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उमा संहिता · अध्याय 45

महाकालिकावतार

अध्याय 44अध्याय-सूचीअध्याय 46

श्लोक 1 (shiva.uma.45.1)

मुनय ऊचुः । श्रुता शम्भोः कथा रम्या नानाख्यानसमन्विता । नानावतारसंयुक्ता भुक्तिमुक्तिप्रदा नृणाम्

munaya ūcuḥ śrutā śambhoḥ kathā ramyā nānākhyānasamanvitā nānāvatārasaṁyuktā bhuktimuktipradā nṛṇām

मुनियों ने कहा — हमने शम्भु की रमणीय कथा सुनी, जो नाना आख्यानों से युक्त है, नाना अवतारों से सम्पन्न है, और मनुष्यों को भोग तथा मोक्ष प्रदान करने वाली है।

श्लोक 2 (shiva.uma.45.2)

इदानीं श्रोतुमिच्छामस्त्वत्तो ब्रह्मविदांवर । चरित्रं जगदम्बाया भगवत्या मनोहरम्

idānīṁ śrotumicchāmastvatto brahmavidāṁvara caritraṁ jagadambāyā bhagavatyā manoharam

अब हे ब्रह्मज्ञानियों में श्रेष्ठ! हम आपसे जगत्-जननी भगवती के मनोहर चरित्र को सुनना चाहते हैं।

श्लोक 3 (shiva.uma.45.3)

परब्रह्ममहेशस्य शक्तिराद्या सनातनी । उमा या समभिख्याता त्रैलोक्यजननी परा

parabrahmamaheśasya śaktirādyā sanātanī umā yā samabhikhyātā trailokyajananī parā

परब्रह्म महेश्वर की जो आदि, सनातन शक्ति है, जो 'उमा' नाम से विख्यात है, जो तीनों लोकों की परम जननी है —

श्लोक 4 (shiva.uma.45.4)

सती हैमवती तस्या अवतारद्वयं श्रुतम् । अपरानवतारांस्त्वं ब्रूहि सूत महामते

satī haimavatī tasyā avatāradvayaṁ śrutam aparānavatārāṁstvaṁ brūhi sūta mahāmate

उसके सती और हैमवती नामक दो अवतार हमने सुने हैं; हे महामते सूत! अब कृपया उसके अन्य अवतारों का वर्णन कीजिए।

श्लोक 5 (shiva.uma.45.5)

को विरज्येत मतिमान् गुणश्रवणकर्मणि । श्रीमातुर्ज्ञानिनो यानि न त्यजन्ति कदाचन

ko virajyeta matimān guṇaśravaṇakarmaṇi śrīmāturjñānino yāni na tyajanti kadācana

श्रीमाता के जो गुण और कर्म कभी भी ज्ञानी पुरुषों द्वारा नहीं त्यागे जाते, उनके श्रवण से कौन बुद्धिमान् विरत हो सकता है?

श्लोक 6 (shiva.uma.45.6)

सूत उवाच । धन्या यूयं महात्मानः कृतकृत्याः स्थ सर्वदा । यत्पृच्छथ पराम्बाया उमायाश्चरितं महत्

sūta uvāca dhanyā yūyaṁ mahātmānaḥ kṛtakṛtyāḥ stha sarvadā yatpṛcchatha parāmbāyā umāyāścaritaṁ mahat

सूत ने कहा — तुम धन्य हो, हे महात्माओ! तुम सर्वदा कृतकृत्य हो, जो परमाम्बा उमा के इस महान् चरित्र के विषय में पूछते हो।

श्लोक 7 (shiva.uma.45.7)

शृण्वतां पृच्छतां चैव तथा वाचयतां च तत् । पादाम्बुजरजांस्येव तीर्थानि मुनयो विदुः

śṛṇvatāṁ pṛcchatāṁ caiva tathā vācayatāṁ ca tat pādāmbujarajāṁsyeva tīrthāni munayo viduḥ

उसे सुनने वाले, पूछने वाले और पढ़ने वाले लोगों के लिए वह [कथा] उन्हीं के चरण-कमलों की धूलि के समान तीर्थ है, ऐसा मुनि जानते हैं।

श्लोक 8 (shiva.uma.45.8)

ते धन्या कृतकृत्याः स्युर्धन्या तेषां प्रसूः कुलम् । येषां चित्तं भवेल्लीनं श्रीदेव्यां परसंविदि

te dhanyā kṛtakṛtyāḥ syurdhanyā teṣāṁ prasūḥ kulam yeṣāṁ cittaṁ bhavellīnaṁ śrīdevyāṁ parasaṁvidi

जिनका चित्त श्रीदेवी के परम चैतन्य में लीन हो जाता है, वे ही धन्य हैं, कृतकृत्य हैं, और धन्य है उनकी वंश-परम्परा।

श्लोक 9 (shiva.uma.45.9)

ये न स्तुवन्ति देवेशीं सर्वकारणकारणाम् । मायागुणैर्मोहिताः स्युर्हतभाग्या न संशयः

ye na stuvanti deveśīṁ sarvakāraṇakāraṇām māyāguṇairmohitāḥ syurhatabhāgyā na saṁśayaḥ

जो समस्त कारणों की कारणरूपा देवेशी की स्तुति नहीं करते, वे माया के गुणों से मोहित, दुर्भाग्यशाली हैं, इसमें सन्देह नहीं।

श्लोक 10 (shiva.uma.45.10)

न भजन्ति महादेवीं करुणारससागराम् । अन्धकूपे पतन्त्येते घोरे संसाररूपिणि

na bhajanti mahādevīṁ karuṇārasasāgarām andhakūpe patantyete ghore saṁsārarūpiṇi

जो करुणा-रस के सागर महादेवी का भजन नहीं करते, वे इस घोर संसाररूपी अन्धकूप में गिरते हैं।

