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उमा संहिता · अध्याय 26

काल-वंचन का वर्णन

अध्याय 25अध्याय-सूचीअध्याय 27

श्लोक 1 (shiva.uma.26.1)

देव्युवाच । कथितं तु त्वया देव कालज्ञानं यथार्थतः । कालस्य वञ्चनं ब्रूहि यथा तत्त्वेन योगिनः

devyuvāca kathitaṁ tu tvayā deva kālajñānaṁ yathārthataḥ kālasya vañcanaṁ brūhi yathā tattvena yoginaḥ

देवी ने कहा — हे देव! आपने काल-ज्ञान यथार्थतः बता दिया। अब मुझे बताइए कि योगीजन तत्त्वतः किस प्रकार काल को वंचित (छल) कर सकते हैं।

श्लोक 2 (shiva.uma.26.2)

कालस्तु सन्निकृष्टो हि वर्तते सर्वजन्तुषु । यथा चास्य न मृत्युश्च वञ्चते कालमागतम्

kālastu sannikṛṣṭo hi vartate sarvajantuṣu yathā cāsya na mṛtyuśca vañcate kālamāgatam

काल तो सभी प्राणियों के समीप ही स्थित रहता है; कैसे उसकी मृत्यु न हो और आते हुए काल को किस प्रकार वंचित (छल) किया जाए —

श्लोक 3 (shiva.uma.26.3)

तथा कथय मे देव प्रीतिं कृत्वा ममोपरि । योगिनां च हिताय त्वं ब्रूहि सर्वसुखप्रद

tathā kathaya me deva prītiṁ kṛtvā mamopari yogināṁ ca hitāya tvaṁ brūhi sarvasukhaprada

— हे देव, मुझ पर प्रेम करते हुए यह बताइए; हे सर्वसुखप्रद! योगियों के हित के लिए यह बताइए।

श्लोक 4 (shiva.uma.26.4)

शङ्कर उवाच । शृणु देवि प्रवक्ष्यामि पृष्टोऽहं यत्त्वया शिवे । समासेन च सर्वेषां मानुषाणां हितार्थतः

śaṅkara uvāca śṛṇu devi pravakṣyāmi pṛṣṭo'haṁ yattvayā śive samāsena ca sarveṣāṁ mānuṣāṇāṁ hitārthataḥ

शंकर जी ने कहा — हे देवि! सुनो, तुमने जो पूछा है, हे शिवे, वह मैं बताऊँगा, संक्षेप में और समस्त मनुष्यों के हित के लिए।

श्लोक 5 (shiva.uma.26.5)

पृथिव्यापस्तथा तेजो वायुराकाशमेव च । एतेषां हि समायोगः शरीरं पाञ्चभौतिकम्

pṛthivyāpastathā tejo vāyurākāśameva ca eteṣāṁ hi samāyogaḥ śarīraṁ pāñcabhautikam

पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश — इन्हीं के संयोग से पाञ्चभौतिक शरीर बनता है।

श्लोक 6 (shiva.uma.26.6)

आकाशस्तु ततो व्यापी सर्वेषां सर्वगः स्थितः । आकाशे तु विलीयन्ते सम्भवन्ति पुनस्ततः

ākāśastu tato vyāpī sarveṣāṁ sarvagaḥ sthitaḥ ākāśe tu vilīyante sambhavanti punastataḥ

आकाश सबसे अधिक व्यापक होकर सबमें सर्वत्र विद्यमान रहता है; आकाश में ही सभी तत्त्व विलीन होते हैं और उसी से पुनः उत्पन्न होते हैं।

श्लोक 7 (shiva.uma.26.7)

वियोगे तु सदा कस्य स्वं धाम प्रतिपेदिरे । तस्या न स्थिरता चास्ति सन्निपातस्य सुन्दरि

viyoge tu sadā kasya svaṁ dhāma pratipedire tasyā na sthiratā cāsti sannipātasya sundari

वियोग (मृत्यु) के समय प्रत्येक तत्त्व अपने-अपने धाम को प्राप्त हो जाता है; हे सुन्दरि! इस तत्त्वों के सन्निपात (संयोग) में कोई स्थिरता नहीं है।

श्लोक 8 (shiva.uma.26.8)

ज्ञानिनोऽपि तथा तत्र तपोमन्त्रबलादपि । ते सर्वे सुविजानन्ति सर्वमेतन्न संशयः

jñānino'pi tathā tatra tapomantrabalādapi te sarve suvijānanti sarvametanna saṁśayaḥ

