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उमा संहिता · अध्याय 35

मन्वन्तर-कीर्तन में वैवस्वत का वृत्तान्त

अध्याय 34अध्याय-सूचीअध्याय 36

श्लोक 1 (shiva.uma.35.1)

सूत उवाच । विवस्वान् कश्यपाज्जज्ञे दाक्षायण्यां महाऋषेः । तस्य भार्याभवत्संज्ञा त्वाष्ट्री देवी सुरेणुका

sūta uvāca vivasvān kaśyapājjajñe dākṣāyaṇyāṁ mahāṛṣeḥ tasya bhāryābhavatsaṁjñā tvāṣṭrī devī sureṇukā

सूत जी ने कहा — महर्षि कश्यप से दाक्षायणी के गर्भ से विवस्वान् (सूर्य) उत्पन्न हुए। उनकी पत्नी त्वष्टा की पुत्री देवी संज्ञा थीं, जो अत्यंत सुकुमार थीं।

श्लोक 2 (shiva.uma.35.2)

मुनेऽसहिष्णुना तेन तेजसा दुस्सहेन च । भर्तृरूपेण नातुष्यद्रूपयौवनशालिनी

mune'sahiṣṇunā tena tejasā dussahena ca bhartṛrūpeṇa nātuṣyadrūpayauvanaśālinī

हे मुने, वह रूप और यौवन से सम्पन्न होते हुए भी अपने पति के असहनीय, दुस्सह तेज को सहन न कर सकी और उससे संतुष्ट न हुई।

श्लोक 3 (shiva.uma.35.3)

आदित्यस्य हि तद्रूपमसहिष्णुः सुतेजसः । दह्यमाना तदोद्वेगमकरोद्वरवर्णिनी

ādityasya hi tadrūpamasahiṣṇuḥ sutejasaḥ dahyamānā tadodvegamakarodvaravarṇinī

सूर्य के उस अत्यंत तेजस्वी रूप को सहन न कर सकने के कारण, दग्ध होती हुई वह सुन्दरी तब उद्विग्न हो उठी।

श्लोक 4 (shiva.uma.35.4)

ऋषेऽस्यां त्रीण्यपत्यानि जनयामास भास्करः । संज्ञायां तु मनुः पूर्वं श्राद्धदेवः प्रजापतिः

ṛṣe'syāṁ trīṇyapatyāni janayāmāsa bhāskaraḥ saṁjñāyāṁ tu manuḥ pūrvaṁ śrāddhadevaḥ prajāpatiḥ

हे ऋषे, उनसे भास्कर ने तीन संतानें उत्पन्न कीं; संज्ञा से पहले श्राद्धदेव नामक प्रजापति मनु उत्पन्न हुए,

श्लोक 5 (shiva.uma.35.5)

यमश्च यमुना चैव यमलौ सम्बभूवतुः । एवं हि त्रीण्यपत्यानि तस्यां जातानि सूर्यतः

yamaśca yamunā caiva yamalau sambabhūvatuḥ evaṁ hi trīṇyapatyāni tasyāṁ jātāni sūryataḥ

और यम तथा यमुना, यह जुड़वाँ संतान उत्पन्न हुई। इस प्रकार सूर्य से उनके तीन संतानें उत्पन्न हुईं।

श्लोक 6 (shiva.uma.35.6)

संवर्तुलं तु तद्रूपं दृष्ट्वा संज्ञा विवस्वतः । असहन्ती ततश्छायामात्मनः सासृजच्छुभाम्

saṁvartulaṁ tu tadrūpaṁ dṛṣṭvā saṁjñā vivasvataḥ asahantī tataśchāyāmātmanaḥ sāsṛjacchubhām

विवस्वान् के उस प्रचण्ड, गोलाकार तेजोमय रूप को देखकर, उसे सहन न कर सकने के कारण, संज्ञा ने तब अपने से एक शुभ छाया उत्पन्न की।

श्लोक 7 (shiva.uma.35.7)

मायामयी तु सा संज्ञामवोचद्भक्तितः सुभे । किं करोमीह कार्यं ते कथयस्व शुचिस्मिते

māyāmayī tu sā saṁjñāmavocadbhaktitaḥ subhe kiṁ karomīha kāryaṁ te kathayasva śucismite

उस मायामयी छाया ने भक्तिपूर्वक संज्ञा से कहा — हे शुभे, मैं क्या करूँ? हे शुचिस्मिते, अपना कार्य बताइए।

