उमा संहिता · अध्याय 43
व्यास-पूजन की विधि
श्लोक 1 (shiva.uma.43.1)
शौनक उवाच । आचार्यपूजनं ब्रूहि सूत व्यासगुरोऽधुना । ग्रन्थस्य श्रवणान्ते हि किं कर्तव्यं तदप्यहो
śaunaka uvāca ācāryapūjanaṁ brūhi sūta vyāsaguro'dhunā granthasya śravaṇānte hi kiṁ kartavyaṁ tadapyaho
शौनक ने कहा — हे सूत! अब आचार्य-पूजन के बारे में बताइए, हे व्यास के शिष्य! ग्रन्थ के श्रवण के अन्त में क्या करना चाहिए, यह भी बताइए।
श्लोक 2 (shiva.uma.43.2)
सूत उवाच । पूजयेद्विधिवद्भक्त्याचार्यं श्रुत्वा कथां पराम् । ग्रन्थान्ते विधिवद्दद्यादाचार्याय प्रसन्नधीः
sūta uvāca pūjayedvidhivadbhaktyācāryaṁ śrutvā kathāṁ parām granthānte vidhivaddadyādācāryāya prasannadhīḥ
सूत ने कहा — यह परम कथा सुनकर, प्रसन्नचित्त होकर, विधिपूर्वक भक्तिसहित आचार्य की पूजा करनी चाहिए, और ग्रन्थ के अन्त में आचार्य को विधिपूर्वक [दक्षिणा] देनी चाहिए।
श्लोक 3 (shiva.uma.43.3)
ततो वक्तारमानम्य सम्पूज्य च यथाविधि । भूषणैर्हस्तकर्णानां वस्त्रैः सौम्यादिभिः सुधीः
tato vaktāramānamya sampūjya ca yathāvidhi bhūṣaṇairhastakarṇānāṁ vastraiḥ saumyādibhiḥ sudhīḥ
फिर बुद्धिमान् पुरुष को चाहिए कि वक्ता को प्रणाम करके, विधिपूर्वक उसका पूजन करके, हाथों और कानों के आभूषणों से तथा मनोहर वस्त्रों आदि से उसे अलंकृत करे।
श्लोक 4 (shiva.uma.43.4)
शिवपूजासमाप्तौ तु दद्याद्धेनुं सवत्सिकाम् । कृत्वासनं सुवर्णस्य पलमानस्य साम्बरम्
śivapūjāsamāptau tu dadyāddhenuṁ savatsikām kṛtvāsanaṁ suvarṇasya palamānasya sāmbaram
शिव-पूजा की समाप्ति पर बछड़े सहित एक गाय अवश्य देनी चाहिए, तथा एक पल भार के सुवर्ण का, वस्त्र सहित एक आसन बनवाकर [अर्पित करे]।
श्लोक 5 (shiva.uma.43.5)
तत्रास्थाप्य शुभं ग्रन्थं लिखितं ललिताक्षरैः । आचार्याय सुधीर्दद्यान्मुक्तः स्याद्भवबन्धनैः
tatrāsthāpya śubhaṁ granthaṁ likhitaṁ lalitākṣaraiḥ ācāryāya sudhīrdadyānmuktaḥ syādbhavabandhanaiḥ
उस पर सुन्दर अक्षरों में लिखित इस शुभ ग्रन्थ को स्थापित करके, बुद्धिमान् पुरुष उसे आचार्य को दे दे; इससे वह संसार के बन्धनों से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 6 (shiva.uma.43.6)
ग्रामो गजो हयश्चापि यथाशक्त्यपराणि च । मुने सर्वाणि देयानि वाचकाय महात्मने
grāmo gajo hayaścāpi yathāśaktyaparāṇi ca mune sarvāṇi deyāni vācakāya mahātmane
हे मुने! गाँव, हाथी, घोड़ा और अन्य वस्तुएँ भी यथाशक्ति उस महात्मा वाचक (पाठ करने वाले) को अवश्य देनी चाहिए।
श्लोक 7 (shiva.uma.43.7)
विधानसहितं सम्यक् श्रुतं हि सफलं स्मृतम् । पुराणं शौनकमुने सत्यमेवोदितं मया
vidhānasahitaṁ samyak śrutaṁ hi saphalaṁ smṛtam purāṇaṁ śaunakamune satyamevoditaṁ mayā
जो पुराण विधिपूर्वक भलीभाँति सुना जाता है, वही सफल कहा गया है; हे शौनक मुने! मैंने यह सत्य ही कहा है।
श्लोक 8 (shiva.uma.43.8)
तस्माद्विधानयुक्तं तु शृणुयाद्भक्तितो मुने । पुराणं निगमार्थाढ्यं पुण्यदं हृदयं श्रुतेः
tasmādvidhānayuktaṁ tu śṛṇuyādbhaktito mune purāṇaṁ nigamārthāḍhyaṁ puṇyadaṁ hṛdayaṁ śruteḥ
इसलिए हे मुने! विधि-विधान सहित इस पुराण को भक्तिपूर्वक सुनना चाहिए, जो वेदार्थ से समृद्ध, पुण्यदायक और श्रुति का हृदय है।