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माहेश्वर खण्ड · अध्याय 114

शिव द्वारा अरुणाचल की सर्वश्रेष्ठता का वरदान

अध्याय 113अध्याय-सूचीअध्याय 115

श्लोक 1 (skanda.1.114.1)

ब्रह्मोवाच । अथ गौरी पुरारातिं प्रणम्य जगदंबिका । अयाचत्तादृशा शंभुमविनाभावमात्मनः

brahmovāca atha gaurī purārātiṁ praṇamya jagadaṁbikā ayācattādṛśā śaṁbhumavinābhāvamātmanaḥ

ब्रह्मा जी ने कहा — तब त्रिपुरारि को प्रणाम करके, जगदम्बिका गौरी ने अपने ही साथ शम्भु की अभिन्नता माँगी।

श्लोक 2 (skanda.1.114.2)

इदं विज्ञापयामास लोकानुग्रहकारणात् । कृपया परया पूर्णा गौरी संवादसुंदरी

idaṁ vijñāpayāmāsa lokānugrahakāraṇāt kṛpayā parayā pūrṇā gaurī saṁvādasuṁdarī

लोकों के अनुग्रह के कारण, परम कृपा से भरी, संवाद में सुन्दर गौरी ने यह निवेदन किया।

श्लोक 3 (skanda.1.114.3)

न त्याज्यमेतत्ते रूपमत्र दृष्टिमनोहरम् । अहं त्वया न च त्याज्या सापराधापि सर्वदा । मनोहरमिदं रूपमेतत्ते लोकमंगलम्

na tyājyametatte rūpamatra dṛṣṭimanoharam ahaṁ tvayā na ca tyājyā sāparādhāpi sarvadā manoharamidaṁ rūpametatte lokamaṁgalam

तुम्हारा यह दृष्टि को मोहित करने वाला रूप यहाँ त्याज्य नहीं है; और मैं भी अपराध करने पर भी तुम्हारे द्वारा सदा त्याज्य नहीं हूँ — यह मनोहर, लोक-मंगलकारी रूप —

श्लोक 4 (skanda.1.114.4)

आलोक्यतां सदा सर्वैर्दिव्यगन्धसमन्वितम् । भुजंगगरलब्रह्मकपालशिवभस्मभिः

ālokyatāṁ sadā sarvairdivyagandhasamanvitam bhujaṁgagaralabrahmakapālaśivabhasmabhiḥ

सदा सबके द्वारा देखा जाए, दिव्य सुगन्ध से युक्त; सर्प, विष, ब्रह्म-कपाल और शिव-भस्म से।

श्लोक 5 (skanda.1.114.5)

भीषणैरलमीशान जय वेषपरिग्रहैः । सुकुमारो भवेर्दिव्यमाल्यगंधांबरादिभिः

bhīṣaṇairalamīśāna jaya veṣaparigrahaiḥ sukumāro bhaverdivyamālyagaṁdhāṁbarādibhiḥ

भयंकर वेशों को धारण करने से अब बस हो, हे ईशान! जय हो! तुम दिव्य माला, सुगन्ध और वस्त्र आदि से सुकुमार बनो।

श्लोक 6 (skanda.1.114.6)

भूषितो रत्नभूषाभिर्विहरस्व महेश्वर । आगता नित्यमीशान देवगन्धर्वकन्यकाः

bhūṣito ratnabhūṣābhirviharasva maheśvara āgatā nityamīśāna devagandharvakanyakāḥ

रत्नों के आभूषणों से विभूषित होकर विहार करो, हे महेश्वर! हे ईशान! देव और गन्धर्वों की कन्याएँ यहाँ सदा आएँ।

श्लोक 7 (skanda.1.114.7)

सेवंतामत्र देवेशं नृत्यवादित्रगीतिभिः । गणाश्च मानुषा भूत्वा सेवंतां त्वामहर्निशम्

sevaṁtāmatra deveśaṁ nṛtyavāditragītibhiḥ gaṇāśca mānuṣā bhūtvā sevaṁtāṁ tvāmaharniśam

वे नृत्य, वाद्य और गीत से यहाँ देवेश की सेवा करें; और गण भी मनुष्य-रूप धारण करके दिन-रात तुम्हारी सेवा करें।

श्लोक 8 (skanda.1.114.8)