श्लोक 8 (shiva.uma.35.8)

संज्ञोवाच अहं यास्यामि भद्रं ते ममैव भवनं पितुः । त्वयैतद्भवने सत्यं वस्तव्यं निर्विकारतः

saṁjñovāca ahaṁ yāsyāmi bhadraṁ te mamaiva bhavanaṁ pituḥ tvayaitadbhavane satyaṁ vastavyaṁ nirvikārataḥ

संज्ञा ने कहा — तुम्हारा कल्याण हो, मैं अपने पिता के घर जाऊँगी। तुम्हें सत्य ही इस घर में बिना किसी विकार के यथावत् रहना होगा।

श्लोक 9 (shiva.uma.35.9)

इमौ मे बालकौ साधू कन्या चेयं सुमध्यमा । पालनीयाः सुखेनैव मम चेदिच्छसि प्रियम्

imau me bālakau sādhū kanyā ceyaṁ sumadhyamā pālanīyāḥ sukhenaiva mama cedicchasi priyam

यदि तुम मुझे प्रिय चाहती हो, तो मेरे इन दोनों सुशील बालकों और इस सुमध्यमा कन्या का सुखपूर्वक पालन करना।

श्लोक 10 (shiva.uma.35.10)

छायोवाच । आकेशग्रहणाद्देवि सहिष्येऽहं सुदुष्कृतम् । नाख्यास्यामि मतं तुभ्यं गच्छ देवि यथासुखम्

chāyovāca ākeśagrahaṇāddevi sahiṣye'haṁ suduṣkṛtam nākhyāsyāmi mataṁ tubhyaṁ gaccha devi yathāsukham

छाया ने कहा — हे देवी, केश खींचे जाने तक भी मैं दुःसह कष्ट सहन करूँगी; मैं तुम्हारा यह भेद प्रकट नहीं करूँगी। हे देवी, सुखपूर्वक जाओ।

श्लोक 11 (shiva.uma.35.11)

सूत उवाच । इत्युक्ता साऽगमद्देवी व्रीडिता सन्निधौ पितुः । पित्रा निर्भर्त्सिता तत्र नियुक्ता सा पुनः पुनः

sūta uvāca ityuktā sā'gamaddevī vrīḍitā sannidhau pituḥ pitrā nirbhartsitā tatra niyuktā sā punaḥ punaḥ

सूत जी ने कहा — यह कहे जाने पर वह देवी लज्जित होकर अपने पिता के पास गई; वहाँ पिता द्वारा उसे धिक्कारा गया और बार-बार लौट जाने को कहा गया।

श्लोक 12 (shiva.uma.35.12)

अगच्छद्वडवा भूत्वाच्छाद्य रूपं ततः स्वकम् । कुरुंस्तदोत्तरान् प्राप्य नृणान्येव चचार ह

agacchadvaḍavā bhūtvācchādya rūpaṁ tataḥ svakam kuruṁstadottarān prāpya nṛṇānyeva cacāra ha

तब उसने अपने रूप को छिपाकर घोड़ी का रूप धारण किया और उत्तर कुरु देश को प्राप्त कर मनुष्यों के बीच विचरण करने लगी।

श्लोक 13 (shiva.uma.35.13)

संज्ञां तां तु रविर्मत्वा छायायां सुसुतं तदा । जनयामास सावर्णिं मनुं वै सविता किल

saṁjñāṁ tāṁ tu ravirmatvā chāyāyāṁ susutaṁ tadā janayāmāsa sāvarṇiṁ manuṁ vai savitā kila

सूर्य उस छाया को ही संज्ञा मानकर, तब उससे एक सुन्दर पुत्र उत्पन्न किया — सविता ने सावर्णि मनु को उत्पन्न किया।

श्लोक 14 (shiva.uma.35.14)

संज्ञानु प्रार्थिता छाया सा स्वपुत्रेऽपि नित्यशः । चकाराभ्यधिकं स्नेहं न तथा पूर्वजे सुते

saṁjñānu prārthitā chāyā sā svaputre'pi nityaśaḥ cakārābhyadhikaṁ snehaṁ na tathā pūrvaje sute

वह छाया, संज्ञा द्वारा प्रार्थना किए जाने पर भी, अपने ही पुत्र के प्रति सदा अधिक स्नेह करती थी, उतना पूर्वजात पुत्र (यम) के प्रति नहीं।