वहाँ ज्ञानीजन भी तप और मन्त्र के बल से यह सब भलीभाँति जानते हैं — इसमें कोई संशय नहीं।

श्लोक 9 (shiva.uma.26.9)

देव्युवाच । खं तेन यन्नश्यति घोररूपः कालः करालस्त्रिदिवैकनाथः । दग्धस्त्वया त्वं पुनरेव तुष्टः स्तोत्रैः स्तुतः स्वां प्रकृतिं स लेभे

devyuvāca khaṁ tena yannaśyati ghorarūpaḥ kālaḥ karālastridivaikanāthaḥ dagdhastvayā tvaṁ punareva tuṣṭaḥ stotraiḥ stutaḥ svāṁ prakṛtiṁ sa lebhe

देवी ने कहा — उस शक्ति से आकाश भी नष्ट हो जाता है, वह भयंकर, विकराल काल — त्रिलोक का एकमात्र स्वामी। उसे आपने दग्ध किया था, और पुनः प्रसन्न होकर, स्तोत्रों से स्तुति किए जाने पर उसने अपना स्वरूप पुनः प्राप्त किया।

श्लोक 10 (shiva.uma.26.10)

त्वया स चोक्तः कथया जनाना- मदृष्टरूपः प्रचरिष्यसीति । दृष्टस्त्वया तत्र महाप्रभावः प्रभोर्वरात्ते पुनरुत्थितश्च

tvayā sa coktaḥ kathayā janānā- madṛṣṭarūpaḥ pracariṣyasīti dṛṣṭastvayā tatra mahāprabhāvaḥ prabhorvarātte punarutthitaśca

और आपने उससे यह कहा था कि 'तू लोगों के बीच अदृश्य रूप में विचरण करेगा।' और वहाँ वह महाप्रभावशाली, आपके द्वारा देखा गया, प्रभु के वरदान से पुनः उठ खड़ा हुआ।

श्लोक 11 (shiva.uma.26.11)

तदद्य भोः काल इहास्थि किञ्चित् निहन्यते येन वदस्व तन्मे । त्वं योगिवर्यः प्रभुरात्मतन्त्रः परोपकारात्ततनुर्महेश

tadadya bhoḥ kāla ihāsthi kiñcit nihanyate yena vadasva tanme tvaṁ yogivaryaḥ prabhurātmatantraḥ paropakārāttatanurmaheśa

तो अब, हे प्रभु, मुझे यह बताइए कि यहाँ स्थित काल को किस प्रकार कुछ मात्रा में भी परास्त किया जा सकता है। आप योगियों में श्रेष्ठ हैं, स्वतन्त्र प्रभु हैं; हे महेश, आपने केवल परोपकार के लिए ही यह देह धारण की है।

श्लोक 12 (shiva.uma.26.12)

शङ्कर उवाच । न हन्यते देववरैस्तु दैत्यैः सयक्षरक्षोरगमानुषैश्च । ये योगिनो ध्यानपराः सदेहा भवन्ति ते घ्नन्ति सुखेन कालम्

śaṅkara uvāca na hanyate devavaraistu daityaiḥ sayakṣarakṣoragamānuṣaiśca ye yogino dhyānaparāḥ sadehā bhavanti te ghnanti sukhena kālam

शंकर जी ने कहा — काल को न तो श्रेष्ठ देवगण मार सकते हैं, न दैत्य, न यक्ष, राक्षस, नाग अथवा मनुष्य। जो योगी ध्यान में तत्पर रहते हुए देहधारी अवस्था में ही रहते हैं, वे ही सुखपूर्वक काल को जीत लेते हैं।

श्लोक 13 (shiva.uma.26.13)

सनत्कुमार उवाच । एतच्छ्रुत्वा त्रिभुवनगुरोः प्राह गौरी विहस्य सत्यं त्वं मे वद कथमसौ हन्यते येन कालः । शम्भुस्तामाह सद्यो हिमकरवदने योगिनो ये क्षिपन्ति कालव्यालं सकलमनघास्तच्छृणुष्वैकचित्ताः

sanatkumāra uvāca etacchrutvā tribhuvanaguroḥ prāha gaurī vihasya satyaṁ tvaṁ me vada kathamasau hanyate yena kālaḥ śambhustāmāha sadyo himakaravadane yogino ye kṣipanti kālavyālaṁ sakalamanaghāstacchṛṇuṣvaikacittāḥ

