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उमा संहिता · अध्याय 38

सत्यव्रत से सगर तक का वंश

अध्याय 37अध्याय-सूचीअध्याय 39

श्लोक 1 (shiva.uma.38.1)

सूत उवाच । सत्यव्रतस्तु तद्भक्त्या कृपया च प्रतिज्ञया । विश्वामित्रकलत्रं च पोषयामास वै तदा

sūta uvāca satyavratastu tadbhaktyā kṛpayā ca pratijñayā viśvāmitrakalatraṁ ca poṣayāmāsa vai tadā

सूत जी ने कहा — सत्यव्रत ने उस भक्ति, दया और प्रतिज्ञा के कारण, तब विश्वामित्र की पत्नी (और परिवार) का भरण-पोषण किया।

श्लोक 2 (shiva.uma.38.2)

हत्वा मृगान्वराहांश्च महिषांश्च वनेचरान् । विश्वामित्राश्रमाभ्याशे तन्मांसं चाक्षिपन्मुने

hatvā mṛgānvarāhāṁśca mahiṣāṁśca vanecarān viśvāmitrāśramābhyāśe tanmāṁsaṁ cākṣipanmune

हे मुने, वह मृग, वराह तथा भैंसे आदि वनचर पशुओं को मारकर उनका मांस विश्वामित्र के आश्रम के समीप डाल देता था।

श्लोक 3 (shiva.uma.38.3)

तीर्थं गां चैव गात्रं च तथैवान्तःपुरं मुनिः । याज्योपाध्यायसंयोगाद्वसिष्ठः पर्यरक्षत

tīrthaṁ gāṁ caiva gātraṁ ca tathaivāntaḥpuraṁ muniḥ yājyopādhyāyasaṁyogādvasiṣṭhaḥ paryarakṣata

याज्य और उपाध्याय के सम्बन्ध से मुनि वसिष्ठ ने तीर्थ, गौ, शरीर तथा अन्तःपुर की रक्षा की।

श्लोक 4 (shiva.uma.38.4)

सत्यव्रतस्य वाक्याद्वा भाविनोऽर्थस्य वै बलात् । वसिष्ठोऽभ्यधिकं मन्युं धारयामास नित्यशः

satyavratasya vākyādvā bhāvino'rthasya vai balāt vasiṣṭho'bhyadhikaṁ manyuṁ dhārayāmāsa nityaśaḥ

सत्यव्रत के वचनों से हो अथवा होनहार घटना के बल से, वसिष्ठ सदैव उसके प्रति बढ़ता हुआ रोष धारण करते रहे।

श्लोक 5 (shiva.uma.38.5)

पित्रा तु तं तदा राष्ट्रात्परित्यक्तं स्वमात्मजम् । न वारयामास मुनिर्वसिष्ठः कारणेन च

pitrā tu taṁ tadā rāṣṭrātparityaktaṁ svamātmajam na vārayāmāsa munirvasiṣṭhaḥ kāraṇena ca

जब पिता द्वारा अपने ही पुत्र को राज्य से निकाल दिया गया, तब मुनि वसिष्ठ ने भी किसी कारणवश उसे नहीं रोका।

श्लोक 6 (shiva.uma.38.6)

पाणिग्रहणमन्त्राणां निष्ठा स्यात्सप्तमे पदे । न च सत्यव्रतस्तस्य तमुपांशुमबुद्ध्यत

pāṇigrahaṇamantrāṇāṁ niṣṭhā syātsaptame pade na ca satyavratastasya tamupāṁśumabuddhyata

पाणिग्रहण के मन्त्रों की पूर्णता सातवें पद (चरण) पर होती है; किन्तु सत्यव्रत को उस गुप्त बात का ज्ञान नहीं था।

श्लोक 7 (shiva.uma.38.7)

तस्मिन्स परितोषाय पितुरासीन्महात्मनः । कुलस्य निष्कृतिर्विप्र कृता सा वै भवेदिति

tasminsa paritoṣāya piturāsīnmahātmanaḥ kulasya niṣkṛtirvipra kṛtā sā vai bhavediti

हे विप्र, उसने सोचा कि इससे अपने महात्मा पिता को संतोष होगा, और कुल का प्रायश्चित्त भी हो जाएगा।