श्लोक 15 (shiva.uma.35.15)

मनुस्तस्याक्षमत्तं यमस्तं नैव चक्षमे । स सरोषस्तु बाल्याच्च भाविनोऽर्थस्य गौरवात्

manustasyākṣamattaṁ yamastaṁ naiva cakṣame sa saroṣastu bālyācca bhāvino'rthasya gauravāt

मनु (सावर्णि) ने उसे सहन किया, किन्तु यम ने उसे सहन नहीं किया; वह बालसुलभ स्वभाव और होनहार घटना के भार से क्रुद्ध हो उठा।

श्लोक 16 (shiva.uma.35.16)

छायां सन्तर्जयामास पदा वैवस्वतो यमः । तं शशाप ततः क्रोधाच्छाया तु कलुषीकृता

chāyāṁ santarjayāmāsa padā vaivasvato yamaḥ taṁ śaśāpa tataḥ krodhācchāyā tu kaluṣīkṛtā

वैवस्वत यम ने पैर उठाकर छाया को डाँटा; तब क्रोध में कलुषित हुई छाया ने उसे शाप दे दिया।

श्लोक 17 (shiva.uma.35.17)

चरणः पततामेष तवेति भृशरोषतः । यमस्ततः पितुः सर्वं प्राञ्जलिः प्रत्यवेदयत्

caraṇaḥ patatāmeṣa taveti bhṛśaroṣataḥ yamastataḥ pituḥ sarvaṁ prāñjaliḥ pratyavedayat

अत्यंत क्रोध से — 'तेरा यह पैर गिर जाए' — ऐसा उसने कहा। तब यम ने हाथ जोड़कर अपने पिता को सब कुछ बता दिया।

श्लोक 18 (shiva.uma.35.18)

भृशं शापभयोद्विग्नः संज्ञावाक्यैर्विचेष्टितः । मात्रा स्नेहेन सर्वेषु वर्तितव्यं सुतेषु वै

bhṛśaṁ śāpabhayodvignaḥ saṁjñāvākyairviceṣṭitaḥ mātrā snehena sarveṣu vartitavyaṁ suteṣu vai

शाप के भय से अत्यंत उद्विग्न, और संज्ञा के [समता के] वचनों से प्रेरित होकर यम ने कहा — माता को अपने सभी पुत्रों के प्रति स्नेहपूर्वक व्यवहार करना चाहिए —

श्लोक 19 (shiva.uma.35.19)

स्नेहमस्मास्वपाकृत्य कनीयांसं बिभर्ति सा । तस्मान्मयोद्यतः पादस्तद्भवान् क्षन्तुमर्हति

snehamasmāsvapākṛtya kanīyāṁsaṁ bibharti sā tasmānmayodyataḥ pādastadbhavān kṣantumarhati

'—हमसे स्नेह हटाकर वह छोटे पुत्र को ही पालती है। इसीलिए मैंने पैर उठाया; अतः आप इसे क्षमा करने योग्य हैं।'

श्लोक 20 (shiva.uma.35.20)

शप्तोऽहमस्मि देवेश जनन्या तपतांवर । तव प्रसादाच्चरणो न पतेन्मम गोपते

śapto'hamasmi deveśa jananyā tapatāṁvara tava prasādāccaraṇo na patenmama gopate

'हे देवेश, तेजस्वियों में श्रेष्ठ, मुझे माता ने शाप दिया है; हे गोपते, आपकी कृपा से मेरा पैर न गिरे।'

श्लोक 21 (shiva.uma.35.21)

सवितोवाच । असंशयं पुत्र महद्भविष्यत्यत्र कारणम् । येन त्वामाविशत्क्रोधो धर्मज्ञं सत्यवादिनम्

savitovāca asaṁśayaṁ putra mahadbhaviṣyatyatra kāraṇam yena tvāmāviśatkrodho dharmajñaṁ satyavādinam

सविता ने कहा — हे पुत्र, निःसंदेह इसके पीछे कोई महान् कारण होगा, जिससे धर्मज्ञ और सत्यवादी तुझ पर क्रोध ने अधिकार कर लिया।

श्लोक 22 (shiva.uma.35.22)

