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उमा संहिता · अध्याय 44

व्यासोत्पत्ति

अध्याय 43अध्याय-सूचीअध्याय 45

श्लोक 1 (shiva.uma.44.1)

मुनय ऊचुः । व्यासोत्पत्तिं महाबुद्धे ब्रूहि सूत दयानिधे । कृपया परया स्वामिन् कृतार्थान्नः कुरु प्रभो

munaya ūcuḥ vyāsotpattiṁ mahābuddhe brūhi sūta dayānidhe kṛpayā parayā svāmin kṛtārthānnaḥ kuru prabho

मुनियों ने कहा — हे महाबुद्धे! हे दयानिधे सूत! व्यास जी की उत्पत्ति का वृत्तान्त बताइए; हे स्वामिन्, हे प्रभो! परम कृपा करके हमें कृतार्थ कीजिए।

श्लोक 2 (shiva.uma.44.2)

व्यासस्य जननी प्रोक्ता नाम्ना सत्यवती शुभा । विवाहिता तु सा देवी राज्ञा शन्तनुना किल

vyāsasya jananī proktā nāmnā satyavatī śubhā vivāhitā tu sā devī rājñā śantanunā kila

व्यास जी की माता, कही जाती है, शुभ सत्यवती नाम से; वह देवी राजा शन्तनु द्वारा विवाहित थीं, ऐसा सुना जाता है।

श्लोक 3 (shiva.uma.44.3)

तस्यां जातो महायोगी कथं व्यासः पराशरात् । सन्देहोऽत्र महाञ्जातस्तं भवाञ्छेत्तुमर्हति

tasyāṁ jāto mahāyogī kathaṁ vyāsaḥ parāśarāt sandeho'tra mahāñjātastaṁ bhavāñchettumarhati

फिर वह पराशर से महायोगी व्यास को किस प्रकार उत्पन्न हुई? इस विषय में हमें बड़ा सन्देह उत्पन्न हुआ है; आप ही इसे दूर करने योग्य हैं।

श्लोक 4 (shiva.uma.44.4)

सूत उवाच । एकदा तीर्थयात्रायां व्रजन्योगी पराशरः । यदृच्छयागतो रम्यं यमुनायास्तटं शुभम्

sūta uvāca ekadā tīrthayātrāyāṁ vrajanyogī parāśaraḥ yadṛcchayāgato ramyaṁ yamunāyāstaṭaṁ śubham

सूत ने कहा — एक बार तीर्थयात्रा में जाते हुए योगी पराशर अनायास ही यमुना के रमणीय, शुभ तट पर आ पहुँचे।

श्लोक 5 (shiva.uma.44.5)

निषादमाह धर्मात्मा कुर्वन्तं भोजनं तदा । नयस्व यमुनापारं जलयानेन मामरम्

niṣādamāha dharmātmā kurvantaṁ bhojanaṁ tadā nayasva yamunāpāraṁ jalayānena māmaram

उस समय धर्मात्मा पराशर ने भोजन कर रहे एक निषाद से कहा — "मुझे नाव द्वारा यमुना के पार ले चलो।"

श्लोक 6 (shiva.uma.44.6)

इत्युक्तो मुनिना तेन निषादः स्वसुतां जगौ । मत्स्यगन्धाममुं बाले पारं नावा नय द्रुतम्

ityukto muninā tena niṣādaḥ svasutāṁ jagau matsyagandhāmamuṁ bāle pāraṁ nāvā naya drutam

मुनि द्वारा ऐसा कहे जाने पर उस निषाद ने अपनी पुत्री से कहा — "हे बाले मत्स्यगन्धे! इन्हें शीघ्र नाव से पार पहुँचाओ।

श्लोक 7 (shiva.uma.44.7)

तापसोऽयं महाभागे दृश्यन्तीगर्भसम्भवः । तितीर्षुरस्ति धर्माब्धिश्चतुराम्नायपारगः

tāpaso'yaṁ mahābhāge dṛśyantīgarbhasambhavaḥ titīrṣurasti dharmābdhiścaturāmnāyapāragaḥ

हे महाभागे! ये तपस्वी दृष्यन्ती के गर्भ से उत्पन्न हैं, धर्म के समुद्र हैं, चारों वेदों में पारंगत हैं और नदी पार करने के इच्छुक हैं।"

श्लोक 8 (shiva.uma.44.8)

इति विज्ञापिता पित्रा मत्स्यगन्धा महामुनिम् । संवाहयति नौकायामासीनं सूर्यरोचिषम्

iti vijñāpitā pitrā matsyagandhā mahāmunim saṁvāhayati naukāyāmāsīnaṁ sūryarociṣam

अपने पिता द्वारा इस प्रकार निर्देशित होकर मत्स्यगन्धा उस महामुनि को, जो नाव में बैठे थे और सूर्य के समान तेजस्वी थे, [नाव द्वारा] ले चलने लगी।

श्लोक 9 (shiva.uma.44.9)

कालयोगान्महायोगी तस्यां कामातुरोऽभवत् । दृष्ट्वा योऽप्सरसां रूपं न कदापि विमोहितः

kālayogānmahāyogī tasyāṁ kāmāturo'bhavat dṛṣṭvā yo'psarasāṁ rūpaṁ na kadāpi vimohitaḥ

काल के संयोग से वह महायोगी, जो अप्सराओं का रूप देखकर भी कभी मोहित नहीं हुआ था, उसके प्रति कामातुर हो गया।

श्लोक 10 (shiva.uma.44.10)

ग्रहीतुकामः स मुनिर्दाशकन्यां मनोहराम् । दक्षिणेन करेणैतामस्पृशद्दक्षिणे करे

grahītukāmaḥ sa munirdāśakanyāṁ manoharām dakṣiṇena kareṇaitāmaspṛśaddakṣiṇe kare

उस मनोहर धीवर-कन्या को ग्रहण करने की इच्छा से उस मुनि ने अपने दाहिने हाथ से उसके दाहिने हाथ को स्पर्श किया।

श्लोक 11 (shiva.uma.44.11)

तमुवाच विशालाक्षी वचनं स्मितपूर्वकम् । किमिदं क्रियते कर्म वाचंयमविगर्हितम्

tamuvāca viśālākṣī vacanaṁ smitapūrvakam kimidaṁ kriyate karma vācaṁyamavigarhitam

उस विशालाक्षी ने मुस्कुराते हुए उनसे कहा — "मौन-व्रतधारियों के लिए निन्दित यह कैसा कर्म आप कर रहे हैं?

श्लोक 12 (shiva.uma.44.12)

वसिष्ठस्य कुले रम्ये त्वं जातोऽसि महामते । निषादजा त्वहं ब्रह्मन् कथं सङ्गो घटेत नौ

vasiṣṭhasya kule ramye tvaṁ jāto'si mahāmate niṣādajā tvahaṁ brahman kathaṁ saṅgo ghaṭeta nau

हे महामते! आप वसिष्ठ के रमणीय कुल में उत्पन्न हुए हैं; मैं तो निषाद-कन्या हूँ, हे ब्रह्मन्! हम दोनों का संग कैसे हो सकता है?

श्लोक 13 (shiva.uma.44.13)

दुर्लभं मानुषं जन्म ब्राह्मणत्वं विशेषतः । तत्रापि तापसत्वं च दुर्लभं मुनिसत्तम

durlabhaṁ mānuṣaṁ janma brāhmaṇatvaṁ viśeṣataḥ tatrāpi tāpasatvaṁ ca durlabhaṁ munisattama

मनुष्य-जन्म ही दुर्लभ है, विशेषतः ब्राह्मणत्व भी; और उसमें भी तापस्य दुर्लभ है, हे मुनिसत्तम!

श्लोक 14 (shiva.uma.44.14)

विद्यया वपुषा वाचा कुलशीलेन चान्वितः । कामबाणवशं यातो महदाश्चर्यमत्र हि

vidyayā vapuṣā vācā kulaśīlena cānvitaḥ kāmabāṇavaśaṁ yāto mahadāścaryamatra hi

विद्या से, शरीर से, वाणी से तथा कुल-शील से सम्पन्न होकर भी आप काम के बाण के वशीभूत हो गए हैं — यह यहाँ महान आश्चर्य ही है।

श्लोक 15 (shiva.uma.44.15)

प्रवृत्तमप्यसत्कर्म कर्तुमेनं न कोऽपि ह । भुवि वारयितुं शक्तः शापभीत्यास्य योगिनः

pravṛttamapyasatkarma kartumenaṁ na ko'pi ha bhuvi vārayituṁ śaktaḥ śāpabhītyāsya yoginaḥ

इस प्रवृत्त हुए अशुभ कर्म को करने से, इस पृथ्वी पर, इस योगी को शाप के भय से कोई भी रोकने में समर्थ नहीं है।

श्लोक 16 (shiva.uma.44.16)

इति सञ्चिन्त्य हृदये निजगाद महामुनिम् । तावद्धैर्यं कुरु स्वामिन्यावत्त्वां पारयामि न

iti sañcintya hṛdaye nijagāda mahāmunim tāvaddhairyaṁ kuru svāminyāvattvāṁ pārayāmi na

ऐसा हृदय में सोचकर उसने उस महामुनि से कहा — "स्वामी! तब तक धैर्य रखिए, जब तक मैं आपको [नदी के] पार न पहुँचा दूँ।"

श्लोक 17 (shiva.uma.44.17)

सूत उवाच । इति श्रुत्वा वचस्तस्या योगिराजः पराशरः । तत्याज पाणिं तरसा सिन्धोः पारं गतः पुनः

sūta uvāca iti śrutvā vacastasyā yogirājaḥ parāśaraḥ tatyāja pāṇiṁ tarasā sindhoḥ pāraṁ gataḥ punaḥ

सूत ने कहा — उसका यह वचन सुनकर योगिराज पराशर ने वेगपूर्वक अपना हाथ छोड़ दिया, और पुनः नदी के पार पहुँचे।

श्लोक 18 (shiva.uma.44.18)

पुनर्जग्राह तां बालां मुनिंः कामप्रपीडितः । कम्पमाना तु सा बाला तमुवाच दयानिधिम्

punarjagrāha tāṁ bālāṁ muniṁḥ kāmaprapīḍitaḥ kampamānā tu sā bālā tamuvāca dayānidhim