त्वत्प्रसादादयं देव सुगंधिः पुष्टिवर्द्धनः । आवयोः संगमो दृष्टो भूयात्सर्वार्थदायकः

tvatprasādādayaṁ deva sugaṁdhiḥ puṣṭivarddhanaḥ āvayoḥ saṁgamo dṛṣṭo bhūyātsarvārthadāyakaḥ

तुम्हारी कृपा से यह सुगन्धित, पुष्टि बढ़ाने वाला रूप — हम दोनों का यह देखा गया संगम सर्व-अर्थ-दायक हो।

श्लोक 9 (skanda.1.114.9)

गृहीतमत्र देवेश सर्वमंत्रात्मकं वपुः । चरितं तव कैंकर्यमस्तु भक्तिः सदा तव

gṛhītamatra deveśa sarvamaṁtrātmakaṁ vapuḥ caritaṁ tava kaiṁkaryamastu bhaktiḥ sadā tava

हे देवेश! यहाँ मैंने समस्त मन्त्रों का स्वरूप शरीर धारण किया है; तुम्हारी सेवा में ही मेरा आचरण हो, तुम्हारे प्रति भक्ति सदा बनी रहे।

श्लोक 10 (skanda.1.114.10)

ज्ञानाज्ञानकृतं नित्यमपराधसहस्रकम् । क्षम्यतां तव भक्तानामनन्यशरणेक्षणात्

jñānājñānakṛtaṁ nityamaparādhasahasrakam kṣamyatāṁ tava bhaktānāmananyaśaraṇekṣaṇāt

ज्ञान अथवा अज्ञान से किए गए, सदा के सहस्रों अपराध — तुम्हारे भक्तों की, जो तुम्हारे अतिरिक्त कोई अन्य शरण नहीं देखते, उन्हें क्षमा किया जाए।

श्लोक 11 (skanda.1.114.11)

इति देव्या वचः श्रुत्वा शम्भुः शोणाचलेश्वरः । तमेव वरदः प्रादाद्वरं सर्वमभीप्सितम्

iti devyā vacaḥ śrutvā śambhuḥ śoṇācaleśvaraḥ tameva varadaḥ prādādvaraṁ sarvamabhīpsitam

देवी के इस वचन को सुनकर, शोणाचलेश्वर शम्भु ने, वर देने वाले होकर, उसे ही अभीष्ट सम्पूर्ण वर प्रदान किया।

श्लोक 12 (skanda.1.114.12)

आभाष्य गौरीं कुतुकाद्रंतुकामः स्वयं शिवः । धारय त्वं मृगमदं मनोज्ञमिदमूचिवान्

ābhāṣya gaurīṁ kutukādraṁtukāmaḥ svayaṁ śivaḥ dhāraya tvaṁ mṛgamadaṁ manojñamidamūcivān

गौरी को कौतुक से सम्बोधित करके, विनोद करने की इच्छा से स्वयं शिव ने कहा — तुम इस मनोज्ञ मृगमद को धारण करो — यह कहकर।

श्लोक 13 (skanda.1.114.13)

महादेव उवाच । पुलकाख्यो महान्दैत्यो मृगरूपी तपोधिकम् । कृत्वा प्राप वरं मत्तः सौगन्ध्यं परमाद्भुतम्

mahādeva uvāca pulakākhyo mahāndaityo mṛgarūpī tapodhikam kṛtvā prāpa varaṁ mattaḥ saugandhyaṁ paramādbhutam

महादेव जी ने कहा — पुलक नामक एक महान् दैत्य, मृग-रूप में, अत्यन्त तप करके, मुझसे परम अद्भुत सौगन्ध्य का वर पाया था।

श्लोक 14 (skanda.1.114.14)

लब्ध्वा वरं स्वगन्धेनामोहयत्सुरयोषितः । तथैवाधर्मसंप्राप्तो बबाधे सकलं जगत्

labdhvā varaṁ svagandhenāmohayatsurayoṣitaḥ tathaivādharmasaṁprāpto babādhe sakalaṁ jagat

वर पाकर उसने अपनी सुगन्ध से देव-स्त्रियों को मोहित कर लिया; उसी प्रकार अधर्म को प्राप्त होकर उसने सम्पूर्ण जगत् को पीड़ित किया।

श्लोक 15 (skanda.1.114.15)

