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उमा संहिता · अध्याय 27

काल-वंचन द्वारा शिव-प्राप्ति का वर्णन

अध्याय 26अध्याय-सूचीअध्याय 28

श्लोक 1 (shiva.uma.27.1)

देव्युवाच । वायोस्तु पदमाप्नोति योगाकाशसमुद्भवम् । तन्मे सर्वं समाचक्ष्व प्रसन्नस्त्वं यदि प्रभो

devyuvāca vāyostu padamāpnoti yogākāśasamudbhavam tanme sarvaṁ samācakṣva prasannastvaṁ yadi prabho

देवी ने कहा — योग-आकाश से उत्पन्न होने वाला वायु का पद प्राप्त होता है। हे प्रभु! यदि आप मुझसे प्रसन्न हैं, तो वह सब मुझे बताइए।

श्लोक 2 (shiva.uma.27.2)

शङ्कर उवाच । पुरा मे सर्वमाख्यातं योगिनां हितकाम्यया । कालं जिगाय यः सम्यग्वायोर्लिङ्गं यथा भवेत्

śaṅkara uvāca purā me sarvamākhyātaṁ yogināṁ hitakāmyayā kālaṁ jigāya yaḥ samyagvāyorliṅgaṁ yathā bhavet

शंकर जी ने कहा — पूर्व में मैंने योगियों के हित की कामना से यह सब बताया था — जिसने काल को भलीभाँति जीत लिया है, उसे वायु का सूक्ष्म चिह्न किस प्रकार प्राप्त होता है।

श्लोक 3 (shiva.uma.27.3)

तेन ज्ञात्वा दिनं योगी प्राणायामपरः स्थितः । स जयत्यागतं कालं मासार्धेनैव सुन्दरि

tena jñātvā dinaṁ yogī prāṇāyāmaparaḥ sthitaḥ sa jayatyāgataṁ kālaṁ māsārdhenaiva sundari

इसे जानकर, प्राणायाम में तत्पर रहने वाला योगी, दिन को जानकर, हे सुन्दरि, आते हुए काल को मात्र आधे मास में ही जीत लेता है।

श्लोक 4 (shiva.uma.27.4)

हृत्स्थो वायुः सदा वह्नेर्दीपकः सोऽनुपावकः । स बाह्याभ्यन्तरो व्यापी वायुः सर्वगतो महान्

hṛtstho vāyuḥ sadā vahnerdīpakaḥ so'nupāvakaḥ sa bāhyābhyantaro vyāpī vāyuḥ sarvagato mahān

हृदय में स्थित वायु सदा अग्नि की दीपक (प्रज्वलक) होती है, उसी के अनुकूल चलती है; वह महान् वायु बाह्य और आन्तरिक दोनों में व्यापक होकर सर्वत्र गतिशील रहती है।

श्लोक 5 (shiva.uma.27.5)

ज्ञानविज्ञानमुत्साहः सर्वं वायोः प्रवर्तते । येनेह निर्जितो वायुस्तेन सर्वमिदं जगत्

jñānavijñānamutsāhaḥ sarvaṁ vāyoḥ pravartate yeneha nirjito vāyustena sarvamidaṁ jagat

ज्ञान, विज्ञान और उत्साह — यह सब वायु से ही प्रवर्तित होते हैं। जिसने इस लोक में वायु को जीत लिया, उसने मानो यह सम्पूर्ण जगत् ही जीत लिया।

श्लोक 6 (shiva.uma.27.6)

धारणायां सदा तिष्ठेज्जरामृत्युजिघांसया । योगी योगरतः सम्यग्धारणाध्यानतत्परः

dhāraṇāyāṁ sadā tiṣṭhejjarāmṛtyujighāṁsayā yogī yogarataḥ samyagdhāraṇādhyānatatparaḥ

जरा और मृत्यु को नष्ट करने की इच्छा से सदा धारणा में स्थित रहना चाहिए; योग में रत, धारणा और ध्यान में सम्यक् तत्पर योगी —

