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उमा संहिता · अध्याय 46

महालक्ष्म्यवतार

अध्याय 45अध्याय-सूचीअध्याय 47

श्लोक 1 (shiva.uma.46.1)

ऋषिरुवाच । आसीद्रम्भासुरो नाम दैत्यवंशशिरोमणिः । तस्माज्जातो महातेजा महिषो नाम दानवः

ṛṣiruvāca āsīdrambhāsuro nāma daityavaṁśaśiromaṇiḥ tasmājjāto mahātejā mahiṣo nāma dānavaḥ

ऋषि ने कहा — रम्भ नामक एक असुर था, जो दैत्य-वंश का शिरोमणि था; उससे महातेजस्वी महिष नामक एक दानव उत्पन्न हुआ।

श्लोक 2 (shiva.uma.46.2)

स सङ्ग्रामे सुरान्सर्वान्निर्जित्य दनुजाधिपः । चकार राज्यं स्वर्लोके महेन्द्रासनसंस्थितः

sa saṅgrāme surānsarvānnirjitya danujādhipaḥ cakāra rājyaṁ svarloke mahendrāsanasaṁsthitaḥ

युद्ध में समस्त देवताओं को जीतकर उस दानवाधिपति ने स्वर्गलोक में महेन्द्र के सिंहासन पर विराजमान होकर राज्य किया।

श्लोक 3 (shiva.uma.46.3)

पराजितास्ततो देवा ब्रह्माणं शरणं ययुः । ब्रह्मापि तान्समादाय ययौ यत्र वृषाकपी

parājitāstato devā brahmāṇaṁ śaraṇaṁ yayuḥ brahmāpi tānsamādāya yayau yatra vṛṣākapī

तब पराजित हुए देवगण ब्रह्मा की शरण में गए; ब्रह्मा भी उन्हें साथ लेकर वहाँ गए जहाँ शंकर और केशव विराजमान थे।

श्लोक 4 (shiva.uma.46.4)

तत्र गत्वा सुराः सर्वे नत्वा शङ्करकेशवौ । स्ववृत्तं कथायामासुर्यथावदनुपूर्वशः

tatra gatvā surāḥ sarve natvā śaṅkarakeśavau svavṛttaṁ kathāyāmāsuryathāvadanupūrvaśaḥ

वहाँ जाकर सभी देवताओं ने शंकर और केशव को प्रणाम कर, अपनी सम्पूर्ण दशा को यथावत् क्रमशः सुनाया।

श्लोक 5 (shiva.uma.46.5)

भगवन्तौ वयं सर्वे महिषेण दुरात्मना । उज्जासिताश्च स्वर्लोकान्निर्जित्य समराङ्गणे

bhagavantau vayaṁ sarve mahiṣeṇa durātmanā ujjāsitāśca svarlokānnirjitya samarāṅgaṇe

"हे भगवन्तो! हम सब दुरात्मा महिष द्वारा युद्धभूमि में पराजित कर स्वर्गलोक से निकाल दिए गए हैं।

श्लोक 6 (shiva.uma.46.6)

भ्रमामो मर्त्यलोकेऽस्मिन्न लभेमहिशं क्वचित् । कां कां न दुर्दशां नीता देवा इन्द्रपुरोगमाः

bhramāmo martyaloke'sminna labhemahiśaṁ kvacit kāṁ kāṁ na durdaśāṁ nītā devā indrapurogamāḥ

हम इस मर्त्यलोक में भटक रहे हैं, हमें कहीं शरण नहीं मिलती; इन्द्र आदि हम देवताओं ने न जाने कैसी-कैसी दुर्दशा भोगी है।

श्लोक 7 (shiva.uma.46.7)

सूर्याचन्द्रमसौ पाशी कुबेरो यम एव च । इन्द्राग्निवातगन्धर्वा विद्याधरसुचारणाः

sūryācandramasau pāśī kubero yama eva ca indrāgnivātagandharvā vidyādharasucāraṇāḥ

सूर्य, चन्द्रमा, पाशधारी वरुण, कुबेर और यम भी, इन्द्र, अग्नि, वायु, गन्धर्व, विद्याधर तथा उत्तम चारण —

श्लोक 8 (shiva.uma.46.8)

एतेषामपरेषां च विधेयं कर्म सोऽसुरः । स्वयं करोति पापात्मा दैत्यपक्षाभयङ्कर

eteṣāmapareṣāṁ ca vidheyaṁ karma so'suraḥ svayaṁ karoti pāpātmā daityapakṣābhayaṅkara

इन सबका और अन्य सबका कार्य भी वह पापात्मा असुर स्वयं ही करता है, हे दैत्य-पक्ष के लिए निर्भयता देने वाले प्रभु!

