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माहेश्वर खण्ड · अध्याय 103

ब्रह्मा की स्तुति और अरुणाचल-रूप में तेजोलिंग की स्थिरता

अध्याय 102अध्याय-सूचीअध्याय 104

श्लोक 1 (skanda.1.103.1)

ब्रह्मोवाच । अथाहमुच्चरन्वेदानशेषैर्वदनैः शिवम् । अस्तौषं भक्तिसंपूर्णं कृत्वा मानसमर्चनम्

brahmovāca athāhamuccaranvedānaśeṣairvadanaiḥ śivam astauṣaṁ bhaktisaṁpūrṇaṁ kṛtvā mānasamarcanam

ब्रह्मा जी ने कहा — तब मैं अपने सभी मुखों से वेदों का उच्चारण करते हुए, भक्ति से परिपूर्ण होकर, मानसिक अर्चना करके शिव की स्तुति करने लगा।

श्लोक 2 (skanda.1.103.2)

नमः शिवाय महते सर्वलोकैकहेतवे । येन प्रकाश्यते सर्वं ध्रियते सततं नमः

namaḥ śivāya mahate sarvalokaikahetave yena prakāśyate sarvaṁ dhriyate satataṁ namaḥ

महान् और समस्त लोकों के एकमात्र कारण शिव को नमस्कार है, जिनके द्वारा सब कुछ प्रकाशित होता है और सदा धारण किया जाता है — उन्हें बारम्बार नमस्कार है।

श्लोक 3 (skanda.1.103.3)

विश्वव्याप्तमिदं तेजः प्रकाशयति संततम् । नेक्षंते त्वद्दयाहीना जात्यंधा भास्करं यथा

viśvavyāptamidaṁ tejaḥ prakāśayati saṁtatam nekṣaṁte tvaddayāhīnā jātyaṁdhā bhāskaraṁ yathā

विश्व में व्याप्त यह तेज निरन्तर प्रकाश करता रहता है; परन्तु तुम्हारी दया से रहित, जन्मान्ध जन उसे नहीं देख पाते, जैसे वे सूर्य को नहीं देख पाते।

श्लोक 4 (skanda.1.103.4)

भूलिंगममलं ह्येतद्दृश्यमध्यात्मचक्षुषा । अंतस्स्थं वा बहिस्स्थं वा त्वद्भक्तैरनुभूयते

bhūliṁgamamalaṁ hyetaddṛśyamadhyātmacakṣuṣā aṁtassthaṁ vā bahissthaṁ vā tvadbhaktairanubhūyate

यह निर्मल भू-लिंग अध्यात्म-दृष्टि से ही देखा जा सकता है; तुम्हारे भक्त इसे भीतर स्थित या बाहर स्थित, दोनों ही रूपों में अनुभव करते हैं।

श्लोक 5 (skanda.1.103.5)

अपरिच्छेद्यमाकारमंतरात्मनि योगिनः । तदेतत्तव देवेश ज्वलितं दर्पणो यथा

aparicchedyamākāramaṁtarātmani yoginaḥ tadetattava deveśa jvalitaṁ darpaṇo yathā

हे देवेश! योगी के अन्तरात्मा में यह अनिर्वचनीय आकार, दर्पण में प्रज्वलित प्रतिबिम्ब के समान, तुम्हारा ही रूप है।

श्लोक 6 (skanda.1.103.6)

अथवा शांकरी शक्तिः सत्याऽणोरप्यणीयसी । मत्तो नान्यतरः कश्चिद्यन्मय्यपि विलीयते

athavā śāṁkarī śaktiḥ satyā'ṇorapyaṇīyasī matto nānyataraḥ kaścidyanmayyapi vilīyate

अथवा वह शांकरी शक्ति है, जो सत्य होते हुए भी परमाणु से भी सूक्ष्मतर है; मुझसे भिन्न कोई भी नहीं जो अन्ततः मुझमें ही विलीन न हो जाए।

श्लोक 7 (skanda.1.103.7)

अणुस्ते करुणापात्रं महत्त्वं ध्रुवमश्नुते । नाधिकोऽस्ति परस्त्वत्तो न मत्तोऽपि तदाश्रयात्

aṇuste karuṇāpātraṁ mahattvaṁ dhruvamaśnute nādhiko'sti parastvatto na matto'pi tadāśrayāt

तुम्हारी करुणा का पात्र बना हुआ अणु भी निश्चय ही महत्ता को प्राप्त करता है; तुमसे बढ़कर कोई श्रेष्ठ नहीं, और उस आश्रय के बिना मुझसे बढ़कर भी कोई नहीं।

श्लोक 8 (skanda.1.103.8)

त्वय्यर्पितं मनस्त्वतो न वियोगमपेक्षते । वाचः कथं प्रवृत्तिः स्यात्तव वैभवकीर्त्तने

tvayyarpitaṁ manastvato na viyogamapekṣate vācaḥ kathaṁ pravṛttiḥ syāttava vaibhavakīrttane

तुम्हें अर्पित मन तुमसे कभी वियोग की अपेक्षा नहीं करता; फिर तुम्हारे वैभव का कीर्तन करने में वाणी की प्रवृत्ति भला कैसे हो सकती है?