श्लोक 7 (shiva.uma.27.7)

लोहकारो यथा भस्त्रामापूर्यमुखतो मुने । साधयेद्वायुना कर्म तद्वद्योगी समभ्यसेत्

lohakāro yathā bhastrāmāpūryamukhato mune sādhayedvāyunā karma tadvadyogī samabhyaset

— हे मुने! जैसे लोहार धौंकनी को मुख से भरकर वायु द्वारा अपना कार्य सिद्ध करता है, वैसे ही योगी को अभ्यास करना चाहिए।

श्लोक 8 (shiva.uma.27.8)

देवः सहस्रको नेत्रपादहस्तसहस्रकः । पृथवीं हि सर्वमावृत्य सोऽग्रे तिष्ठेद्दशाङ्गुलम्

devaḥ sahasrako netrapādahastasahasrakaḥ pṛthavīṁ hi sarvamāvṛtya so'gre tiṣṭheddaśāṅgulam

सहस्र नेत्रों, सहस्र पैरों और सहस्र हाथों वाला वह देव, सम्पूर्ण पृथ्वी को व्याप्त करके भी, उससे दस अंगुल आगे स्थित रहता है —

श्लोक 9 (shiva.uma.27.9)

गायत्रीं शिरसा सार्द्धं जपेद् व्याहृतिपूर्विकाम् । त्रिवारमायतप्राणाः प्राणायामः स उच्यते

gāyatrīṁ śirasā sārddhaṁ japed vyāhṛtipūrvikām trivāramāyataprāṇāḥ prāṇāyāmaḥ sa ucyate

— गायत्री मन्त्र का, शिर-सहित तथा व्याहृतियों-सहित, तीन बार जप करना चाहिए, प्राणों को पूर्णतः विस्तारित करते हुए; इसे ही प्राणायाम कहा जाता है।

श्लोक 10 (shiva.uma.27.10)

गतागता निवर्तन्ते चन्द्रसूर्यादयो ग्रहाः । अद्यापि न निवर्तन्ते योगध्यानपरायणाः

gatāgatā nivartante candrasūryādayo grahāḥ adyāpi na nivartante yogadhyānaparāyaṇāḥ

चन्द्र-सूर्य आदि ग्रह आते-जाते और लौटते रहते हैं; परन्तु योग-ध्यान में तत्पर रहने वाले साधक आज भी जन्म-मृत्यु के चक्र में पुनः नहीं लौटते।

श्लोक 11 (shiva.uma.27.11)

शतमब्दं तपस्तप्त्वा कुशाग्रापः पिबेद् द्विजः । तदाप्नोति फलं देवि प्राणानां धारणैकया

śatamabdaṁ tapastaptvā kuśāgrāpaḥ pibed dvijaḥ tadāpnoti phalaṁ devi prāṇānāṁ dhāraṇaikayā

जो द्विज सौ वर्षों तक तप करके कुश की नोक पर टिकी हुई जल-बूँद मात्र पीकर रहे, हे देवि, उसका फल केवल प्राणों की एक धारणा (साँस रोकने के अभ्यास) से ही प्राप्त हो जाता है।

श्लोक 12 (shiva.uma.27.12)

यो द्विजः कल्यमुत्थाय प्राणायामैकमाचरेत् । सर्वं पापं निहन्त्याशु ब्रह्मलोकं स गच्छति

yo dvijaḥ kalyamutthāya prāṇāyāmaikamācaret sarvaṁ pāpaṁ nihantyāśu brahmalokaṁ sa gacchati

जो द्विज प्रातःकाल उठकर एक भी प्राणायाम करता है, वह शीघ्र ही समस्त पाप को नष्ट कर ब्रह्मलोक को प्राप्त होता है।

श्लोक 13 (shiva.uma.27.13)