श्लोक 9 (shiva.uma.46.9)

तस्माच्छरणमापन्नान्देवान्नस्त्रातुमर्हथः । वधोपायं च तस्याशु चिन्तयेथां युवां प्रभू

tasmāccharaṇamāpannāndevānnastrātumarhathaḥ vadhopāyaṁ ca tasyāśu cintayethāṁ yuvāṁ prabhū

इसलिए शरणागत हुए हम देवताओं की रक्षा करने योग्य आप ही हैं; आप दोनों प्रभु शीघ्र ही उसके वध का उपाय सोचिए।

श्लोक 10 (shiva.uma.46.10)

इति देववचः श्रुत्वा दामोदरसतीश्वरौ । चक्रतुः परमं कोपं रोषाघूर्णितलोचनौ

iti devavacaḥ śrutvā dāmodarasatīśvarau cakratuḥ paramaṁ kopaṁ roṣāghūrṇitalocanau

देवताओं का यह वचन सुनकर दामोदर (विष्णु) और शिव — दोनों को अत्यन्त क्रोध हुआ, और क्रोध से उनके नेत्र घूमने लगे।

श्लोक 11 (shiva.uma.46.11)

ततोऽतिकोपपूर्णस्य विष्णोः शम्भोश्च वक्त्रतः । तथान्येषां च देवानां शरीरान्निर्गतं महः

tato'tikopapūrṇasya viṣṇoḥ śambhośca vaktrataḥ tathānyeṣāṁ ca devānāṁ śarīrānnirgataṁ mahaḥ

तब अत्यन्त क्रोध से भरे हुए विष्णु और शम्भु के मुख से, तथा अन्य देवताओं के शरीर से भी, एक तेज निकला।

श्लोक 12 (shiva.uma.46.12)

अतीव महसः पुञ्जं ज्वलन्तं दशदिक्षु च । अपश्यंस्त्रिदशाः सर्वे दुर्गाध्यानपरायणाः

atīva mahasaḥ puñjaṁ jvalantaṁ daśadikṣu ca apaśyaṁstridaśāḥ sarve durgādhyānaparāyaṇāḥ

दसों दिशाओं में जलते हुए उस अत्यन्त तेज-पुंज को समस्त देवगण दुर्गा के ध्यान में तत्पर होकर देखने लगे।

श्लोक 13 (shiva.uma.46.13)

सर्वदेवशरीरोत्थं तेजस्तदतिभीषणम् । सङ्घीभूयाभवन्नारी साक्षान्महिषमर्दिनी

sarvadevaśarīrotthaṁ tejastadatibhīṣaṇam saṅghībhūyābhavannārī sākṣānmahiṣamardinī

समस्त देवताओं के शरीर से उत्पन्न वह अत्यन्त भीषण तेज एक साथ मिलकर साक्षात् महिषासुर-मर्दिनी नारी के रूप में परिणत हो गया।

श्लोक 14 (shiva.uma.46.14)

शम्भुतेजस उत्पन्नं मुखमस्याः सुभास्वरम् । याम्येन बाला अभवन्वैष्णवेन च बाहवः

śambhutejasa utpannaṁ mukhamasyāḥ subhāsvaram yāmyena bālā abhavanvaiṣṇavena ca bāhavaḥ

शम्भु के तेज से इसका अत्यन्त दीप्तिमान मुख उत्पन्न हुआ; यम के तेज से भुजाएँ और विष्णु के तेज से भी भुजाएँ बनीं।

श्लोक 15 (shiva.uma.46.15)

चन्द्रमस्तेजसा तस्याः स्तनयुग्मं व्यजायत । मध्यमैन्द्रेण जङ्घोरू वारुणेन बभूवतुः

candramastejasā tasyāḥ stanayugmaṁ vyajāyata madhyamaindreṇa jaṅghorū vāruṇena babhūvatuḥ

चन्द्रमा के तेज से उसका स्तन-युगल उत्पन्न हुआ; मध्य भाग इन्द्र के तेज से, और जांघें तथा ऊरु वरुण के तेज से बने।

श्लोक 16 (shiva.uma.46.16)

भूतेजसा नितम्बोऽभूद् ब्राह्मेण चरणद्वयम् । आर्केण चरणाङ्गुल्यः कराङ्गुल्यश्च वासवात्

bhūtejasā nitambo'bhūd brāhmeṇa caraṇadvayam ārkeṇa caraṇāṅgulyaḥ karāṅgulyaśca vāsavāt