सनत्कुमार जी ने कहा — त्रिभुवन के गुरु से यह सुनकर गौरी ने हँसते हुए कहा, 'सत्य-सत्य मुझे बताइए, वह काल किस प्रकार नष्ट होता है?' शम्भु ने तुरन्त उनसे कहा — 'हे चन्द्रमुखी! जो निष्पाप योगीजन काल-रूपी सर्प को पूर्णतः दूर फेंक देते हैं, वह सब एकाग्रचित्त होकर सुनो —'

श्लोक 14 (shiva.uma.26.14)

शङ्कर उवाच । पञ्चभूतात्मको देहः सदा युक्तस्तु तद्गुणैः । उत्पाद्यते वरारोहे तद्विलीनो हि पार्थिवः

śaṅkara uvāca pañcabhūtātmako dehaḥ sadā yuktastu tadguṇaiḥ utpādyate varārohe tadvilīno hi pārthivaḥ

शंकर जी ने कहा — हे वरारोहे! पञ्चभूतों से बना यह देह सदा उनके गुणों से युक्त रहता है; यह उत्पन्न होता है और पार्थिव होने के कारण उन्हीं में विलीन हो जाता है।

श्लोक 15 (shiva.uma.26.15)

आकाशाज्जायते वायुर्वायोस्तेजश्च जायते । तेजसोऽम्बु विनिर्द्दिष्टं तस्माद्धि पृथिवी भवेत्

ākāśājjāyate vāyurvāyostejaśca jāyate tejaso'mbu vinirddiṣṭaṁ tasmāddhi pṛthivī bhavet

आकाश से वायु उत्पन्न होती है, वायु से तेज (अग्नि) उत्पन्न होता है, तेज से जल की उत्पत्ति कही गई है, और जल से पृथ्वी उत्पन्न होती है।

श्लोक 16 (shiva.uma.26.16)

पृथिव्यादीनि भूतानि गच्छन्ति क्रमशः परम् । धरा पञ्चगुणा प्रोक्ता ह्यापश्चैव चतुर्गुणाः

pṛthivyādīni bhūtāni gacchanti kramaśaḥ param dharā pañcaguṇā proktā hyāpaścaiva caturguṇāḥ

पृथ्वी आदि भूत क्रमशः परम तत्त्व की ओर अग्रसर होते हैं; पृथ्वी को पाँच गुणों वाली कहा गया है, और जल को चार गुणों वाला।

श्लोक 17 (shiva.uma.26.17)

त्रिगुणं च तथा तेजो वायुर्द्विगुण एव च । शब्दैकगुणमाकाशं पृथिव्यादिषु कीर्तितम्

triguṇaṁ ca tathā tejo vāyurdviguṇa eva ca śabdaikaguṇamākāśaṁ pṛthivyādiṣu kīrtitam

तेज तीन गुणों वाला है, और वायु दो गुणों वाली; आकाश का एकमात्र गुण शब्द है — इस प्रकार पृथ्वी आदि तत्त्वों में यह वर्णित है।

श्लोक 18 (shiva.uma.26.18)

शब्दः स्पर्शश्च रूपं च रसो गन्धश्च पञ्चमः । विजहाति गुणं स्वं स्वं तदा भूतं विपद्यते

śabdaḥ sparśaśca rūpaṁ ca raso gandhaśca pañcamaḥ vijahāti guṇaṁ svaṁ svaṁ tadā bhūtaṁ vipadyate

शब्द, स्पर्श, रूप, रस और पाँचवाँ गन्ध — जब कोई भूत अपने-अपने गुण को त्याग देता है, तब वह नष्ट (विलीन) हो जाता है।

श्लोक 19 (shiva.uma.26.19)

तदा गुणं विगृह्णाति प्रादुर्भूतं तदुच्यते । एवं जानीहि देवेशि पञ्चभूतानि तत्त्वतः

tadā guṇaṁ vigṛhṇāti prādurbhūtaṁ taducyate evaṁ jānīhi deveśi pañcabhūtāni tattvataḥ

और जब वह नया गुण ग्रहण करता है, तब उसे प्रादुर्भूत (प्रकट) कहा जाता है। इस प्रकार, हे देवेशि, पञ्चभूतों को तत्त्वतः जानो।

श्लोक 20 (shiva.uma.26.20)