योऽतन्द्रितः सदैकान्ते प्रणायामपरो भवेत् । जरां मृत्युं विनिर्जित्य वायुगः खेचरीति सः

yo'tandritaḥ sadaikānte praṇāyāmaparo bhavet jarāṁ mṛtyuṁ vinirjitya vāyugaḥ khecarīti saḥ

जो अनथक होकर सदा एकान्त में प्राणायाम में तत्पर रहता है, वह जरा और मृत्यु को पूर्णतः जीतकर वायु के समान गतिशील 'खेचर' (आकाशचारी) बन जाता है।

श्लोक 14 (shiva.uma.27.14)

सिद्धस्य भजते रूपं कान्तिं मेधां पराक्रमम् । शौर्यं वायुसमो गत्या सौख्यं श्लाघ्यं परं सुखम्

siddhasya bhajate rūpaṁ kāntiṁ medhāṁ parākramam śauryaṁ vāyusamo gatyā saukhyaṁ ślāghyaṁ paraṁ sukham

वह सिद्ध पुरुष के समान रूप, कान्ति, मेधा और पराक्रम को प्राप्त करता है; वायु के समान गति वाला होकर वह शौर्य तथा प्रशंसनीय परम सुख को प्राप्त करता है।

श्लोक 15 (shiva.uma.27.15)

एतत्कथितमशेषं वायोः सिद्धिं यदाप्नुते योगी । यत्तेजसोऽपि लभते तत्ते वक्ष्यामि देवेशि

etatkathitamaśeṣaṁ vāyoḥ siddhiṁ yadāpnute yogī yattejaso'pi labhate tatte vakṣyāmi deveśi

यह वायु की सिद्धि, जिसे योगी प्राप्त करता है, संपूर्णतः बताई गई। हे देवेशि! अब मैं तुम्हें यह भी बताऊँगा कि योगी तेज (प्रकाश-साधना) से क्या प्राप्त करता है।

श्लोक 16 (shiva.uma.27.16)

स्थित्वा सुखासने स्वे शेते जनवचनहीने तु । शशिरवियुतया तेजः प्रकाशयन्मध्यमे देशे

sthitvā sukhāsane sve śete janavacanahīne tu śaśiraviyutayā tejaḥ prakāśayanmadhyame deśe

अपने सुखासन में स्थित होकर, लोगों की बातचीत से रहित स्थान में लेटकर, चन्द्र-सूर्य से रहित उस तेज को मध्य प्रदेश (भ्रूमध्य) में प्रकाशित करते हुए —

श्लोक 17 (shiva.uma.27.17)

वह्निगतं भ्रूमध्ये प्रकाशते यस्त्वतन्द्रितो योगी । दीपैर्हीनध्वान्ते पश्येन्न्यूनमसंशयं लोके

vahnigataṁ bhrūmadhye prakāśate yastvatandrito yogī dīpairhīnadhvānte paśyennyūnamasaṁśayaṁ loke

— वह अग्नि-तत्त्वयुक्त प्रकाश उस अथक योगी के भ्रूमध्य में प्रकाशित होता है; दीपकों से रहित अन्धकार में भी वह निःसंदेह अत्यल्प प्रकाश तक को देख लेता है।

श्लोक 18 (shiva.uma.27.18)

नेत्रे करशाखाभिः किञ्चित्सम्पीड्य यत्नतो योगी । तारं पश्यन्ध्यायेन्मुहूर्तमर्द्धं तमेकभावोऽपि

netre karaśākhābhiḥ kiñcitsampīḍya yatnato yogī tāraṁ paśyandhyāyenmuhūrtamarddhaṁ tamekabhāvo'pi

अँगुलियों से नेत्रों को कुछ दबाकर, योगी प्रयत्नपूर्वक किसी तारे को देखते हुए आधे मुहूर्त तक ध्यान करे, तथा अन्धकार में भी एकाग्रचित्त हो जाए।

श्लोक 19 (shiva.uma.27.19)