श्लोक 11 (shiva.uma.45.11)

गङ्गां विहाय तृप्त्यर्थं मरुवारि यथा व्रजेत् । विहाय देवीं तद्भिन्नं तथा देवान्तरं व्रजेत्

gaṅgāṁ vihāya tṛptyarthaṁ maruvāri yathā vrajet vihāya devīṁ tadbhinnaṁ tathā devāntaraṁ vrajet

जैसे गंगा को छोड़कर तृप्ति के लिए कोई मरुभूमि के जल की ओर जाए, वैसे ही देवी को छोड़कर उससे भिन्न किसी अन्य देवता की ओर जाना है।

श्लोक 12 (shiva.uma.45.12)

यस्याः स्मरणमात्रेण पुरुषार्थचतुष्टयम् । अनायासेन लभते कस्त्यजेत्तां नरोत्तमः

yasyāḥ smaraṇamātreṇa puruṣārthacatuṣṭayam anāyāsena labhate kastyajettāṁ narottamaḥ

जिसके स्मरण मात्र से मनुष्य बिना किसी परिश्रम के धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष — इन चारों पुरुषार्थों को प्राप्त कर लेता है, ऐसा कौन श्रेष्ठ पुरुष है जो उसे त्याग दे?

श्लोक 13 (shiva.uma.45.13)

एतत्पृष्टः पुरा मेधाः सुरथेन महात्मना । यदुक्तं मेधसा पूर्वं तच्छृणुष्व वदामि ते

etatpṛṣṭaḥ purā medhāḥ surathena mahātmanā yaduktaṁ medhasā pūrvaṁ tacchṛṇuṣva vadāmi te

यही प्रश्न पहले महात्मा सुरथ ने मेधा [मुनि] से पूछा था; मेधा ने जो पहले कहा था, वह मुझसे सुनो, मैं तुम्हें बताता हूँ।

श्लोक 14 (shiva.uma.45.14)

स्वारोचिषेऽन्तरे पूर्वं विरथो नाम पार्थिवः । सुरथस्तस्य पुत्रोऽभून्महाबलपराक्रमः

svārociṣe'ntare pūrvaṁ viratho nāma pārthivaḥ surathastasya putro'bhūnmahābalaparākramaḥ

पूर्वकाल में स्वारोचिष मन्वन्तर में विरथ नामक एक राजा था; उसका पुत्र सुरथ हुआ, जो महाबल-पराक्रमी था।

श्लोक 15 (shiva.uma.45.15)

दानशौण्डः सत्यवादी स्वधर्मकुशलः कृती । देवीभक्तो दयासिन्धुः प्रजानां परिपालकः

dānaśauṇḍaḥ satyavādī svadharmakuśalaḥ kṛtī devībhakto dayāsindhuḥ prajānāṁ paripālakaḥ

वह दानशील, सत्यवादी, अपने धर्म में कुशल, कर्तव्यपरायण, देवी-भक्त, दया का सागर और प्रजा का पालक था।

श्लोक 16 (shiva.uma.45.16)

पृथिवीं शासतस्तस्य पाकशासनतेजसः । बभूवुर्नव ये भूपाः पृथ्वीग्रहणतत्पराः

pṛthivīṁ śāsatastasya pākaśāsanatejasaḥ babhūvurnava ye bhūpāḥ pṛthvīgrahaṇatatparāḥ

इन्द्र के समान तेजस्वी उस राजा के पृथ्वी पर शासन करते समय, नौ ऐसे राजा उत्पन्न हुए जो [उसकी] भूमि हड़पने में तत्पर थे।

श्लोक 17 (shiva.uma.45.17)

कोलानाम्नीं राजधानीं रुरुधुस्तस्य भूपतेः । तैः समं तुमुलं युद्धं समपद्यत दारुणम्

kolānāmnīṁ rājadhānīṁ rurudhustasya bhūpateḥ taiḥ samaṁ tumulaṁ yuddhaṁ samapadyata dāruṇam

उन्होंने उस राजा की कोला नामक राजधानी को घेर लिया; उनके साथ उसका भयंकर, घमासान युद्ध हुआ।

श्लोक 18 (shiva.uma.45.18)

युद्धे स निर्जितो भूपः प्रबलैस्तैर्द्विषद्गणैः । उज्जासितश्च कोलाया हृत्वा राज्यमशेषतः

yuddhe sa nirjito bhūpaḥ prabalaistairdviṣadgaṇaiḥ ujjāsitaśca kolāyā hṛtvā rājyamaśeṣataḥ

युद्ध में उन बलशाली शत्रु-समूहों द्वारा वह राजा पराजित हुआ, कोला से निकाल दिया गया और उसका सम्पूर्ण राज्य छीन लिया गया।

श्लोक 19 (shiva.uma.45.19)

स राजा स्वपुरीमेत्याकरोद्राज्यं स्वमन्त्रिभिः । तत्रापि च महापक्षैर्विपक्षैः स पराजितः

sa rājā svapurīmetyākarodrājyaṁ svamantribhiḥ tatrāpi ca mahāpakṣairvipakṣaiḥ sa parājitaḥ

वह राजा अपनी नगरी में आकर अपने मन्त्रियों के साथ राज्य करने लगा; वहाँ भी वह बड़े पक्षधर विरोधी दलों से पराजित हो गया।

श्लोक 20 (shiva.uma.45.20)

दैवाच्छत्रुत्वमापन्नैरमात्यप्रमुखैर्गणैः । कोशस्थितं च यद्वित्तं तत्सर्वं चात्मसात्कृतम्

daivācchatrutvamāpannairamātyapramukhairgaṇaiḥ kośasthitaṁ ca yadvittaṁ tatsarvaṁ cātmasātkṛtam