तस्माद्धि योगिना नित्यं स्वस्वकालेंऽशजा गुणाः । चिन्तनीयाः प्रयत्नेन देवि कालजिगीषुणा

tasmāddhi yoginā nityaṁ svasvakāleṁ'śajā guṇāḥ cintanīyāḥ prayatnena devi kālajigīṣuṇā

इसलिए, हे देवि, काल पर विजय पाने की इच्छा रखने वाले योगी को अपने-अपने काल में उत्पन्न होने वाले गुणों का सदा प्रयत्नपूर्वक चिन्तन करना चाहिए।

श्लोक 21 (shiva.uma.26.21)

देव्युवाच । कथं जेजीयते कालो योगिभिर्योगवित्प्रभो । ध्यानेन चाथ मन्त्रेण तत्सर्वं कथयस्व मे

devyuvāca kathaṁ jejīyate kālo yogibhiryogavitprabho dhyānena cātha mantreṇa tatsarvaṁ kathayasva me

देवी ने कहा — हे योगवित् प्रभो! योगीजन काल को किस प्रकार जीतते हैं — ध्यान से अथवा मन्त्र से? यह सब मुझे बताइए।

श्लोक 22 (shiva.uma.26.22)

शङ्कर उवाच । शृणु देवि प्रवक्ष्यामि योगिनां हितकाम्यया । परज्ञानप्रकथनं न देयं यस्य कस्यचित्

śaṅkara uvāca śṛṇu devi pravakṣyāmi yogināṁ hitakāmyayā parajñānaprakathanaṁ na deyaṁ yasya kasyacit

शंकर जी ने कहा — हे देवि! सुनो, मैं योगियों के हित की कामना से यह बताऊँगा; परन्तु इस परम ज्ञान का उपदेश जिस-किसी को नहीं देना चाहिए।

श्लोक 23 (shiva.uma.26.23)

श्रद्दधानाय दातव्यं भक्तियुक्ताय धीमते । अनास्तिकाय शुद्धाय धर्मनित्याय भामिनि

śraddadhānāya dātavyaṁ bhaktiyuktāya dhīmate anāstikāya śuddhāya dharmanityāya bhāmini

हे भामिनि! यह ज्ञान श्रद्धावान्, भक्तियुक्त, बुद्धिमान्, आस्तिक, शुद्ध और सदा धर्मपरायण व्यक्ति को ही देना चाहिए।

श्लोक 24 (shiva.uma.26.24)

सुश्वासेन सुशय्यायां योगं युञ्जीत योगवित् । दीपं विनान्धकारे तु प्रजाः सुप्तेषु धारयेत्

suśvāsena suśayyāyāṁ yogaṁ yuñjīta yogavit dīpaṁ vināndhakāre tu prajāḥ supteṣu dhārayet

शान्त श्वास के साथ, अच्छी शय्या पर, योग जानने वाले को योग का अभ्यास करना चाहिए; अन्धकार में, बिना दीपक के, जब लोग सोए हों, तब इसे धारण करना चाहिए।

श्लोक 25 (shiva.uma.26.25)

तर्जन्या पिहितौ कर्णौ पीडयित्वा मुहूर्त्तकम् । तस्मात्संश्रूयते शब्दस्तुदन्वह्निसमुद्भवः

tarjanyā pihitau karṇau pīḍayitvā muhūrttakam tasmātsaṁśrūyate śabdastudanvahnisamudbhavaḥ

तर्जनी अँगुलियों से दोनों कानों को बन्द कर मुहूर्त भर दबाए रखने पर, उससे एक स्पन्दनयुक्त ध्वनि सुनाई देती है, मानो अग्नि से उत्पन्न हो रही हो।

श्लोक 26 (shiva.uma.26.26)

सन्ध्यातो भुक्तमेवं हि चावसन्नं क्षणादपि । सर्वरोगान्निहत्याशु ज्वरोपद्रवकान्बहून्

sandhyāto bhuktamevaṁ hi cāvasannaṁ kṣaṇādapi sarvarogānnihatyāśu jvaropadravakānbahūn

इस प्रकार सन्ध्या के समय, भोजन के पश्चात्, अथवा क्षण भर के अवसर पर भी अभ्यास करने से, यह शीघ्र ही समस्त रोगों को, अनेक ज्वर और उपद्रवों सहित, नष्ट कर देता है।

श्लोक 27 (shiva.uma.26.27)