ततस्तु तमसि ध्यायन्पश्यति ज्योतिरैश्वरम् । श्वेतं रक्तं तथा पीतं कृष्णमिन्द्रधनुष्प्रभम्

tatastu tamasi dhyāyanpaśyati jyotiraiśvaram śvetaṁ raktaṁ tathā pītaṁ kṛṣṇamindradhanuṣprabham

तत्पश्चात् अन्धकार में ध्यान करते हुए वह ऐश्वर ज्योति (ईश्वर के दिव्य प्रकाश) को देखता है — श्वेत, रक्त, पीत, कृष्ण तथा इन्द्रधनुष के समान प्रभावाला।

श्लोक 20 (shiva.uma.27.20)

भुवोर्मध्ये ललाटस्थं बालार्कसमतेजसम् । तं विदित्वा तु कामाङ्गी क्रीडते कामरूपधृक्

bhuvormadhye lalāṭasthaṁ bālārkasamatejasam taṁ viditvā tu kāmāṅgī krīḍate kāmarūpadhṛk

भौंहों के मध्य, ललाट पर स्थित, उदीयमान बाल-सूर्य के समान तेजस्वी उस ज्योति को जानकर, इच्छानुसार अंगों वाला व्यक्ति कामरूपधारी होकर क्रीड़ा करता है।

श्लोक 21 (shiva.uma.27.21)

कारणप्रशमावेशं परकायप्रवेशनम् । अणिमादिगुणावाप्तिर्मनसा चावलोकनम्

kāraṇapraśamāveśaṁ parakāyapraveśanam aṇimādiguṇāvāptirmanasā cāvalokanam

कारण (मूल तत्त्व) में शमन और लीन हो जाना; परकाया-प्रवेश (दूसरे के शरीर में प्रवेश करने की शक्ति); अणिमा आदि सिद्धियों की प्राप्ति; तथा मन से ही दूरस्थ वस्तुओं का अवलोकन —

श्लोक 22 (shiva.uma.27.22)

दूरश्रवणविज्ञानमदृश्यं बहुरूपधृक् । सतताभ्यासयोगेन खेचरत्वं प्रजायते

dūraśravaṇavijñānamadṛśyaṁ bahurūpadhṛk satatābhyāsayogena khecaratvaṁ prajāyate

— दूर से सुनने का ज्ञान; अदृश्य हो जाना; बहुरूपधारी होना — निरन्तर योगाभ्यास से यह 'खेचरत्व' (आकाशगमन की सिद्धि) प्राप्त होता है।

श्लोक 23 (shiva.uma.27.23)

श्रुताध्ययनसम्पन्ना नानाशास्त्रविशारदाः । ज्ञानिनोऽपि विमुह्यन्ते पूर्वकर्मवशानुगाः

śrutādhyayanasampannā nānāśāstraviśāradāḥ jñānino'pi vimuhyante pūrvakarmavaśānugāḥ

वेद-अध्ययन से सम्पन्न, अनेक शास्त्रों में निपुण, ज्ञानी पुरुष भी अपने पूर्व कर्मों के वशीभूत होकर मोहित हो जाते हैं।

श्लोक 24 (shiva.uma.27.24)

पश्यन्तोऽपि न पश्यन्ति शृण्वाना बधिरा यथा । यथान्धा मानुषा लोके मूढाः पापविमोहिताः

paśyanto'pi na paśyanti śṛṇvānā badhirā yathā yathāndhā mānuṣā loke mūḍhāḥ pāpavimohitāḥ

वे देखते हुए भी नहीं देखते, सुनते हुए भी मानो बहरे हों; इस लोक में अन्धे मनुष्यों के समान वे मूढ़ और पाप से विमोहित रहते हैं।

श्लोक 25 (shiva.uma.27.25)

वेदाहमेतं पुरुषं महान्त- मादित्यवर्णं तमसः परस्तात् । तमेव विदित्वातिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यते प्रायणाय

vedāhametaṁ puruṣaṁ mahānta- mādityavarṇaṁ tamasaḥ parastāt tameva viditvātimṛtyumeti nānyaḥ panthā vidyate prāyaṇāya