दैवयोग से शत्रुभाव को प्राप्त हुए अपने ही मुख्य मन्त्रियों और समूहों ने उसके कोष में रखा हुआ जो भी धन था, वह सब हड़प लिया।

श्लोक 21 (shiva.uma.45.21)

ततः स निर्गतो राजा नगरान्मृगयाछलात् । असहायोऽश्वमारुह्य जगाम गहनं वनम्

tataḥ sa nirgato rājā nagarānmṛgayāchalāt asahāyo'śvamāruhya jagāma gahanaṁ vanam

तब वह राजा शिकार के बहाने नगर से निकल गया; असहाय होकर घोड़े पर सवार होकर वह घने वन में चला गया।

श्लोक 22 (shiva.uma.45.22)

इतस्ततस्तत्र गच्छन्राजा मुनिवराश्रमम् । ददर्श कुसुमारामभ्राजितं सर्वतोदिशम्

itastatastatra gacchanrājā munivarāśramam dadarśa kusumārāmabhrājitaṁ sarvatodiśam

इधर-उधर घूमते हुए उस राजा ने वहाँ एक श्रेष्ठ मुनि के आश्रम को देखा, जो चारों ओर फूलों के उद्यानों से सुशोभित था।

श्लोक 23 (shiva.uma.45.23)

वेदध्वनिसमाकीर्णं शान्तजन्तुसमाश्रितम् । शिष्यैः प्रशिष्यैस्तच्छिष्यैः समन्तात्परिवेष्टितम्

vedadhvanisamākīrṇaṁ śāntajantusamāśritam śiṣyaiḥ praśiṣyaistacchiṣyaiḥ samantātpariveṣṭitam

वह वेद-ध्वनि से व्याप्त था, शान्त प्राणियों द्वारा आश्रित था, तथा शिष्यों, प्रशिष्यों और उनके शिष्यों से चारों ओर घिरा हुआ था।

श्लोक 24 (shiva.uma.45.24)

व्याघ्रादयो महावीर्या अल्पवीर्यान्महामते । तदाश्रमे न बाधन्ते द्विजवर्यप्रभावतः

vyāghrādayo mahāvīryā alpavīryānmahāmate tadāśrame na bādhante dvijavaryaprabhāvataḥ

हे महामते! उस आश्रम में महाशक्तिशाली व्याघ्र आदि भी उस श्रेष्ठ ब्राह्मण के प्रभाव से दुर्बल प्राणियों को कभी पीड़ा नहीं पहुँचाते थे।

श्लोक 25 (shiva.uma.45.25)

उवास तत्र नृपतिर्महाकारुणिको बुधः । सत्कृतो मुनिनाथेन सुवचो भोजनासनैः

uvāsa tatra nṛpatirmahākāruṇiko budhaḥ satkṛto munināthena suvaco bhojanāsanaiḥ

वहाँ वह अत्यन्त करुणामय, बुद्धिमान् राजा रुका, और उस मुनिनाथ ने सुन्दर वचनों, भोजन और आसन से उसका सत्कार किया।

श्लोक 26 (shiva.uma.45.26)

एकदा स महाराजश्चिन्तामाप दुरत्ययाम् । अहो मे हीनभाग्यस्य दुर्बुद्धेर्हीनतेजसः

ekadā sa mahārājaścintāmāpa duratyayām aho me hīnabhāgyasya durbuddherhīnatejasaḥ

एक दिन उस महाराज को एक असह्य चिन्ता ने घेर लिया — "अहो! अभागा, दुर्बुद्धि और तेजहीन मैं,

श्लोक 27 (shiva.uma.45.27)

हृतं राज्यमशेषेण शत्रुवर्गैर्मदोद्धतैः । मत्पूर्वै रक्षितं राज्यं शत्रुभिर्भुज्यतेऽधुना

hṛtaṁ rājyamaśeṣeṇa śatruvargairmadoddhataiḥ matpūrvai rakṣitaṁ rājyaṁ śatrubhirbhujyate'dhunā

मेरा सम्पूर्ण राज्य मद से उन्मत्त शत्रु-समूहों द्वारा छीन लिया गया है; मेरे पूर्वजों द्वारा रक्षित वह राज्य अब शत्रुओं द्वारा भोगा जा रहा है।

श्लोक 28 (shiva.uma.45.28)

मादृशश्चैत्रवंशेऽस्मिन्न कोऽप्यासीन्महीपतिः । किं करोमि क्व गच्छामि कथं राज्यं लभेय हि

mādṛśaścaitravaṁśe'sminna ko'pyāsīnmahīpatiḥ kiṁ karomi kva gacchāmi kathaṁ rājyaṁ labheya hi

इस चैत्र-वंश में मेरे जैसा कोई भी राजा नहीं हुआ; अब मैं क्या करूँ, कहाँ जाऊँ, राज्य को फिर से किस प्रकार प्राप्त करूँ?

श्लोक 29 (shiva.uma.45.29)

अमात्या मन्त्रिणश्चैव मामका ये सनातनाः । न जाने कं च नृपतिं समासाद्याधुनासते

amātyā mantriṇaścaiva māmakā ye sanātanāḥ na jāne kaṁ ca nṛpatiṁ samāsādyādhunāsate

मेरे जो सनातन (कुल-परम्परागत) मन्त्री और अमात्य थे, वे अब किस राजा की शरण लेकर बैठे हैं, मुझे नहीं पता।

श्लोक 30 (shiva.uma.45.30)

विनाश्य राज्यमधुना न जाने कां गतिं गताः । रणभूमिमहोत्साहा अरिवर्गनिकर्तनाः

vināśya rājyamadhunā na jāne kāṁ gatiṁ gatāḥ raṇabhūmimahotsāhā arivarganikartanāḥ