यश्चोपलक्षयेन्नित्यमाकारं घटिकाद्वयम् । जित्वा मृत्युं तथा कामं स्वेच्छया पर्यटेदिह

yaścopalakṣayennityamākāraṁ ghaṭikādvayam jitvā mṛtyuṁ tathā kāmaṁ svecchayā paryaṭediha

जो प्रतिदिन दो घड़ी (लगभग अड़तालीस मिनट) तक इस स्वरूप का अभ्यास करता है, वह मृत्यु और काम को जीतकर इस लोक में स्वेच्छा से विचरण कर सकता है।

श्लोक 28 (shiva.uma.26.28)

सर्वज्ञः सर्वदर्शी च सर्वसिद्धिमवाप्नुयात् । यथा नदति खेऽब्दो हि प्रावृडद्भिः सुसंयतः

sarvajñaḥ sarvadarśī ca sarvasiddhimavāpnuyāt yathā nadati khe'bdo hi prāvṛḍadbhiḥ susaṁyataḥ

वह सर्वज्ञ और सर्वदर्शी हो जाता है, और समस्त सिद्धियाँ प्राप्त कर लेता है — जैसे वर्षा ऋतु में जल से भरा हुआ बादल आकाश में गरजता है।

श्लोक 29 (shiva.uma.26.29)

तं श्रुत्वा मुच्यते योगी सद्यः संसारबन्धनात् । ततः स योगिभिर्न्नित्यं सूक्ष्मात्सूक्ष्मतरो भवेत्

taṁ śrutvā mucyate yogī sadyaḥ saṁsārabandhanāt tataḥ sa yogibhirnnityaṁ sūkṣmātsūkṣmataro bhavet

उस नाद को सुनकर योगी तत्काल संसार-बन्धन से मुक्त हो जाता है; तत्पश्चात् वह योगियों में सदा सूक्ष्म से भी अधिक सूक्ष्म हो जाता है।

श्लोक 30 (shiva.uma.26.30)

एष ते कथितो देवि शब्दब्रह्मविधिक्रमः । पलालमिव धान्यार्थी त्यजेद्बन्धमशेषतः

eṣa te kathito devi śabdabrahmavidhikramaḥ palālamiva dhānyārthī tyajedbandhamaśeṣataḥ

हे देवि! यह तुम्हें शब्द-ब्रह्म की विधि बताई गई। जैसे अन्न चाहने वाला भूसे को त्याग देता है, वैसे ही सम्पूर्ण बन्धन को त्याग देना चाहिए।

श्लोक 31 (shiva.uma.26.31)

शब्दब्रह्म त्विदं प्राप्य ये केचिदन्यकाङ्क्षिणः । घ्नन्ति ते मुष्टिनाकाशं कामयन्ते क्षुधां तृषाम्

śabdabrahma tvidaṁ prāpya ye kecidanyakāṅkṣiṇaḥ ghnanti te muṣṭinākāśaṁ kāmayante kṣudhāṁ tṛṣām

जो लोग इस शब्द-ब्रह्म को प्राप्त करके भी अन्य कुछ चाहते हैं, वे मानो मुट्ठी से आकाश पर प्रहार करते हैं; वे केवल भूख-प्यास की ही कामना करते हैं।

श्लोक 32 (shiva.uma.26.32)

ज्ञात्वा परमिदं ब्रह्म सुखदं मुक्तिकारणम् । अबाह्यमक्षरं चैव सर्वोपाधिविवर्जितम्

jñātvā paramidaṁ brahma sukhadaṁ muktikāraṇam abāhyamakṣaraṁ caiva sarvopādhivivarjitam

इस परम ब्रह्म को जानकर, जो सुखदायी और मुक्ति का कारण है, जो बाह्यरहित, अक्षर और समस्त उपाधियों से रहित है —

श्लोक 33 (shiva.uma.26.33)

मोहिताः कालपाशेन मृत्युपाशवशङ्गताः । शब्दब्रह्म न जानन्ति पापिनस्ते कुबुद्धयः

mohitāḥ kālapāśena mṛtyupāśavaśaṅgatāḥ śabdabrahma na jānanti pāpinaste kubuddhayaḥ

— काल के पाश से मोहित, मृत्यु के पाश के वशीभूत, पापी और कुबुद्धि लोग इस शब्द-ब्रह्म को नहीं जान पाते।

श्लोक 34 (shiva.uma.26.34)