श्लोक 9 (skanda.1.103.9)

स्वयमीश महादेव प्रसीद भुवनाधिक । आदिश प्रयतं भक्तमपेक्षितनियुक्तिषु

svayamīśa mahādeva prasīda bhuvanādhika ādiśa prayataṁ bhaktamapekṣitaniyuktiṣu

हे स्वयं ईश्वर! हे महादेव! हे भुवनाधिक! प्रसन्न होइए, और अपने विनम्र भक्त को अपेक्षित नियुक्तियों में आदेश दीजिए।

श्लोक 10 (skanda.1.103.10)

इदं विज्ञाप्य विनयान्नमस्कृत्वा पुनःपुनः । प्रांजलिर्देवदेवेशं न्यषीदं सविधे विभो

idaṁ vijñāpya vinayānnamaskṛtvā punaḥpunaḥ prāṁjalirdevadeveśaṁ nyaṣīdaṁ savidhe vibho

यह निवेदन करके, विनयपूर्वक बारम्बार नमस्कार करके, हे विभो! मैं हाथ जोड़कर देवाधिदेव के समीप ही बैठ गया।

श्लोक 11 (skanda.1.103.11)

अथ विष्णुर्नवांभोदगंभीरध्वनिरभ्यधात् । वाचः कृतार्थन्भूयः शुक्लाः शंकरकीर्त्तनैः

atha viṣṇurnavāṁbhodagaṁbhīradhvanirabhyadhāt vācaḥ kṛtārthanbhūyaḥ śuklāḥ śaṁkarakīrttanaiḥ

तब नवीन मेघ के समान गम्भीर स्वर वाले विष्णु बोले, उनकी वाणी शंकर के कीर्तन से पहले ही शुद्ध और सफल हो चुकी थी।

श्लोक 12 (skanda.1.103.12)

जय त्रिभुवनाधीश जय गंगाधर प्रभो । जय नाथ विरूपाक्ष जय चंद्रार्द्धशेखर

jaya tribhuvanādhīśa jaya gaṁgādhara prabho jaya nātha virūpākṣa jaya caṁdrārddhaśekhara

जय हो त्रिभुवनाधीश! जय हो हे प्रभु गंगाधर! जय हो हे नाथ विरूपाक्ष! जय हो हे अर्ध-चन्द्रशेखर!

श्लोक 13 (skanda.1.103.13)

अव्याजममितं शंभो कारुण्यं तव वर्द्धते । येन निर्धूतमखिलं भक्तेषु ज्ञानमाहितम्

avyājamamitaṁ śaṁbho kāruṇyaṁ tava varddhate yena nirdhūtamakhilaṁ bhakteṣu jñānamāhitam

हे शम्भो! तुम्हारी निष्कपट, असीम करुणा सदा बढ़ती रहती है, जिसके द्वारा भक्तों में समस्त ज्ञान निर्मल होकर स्थापित हो जाता है।

श्लोक 14 (skanda.1.103.14)

पालनं सर्वविद्यानां प्रापणं भूतिसंचयैः । पुराणं च सपुत्राणां पितुरेव प्रवर्धनम्

pālanaṁ sarvavidyānāṁ prāpaṇaṁ bhūtisaṁcayaiḥ purāṇaṁ ca saputrāṇāṁ pitureva pravardhanam

समस्त विद्याओं का पालन, ऐश्वर्य-संचय की प्राप्ति, और पुत्रों सहित पितामह की भाँति निरन्तर वृद्धि — यह सब तुम्हीं से है।

श्लोक 15 (skanda.1.103.15)

शतानामपि मूर्तीनामेकामपि नवैः स्तवैः । स्तोतुं न शक्नुमेशान समवायस्तु कि पुनः

śatānāmapi mūrtīnāmekāmapi navaiḥ stavaiḥ stotuṁ na śaknumeśāna samavāyastu ki punaḥ

हे ईशान! तुम्हारे सैकड़ों रूपों में से एक की भी नयी-नयी स्तुतियों से मैं स्तुति नहीं कर सकता, फिर उन सबके समुदाय की तो बात ही क्या!