पृथ्वी के तेज से नितम्ब उत्पन्न हुआ, ब्रह्मा के तेज से दोनों चरण; सूर्य के तेज से चरणों की अंगुलियाँ और इन्द्र के तेज से हाथों की अंगुलियाँ बनीं।

श्लोक 17 (shiva.uma.46.17)

कुबेरतेजसा नासा रदनाश्च प्रजापतेः । पावकीयेन नयनत्रयं सान्ध्येन भ्रूद्वयम्

kuberatejasā nāsā radanāśca prajāpateḥ pāvakīyena nayanatrayaṁ sāndhyena bhrūdvayam

कुबेर के तेज से नासिका और प्रजापति के तेज से दाँत उत्पन्न हुए; अग्नि के तेज से तीन नेत्र, और सन्ध्या के तेज से दोनों भौंहें बनीं।

श्लोक 18 (shiva.uma.46.18)

आनिलेन श्रवोद्वन्द्वं तथान्येषां स्वरोकसाम् । तेजसा सम्भवा पद्मालया सा परमेश्वरी

ānilena śravodvandvaṁ tathānyeṣāṁ svarokasām tejasā sambhavā padmālayā sā parameśvarī

वायु के तेज से दोनों कान, और अन्य लोकपालों के तेज से भी [अन्य अंग] उत्पन्न हुए — इस प्रकार समस्त तेज-राशि से उत्पन्न वह परमेश्वरी पद्मालया (लक्ष्मी) प्रकट हुई।

श्लोक 19 (shiva.uma.46.19)

ततो निखिलदेवानां तेजोराशिसमुद्भवाम् । तामालोक्य सुराः सर्वे परं हर्षं प्रपेदिरे

tato nikhiladevānāṁ tejorāśisamudbhavām tāmālokya surāḥ sarve paraṁ harṣaṁ prapedire

तब समस्त देवताओं के तेज-समूह से उत्पन्न उस देवी को देखकर सभी देवताओं को परम हर्ष प्राप्त हुआ।

श्लोक 20 (shiva.uma.46.20)

निरायुधां च तां दृष्ट्वा ब्रह्माद्यास्त्रिदिवेश्वराः । सायुधां तां शिवां कर्तुं मनः सन्दधिरे सुराः

nirāyudhāṁ ca tāṁ dṛṣṭvā brahmādyāstridiveśvarāḥ sāyudhāṁ tāṁ śivāṁ kartuṁ manaḥ sandadhire surāḥ

उसे शस्त्ररहित देखकर ब्रह्मा आदि त्रिलोकाधिपति देवताओं ने उसे शस्त्रयुक्त, कल्याणकारी बनाने का विचार किया।

श्लोक 21 (shiva.uma.46.21)

ततः शूलं महेशानो महेशान्यै समर्पयत् । चक्रं च कृष्णो भगवान् शङ्खं पाशं च पाशभृत्

tataḥ śūlaṁ maheśāno maheśānyai samarpayat cakraṁ ca kṛṣṇo bhagavān śaṅkhaṁ pāśaṁ ca pāśabhṛt

तब महेश ने त्रिशूल महेश्वरी को अर्पित किया, भगवान् कृष्ण ने चक्र, और पाशधारी वरुण ने शंख और पाश दिए।

श्लोक 22 (shiva.uma.46.22)

शक्तिं हुताशनोऽयच्छन्मारुतश्चापमेव च । बाणपूर्णेषुधी चैव वज्रघण्टे शचीपतिः

śaktiṁ hutāśano'yacchanmārutaścāpameva ca bāṇapūrṇeṣudhī caiva vajraghaṇṭe śacīpatiḥ

अग्नि ने शक्ति दी और वायु ने धनुष; इन्द्र ने बाणों से भरे दो तरकश तथा वज्र और घण्टा दिए।

श्लोक 23 (shiva.uma.46.23)

यमो ददौ कालदण्डमक्षमालां प्रजापतिः । ब्रह्मा कमण्डलुं प्रादाद्रोमरश्मीन्दिवाकरः

yamo dadau kāladaṇḍamakṣamālāṁ prajāpatiḥ brahmā kamaṇḍaluṁ prādādromaraśmīndivākaraḥ

यम ने कालदण्ड दिया, प्रजापति ने अक्षमाला (जपमाला); ब्रह्मा ने कमण्डलु दिया, और सूर्य ने अपनी किरणों के रोम अर्पित किए।

श्लोक 24 (shiva.uma.46.24)