तावद् भ्रमन्ति संसारे यावद्धाम न विन्दते । विदिते तु परे तत्त्वे मुच्यते जन्मबन्धनात्

tāvad bhramanti saṁsāre yāvaddhāma na vindate vidite tu pare tattve mucyate janmabandhanāt

वे तब तक संसार में भटकते रहते हैं जब तक उन्हें वह सच्चा धाम प्राप्त नहीं होता; परन्तु परम तत्त्व को जान लेने पर वे जन्म-बन्धन से मुक्त हो जाते हैं।

श्लोक 35 (shiva.uma.26.35)

निद्रालस्यं महाविघ्नं जित्वा शत्रुं प्रयत्नतः । सुखासने स्थितो नित्यं शब्दब्रह्माभ्यसन्निति

nidrālasyaṁ mahāvighnaṁ jitvā śatruṁ prayatnataḥ sukhāsane sthito nityaṁ śabdabrahmābhyasanniti

निद्रा और आलस्य — इस महाविघ्न रूपी शत्रु को प्रयत्नपूर्वक जीतकर, सुखासन में स्थित होकर सदा इस प्रकार शब्द-ब्रह्म का अभ्यास करना चाहिए।

श्लोक 36 (shiva.uma.26.36)

शतवृद्धः पुमांल्लब्ध्वा यावदायुः समभ्यसेत् । मृत्युञ्जयवपुस्तम्भ आरोग्यं वायुवर्द्धनम्

śatavṛddhaḥ pumāṁllabdhvā yāvadāyuḥ samabhyaset mṛtyuñjayavapustambha ārogyaṁ vāyuvarddhanam

सौ वर्ष की आयु वाला पुरुष भी इसे प्राप्त कर जीवन-भर इसका अभ्यास करे; यह मृत्यु को जीतने वाला अटल शरीर, आरोग्य तथा प्राणवायु की वृद्धि प्रदान करता है।

श्लोक 37 (shiva.uma.26.37)

प्रत्ययो दृश्यते वृद्धे किं पुनस्तरुणे जने । न चोङ्कारो न मन्त्रोऽपि नैव बीजं न चाक्षरम्

pratyayo dṛśyate vṛddhe kiṁ punastaruṇe jane na coṅkāro na mantro'pi naiva bījaṁ na cākṣaram

इसका प्रमाण वृद्ध पुरुष में भी देखा जाता है — तरुण मनुष्य में तो और भी अधिक! यह न ओंकार है, न मन्त्र है, न बीजाक्षर है और न ही कोई अक्षर —

श्लोक 38 (shiva.uma.26.38)

अनाहतमनुच्चार्यं शब्दब्रह्म शिवं परम् । ध्यायन्ते देवि सततं सुधियो यत्नतः प्रिये

anāhatamanuccāryaṁ śabdabrahma śivaṁ param dhyāyante devi satataṁ sudhiyo yatnataḥ priye

— यह अनाहत (बिना आघात के उत्पन्न होने वाला), अनुच्चार्य शब्द-ब्रह्म ही परम शिव-तत्त्व है। हे प्रिये, सुधीजन इसका सतत और प्रयत्नपूर्वक ध्यान करते हैं।

श्लोक 39 (shiva.uma.26.39)

तस्माच्छब्दा नव प्रोक्ताः प्राणविद्भिस्तु लक्षिताः । तान् प्रवक्ष्यामि यत्नेन नादसिद्धिमनुक्रमात्

tasmācchabdā nava proktāḥ prāṇavidbhistu lakṣitāḥ tān pravakṣyāmi yatnena nādasiddhimanukramāt

इसी से नौ प्रकार के शब्द बताए गए हैं, जिन्हें प्राण के जानकारों ने पहचाना है। अब मैं उन्हें क्रमशः, नाद-सिद्धि के रूप में, प्रयत्नपूर्वक बताऊँगा।

श्लोक 40 (shiva.uma.26.40)

घोषं कांस्यं तथा शृङ्गं घण्टां वीणादिवंशजान् । दुन्दुभिं शङ्खशब्दं तु नवमं मेघगर्जितम्

ghoṣaṁ kāṁsyaṁ tathā śṛṅgaṁ ghaṇṭāṁ vīṇādivaṁśajān dundubhiṁ śaṅkhaśabdaṁ tu navamaṁ meghagarjitam

घोष (गर्जन), काँसे की ध्वनि, शृंग (सींग), घण्टा, वीणा-वंश आदि (वाद्य), दुन्दुभि, शंख-ध्वनि, और नौवीं मेघ-गर्जन की ध्वनि।