मेरे उन युद्धभूमि में महान् उत्साह वाले, शत्रु-समूहों को काट डालने वाले वीरों की, मेरे राज्य के नष्ट होने पर, अब क्या गति हुई, यह भी मुझे ज्ञात नहीं।

श्लोक 31 (shiva.uma.45.31)

मामका ये महाशूरा नृपमन्यं भजन्ति ते । पर्वताभा गजा अश्वा वातवद्वेगगामिनः

māmakā ye mahāśūrā nṛpamanyaṁ bhajanti te parvatābhā gajā aśvā vātavadvegagāminaḥ

मेरे जो महाशूरवीर थे, वे अब किसी अन्य राजा की सेवा में लगे होंगे; और पर्वत के समान विशाल मेरे हाथी और वायु के समान वेगवान् घोड़े —

श्लोक 32 (shiva.uma.45.32)

पूर्वपूर्वार्जितः कोशः पाल्यते तैर्न वाधुना । एवं मोहवशं यातो राजा परमधार्मिकः

pūrvapūrvārjitaḥ kośaḥ pālyate tairna vādhunā evaṁ mohavaśaṁ yāto rājā paramadhārmikaḥ

पूर्व-पूर्व राजाओं द्वारा संचित वह कोष अब उनके द्वारा संरक्षित नहीं है।" इस प्रकार वह परम धार्मिक राजा मोहग्रस्त हो गया।

श्लोक 33 (shiva.uma.45.33)

एतस्मिन्नन्तरे तत्र वैश्यः कश्चित्समागतः । राजा पप्रच्छ कस्त्वं भोः किमर्थमिह चागतः

etasminnantare tatra vaiśyaḥ kaścitsamāgataḥ rājā papraccha kastvaṁ bhoḥ kimarthamiha cāgataḥ

इसी बीच वहाँ कोई वैश्य भी आ पहुँचा; राजा ने पूछा — "हे भाई! तुम कौन हो, और यहाँ किस कारण आए हो?

श्लोक 34 (shiva.uma.45.34)

दुर्मना लक्ष्यसे कस्मादेतन्मे ब्रूहि साम्प्रतम् । इत्याकर्ण्य वचो रम्यं नरपालेन भाषितम्

durmanā lakṣyase kasmādetanme brūhi sāmpratam ityākarṇya vaco ramyaṁ narapālena bhāṣitam

तुम उदास से दिखाई दे रहे हो — किस कारण से, यह अभी मुझे बताओ।" राजा द्वारा कहे गए इन सुन्दर वचनों को सुनकर,

श्लोक 35 (shiva.uma.45.35)

दृग्भ्यां विमुञ्चन्नश्रूणि समाधिर्वैश्यपुङ्गवः । प्रत्युवाच महीपालं प्रणयावनतां गिरम्

dṛgbhyāṁ vimuñcannaśrūṇi samādhirvaiśyapuṅgavaḥ pratyuvāca mahīpālaṁ praṇayāvanatāṁ giram

अपनी दोनों आँखों से आँसू बहाता हुआ, समाधि नामक वह श्रेष्ठ वैश्य विनम्र वाणी में उस राजा को उत्तर देने लगा।

श्लोक 36 (shiva.uma.45.36)

वैश्य उवाच । समाधिर्नाम वैश्योऽहं धनिवंशसमुद्भवः । पुत्रदारादिभिस्त्यक्तो धनलोभान्महीपते

vaiśya uvāca samādhirnāma vaiśyo'haṁ dhanivaṁśasamudbhavaḥ putradārādibhistyakto dhanalobhānmahīpate

वैश्य ने कहा — मैं समाधि नामक वैश्य हूँ, धनी वंश में उत्पन्न; धन के लोभ से मेरे पुत्र और पत्नी आदि ने मुझे त्याग दिया है, हे राजन्!

श्लोक 37 (shiva.uma.45.37)

वनमभ्यागतो राजन्दुःखितः स्वेन कर्मणा । सोऽहं पुत्रप्रपौत्राणां कलत्राणां तथैव च

vanamabhyāgato rājanduḥkhitaḥ svena karmaṇā so'haṁ putraprapautrāṇāṁ kalatrāṇāṁ tathaiva ca

अपने ही कर्म के फलस्वरूप दुःखी होकर मैं वन में आ गया, हे राजन्! मैं अपने पुत्रों, पौत्रों, पत्नियों,

श्लोक 38 (shiva.uma.45.38)

भ्रातृणां भ्रातृपुत्राणां परेषां सुहृदां तथा । न वेद्मि कुशलं सम्यक् करुणासागर प्रभो

bhrātṛṇāṁ bhrātṛputrāṇāṁ pareṣāṁ suhṛdāṁ tathā na vedmi kuśalaṁ samyak karuṇāsāgara prabho

भाइयों, भतीजों और अन्य मित्रों के — हे करुणासागर प्रभो! उनके कुशल-क्षेम को भी मैं भलीभाँति नहीं जानता।

श्लोक 39 (shiva.uma.45.39)

राजोवाच । निष्कासितो यैः पुत्राद्यैर्दुर्वृत्तैर्धनगर्धिभिः । तेषु किं भवता प्रीतिः क्रियते मूर्खजन्तुवत्

rājovāca niṣkāsito yaiḥ putrādyairdurvṛttairdhanagardhibhiḥ teṣu kiṁ bhavatā prītiḥ kriyate mūrkhajantuvat

राजा ने कहा — जिन पुत्रों आदि दुष्ट, धन-लोभी लोगों ने तुम्हें निकाल दिया, क्या तुम अब भी उनके प्रति प्रेम रखते हो, मूर्ख प्राणी की भाँति?