श्लोक 16 (skanda.1.103.16)

त्वमेव त्वामलं वेत्तुं यदि वा त्वत्प्रसादतः । भ्रमरः कीटमाकृष्य स्वात्मानं किं न चानयेत्

tvameva tvāmalaṁ vettuṁ yadi vā tvatprasādataḥ bhramaraḥ kīṭamākṛṣya svātmānaṁ kiṁ na cānayet

तुम्हें पूर्ण रूप से जानने में तुम स्वयं ही समर्थ हो, अथवा तुम्हारी कृपा से ही कोई जान सकता है; क्या भ्रमर कीड़े को आकृष्ट करके अपने ही स्वरूप में नहीं ले आता?

श्लोक 17 (skanda.1.103.17)

देवास्त्वदंशसंभूतिप्रभवो न भवन्ति किम् । अप्यायस्याग्निकीलस्य दाहे शक्तिर्न किं भवेत्

devāstvadaṁśasaṁbhūtiprabhavo na bhavanti kim apyāyasyāgnikīlasya dāhe śaktirna kiṁ bhavet

क्या देवगण तुम्हारे ही अंश से उत्पन्न होकर प्रभावशाली नहीं होते? क्या अग्नि की एक चिनगारी में भी जलाने की शक्ति नहीं होती?

श्लोक 18 (skanda.1.103.18)

देशकालक्रियायोगाद्यथाग्नेर्भेदसम्भवः । तथा विषयभेदेन त्वमेकोऽपि विभिद्यसे

deśakālakriyāyogādyathāgnerbhedasambhavaḥ tathā viṣayabhedena tvameko'pi vibhidyase

जैसे देश, काल और क्रिया के संयोग से अग्नि में भेद उत्पन्न हो जाता है, वैसे ही विषय-भेद के कारण तुम एक होते हुए भी अनेक रूपों में विभक्त प्रतीत होते हो।

श्लोक 19 (skanda.1.103.19)

अनुग्रहपरो देव मूर्तिं दर्शय शंकर । आवयोरखिलाधार नयनानंददायिनीम्

anugrahaparo deva mūrtiṁ darśaya śaṁkara āvayorakhilādhāra nayanānaṁdadāyinīm

हे देव! हे समस्त आधार शंकर! अनुग्रह-परायण होकर हम दोनों को नेत्रों को आनन्द देने वाली अपनी मूर्ति दिखाइए।

श्लोक 20 (skanda.1.103.20)

एवं प्रणमतोर्देवः श्रद्धाभक्तिसमन्वितम् । प्रससाद परं शंभुः स्तुवतोरावयोर्द्वयोः

evaṁ praṇamatordevaḥ śraddhābhaktisamanvitam prasasāda paraṁ śaṁbhuḥ stuvatorāvayordvayoḥ

इस प्रकार श्रद्धा-भक्ति से युक्त होकर प्रणाम करते हुए और स्तुति करते हुए हम दोनों पर देव शम्भु अत्यन्त प्रसन्न हुए।

श्लोक 21 (skanda.1.103.21)

तेजःस्तंभात्पुनस्तस्माद्देवश्चन्द्रार्द्धशेखरः । आविर्बभूव पुरुषः कपिलः कालकन्धरः

tejaḥstaṁbhātpunastasmāddevaścandrārddhaśekharaḥ āvirbabhūva puruṣaḥ kapilaḥ kālakandharaḥ

तब उसी तेज-स्तम्भ से अर्ध-चन्द्रशेखर देव पुनः एक पुरुष के रूप में प्रकट हुए — पिंगल वर्ण वाले, नीले कण्ठ वाले।

श्लोक 22 (skanda.1.103.22)

परशुं बालहरिणं करैरभयविश्रमौ । दधानः पुरुषोऽवादीत्पुत्रावावामिति प्रभुः

paraśuṁ bālahariṇaṁ karairabhayaviśramau dadhānaḥ puruṣo'vādītputrāvāvāmiti prabhuḥ

अपने हाथों में परशु और एक शावक मृग धारण किए, अभय और वरद मुद्राओं से युक्त उन प्रभु पुरुष ने कहा — तुम दोनों मेरे पुत्र हो।

श्लोक 23 (skanda.1.103.23)

परितुष्टोऽस्मि युवयोर्भक्त्या युक्तात्मनोर्मयि । भवतं सर्वलोकानां सृष्टिरक्षाधिपौ युवाम्

parituṣṭo'smi yuvayorbhaktyā yuktātmanormayi bhavataṁ sarvalokānāṁ sṛṣṭirakṣādhipau yuvām

मैं तुम दोनों की भक्ति-युक्त, मुझमें एकाग्र आत्माओं से अत्यन्त सन्तुष्ट हूँ; तुम दोनों समस्त लोकों की सृष्टि और रक्षा के अधिपति हो।

श्लोक 24 (skanda.1.103.24)