काम से पीड़ित उस मुनि ने पुनः उस बालिका को पकड़ लिया; काँपती हुई उस बालिका ने उन दयानिधि से कहा —

श्लोक 19 (shiva.uma.44.19)

दुर्गन्धाहं मुनिश्रेष्ठ कृष्णवर्णा निषादजा । भवांस्तु परमोदारविचारो योगिसत्तमः

durgandhāhaṁ muniśreṣṭha kṛṣṇavarṇā niṣādajā bhavāṁstu paramodāravicāro yogisattamaḥ

"हे मुनिश्रेष्ठ! मैं दुर्गन्ध वाली और काले वर्ण की निषाद-कन्या हूँ; और आप तो परम उदार विचार वाले योगियों में श्रेष्ठ हैं।

श्लोक 20 (shiva.uma.44.20)

नावयोर्घटते सङ्गो काचकाञ्चनयोरिव । तुल्यजात्याकृतिकयोः सङ्गः सौख्यप्रदो भवेत्

nāvayorghaṭate saṅgo kācakāñcanayoriva tulyajātyākṛtikayoḥ saṅgaḥ saukhyaprado bhavet

हम दोनों का संग वैसे ही असंगत है जैसे काँच और सुवर्ण का; समान जाति और समान रूप वालों का ही संग सुख देने वाला होता है।"

श्लोक 21 (shiva.uma.44.21)

इत्युक्तेन तया तेन क्षणमात्रेण कामिनी । कृता योजनगन्धा तु रम्यरूपा मनोरमा

ityuktena tayā tena kṣaṇamātreṇa kāminī kṛtā yojanagandhā tu ramyarūpā manoramā

उसके इस प्रकार कहने पर उस मुनि ने उस कामिनी को उसी क्षण योजन-गन्धा और रमणीय, मनोहर रूप वाली बना दिया।

श्लोक 22 (shiva.uma.44.22)

पुनर्जग्राह तां बालां स मुनिः कामपीडितः । ग्रहीतुकामं तं दृष्ट्वा पुनः प्रोवाच वासवी

punarjagrāha tāṁ bālāṁ sa muniḥ kāmapīḍitaḥ grahītukāmaṁ taṁ dṛṣṭvā punaḥ provāca vāsavī

काम से पीड़ित उस मुनि ने उस बालिका को पुनः पकड़ लिया; उसे ग्रहण करने की इच्छा वाला देखकर उस वासवी ने पुनः कहा —

श्लोक 23 (shiva.uma.44.23)

रात्रौ व्यवायः कर्तव्यो न दिवेति श्रुतिर्जगौ । दिवासङ्गे महान्दोषो निन्दा चापि दुरासदा

rātrau vyavāyaḥ kartavyo na diveti śrutirjagau divāsaṅge mahāndoṣo nindā cāpi durāsadā

"संभोग रात्रि में ही करना चाहिए, दिन में नहीं — ऐसा श्रुति कहती है; दिन में संग करने में महान् दोष है और उसकी निन्दा भी असह्य है।

श्लोक 24 (shiva.uma.44.24)

तस्मात्तावत्प्रतीक्षस्व यावद्भवति यामिनी । पश्यन्ति मानवाश्चात्र पिता मे च तटे स्थितः

tasmāttāvatpratīkṣasva yāvadbhavati yāminī paśyanti mānavāścātra pitā me ca taṭe sthitaḥ

इसलिए तब तक प्रतीक्षा कीजिए, जब तक रात्रि न हो जाए; यहाँ लोग भी देख रहे हैं, और मेरे पिता भी तट पर ही खड़े हैं।"

श्लोक 25 (shiva.uma.44.25)

तयोक्तमिदमाकर्ण्य वचनं मुनिपुङ्गवः । नीहारं कल्पयामास सद्यः पुण्यबलेन वै

tayoktamidamākarṇya vacanaṁ munipuṅgavaḥ nīhāraṁ kalpayāmāsa sadyaḥ puṇyabalena vai

उसके इस वचन को सुनकर उस श्रेष्ठ मुनि ने अपने पुण्य-बल से तत्काल घना कोहरा उत्पन्न कर दिया।

श्लोक 26 (shiva.uma.44.26)

नीहारे च समुत्पन्ने तमसा रात्रिसन्निभे । व्यवायचकिता बाला पुनः प्रोवाच तं मुनिम्

nīhāre ca samutpanne tamasā rātrisannibhe vyavāyacakitā bālā punaḥ provāca taṁ munim

अन्धकार से रात्रि के समान वह कोहरा उत्पन्न होने पर, संभोग से भयभीत वह बालिका पुनः उस मुनि से बोली —

श्लोक 27 (shiva.uma.44.27)

योगिन्नमोघवीर्यस्त्वं भुक्त्वा गन्तासि मां यदि । सगर्भा स्यां तदा स्वामिन्का गतिर्मे भवेदिति

yoginnamoghavīryastvaṁ bhuktvā gantāsi māṁ yadi sagarbhā syāṁ tadā svāminkā gatirme bhavediti

"हे योगिन्! आप अमोघ-वीर्य वाले हैं; यदि मुझे भोगकर चले जाएँगे और मैं गर्भवती हो जाऊँगी, तो हे स्वामी! मेरी क्या गति होगी?

श्लोक 28 (shiva.uma.44.28)

कन्याव्रतं महाबुद्धे मम नष्टं भविष्यति । हसिष्यन्ति तदा लोकाः पितरं किं ब्रवीम्यहम्

kanyāvrataṁ mahābuddhe mama naṣṭaṁ bhaviṣyati hasiṣyanti tadā lokāḥ pitaraṁ kiṁ bravīmyaham

हे महाबुद्धे! मेरा कन्या-व्रत भी नष्ट हो जाएगा; तब लोग हँसेंगे — मैं अपने पिता से क्या कहूँगी?"

श्लोक 29 (shiva.uma.44.29)

पराशर उवाच । रम बाले मया सार्धं स्वच्छन्दं कामजै रसैः । स्वीयाभिलाषमाख्याहि पूरयाम्यधुना प्रिये

parāśara uvāca rama bāle mayā sārdhaṁ svacchandaṁ kāmajai rasaiḥ svīyābhilāṣamākhyāhi pūrayāmyadhunā priye

पराशर ने कहा — "हे बाले! मेरे साथ स्वच्छन्दतापूर्वक कामज रसों में रमण करो; हे प्रिये! अपनी अभिलाषा बताओ, मैं इसी क्षण उसे पूर्ण करूँगा।

श्लोक 30 (shiva.uma.44.30)

मदाज्ञासत्यकरणान्नाम्ना सत्यवती भव । वन्दनीया तथाशेषैर्योगिभिस्त्रिदशैरपि

madājñāsatyakaraṇānnāmnā satyavatī bhava vandanīyā tathāśeṣairyogibhistridaśairapi

मेरी आज्ञा को सत्य करने के कारण तुम्हारा नाम 'सत्यवती' होगा, और तुम समस्त योगियों तथा देवताओं द्वारा भी वन्दनीय बनोगी।"

श्लोक 31 (shiva.uma.44.31)

सत्यवत्युवाच । जानते न पिता माता न वान्ये भुवि मानवाः । कन्याधर्मो न मे हन्याद्यदि स्वीकुरु मां तदा

satyavatyuvāca jānate na pitā mātā na vānye bhuvi mānavāḥ kanyādharmo na me hanyādyadi svīkuru māṁ tadā

सत्यवती ने कहा — "न मेरे पिता जानें, न मेरी माता, और न ही पृथ्वी पर कोई अन्य मनुष्य; यदि मेरा कन्या-धर्म नष्ट न हो, तो आप मुझे स्वीकार कीजिए।

श्लोक 32 (shiva.uma.44.32)

पुत्रश्च त्वत्समो नाथ भवेदद्भुतशक्तिमान् । सौगन्ध्यं सर्वदाङ्गे मे तारुण्यं च नवं नवम्

putraśca tvatsamo nātha bhavedadbhutaśaktimān saugandhyaṁ sarvadāṅge me tāruṇyaṁ ca navaṁ navam

हे नाथ! मेरा पुत्र आपके समान अद्भुत शक्तिशाली हो, और मेरे शरीर में सदा सुगन्ध तथा नित नवीन यौवन बना रहे।"

श्लोक 33 (shiva.uma.44.33)

पराशर उवाच । शृणु प्रिये तवाभीष्टं सर्वं पूर्णं भविष्यति । विष्ण्वंशसम्भवः पुत्रो भविता ते महायशाः

parāśara uvāca śṛṇu priye tavābhīṣṭaṁ sarvaṁ pūrṇaṁ bhaviṣyati viṣṇvaṁśasambhavaḥ putro bhavitā te mahāyaśāḥ

पराशर ने कहा — "हे प्रिये! सुनो, तुम्हारी सम्पूर्ण अभिलाषा पूर्ण होगी; तुम्हारा पुत्र विष्णु के अंश से उत्पन्न, महायशस्वी होगा।

श्लोक 34 (shiva.uma.44.34)

किञ्चिद्वै कारणं विद्धि यतोऽहं कामपीडितः । दृष्ट्वा चाप्सरसां रूपं नामुह्यन्मे मनः क्वचित्

kiñcidvai kāraṇaṁ viddhi yato'haṁ kāmapīḍitaḥ dṛṣṭvā cāpsarasāṁ rūpaṁ nāmuhyanme manaḥ kvacit

यह भी जान लो कि इसका कुछ कारण है कि मैं काम से पीड़ित हुआ — अप्सराओं का रूप देखकर भी मेरा मन कभी मोहित नहीं हुआ था।

श्लोक 35 (shiva.uma.44.35)

मीनगन्धां समालक्ष्य त्वां मोहवशगोऽभवम् । न बाले भालपट्टस्थो ब्रह्मलेखोऽन्यथा भवेत्

mīnagandhāṁ samālakṣya tvāṁ mohavaśago'bhavam na bāle bhālapaṭṭastho brahmalekho'nyathā bhavet

तुम्हारी मत्स्य-गन्ध को देखकर ही मैं मोहवश हो गया, हे बाले! अन्यथा मेरे मस्तक पर स्थित ब्रह्म-लेख [विधाता का लेख] अन्यथा नहीं हो सकता था।