श्लोक 8 (shiva.uma.38.8)

न तं वसिष्ठो भगवान्पित्रा त्यक्तं न्यवारयत् । अभिषेक्ष्याम्यहं पुत्रमस्य नैवाब्रवीन्मुनिः

na taṁ vasiṣṭho bhagavānpitrā tyaktaṁ nyavārayat abhiṣekṣyāmyahaṁ putramasya naivābravīnmuniḥ

भगवान् वसिष्ठ ने पिता द्वारा त्यागे गए उसे नहीं रोका; और न ही मुनि ने कभी यह कहा — 'मैं इस पुत्र का राज्याभिषेक करूँगा।'

श्लोक 9 (shiva.uma.38.9)

स तु द्वादश वर्षाणि दीक्षां तामुद्वहद् बली । अविद्यामाने मांसे तु वसिष्ठस्य महात्मनः

sa tu dvādaśa varṣāṇi dīkṣāṁ tāmudvahad balī avidyāmāne māṁse tu vasiṣṭhasya mahātmanaḥ

वह बलवान् बारह वर्षों तक उस दीक्षा (व्रत) का पालन करता रहा; किन्तु जब महात्मा वसिष्ठ के लिए मांस उपलब्ध न हो सका—

श्लोक 10 (shiva.uma.38.10)

सर्वकामदुहां दोग्ध्रीं ददर्श स नृपात्मजः । तां वै क्रोधाच्च लोभाच्च श्रमाद्वै च क्षुधान्वितः

sarvakāmaduhāṁ dogdhrīṁ dadarśa sa nṛpātmajaḥ tāṁ vai krodhācca lobhācca śramādvai ca kṣudhānvitaḥ

—तब उस राजकुमार ने सर्वकामनाओं को पूर्ण करने वाली कामधेनु गाय को देखा; क्रोध, लोभ, थकान तथा भूख से पीड़ित होकर—

श्लोक 11 (shiva.uma.38.11)

दाशधर्मगतो राजा तां जघान स वै मुने । स तं मांसं स्वयं चैव विश्वामित्रस्य चात्मजम्

dāśadharmagato rājā tāṁ jaghāna sa vai mune sa taṁ māṁsaṁ svayaṁ caiva viśvāmitrasya cātmajam

—चाण्डाल-धर्म का आश्रय लेकर उस राजकुमार ने, हे मुने, उसे मार डाला; और उस मांस को उसने स्वयं तथा विश्वामित्र के पुत्र गालव को—

श्लोक 12 (shiva.uma.38.12)

भोजयामास तच्छ्रुत्वा वसिष्ठो ह्यस्य चुक्रुधे । उवाच च मुनिश्रेष्ठस्तं तदा क्रोधसंयुतः

bhojayāmāsa tacchrutvā vasiṣṭho hyasya cukrudhe uvāca ca muniśreṣṭhastaṁ tadā krodhasaṁyutaḥ

—खिला दिया। यह सुनकर वसिष्ठ उस पर अत्यंत क्रुद्ध हुए; और उस मुनिश्रेष्ठ ने क्रोधयुक्त होकर तब उससे कहा।

श्लोक 13 (shiva.uma.38.13)

वसिष्ठ उवाच । पातयेयमहं क्रूर तव शङ्कुमशंसयम् । यदि ते द्वाविमौ शङ्कू नस्यातां वै कृतौ पुरा

vasiṣṭha uvāca pātayeyamahaṁ krūra tava śaṅkumaśaṁsayam yadi te dvāvimau śaṅkū nasyātāṁ vai kṛtau purā

वसिष्ठ ने कहा — 'हे क्रूर, मैं तेरे अस्तित्व को निःसंकोच नष्ट कर देता, यदि पहले तूने ये दो शंकु (पुण्य) अर्जित न किए होते—'

श्लोक 14 (shiva.uma.38.14)

पितुश्चापरितोषेण गुरोर्दोग्ध्रीवधेन च । अप्रोक्षितोपयोगाच्च त्रिविधस्ते व्यतिक्रमः

pituścāparitoṣeṇa gurordogdhrīvadhena ca aprokṣitopayogācca trividhaste vyatikramaḥ