कालः खड्गं ददौ तस्यै फलकं च समुज्वलम् । क्षीराब्धी रुचिरं हारमजरे च तथाम्बरे

kālaḥ khaḍgaṁ dadau tasyai phalakaṁ ca samujvalam kṣīrābdhī ruciraṁ hāramajare ca tathāmbare

काल ने उसे खड्ग और चमकती हुई ढाल दी; क्षीरसागर ने सुन्दर हार तथा अजर वस्त्र भी [दिए]।

श्लोक 25 (shiva.uma.46.25)

चूडामणिं कुण्डले च कटकानि तथैव च । अर्द्धचन्द्रं च केयूरान्नूपुरौ च मनोहरौ

cūḍāmaṇiṁ kuṇḍale ca kaṭakāni tathaiva ca arddhacandraṁ ca keyūrānnūpurau ca manoharau

चूड़ामणि और कुण्डल, तथा कड़े भी [दिए]; अर्धचन्द्र, बाजूबन्द और दोनों मनोहर नूपुर [अर्पित किए]।

श्लोक 26 (shiva.uma.46.26)

ग्रैवेयकमङ्गुलीषु समस्तास्वङ्गुलीयकम् । विश्वकर्मा च परशुं ददौ तस्यै मनोहरम्

graiveyakamaṅgulīṣu samastāsvaṅgulīyakam viśvakarmā ca paraśuṁ dadau tasyai manoharam

कण्ठहार और सभी अंगुलियों के लिए अंगूठियाँ भी [दिए]; विश्वकर्मा ने उसे एक मनोहर परशु प्रदान किया।

श्लोक 27 (shiva.uma.46.27)

अस्त्राण्यनेकानि तथाभेद्यं चैव तनुच्छदम् । सुरम्यसरसां मालां पङ्कजं चाम्बुधिर्ददौ

astrāṇyanekāni tathābhedyaṁ caiva tanucchadam suramyasarasāṁ mālāṁ paṅkajaṁ cāmbudhirdadau

अनेक अस्त्र और एक अभेद्य कवच भी [दिए]; समुद्र ने एक अत्यन्त सुन्दर सरोवर-माला और कमल भी दिया।

श्लोक 28 (shiva.uma.46.28)

ददौ सिंहं च हिमवान् रत्नानि विविधानि च । सुरया पूरितं पात्रं कुबेरोऽस्यै समर्पयत्

dadau siṁhaṁ ca himavān ratnāni vividhāni ca surayā pūritaṁ pātraṁ kubero'syai samarpayat

हिमवान् ने सिंह और नाना प्रकार के रत्न दिए; कुबेर ने उसे मदिरा से भरा हुआ पात्र अर्पित किया।

श्लोक 29 (shiva.uma.46.29)

शेषश्च भोगिनां नेता विचित्ररचनाञ्चितम् । ददौ तस्यै नागहारं नानासन्मणिगुम्फितम्

śeṣaśca bhogināṁ netā vicitraracanāñcitam dadau tasyai nāgahāraṁ nānāsanmaṇigumphitam

नागों के अधिपति शेष ने उसे विचित्र रचना से सुशोभित, नाना उत्तम मणियों से गुँथा हुआ एक नाग-हार अर्पित किया।

श्लोक 30 (shiva.uma.46.30)

एतैश्चान्यैः सुरैर्देवी भूषणैरायुधैस्तथा । सत्कृतोच्चैर्ननादासौ साट्टहासं पुनःपुनः

etaiścānyaiḥ surairdevī bhūṣaṇairāyudhaistathā satkṛtoccairnanādāsau sāṭṭahāsaṁ punaḥpunaḥ

इन तथा अन्य देवताओं द्वारा दिए गए इन आभूषणों और आयुधों से सम्मानित होकर वह देवी बार-बार अट्टहास सहित उच्च स्वर में गर्जना करने लगी।

श्लोक 31 (shiva.uma.46.31)

तस्या भीषणनादेन पूरिता च नभःस्थली । प्रतिशब्दो महानासीच्चुक्षुभे भुवनत्रयम्

tasyā bhīṣaṇanādena pūritā ca nabhaḥsthalī pratiśabdo mahānāsīccukṣubhe bhuvanatrayam

उसकी उस भयंकर गर्जना से आकाश-मण्डल भर गया; उसकी प्रतिध्वनि महान् हुई और तीनों लोक क्षुब्ध हो उठे।

श्लोक 32 (shiva.uma.46.32)

चेलुः समुद्राश्चत्वारो वसुधा च चचाल ह । जयशब्दस्ततो देवैरकारि महिषार्दितैः

celuḥ samudrāścatvāro vasudhā ca cacāla ha jayaśabdastato devairakāri mahiṣārditaiḥ