श्लोक 36 (shiva.uma.44.36)

पुराणकर्ता पुत्रस्ते वेदशाखाविभागकृत् । भविष्यति वरारोहे ख्यातकीर्तिर्जगत्त्रये

purāṇakartā putraste vedaśākhāvibhāgakṛt bhaviṣyati varārohe khyātakīrtirjagattraye

हे वरारोहे! तुम्हारा पुत्र पुराणों का रचयिता, वेद-शाखाओं का विभाजक और तीनों लोकों में विख्यात कीर्ति वाला होगा।"

श्लोक 37 (shiva.uma.44.37)

इत्युक्त्वा तां सुरम्याङ्गीं भुक्त्वा योगविशारदः । वव्राज शीघ्रं यमुनाजले स्नात्वा महामुने

ityuktvā tāṁ suramyāṅgīṁ bhuktvā yogaviśāradaḥ vavrāja śīghraṁ yamunājale snātvā mahāmune

ऐसा कहकर योग में निपुण उन पराशर ने उस सुरम्य-अंगी से समागम किया, और तत्काल यमुना जल में स्नान करके, हे महामुने! वे शीघ्र चले गए।

श्लोक 38 (shiva.uma.44.38)

सापि गर्भं दधाराशु द्वादशात्मसमप्रभम् । असूत सूर्यजाद्वीपे कामदेवमिवात्मजम्

sāpi garbhaṁ dadhārāśu dvādaśātmasamaprabham asūta sūryajādvīpe kāmadevamivātmajam

उसने भी तत्काल गर्भ धारण किया, जो द्वादश आदित्यों के समान तेजस्वी था; उसने सूर्य के पुत्र के समान उस पुत्र को एक द्वीप पर जन्म दिया।

श्लोक 39 (shiva.uma.44.39)

वामे कमण्डलुं बिभ्रद्दक्षिणे दण्डमुत्तमम् । पिशङ्गीभिर्जटाभिश्च राजितो महसां चयः

vāme kamaṇḍaluṁ bibhraddakṣiṇe daṇḍamuttamam piśaṅgībhirjaṭābhiśca rājito mahasāṁ cayaḥ

बायें हाथ में कमण्डलु और दाहिने में उत्तम दण्ड धारण किए, भूरी जटाओं से युक्त, वह तेजोराशि सुशोभित था।

श्लोक 40 (shiva.uma.44.40)

जातमात्रस्तु तेजस्वी मातरं प्रत्यभाषत । गच्छ मातर्यथाकामं गच्छाम्यहमतः परम्

jātamātrastu tejasvī mātaraṁ pratyabhāṣata gaccha mātaryathākāmaṁ gacchāmyahamataḥ param

जन्म लेते ही वह तेजस्वी बालक अपनी माता से बोला — "हे माता! जैसी तुम्हारी इच्छा हो वैसे जाओ, मैं अब यहाँ से आगे चला जाता हूँ।

श्लोक 41 (shiva.uma.44.41)

मातर्यदा भवेत्कार्यं तव किञ्चिद् हृदीप्सितम् । संस्मृतश्चागमिष्यामि त्वदिच्छापूर्तिहेतवे

mātaryadā bhavetkāryaṁ tava kiñcid hṛdīpsitam saṁsmṛtaścāgamiṣyāmi tvadicchāpūrtihetave

हे माता! जब भी तुम्हारे हृदय में कोई अभीष्ट कार्य होगा, स्मरण करते ही मैं तुम्हारी इच्छा-पूर्ति के लिए आ जाऊँगा।"

श्लोक 42 (shiva.uma.44.42)

इत्युक्त्वा मातृचरणावभिवाद्य तपोनिधिः । जगाम च तपः कर्तुं तीर्थं पापविशोधनम्

ityuktvā mātṛcaraṇāvabhivādya taponidhiḥ jagāma ca tapaḥ kartuṁ tīrthaṁ pāpaviśodhanam

ऐसा कहकर उस तपोनिधि ने माता के चरणों की वन्दना करके तप करने के लिए पापनाशक तीर्थ की ओर प्रस्थान किया।

श्लोक 43 (shiva.uma.44.43)

सापि पित्रन्तिकं याता पुत्रस्नेहाकुला सती । स्मरन्ती चरितं सूनोर्वर्णयन्ती स्वभाग्यकम्

sāpi pitrantikaṁ yātā putrasnehākulā satī smarantī caritaṁ sūnorvarṇayantī svabhāgyakam

पुत्र-स्नेह से व्याकुल वह सती (सत्यवती) भी अपने पिता के पास गई, अपने पुत्र के चरित्र का स्मरण करती और अपने सौभाग्य का वर्णन करती हुई।

श्लोक 44 (shiva.uma.44.44)

द्वीपे जातो यतो बालस्तेन द्वैपायनोऽभवत् । वेदशाखाविभजनाद्वेदव्यासः प्रकीर्तितः

dvīpe jāto yato bālastena dvaipāyano'bhavat vedaśākhāvibhajanādvedavyāsaḥ prakīrtitaḥ

चूँकि वह बालक द्वीप पर उत्पन्न हुआ था, इसलिए वह 'द्वैपायन' कहलाया; वेद की शाखाओं का विभाजन करने के कारण वह 'वेदव्यास' के नाम से विख्यात हुआ।

श्लोक 45 (shiva.uma.44.45)

तीर्थराजं प्रथमतो धर्मकामार्थमोक्षदम् । नैमिषं च कुरुक्षेत्रं गङ्गाद्वारमवन्तिकाम्

tīrtharājaṁ prathamato dharmakāmārthamokṣadam naimiṣaṁ ca kurukṣetraṁ gaṅgādvāramavantikām

सबसे पहले धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष प्रदान करने वाले तीर्थराज [प्रयाग] को, फिर नैमिष, कुरुक्षेत्र, गंगाद्वार और अवन्तिका को,

श्लोक 46 (shiva.uma.44.46)

अयोध्यां मथुरां चैव द्वारकाममरावतीम् । सरस्वतीं सिन्धुसङ्गं गङ्गासागरसङ्गमम्

ayodhyāṁ mathurāṁ caiva dvārakāmamarāvatīm sarasvatīṁ sindhusaṅgaṁ gaṅgāsāgarasaṅgamam

अयोध्या, मथुरा, द्वारका और अमरावती को, सरस्वती और सिन्धु के संगम को, गंगा-सागर के संगम को [वे गए],

श्लोक 47 (shiva.uma.44.47)

काञ्चीं च त्र्यम्बकं चापि सप्तगोदावरीतटम् । कालञ्जरं प्रभासं च तथा बदरिकाश्रमम्

kāñcīṁ ca tryambakaṁ cāpi saptagodāvarītaṭam kālañjaraṁ prabhāsaṁ ca tathā badarikāśramam

काञ्ची और त्र्यम्बक को, सप्त-गोदावरी के तट को, कालञ्जर, प्रभास और बदरिकाश्रम को भी [वे गए],

श्लोक 48 (shiva.uma.44.48)

महालयं तथोङ्कारक्षेत्रं वै पुरुषोत्तमम् । गोकर्णं भृगुकच्छं च भृगुतुङ्गं च पुष्करम्

mahālayaṁ tathoṅkārakṣetraṁ vai puruṣottamam gokarṇaṁ bhṛgukacchaṁ ca bhṛgutuṅgaṁ ca puṣkaram

महालय, ओंकार-क्षेत्र, पुरुषोत्तम, गोकर्ण, भृगुकच्छ, भृगुतुंग और पुष्कर को [वे गए],

श्लोक 49 (shiva.uma.44.49)

श्रीपर्वतादितीर्थानि धारातीर्थं तथैव च । गत्वावगाह्य विधिना चचार परमं तपः

śrīparvatāditīrthāni dhārātīrthaṁ tathaiva ca gatvāvagāhya vidhinā cacāra paramaṁ tapaḥ

श्रीपर्वत आदि तीर्थों को और धारा-तीर्थ को भी — इन सबमें जाकर, विधिपूर्वक स्नान करके उन्होंने परम तप का आचरण किया।

श्लोक 50 (shiva.uma.44.50)

एवं तीर्थान्यनेकानि नानादेशस्थितानि ह । पर्यटन्कालिकासूनुः प्रापद्वाराणसीं पुरीम्

evaṁ tīrthānyanekāni nānādeśasthitāni ha paryaṭankālikāsūnuḥ prāpadvārāṇasīṁ purīm

इस प्रकार अनेक तथा नाना देशों में स्थित तीर्थों में विचरण करते हुए वह कालिका-पुत्र (सत्यवती-पुत्र व्यास) वाराणसी नगरी में पहुँचे,

श्लोक 51 (shiva.uma.44.51)

यत्र विश्वेश्वरः साक्षादन्नपूर्णा महेश्वरी । भक्तानाममृतं दातुं विराजेते कृपानिधी

yatra viśveśvaraḥ sākṣādannapūrṇā maheśvarī bhaktānāmamṛtaṁ dātuṁ virājete kṛpānidhī

जहाँ स्वयं विश्वेश्वर और महेश्वरी अन्नपूर्णा, वे दोनों कृपानिधि, भक्तों को अमृत प्रदान करने के लिए विराजमान रहते हैं।

श्लोक 52 (shiva.uma.44.52)

प्राप्य वाराणसीतीर्थं दृष्ट्वाथ मणिकर्णिकाम् । कोटिजन्मार्जितं पापं तत्याज स मुनीश्वरः

prāpya vārāṇasītīrthaṁ dṛṣṭvātha maṇikarṇikām koṭijanmārjitaṁ pāpaṁ tatyāja sa munīśvaraḥ

वाराणसी तीर्थ को प्राप्त कर और मणिकर्णिका [घाट] का दर्शन कर, उन मुनीश्वर ने करोड़ों जन्मों में अर्जित पाप को त्याग दिया।

श्लोक 53 (shiva.uma.44.53)

दृष्ट्वा लिङ्गानि सर्वाणि विश्वेशप्रमुखानि च । स्नात्वा सर्वेषु कुण्डेषु वापीकूपसरःसु च

dṛṣṭvā liṅgāni sarvāṇi viśveśapramukhāni ca snātvā sarveṣu kuṇḍeṣu vāpīkūpasaraḥsu ca

