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उमा संहिता · अध्याय 24

स्त्रीस्वभाव वर्णन

अध्याय 23अध्याय-सूचीअध्याय 25

श्लोक 1 (shiva.uma.24.1)

व्यास उवाच । कुत्सितं योषिदर्थं यत्सम्प्रोक्तं पञ्चचूडया । तन्मे ब्रूहि समासेन यदि तुष्टोऽसि मे मुने

vyāsa uvāca kutsitaṁ yoṣidarthaṁ yatsamproktaṁ pañcacūḍayā tanme brūhi samāsena yadi tuṣṭo'si me mune

व्यास जी ने कहा -- हे मुने! पंचचूड़ा द्वारा स्त्रियों के विषय में जो निंदनीय बात कही गई, वह मुझे संक्षेप में बताइए, यदि आप मुझसे प्रसन्न हों।

श्लोक 2 (shiva.uma.24.2)

सनत्कुमार उवाच । स्त्रीणां स्वभावं वक्ष्यामि शृणु विप्र यथातथम् । यस्य श्रवणमात्रेण भवेद्वैराग्यमुत्तमम्

sanatkumāra uvāca strīṇāṁ svabhāvaṁ vakṣyāmi śṛṇu vipra yathātatham yasya śravaṇamātreṇa bhavedvairāgyamuttamam

सनत्कुमार जी ने कहा -- हे विप्र! मैं स्त्रियों का स्वभाव यथार्थ रूप में बताता हूँ, सुनो; जिसे सुनने मात्र से परम वैराग्य उत्पन्न हो जाता है।

श्लोक 3 (shiva.uma.24.3)

स्त्रियो मूलं हि दोषाणां लघुचित्ताः सदा मुने । तदासक्तिर्न कर्तव्या मोक्षेप्सुभिरतन्द्रितैः

striyo mūlaṁ hi doṣāṇāṁ laghucittāḥ sadā mune tadāsaktirna kartavyā mokṣepsubhiratandritaiḥ

हे मुने! स्त्रियाँ सभी दोषों का मूल हैं, उनका चित्त सदा चंचल रहता है; इसलिए मोक्ष की इच्छा रखने वाले सजग पुरुषों को उनमें आसक्ति नहीं करनी चाहिए।

श्लोक 4 (shiva.uma.24.4)

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । नारदस्य च संवादं पुंश्चल्या पञ्चचूडया

atrāpyudāharantīmamitihāsaṁ purātanam nāradasya ca saṁvādaṁ puṁścalyā pañcacūḍayā

इस विषय में लोग यह प्राचीन इतिहास उदाहरण के रूप में देते हैं -- नारद और वेश्या पंचचूड़ा के बीच हुआ संवाद।

श्लोक 5 (shiva.uma.24.5)

लोकान् परिचरन् धीमान् देवर्षिर्नारदः पुरा । ददर्शाप्सरसं बालां पञ्चचूडामनुत्तमाम्

lokān paricaran dhīmān devarṣirnāradaḥ purā dadarśāpsarasaṁ bālāṁ pañcacūḍāmanuttamām

एक बार लोकों में विचरण करते हुए बुद्धिमान देवर्षि नारद ने अनुपम अप्सरा-बाला पंचचूड़ा को देखा।

श्लोक 6 (shiva.uma.24.6)

पप्रच्छाप्सरसं सुभ्रूं नारदो मुनिसत्तमः । संशयो हृदि मे कश्चित्तन्मे ब्रूहि सुमध्यमे

papracchāpsarasaṁ subhrūṁ nārado munisattamaḥ saṁśayo hṛdi me kaścittanme brūhi sumadhyame

मुनिश्रेष्ठ नारद ने उस सुंदर भौंहों वाली अप्सरा से पूछा -- 'मेरे हृदय में एक संशय है, हे सुमध्यमे! उसे बताओ।'

श्लोक 7 (shiva.uma.24.7)