श्लोक 40 (shiva.uma.45.40)

वैश्य उवाच । सम्यगुक्तं त्वया राजन्वचः सारार्थबृंहितम् । तथापि स्नेहपाशेन मोह्यतेऽतीव मे मनः

vaiśya uvāca samyaguktaṁ tvayā rājanvacaḥ sārārthabṛṁhitam tathāpi snehapāśena mohyate'tīva me manaḥ

वैश्य ने कहा — हे राजन्! आपने सारगर्भित वचन भलीभाँति कहा है; तथापि स्नेह के पाश से मेरा मन अत्यन्त मोहित हो जाता है।

श्लोक 41 (shiva.uma.45.41)

एवं मोहाकुलौ वैश्यपार्थिवौ मुनिसत्तम । जग्मतुर्मुनिवर्यस्य मेधसः सन्निधिं तदा

evaṁ mohākulau vaiśyapārthivau munisattama jagmaturmunivaryasya medhasaḥ sannidhiṁ tadā

हे मुनिसत्तम! इस प्रकार मोह से व्याकुल वे दोनों — वैश्य और राजा — तब उस श्रेष्ठ मुनि मेधा के समीप गए।

श्लोक 42 (shiva.uma.45.42)

स वैश्यराजसहितो नरराजः प्रतापवान् । प्रणनाम महावीरः शिरसा योगिनां वरम्

sa vaiśyarājasahito nararājaḥ pratāpavān praṇanāma mahāvīraḥ śirasā yogināṁ varam

उस वैश्य-राजा के साथ वह प्रतापी, महावीर राजा उन योगियों में श्रेष्ठ के चरणों में सिर झुकाकर प्रणाम करने लगा।

श्लोक 43 (shiva.uma.45.43)

बद्ध्वाञ्जलिमिमां वाचमुवाच नृपतिर्मुनिम् । भगवन्नावयोर्मोहं छेत्तुमर्हसि साम्प्रतम्

baddhvāñjalimimāṁ vācamuvāca nṛpatirmunim bhagavannāvayormohaṁ chettumarhasi sāmpratam

हाथ जोड़कर राजा ने मुनि से यह वचन कहा — "हे भगवन्! अब आप हम दोनों के मोह को दूर करने योग्य हैं।

श्लोक 44 (shiva.uma.45.44)

अहं राजश्रिया त्यक्तो गहनं वनमाश्रितः । तथापि हृतराज्यस्य तोषो नैवाभिजायते

ahaṁ rājaśriyā tyakto gahanaṁ vanamāśritaḥ tathāpi hṛtarājyasya toṣo naivābhijāyate

राज्य-लक्ष्मी से त्यक्त होकर मैंने इस घने वन का आश्रय लिया है, फिर भी छीने गए राज्य के प्रति मेरा वैराग्य कदापि नहीं होता।

श्लोक 45 (shiva.uma.45.45)

अयं च वैश्यः स्वजनैर्दाराद्यैर्निष्कृतो गृहात् । तथाप्येतस्य ममता न निवृत्तिं समश्नुते

ayaṁ ca vaiśyaḥ svajanairdārādyairniṣkṛto gṛhāt tathāpyetasya mamatā na nivṛttiṁ samaśnute

और यह वैश्य भी अपने ही स्वजनों — पत्नी आदि — द्वारा घर से निकाल दिया गया है, फिर भी इसकी उनके प्रति ममता समाप्त नहीं होती।

श्लोक 46 (shiva.uma.45.46)

किमत्र कारणं ब्रूहि ज्ञानिनोरपि नो मनः । मोहेन व्याकुलं जातं महत्येषा हि मूर्खता

kimatra kāraṇaṁ brūhi jñāninorapi no manaḥ mohena vyākulaṁ jātaṁ mahatyeṣā hi mūrkhatā

इसका क्या कारण है, यह बताइए — हम दोनों ज्ञानी होते हुए भी हमारा मन मोह से व्याकुल है; यह तो बड़ी विचित्र मूर्खता है।

श्लोक 47 (shiva.uma.45.47)

ऋषिरुवाच । महामाया जगद्धात्री शक्तिरूपा सनातनी । सा मोहयति सर्वेषां समाकृष्य मनांसि वै

ṛṣiruvāca mahāmāyā jagaddhātrī śaktirūpā sanātanī sā mohayati sarveṣāṁ samākṛṣya manāṁsi vai

ऋषि ने कहा — जगत् को धारण करने वाली सनातन शक्तिस्वरूपा महामाया ही सबके मन को खींचकर सबको मोहित करती है।

श्लोक 48 (shiva.uma.45.48)

ब्रह्मादयः सुराः सर्वे यन्मायामोहिताः प्रभो । न जानन्ति परं तत्त्वं मनुष्याणां च का कथा

brahmādayaḥ surāḥ sarve yanmāyāmohitāḥ prabho na jānanti paraṁ tattvaṁ manuṣyāṇāṁ ca kā kathā

हे प्रभो! ब्रह्मा आदि समस्त देवगण भी जिसकी माया से मोहित हैं और परम तत्त्व को नहीं जानते, फिर मनुष्यों की तो बात ही क्या!

श्लोक 49 (shiva.uma.45.49)

सा सृजत्यखिलं विश्वं सैव पालयतीति च । सैव संहरते काले त्रिगुणा परमेश्वरी

sā sṛjatyakhilaṁ viśvaṁ saiva pālayatīti ca saiva saṁharate kāle triguṇā parameśvarī

वही सम्पूर्ण विश्व की सृष्टि करती है, वही उसका पालन करती है, और काल आने पर वही उसका संहार भी करती है — वह त्रिगुणात्मिका परमेश्वरी है।

श्लोक 50 (shiva.uma.45.50)

यस्योपरि प्रसन्ना सा वरदा कामरूपिणी । स एव मोहमत्येति नान्यथा नृपसत्तम

yasyopari prasannā sā varadā kāmarūpiṇī sa eva mohamatyeti nānyathā nṛpasattama

जिस पर वह वरदायिनी, इच्छानुसार रूप धारण करने वाली देवी प्रसन्न हो जाती है, वही मोह को पार करता है, अन्यथा नहीं, हे राजश्रेष्ठ!