विश्वेश आदि सभी लिंगों का दर्शन कर, सभी कुण्डों, बावड़ियों, कुओं और सरोवरों में स्नान करके,

श्लोक 54 (shiva.uma.44.54)

नत्वा विनायकान्सर्वान्गौरीः सर्वाः प्रणम्य च । सम्पूज्य कालराजं च भैरवं पापभक्षणम्

natvā vināyakānsarvāngaurīḥ sarvāḥ praṇamya ca sampūjya kālarājaṁ ca bhairavaṁ pāpabhakṣaṇam

सभी विनायकों को प्रणाम कर, सभी गौरी-रूपों को नमन कर, कालराज और पाप-भक्षक भैरव का पूजन कर,

श्लोक 55 (shiva.uma.44.55)

दण्डनायकमुख्यांश्च गणान्स्तुत्वा प्रयत्नतः । आदिकेशवमुख्यांश्च केशवान्परितोष्य च

daṇḍanāyakamukhyāṁśca gaṇānstutvā prayatnataḥ ādikeśavamukhyāṁśca keśavānparitoṣya ca

दण्डनायक आदि प्रमुख गणों की प्रयत्नपूर्वक स्तुति कर, आदिकेशव आदि प्रमुख केशव-रूपों को सन्तुष्ट कर,

श्लोक 56 (shiva.uma.44.56)

लोलार्कमुख्यसूर्यांश्च प्रणम्य च पुनःपुनः । कृत्वा पिण्डप्रदानानि सर्वतीर्थेष्वतन्द्रितः

lolārkamukhyasūryāṁśca praṇamya ca punaḥpunaḥ kṛtvā piṇḍapradānāni sarvatīrtheṣvatandritaḥ

लोलार्क आदि प्रमुख सूर्यों को बारम्बार प्रणाम कर, सभी तीर्थों में अथक भाव से पिण्डदान करके,

श्लोक 57 (shiva.uma.44.57)

स्थापयामास पुण्यात्मा लिङ्गं व्यासेश्वराभिधम् । यद्दर्शनाद्भवेद्विप्रा नरो विद्यासु वाक्पतिः

sthāpayāmāsa puṇyātmā liṅgaṁ vyāseśvarābhidham yaddarśanādbhavedviprā naro vidyāsu vākpatiḥ

उस पुण्यात्मा ने 'व्यासेश्वर' नामक लिंग की स्थापना की, जिसके दर्शन मात्र से मनुष्य, हे विप्रगण, विद्याओं में वाणी का स्वामी (महापण्डित) बन जाता है।

श्लोक 58 (shiva.uma.44.58)

लिङ्गान्यभ्यर्च्य विश्वेशप्रमुखानि सुभक्तितः । असकृच्चिन्तयामास किं लिङ्गं क्षिप्रसिद्धिदम्

liṅgānyabhyarcya viśveśapramukhāni subhaktitaḥ asakṛccintayāmāsa kiṁ liṅgaṁ kṣiprasiddhidam

विश्वेश आदि सभी लिंगों की सुभक्तिपूर्वक अर्चना करके, उन्होंने बारम्बार यह विचार किया — "कौन-सा लिंग शीघ्र सिद्धि देने वाला है,

श्लोक 59 (shiva.uma.44.59)

यमाराध्य महादेवं विद्याः सर्वा लभेमहि । पुराणकर्तृताशक्तिर्ममास्तु यदनुग्रहात्

yamārādhya mahādevaṁ vidyāḥ sarvā labhemahi purāṇakartṛtāśaktirmamāstu yadanugrahāt

जिस महादेव की आराधना करके हम समस्त विद्याएँ प्राप्त कर सकें, जिनके अनुग्रह से मुझे पुराण-रचना की सामर्थ्य प्राप्त हो?

श्लोक 60 (shiva.uma.44.60)

श्रीमदोङ्कारनाथं वा कृत्तिवासेश्वरं किमु । केदारेशं तु कामेशं चन्द्रेशं वा त्रिलोचनम्

śrīmadoṅkāranāthaṁ vā kṛttivāseśvaraṁ kimu kedāreśaṁ tu kāmeśaṁ candreśaṁ vā trilocanam

क्या श्रीमान् ओंकारनाथ, अथवा कृत्तिवासेश्वर? क्या केदारेश, कामेश, चन्द्रेश अथवा त्रिलोचन?

श्लोक 61 (shiva.uma.44.61)

कालेशं वृद्धकालेशं कलशेश्वरमेव वा । ज्येष्ठेशं जम्बुकेशं वा जैगीषव्येश्वरं तु वा

kāleśaṁ vṛddhakāleśaṁ kalaśeśvarameva vā jyeṣṭheśaṁ jambukeśaṁ vā jaigīṣavyeśvaraṁ tu vā

कालेश, वृद्धकालेश अथवा कलशेश्वर? ज्येष्ठेश, जम्बुकेश अथवा जैगीषव्येश्वर?

श्लोक 62 (shiva.uma.44.62)

दशाश्वमेधमीशानं द्रुमचण्डेशमेव वा । दृक्केशं गरुडेशं वा गोकर्णेशं गणेश्वरम्

daśāśvamedhamīśānaṁ drumacaṇḍeśameva vā dṛkkeśaṁ garuḍeśaṁ vā gokarṇeśaṁ gaṇeśvaram

दशाश्वमेधेश, अथवा द्रुमचण्डेश? दृक्केश, गरुडेश अथवा गोकर्णेश और गणेश्वर?

श्लोक 63 (shiva.uma.44.63)

प्रसन्नवदनेशं वा धर्मेशं तारकेश्वरम् । नन्दिकेशं निवासेशं पत्रीशं प्रीतिकेश्वरम्

prasannavadaneśaṁ vā dharmeśaṁ tārakeśvaram nandikeśaṁ nivāseśaṁ patrīśaṁ prītikeśvaram

प्रसन्नवदनेश, धर्मेश अथवा तारकेश्वर? नन्दिकेश, निवासेश, पत्रीश अथवा प्रीतिकेश्वर?

श्लोक 64 (shiva.uma.44.64)

पर्वतेशं पशुपतिं हाटकेश्वरमेव वा । बृहस्पतीश्वरं वाथ तिलभाण्डेशमेव वा

parvateśaṁ paśupatiṁ hāṭakeśvarameva vā bṛhaspatīśvaraṁ vātha tilabhāṇḍeśameva vā

पर्वतेश, पशुपति अथवा हाटकेश्वर? बृहस्पतीश्वर अथवा तिलभाण्डेश?

श्लोक 65 (shiva.uma.44.65)

भारभूतेश्वरं किं वा महालक्ष्मीश्वरं तु वा । मरुतेशं तु मोक्षेशं गङ्गेशं नर्मदेश्वरम्

bhārabhūteśvaraṁ kiṁ vā mahālakṣmīśvaraṁ tu vā maruteśaṁ tu mokṣeśaṁ gaṅgeśaṁ narmadeśvaram

भारभूतेश्वर अथवा महालक्ष्मीश्वर? मरुतेश, मोक्षेश, गंगेश अथवा नर्मदेश्वर?

श्लोक 66 (shiva.uma.44.66)

कृष्णेशं परमेशानं रत्नेश्वरमथापि वा । यामुनेशं लाङ्गलीशं श्रीमद्विश्वेश्वरं विभुम्

kṛṣṇeśaṁ parameśānaṁ ratneśvaramathāpi vā yāmuneśaṁ lāṅgalīśaṁ śrīmadviśveśvaraṁ vibhum

कृष्णेश, परमेशान अथवा रत्नेश्वर? यामुनेश, लांगलीश अथवा प्रभु श्रीमान् विश्वेश्वर?

श्लोक 67 (shiva.uma.44.67)

अविमुक्तेश्वरं वाथ विशालाक्षीशमेव वा । व्याघ्रेश्वरं वराहेशं विद्येश्वरमथापि वा

avimukteśvaraṁ vātha viśālākṣīśameva vā vyāghreśvaraṁ varāheśaṁ vidyeśvaramathāpi vā

अविमुक्तेश्वर अथवा विशालाक्षीश? व्याघ्रेश्वर, वराहेश अथवा विद्येश्वर?

श्लोक 68 (shiva.uma.44.68)

वरुणेशं विधीशं वा हरिकेशेश्वरं तु वा । भवानीशं कपर्दीशं कन्दुकेशमजेश्वरम्

varuṇeśaṁ vidhīśaṁ vā harikeśeśvaraṁ tu vā bhavānīśaṁ kapardīśaṁ kandukeśamajeśvaram

वरुणेश, विधीश अथवा हरिकेशेश्वर? भवानीश, कपर्दीश, कन्दुकेश अथवा अजेश्वर?

श्लोक 69 (shiva.uma.44.69)

विश्वकर्मेश्वरं वाथ वीरेश्वरमथापि वा । नादेशं कपिलेशं च भुवनेश्वरमेव वा

viśvakarmeśvaraṁ vātha vīreśvaramathāpi vā nādeśaṁ kapileśaṁ ca bhuvaneśvarameva vā

विश्वकर्मेश्वर अथवा वीरेश्वर? नादेश, कपिलेश अथवा भुवनेश्वर?

श्लोक 70 (shiva.uma.44.70)

वाष्कुलीशं महादेवं सिद्धीश्वरमथापि वा । विश्वेदेवेश्वरं वीरभद्रेशं भैरवेश्वरम्

vāṣkulīśaṁ mahādevaṁ siddhīśvaramathāpi vā viśvedeveśvaraṁ vīrabhadreśaṁ bhairaveśvaram

वाष्कुलीश महादेव अथवा सिद्धीश्वर? विश्वेदेवेश्वर, वीरभद्रेश अथवा भैरवेश्वर?

श्लोक 71 (shiva.uma.44.71)

अमृतेशं सतीशं वा पार्वतीश्वरमेव वा । सिद्धेश्वरं मतङ्गेशं भूतीश्वरमथापि वा

amṛteśaṁ satīśaṁ vā pārvatīśvarameva vā siddheśvaraṁ mataṅgeśaṁ bhūtīśvaramathāpi vā

अमृतेश, सतीश अथवा पार्वतीश्वर? सिद्धेश्वर, मतंगेश अथवा भूतीश्वर?