एवमुक्ता तु सा विप्रं प्रत्युवाच वराप्सरा । विषये सति वक्ष्यामि समर्थां मन्यसेऽथ माम्

evamuktā tu sā vipraṁ pratyuvāca varāpsarā viṣaye sati vakṣyāmi samarthāṁ manyase'tha mām

इस प्रकार कहे जाने पर वह श्रेष्ठ अप्सरा उस विप्र से बोली -- 'यदि विषय मेरी सामर्थ्य के भीतर हुआ, तो मैं बताऊँगी, यदि आप मुझे समर्थ मानते हों।'

श्लोक 8 (shiva.uma.24.8)

नारद उवाच । न त्वामविषये भद्रे नियोक्ष्यामि कथञ्चन । स्त्रीणां स्वभावमिच्छामि त्वत्तः श्रोतुं सुमध्यमे

nārada uvāca na tvāmaviṣaye bhadre niyokṣyāmi kathañcana strīṇāṁ svabhāvamicchāmi tvattaḥ śrotuṁ sumadhyame

नारद जी ने कहा -- 'हे भद्रे! मैं तुम्हें किसी असंभव विषय के लिए कभी नियुक्त नहीं करूँगा; हे सुमध्यमे! मैं तुमसे स्त्रियों का स्वभाव सुनना चाहता हूँ।'

श्लोक 9 (shiva.uma.24.9)

सनत्कुमार उवाच । एतच्छ्रुत्वा वचस्तस्य देवर्षेरप्सरोत्तमा । प्रत्युवाच मुनीशं तं देवर्षिं मुनिसत्तमम्

sanatkumāra uvāca etacchrutvā vacastasya devarṣerapsarottamā pratyuvāca munīśaṁ taṁ devarṣiṁ munisattamam

सनत्कुमार जी ने कहा -- देवर्षि के इस वचन को सुनकर वह श्रेष्ठ अप्सरा मुनीश्वर, उस देवर्षि, उस मुनिश्रेष्ठ को उत्तर देने लगी।

श्लोक 10 (shiva.uma.24.10)

पञ्चचूडोवाच । मुने शृणु न शक्या स्त्री सती वै निन्दितुं स्त्रिया । विदितास्ते स्त्रियो याश्च यादृश्यश्च स्वभावतः

pañcacūḍovāca mune śṛṇu na śakyā strī satī vai nindituṁ striyā viditāste striyo yāśca yādṛśyaśca svabhāvataḥ

पंचचूड़ा ने कहा -- 'हे मुने! सुनिए, एक सती स्त्री दूसरी स्त्री की निंदा करने में समर्थ नहीं होती; फिर भी आप स्वयं स्त्रियों को जानते हैं, कि वे कैसी हैं और स्वभाव से कैसी होती हैं।'

श्लोक 11 (shiva.uma.24.11)

न मामर्हसि देवर्षे नियोक्तुं प्रश्नमीदृशम् । इत्युक्त्वा साभवत्तूष्णीं पञ्चचूडाप्सरोवरा

na māmarhasi devarṣe niyoktuṁ praśnamīdṛśam ityuktvā sābhavattūṣṇīṁ pañcacūḍāpsarovarā

'हे देवर्षि! आपको मुझसे ऐसा प्रश्न करना उचित नहीं है।' -- ऐसा कहकर वह श्रेष्ठ अप्सरा पंचचूड़ा मौन हो गई।

श्लोक 12 (shiva.uma.24.12)

अथ देवर्षिवर्यो हि श्रुत्वा तद्वाक्यमुत्तमम् । प्रत्युवाच पुनस्तां वै लोकानां हितकाम्यया

atha devarṣivaryo hi śrutvā tadvākyamuttamam pratyuvāca punastāṁ vai lokānāṁ hitakāmyayā

तब उस श्रेष्ठ देवर्षि ने उसके उत्तम वचन को सुनकर, लोकों के हित की कामना से, उससे पुनः कहा।

श्लोक 13 (shiva.uma.24.13)