न शक्यते तन्मिथ्या वै कर्तुं मातृवचस्तव । कृमयो मांसमादाय गमिष्यन्ति महीतले

na śakyate tanmithyā vai kartuṁ mātṛvacastava kṛmayo māṁsamādāya gamiṣyanti mahītale

'तेरी माता का वह वचन मिथ्या नहीं किया जा सकता; इसलिए कृमि मांस लेकर पृथ्वी पर गिरेंगे — इस प्रकार शाप आंशिक रूप से पूर्ण होगा।'

श्लोक 23 (shiva.uma.35.23)

तद्वाक्यं भविता सत्यं त्वं च त्रातौ भविष्यसि । कुरु तात न सन्देहं मनश्चाश्वास्य स्वं प्रभो

tadvākyaṁ bhavitā satyaṁ tvaṁ ca trātau bhaviṣyasi kuru tāta na sandehaṁ manaścāśvāsya svaṁ prabho

'वह वचन सत्य होगा, और तुम्हारी रक्षा भी हो जाएगी। हे तात, संदेह न करो, अपने मन को आश्वस्त करो।'

श्लोक 24 (shiva.uma.35.24)

सूत उवाच । इत्युक्त्वा तनयं सूर्यो यमसंज्ञं मुनीश्वर । आदित्यश्चाब्रवीत्तान्त्तु छायां क्रोधसमन्वितः

sūta uvāca ityuktvā tanayaṁ sūryo yamasaṁjñaṁ munīśvara ādityaścābravīttānttu chāyāṁ krodhasamanvitaḥ

सूत जी ने कहा — हे मुनीश्वर, यम नामक अपने पुत्र से यह कहकर, सूर्य ने क्रोधयुक्त होकर उस छाया से कहा।

श्लोक 25 (shiva.uma.35.25)

सूर्य उवाच । हे प्रिये कुमते चण्डि किं त्वयाचरितं किल । किन्तु मेऽभ्यधिकः स्नेह एतदाख्यातुमर्हसि

sūrya uvāca he priye kumate caṇḍi kiṁ tvayācaritaṁ kila kintu me'bhyadhikaḥ sneha etadākhyātumarhasi

सूर्य ने कहा — हे प्रिये, हे दुर्बुद्धि, हे उग्र स्वभाव वाली, तूने यह क्या किया है? फिर भी मेरा तुझ पर स्नेह अधिक है — तू यह सत्य बता।

श्लोक 26 (shiva.uma.35.26)

सूत उवाच । सा रवेर्वचनं श्रुत्वा यथातथ्यं न्यवेदयत् । निर्दग्धा कामरविणा सान्त्वयामास वै तदा

sūta uvāca sā ravervacanaṁ śrutvā yathātathyaṁ nyavedayat nirdagdhā kāmaraviṇā sāntvayāmāsa vai tadā

सूत जी ने कहा — सूर्य के वचन सुनकर उसने यथार्थ स्थिति बता दी; उस बात से संतप्त होकर सूर्य ने तब उसे सांत्वना दी।

श्लोक 27 (shiva.uma.35.27)

तस्यास्तद् वचनं श्रुत्वा सूर्याऽगात्तवष्टुरन्तिकम् पप्रच्छ तं क्व संज्ञेति त्वष्टा सूर्यमथाब्रवीत्

tasyāstad vacanaṁ śrutvā sūryā'gāttavaṣṭurantikam papraccha taṁ kva saṁjñeti tvaṣṭā sūryamathābravīt

उसके वे वचन सुनकर सूर्य त्वष्टा के पास गए और उनसे पूछा — 'संज्ञा कहाँ है?' तब त्वष्टा ने सूर्य से कहा।

श्लोक 28 (shiva.uma.35.28)

त्वष्टोवाच । तवातितेजसा दग्धा इदं रूपं न शोभते । असहन्ती च तत्संज्ञा वने वसति शाद्वले

tvaṣṭovāca tavātitejasā dagdhā idaṁ rūpaṁ na śobhate asahantī ca tatsaṁjñā vane vasati śādvale

त्वष्टा ने कहा — तुम्हारे अत्यधिक तेज से दग्ध होकर यह रूप शोभा नहीं देता; और वह संज्ञा उसे सहन न कर सकने के कारण घास के मैदान वाले वन में निवास करती है।

श्लोक 29 (shiva.uma.35.29)