चारों समुद्र काँपने लगे और पृथ्वी भी हिल उठी; तब महिष से पीड़ित देवताओं ने जय-जयकार का शब्द किया।

श्लोक 33 (shiva.uma.46.33)

ततोऽम्बिकां परां शक्तिं महालक्ष्मीस्वरूपिणीम् । तुष्टुवुस्ते सुराः सर्वे भक्तिगद्गदया गिरा

tato'mbikāṁ parāṁ śaktiṁ mahālakṣmīsvarūpiṇīm tuṣṭuvuste surāḥ sarve bhaktigadgadayā girā

तब समस्त देवताओं ने भक्ति से गद्गद वाणी में महालक्ष्मी-स्वरूपिणी उस परा शक्ति अम्बिका की स्तुति की।

श्लोक 34 (shiva.uma.46.34)

लोकं सङ्क्षुब्धमालोक्य देवतापरिपन्थिनः । सन्नद्धसैनिकास्ते च समुत्तस्थुरुदायुधाः

lokaṁ saṅkṣubdhamālokya devatāparipanthinaḥ sannaddhasainikāste ca samuttasthurudāyudhāḥ

लोक को क्षुब्ध हुआ देखकर देवताओं के शत्रुओं के सैनिक भी अस्त्र धारण कर, तैयार होकर उठ खड़े हुए।

श्लोक 35 (shiva.uma.46.35)

महिषोऽपि च तं शब्दमभ्यधावद्रुषान्वितः । स ददर्श ततो देवीं व्याप्तलोकत्रयां रुचा

mahiṣo'pi ca taṁ śabdamabhyadhāvadruṣānvitaḥ sa dadarśa tato devīṁ vyāptalokatrayāṁ rucā

महिष भी उस [गर्जना के] शब्द की ओर क्रोधपूर्वक दौड़ा; तब उसने त्रिलोक को अपनी कान्ति से व्याप्त करने वाली उस देवी को देखा।

श्लोक 36 (shiva.uma.46.36)

एतस्मिन्नन्तरे तत्र महिषासुरपालिताः । समाजग्मुर्महावीराः कोटिशो धृतहेतयः

etasminnantare tatra mahiṣāsurapālitāḥ samājagmurmahāvīrāḥ koṭiśo dhṛtahetayaḥ

इसी बीच महिषासुर द्वारा पालित करोड़ों महावीर, शस्त्र धारण किए हुए, वहाँ एकत्र हो गए।

श्लोक 37 (shiva.uma.46.37)

चिक्षुरश्चामरोदग्रौ करालोद्धतवाष्कलाः । ताम्रोग्रास्योग्रवीर्याश्च बिडालोऽन्धक एव च

cikṣuraścāmarodagrau karāloddhatavāṣkalāḥ tāmrogrāsyogravīryāśca biḍālo'ndhaka eva ca

चिक्षुर, चामर, उद्ग्र, कराल, उद्धत, वाष्कल, ताम्र, उग्रास्य, उग्रवीर्य, बिडाल और अन्धक —

श्लोक 38 (shiva.uma.46.38)

दुर्धरो दुर्मुखश्चैव त्रिनेत्रश्च महाहनुः । एते चान्ये च बहवः शूरा युद्धविशारदाः

durdharo durmukhaścaiva trinetraśca mahāhanuḥ ete cānye ca bahavaḥ śūrā yuddhaviśāradāḥ

दुर्धर, दुर्मुख, त्रिनेत्र और महाहनु — ये तथा युद्ध में निपुण अन्य अनेक शूरवीर,

श्लोक 39 (shiva.uma.46.39)

युयुधुः समरे देव्या सह शस्त्रास्त्रपारगाः । इत्थं कालो व्यतीयाय युध्यतोर्भीषणस्तयोः

yuyudhuḥ samare devyā saha śastrāstrapāragāḥ itthaṁ kālo vyatīyāya yudhyatorbhīṣaṇastayoḥ

शस्त्र-अस्त्र में पारंगत होकर उस देवी के साथ रणभूमि में युद्ध करने लगे; इस प्रकार दोनों पक्षों के भीषण युद्ध में समय बीतने लगा।

श्लोक 40 (shiva.uma.46.40)

अरिवर्गकरक्षिप्ता नानाशस्त्रास्त्रराशयः । महामायाप्रभावेण विफला अभवन् क्षणात्

arivargakarakṣiptā nānāśastrāstrarāśayaḥ mahāmāyāprabhāveṇa viphalā abhavan kṣaṇāt