युवयोरिष्टसिद्ध्यर्थमाविर्भूतोऽस्म्यहं यतः । वरं वृणुतमन्यं च वरदोऽहमुपागतः

yuvayoriṣṭasiddhyarthamāvirbhūto'smyahaṁ yataḥ varaṁ vṛṇutamanyaṁ ca varado'hamupāgataḥ

तुम दोनों के अभीष्ट की सिद्धि के लिए ही मैं यहाँ प्रकट हुआ हूँ; अतः वर माँगो — मैं वर देने के लिए ही यहाँ आया हूँ।

श्लोक 25 (skanda.1.103.25)

इति देवस्य वचनात्सप्रीतौ च कृतांजली । विज्ञापयामासिवतौ स्वं स्वमर्थं पृथक्पृथक्

iti devasya vacanātsaprītau ca kṛtāṁjalī vijñāpayāmāsivatau svaṁ svamarthaṁ pṛthakpṛthak

देव के इन वचनों को सुनकर हम दोनों प्रसन्नतापूर्वक हाथ जोड़कर, अपना-अपना प्रयोजन अलग-अलग निवेदन करने लगे।

श्लोक 26 (skanda.1.103.26)

अहं मन्त्रैः शिशुप्रायजगत्त्रयविधायकः । संस्तुवन्वैदिकैर्मंत्रैरीशानमपराजितम्

ahaṁ mantraiḥ śiśuprāyajagattrayavidhāyakaḥ saṁstuvanvaidikairmaṁtrairīśānamaparājitam

मैं, जो मन्त्रों द्वारा शिशु के समान तीनों लोकों की रचना करने वाला हूँ, वैदिक मन्त्रों से अपराजित ईशान की स्तुति करते हुए बोला।

श्लोक 27 (skanda.1.103.27)

नमस्येहमिदं रूपं शश्वद्वरदमीश्वरम् । तेजोमयं महादेवं योगिध्येयं निरंजनम्

namasyehamidaṁ rūpaṁ śaśvadvaradamīśvaram tejomayaṁ mahādevaṁ yogidhyeyaṁ niraṁjanam

मैं इस सदा वर देने वाले ईश्वर-रूप को नमस्कार करता हूँ, इस तेजोमय, योगियों के ध्येय, निरंजन महादेव को।

श्लोक 28 (skanda.1.103.28)

आपूर्यमाणं भवता तेजसा गगनांतरम् । परिपृच्छ्यः सुरावासः क्षणाद्देव भविष्यति

āpūryamāṇaṁ bhavatā tejasā gaganāṁtaram paripṛcchyaḥ surāvāsaḥ kṣaṇāddeva bhaviṣyati

हे देव! तुम्हारे तेज से यह सम्पूर्ण आकाश भरता जा रहा है; इससे देवताओं का निवास-स्थान क्षण भर में ही असुरक्षित हो जाएगा।

श्लोक 29 (skanda.1.103.29)

सिद्धचारणगन्धर्वा देवाश्च परमर्षयः । नावसन्दिवि संचारं लभेरंस्तेजसा तव

siddhacāraṇagandharvā devāśca paramarṣayaḥ nāvasandivi saṁcāraṁ labheraṁstejasā tava

सिद्ध, चारण, गन्धर्व, देवगण और परम ऋषि — तुम्हारे तेज के कारण वे स्वर्ग में विचरण करने की क्षमता ही नहीं पा सकेंगे।

श्लोक 30 (skanda.1.103.30)

पृथ्वी च सकला चैव तप्यमाना तवौजसा । चराचरसमुत्पत्तिक्षमा नैव भविप्यति

pṛthvī ca sakalā caiva tapyamānā tavaujasā carācarasamutpattikṣamā naiva bhavipyati

और तुम्हारे तेज से सन्तप्त होती हुई यह सम्पूर्ण पृथ्वी भी चराचर प्राणियों को उत्पन्न करने में समर्थ नहीं रह जाएगी।

श्लोक 31 (skanda.1.103.31)

उपसंहृत्य तेजः स्वमरुणाचलसंज्ञया । भव स्थावरलिंगं त्वं लोकानुग्रहकारणात्

upasaṁhṛtya tejaḥ svamaruṇācalasaṁjñayā bhava sthāvaraliṁgaṁ tvaṁ lokānugrahakāraṇāt

अतः अपने तेज को समेटकर, अरुणाचल नाम से, लोकों के अनुग्रह के लिए तुम स्वयं स्थावर लिंग बन जाओ।

श्लोक 32 (skanda.1.103.32)

ज्योतिर्मयमिदं रूपमरुणाचलसंज्ञितम् । ये नमन्ति नरा भक्त्या ते भवन्त्यमराधिकाः

jyotirmayamidaṁ rūpamaruṇācalasaṁjñitam ye namanti narā bhaktyā te bhavantyamarādhikāḥ