श्लोक 51 (shiva.uma.45.51)

राजोवाच । का सा देवी महामाया या च मोहयतेऽखिलान् । कथं जाता च सा देवी कृपया वद मे मुने

rājovāca kā sā devī mahāmāyā yā ca mohayate'khilān kathaṁ jātā ca sā devī kṛpayā vada me mune

राजा ने कहा — वह महामाया देवी कौन है, जो सबको मोहित करती है? और वह देवी किस प्रकार उत्पन्न हुई? हे मुने! कृपापूर्वक मुझे बताइए।

श्लोक 52 (shiva.uma.45.52)

ऋषिरुवाच । जगत्येकार्णवे जाते शेषमास्तीर्य योगराट् । योगनिद्रामुपाश्रित्य यदा सुष्वाप केशवः

ṛṣiruvāca jagatyekārṇave jāte śeṣamāstīrya yogarāṭ yoganidrāmupāśritya yadā suṣvāpa keśavaḥ

ऋषि ने कहा — जब सम्पूर्ण जगत् एकार्णव (एक महासागर) रूप हो गया था, तब शेषनाग पर लेटकर योगराज केशव, योगनिद्रा का आश्रय लेकर सो गए।

श्लोक 53 (shiva.uma.45.53)

तदा द्वावसुरौ जातौ विष्णोः कर्णमलेन वै । मधुकैटभनामानौ विख्यातौ पृथिवीतले

tadā dvāvasurau jātau viṣṇoḥ karṇamalena vai madhukaiṭabhanāmānau vikhyātau pṛthivītale

उस समय विष्णु के कान के मैल से दो असुर उत्पन्न हुए, जो पृथ्वी पर मधु और कैटभ नामों से विख्यात हुए।

श्लोक 54 (shiva.uma.45.54)

प्रलयार्कप्रभौ घोरौ महाकायौ महाहनू । दंष्ट्राकरालवदनौ भक्षयन्तौ जगन्ति वा

pralayārkaprabhau ghorau mahākāyau mahāhanū daṁṣṭrākarālavadanau bhakṣayantau jaganti vā

प्रलयकालीन सूर्य के समान तेजस्वी, भयंकर, विशालकाय, विशाल जबड़ों वाले, दाढ़ों से विकराल मुख वाले वे दोनों जगत् को निगल जाने को उद्यत थे।

श्लोक 55 (shiva.uma.45.55)

तौ दृष्ट्वा भगवन्नाभिपङ्कजे कमलासनम् । हननायोद्यतावास्तां कस्त्वं भोरिति वादिनौ

tau dṛṣṭvā bhagavannābhipaṅkaje kamalāsanam hananāyodyatāvāstāṁ kastvaṁ bhoriti vādinau

उन दोनों ने भगवान् [विष्णु] की नाभि-कमल पर विराजमान ब्रह्मा को देखकर उन्हें मार डालने के लिए उद्यत होकर कहा — "तुम कौन हो, अरे?"

श्लोक 56 (shiva.uma.45.56)

समालोक्य तु तौ दैत्यौ सुरज्येष्ठो जनार्दनम् । शयानं च पयोम्भोधौ तुष्टाव परमेश्वरीम्

samālokya tu tau daityau surajyeṣṭho janārdanam śayānaṁ ca payombhodhau tuṣṭāva parameśvarīm

उन दोनों दैत्यों को देखकर देवताओं में ज्येष्ठ ब्रह्मा ने क्षीरसागर में शयन कर रहे जनार्दन को [जगाने के लिए] परमेश्वरी की स्तुति की।

श्लोक 57 (shiva.uma.45.57)

ब्रह्मोवाच । रक्ष रक्ष महामाये शरणागतवत्सले । एताभ्यां घोररूपाभ्यां दैत्याभ्यां जगदम्बिके

brahmovāca rakṣa rakṣa mahāmāye śaraṇāgatavatsale etābhyāṁ ghorarūpābhyāṁ daityābhyāṁ jagadambike

ब्रह्मा ने कहा — हे महामाये! रक्षा करो, रक्षा करो! हे शरणागत-वत्सले! हे जगदम्बिके! इन दोनों भयंकर-रूप दैत्यों से [हमारी रक्षा करो]।

श्लोक 58 (shiva.uma.45.58)

प्रणमामि महामायां योगनिद्रामुमां सतीम् । कालरात्रिं महारात्रिं मोहरात्रिं परात्पराम्

praṇamāmi mahāmāyāṁ yoganidrāmumāṁ satīm kālarātriṁ mahārātriṁ moharātriṁ parātparām

मैं उस महामाया, योगनिद्रा, सती उमा को, कालरात्रि, महारात्रि, मोहरात्रि, परात्परा को प्रणाम करता हूँ।

श्लोक 59 (shiva.uma.45.59)

त्रिदेवजननीं नित्यां भक्ताभीष्टफलप्रदाम् । पालिनीं सर्वदेवानां करुणावरुणालयाम्

tridevajananīṁ nityāṁ bhaktābhīṣṭaphalapradām pālinīṁ sarvadevānāṁ karuṇāvaruṇālayām

तीनों देवों की नित्य जननी को, भक्तों को अभीष्ट फल देने वाली को, समस्त देवताओं की रक्षिका को, करुणा के समुद्र के आवासस्थल को [प्रणाम है]।

श्लोक 60 (shiva.uma.45.60)