शत्रु-समूहों के हाथों से फेंके गए नाना शस्त्र-अस्त्रों के समूह महामाया के प्रभाव से क्षणभर में ही निष्फल हो जाते थे।

श्लोक 41 (shiva.uma.46.41)

ततो जघान सा देवी चिक्षुरप्रमुखानरीन् । सगणान्गदया बाणैः शूलशक्तिपरश्वधैः

tato jaghāna sā devī cikṣurapramukhānarīn sagaṇāngadayā bāṇaiḥ śūlaśaktiparaśvadhaiḥ

तब उस देवी ने चिक्षुर आदि शत्रुओं को उनके गणों सहित गदा, बाण, त्रिशूल, शक्ति और परशु से मार डाला।

श्लोक 42 (shiva.uma.46.42)

एवं स्वीयेषु सैन्येषु हतेषु महिषासुरः । देवीनिःश्वाससम्भूतान्भावयामास तान्गणान्

evaṁ svīyeṣu sainyeṣu hateṣu mahiṣāsuraḥ devīniḥśvāsasambhūtānbhāvayāmāsa tāngaṇān

इस प्रकार अपनी सेनाओं के मारे जाने पर महिषासुर ने देवी के निःश्वास से उत्पन्न उन गणों पर ही आक्रमण किया।

श्लोक 43 (shiva.uma.46.43)

अताडयत्खुरैः काश्चित्काश्चिच्छृङ्गद्वयेन च । लाङ्गूलेन च तुण्डेन भिनत्ति स्म मुहुर्मुहुः

atāḍayatkhuraiḥ kāścitkāścicchṛṅgadvayena ca lāṅgūlena ca tuṇḍena bhinatti sma muhurmuhuḥ

वह किन्हीं को अपने खुरों से, किन्हीं को अपने दोनों सींगों से मार डालता, और अपनी पूँछ तथा थूथन से बार-बार उन्हें छिन्न-भिन्न करता रहा।

श्लोक 44 (shiva.uma.46.44)

इत्थं देवीगणान्हत्वाभ्यधावत्सोऽसुराधिपः । सिंहं मारयितुं देव्यास्ततोऽसौ कुपितोऽभवत्

itthaṁ devīgaṇānhatvābhyadhāvatso'surādhipaḥ siṁhaṁ mārayituṁ devyāstato'sau kupito'bhavat

इस प्रकार देवी के गणों को मारकर वह असुराधिपति देवी के सिंह को मार डालने के लिए दौड़ा; तब वह अत्यन्त कुपित हो उठी।

श्लोक 45 (shiva.uma.46.45)

कोपात्सोऽपि महावीर्यः खुरकुट्टितभूतलः । शृङ्गाभ्यां शैलमुत्पाट्य चिक्षेप प्रणनाद च

kopātso'pi mahāvīryaḥ khurakuṭṭitabhūtalaḥ śṛṅgābhyāṁ śailamutpāṭya cikṣepa praṇanāda ca

क्रोध से भरा हुआ, अपने खुरों से पृथ्वी को कुरेदता हुआ वह महाबली [महिष], अपने दोनों सींगों से एक पर्वत उखाड़कर उसे फेंककर गरजने लगा।

श्लोक 46 (shiva.uma.46.46)

वेगेन विष्वग् भ्रमता प्रक्षिप्ता गुरवोऽद्रयः । आकाशतो महीमध्ये निपेतुर्नृपसत्तम

vegena viṣvag bhramatā prakṣiptā guravo'drayaḥ ākāśato mahīmadhye nipeturnṛpasattama

हे नृपसत्तम! वेग से चारों ओर घूमते हुए वे फेंके गए विशाल पर्वत आकाश से पृथ्वी के बीच में गिरने लगे।

श्लोक 47 (shiva.uma.46.47)

शृङ्गभिन्नाः पयोवाहाः खण्डं खण्डमयासिषुः । लाङ्गूलेनाहतश्चाब्धिर्विष्वगुद्वेलमस्पदत्

śṛṅgabhinnāḥ payovāhāḥ khaṇḍaṁ khaṇḍamayāsiṣuḥ lāṅgūlenāhataścābdhirviṣvagudvelamaspadat

सींगों से टूटे हुए बादल टुकड़े-टुकड़े होकर बिखर गए; और उसकी पूँछ की मार से समुद्र चारों ओर उमड़ पड़ा।

श्लोक 48 (shiva.uma.46.48)