'—पिता को असंतुष्ट करने से, गुरु की कामधेनु का वध करने से, और बिना शुद्धिकरण के भक्षण करने से — तूने तीन प्रकार का अपराध किया है।'

श्लोक 15 (shiva.uma.38.15)

त्रिशङ्कुरिति होवाच त्रिशङ्कुरिति स स्मृतः । विश्वामित्रस्तु दाराणामागतो भरणे कृते

triśaṅkuriti hovāca triśaṅkuriti sa smṛtaḥ viśvāmitrastu dārāṇāmāgato bharaṇe kṛte

'[अतः] तू त्रिशंकु कहलाएगा' — ऐसा उन्होंने कहा, और वह त्रिशंकु नाम से स्मरण किया गया। विश्वामित्र, अपनी पत्नी के भरण-पोषण की व्यवस्था हो जाने पर लौट आए—

श्लोक 16 (shiva.uma.38.16)

तेन तस्मै वरं प्रादान्मुनिः प्रीतस्त्रिशङ्कवे । छन्द्यमानो वरेणाथ वरं वव्रे नृपात्मजः

tena tasmai varaṁ prādānmuniḥ prītastriśaṅkave chandyamāno vareṇātha varaṁ vavre nṛpātmajaḥ

—और उस सहायता से प्रसन्न होकर मुनि ने त्रिशंकु को वरदान दिया; वरदान का चयन करने का अवसर पाकर उस राजकुमार ने वर माँगा।

श्लोक 17 (shiva.uma.38.17)

अनावृष्टिभये चास्मिञ्जाते द्वादशवार्षिके । अभिषिच्य पितू राज्ये याजयामास तं मुनिः

anāvṛṣṭibhaye cāsmiñjāte dvādaśavārṣike abhiṣicya pitū rājye yājayāmāsa taṁ muniḥ

और जब यह बारह वर्षों का अनावृष्टि-भय उत्पन्न हुआ, तब मुनि विश्वामित्र ने उसे पिता के राज्य पर अभिषिक्त कर उसके लिए यज्ञ सम्पन्न कराया।

श्लोक 18 (shiva.uma.38.18)

मिषतां देवतानां च वसिष्ठस्य च कौशिकः । सशरीरं तदा तं तु दिवमारोहयत्प्रभुः

miṣatāṁ devatānāṁ ca vasiṣṭhasya ca kauśikaḥ saśarīraṁ tadā taṁ tu divamārohayatprabhuḥ

देवताओं और वसिष्ठ के देखते-देखते, प्रभु कौशिक (विश्वामित्र) ने तब उसे सशरीर स्वर्ग में आरोहित करा दिया।

श्लोक 19 (shiva.uma.38.19)

तस्य सत्यरथा नाम भार्या केकयवंशजा । कुमारं जनयामास हरिश्चन्द्रमकल्मषम्

tasya satyarathā nāma bhāryā kekayavaṁśajā kumāraṁ janayāmāsa hariścandramakalmaṣam

उसकी सत्यरथा नामक पत्नी, जो केकय वंश में उत्पन्न हुई थी, ने निष्कलंक हरिश्चन्द्र नामक पुत्र को जन्म दिया।

श्लोक 20 (shiva.uma.38.20)

स वै राजा हरिश्चन्द्रो त्रैशङ्कव इति स्मृतः । आहर्ता राजसूयस्य सम्राडिति ह विश्रुतः

sa vai rājā hariścandro traiśaṅkava iti smṛtaḥ āhartā rājasūyasya samrāḍiti ha viśrutaḥ

वह राजा हरिश्चन्द्र त्रैशंकव (त्रिशंकु-पुत्र) नाम से स्मरण किए गए; उन्होंने राजसूय यज्ञ सम्पन्न किया और सम्राट् नाम से विख्यात हुए।

श्लोक 21 (shiva.uma.38.21)

हरिश्चन्द्रस्य हि सुतो रोहितो नाम विश्रुतः । रोहितस्य वृकः पुत्रो वृकाद् बाहुस्तु जज्ञिवान्

hariścandrasya hi suto rohito nāma viśrutaḥ rohitasya vṛkaḥ putro vṛkād bāhustu jajñivān

हरिश्चन्द्र का पुत्र रोहित नाम से विख्यात हुआ; रोहित का पुत्र वृक हुआ; वृक से बाहु उत्पन्न हुआ।