नारद उवाच । मृषावादे भवेद्दोषः सत्ये दोषो न विद्यते । इति जानीहि सत्यं त्वं वदातस्तत्सुमध्यमे

nārada uvāca mṛṣāvāde bhaveddoṣaḥ satye doṣo na vidyate iti jānīhi satyaṁ tvaṁ vadātastatsumadhyame

नारद जी ने कहा -- 'मिथ्या भाषण में दोष होता है, सत्य में कोई दोष नहीं होता; ऐसा जानकर, हे सुमध्यमे! तुम सत्य बोलो।'

श्लोक 14 (shiva.uma.24.14)

सनत्कुमार उवाच । इत्युक्ता सा कृतमती रभसा चारुहासिनी । स्त्रीदोषान् शाश्वतान्सत्यान् भाषितुं सम्प्रचक्रमे

sanatkumāra uvāca ityuktā sā kṛtamatī rabhasā cāruhāsinī strīdoṣān śāśvatānsatyān bhāṣituṁ sampracakrame

सनत्कुमार जी ने कहा -- इस प्रकार कहे जाने पर वह मनोहर हास्य वाली, दृढ़-निश्चयी अप्सरा उत्साहपूर्वक स्त्रियों के शाश्वत सत्य दोषों को कहने लगी।

श्लोक 15 (shiva.uma.24.15)

पञ्चचूडोवाच । कुलीना नाथवन्त्यश्च रूपवन्त्यश्च योषितः । मर्यादाषु न तिष्ठन्ति स दोषः स्त्रीषु नारद

pañcacūḍovāca kulīnā nāthavantyaśca rūpavantyaśca yoṣitaḥ maryādāṣu na tiṣṭhanti sa doṣaḥ strīṣu nārada

पंचचूड़ा ने कहा -- 'हे नारद! कुलीन, सुरक्षित पति वाली और रूपवती स्त्रियाँ भी मर्यादा में स्थिर नहीं रहतीं -- यही स्त्रियों का दोष है।'

श्लोक 16 (shiva.uma.24.16)

न स्त्रीभ्यः किञ्चिदन्यद्वै पापीयस्तरमस्ति हि । स्त्रियो मूलं हि पापानां तथा त्वमपि वेत्थ ह

na strībhyaḥ kiñcidanyadvai pāpīyastaramasti hi striyo mūlaṁ hi pāpānāṁ tathā tvamapi vettha ha

'स्त्रियों से बढ़कर वास्तव में कोई अन्य पापी वस्तु नहीं है; स्त्रियाँ ही पापों का मूल हैं, यह आप भी जानते हैं।'

श्लोक 17 (shiva.uma.24.17)

समाज्ञातानर्थवतः प्रतिरूपान् यथेप्सितान् । पतीनन्तरमासाद्य नालं नार्यः प्रतीक्षितुम्

samājñātānarthavataḥ pratirūpān yathepsitān patīnantaramāsādya nālaṁ nāryaḥ pratīkṣitum

'सुविख्यात, संपन्न, उपयुक्त रूप वाले तथा अपनी इच्छानुसार पति प्राप्त करके भी, स्त्रियाँ थोड़ी देर भी संतुष्ट रहने में समर्थ नहीं होतीं।'

श्लोक 18 (shiva.uma.24.18)

असद्धर्मस्त्वयं स्त्रीणामस्माकं भवति प्रभो । पापीयसो नरान् यद्वै लज्जां त्यक्त्वा भजामहे

asaddharmastvayaṁ strīṇāmasmākaṁ bhavati prabho pāpīyaso narān yadvai lajjāṁ tyaktvā bhajāmahe

'हे प्रभो! यह असद्धर्म हम स्त्रियों में है कि हम लज्जा त्यागकर पापी पुरुषों से भी संबंध बना लेती हैं।'

श्लोक 19 (shiva.uma.24.19)

स्त्रियं च यः प्रार्थयते सन्निकर्षं च गच्छति । ईषच्च कुरुते सेवां तमेवेच्छन्ति योषितः

striyaṁ ca yaḥ prārthayate sannikarṣaṁ ca gacchati īṣacca kurute sevāṁ tamevecchanti yoṣitaḥ