श्लोक 72 (shiva.uma.44.72)

आषाढीशं प्रकाशेशं कोटिरुद्रेश्वरं तथा । मदालसेश्वरं चैव तिलपर्णेश्वरं किमु

āṣāḍhīśaṁ prakāśeśaṁ koṭirudreśvaraṁ tathā madālaseśvaraṁ caiva tilaparṇeśvaraṁ kimu

आषाढीश, प्रकाशेश अथवा कोटिरुद्रेश्वर? मदालसेश्वर अथवा तिलपर्णेश्वर?

श्लोक 73 (shiva.uma.44.73)

किं वा हिरण्यगर्भेशं किं वा श्रीमध्यमेश्वरम् । इत्यादि कोटिलिङ्गानां मध्येऽहं किमुपाश्रये

kiṁ vā hiraṇyagarbheśaṁ kiṁ vā śrīmadhyameśvaram ityādi koṭiliṅgānāṁ madhye'haṁ kimupāśraye

अथवा हिरण्यगर्भेश, अथवा श्रीमध्यमेश्वर? इन आदि करोड़ों लिंगों में से किसका आश्रय लूँ?

श्लोक 74 (shiva.uma.44.74)

इति चिन्तातुरो व्यासः शिवभक्तिरतात्मवान् । क्षणं विचारयामास ध्यानसुस्थिरचेतसा

iti cintāturo vyāsaḥ śivabhaktiratātmavān kṣaṇaṁ vicārayāmāsa dhyānasusthiracetasā

इस प्रकार चिन्ता में डूबे, शिवभक्ति में लीन-चित्त व्यास ने ध्यान में स्थिर होकर क्षणभर विचार किया।

श्लोक 75 (shiva.uma.44.75)

आं ज्ञातं विस्मृतं तावन्निष्पन्नो मे मनोरथः । सिद्धैः सम्पूजितं लिङ्गं धर्मकामार्थमोक्षदम्

āṁ jñātaṁ vismṛtaṁ tāvanniṣpanno me manorathaḥ siddhaiḥ sampūjitaṁ liṅgaṁ dharmakāmārthamokṣadam

"आह! स्मरण हो आया — भूला हुआ [ज्ञान वापस आया]; अब मेरा मनोरथ सिद्ध हुआ! वह लिंग जो सिद्धों द्वारा पूजित है, धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष प्रदान करने वाला है,

श्लोक 76 (shiva.uma.44.76)

दर्शनात्स्पर्शनाद्यस्य चेतो निर्मलतामियात् । उद्घाटितं सदैवास्ति द्वारं स्वर्गस्य यत्र हि

darśanātsparśanādyasya ceto nirmalatāmiyāt udghāṭitaṁ sadaivāsti dvāraṁ svargasya yatra hi

जिसके दर्शन और स्पर्श मात्र से चित्त निर्मलता को प्राप्त करता है, जहाँ स्वर्ग का द्वार सदा खुला ही रहता है,

श्लोक 77 (shiva.uma.44.77)

अविमुक्ते महाक्षेत्रे सिद्धक्षेत्रे हि तत्परम् । यत्रास्ते परमं लिङ्गं मध्यमेश्वरसंज्ञकम्

avimukte mahākṣetre siddhakṣetre hi tatparam yatrāste paramaṁ liṅgaṁ madhyameśvarasaṁjñakam

अविमुक्त नामक महाक्षेत्र में, उस सिद्धक्षेत्र में सर्वोपरि है — वहीं वह परम लिंग स्थित है, जो 'मध्यमेश्वर' नाम से जाना जाता है।

श्लोक 78 (shiva.uma.44.78)

न मध्यमेश्वरादन्याल्लिङ्गं काश्यां हि विद्यते । यद्दर्शनार्थमायान्ति देवाः पर्वणि पर्वणि

na madhyameśvarādanyālliṅgaṁ kāśyāṁ hi vidyate yaddarśanārthamāyānti devāḥ parvaṇi parvaṇi

काशी में मध्यमेश्वर से बढ़कर अन्य कोई लिंग नहीं है, जिसके दर्शन के लिए देवता भी प्रत्येक पर्व पर आते हैं।

श्लोक 79 (shiva.uma.44.79)

अतः सेव्यो महादेवो मध्यमेश्वरसंज्ञकः । अस्याराधनतो विप्रा बहवः सिद्धिमागताः

ataḥ sevyo mahādevo madhyameśvarasaṁjñakaḥ asyārādhanato viprā bahavaḥ siddhimāgatāḥ

इसलिए मध्यमेश्वर नामक महादेव ही सेवा करने योग्य हैं; इनकी आराधना से अनेक ब्राह्मणों ने सिद्धि प्राप्त की है।

श्लोक 80 (shiva.uma.44.80)

यः प्रधानतया काश्यां मध्ये तिष्ठति शङ्करः । स्वपुरीजन सौख्यार्थमतोऽसौ मध्यमेश्वरः

yaḥ pradhānatayā kāśyāṁ madhye tiṣṭhati śaṅkaraḥ svapurījana saukhyārthamato'sau madhyameśvaraḥ

जो शंकर काशी के प्रमुख रूप में उसके मध्य में विराजते हैं, अपने नगरवासियों के सुख के लिए ही वे 'मध्यमेश्वर' हैं।"

श्लोक 81 (shiva.uma.44.81)

तुम्बुरुर्नाम गन्धर्वो देवर्षिर्नारदस्तथा । अमुमाराध्य सम्पन्नो गानविद्याविशारदौ

tumbururnāma gandharvo devarṣirnāradastathā amumārādhya sampanno gānavidyāviśāradau

तुम्बुरु नामक गन्धर्व और देवर्षि नारद, इन्हीं की आराधना करके संगीत-विद्या में निपुण हुए।

श्लोक 82 (shiva.uma.44.82)

अमुमेव समाराध्य विष्णुर्मोक्षप्रदोऽभवत् । ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च सृष्टिपालकहारकाः

amumeva samārādhya viṣṇurmokṣaprado'bhavat brahmā viṣṇuśca rudraśca sṛṣṭipālakahārakāḥ

इन्हीं की आराधना करके विष्णु मोक्ष प्रदान करने वाले बने; ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र — सृष्टि, पालन और संहार करने वाले —

श्लोक 83 (shiva.uma.44.83)

धनाधीशः कुबेरोऽपि वामदेवो हि शैवराट् । खट्वाङ्गो नाम भूपालोऽनपत्योऽपत्यवानभूत्

dhanādhīśaḥ kubero'pi vāmadevo hi śaivarāṭ khaṭvāṅgo nāma bhūpālo'napatyo'patyavānabhūt

धनाध्यक्ष कुबेर भी, और वामदेव नामक शैवराज भी [इन्हीं की आराधना से सिद्ध हुए]; खट्वांग नामक राजा, जो सन्तानरहित थे, सन्तानवान हुए।

श्लोक 84 (shiva.uma.44.84)

अप्सराश्चन्द्रभामाख्या नृत्यन्ती निजभावतः । सदेहा कोकिलालापा लिङ्गमध्ये लयं गता

apsarāścandrabhāmākhyā nṛtyantī nijabhāvataḥ sadehā kokilālāpā liṅgamadhye layaṁ gatā

चन्द्रभा नाम की एक अप्सरा, जो अपने भाव से कोयल-जैसी मधुर वाणी में नृत्य करती थी, उसने सशरीर ही इस लिंग में लीन होकर [मुक्ति पाई]।

श्लोक 85 (shiva.uma.44.85)

श्रीकरो गोपिकासूनुः सेवित्वा मध्यमेश्वरम् । गाणपत्यं समालेभे शिवस्य करुणात्मनः

śrīkaro gopikāsūnuḥ sevitvā madhyameśvaram gāṇapatyaṁ samālebhe śivasya karuṇātmanaḥ

गोपिका का पुत्र श्रीकर, मध्यमेश्वर की सेवा करके करुणामय शिव के गणपत्य पद (गणों के अधिपति-पद) को प्राप्त हुआ।

श्लोक 86 (shiva.uma.44.86)

भार्गवो गीष्पतिश्चोभौ देवौ दैत्यसुरार्चितौ । विद्यापारङ्गतौ जातौ प्रसादान्मध्यमेशितुः

bhārgavo gīṣpatiścobhau devau daityasurārcitau vidyāpāraṅgatau jātau prasādānmadhyameśituḥ

भार्गव (शुक्राचार्य) और बृहस्पति, दोनों देव और दैत्यों द्वारा पूजित, मध्यमेश्वर की कृपा से ही विद्या में पारंगत हुए।

श्लोक 87 (shiva.uma.44.87)

अहमप्यत्र सम्पूज्य मध्यमेश्वरमीश्वरम् । पुराणकर्तृताशक्तिं प्राप्स्यामि तरसा ध्रुवम्

ahamapyatra sampūjya madhyameśvaramīśvaram purāṇakartṛtāśaktiṁ prāpsyāmi tarasā dhruvam

मैं भी यहाँ भगवान् मध्यमेश्वर की पूजा करके शीघ्र ही निश्चयपूर्वक पुराण-रचना की सामर्थ्य प्राप्त करूँगा।"

श्लोक 88 (shiva.uma.44.88)

इति कृत्वा मतिं धीरो व्यासः सत्यवतीसुतः । भागीरथ्यम्भसि स्नात्वा जग्राह नियमं व्रती

iti kṛtvā matiṁ dhīro vyāsaḥ satyavatīsutaḥ bhāgīrathyambhasi snātvā jagrāha niyamaṁ vratī

ऐसा निश्चय करके धीर व्यास, सत्यवती के पुत्र, ने भागीरथी (गंगा) के जल में स्नान करके व्रत का नियम ग्रहण किया।

श्लोक 89 (shiva.uma.44.89)

क्वचित्पर्णाशनो भूत्त्वा फलशाकाशनः क्वचित् । वातभुग्जलभुक् क्वापि क्वचिन्निरशनव्रती

kvacitparṇāśano bhūttvā phalaśākāśanaḥ kvacit vātabhugjalabhuk kvāpi kvacinniraśanavratī

कभी वे केवल पत्ते खाकर रहते, कभी फल और शाक खाकर, कभी वायु का सेवन करते, कभी केवल जल पीते, और कभी भोजन का पूर्ण त्याग करके व्रत रखते।