श्लोक 22 (shiva.uma.38.22)

हैहयास्तालजङ्घाश्च निरस्यन्ति स्म तं नृपम् । नात्यर्थे धार्मिको विप्राः स हि धर्मयुगेऽभवत्

haihayāstālajaṅghāśca nirasyanti sma taṁ nṛpam nātyarthe dhārmiko viprāḥ sa hi dharmayuge'bhavat

हैहय और तालजंघों ने उस राजा (बाहु) को राज्य से निकाल दिया; हे विप्रो, वह अत्यंत धर्मात्मा नहीं था, क्योंकि वह धर्मयुग में हुआ था।

श्लोक 23 (shiva.uma.38.23)

सगरं स सुतं बाहुर्जज्ञे सह गरेण वै । और्वस्याश्रममासाद्य भार्गवेणाभिरक्षितः

sagaraṁ sa sutaṁ bāhurjajñe saha gareṇa vai aurvasyāśramamāsādya bhārgaveṇābhirakṣitaḥ

बाहु ने सगर नामक पुत्र को विष (गर) के साथ उत्पन्न किया; और्व के आश्रम को प्राप्त कर वह भार्गव द्वारा सुरक्षित हुआ।

श्लोक 24 (shiva.uma.38.24)

आग्नेयमस्त्रं लब्ध्वा च भार्गवात्सगरो नृपः । जिगाय पृथिवीं हत्वा तालजङ्घान्स हैहयान

āgneyamastraṁ labdhvā ca bhārgavātsagaro nṛpaḥ jigāya pṛthivīṁ hatvā tālajaṅghānsa haihayāna

भार्गव से आग्नेय अस्त्र प्राप्त कर राजा सगर ने तालजंघों और हैहयों को मारकर पृथ्वी को जीत लिया।

श्लोक 25 (shiva.uma.38.25)

शकान्बहूदकांश्चैव पारदान्सगणान्खशान् । सुधर्मं स्थापयामास शशास वृषतः क्षितिम्

śakānbahūdakāṁścaiva pāradānsagaṇānkhaśān sudharmaṁ sthāpayāmāsa śaśāsa vṛṣataḥ kṣitim

शक, बहूदक, पारद अपने गणों सहित, तथा खश — इन्हें जीतकर उसने सुधर्म की स्थापना की और वृषभ के समान बलपूर्वक पृथ्वी का शासन किया।

श्लोक 26 (shiva.uma.38.26)

शौनक उवाच । स वै गरेण सहितः कथं जातस्तु क्षत्रियात् । जितवानेतदाचक्ष्व विस्तरेण हि सूतज

śaunaka uvāca sa vai gareṇa sahitaḥ kathaṁ jātastu kṣatriyāt jitavānetadācakṣva vistareṇa hi sūtaja

शौनक ने कहा — 'वे विष के साथ क्षत्रिय पिता से कैसे उत्पन्न हुए, और कैसे उन्होंने विजय प्राप्त की — हे सूतपुत्र, यह विस्तार से बताइए।'

श्लोक 27 (shiva.uma.38.27)

सूत उवाच । पारीक्षितेन सम्पृष्टो वैशम्पायन एव च । यदाचष्ट स्म तद्वक्ष्ये शृणुष्वैकमना मुने

sūta uvāca pārīkṣitena sampṛṣṭo vaiśampāyana eva ca yadācaṣṭa sma tadvakṣye śaṛṇuṣvaikamanā mune

सूत जी ने कहा — 'परीक्षित-पुत्र द्वारा पूछे जाने पर वैशम्पायन जी ने जो कहा, वही मैं बताता हूँ — हे मुने, एकाग्रचित्त होकर सुनिए।'

श्लोक 28 (shiva.uma.38.28)

परीक्षितोवाच । कथं स सगरो राजा गरेण सहितो मुने । जातः स जघ्निवान्भूपानेतदाख्यातुमर्हसि

parīkṣitovāca kathaṁ sa sagaro rājā gareṇa sahito mune jātaḥ sa jaghnivānbhūpānetadākhyātumarhasi

परीक्षित-पुत्र (जनमेजय) ने कहा — 'हे मुने, राजा सगर विष के साथ कैसे उत्पन्न हुए, और उन्होंने राजाओं का वध कैसे किया — यह बताने योग्य है।'