त्वत्प्रभावादहं ब्रह्मा माधवो गिरिजापतिः । सृजत्यवति संसारं काले संहरतीति च

tvatprabhāvādahaṁ brahmā mādhavo girijāpatiḥ sṛjatyavati saṁsāraṁ kāle saṁharatīti ca

तुम्हारे ही प्रभाव से मैं ब्रह्मा, गिरिजापति माधव (विष्णु) — संसार को रचते हैं, पालते हैं, और काल आने पर संहार करते हैं।

श्लोक 61 (shiva.uma.45.61)

त्वं स्वाहा त्वं स्वधा त्वं ह्रीस्त्वं बुद्धिर्विमला मता । तुष्टिः पुष्टिस्त्वमेवाम्ब शान्तिः क्षान्तिः क्षुधा दया

tvaṁ svāhā tvaṁ svadhā tvaṁ hrīstvaṁ buddhirvimalā matā tuṣṭiḥ puṣṭistvamevāmba śāntiḥ kṣāntiḥ kṣudhā dayā

तुम ही स्वाहा हो, तुम ही स्वधा हो, तुम ही ह्रीँ हो, तुम्हें ही विमला बुद्धि माना गया है; हे माता! तुम ही तुष्टि हो, पुष्टि हो, शान्ति हो, क्षमा हो, क्षुधा हो और दया हो।

श्लोक 62 (shiva.uma.45.62)

विष्णुमाया त्वमेवाम्ब त्वमेव चेतना मता । त्वं शक्तिः परमा प्रोक्ता लज्जा तृष्णा त्वमेव च

viṣṇumāyā tvamevāmba tvameva cetanā matā tvaṁ śaktiḥ paramā proktā lajjā tṛṣṇā tvameva ca

हे माता! तुम ही विष्णु की माया हो, तुम्हें ही चेतना माना गया है; तुम्हें ही परम शक्ति कहा गया है, और तुम ही लज्जा हो, तुम ही तृष्णा हो।

श्लोक 63 (shiva.uma.45.63)

भ्रान्तिस्त्वं स्मृतिरूपा त्वं मातृरूपेण संस्थिता । त्वं लक्ष्मीर्भवने पुंसां पुण्याचारप्रवर्तिनाम्

bhrāntistvaṁ smṛtirūpā tvaṁ mātṛrūpeṇa saṁsthitā tvaṁ lakṣmīrbhavane puṁsāṁ puṇyācārapravartinām

तुम ही भ्रान्ति हो, तुम ही स्मृति-रूप हो, तुम ही माता के रूप में स्थित हो; तुम ही पुण्याचार में प्रवृत्त पुरुषों के घर में लक्ष्मी हो।

श्लोक 64 (shiva.uma.45.64)

त्वं जातिस्त्वं मता वृत्तिर्व्याप्तिरूपा त्वमेव हि । त्वमेव चित्तिरूपेण व्याप्य कृत्स्नं प्रतिष्ठिता

tvaṁ jātistvaṁ matā vṛttirvyāptirūpā tvameva hi tvameva cittirūpeṇa vyāpya kṛtsnaṁ pratiṣṭhitā

तुम ही जाति हो, तुम्हें ही वृत्ति (आजीविका) माना गया है, तुम ही व्याप्ति-रूप हो; तुम ही चेतना (चिति) के रूप में सब कुछ व्याप्त कर स्थित हो।

श्लोक 65 (shiva.uma.45.65)

सा त्वमेतौ दुराधर्षावसुरौ मोहयाम्बिके । प्रबोधय जगद्योने नारायणमजं विभुम्

sā tvametau durādharṣāvasurau mohayāmbike prabodhaya jagadyone nārāyaṇamajaṁ vibhum

हे अम्बिके! तुम ही इन दुर्जय दोनों असुरों को मोहित करो, और हे जगत्-जननी! सर्वव्यापक, अजन्मा नारायण को जगाओ।

श्लोक 66 (shiva.uma.45.66)

ऋषिरुवाच । ब्रह्मणा प्रार्थिता सेयं मधुकैटभनाशने । महाविद्या जगद्धात्री सर्वविद्याधिदेवता

ṛṣiruvāca brahmaṇā prārthitā seyaṁ madhukaiṭabhanāśane mahāvidyā jagaddhātrī sarvavidyādhidevatā

ऋषि ने कहा — ब्रह्मा द्वारा मधु-कैटभ के नाश के लिए प्रार्थना की गई वही महाविद्या, जगत्-धात्री, समस्त विद्याओं की अधिष्ठात्री देवी —

श्लोक 67 (shiva.uma.45.67)

द्वादश्यां फाल्गुनस्यैव शुक्लायां समभून्नृप । महाकालीति विख्याता शक्तिस्त्रैलोक्यमोहिनी

dvādaśyāṁ phālgunasyaiva śuklāyāṁ samabhūnnṛpa mahākālīti vikhyātā śaktistrailokyamohinī

हे राजन्! फाल्गुन मास की शुक्ल द्वादशी को महाकाली नाम से विख्यात, त्रैलोक्य को मोहित करने वाली शक्ति के रूप में प्रकट हुई।

श्लोक 68 (shiva.uma.45.68)

ततोऽभवद्वियद्वाणी मा भैषीः कमलासन । कण्टकं नाशयाम्यद्य हत्वाजौ मधुकैटभौ

tato'bhavadviyadvāṇī mā bhaiṣīḥ kamalāsana kaṇṭakaṁ nāśayāmyadya hatvājau madhukaiṭabhau

तब आकाशवाणी हुई — "हे कमलासन! डरो मत, आज मैं मधु और कैटभ का वध करके इस कण्टक को नष्ट कर दूँगी।"

श्लोक 69 (shiva.uma.45.69)