श्लोक 90 (shiva.uma.44.90)

इत्यादिनियमैर्योगी त्रिकालं मध्यमेश्वरम् । पूजयामास धर्मात्मा नानावृक्षोद्भवैः फलैः

ityādiniyamairyogī trikālaṁ madhyameśvaram pūjayāmāsa dharmātmā nānāvṛkṣodbhavaiḥ phalaiḥ

इन्हीं आदि नियमों के साथ वह धर्मात्मा योगी नित्य त्रिकाल-सन्ध्या में मध्यमेश्वर की पूजा नाना वृक्षों के फलों से करता रहा।

श्लोक 91 (shiva.uma.44.91)

इत्थं बहुतिथे काले व्यतीते कालिकासुतः । स्नात्वा त्रिपथगातोये यावदायाति स प्रगे

itthaṁ bahutithe kāle vyatīte kālikāsutaḥ snātvā tripathagātoye yāvadāyāti sa prage

इस प्रकार बहुत समय बीत जाने पर, वह कालिका-पुत्र (सत्यवती-पुत्र व्यास) त्रिपथगा (गंगा) के जल में स्नान करके जब भी प्रातः [पूजा के लिए] आता था,

श्लोक 92 (shiva.uma.44.92)

मध्यमेश्वरमीशानं भक्ताभीष्टवरप्रदम् । तावद्ददर्श पुण्यात्मा मध्ये लिङ्गं महेश्वरम्

madhyameśvaramīśānaṁ bhaktābhīṣṭavarapradam tāvaddadarśa puṇyātmā madhye liṅgaṁ maheśvaram

भक्तों की अभीष्ट-वर देने वाले मध्यमेश्वर के, उस पुण्यात्मा ने उस दिन मध्य में उस महेश्वर-लिंग को [एक विशेष रूप में] देखा।

श्लोक 93 (shiva.uma.44.93)

उमाभूषितवामाङ्गं व्याघ्रचर्मोत्तरीयकम् । जटाजूटचलद्गङ्गातरङ्गैश्चारुविग्रहम्

umābhūṣitavāmāṅgaṁ vyāghracarmottarīyakam jaṭājūṭacaladgaṅgātaraṅgaiścāruvigraham

उमा से सुशोभित बायाँ अंग, व्याघ्रचर्म का उत्तरीय धारण किए, जटाजूट में हिलती हुई गंगा-तरंगों से सुन्दर विग्रह वाले,

श्लोक 94 (shiva.uma.44.94)

लसच्छारदबालेन्दुचन्द्रिकाचन्द्रितालकम् । भस्मोद्धूलितसर्वाङ्गं कर्पूरार्जुनविग्रहम्

lasacchāradabālenducandrikācandritālakam bhasmoddhūlitasarvāṅgaṁ karpūrārjunavigraham

शरद्-ऋतु के बाल-चन्द्रमा की चाँदनी से चमकते हुए केशों वाले, समस्त अंगों पर भस्म लगाए, कपूर के समान श्वेत विग्रह वाले,

श्लोक 95 (shiva.uma.44.95)

कर्णान्तायतनेत्रं च विद्रुमारुणदच्छदम् । पञ्चवर्षाकृतिं बालं बालकोचितभूषणम्

karṇāntāyatanetraṁ ca vidrumāruṇadacchadam pañcavarṣākṛtiṁ bālaṁ bālakocitabhūṣaṇam

कानों तक फैली हुई आँखों वाले, मूँगे के समान लाल ओठों वाले, पाँच वर्ष के बालक की आकृति वाले, बालक-योग्य आभूषण धारण किए हुए,

श्लोक 96 (shiva.uma.44.96)

दधानं कोटिकन्दर्पदर्पहानिं तनुद्युतिम् । नग्रं प्रहसितास्याब्जं गायन्तं साम लीलया

dadhānaṁ koṭikandarpadarpahāniṁ tanudyutim nagraṁ prahasitāsyābjaṁ gāyantaṁ sāma līlayā

करोड़ों कामदेवों के गर्व को नष्ट करने वाली सुकुमार कान्ति धारण किए, नग्न, हँसते हुए कमल-मुख वाले, लीलापूर्वक साम-गान गाते हुए,

श्लोक 97 (shiva.uma.44.97)

करुणापारपाथोधिं भक्तवत्सलनामकम् । आशुतोषमुमाकान्तं प्रसादसुमुखं हरम्

karuṇāpārapāthodhiṁ bhaktavatsalanāmakam āśutoṣamumākāntaṁ prasādasumukhaṁ haram

करुणा के अपार सागर, 'भक्तवत्सल' नामधारी, शीघ्र प्रसन्न होने वाले, उमा के प्रियतम, प्रसन्न मुखमुद्रा वाले हर [महादेव] को —

श्लोक 98 (shiva.uma.44.98)

समालोक्य स्तुतिं चक्रे प्रेमगद्गदया गिरा । योगिनामप्यगम्यं तं दीनबन्धुं चिदात्मकम्

samālokya stutiṁ cakre premagadgadayā girā yogināmapyagamyaṁ taṁ dīnabandhuṁ cidātmakam

उन्हें देखकर उन्होंने प्रेम से गद्गद वाणी में स्तुति की — योगियों के लिए भी अगम्य, दीनबन्धु, चैतन्यस्वरूप उस [महादेव] की —

श्लोक 99 (shiva.uma.44.99)

वेदव्यास उवाच । देवदेव महाभाग शरणागतवत्सल । वाङ्मनःकर्मदुष्प्राप योगिनामप्यगोचर

vedavyāsa uvāca devadeva mahābhāga śaraṇāgatavatsala vāṅmanaḥkarmaduṣprāpa yogināmapyagocara

वेदव्यास ने कहा — हे देवाधिदेव! हे महाभाग! हे शरणागत-वत्सल! वाणी, मन और कर्म से अप्राप्य, योगियों के लिए भी अगोचर [प्रभु]!

श्लोक 100 (shiva.uma.44.100)

महिमानं न ते वेदा विदामासुरुमापते । त्वमेव जगतः कर्ता धर्ता हर्ता तथैव च

mahimānaṁ na te vedā vidāmāsurumāpate tvameva jagataḥ kartā dhartā hartā tathaiva ca

हे उमापते! वेद भी आपकी महिमा को नहीं जानते; आप ही जगत् के कर्ता, धर्ता और संहारक भी हैं।

श्लोक 101 (shiva.uma.44.101)

त्वमाद्यः सर्वदेवानां सच्चिदानन्द ईश्वरः । नामगोत्रे न वा ते स्तः सर्वज्ञोऽसि सदाशिव

tvamādyaḥ sarvadevānāṁ saccidānanda īśvaraḥ nāmagotre na vā te staḥ sarvajño'si sadāśiva

आप ही समस्त देवों के आदि हैं, सच्चिदानन्द-स्वरूप ईश्वर हैं; आपका न नाम है, न गोत्र — आप सर्वज्ञ हैं, हे सदाशिव!

श्लोक 102 (shiva.uma.44.102)

त्वमेव परमं ब्रह्म मायापाशनिवर्तकः । गुणत्रयैर्न लिप्तस्त्वं पद्मपत्रमिवाम्भसा

tvameva paramaṁ brahma māyāpāśanivartakaḥ guṇatrayairna liptastvaṁ padmapatramivāmbhasā

आप ही परब्रह्म हैं, माया के पाश से मुक्त करने वाले हैं; आप त्रिगुणों से वैसे ही अलिप्त हैं जैसे जल से कमल-पत्र।

श्लोक 103 (shiva.uma.44.103)

न ते जन्म न वा शीलं न देशो न कुलं च ते । इत्थम्भूतोऽपीश्वरस्त्वं त्रिलोक्याः काममावहेः

na te janma na vā śīlaṁ na deśo na kulaṁ ca te itthambhūto'pīśvarastvaṁ trilokyāḥ kāmamāvaheḥ

न आपका जन्म है, न स्वभाव, न देश, न कुल; ऐसे होते हुए भी आप ईश्वर हैं, तीनों लोकों की समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाले।

श्लोक 104 (shiva.uma.44.104)

न ब्रह्मा न च लक्ष्मीशो न च सेन्द्रा दिवौकसः । न योगीन्द्रा विदुस्तत्त्वं यस्य तं त्वामुपास्महे

na brahmā na ca lakṣmīśo na ca sendrā divaukasaḥ na yogīndrā vidustattvaṁ yasya taṁ tvāmupāsmahe

न ब्रह्मा, न लक्ष्मीपति विष्णु, न इन्द्र सहित देवगण, न योगीन्द्र भी आपके तत्त्व को जानते हैं; उन्हीं आपकी हम उपासना करते हैं।

श्लोक 105 (shiva.uma.44.105)

त्वत्तः सर्वं त्वं हि सर्वं गौरीशस्त्वं पुरान्तकः । त्वं बालस्त्वं युवा वृद्धस्तं त्वां हृदि युनज्म्यहम्

tvattaḥ sarvaṁ tvaṁ hi sarvaṁ gaurīśastvaṁ purāntakaḥ tvaṁ bālastvaṁ yuvā vṛddhastaṁ tvāṁ hṛdi yunajmyaham

आपसे ही सब कुछ है, आप ही सब कुछ हैं; आप गौरी के स्वामी हैं, त्रिपुर के अन्तक हैं; आप ही बालक हैं, आप ही युवा हैं, आप ही वृद्ध हैं — उन्हीं आपको मैं अपने हृदय में धारण करता हूँ।

श्लोक 106 (shiva.uma.44.106)

नमस्तस्मै महेशाय भक्तध्येयाय शम्भवे । पुराणपुरुषायाद्धा शङ्कराय परात्मने

namastasmai maheśāya bhaktadhyeyāya śambhave purāṇapuruṣāyāddhā śaṅkarāya parātmane

उन महेश को नमस्कार है, जो भक्तों के ध्यान के विषय हैं, शम्भु को, पुराण-पुरुष को, वस्तुतः शंकर को, परमात्मा को नमस्कार है।

श्लोक 107 (shiva.uma.44.107)