अरुणाचल नाम से प्रसिद्ध यह ज्योतिर्मय रूप — जो मनुष्य इसे भक्ति से नमस्कार करते हैं, वे देवताओं से भी बढ़कर हो जाते हैं।

श्लोक 33 (skanda.1.103.33)

सेवंतां सकला लोकाः सिद्धाश्च परमर्षयः । गणाश्च विविधा भूमौ मानुषं भावमास्थिताः

sevaṁtāṁ sakalā lokāḥ siddhāśca paramarṣayaḥ gaṇāśca vividhā bhūmau mānuṣaṁ bhāvamāsthitāḥ

समस्त लोक, सिद्धगण और परम ऋषि इसकी सेवा करें, और भूमि पर मानव-रूप में स्थित विविध गणदेवता भी इसकी सेवा करें।

श्लोक 34 (skanda.1.103.34)

दिव्याराम समुद्भूतकल्पकाद्याः सुरद्रुमाः । सेविनस्त्वां प्ररोहंतु भरिता विविधैः फलैः

divyārāma samudbhūtakalpakādyāḥ suradrumāḥ sevinastvāṁ prarohaṁtu bharitā vividhaiḥ phalaiḥ

इसके दिव्य उद्यान में उत्पन्न कल्पवृक्ष आदि दिव्य वृक्ष तुम्हारी सेवा करते हुए विविध फलों से लदकर फलें-फूलें।

श्लोक 35 (skanda.1.103.35)

दिव्यौषधिगणास्सर्वे सिंहाद्या मृगजातयः । प्रशांताः परिवर्त्तंता पापकल्मषनाशनम्

divyauṣadhigaṇāssarve siṁhādyā mṛgajātayaḥ praśāṁtāḥ parivarttaṁtā pāpakalmaṣanāśanam

समस्त दिव्य औषधियों के समूह और सिंह आदि मृग-जातियाँ, शान्त होकर, पाप और कल्मष का नाश करने वाले इस स्थान में विचरण करें।

श्लोक 36 (skanda.1.103.36)

अयनद्वयभिन्नेन गमनेनापि संयुतः । न लंघयिष्यति रविः शृंगं लिंगतनोस्तव

ayanadvayabhinnena gamanenāpi saṁyutaḥ na laṁghayiṣyati raviḥ śṛṁgaṁ liṁgatanostava

दोनों अयनों में भिन्न-भिन्न मार्गों से गमन करता हुआ भी सूर्य, तुम्हारे लिंग-शरीर के शिखर का उल्लंघन कभी नहीं करेगा।

श्लोक 37 (skanda.1.103.37)

दिव्य दुंदुभिशंखानां घोषैः पुष्पौघवृष्टिभिः । सेवितो भव देव त्वमप्सरोनृत्यगीतिभिः

divya duṁdubhiśaṁkhānāṁ ghoṣaiḥ puṣpaughavṛṣṭibhiḥ sevito bhava deva tvamapsaronṛtyagītibhiḥ

हे देव! तुम दिव्य दुन्दुभि और शंखों की ध्वनियों से, पुष्पों की वर्षा से, और अप्सराओं के नृत्य-गीतों से सेवित होओ।

श्लोक 38 (skanda.1.103.38)

अमरत्वं च सिद्धत्वं रससिद्धीश्च निर्वृतिम् । लभंतां मानुषा नित्यं त्वत्संनिधिमुपागताः

amaratvaṁ ca siddhatvaṁ rasasiddhīśca nirvṛtim labhaṁtāṁ mānuṣā nityaṁ tvatsaṁnidhimupāgatāḥ

तुम्हारी समीपता को प्राप्त करने वाले मनुष्य सदा अमरत्व, सिद्धत्व, रस-सिद्धि और मोक्ष-सुख को प्राप्त करें।

श्लोक 39 (skanda.1.103.39)

ईशत्वं च वशित्वं च सौभाग्यं कालवंचनम् । त्वामाश्रित्य नरास्सर्वे लभंतामरुणाचल

īśatvaṁ ca vaśitvaṁ ca saubhāgyaṁ kālavaṁcanam tvāmāśritya narāssarve labhaṁtāmaruṇācala

हे अरुणाचल! तुम्हारा आश्रय लेकर सभी मनुष्य ईशत्व, वशित्व, सौभाग्य और काल पर विजय प्राप्त करें।

श्लोक 40 (skanda.1.103.40)