'जो भी पुरुष किसी स्त्री की प्रार्थना करता है, उसके निकट जाता है, और थोड़ी-सी भी सेवा करता है, स्त्रियाँ उसी की कामना करने लगती हैं।'

श्लोक 20 (shiva.uma.24.20)

अनर्थित्वान्मनुष्याणां भयात्पतिजनस्य च । मर्यादायाममर्यादाः स्त्रियस्तिष्ठन्ति भर्तृषु

anarthitvānmanuṣyāṇāṁ bhayātpatijanasya ca maryādāyāmamaryādāḥ striyastiṣṭhanti bhartṛṣu

'पुरुषों के अभाव के कारण, और पति के परिजनों के भय से ही, स्त्रियाँ, जो स्वभाव से मर्यादाहीन होती हैं, मर्यादा में स्थित रहती हैं।'

श्लोक 21 (shiva.uma.24.21)

नासां कश्चिदमान्योऽस्ति नासां वयसि निश्चयः । सुरूपं वा कुरूपं वा पुमांसमुपभुञ्जते

nāsāṁ kaścidamānyo'sti nāsāṁ vayasi niścayaḥ surūpaṁ vā kurūpaṁ vā pumāṁsamupabhuñjate

'उन्हें कोई भी अपमानजनक नहीं लगता, न उम्र का कोई निश्चित मापदंड होता है; वे सुंदर हो या कुरूप, किसी भी पुरुष को स्वीकार कर लेती हैं।'

श्लोक 22 (shiva.uma.24.22)

न भयादथ वाक्रोशान्नार्थहेतोः कथञ्चन । न ज्ञातिकुलसम्बन्धात् स्त्रियस्तिष्ठन्ति भर्तृषु

na bhayādatha vākrośānnārthahetoḥ kathañcana na jñātikulasambandhāt striyastiṣṭhanti bhartṛṣu

'न भय से, न निंदा से, न किसी अर्थ के कारण, न ही कुल-संबंध के कारण स्त्रियाँ अपनी इच्छा से पतियों के प्रति निष्ठावान रहती हैं।'

श्लोक 23 (shiva.uma.24.23)

यौवने वर्तमानानामिष्टाभरणवाससाम् । नारीणां स्वैरवृत्तीनां स्पृहयन्ति कुलस्त्रियः

yauvane vartamānānāmiṣṭābharaṇavāsasām nārīṇāṁ svairavṛttīnāṁ spṛhayanti kulastriyaḥ

'यौवन में स्थित, इच्छित आभूषण-वस्त्र पहनने वाली, स्वच्छंद वृत्ति वाली स्त्रियों की ओर कुलीन स्त्रियाँ भी ईर्ष्यापूर्वक देखती हैं।'

श्लोक 24 (shiva.uma.24.24)

या हि शश्वद् बहुमता रक्ष्यन्ते दयिताः स्त्रियः । अपि ताः सम्प्रसज्जन्ते कुब्जान्धजडवामने

yā hi śaśvad bahumatā rakṣyante dayitāḥ striyaḥ api tāḥ samprasajjante kubjāndhajaḍavāmane

'जो प्रिय पत्नियाँ सदा अत्यंत सम्मानित होकर सुरक्षित रखी जाती हैं, वे भी कुबड़े, अंधे, जड़बुद्धि अथवा बौने व्यक्ति में आसक्त हो जाती हैं।'

श्लोक 25 (shiva.uma.24.25)

पङ्गुष्वपि च देवर्षे ये चान्ये कुत्सिता नराः । स्त्रीणामगम्यो लोकेषु नास्ति कश्चिन्महामुने

paṅguṣvapi ca devarṣe ye cānye kutsitā narāḥ strīṇāmagamyo lokeṣu nāsti kaścinmahāmune

'हे देवर्षि! लंगड़े व्यक्तियों तक में, तथा अन्य कितने ही निकृष्ट पुरुषों में भी -- हे महामुने! संसार में कोई भी पुरुष स्त्रियों की पहुँच से बाहर नहीं है।'