इति स्तुत्वा क्षितौ यावद्दण्डवन्निपपात सः । तावत्स बालो हृष्टात्मा वेदव्यासमभाषत

iti stutvā kṣitau yāvaddaṇḍavannipapāta saḥ tāvatsa bālo hṛṣṭātmā vedavyāsamabhāṣata

इस प्रकार स्तुति करके जैसे ही वे पृथ्वी पर दण्डवत् प्रणाम करने को हुए, उसी क्षण वह हर्षित बालक वेदव्यास से बोला —

श्लोक 108 (shiva.uma.44.108)

वरं वृणीष्व भो योगिन्यस्ते मनसि वर्तते । नादेयं विद्यते किञ्चिद्भक्ताधीनो यतोऽस्म्यहम्

varaṁ vṛṇīṣva bho yoginyaste manasi vartate nādeyaṁ vidyate kiñcidbhaktādhīno yato'smyaham

"हे योगिन्! वर माँगो, जो कुछ भी तुम्हारे मन में हो; ऐसा कुछ भी नहीं जो न देने योग्य हो, क्योंकि मैं भक्तों के अधीन हूँ।"

श्लोक 109 (shiva.uma.44.109)

तत उत्थाय हृष्टात्मा मुनिर्व्यासो महातपाः । प्रत्यब्रवीत्किमज्ञातं सर्वज्ञस्य तव प्रभो

tata utthāya hṛṣṭātmā munirvyāso mahātapāḥ pratyabravītkimajñātaṁ sarvajñasya tava prabho

तब हर्षित मन वाले, महातपस्वी मुनि व्यास ने उठकर उत्तर दिया — "हे प्रभो! आप सर्वज्ञ के लिए क्या अज्ञात है?

श्लोक 110 (shiva.uma.44.110)

सर्वान्तरात्मा भगवान् शर्वः सर्वप्रदो भवान् । याञ्चां प्रतिनियुङ्क्ते मां किमीशो दैन्यकारिणीम्

sarvāntarātmā bhagavān śarvaḥ sarvaprado bhavān yāñcāṁ pratiniyuṅkte māṁ kimīśo dainyakāriṇīm

आप सबके अन्तरात्मा, भगवान् शर्व, सर्वप्रदाता हैं; फिर क्यों आप मुझे इस दीनतापूर्ण याचना में लगाते हैं, हे ईश?"

श्लोक 111 (shiva.uma.44.111)

इति श्रुत्वा वचस्तस्य व्यासस्यामलचेतसः । शुचि स्मित्वा महादेवो बालरूपधरोऽब्रवीत्

iti śrutvā vacastasya vyāsasyāmalacetasaḥ śuci smitvā mahādevo bālarūpadharo'bravīt

व्यास के इस निर्मल-हृदय वचन को सुनकर वे बालक-रूपधारी महादेव पवित्र मुस्कान के साथ बोले —

श्लोक 112 (shiva.uma.44.112)

बाल उवाच । त्वया ब्रह्मविदां श्रेष्ठ योऽभिलाषः कृतो हृदि । अचिरेणैव कालेन स भविष्यत्यसंशयः

bāla uvāca tvayā brahmavidāṁ śreṣṭha yo'bhilāṣaḥ kṛto hṛdi acireṇaiva kālena sa bhaviṣyatyasaṁśayaḥ

बालक ने कहा — "हे ब्रह्मज्ञानियों में श्रेष्ठ! तुमने हृदय में जो अभिलाषा की है, वह शीघ्र ही, बिना सन्देह के, पूर्ण होगी।

श्लोक 113 (shiva.uma.44.113)

कण्ठे स्थित्वा तव ब्रह्मन्नन्तर्याम्यहमीश्वरः । सेतिहासपुराणानि सम्यङ्निर्मापयाम्यहम्

kaṇṭhe sthitvā tava brahmannantaryāmyahamīśvaraḥ setihāsapurāṇāni samyaṅnirmāpayāmyaham

हे ब्रह्मन्! मैं ईश्वर तुम्हारे कण्ठ में स्थित होकर अन्तर्यामी रूप से रहूँगा, और इतिहास सहित पुराणों की भलीभाँति रचना करूँगा।

श्लोक 114 (shiva.uma.44.114)

अभिलाषाष्टकं पुण्यं स्तोत्रमेतत्त्वयेरितम् । वर्षं त्रिकालं पठनात्कामदं शम्भुसद्मनि

abhilāṣāṣṭakaṁ puṇyaṁ stotrametattvayeritam varṣaṁ trikālaṁ paṭhanātkāmadaṁ śambhusadmani

यह जो तुमने पुण्यमय 'अभिलाषाष्टक' स्तोत्र कहा है, इसका वर्ष-भर त्रिकाल पाठ करने से शम्भु के धाम में समस्त कामनाएँ पूर्ण होती हैं।

श्लोक 115 (shiva.uma.44.115)

एतत्स्तोत्रस्य पठनं विद्याबुद्धिविवर्धनम् । सर्वसम्पत्करं प्रोक्तं धर्मदं मोक्षदं नृणाम्

etatstotrasya paṭhanaṁ vidyābuddhivivardhanam sarvasampatkaraṁ proktaṁ dharmadaṁ mokṣadaṁ nṛṇām

इस स्तोत्र का पाठ विद्या और बुद्धि की वृद्धि करने वाला कहा गया है, मनुष्यों के लिए सर्व-सम्पत्ति-प्रदायक, धर्म-दायक और मोक्ष-दायक भी है।

श्लोक 116 (shiva.uma.44.116)

प्रातरुत्थाय सुस्नातो लिङ्गमभ्यर्च्य शाङ्करम् । वर्षं पठन्निदं स्तोत्रं मूर्खोऽपि स्याद् बृहस्पतिः

prātarutthāya susnāto liṅgamabhyarcya śāṅkaram varṣaṁ paṭhannidaṁ stotraṁ mūrkho'pi syād bṛhaspatiḥ

प्रातःकाल उठकर भलीभाँति स्नान करके शांकर-लिंग की पूजा करके, जो एक वर्ष तक इस स्तोत्र का पाठ करता है, वह मूर्ख भी बृहस्पति के समान बुद्धिमान् हो जाता है।

श्लोक 117 (shiva.uma.44.117)

स्त्रिया वा पुरुषेणापि नियमाल्लिङ्गसन्निधौ । वर्षं जप्तमिदं स्तोत्रं बुद्धिं विद्यां च वर्धयेत्

striyā vā puruṣeṇāpi niyamālliṅgasannidhau varṣaṁ japtamidaṁ stotraṁ buddhiṁ vidyāṁ ca vardhayet

स्त्री हो या पुरुष, नियमपूर्वक लिंग के समीप इस स्तोत्र का एक वर्ष तक जप करने से बुद्धि और विद्या की वृद्धि होती है।

श्लोक 118 (shiva.uma.44.118)

इत्युक्त्वा स महादेवो बालो लिङ्गे न्यलीयत । व्यासोऽपि मुञ्चन्नश्रूणि शिवप्रेमाकुलोऽभवत्

ityuktvā sa mahādevo bālo liṅge nyalīyata vyāso'pi muñcannaśrūṇi śivapremākulo'bhavat

ऐसा कहकर वह बालक-रूपधारी महादेव उसी लिंग में लीन हो गए; व्यास भी अश्रु बहाते हुए शिव-प्रेम से व्याकुल हो गए।

श्लोक 119 (shiva.uma.44.119)

एवं लब्धवरो व्यासो महेशान्मध्यमेश्वरात् । अष्टादश पुराणानि प्रणिनाय स्वलीलया

evaṁ labdhavaro vyāso maheśānmadhyameśvarāt aṣṭādaśa purāṇāni praṇināya svalīlayā

इस प्रकार महादेव मध्यमेश्वर से वर प्राप्त कर व्यास ने अपनी लीला से अठारह पुराणों की रचना की —

श्लोक 120 (shiva.uma.44.120)

ब्राह्मं पाद्मं वैष्णवं च शैवं भागवतं तथा । भविष्यं नारदीयं च मार्कण्डेयमतः परम्

brāhmaṁ pādmaṁ vaiṣṇavaṁ ca śaivaṁ bhāgavataṁ tathā bhaviṣyaṁ nāradīyaṁ ca mārkaṇḍeyamataḥ param

ब्राह्म, पाद्म, वैष्णव, शैव और भागवत; भविष्य, नारदीय और उसके पश्चात् मार्कण्डेय;

श्लोक 121 (shiva.uma.44.121)

आग्नेयं ब्रह्मवैवर्तं लैङ्गं वाराहमेव च । वामनाख्यं ततः कौर्मं मात्स्यं गारुडमेव च

āgneyaṁ brahmavaivartaṁ laiṅgaṁ vārāhameva ca vāmanākhyaṁ tataḥ kaurmaṁ mātsyaṁ gāruḍameva ca

आग्नेय, ब्रह्मवैवर्त, लैंग और वाराह भी; वामन नामक, फिर कौर्म, मात्स्य और गारुड भी —

श्लोक 122 (shiva.uma.44.122)

स्कान्दं तथैव ब्रह्माण्डाख्यं पुराणं च कीर्तितम् । यशस्यं पुण्यदं नॄणां श्रोतॄणां शाङ्करं यशः

skāndaṁ tathaiva brahmāṇḍākhyaṁ purāṇaṁ ca kīrtitam yaśasyaṁ puṇyadaṁ nṝṇāṁ śrotṝṇāṁ śāṅkaraṁ yaśaḥ

और इसी प्रकार स्कान्द तथा ब्रह्माण्ड नामक पुराण भी वर्णित हैं — ये सब मनुष्यों के लिए यशस्कर, पुण्यदायक, और सुनने वालों के लिए शांकर-यश हैं।

श्लोक 123 (shiva.uma.44.123)

सूत उवाच । अष्टादशपुराणानां पूर्वं नामोदितं त्वया । कुरु निर्वचनं तेषामिदानीं वेदवित्तम

sūta uvāca aṣṭādaśapurāṇānāṁ pūrvaṁ nāmoditaṁ tvayā kuru nirvacanaṁ teṣāmidānīṁ vedavittama

सूत ने कहा — आपने पहले अठारह पुराणों के नाम बताए; अब, हे वेद के मर्मज्ञ! इनका निर्वचन (व्युत्पत्ति) भी बताइए।

श्लोक 124 (shiva.uma.44.124)