सर्वावयवदानेन सर्वव्याधिविनाशनात् । सर्वाभीष्टप्रदानेन दृश्यो भव महीतले

sarvāvayavadānena sarvavyādhivināśanāt sarvābhīṣṭapradānena dṛśyo bhava mahītale

अपने समस्त अंगों को प्रकट करने से, सम्पूर्ण व्याधियों का नाश करने से, और सम्पूर्ण अभीष्टों को प्रदान करने से, तुम इस पृथ्वी पर सबको दृश्य होओ।

श्लोक 41 (skanda.1.103.41)

तथेति वरदं देवमरुणाद्रिपतिं शिवम् । प्रणम्य कमलानाथः प्रार्थयन्निदमब्रवीत्

tatheti varadaṁ devamaruṇādripatiṁ śivam praṇamya kamalānāthaḥ prārthayannidamabravīt

'तथास्तु' कहने वाले वरद देव, अरुणाद्रि के स्वामी शिव को प्रणाम करके, कमला के स्वामी विष्णु ने प्रार्थना करते हुए यह कहा।

श्लोक 42 (skanda.1.103.42)

प्रसीद करुणापूर्ण शोणशैलेश्वर प्रभो । महेश सर्वलोकानां हिताय प्रकटोदय

prasīda karuṇāpūrṇa śoṇaśaileśvara prabho maheśa sarvalokānāṁ hitāya prakaṭodaya

हे करुणापूर्ण प्रभु! हे शोणशैलेश्वर! प्रसन्न होइए; हे महेश! समस्त लोकों के हित के लिए प्रकट होइए।

श्लोक 43 (skanda.1.103.43)

यदाहं त्वामुपाश्रित्य जगद्रक्षणदक्षिणः । श्रीपतित्वमनुप्राप्तस्तदा भक्ता भवंतु ते

yadāhaṁ tvāmupāśritya jagadrakṣaṇadakṣiṇaḥ śrīpatitvamanuprāptastadā bhaktā bhavaṁtu te

जब मैं तुम्हारा आश्रय लेकर जगत् की रक्षा में दक्ष होकर श्रीपतित्व को प्राप्त हुआ हूँ, तब तुम्हारे भक्त भी मेरे भक्त बनें।

श्लोक 44 (skanda.1.103.44)

नाल्पपुण्यैरुपास्येत त्वद्रूपं महदद्भुतम् । मया च ब्रह्मणा चैवमदृष्टपदशेखरः

nālpapuṇyairupāsyeta tvadrūpaṁ mahadadbhutam mayā ca brahmaṇā caivamadṛṣṭapadaśekharaḥ

अल्प पुण्य वाले लोग तुम्हारे इस महान् और अद्भुत रूप की उपासना नहीं कर सकते, जिसका शिखर-पद मुझसे और ब्रह्मा से भी अद्रष्ट रहा।

श्लोक 45 (skanda.1.103.45)

प्रदक्षिणानमस्कारैर्नृत्यगीतैश्च पूजनैः । त्वामर्चयंति ये मर्त्याः कृतार्थास्ते गतांहसः

pradakṣiṇānamaskārairnṛtyagītaiśca pūjanaiḥ tvāmarcayaṁti ye martyāḥ kṛtārthāste gatāṁhasaḥ

जो मनुष्य प्रदक्षिणा, नमस्कार, नृत्य-गान और पूजन से तुम्हारी अर्चना करते हैं, वे कृतार्थ होकर पापों से मुक्त हो जाते हैं।

श्लोक 46 (skanda.1.103.46)

उपवासैर्व्रतैः सत्रैरुपहारैस्तथार्चनैः । त्वामर्चयंति मनुजाः सार्वभौमा भवंतु ते

upavāsairvrataiḥ satrairupahāraistathārcanaiḥ tvāmarcayaṁti manujāḥ sārvabhaumā bhavaṁtu te

जो मनुष्य उपवास, व्रत, सत्र, उपहार और अर्चना से तुम्हारी पूजा करते हैं, वे इस पृथ्वी के सम्राट् बन जाएँ।

श्लोक 47 (skanda.1.103.47)

आरामं मंडपं चापि कूपं विधिविशोधनम् । कुर्वतामरुणाद्रीश संनिधाने पुनर्भव

ārāmaṁ maṁḍapaṁ cāpi kūpaṁ vidhiviśodhanam kurvatāmaruṇādrīśa saṁnidhāne punarbhava

हे अरुणाद्रीश! जो लोग उद्यान, मण्डप और विधिवत् शुद्ध किया हुआ कूप बनवाते हैं, उन्हें अपनी समीपता में पुनः स्थान दो।

श्लोक 48 (skanda.1.103.48)

अंगप्रदक्षिणं कुर्वन्नष्टैश्वर्यसमन्वितः । अशेषपातकैः सद्यो विमुक्तो निर्मलाशयः

aṁgapradakṣiṇaṁ kurvannaṣṭaiśvaryasamanvitaḥ aśeṣapātakaiḥ sadyo vimukto nirmalāśayaḥ