इत्युक्त्वा सा महामाया नेत्रवक्त्रादितो हरेः । निर्गम्य दर्शने तस्थौ ब्रह्मणोऽव्यक्तजन्मनः

ityuktvā sā mahāmāyā netravaktrādito hareḥ nirgamya darśane tasthau brahmaṇo'vyaktajanmanaḥ

ऐसा कहकर वह महामाया विष्णु के नेत्रों और मुख आदि से निकलकर अव्यक्त-जन्मा ब्रह्मा के सामने आ खड़ी हुई।

श्लोक 70 (shiva.uma.45.70)

उत्तस्थौ च हृषीकेशो देवदेवो जनार्दनः । स ददर्श पुरो दैत्यौ मधुकैटभसंज्ञकौ

uttasthau ca hṛṣīkeśo devadevo janārdanaḥ sa dadarśa puro daityau madhukaiṭabhasaṁjñakau

तब हृषीकेश देवाधिदेव जनार्दन जाग उठे, और उन्होंने सामने मधु-कैटभ नामक दोनों दैत्यों को देखा।

श्लोक 71 (shiva.uma.45.71)

ताभ्यां प्रववृत्ते युद्धं विष्णोरतुलतेजसः । पञ्चवर्षसहस्राणि बाहुयुद्धमभूत्तदा

tābhyāṁ pravavṛtte yuddhaṁ viṣṇoratulatejasaḥ pañcavarṣasahasrāṇi bāhuyuddhamabhūttadā

अतुल तेजस्वी विष्णु का उन दोनों के साथ युद्ध छिड़ गया; उस समय पाँच हजार वर्षों तक केवल बाहु-युद्ध होता रहा।

श्लोक 72 (shiva.uma.45.72)

महामायाप्रभावेण मोहितौ दानवोत्तमौ । जजल्पतू रमाकान्तं गृहाण वरमीप्सितम्

mahāmāyāprabhāveṇa mohitau dānavottamau jajalpatū ramākāntaṁ gṛhāṇa varamīpsitam

महामाया के प्रभाव से मोहित हुए वे दोनों श्रेष्ठ दानव लक्ष्मीपति [विष्णु] से बोले — "जो अभीष्ट वर हो, वह माँग लो।"

श्लोक 73 (shiva.uma.45.73)

नारायण उवाच । मयि प्रसन्नौ यदि वां दीयतामेष मे वरः । मम वध्यावुभौ नान्यं युवाभ्यां प्रार्थये वरम्

nārāyaṇa uvāca mayi prasannau yadi vāṁ dīyatāmeṣa me varaḥ mama vadhyāvubhau nānyaṁ yuvābhyāṁ prārthaye varam

नारायण ने कहा — "यदि तुम दोनों मुझसे प्रसन्न हो, तो मुझे यह वर दे दो — तुम दोनों मेरे ही द्वारा वध्य हो; तुमसे मैं और कोई वर नहीं माँगता।"

श्लोक 74 (shiva.uma.45.74)

ऋषिरुवाच । एकार्णवां महीं दृष्ट्वा प्रोचतुः केशवं वचः । आवां जहि न यत्रासौ धरणी पयसाप्लुता

ṛṣiruvāca ekārṇavāṁ mahīṁ dṛṣṭvā procatuḥ keśavaṁ vacaḥ āvāṁ jahi na yatrāsau dharaṇī payasāplutā

ऋषि ने कहा — पृथ्वी को एक-अर्णव (जलमय) देखकर उन दोनों ने केशव से कहा — "हमें वहाँ मत मारो जहाँ यह धरती जल से आच्छादित न हो।"

श्लोक 75 (shiva.uma.45.75)

तथास्तु प्रोच्य भगवांश्चक्रमुत्थाप्य सूज्ज्वलम् । चिच्छेद शिरसी कृत्वा स्वकीयजघने तयोः

tathāstu procya bhagavāṁścakramutthāpya sūjjvalam ciccheda śirasī kṛtvā svakīyajaghane tayoḥ

"वैसा ही हो" कहकर भगवान् ने अपनी अत्यन्त देदीप्यमान चक्र को उठाकर, अपनी ही जांघ पर रखकर उन दोनों के सिर काट डाले।

श्लोक 76 (shiva.uma.45.76)

एवं ते कथितो राजन् कालिकायाः समुद्भवः । महालक्ष्म्यास्तथोत्पत्तिं निशामय महामते

evaṁ te kathito rājan kālikāyāḥ samudbhavaḥ mahālakṣmyāstathotpattiṁ niśāmaya mahāmate

हे राजन्! इस प्रकार मैंने तुम्हें कालिका की उत्पत्ति का वर्णन सुनाया; अब महालक्ष्मी की उत्पत्ति का वृत्तान्त भी सुनो, हे महामते!

श्लोक 77 (shiva.uma.45.77)

निर्विकारादि साकारा निराकारापि देव्युमा । देवानां तापनाशार्थं प्रादुरासीद्युगे युगे

nirvikārādi sākārā nirākārāpi devyumā devānāṁ tāpanāśārthaṁ prādurāsīdyuge yuge

मूलतः निर्विकार, फिर भी साकार, और निराकार भी — देवी उमा देवताओं के संताप को दूर करने के लिए युग-युग में प्रकट होती हैं।

श्लोक 78 (shiva.uma.45.78)

यदिच्छावैभवं सर्वं तस्या देहग्रहः स्मृतः । लीलया सापि भक्तानां गुणवर्णनहेतवे

yadicchāvaibhavaṁ sarvaṁ tasyā dehagrahaḥ smṛtaḥ līlayā sāpi bhaktānāṁ guṇavarṇanahetave

जो भी उसका ऐश्वर्य और महिमा है, वह सब उसका ही देह-ग्रहण (अवतार) माना गया है; लीलापूर्वक वह भक्तों के गुण-कीर्तन के निमित्त ही [अवतार लेती है]।

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