श्लोक 41 (shiva.uma.26.41)

नव शब्दान् परित्यज्य तुङ्कारं तु समभ्यसेत् । ध्यायन्नेवं सदा योगी पुण्यैः पापैर्न लिप्यते

nava śabdān parityajya tuṅkāraṁ tu samabhyaset dhyāyannevaṁ sadā yogī puṇyaiḥ pāpairna lipyate

इन नौ ध्वनियों को पार कर 'तुं'-कार ध्वनि का अभ्यास करना चाहिए; इस प्रकार सदा ध्यान करने वाला योगी पुण्य और पाप, दोनों से लिप्त नहीं होता।

श्लोक 42 (shiva.uma.26.42)

न शृणोति यदा शृण्वन्योगाभ्यासेन देविके । म्रियतेऽभ्यसमानस्तु योगी तिष्ठेद्दिवानिशम्

na śṛṇoti yadā śṛṇvanyogābhyāsena devike mriyate'bhyasamānastu yogī tiṣṭheddivāniśam

हे देविके! जब योगाभ्यास के कारण सुनते हुए भी वह नौ ध्वनियाँ सुनाई न दें, तब वह सांसारिक श्रवण मानो लुप्त हो जाता है, और अभ्यासरत योगी दिन-रात स्थिर रहता है।

श्लोक 43 (shiva.uma.26.43)

तस्मादुत्पद्यते शब्दो मृत्युजित्सप्तभिर्दिनैः । स वै नवविधो देवि तं ब्रवीमि यथार्थतः

tasmādutpadyate śabdo mṛtyujitsaptabhirdinaiḥ sa vai navavidho devi taṁ bravīmi yathārthataḥ

उससे सात दिनों के भीतर मृत्यु को जीतने वाली ध्वनि उत्पन्न होती है; हे देवि, वह वस्तुतः नौ प्रकार की है — अब मैं उसे यथार्थतः बताता हूँ।

श्लोक 44 (shiva.uma.26.44)

प्रथमं नदते घोषमात्मशुद्धिकरं परम् । सर्वव्याधिहरं नादं वश्याकर्षणमुत्तमम्

prathamaṁ nadate ghoṣamātmaśuddhikaraṁ param sarvavyādhiharaṁ nādaṁ vaśyākarṣaṇamuttamam

पहली घोष-ध्वनि गूँजती है, जो आत्मशुद्धि करने वाली परम ध्वनि है; यह सर्वरोगनाशक नाद है, और वशीकरण-आकर्षण के लिए उत्तम है।

श्लोक 45 (shiva.uma.26.45)

द्वितीयं नदते कांस्यं स्तम्भयेत् प्राणिनां गतिम् । विषं भूतग्रहान् सर्वान् बध्नीयान्नात्र संशयः

dvitīyaṁ nadate kāṁsyaṁ stambhayet prāṇināṁ gatim viṣaṁ bhūtagrahān sarvān badhnīyānnātra saṁśayaḥ

दूसरी काँसे की ध्वनि गूँजती है, जो प्राणियों की गति को स्तम्भित कर सकती है; यह विष और समस्त भूत-ग्रहों को बाँध सकती है — इसमें संशय नहीं।

श्लोक 46 (shiva.uma.26.46)

तृतीयं नदते शृङ्गमभिचारि नियोजयेत् । विद्विडुच्चाटने शत्रोर्मारणे च प्रयोजयेत्

tṛtīyaṁ nadate śṛṅgamabhicāri niyojayet vidviḍuccāṭane śatrormāraṇe ca prayojayet

तीसरी शृंग-ध्वनि गूँजती है, जिसका प्रयोग अभिचार (मारण-उच्चाटन) कर्मों में किया जाता है; इसका उपयोग शत्रु या विद्वेषी को उच्चाटित करने अथवा उसके मारण के लिए भी किया जाता है।

श्लोक 47 (shiva.uma.26.47)

घण्टानादं चतुर्थं तु वदते परमेश्वरः । आकर्षः सर्वदेवानां किं पुनर्मानुषा भुवि

ghaṇṭānādaṁ caturthaṁ tu vadate parameśvaraḥ ākarṣaḥ sarvadevānāṁ kiṁ punarmānuṣā bhuvi

परमेश्वर चौथी घण्टा-ध्वनि बताते हैं; यह समस्त देवताओं को भी आकर्षित करने वाली है — फिर पृथ्वी पर मनुष्यों की तो बात ही क्या!