देवैरभ्यर्थितः सोहमाहूयासुरनायकम् । विमुंच लोकरक्षार्थमासुरं देहमित्यशाम्

devairabhyarthitaḥ sohamāhūyāsuranāyakam vimuṁca lokarakṣārthamāsuraṁ dehamityaśām

देवताओं द्वारा प्रार्थित मैंने उस असुर-नायक को बुलाकर, लोक की रक्षा के लिए अपना आसुर शरीर त्यागने का आदेश दिया।

श्लोक 16 (skanda.1.114.16)

पुलक उवाच । त्यक्ष्यामि देवदेवेश देहमेतं त्वदाज्ञया । प्रणम्य भक्तिमनसा मामप्यर्चेदमूचिवान्

pulaka uvāca tyakṣyāmi devadeveśa dehametaṁ tvadājñayā praṇamya bhaktimanasā māmapyarcedamūcivān

पुलक ने कहा — हे देवाधिदेव! तुम्हारी आज्ञा से मैं इस शरीर को त्याग दूँगा — भक्ति-भाव से प्रणाम करके उसने मुझसे यह भी कहा — मुझे भी पूजित करो।

श्लोक 17 (skanda.1.114.17)

मदंगसंभवं दिव्यं सौरभं विश्वमोहनम् । धार्यतां देव देवेश सदा सादरचेतसा

madaṁgasaṁbhavaṁ divyaṁ saurabhaṁ viśvamohanam dhāryatāṁ deva deveśa sadā sādaracetasā

मेरे ही अंग से उत्पन्न यह दिव्य, विश्व-मोहनी सुगन्ध — हे देव! हे देवेश! सदा आदर-भाव से धारण की जाए।

श्लोक 18 (skanda.1.114.18)

पुलकस्वेदजातो हि सदा प्रख्यायतां तव । अयं मृगमदो लोके शृङ्गाररसवर्द्धनः

pulakasvedajāto hi sadā prakhyāyatāṁ tava ayaṁ mṛgamado loke śṛṅgārarasavarddhanaḥ

यह सदा 'पुलक' के स्वेद से उत्पन्न कहलाए; यह मृगमद लोक में शृंगार-रस को बढ़ाने वाला हो।

श्लोक 19 (skanda.1.114.19)

त्वत्प्रियः कांतिसौभाग्यरूपलावण्यदायकः । विसृजामि निजं देहं देवदेव जगत्पते

tvatpriyaḥ kāṁtisaubhāgyarūpalāvaṇyadāyakaḥ visṛjāmi nijaṁ dehaṁ devadeva jagatpate

तुम्हारा प्रिय, कान्ति, सौभाग्य, रूप और लावण्य को देने वाला — हे देवाधिदेव! हे जगत्पते! मैं अपना यह शरीर त्याग रहा हूँ।

श्लोक 20 (skanda.1.114.20)

सदा बहुमतो देव्या दिव्यसौरभलुब्धया । मदंशसंभवा ये स्युर्मत्तपोलब्धसौरभाः

sadā bahumato devyā divyasaurabhalubdhayā madaṁśasaṁbhavā ye syurmattapolabdhasaurabhāḥ

दिव्य सुगन्ध की लालसा रखने वाली देवी द्वारा सदा अत्यन्त सम्मानित यह — मेरे ही अंश से उत्पन्न जो भी मेरे तप से सुगन्ध प्राप्त करेंगे।

श्लोक 21 (skanda.1.114.21)

लीयंतां तव देवेश मूर्तावालेपनच्छलात् । तथेति मय्युक्तवति स दैत्यः पुलकाभिधः

līyaṁtāṁ tava deveśa mūrtāvālepanacchalāt tatheti mayyuktavati sa daityaḥ pulakābhidhaḥ

हे देवेश! तुम्हारी ही मूर्ति में लेप के बहाने वे लीन हो जाएँ — 'तथास्तु' यह मेरे कहने पर, पुलक नामक उस दैत्य ने।

श्लोक 22 (skanda.1.114.22)

विससर्ज निजं देहं मयिसन्यस्तजीवितः । ततस्तदंगसंभूतं मदं बहुलसौरभम्

visasarja nijaṁ dehaṁ mayisanyastajīvitaḥ tatastadaṁgasaṁbhūtaṁ madaṁ bahulasaurabham

अपने जीवन को मुझ पर अर्पित करके अपना शरीर त्याग दिया; तब उसके शरीर से उत्पन्न, प्रचुर सुगन्ध वाला वह मद —