मैं इस महान् पुरुष को जानता हूँ, जो आदित्य के समान वर्ण वाला और अन्धकार से परे है। उसे जानकर ही मनुष्य मृत्यु को पार करता है; उस परम गति की प्राप्ति के लिए अन्य कोई मार्ग नहीं है।

श्लोक 26 (shiva.uma.27.26)

एष ते कथितः सम्यक्तेजसो विधिरुत्तमः । कालं जित्वा यथा योगी चामरत्वं प्रपद्यते

eṣa te kathitaḥ samyaktejaso vidhiruttamaḥ kālaṁ jitvā yathā yogī cāmaratvaṁ prapadyate

यह तुम्हें अच्छी तरह बताया गया, तेज-साधना की यह उत्तम विधि — जिससे योगी काल को जीतकर अमरत्व को प्राप्त करता है।

श्लोक 27 (shiva.uma.27.27)

पुनः परतरं वक्ष्ये यथा मृत्युर्न जायते । सावधानतया देवि शृणुष्वैकाग्रमानसा

punaḥ parataraṁ vakṣye yathā mṛtyurna jāyate sāvadhānatayā devi śṛṇuṣvaikāgramānasā

अब मैं इससे भी उत्कृष्ट विधि बताऊँगा, जिससे मृत्यु होती ही नहीं। हे देवि! सावधानीपूर्वक, एकाग्रचित्त होकर सुनो।

श्लोक 28 (shiva.uma.27.28)

तुरीया देवि भूतानां योगिनां ध्यानिनां तथा । सुखासने यथास्थानं योगी नियतमानसः

turīyā devi bhūtānāṁ yogināṁ dhyānināṁ tathā sukhāsane yathāsthānaṁ yogī niyatamānasaḥ

हे देवि! यह प्राणियों के लिए, विशेषतः ध्यानी योगियों के लिए, तुरीय अवस्था है; सुखासन में, उपयुक्त स्थान पर बैठकर, संयमित मन वाला योगी —

श्लोक 29 (shiva.uma.27.29)

समुन्नतशरीरोऽपि स बद्ध्वा करसम्पुटम् । चञ्च्वाकारेण वक्त्रेण पिबन्वायुं शनैः शनैः

samunnataśarīro'pi sa baddhvā karasampuṭam cañcvākāreṇa vaktreṇa pibanvāyuṁ śanaiḥ śanaiḥ

— शरीर को सीधा रखते हुए, हाथों को कमल-कोश के आकार में जोड़कर, चोंच के समान बनाए हुए मुख से धीरे-धीरे वायु का पान करते हुए —

श्लोक 30 (shiva.uma.27.30)

प्रस्रवन्ति क्षणादापस्तालुस्था जीवदायिकाः । ता जिघ्रेद्वायुनादायामृतं तच्छीतलं जलम्

prasravanti kṣaṇādāpastālusthā jīvadāyikāḥ tā jighredvāyunādāyāmṛtaṁ tacchītalaṁ jalam

— तभी तालु से जीवनदायी जल-बूँदें बहने लगती हैं; वायु के साथ उन्हें खींचकर उस शीतल, अमृत-तुल्य जल का पान करना चाहिए।

श्लोक 31 (shiva.uma.27.31)

पिबन्ननुदिनं योगी न मृत्युवशगो भवेत् । दिव्यकायो महातेजाः पिपासाक्षुद्विवर्जितः

pibannanudinaṁ yogī na mṛtyuvaśago bhavet divyakāyo mahātejāḥ pipāsākṣudvivarjitaḥ

प्रतिदिन इसका पान करने वाला योगी मृत्यु के वश में नहीं होता; वह दिव्य शरीर, महातेज को प्राप्त करता है और भूख-प्यास से रहित हो जाता है।

श्लोक 32 (shiva.uma.27.32)