श्लोक 29 (shiva.uma.38.29)

वैशम्पायन उवाच । बाहोर्व्यसनिनस्तातहृतं राज्यमभूत्किल । हैहयैस्तालजङ्घैश्च शकैः सार्धं विशाम्पते

vaiśampāyana uvāca bāhorvyasaninastātahṛtaṁ rājyamabhūtkila haihayaistālajaṅghaiśca śakaiḥ sārdhaṁ viśāmpate

वैशम्पायन जी ने कहा — 'हे तात, संकटग्रस्त बाहु का राज्य, हे विशाम्पते, हैहयों और तालजंघों ने शकों के साथ मिलकर छीन लिया था—'

श्लोक 30 (shiva.uma.38.30)

यवनाः पारदाश्चैव काम्बोजाः पाह्लवास्तथा । बहूदकाश्च पञ्चैव गणाः प्रोक्ताश्च रक्षसाम्

yavanāḥ pāradāścaiva kāmbojāḥ pāhlavāstathā bahūdakāśca pañcaiva gaṇāḥ proktāśca rakṣasām

'—यवन, पारद, काम्बोज, पह्लव तथा बहूदक — ये पाँच गण राक्षसों के [सहयोगी] कहे गए हैं।'

श्लोक 31 (shiva.uma.38.31)

एते पञ्च गणा राजन् हैहयार्थेषु रक्षसाम् । कृत्वा पराक्रमान् बाहो राज्यं तेभ्यो ददुर्बलात्

ete pañca gaṇā rājan haihayārtheṣu rakṣasām kṛtvā parākramān bāho rājyaṁ tebhyo dadurbalāt

'हे राजन्, इन पाँच गणों ने हैहयों के हित में राक्षसों का पराक्रम दिखाकर बाहु से बलपूर्वक राज्य छीनकर उन्हें दे दिया।'

श्लोक 32 (shiva.uma.38.32)

हतराज्यस्ततो राजा स वै बाहुर्वनं ययौ । पत्न्या चानुगतो दुःखी स वै प्राणानवासृजत्

hatarājyastato rājā sa vai bāhurvanaṁ yayau patnyā cānugato duḥkhī sa vai prāṇānavāsṛjat

'राज्य छिन जाने पर वह राजा बाहु वन में चला गया; अपनी पत्नी के साथ, दुःखी होकर उसने अपने प्राण त्याग दिए।'

श्लोक 33 (shiva.uma.38.33)

पत्नी या यादवी तस्य सगर्भा पृष्ठतो गता । सपत्न्या च गरस्तस्यै दत्तः पूर्वसुतेर्ष्यया

patnī yā yādavī tasya sagarbhā pṛṣṭhato gatā sapatnyā ca garastasyai dattaḥ pūrvasuterṣyayā

'उसकी यादव-वंशीया पत्नी, गर्भवती होते हुए भी, पति के पीछे-पीछे गई; सौत के पूर्वजात पुत्र की ईर्ष्या के कारण उसे विष दिया गया था।'

श्लोक 34 (shiva.uma.38.34)

सा तु भर्तुश्चितां कृत्वा ज्वलनं चावरोहत । और्वस्तां भार्गवो राजन्कारुण्यात्समवारयत्

sā tu bhartuścitāṁ kṛtvā jvalanaṁ cāvarohata aurvastāṁ bhārgavo rājankāruṇyātsamavārayat

'वह अपने पति की चिता बनाकर अग्नि में प्रवेश करने ही वाली थी; किन्तु हे राजन्, भार्गव और्व ने करुणावश उसे रोक दिया।'

श्लोक 35 (shiva.uma.38.35)

तस्याश्रमे स्थिता राज्ञी गर्भरक्षणहेतवे । सिषेवे मुनिवर्यं तं स्मरन्ती शङ्करं हृदा

tasyāśrame sthitā rājñī garbharakṣaṇahetave siṣeve munivaryaṁ taṁ smarantī śaṅkaraṁ hṛdā

'वह रानी, अपने गर्भ की रक्षा हेतु उसके आश्रम में रहते हुए, हृदय में शंकर जी का स्मरण करती हुई उस श्रेष्ठ मुनि की सेवा करने लगी।'