श्लोक 23 (skanda.1.114.23)

अधारयमहं प्रेम्णा शतशृंगारवर्द्धनम् । तपसा देवदेवेशि तप्तं तव वपुः कृशम्

adhārayamahaṁ premṇā śataśṛṁgāravarddhanam tapasā devadeveśi taptaṁ tava vapuḥ kṛśam

मैंने उसे प्रेमपूर्वक धारण किया, जो सैकड़ों गुना शृंगार को बढ़ाने वाला था; हे देवदेवेशि! तप से सन्तप्त, तुम्हारे इस कृश शरीर पर।

श्लोक 24 (skanda.1.114.24)

मदंगं च वियोगात्त इदं निर्वापयाधुना । इति प्रशस्य बहुधा पुलकस्नेहमद्भुतम्

madaṁgaṁ ca viyogātta idaṁ nirvāpayādhunā iti praśasya bahudhā pulakasnehamadbhutam

और मेरे ही अंग से उत्पन्न इसे अब, तुम्हारे वियोग से जो नष्ट हुआ था, उसे शान्त करने के लिए धारण करो — इस प्रकार पुलक के अद्भुत स्नेह की बहुत प्रशंसा करके।

श्लोक 25 (skanda.1.114.25)

आलिलिंप महादेवः पार्वतीं प्रेममंदिराम् । अपृच्छच्च हसन्देवः पार्वतीं ललनाकृतिम्

āliliṁpa mahādevaḥ pārvatīṁ premamaṁdirām apṛcchacca hasandevaḥ pārvatīṁ lalanākṛtim

महादेव ने प्रेम की उस मन्दिर-स्वरूपा पार्वती को लेप किया; और हँसते हुए देव ने ललना-रूपिणी पार्वती से पूछा।

श्लोक 26 (skanda.1.114.26)

किमेतदिति हस्तोत्थं दृष्ट्वा तं जगदंबिका । अब्रवीदरुणाद्रीशमानम्य जगदंबिका

kimetaditi hastotthaṁ dṛṣṭvā taṁ jagadaṁbikā abravīdaruṇādrīśamānamya jagadaṁbikā

'यह क्या है' — उसके हाथ में उठे उस पदार्थ को देखकर जगदम्बिका ने, अरुणाद्रीश को प्रणाम करके, जगदम्बिका ने पूछा।

श्लोक 27 (skanda.1.114.27)

आगतिं तस्य पुष्पस्य सदा स्वकरवर्तिनः

āgatiṁ tasya puṣpasya sadā svakaravartinaḥ

उस पुष्प के आगमन को, जो सदा उसके ही हाथ में रहता था।

श्लोक 28 (skanda.1.114.28)

देव्युवाच । अहं कैलासशिखराद्देवदेव त्वदाज्ञया । तपः कर्तुमनुप्राप्ता कांचीं कनकतोरणाम्

devyuvāca ahaṁ kailāsaśikharāddevadeva tvadājñayā tapaḥ kartumanuprāptā kāṁcīṁ kanakatoraṇām

देवी ने कहा — हे देवाधिदेव! मैं कैलास शिखर से तुम्हारी आज्ञा से तप करने के लिए, स्वर्ण-तोरण वाली काञ्ची में आई थी।

श्लोक 29 (skanda.1.114.29)

अवाप्य मानसोद्भूतं कह्लारमिदमुत्तमम् । आराधयं महादेवमम्लानगुरुसौरभम्

avāpya mānasodbhūtaṁ kahlāramidamuttamam ārādhayaṁ mahādevamamlānagurusaurabham

मानसरोवर से उत्पन्न इस उत्तम श्वेत-कमल को पाकर, अम्लान, गहरी सुगन्ध वाले महादेव की मैंने आराधना की।

श्लोक 30 (skanda.1.114.30)

यदक्षयमविश्रांतमर्चनायोजितं मया । अविच्छिन्नमहादीप्तिः कामधेनुघृताप्लुतः

yadakṣayamaviśrāṁtamarcanāyojitaṁ mayā avicchinnamahādīptiḥ kāmadhenughṛtāplutaḥ

जो अक्षय, अविश्रान्त होकर मेरे द्वारा अर्चना में लगाया गया, अखण्ड महान् दीप्ति वाला, कामधेनु के घृत से सींचा गया।

श्लोक 31 (skanda.1.114.31)