जो तुम्हारे शरीर की प्रदक्षिणा करता है, वह आठों ऐश्वर्यों से युक्त होकर, सम्पूर्ण पापों से तत्काल मुक्त, निर्मल हृदय वाला हो जाता है।

श्लोक 49 (skanda.1.103.49)

आवामप्यविमुंचंतौ सदा त्वत्पादपंकजम् । ध्यातव्यं मनुजैः सर्वैस्तव संनिधिमागतैः

āvāmapyavimuṁcaṁtau sadā tvatpādapaṁkajam dhyātavyaṁ manujaiḥ sarvaistava saṁnidhimāgataiḥ

हम दोनों भी सदा तुम्हारे चरण-कमल को न छोड़ते हुए, वहाँ आने वाले समस्त मनुष्यों द्वारा ध्यान किए जाने योग्य बने रहें।

श्लोक 50 (skanda.1.103.50)

तथास्त्विति वरं दत्त्वा विष्णवे चंद्रशेखरः । भरुणाचलरूपेण प्राप्तः स्थावरलिंगताम्

tathāstviti varaṁ dattvā viṣṇave caṁdraśekharaḥ bharuṇācalarūpeṇa prāptaḥ sthāvaraliṁgatām

'तथास्तु' कहकर विष्णु को यह वर देकर, चन्द्रशेखर शिव अरुणाचल-रूप में स्थावर-लिंगता को प्राप्त हुए।

श्लोक 51 (skanda.1.103.51)

तैजसं लिंगमेतद्धि सर्वलोकैककारणम् । अरुणाद्रिरिति ख्यातं दृश्यते वसुधातले

taijasaṁ liṁgametaddhi sarvalokaikakāraṇam aruṇādririti khyātaṁ dṛśyate vasudhātale

यह तैजस लिंग, जो समस्त लोकों का एकमात्र कारण है, अरुणाद्रि के नाम से प्रसिद्ध होकर इस पृथ्वी पर दिखाई देता है।

श्लोक 52 (skanda.1.103.52)

युगांतसमये क्षुब्धैश्चतुर्भिरपि सागरैः । अपि निर्मग्नलोकांतैरस्पृष्टांतिकभूतलम्

yugāṁtasamaye kṣubdhaiścaturbhirapi sāgaraiḥ api nirmagnalokāṁtairaspṛṣṭāṁtikabhūtalam

युगान्त के समय क्षुब्ध हुए चारों समुद्रों के जल से भी, जो समस्त लोकों को डुबो देता है, इसका निकटवर्ती धरातल तक भी स्पर्श नहीं हो पाया।

श्लोक 53 (skanda.1.103.53)

गजप्रमाणैः पृषतैः पूरयंतो जगत्त्रयम् । पुष्कराद्या महामेघा विश्रांता यस्य सानुनि

gajapramāṇaiḥ pṛṣataiḥ pūrayaṁto jagattrayam puṣkarādyā mahāmeghā viśrāṁtā yasya sānuni

हाथी के समान बड़ी बूँदों से तीनों लोकों को भर देने वाले पुष्कर आदि महान् मेघ भी जिसके शिखरों पर ही विश्राम पाते हैं।

श्लोक 54 (skanda.1.103.54)

प्रवृत्ते भूतसंहारे प्रकृतौ प्रतिसंचरे । भविष्यत्सर्वबीजानि निषेदुर्यत्र निश्चयम्

pravṛtte bhūtasaṁhāre prakṛtau pratisaṁcare bhaviṣyatsarvabījāni niṣeduryatra niścayam

जब भूत-संहार और प्रकृति का प्रतिसंचार (प्रलय) प्रवृत्त होता है, तब आगामी सृष्टि के समस्त बीज निश्चय ही इसी पर आकर टिकते हैं।

श्लोक 55 (skanda.1.103.55)

मया चाहूयमानेभ्यः प्रलयानंतरं पुनः । यत्पादसेविविप्रेभ्यो वेदाध्ययनसंग्रहः

mayā cāhūyamānebhyaḥ pralayānaṁtaraṁ punaḥ yatpādaseviviprebhyo vedādhyayanasaṁgrahaḥ

प्रलय के पश्चात् जब मैं उन्हें पुनः बुलाता हूँ, तो इसी के चरणों की सेवा करने वाले ब्राह्मणों से ही वेदाध्ययन का संग्रह पुनः प्राप्त होता है।

श्लोक 56 (skanda.1.103.56)

सर्वासामपि विद्यानां कलानां शास्त्रसंपदाम् । आगमानां च वेदानां यत्र सत्यव्यवस्थितिः

sarvāsāmapi vidyānāṁ kalānāṁ śāstrasaṁpadām āgamānāṁ ca vedānāṁ yatra satyavyavasthitiḥ