एवं क्रुद्धं समालोक्य महिषासुरमम्बिका । विदधे तद्वधोपायं देवानामभयङ्करी

evaṁ kruddhaṁ samālokya mahiṣāsuramambikā vidadhe tadvadhopāyaṁ devānāmabhayaṅkarī

इस प्रकार क्रोधित महिषासुर को देखकर देवताओं को निर्भय करने वाली अम्बिका ने उसके वध का उपाय सोचा।

श्लोक 49 (shiva.uma.46.49)

ततः पाशं समुत्थाप्य क्षिप्त्वा तस्योपरीश्वरी । बबन्ध महिषं सोऽपि रूपं तत्याज माहिषम्

tataḥ pāśaṁ samutthāpya kṣiptvā tasyoparīśvarī babandha mahiṣaṁ so'pi rūpaṁ tatyāja māhiṣam

तब उस ईश्वरी ने पाश उठाकर उसके ऊपर फेंककर महिष को बाँध दिया; उसने भी [तत्काल] महिष-रूप त्याग दिया।

श्लोक 50 (shiva.uma.46.50)

ततः सिंहो बभूवाशु मायावी तच्छिरोऽम्बिका । यावद्भिनत्ति तावत्स खङ्गपाणिर्बभूव ह

tataḥ siṁho babhūvāśu māyāvī tacchiro'mbikā yāvadbhinatti tāvatsa khaṅgapāṇirbabhūva ha

तब वह मायावी शीघ्र ही सिंह बन गया; जब तक अम्बिका उसका सिर काटने को हुई, तब तक वह खड्गधारी पुरुष बन गया।

श्लोक 51 (shiva.uma.46.51)

सचर्मासिकरं तं च देवी बाणैरताडयत् । ततो गजवपुर्भूत्वा सिंहं चिच्छेद शुण्डया

sacarmāsikaraṁ taṁ ca devī bāṇairatāḍayat tato gajavapurbhūtvā siṁhaṁ ciccheda śuṇḍayā

देवी ने ढाल और तलवार धारण किए हुए उस [पुरुष] पर बाणों की वर्षा की; तब वह हाथी का रूप धारण कर अपनी सूँड से सिंह को काटने लगा।

श्लोक 52 (shiva.uma.46.52)

ततोऽस्य च करं देवी चकर्त स्वमहासिना । अधारि च पुना रूपं स्वकीयं तेन रक्षसा

tato'sya ca karaṁ devī cakarta svamahāsinā adhāri ca punā rūpaṁ svakīyaṁ tena rakṣasā

तब देवी ने अपने महान् खड्ग से उसके उस [हाथी के] हाथ को काट डाला; उस राक्षस ने पुनः अपना [महिष] रूप धारण कर लिया।

श्लोक 53 (shiva.uma.46.53)

तदैव क्षोभयामास त्रैलोक्यं सचराचरम् । ततः क्रुद्धा महामाया चण्डिका मानविक्रमा

tadaiva kṣobhayāmāsa trailokyaṁ sacarācaram tataḥ kruddhā mahāmāyā caṇḍikā mānavikramā

उसी क्षण उसने सचराचर तीनों लोकों को क्षुब्ध कर दिया; तब क्रुद्ध हुई मानो अपनी ही मर्यादा में पराक्रम करती वह महामाया चण्डिका —

श्लोक 54 (shiva.uma.46.54)

पपौ पुनः पुनः पानं जहासोद्भ्रान्तलोचना । जगर्ज चासुरः सोऽपि बलवीर्यमदोद्धतः

papau punaḥ punaḥ pānaṁ jahāsodbhrāntalocanā jagarja cāsuraḥ so'pi balavīryamadoddhataḥ

बार-बार मदिरा-पान करने लगी, घूमते नेत्रों से हँसने लगी; और वह असुर भी बल, वीर्य और मद से उन्मत्त होकर गरजने लगा।

श्लोक 55 (shiva.uma.46.55)

तस्या उपरि चिक्षेप शैलानुत्पाट्य सोऽसुरः । सा च बाणावलीघातैश्चूर्णयामास सत्वरम्

tasyā upari cikṣepa śailānutpāṭya so'suraḥ sā ca bāṇāvalīghātaiścūrṇayāmāsa satvaram

उस असुर ने पर्वतों को उखाड़कर उस पर फेंका; और उसने भी अपने बाणों की झड़ी के प्रहारों से उन्हें तत्काल चूर-चूर कर दिया।

श्लोक 56 (shiva.uma.46.56)