बलेन नागस्तुरगो जवेन दृष्ट्या सुपर्णः सुश्रुतिस्तु दूरात् । आकुञ्चिताकुण्डलिकृष्णकेशो गन्धर्वविद्याधरतुल्यवर्णः

balena nāgasturago javena dṛṣṭyā suparṇaḥ suśrutistu dūrāt ākuñcitākuṇḍalikṛṣṇakeśo gandharvavidyādharatulyavarṇaḥ

वह बल में गजराज के समान, वेग में अश्व के समान, दृष्टि में गरुड़ के समान हो जाता है, और दूर से सुनने में समर्थ हो जाता है; उसके बाल घुँघराले और श्याम हो जाते हैं, तथा उसका वर्ण गन्धर्वों और विद्याधरों के समान हो जाता है।

श्लोक 33 (shiva.uma.27.33)

जीवेन्नरो वर्षशतं सुराणां सुमेधसा वाक्पतिना समत्वम् । एवं चरन् खेचरतां प्रयाति यथेष्टचारी सुखितः सदैव

jīvennaro varṣaśataṁ surāṇāṁ sumedhasā vākpatinā samatvam evaṁ caran khecaratāṁ prayāti yatheṣṭacārī sukhitaḥ sadaiva

वह मनुष्य देवताओं के सौ वर्षों तक जीवित रहता है, तथा बुद्धि में वाक्पति बृहस्पति के समान हो जाता है; इस प्रकार विचरण करते हुए वह खेचरत्व को प्राप्त कर, सदा सुखी होकर स्वेच्छानुसार भ्रमण करता है।

श्लोक 34 (shiva.uma.27.34)

पुनरन्यत्प्रवक्ष्यामि विधानं यत्सुरैरपि । गोपितं तु प्रयत्नेन तच्छृणुष्व वरानने

punaranyatpravakṣyāmi vidhānaṁ yatsurairapi gopitaṁ tu prayatnena tacchṛṇuṣva varānane

अब मैं एक और विधि बताऊँगा, जिसे देवगण भी प्रयत्नपूर्वक गुप्त रखते हैं; हे वरानने! उसे सुनो।

श्लोक 35 (shiva.uma.27.35)

समाकुञ्च्याभ्यसेद्योगी रसनां तालुकं प्रति । किञ्चित्कालान्तरेणैव क्रमात्प्राप्नोति लम्बिकाम्

samākuñcyābhyasedyogī rasanāṁ tālukaṁ prati kiñcitkālāntareṇaiva kramātprāpnoti lambikām

योगी को जिह्वा को मोड़कर तालु की ओर अभ्यास करना चाहिए; कुछ समय के अन्तराल में ही वह क्रमशः लम्बिका (कण्ठ की घण्टिका) तक पहुँच जाता है।

श्लोक 36 (shiva.uma.27.36)

ततः प्रस्रवते सा तु संस्पृष्टा शीतलां सुधाम् । पिबन्नेव सदा योगी सोऽमरत्वं हि गच्छति

tataḥ prasravate sā tu saṁspṛṣṭā śītalāṁ sudhām pibanneva sadā yogī so'maratvaṁ hi gacchati

तब स्पर्श किए जाने पर वह शीतल अमृत झराने लगती है; उसका सदा पान करने वाला योगी निश्चय ही अमरत्व को प्राप्त करता है।

श्लोक 37 (shiva.uma.27.37)

रेफाग्रं लम्बकाग्रं करतलघटनं शुभ्रपद्मस्य बिन्दो- स्तेनाकृष्टा सुधेयं पतति परपदे देवतानन्दकारी । सारं संसारतारं कृतकलुषतरं कालतारं सतारं येनेदं प्लाविताङ्गं स भवति न मृतः क्षुत्पिपासाविहीनः

rephāgraṁ lambakāgraṁ karatalaghaṭanaṁ śubhrapadmasya bindo- stenākṛṣṭā sudheyaṁ patati parapade devatānandakārī sāraṁ saṁsāratāraṁ kṛtakaluṣataraṁ kālatāraṁ satāraṁ yenedaṁ plāvitāṅgaṁ sa bhavati na mṛtaḥ kṣutpipāsāvihīnaḥ