श्लोक 36 (shiva.uma.38.36)

एकदा खलु तद् गर्भो गरेणैव सह च्युतः । सुमुहूर्त्ते सुलग्ने च पञ्चोच्चग्रहसंयुते

ekadā khalu tad garbho gareṇaiva saha cyutaḥ sumuhūrtte sulagne ca pañcoccagrahasaṁyute

'एक दिन वह गर्भ विष सहित ही उत्पन्न हुआ, अत्यंत शुभ मुहूर्त और लग्न में, जब पाँच ग्रह उच्च राशि में स्थित थे।'

श्लोक 37 (shiva.uma.38.37)

तस्मिँल्लग्ने च बलिनि सर्वथा मुनिसत्तम । व्यजायत महाबाहुः सगरो नाम पार्थिवः

tasmi~llagne ca balini sarvathā munisattama vyajāyata mahābāhuḥ sagaro nāma pārthivaḥ

'हे मुनिश्रेष्ठ, उस बलवान् लग्न में सर्वथा, महाबाहु राजा सगर नामक पुत्र उत्पन्न हुआ।'

श्लोक 38 (shiva.uma.38.38)

और्वस्तु जातकर्मादि तस्य कृत्वा महात्मनः । अध्याप्य वेदशास्त्राणि ततोऽस्त्रं प्रत्यपादयत्

aurvastu jātakarmādi tasya kṛtvā mahātmanaḥ adhyāpya vedaśāstrāṇi tato'straṁ pratyapādayat

'और्व ने उस महात्मा बालक के जातकर्म आदि संस्कार करके तथा वेद-शास्त्रों की शिक्षा देकर, तत्पश्चात् उसे अस्त्र प्रदान किए।'

श्लोक 39 (shiva.uma.38.39)

आग्नेयं तं महाभागो ह्यमरैरपि दुःसहम् । जग्राह विधिना प्रीत्या सगरोऽसौ नृपोत्तमः

āgneyaṁ taṁ mahābhāgo hyamarairapi duḥsaham jagrāha vidhinā prītyā sagaro'sau nṛpottamaḥ

'उस महाभाग, राजाओं में श्रेष्ठ सगर ने, देवताओं के लिए भी दुःसह उस आग्नेय अस्त्र को विधिपूर्वक प्रसन्नतापूर्वक प्राप्त किया।'

श्लोक 40 (shiva.uma.38.40)

स तेनास्त्रबलेनैव बलेन च समन्वितः । हैहयान्विजघानाशु सङ्क्रुद्धोऽस्त्रबलेन च

sa tenāstrabalenaiva balena ca samanvitaḥ haihayānvijaghānāśu saṅkruddho'strabalena ca

'उस अस्त्र-बल और अपने पराक्रम से युक्त होकर, अत्यंत क्रुद्ध हुए उसने अस्त्र के बल से शीघ्र ही हैहयों का वध कर डाला।'

श्लोक 41 (shiva.uma.38.41)

आजहार च लोकेषु कीर्तिं कीर्तिमतां वरः । धर्मं संस्थापयामास सगरोऽसौ महीतले

ājahāra ca lokeṣu kīrtiṁ kīrtimatāṁ varaḥ dharmaṁ saṁsthāpayāmāsa sagaro'sau mahītale

'यशस्वियों में श्रेष्ठ उसने लोकों में कीर्ति अर्जित की; उस सगर ने पृथ्वी पर धर्म की सुदृढ़ स्थापना की।'

श्लोक 42 (shiva.uma.38.42)

ततः शकाः सयवनाः काम्बोजाः पाह्लवास्तथा । हन्यमानास्तदा ते तु वसिष्ठं शरणं ययुः

tataḥ śakāḥ sayavanāḥ kāmbojāḥ pāhlavāstathā hanyamānāstadā te tu vasiṣṭhaṁ śaraṇaṁ yayuḥ

'तब शक, यवनों सहित, काम्बोज तथा पह्लव, मारे जाते हुए, वसिष्ठ की शरण में गए।'

श्लोक 43 (shiva.uma.38.43)