श्लाघ्या योगबलोपेता योगमासाद्य गोपते । अनुकूलस्तु देवेश सन्दिश्यात्ममयं मतम्

ślāghyā yogabalopetā yogamāsādya gopate anukūlastu deveśa sandiśyātmamayaṁ matam

'वह प्रशंसनीय है, योगबल से युक्त होकर योग को प्राप्त हुई है, हे गोपते; हे देवेश, अनुकूल होकर अपना मत बताइए।'

श्लोक 30 (shiva.uma.35.30)

रूपं निवर्तयाम्यद्य तव कान्तं करोम्यहम् । सूत उवाच । तच्छ्रुत्वापगतः क्रोधो मार्तण्डस्य विवस्वतः

rūpaṁ nivartayāmyadya tava kāntaṁ karomyaham sūta uvāca tacchrutvāpagataḥ krodho mārtaṇḍasya vivasvataḥ

'आज मैं तुम्हारे रूप को कम कर दूँगा, तुम्हें सुन्दर बना दूँगा।' सूत जी ने कहा — यह सुनकर मार्तण्ड विवस्वान् का क्रोध दूर हो गया।

श्लोक 31 (shiva.uma.35.31)

भ्रमिमारोप्य तत्तेजः शातयामास वै मुनिः । ततो विभ्राजितं रूपं तेजसा संवृतेन च

bhramimāropya tattejaḥ śātayāmāsa vai muniḥ tato vibhrājitaṁ rūpaṁ tejasā saṁvṛtena ca

उस तेज को खराद (चाक) पर चढ़ाकर मुनि त्वष्टा ने उसे कम किया; तब उनका रूप, संवृत तेज से युक्त, दीप्तिमान होकर—

श्लोक 32 (shiva.uma.35.32)

कृतं कान्ततरं रूपं त्वष्ट्रा तच्छुशुभे तदा । ततोऽधियोगमास्थाय स्वां भार्यां हि ददर्श ह

kṛtaṁ kāntataraṁ rūpaṁ tvaṣṭrā tacchuśubhe tadā tato'dhiyogamāsthāya svāṁ bhāryāṁ hi dadarśa ha

त्वष्टा द्वारा और भी सुन्दर बनाया गया वह रूप तब सुशोभित हुआ। तत्पश्चात् योग का आश्रय लेकर उन्होंने अपनी पत्नी को देखा।

श्लोक 33 (shiva.uma.35.33)

अधृष्यां सर्वभूतानां तेजसा नियमेन च । सोऽश्वरूपं समास्थाय गत्वा तां मैथुनेच्छया

adhṛṣyāṁ sarvabhūtānāṁ tejasā niyamena ca so'śvarūpaṁ samāsthāya gatvā tāṁ maithunecchayā

वह अपने तेज और नियम (व्रत) के कारण समस्त प्राणियों के लिए अजेय थी; वे सूर्य अश्व का रूप धारण कर, मैथुन की इच्छा से उसके पास गए।

श्लोक 34 (shiva.uma.35.34)

मैथुनाय विचेष्टन्तीं परपुंसोऽभिशङ्कया । मुखतो नासिकायां तु शुक्रं तद्व्यदधान्मुने

maithunāya viceṣṭantīṁ parapuṁso'bhiśaṅkayā mukhato nāsikāyāṁ tu śukraṁ tadvyadadhānmune

वह मैथुन के लिए संघर्ष करती हुई, उसे अन्य पुरुष समझने की आशंका से विरोध करने लगी; हे मुने, तब उन्होंने वह वीर्य उसके मुख से नासिका में स्थापित किया।

श्लोक 35 (shiva.uma.35.35)

देवौ ततः प्रजायेतामश्विनौ भिषजां वरौ । नासत्यौ तौ च दस्रौ च स्मृतौ द्वावश्विनावपि

devau tataḥ prajāyetāmaśvinau bhiṣajāṁ varau nāsatyau tau ca dasrau ca smṛtau dvāvaśvināvapi

तब दोनों देव अश्विनीकुमार, वैद्यों में श्रेष्ठ, उत्पन्न हुए; वे दोनों नासत्य और दस्र नाम से तथा अश्विनीकुमार नाम से भी स्मरण किए जाते हैं।

श्लोक 36 (shiva.uma.35.36)