मुड़ी हुई जिह्वा का अग्रभाग लम्बिका के अग्रभाग से मिलकर, मानो हथेलियों के जुड़ने-सा संयोग बनाकर, शुभ्र कमल (सहस्रार) की बिन्दु से अमृत को खींच लाता है; उस संयोग से आकर्षित होकर यह अमृत परम पद में गिरता है, जो देवताओं को भी आनन्दित करने वाला है। यह सार है, संसार से पार कराने वाला है, मलिनता को दूर करने वाला महान् साधन है, तारों सहित काल को भी पार कराने वाला है — जिससे शरीर सिंचित होकर मनुष्य न मरता है और न भूख-प्यास से पीड़ित होता है।

श्लोक 38 (shiva.uma.27.38)

एभिर्युक्ता चतुर्भिः क्षितिधरतनये योगिभिर्वै धरैषा धैर्यान्नित्यं कुतोऽन्तः सकलमपि जगद्यत्सुखप्रापणाय । स्वप्ने देही विधत्ते सकलमपि सदा मानयन्यच्च दुःखं स्वर्गे ह्येवं धरित्र्याः प्रभवति च ततो वा स किञ्चिच्चतुर्णाम्

ebhiryuktā caturbhiḥ kṣitidharatanaye yogibhirvai dharaiṣā dhairyānnityaṁ kuto'ntaḥ sakalamapi jagadyatsukhaprāpaṇāya svapne dehī vidhatte sakalamapi sadā mānayanyacca duḥkhaṁ svarge hyevaṁ dharitryāḥ prabhavati ca tato vā sa kiñciccaturṇām

हे पर्वत-पुत्री! योगियों द्वारा धैर्यपूर्वक इन चार सिद्धियों से युक्त यह अवस्था — इसका अन्त भला कहाँ है? क्योंकि यह सम्पूर्ण जगत् ही सुख-प्राप्ति के लिए है। स्वप्न में देही (जीव) सब कुछ रचता है, सदा उसे सत्य मानते हुए, और जो भी दुःख होता है वह भी वैसे ही; इसी प्रकार पृथ्वी और स्वर्ग का सम्पूर्ण अनुभव भी देहभाव से उत्पन्न होता है — और तब जो कुछ भी है, वह इन्हीं चारों में से किसी एक का है।

श्लोक 39 (shiva.uma.27.39)

तस्मान्मन्त्रैस्तपोभिर्व्रतनियमयुतैरौषधैर्योगयुक्ता धात्री रक्ता मनुष्यैर्नयविनययुतैर्धर्मविद्भिः क्रमेण । भूतानामादि देवो न हि भवति चलः संयुतो वै चतुर्णां तस्मादेवं प्रवक्ष्ये विधिमनुगदितं छायिकं यच्छिवाख्यम्

tasmānmantraistapobhirvrataniyamayutairauṣadhairyogayuktā dhātrī raktā manuṣyairnayavinayayutairdharmavidbhiḥ krameṇa bhūtānāmādi devo na hi bhavati calaḥ saṁyuto vai caturṇāṁ tasmādevaṁ pravakṣye vidhimanugaditaṁ chāyikaṁ yacchivākhyam

इसलिए मंत्रों, तपों, व्रत-नियमों, औषधियों तथा योग से युक्त यह धात्री (शरीर/पृथ्वी), नीति और विनय से युक्त, धर्मज्ञ मनुष्यों द्वारा क्रमशः रक्षित होती है। समस्त प्राणियों के आदि देव सदा इन्हीं चार साधनों से युक्त होकर कभी विचलित नहीं होते। इसलिए अब मैं उस विधि को क्रमशः बताऊँगा, जो छाया से सम्बन्धित है और जिसे 'शैव' कहा जाता है।

अध्याय 26अध्याय-सूचीअध्याय 28