श्लोक 48 (shiva.uma.26.48)

यक्षगन्धर्वकन्याश्च तस्याकृष्टा ददन्ति हि । यथेप्सितां महासिद्धिं योगिने कामतोऽपि वा

yakṣagandharvakanyāśca tasyākṛṣṭā dadanti hi yathepsitāṁ mahāsiddhiṁ yogine kāmato'pi vā

यक्ष और गन्धर्व-कन्याएँ भी इससे आकृष्ट होकर योगी को उसकी इच्छानुसार महासिद्धि प्रदान करती हैं, यहाँ तक कि स्वेच्छा से भी।

श्लोक 49 (shiva.uma.26.49)

वीणा तु पञ्चमो नादः श्रूयते योगिभिः सदा । तस्मादुत्पद्यते देवि दूरादर्शनमेव हि

vīṇā tu pañcamo nādaḥ śrūyate yogibhiḥ sadā tasmādutpadyate devi dūrādarśanameva hi

वीणा की ध्वनि पाँचवाँ नाद है, जिसे योगीजन सदा सुनते हैं; हे देवि, इससे दूर-दर्शन (दूरस्थ वस्तुओं को देखने) की शक्ति उत्पन्न होती है।

श्लोक 50 (shiva.uma.26.50)

ध्यायतो वंशनादं तु सर्वतत्त्वं प्रजायते । दुन्दुभिं ध्यायमानस्तु जरामृत्युविवर्जितः

dhyāyato vaṁśanādaṁ tu sarvatattvaṁ prajāyate dundubhiṁ dhyāyamānastu jarāmṛtyuvivarjitaḥ

वंश (बाँसुरी) की ध्वनि का ध्यान करने से सम्पूर्ण तत्त्व-ज्ञान उत्पन्न होता है; और दुन्दुभि-ध्वनि का ध्यान करने वाला जरा-मृत्यु से रहित हो जाता है।

श्लोक 51 (shiva.uma.26.51)

शङ्खशब्देन देवेशि कामरूपं प्रपद्यते । योगिनो मेघनादेन न विपत्सङ्गमो भवेत्

śaṅkhaśabdena deveśi kāmarūpaṁ prapadyate yogino meghanādena na vipatsaṅgamo bhavet

हे देवेशि! शंख-ध्वनि से मनुष्य कामरूप (इच्छानुसार रूप धारण करने की शक्ति) प्राप्त करता है; मेघ-गर्जन की ध्वनि से योगी को कभी विपत्ति का सामना नहीं करना पड़ता।

श्लोक 52 (shiva.uma.26.52)

यश्चैकमनसा नित्यं तुङ्कारं ब्रह्मरूपिणम् । किमसाध्यं न तस्यास्ति यथामति वरानने

yaścaikamanasā nityaṁ tuṅkāraṁ brahmarūpiṇam kimasādhyaṁ na tasyāsti yathāmati varānane

हे वरानने! जो एकाग्रचित्त होकर सदा ब्रह्मस्वरूप 'तुं'-कार का ध्यान करता है, उसके लिए अपनी बुद्धि के अनुसार क्या असाध्य रह जाता है?

श्लोक 53 (shiva.uma.26.53)

सर्वज्ञः सर्वदर्शी च कामरूपी व्रजत्यसौ । न विकारैः प्रयुज्येत शिव एव न संशयः

sarvajñaḥ sarvadarśī ca kāmarūpī vrajatyasau na vikāraiḥ prayujyeta śiva eva na saṁśayaḥ

वह सर्वज्ञ, सर्वदर्शी और कामरूपधारी हो जाता है; वह किसी भी विकार से युक्त नहीं होता — वह निःसंदेह साक्षात् शिव ही है।

श्लोक 54 (shiva.uma.26.54)

एतत्ते परमेशानि शब्दब्रह्मस्वरूपकम् । नवधा सर्वमाख्यातं किं भूयः श्रोतुमिच्छसि

etatte parameśāni śabdabrahmasvarūpakam navadhā sarvamākhyātaṁ kiṁ bhūyaḥ śrotumicchasi

हे परमेशानि! यह शब्द-ब्रह्म का स्वरूप, नौ प्रकार से पूर्णतः तुम्हें बताया गया। अब और क्या सुनना चाहती हो?

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