श्लोक 26 (shiva.uma.24.26)

यदि पुंसां गतिर्ब्रह्मन् कथञ्चिन्नोपपद्यते । अप्यन्योऽन्यं प्रवर्तन्ते न च तिष्ठन्ति भर्तृषु

yadi puṁsāṁ gatirbrahman kathañcinnopapadyate apyanyo'nyaṁ pravartante na ca tiṣṭhanti bhartṛṣu

'हे ब्रह्मन्! यदि किसी कारण से उन्हें पुरुषों तक पहुँच न मिले, तो वे परस्पर एक-दूसरे की ओर भी प्रवृत्त हो जाती हैं, परन्तु पतियों के प्रति स्थिर नहीं रहतीं।'

श्लोक 27 (shiva.uma.24.27)

अलाभात्पुरुषाणां च भयात्परिजनस्य च । वधबन्धभयाच्चैव ता भग्नाशा हि योषितः

alābhātpuruṣāṇāṁ ca bhayātparijanasya ca vadhabandhabhayāccaiva tā bhagnāśā hi yoṣitaḥ

'पुरुषों की अनुपलब्धता से, परिजनों के भय से, तथा वध और बंधन के भय से ही, आशा टूटी हुई वे स्त्रियाँ संयमित रहती हैं।'

श्लोक 28 (shiva.uma.24.28)

चलस्वभाव दुश्चेष्टा दुर्गाह्या भावतस्तथा । प्राज्ञस्य पुरुषस्येह यथा रतिपरिग्रहात्

calasvabhāva duśceṣṭā durgāhyā bhāvatastathā prājñasya puruṣasyeha yathā ratiparigrahāt

'उनका स्वभाव चंचल, आचरण दुष्ट तथा वास्तविक भाव समझ पाना कठिन है, जैसा कि किसी बुद्धिमान पुरुष को उनसे संबंध बनाने पर ही ज्ञात हो जाता है।'

श्लोक 29 (shiva.uma.24.29)

नाग्निस्तुष्यति काष्ठानां नापगानां महोदधि । नान्तकः सर्वभूतानां न पुंसां वामलोचनाः

nāgnistuṣyati kāṣṭhānāṁ nāpagānāṁ mahodadhi nāntakaḥ sarvabhūtānāṁ na puṁsāṁ vāmalocanāḥ

'जैसे अग्नि लकड़ी से कभी तृप्त नहीं होती, महासागर नदियों से कभी तृप्त नहीं होता, मृत्यु समस्त प्राणियों से कभी तृप्त नहीं होती, वैसे ही सुंदर नेत्रों वाली स्त्रियाँ पुरुषों से कभी तृप्त नहीं होतीं।'

श्लोक 30 (shiva.uma.24.30)

इदमन्यच्च देवर्षे रहस्यं सर्वयोषिताम् । दृष्ट्वैव पुरुषं सद्यो योनिः प्रक्लिद्यते स्त्रियाः

idamanyacca devarṣe rahasyaṁ sarvayoṣitām dṛṣṭvaiva puruṣaṁ sadyo yoniḥ praklidyate striyāḥ

'हे देवर्षि! और भी एक रहस्य है समस्त स्त्रियों का -- पुरुष को देखते ही तत्काल स्त्री की योनि आर्द्र हो जाती है।'

श्लोक 31 (shiva.uma.24.31)

सुस्नातं पुरुषं दृष्ट्वा सुगन्धं मलवर्जितम् । योनिः प्रक्लिद्यते स्त्रीणां दृतेः पात्रादिवोदकम्

susnātaṁ puruṣaṁ dṛṣṭvā sugandhaṁ malavarjitam yoniḥ praklidyate strīṇāṁ dṛteḥ pātrādivodakam

'भलीभाँति स्नान किए हुए, सुगंधित तथा मैल-रहित पुरुष को देखकर स्त्रियों की योनि उसी प्रकार आर्द्र हो जाती है, जैसे चमड़े के थैले के पात्र से जल रिसता है।'