वारुणीमदसञ्जातमुखरागाकुलेन्द्रिया । प्रोवाच परमेशानी मेघगम्भीरया गिरा

vāruṇīmadasañjātamukharāgākulendriyā provāca parameśānī meghagambhīrayā girā

मदिरा के नशे से उत्पन्न मुख की लालिमा से व्याकुल इन्द्रियों वाली वह परमेश्वरी मेघ के समान गम्भीर वाणी में बोली —

श्लोक 57 (shiva.uma.46.57)

देव्युवाच । रे मूढ रे हतप्रज्ञ व्यर्थं किं कुरुषे हठम् । न मदग्रेऽसुराः केऽपि स्थास्नवो जगतीत्रये

devyuvāca re mūḍha re hataprajña vyarthaṁ kiṁ kuruṣe haṭham na madagre'surāḥ ke'pi sthāsnavo jagatītraye

देवी ने कहा — "अरे मूर्ख! अरे मन्दबुद्धि! व्यर्थ ही यह हठ क्यों करता है? मेरे सामने तीनों लोकों में कोई भी असुर टिकने वाला नहीं है।"

श्लोक 58 (shiva.uma.46.58)

ऋषि रुवाच । एकमाभाष्य कूर्दित्वा देवी सर्वकलामयी । पदाक्रम्यासुरं कण्ठे शूलेनोग्रेण साभिनत्

ṛṣi ruvāca ekamābhāṣya kūrditvā devī sarvakalāmayī padākramyāsuraṁ kaṇṭhe śūlenogreṇa sābhinat

ऋषि ने कहा — इतना कहकर, कूदकर, समस्त कलाओं से युक्त वह देवी उस असुर पर अपने चरण से उसके कण्ठ पर चढ़कर उग्र त्रिशूल से उसे बींध डाला।

श्लोक 59 (shiva.uma.46.59)

ततस्तच्चरणाक्रान्तः स स्वकीयमुखात्ततः । अर्धनिष्क्रान्त एवासीद्देव्या वीर्येण संवृतः

tatastaccaraṇākrāntaḥ sa svakīyamukhāttataḥ ardhaniṣkrānta evāsīddevyā vīryeṇa saṁvṛtaḥ

तब उसके चरण से दबा हुआ वह [असुर] अपने ही मुख से आधा बाहर निकल आया, फिर भी देवी के पराक्रम से घिरा हुआ था।

श्लोक 60 (shiva.uma.46.60)

अर्धनिष्क्रान्त एवासौ युध्यमानो महाधमः । महासिना शिरो भित्त्वा न्यपाति धरणीतले

ardhaniṣkrānta evāsau yudhyamāno mahādhamaḥ mahāsinā śiro bhittvā nyapāti dharaṇītale

इस प्रकार आधा बाहर निकला हुआ वह महादुष्ट, युद्ध करते हुए ही, अपने महान् खड्ग से सिर काटा जाकर पृथ्वी पर गिर पड़ा।

श्लोक 61 (shiva.uma.46.61)

हा हा शब्दं समुच्चार्यावाङ्मुखास्तद्गणास्ततः । पलायन्त रणाद्भीतास्त्राहि त्राहीति वादिनः

hā hā śabdaṁ samuccāryāvāṅmukhāstadgaṇāstataḥ palāyanta raṇādbhītāstrāhi trāhīti vādinaḥ

तब उसके गणों ने "हा हा" शब्द करते हुए मुख नीचा कर लिया, और युद्ध से भयभीत होकर "त्राहि माम्, त्राहि माम्" पुकारते हुए भाग गए।

श्लोक 62 (shiva.uma.46.62)

तुष्टुवुश्च तदा देवीमिन्द्राद्याः सकलाः सुराः । गन्धर्वा गीतमुच्चेरुर्ननृतुर्नर्तकीजनाः

tuṣṭuvuśca tadā devīmindrādyāḥ sakalāḥ surāḥ gandharvā gītamuccerurnanṛturnartakījanāḥ

तब इन्द्र आदि समस्त देवताओं ने देवी की स्तुति की; गन्धर्वों ने उच्च स्वर में गीत गाए, और अप्सराओं ने नृत्य किया।

श्लोक 63 (shiva.uma.46.63)

एवं ते कथितो राजन्महालक्ष्म्याः समुद्भवः । सरस्वत्यास्तथोत्पत्तिं शृणु सुस्थेन चेतसा

evaṁ te kathito rājanmahālakṣmyāḥ samudbhavaḥ sarasvatyāstathotpattiṁ śṛṇu susthena cetasā

हे राजन्! इस प्रकार मैंने तुम्हें महालक्ष्मी की उत्पत्ति का वर्णन सुनाया; अब सरस्वती की उत्पत्ति को भी स्थिर चित्त से सुनो।

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