अवेक्षणीयो भूपालैरनुपाल्यश्च सर्वदा । धर्मलक्षणमाधेयं लोकरक्षार्थमादरात्

avekṣaṇīyo bhūpālairanupālyaśca sarvadā dharmalakṣaṇamādheyaṁ lokarakṣārthamādarāt

इसे राजाओं द्वारा सदा देखा और पाला जाना चाहिए; लोक-रक्षा के लिए धर्म-लक्षण को आदरपूर्वक धारण किया जाए।

श्लोक 32 (skanda.1.114.32)

सर्वाभीप्सितसिद्ध्यर्थं मत्प्रीतिकरणाय च । मया संस्थापिता धर्मा द्वात्रिंशल्लोकगुप्तये

sarvābhīpsitasiddhyarthaṁ matprītikaraṇāya ca mayā saṁsthāpitā dharmā dvātriṁśallokaguptaye

समस्त अभीष्टों की सिद्धि के लिए और मेरी प्रसन्नता के लिए, मेरे द्वारा लोकों की रक्षा हेतु बत्तीस धर्म स्थापित किए गए हैं।

श्लोक 33 (skanda.1.114.33)

रक्षणीया प्रयत्नेन तत्संनिधिमुपागतैः । सर्वालंकारसंयुक्तं सर्वभोगकृतोत्सवम् । आलोक्यतामिदं रूपं कन्यायां मम कांतिमत्

rakṣaṇīyā prayatnena tatsaṁnidhimupāgataiḥ sarvālaṁkārasaṁyuktaṁ sarvabhogakṛtotsavam ālokyatāmidaṁ rūpaṁ kanyāyāṁ mama kāṁtimat

उसकी समीपता में पहुँचने वालों द्वारा उन्हें प्रयत्नपूर्वक रक्षित रखा जाना चाहिए; समस्त आभूषणों से युक्त, समस्त भोगों से उत्सव-युक्त — इस कान्तिमान् रूप को उस कन्या में देखा जाए।

श्लोक 34 (skanda.1.114.34)

ब्रह्मोवाच । इति देव्या वचः श्रुत्वा शम्भुः शोणाचलेश्वरः

brahmovāca iti devyā vacaḥ śrutvā śambhuḥ śoṇācaleśvaraḥ

ब्रह्मा जी ने कहा — देवी के इस वचन को सुनकर, शोणाचलेश्वर शम्भु ने।

श्लोक 35 (skanda.1.114.35)

तथेति वरदः प्रादाद्वरं सर्वमभीप्सितम् । एष शोणाचलः श्रीमान्दृश्यते लोकपूजितः

tatheti varadaḥ prādādvaraṁ sarvamabhīpsitam eṣa śoṇācalaḥ śrīmāndṛśyate lokapūjitaḥ

'तथास्तु' कहकर, वर देने वाले होकर, समस्त अभीष्ट वर प्रदान किए; यह श्रीमान् शोणाचल, लोकों द्वारा पूजित दिखाई देता है।

श्लोक 36 (skanda.1.114.36)

सर्वदा वरदागौर्या सर्वभोगैश्च संवृतः । य एतच्छांभवं रूपमरुणाद्रितया स्थितम्

sarvadā varadāgauryā sarvabhogaiśca saṁvṛtaḥ ya etacchāṁbhavaṁ rūpamaruṇādritayā sthitam

सदा वर देने वाली गौरी से युक्त, और समस्त भोगों से घिरा हुआ; जो यह शाम्भव-रूप, अरुणाद्रि के रूप में स्थित।

श्लोक 37 (skanda.1.114.37)

संपश्यंति नमस्यंति कृतार्थाः सर्व एव ते । अरुणाचलमाहात्म्यमेतच्छ्रण्वंति ये भुवि

saṁpaśyaṁti namasyaṁti kṛtārthāḥ sarva eva te aruṇācalamāhātmyametacchraṇvaṁti ye bhuvi

उसे भलीभाँति देखते हैं और नमस्कार करते हैं, वे सभी कृतार्थ हो जाते हैं; इस अरुणाचल-माहात्म्य को जो भी पृथ्वी पर सुनते हैं।

श्लोक 38 (skanda.1.114.38)

