्यङ्गं जरायुपरिवेष्टितम् । सङ्कटेनाविविक्तेन योनिमार्गेण निर्गतम्

saṁvartitāṅgapratyaṅgaṁ jarāyupariveṣṭitam saṅkaṭenāviviktena yonimārgeṇa nirgatam

अंग-प्रत्यंग सिकुड़े हुए, जरायु से लिपटे हुए, वह संकीर्ण और अपवित्र योनि-मार्ग से बाहर निकलता है।

श्लोक 43 (shiva.uma.22.43)

विण्मूत्ररक्तसिक्ताङ्गं विकोशिकसमुद्भवम् । अस्थिपञ्जरविख्यातमस्मिन् ज्ञेयं कलेवरम्

viṇmūtraraktasiktāṅgaṁ vikośikasamudbhavam asthipañjaravikhyātamasmin jñeyaṁ kalevaram

विष्ठा, मूत्र और रक्त से सने अंगों वाला, मानो किसी आवरण से निकला हुआ -- इस प्रकार यह शरीर अस्थि-पंजर के रूप में विख्यात जानना चाहिए।

श्लोक 44 (shiva.uma.22.44)

शतत्रयं षष्ट्यधिकं पञ्च पेशीशतानि च । सार्धाभिस्तिसृभिश्छन्नं समन्ताद्रोमकोटिभिः

śatatrayaṁ ṣaṣṭyadhikaṁ pañca peśīśatāni ca sārdhābhistisṛbhiśchannaṁ samantādromakoṭibhiḥ

इसमें तीन सौ साठ हड्डियाँ और पाँच सौ मांसपेशियाँ हैं; यह साढ़े तीन करोड़ रोमों से सब ओर ढका हुआ है।

श्लोक 45 (shiva.uma.22.45)

शरीरं स्थूलसूक्ष्माभिर्दृश्यादृश्या हि ताः स्मृताः । एतावतीभिर्नाडीभिः कोटिभिस्तत्समन्ततः

śarīraṁ sthūlasūkṣmābhirdṛśyādṛśyā hi tāḥ smṛtāḥ etāvatībhirnāḍībhiḥ koṭibhistatsamantataḥ

शरीर स्थूल और सूक्ष्म नाड़ियों से युक्त है, जिन्हें दृश्य और अदृश्य कहा गया है; इतने ही करोड़ों नाड़ियों से यह सब ओर व्याप्त है।

श्लोक 46 (shiva.uma.22.46)

अस्वेदमधुभिर्याभिरन्तस्थः स्रवते बहिः । द्वात्रिंशद्दशनाः प्रोक्ता विंशतिश्च नखाः स्मृताः

asvedamadhubhiryābhirantasthaḥ sravate bahiḥ dvātriṁśaddaśanāḥ proktā viṁśatiśca nakhāḥ smṛtāḥ

इनके द्वारा भीतर स्थित स्वेद आदि पदार्थ बाहर बहते हैं; बत्तीस दाँत तथा बीस नाखून कहे गए हैं।

श्लोक 47 (shiva.uma.22.47)

पित्तस्य कुडवं ज्ञेयं कफस्याथाढकं स्मृतम् । वसायाश्च पलं विंशत्तदर्धं कपिलस्य च

pittasya kuḍavaṁ jñeyaṁ kaphasyāthāḍhakaṁ smṛtam vasāyāśca palaṁ viṁśattadardhaṁ kapilasya ca

पित्त की मात्रा एक कुडव, कफ की एक आढक जाननी चाहिए; वसा बीस पल, तथा कपिल नामक धातु उसकी आधी मात्रा में होती है।

श्लोक 48 (shiva.uma.22.48)

पञ्चार्द्धं तु तुला ज्ञेया पलानि दश मेदसः । पलत्रयं महारक्तं मज्जायाश्च चतुर्गुणम्

pañcārddhaṁ tu tulā jñeyā palāni daśa medasaḥ palatrayaṁ mahāraktaṁ majjāyāśca caturguṇam

एक अन्य धातु की मात्रा ढाई तुला जाननी चाहिए, मेद दस पल; महारक्त तीन पल, और मज्जा उससे चार गुनी।

श्लोक 49 (shiva.uma.22.49)

शुक्रोऽर्द्धं कुडवं ज्ञेयं तद्बीजं देहिनां बलम् । मांसस्य चैकपिण्डेन पलसाहस्रमुच्यते

śukro'rddhaṁ kuḍavaṁ jñeyaṁ tadbījaṁ dehināṁ balam māṁsasya caikapiṇḍena palasāhasramucyate

वीर्य आधा कुडव जानना चाहिए -- वही बीज देहधारियों का बल है; और मांस एक पिंड में एक हजार पल कहा गया है।

श्लोक 50 (shiva.uma.22.50)

रक्तं पलशतं ज्ञेयं विण्मूत्रं यत्प्रमाणतः । अञ्जलयश्च चत्वारश्चत्वारो मुनिसत्तम

raktaṁ palaśataṁ jñeyaṁ viṇmūtraṁ yatpramāṇataḥ añjalayaśca catvāraścatvāro munisattama

रक्त सौ पल जानना चाहिए; हे मुनिश्रेष्ठ! विष्ठा और मूत्र की मात्रा चार-चार अंजलि है।

श्लोक 51 (shiva.uma.22.51)

इति देहगृहं ह्येतन्नित्यस्यानित्यमात्मनः । अविशुद्धं विशुद्धस्य कर्मबन्धाद्विनिर्मितम्

iti dehagṛhaṁ hyetannityasyānityamātmanaḥ aviśuddhaṁ viśuddhasya karmabandhādvinirmitam

इस प्रकार यह देह-रूपी घर नित्य आत्मा का होते हुए भी अनित्य है, शुद्ध आत्मा का होते हुए भी अशुद्ध है, और अपने ही कर्म-बंधन से निर्मित हुआ है।

अध्याय 21अध्याय-सूचीअध्याय 23