वसिष्ठो वञ्चनां कृत्वा समयेन महाद्युतिः । सगरं वारयामास तेषां दत्वाभयं नृपम्

vasiṣṭho vañcanāṁ kṛtvā samayena mahādyutiḥ sagaraṁ vārayāmāsa teṣāṁ datvābhayaṁ nṛpam

'महातेजस्वी वसिष्ठ ने एक उपाय करके, उन्हें अभय प्रदान कर, राजा सगर को रोक दिया।'

श्लोक 44 (shiva.uma.38.44)

सगरः स्वां प्रतिज्ञां तु गुरोर्वाक्यं निशम्य च । धर्मं जघान तेषां वै केशान्यत्वं चकार ह

sagaraḥ svāṁ pratijñāṁ tu gurorvākyaṁ niśamya ca dharmaṁ jaghāna teṣāṁ vai keśānyatvaṁ cakāra ha

'सगर ने अपनी प्रतिज्ञा का पालन करते हुए, गुरु का वचन सुनकर, उनका धर्म (धार्मिक आचार) नष्ट कर दिया, और उनके केशों को भी बदल दिया।'

श्लोक 45 (shiva.uma.38.45)

अर्धं शकानां शिरसो मुण्डं कृत्वा व्यसर्जयत् । यवनानां शिरः सर्वं काम्बोजानां तथैव च

ardhaṁ śakānāṁ śiraso muṇḍaṁ kṛtvā vyasarjayat yavanānāṁ śiraḥ sarvaṁ kāmbojānāṁ tathaiva ca

'शकों के आधे सिर मुण्डित कर उन्हें छोड़ दिया; यवनों के सम्पूर्ण सिर, और इसी प्रकार काम्बोजों के भी मुण्डित किए।'

श्लोक 46 (shiva.uma.38.46)

पारदा मुण्डकेशाश्च पाह्नवाश्श्मश्रुधारिणः । निःस्वाध्यायवषट्काराः कृतास्तेन महात्मना

pāradā muṇḍakeśāśca pāhnavāśśmaśrudhāriṇaḥ niḥsvādhyāyavaṣaṭkārāḥ kṛtāstena mahātmanā

'पारदों को मुण्डित-केश तथा पह्लवों को दाढ़ी रखने वाला बनाया गया; उस महात्मा ने उन्हें स्वाध्याय और वषट्कार (यज्ञ-अधिकार) से रहित कर दिया।'

श्लोक 47 (shiva.uma.38.47)

जिता च सकला पृथ्वी धर्मतस्तेन भूभुजा । सर्वे ते क्षत्रियास्तात धर्महीनाः कृताः पुरा

jitā ca sakalā pṛthvī dharmatastena bhūbhujā sarve te kṣatriyāstāta dharmahīnāḥ kṛtāḥ purā

'उस राजा द्वारा सम्पूर्ण पृथ्वी धर्मपूर्वक जीत ली गई; हे तात, वे सभी, जो पहले क्षत्रिय थे, धर्म-रहित कर दिए गए।'

श्लोक 48 (shiva.uma.38.48)

स धर्मविजयी राजा विजित्वेमां वसुन्धराम् । अश्वं संस्कारयामास वाजिमेधाय पार्थिवः

sa dharmavijayī rājā vijitvemāṁ vasundharām aśvaṁ saṁskārayāmāsa vājimedhāya pārthivaḥ

'उस धर्म-विजयी राजा ने इस पृथ्वी को जीतकर, अश्वमेध यज्ञ के लिए एक घोड़े को संस्कारित कराया।'

श्लोक 49 (shiva.uma.38.49)

तस्य चारयतः सोऽश्वः समुद्रे पूर्वदक्षिणे । गतः षष्टिसहस्रैस्तु तत्पुत्रैरन्वितो मुने

tasya cārayataḥ so'śvaḥ samudre pūrvadakṣiṇe gataḥ ṣaṣṭisahasraistu tatputrairanvito mune

'स्वच्छन्द विचरण करते हुए वह अश्व दक्षिण-पूर्व समुद्र की ओर चला गया, हे मुने, और उसके साथ उसके साठ हजार पुत्र भी गए।'

श्लोक 50 (shiva.uma.38.50)

देवराजेन शक्रेण सोऽश्वो हि स्वार्थसाधिना । वेलासमीपेऽपहृतो भूमिं चैव प्रवेशितः

devarājena śakreṇa so'śvo hi svārthasādhinā velāsamīpe'pahṛto bhūmiṁ caiva praveśitaḥ