तां तु कान्तेन रूपेण दर्शयामास भास्करः । आत्मानं सा तु तं दृष्ट्वा प्रहृष्टा पतिमादरात्

tāṁ tu kāntena rūpeṇa darśayāmāsa bhāskaraḥ ātmānaṁ sā tu taṁ dṛṣṭvā prahṛṣṭā patimādarāt

भास्कर ने तब अपने सुन्दर रूप में स्वयं को उसे दिखाया; वह उन्हें देखकर अत्यंत हर्षित हुई और आदरपूर्वक अपने पति को अपना लिया।

श्लोक 37 (shiva.uma.35.37)

पत्या तेन गृहं प्रागात्स्वं सती मुदितानना । मुमुदातेऽथ तौ प्रीत्या दम्पती पूर्वतोधिकम्

patyā tena gṛhaṁ prāgātsvaṁ satī muditānanā mumudāte'tha tau prītyā dampatī pūrvatodhikam

उस पति के साथ वह सती, प्रसन्नमुख होकर, अपने घर गई; तब वे दोनों दम्पती पूर्व से भी अधिक प्रेमपूर्वक आनन्दित हुए।

श्लोक 38 (shiva.uma.35.38)

यमस्तु कर्मणा तेन भृशं पीडितमानसः । धर्मेण रञ्जयामास धर्मराज इमा प्रजाः

yamastu karmaṇā tena bhṛśaṁ pīḍitamānasaḥ dharmeṇa rañjayāmāsa dharmarāja imā prajāḥ

किन्तु यम, उस कृत्य से मन में अत्यंत पीड़ित होकर, धर्मराज बनकर धर्म से इन प्रजाओं को सदा प्रसन्न रखने लगे।

श्लोक 39 (shiva.uma.35.39)

लेभे स कर्मणा तेन धर्मराजो महाद्युतिः । पितॄणामाधिपत्यं च लोकपालत्वमेव च

lebhe sa karmaṇā tena dharmarājo mahādyutiḥ pitṝṇāmādhipatyaṁ ca lokapālatvameva ca

उस कर्म (धर्मपूर्ण शासन) से महातेजस्वी धर्मराज ने पितरों का आधिपत्य और लोकपालत्व भी प्राप्त किया।

श्लोक 40 (shiva.uma.35.40)

मनुः प्रजापतिस्त्वासीत्सावर्णिः स तपोधनः । भाव्यः स कर्मणा तेन मनोः सावर्णिकेऽन्तरे

manuḥ prajāpatistvāsītsāvarṇiḥ sa tapodhanaḥ bhāvyaḥ sa karmaṇā tena manoḥ sāvarṇike'ntare

सावर्णि मनु, वह तपोधन, प्रजापति हुए; उसी कर्म के फलस्वरूप वे सावर्णिक अन्तर में भावी मनु होंगे।

श्लोक 41 (shiva.uma.35.41)

मेरुपृष्ठे तपो घोरमद्यापि चरते प्रभुः । यवीयसी तयोर्या तु यमी कन्या यशस्विनी

merupṛṣṭhe tapo ghoramadyāpi carate prabhuḥ yavīyasī tayoryā tu yamī kanyā yaśasvinī

वे प्रभु अब भी मेरु पर्वत की चोटी पर घोर तपस्या कर रहे हैं। और उन दोनों में जो छोटी, यशस्विनी कन्या यमी थी,

श्लोक 42 (shiva.uma.35.42)

अभवत्सा सरिच्छ्रेष्ठा यमुना लोकपा वनी । मनुरित्युच्यते लोके सावर्णिरिति चोच्यते

abhavatsā saricchreṣṭhā yamunā lokapā vanī manurityucyate loke sāvarṇiriti cocyate

वह नदियों में श्रेष्ठ यमुना बनी, जो लोकपालिका और वनवासिनी है। उनका भाई लोक में मनु कहलाता है, और सावर्णि भी कहा जाता है।

श्लोक 43 (shiva.uma.35.43)

य इदं जन्म देवानां शृणुयाद्धारयेत्तु वा । आपदं प्राप्य मुच्येत प्राप्नुयात्सुमहद्यशः

ya idaṁ janma devānāṁ śaṛṇuyāddhārayettu vā āpadaṁ prāpya mucyeta prāpnuyātsumahadyaśaḥ

जो कोई भी देवताओं की इस जन्म-कथा को सुनता है या स्मरण रखता है, वह आपत्ति में पड़कर भी उससे मुक्त हो जाता है और महान् यश प्राप्त करता है।

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