श्लोक 32 (shiva.uma.24.32)

कायानामपि दातारं कर्त्तारं मानसान्त्वयोः । रक्षितारं न मृष्यन्ति भर्तारं परमं स्त्रियः

kāyānāmapi dātāraṁ karttāraṁ mānasāntvayoḥ rakṣitāraṁ na mṛṣyanti bhartāraṁ paramaṁ striyaḥ

'स्त्रियाँ अपने ही शरीर के सुखों के दाता, मन को शांति देने वाले तथा सर्वोच्च रक्षक -- अपने पति को भी सहन नहीं करतीं।'

श्लोक 33 (shiva.uma.24.33)

न कामभोगात्परमान्नालङ्कारार्थसञ्चयात् । तथा हितं न मन्यन्ते यथा रतिपरिग्रहात्

na kāmabhogātparamānnālaṅkārārthasañcayāt tathā hitaṁ na manyante yathā ratiparigrahāt

'स्त्रियाँ न तो श्रेष्ठ काम-भोग को, न आभूषण-धन के संचय को उतना हितकर मानती हैं, जितना नए संबंध बनाने को मानती हैं।'

श्लोक 34 (shiva.uma.24.34)

अन्तकः शमनो मृत्युः पातालं वडवामुखम् । क्षुरधारा विषं सर्पो वह्निरित्येकतः स्त्रियः

antakaḥ śamano mṛtyuḥ pātālaṁ vaḍavāmukham kṣuradhārā viṣaṁ sarpo vahnirityekataḥ striyaḥ

'मृत्यु, यम, अंतक, पाताल, बड़वानल, तीक्ष्ण छुरे की धार, विष, सर्प और अग्नि -- ये सब एक ओर, और स्त्रियाँ दूसरी ओर, समान रूप से भयावह हैं।'

श्लोक 35 (shiva.uma.24.35)

यतश्च भूतानि महान्ति पञ्च यतश्च लोको विहितो विधात्रा । यतः पुमांसः प्रमदाश्च निर्मिताः सदैव दोषः प्रमदासु नारद

yataśca bhūtāni mahānti pañca yataśca loko vihito vidhātrā yataḥ pumāṁsaḥ pramadāśca nirmitāḥ sadaiva doṣaḥ pramadāsu nārada

'हे नारद! जिस स्रोत से पाँच महाभूत उत्पन्न हुए, जिससे विधाता ने इस लोक की रचना की, जिससे पुरुष और स्त्रियाँ दोनों निर्मित हुए -- उसी स्रोत से स्त्रियों में सदा दोष विद्यमान रहा है।'

श्लोक 36 (shiva.uma.24.36)

सनत्कुमार उवाच । इति श्रुत्वा वचस्तस्या नारदस्तुष्टमानसः । तथ्यं मत्वा ततस्तद्वै विरक्तोऽभूद्धि तासु च

sanatkumāra uvāca iti śrutvā vacastasyā nāradastuṣṭamānasaḥ tathyaṁ matvā tatastadvai virakto'bhūddhi tāsu ca

सनत्कुमार जी ने कहा -- इस प्रकार उसके वचन सुनकर नारद जी का मन संतुष्ट हुआ, और उसे सत्य मानकर वे स्त्रियों के प्रति विरक्त हो गए।

श्लोक 37 (shiva.uma.24.37)

इत्युक्तः स्त्रीस्वभावस्ते पञ्चचूडोक्त आदरात् । वैराग्यकारणं व्यास किमन्यच्छ्रोतुमर्हसि

ityuktaḥ strīsvabhāvaste pañcacūḍokta ādarāt vairāgyakāraṇaṁ vyāsa kimanyacchrotumarhasi

इस प्रकार पंचचूड़ा द्वारा आदरपूर्वक कहा गया यह स्त्री-स्वभाव, जो वैराग्य का कारण है, तुम्हें बताया गया। हे व्यास! अब और क्या सुनना चाहते हो?

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