'देवराज इन्द्र ने, अपने स्वार्थ की सिद्धि हेतु, समुद्र-तट के समीप उस अश्व का अपहरण कर उसे पृथ्वी में प्रविष्ट करा दिया।'

श्लोक 51 (shiva.uma.38.51)

महाराजोऽथ सगरस्तद्धयान्वेषणाय च । स तं देशं तदा पुत्रैः खानयामास सर्वतः

mahārājo'tha sagarastaddhayānveṣaṇāya ca sa taṁ deśaṁ tadā putraiḥ khānayāmāsa sarvataḥ

'तब महाराज सगर ने उस अश्व की खोज हेतु अपने पुत्रों द्वारा उस प्रदेश को सब ओर से खुदवाया।'

श्लोक 52 (shiva.uma.38.52)

आसेदुस्ते ततस्तत्र खन्यमाने महार्णवे । तमादिपुरुषं देवं कपिलं विश्वरूपिणम्

āseduste tatastatra khanyamāne mahārṇave tamādipuruṣaṁ devaṁ kapilaṁ viśvarūpiṇam

'उस महासागर की खुदाई करते हुए वे वहाँ उन आदिपुरुष देव कपिल के पास पहुँचे, जो विश्वरूप थे।'

श्लोक 53 (shiva.uma.38.53)

तस्य चक्षुःसमुत्थेन वह्निना प्रतिबुध्यतः । दग्धाः षष्टिसहस्राणि चत्वारस्त्ववशेषिताः

tasya cakṣuḥsamutthena vahninā pratibudhyataḥ dagdhāḥ ṣaṣṭisahasrāṇi catvārastvavaśeṣitāḥ

'उनके जागृत होने पर उनके नेत्र से उत्पन्न अग्नि से साठ हजार पुत्र दग्ध हो गए; केवल चार ही शेष रहे।'

श्लोक 54 (shiva.uma.38.54)

हर्षकेतुः सुकेतुश्च तथा धर्मरथोपरः । शूरः पञ्चजनश्चैव तस्य वंशकरा नृपाः

harṣaketuḥ suketuśca tathā dharmarathoparaḥ śūraḥ pañcajanaścaiva tasya vaṁśakarā nṛpāḥ

हर्षकेतु, सुकेतु, धर्मरथ तथा शूर पंचजन — ये उनके वंश को आगे बढ़ाने वाले राजा हुए।

श्लोक 55 (shiva.uma.38.55)

प्रादाच्च तस्मै भगवान् हरिः पञ्च वरान्स्वयम् । वंशं मेधां च कीर्तिं च समुद्रं तनयं धनम्

prādācca tasmai bhagavān hariḥ pañca varānsvayam vaṁśaṁ medhāṁ ca kīrtiṁ ca samudraṁ tanayaṁ dhanam

'और भगवान् हरि ने स्वयं उन्हें पाँच वरदान दिए — वंश, बुद्धि, कीर्ति, पुत्ररूप समुद्र, तथा धन।'

श्लोक 56 (shiva.uma.38.56)

सागरत्वं च लेभे स कर्मणा तस्य तेन वै । तं चाश्वमेधिकं सोऽश्वं समुद्रादुपलब्धवान्

sāgaratvaṁ ca lebhe sa karmaṇā tasya tena vai taṁ cāśvamedhikaṁ so'śvaṁ samudrādupalabdhavān

'और उसी कर्म के फलस्वरूप समुद्र ने 'सागर' नाम प्राप्त किया; और उसने उस अश्वमेध के अश्व को समुद्र से पुनः प्राप्त कर लिया।'

श्लोक 57 (shiva.uma.38.57)

आजहाराश्वमेधानां शतं स तु महायशाः । ईजे शम्भुविभूतीश्च देवतास्तत्र सुव्रताः

ājahārāśvamedhānāṁ śataṁ sa tu mahāyaśāḥ īje śambhuvibhūtīśca devatāstatra suvratāḥ

'उस महायशस्वी ने सौ अश्वमेध यज्ञ सम्पन्न किए; उसने वहाँ शम्भु की विभूतियों और सुव्रत देवताओं का पूजन किया।'

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