व्यास उवाच । अयमेव कृतः प्रश्नस्तण्डिना ब्रह्मयोनिना । नन्दिकेश्वरमुद्दिश्य स यदाह ब्रवीमि तत्

vyāsa uvāca ayameva kṛtaḥ praśnastaṇḍinā brahmayoninā nandikeśvaramuddiśya sa yadāha bravīmi tat

व्यास ने कहा — यही प्रश्न ब्रह्मयोनि तण्डि ने भी नन्दिकेश्वर से पूछा था; उन्होंने जो उत्तर दिया, वही मैं तुम्हें बता रहा हूँ।

श्लोक 125 (shiva.uma.44.125)

नन्दिकेश्वर उवाच । यत्र वक्ता स्वयं तण्डिन् ब्रह्मा साक्षाच्चतुर्मुखः । तस्माद् ब्राह्मं समाख्यातं पुराणं प्रथमं मुने

nandikeśvara uvāca yatra vaktā svayaṁ taṇḍin brahmā sākṣāccaturmukhaḥ tasmād brāhmaṁ samākhyātaṁ purāṇaṁ prathamaṁ mune

नन्दिकेश्वर ने कहा — हे तण्डि! जिस पुराण में स्वयं साक्षात् चतुर्मुख ब्रह्मा ही वक्ता हैं, हे मुने! उसी कारण वह 'ब्राह्म' नामक प्रथम पुराण कहा गया है।

श्लोक 126 (shiva.uma.44.126)

पद्मकल्पस्य माहात्म्यं तत्र यस्यामुदाहृतम् । तस्मात्पाद्मं समाख्यातं पुराणं च द्वितीयकम्

padmakalpasya māhātmyaṁ tatra yasyāmudāhṛtam tasmātpādmaṁ samākhyātaṁ purāṇaṁ ca dvitīyakam

जिसमें पद्म-कल्प की महिमा वर्णित है, उसी कारण वह द्वितीय पुराण 'पाद्म' नाम से कहा गया है।

श्लोक 127 (shiva.uma.44.127)

पराशरकृतं यत्तु पुराणं विष्णुबोधकम् । तदेव व्यासकथितं पुत्रपित्रोरभेदतः

parāśarakṛtaṁ yattu purāṇaṁ viṣṇubodhakam tadeva vyāsakathitaṁ putrapitrorabhedataḥ

जो पुराण पराशर द्वारा रचित है और विष्णु का बोध कराने वाला है, वही व्यास द्वारा कहा गया माना जाता है, क्योंकि पिता और पुत्र में कोई भेद नहीं है।

श्लोक 128 (shiva.uma.44.128)

यत्र पूर्वोत्तरे खण्डे शिवस्य चरितं बहु । शैवमेतत्पुराणं हि पुराणज्ञा वदन्ति च

yatra pūrvottare khaṇḍe śivasya caritaṁ bahu śaivametatpurāṇaṁ hi purāṇajñā vadanti ca

जिसमें पूर्व और उत्तर खण्ड में शिव का विपुल चरित वर्णित है, उसे पुराण के ज्ञाता 'शैव' पुराण कहते हैं।

श्लोक 129 (shiva.uma.44.129)

भगवत्याश्च दुर्गायाश्चरितं यत्र विद्यते । तत्तु भागवतं प्रोक्तं ननु देवीपुराणकम्

bhagavatyāśca durgāyāścaritaṁ yatra vidyate tattu bhāgavataṁ proktaṁ nanu devīpurāṇakam

जहाँ भगवती दुर्गा का चरित्र वर्णित है, वही वास्तव में 'देवी-पुराण' कहा जाता है, जो 'भागवत' नाम से भी प्रोक्त है।

श्लोक 130 (shiva.uma.44.130)

नारदोक्तं पुराणं तु नारदीयं प्रचक्षते । यत्र वक्ताभवत्तण्डिन् मार्कण्डेयो महामुनिः

nāradoktaṁ purāṇaṁ tu nāradīyaṁ pracakṣate yatra vaktābhavattaṇḍin mārkaṇḍeyo mahāmuniḥ

नारद द्वारा कहा गया पुराण 'नारदीय' कहलाता है; और वह पुराण जिसमें हे तण्डि, महामुनि मार्कण्डेय ही वक्ता हुए,

श्लोक 131 (shiva.uma.44.131)

मार्कण्डेयपुराणं हि तदाख्यातं च सप्तमम् । अग्नियोगात्तदाग्नेयं भविष्योक्तेर्भविष्यकम्

mārkaṇḍeyapurāṇaṁ hi tadākhyātaṁ ca saptamam agniyogāttadāgneyaṁ bhaviṣyokterbhaviṣyakam

वह 'मार्कण्डेय' पुराण कहा गया, जो सातवाँ है। अग्नि द्वारा उपदिष्ट होने से 'आग्नेय', और भविष्य के कथनों के कारण 'भविष्य' पुराण [कहा गया]।

श्लोक 132 (shiva.uma.44.132)

विवर्तनाद् ब्रह्मणस्तु ब्रह्मवैवर्तमुच्यते । लिङ्गस्य चरितोक्तत्वात्पुराणं लिङ्गमुच्यते

vivartanād brahmaṇastu brahmavaivartamucyate liṅgasya caritoktatvātpurāṇaṁ liṅgamucyate

ब्रह्मा के विवर्तन (आविर्भाव) के कारण 'ब्रह्मवैवर्त' कहा जाता है; लिंग का चरित्र वर्णित होने से पुराण को 'लिंग' [पुराण] कहा जाता है।

श्लोक 133 (shiva.uma.44.133)

वराहस्य च वाराहं पुराणं द्वादशं मुने । यत्र स्कन्दः स्वयं श्रोता वक्ता साक्षान्महेश्वरः

varāhasya ca vārāhaṁ purāṇaṁ dvādaśaṁ mune yatra skandaḥ svayaṁ śrotā vaktā sākṣānmaheśvaraḥ

हे मुने! वराह [के चरित] का वर्णन होने से वह द्वादश पुराण 'वाराह' कहलाता है; जिसमें स्वयं स्कन्द श्रोता हों और साक्षात् महेश्वर वक्ता हों,

श्लोक 134 (shiva.uma.44.134)

तत्तु स्कान्दं समाख्यातं वामनस्य तु वामनम् । कौर्मं कूर्मस्य चरितं मात्स्यं मत्स्येन कीर्तितम्

tattu skāndaṁ samākhyātaṁ vāmanasya tu vāmanam kaurmaṁ kūrmasya caritaṁ mātsyaṁ matsyena kīrtitam

वही 'स्कान्द' पुराण कहा गया है; वामन [के चरित] का 'वामन', कूर्म के चरित का 'कौर्म', मत्स्य द्वारा कहा गया 'मात्स्य' [पुराण कहलाता है]।

श्लोक 135 (shiva.uma.44.135)

गरुडस्तु स्वयं वक्ता यत्तद् गारुडसंज्ञकम् । ब्रह्माण्डचरितोक्तत्वाद् ब्रह्माण्डं परिकीर्तितम्

garuḍastu svayaṁ vaktā yattad gāruḍasaṁjñakam brahmāṇḍacaritoktatvād brahmāṇḍaṁ parikīrtitam

गरुड स्वयं जिसके वक्ता हैं, वह 'गारुड' नामक पुराण कहलाता है; और ब्रह्माण्ड का चरित वर्णित होने से वह पुराण 'ब्रह्माण्ड' नाम से कीर्तित है।

श्लोक 136 (shiva.uma.44.136)

सूत उवाच । अयमेव मयाऽकारि प्रश्नो व्यासाय धीमते । ततः सर्वपुराणानां मया निर्वचनं श्रुतम्

sūta uvāca ayameva mayā'kāri praśno vyāsāya dhīmate tataḥ sarvapurāṇānāṁ mayā nirvacanaṁ śrutam

सूत ने कहा — यही प्रश्न मैंने भी बुद्धिमान् व्यास से पूछा था; तब मैंने ही उनसे समस्त पुराणों का यह निर्वचन सुना था।

श्लोक 137 (shiva.uma.44.137)

एवं व्यासः समुत्पन्नः सत्यवत्यां पराशरात् । पुराणसंहिताश्चक्रे महाभारतमुत्तमम्

evaṁ vyāsaḥ samutpannaḥ satyavatyāṁ parāśarāt purāṇasaṁhitāścakre mahābhāratamuttamam

इस प्रकार व्यास पराशर से सत्यवती में उत्पन्न हुए; उन्होंने ही पुराण-संहिताओं की और उत्तम महाभारत की रचना की।

श्लोक 138 (shiva.uma.44.138)

पराशरेण संयोगः पुनः शन्तनुना यथा । सत्यवत्या इव ब्रह्मन्नः संशयितुमर्हसि

parāśareṇa saṁyogaḥ punaḥ śantanunā yathā satyavatyā iva brahmannaḥ saṁśayitumarhasi

पराशर से जो यह संयोग हुआ, और शन्तनु के साथ भी सत्यवती का जो संयोग हुआ, हे ब्रह्मन्! उसमें तुम्हें सन्देह नहीं करना चाहिए।

श्लोक 139 (shiva.uma.44.139)

सकारणेयमुत्पत्तिः कथिताश्चर्यकारिणी । महतां चरिते चैव गुणा ग्राह्या विचक्षणैः

sakāraṇeyamutpattiḥ kathitāścaryakāriṇī mahatāṁ carite caiva guṇā grāhyā vicakṣaṇaiḥ

यह जो सकारण, आश्चर्यकारी उत्पत्ति कही गई है, वह महापुरुषों के चरित्र में विद्वानों द्वारा ग्राह्य गुणों के रूप में ही समझी जानी चाहिए।

श्लोक 140 (shiva.uma.44.140)

इदं रहस्यं परमं यः शृणोति पठत्यपि । स सर्वपापनिर्मुक्त ऋषिलोके महीयते

idaṁ rahasyaṁ paramaṁ yaḥ śṛṇoti paṭhatyapi sa sarvapāpanirmukta ṛṣiloke mahīyate

जो इस परम रहस्य को सुनता है अथवा पढ़ता भी है, वह समस्त पापों से मुक्त होकर ऋषिलोक में महिमामण्डित होता है।

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