समस्त विद्याओं, कलाओं, शास्त्र-सम्पदाओं, आगमों और वेदों की सत्य-व्यवस्था भी इसी स्थान पर स्थित है।

श्लोक 57 (skanda.1.103.57)

यद्गुहागह्वरांतस्स्था मुनयः शंसितव्रताः । जटिनः संप्रकाशंते कोटिसूर्याग्नितेजसः

yadguhāgahvarāṁtassthā munayaḥ śaṁsitavratāḥ jaṭinaḥ saṁprakāśaṁte koṭisūryāgnitejasaḥ

जिसकी गुफाओं और कन्दराओं के भीतर स्थित, शंसित-व्रत वाले जटाधारी मुनि करोड़ों सूर्यों की अग्नि के समान तेजस्वी होकर प्रकाशित होते हैं।

श्लोक 58 (skanda.1.103.58)

पंचब्रह्ममयैर्मंत्रैः पंचाक्षरवपुर्धरैः । अकारपीठिकारूढो नादात्मा यः सदाशिवः

paṁcabrahmamayairmaṁtraiḥ paṁcākṣaravapurdharaiḥ akārapīṭhikārūḍho nādātmā yaḥ sadāśivaḥ

पंचब्रह्म-मय मन्त्रों से, पंचाक्षर-रूप शरीर धारण करने वाले, अकार की पीठिका पर आरूढ़, नाद-स्वरूप सदाशिव जिसमें विराजते हैं।

श्लोक 59 (skanda.1.103.59)

अष्टभिश्च सदा लिंगैरष्टदिक्पालपूजितः । अष्टमूर्त्तितया योऽयमष्टसिद्धिप्रदायकः

aṣṭabhiśca sadā liṁgairaṣṭadikpālapūjitaḥ aṣṭamūrttitayā yo'yamaṣṭasiddhipradāyakaḥ

जो सदा आठ लिंगों से युक्त, आठों दिक्पालों द्वारा पूजित, अष्ट-मूर्ति के रूप में अष्ट-सिद्धियों का प्रदाता है।

श्लोक 60 (skanda.1.103.60)

यत्र सिद्धास्तथा लोकान्स्वान्स्वान्मुक्त्वा सुरेश्वराः । अपेक्षंते स्थिता मुक्तिं विहाय कनकाचलम्

yatra siddhāstathā lokānsvānsvānmuktvā sureśvarāḥ apekṣaṁte sthitā muktiṁ vihāya kanakācalam

जहाँ सिद्धगण तथा देवेश्वर अपने-अपने लोकों को छोड़कर, सुवर्ण-पर्वत को छोड़े बिना, वहीं स्थित रहकर मुक्ति की अपेक्षा करते हैं।

श्लोक 61 (skanda.1.103.61)

एवं वसुंधरापुण्यपरिपाकसमुच्चयः । अरुणाद्रिरिति ख्यातो भक्तभक्तिवरप्रदः

evaṁ vasuṁdharāpuṇyaparipākasamuccayaḥ aruṇādririti khyāto bhaktabhaktivarapradaḥ

इस प्रकार यह पृथ्वी के पुण्य के परिपाक का सम्पूर्ण संचय, भक्तों को भक्ति-रूपी वर देने वाला, अरुणाद्रि के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

श्लोक 62 (skanda.1.103.62)

कैलासान्मेरुशिखरादागतैर्देवसंचयैः । पूज्यते शोणशैलात्मा शंभुः सर्ववरप्रदः

kailāsānmeruśikharādāgatairdevasaṁcayaiḥ pūjyate śoṇaśailātmā śaṁbhuḥ sarvavarapradaḥ

कैलास और मेरु के शिखर से आए हुए देव-समूहों द्वारा, सर्व-वरप्रद, शोणशैल-स्वरूप शम्भु की पूजा की जाती है।

श्लोक 63 (skanda.1.103.63)

इति कमलजवक्त्रपद्मजां तं मुदितमनाः सनको निशम्य भक्त्या । विरचितविनयः प्रणम्य पुत्रः पितरमपृच्छदशेषवेदसारम्

iti kamalajavaktrapadmajāṁ taṁ muditamanāḥ sanako niśamya bhaktyā viracitavinayaḥ praṇamya putraḥ pitaramapṛcchadaśeṣavedasāram

इस प्रकार कमल से उत्पन्न (ब्रह्मा) के मुख-कमल से निकली यह कथा सुनकर, प्रसन्न-मन सनक जी ने भक्तिपूर्वक विनयपूर्वक प्रणाम करके पिता से समस्त वेदों के सार के विषय में पूछा।

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