भवंति सततं तेषां समग्राः सर्वसंपदः । श्रीमत्त्वं वाक्पतित्वं च रूपमव्याहतं बलम्

bhavaṁti satataṁ teṣāṁ samagrāḥ sarvasaṁpadaḥ śrīmattvaṁ vākpatitvaṁ ca rūpamavyāhataṁ balam

उन्हें निरन्तर समस्त सम्पदाएँ पूर्ण रूप से प्राप्त होती हैं — श्रीमत्ता, वाक्-पटुता, अबाधित रूप और बल।

श्लोक 39 (skanda.1.114.39)

लभंते पापनाशं च माहात्म्यस्यास्य धारणात् । सर्वतीर्थाभिषवणं सर्वयज्ञक्रियाफलम्

labhaṁte pāpanāśaṁ ca māhātmyasyāsya dhāraṇāt sarvatīrthābhiṣavaṇaṁ sarvayajñakriyāphalam

इस माहात्म्य को धारण करने से उन्हें पापों का नाश भी प्राप्त होता है; समस्त तीर्थों में स्नान का, समस्त यज्ञ-कर्मों का फल —

श्लोक 40 (skanda.1.114.40)

सदाशिवप्रसादं च दत्ते शोणाद्रिदर्शनम्

sadāśivaprasādaṁ ca datte śoṇādridarśanam

तथा सदाशिव की कृपा, शोणाद्रि के दर्शन से ही प्राप्त हो जाती है।

श्लोक 41 (skanda.1.114.41)

इति कैलासशिखरात्प्राप्ता देवी शिवाज्ञया । शापमोक्षगतवती शोणाचलनिरीक्षणात्

iti kailāsaśikharātprāptā devī śivājñayā śāpamokṣagatavatī śoṇācalanirīkṣaṇāt

इस प्रकार कैलास शिखर से शिव की आज्ञा से आई हुई देवी ने, शोणाचल के दर्शन से ही शाप से मुक्ति प्राप्त की।

श्लोक 42 (skanda.1.114.42)

स्थानेष्वन्येषु देवस्य विद्यमानेषु च क्षितौ । दिवि चात्यंतपुण्येषु शंभुरत्र प्रसेदिवान्

sthāneṣvanyeṣu devasya vidyamāneṣu ca kṣitau divi cātyaṁtapuṇyeṣu śaṁbhuratra prasedivān

पृथ्वी पर विद्यमान देव के अन्य स्थानों में भी, और स्वर्ग के अत्यन्त पुण्यमय स्थानों में भी — शम्भु यहाँ ही सबसे अधिक प्रसन्न हुए हैं।

श्लोक 43 (skanda.1.114.43)

अयं सदाशिवः साक्षादरुणाचलरूपतः । दृश्यते परमं तेजः सर्गस्थित्यंतकारणम्

ayaṁ sadāśivaḥ sākṣādaruṇācalarūpataḥ dṛśyate paramaṁ tejaḥ sargasthityaṁtakāraṇam

यह सदाशिव साक्षात् अरुणाचल-रूप में, सृष्टि-स्थिति-संहार के कारण-भूत, परम तेज के रूप में देखा जाता है।

श्लोक 44 (skanda.1.114.44)

एतत्तु तैजसं लिगं सर्वदेवनमस्कृतम् । दृश्यते कर्मभूरेषा तेन धर्माधिका मता

etattu taijasaṁ ligaṁ sarvadevanamaskṛtam dṛśyate karmabhūreṣā tena dharmādhikā matā

यह जो तैजस लिंग है, समस्त देवताओं द्वारा नमस्कृत, यहाँ देखा जाता है — इसीलिए यह कर्म-भूमि धर्म में सबसे श्रेष्ठ मानी गई है।

श्लोक 45 (skanda.1.114.45)

अरुणाचलनाथस्य तेजसा धूतकल्मषाः । भक्तिमंतो नरा लोके सुखमाप्स्यंति सर्वतः

aruṇācalanāthasya tejasā dhūtakalmaṣāḥ bhaktimaṁto narā loke sukhamāpsyaṁti sarvataḥ

अरुणाचल-नाथ के तेज से पाप-रहित हुए, भक्तिमान् मनुष्य लोक में सर्वत्र सुख को प्राप्त करेंगे।

श्लोक 46 (skanda.1.114.46)

प्रदक्षिणैर्नमस्कारैस्तपोभिर्नियमैरपि । येऽर्चयंत्यरुणाद्रीशं तेषां शंभुर्वशंगतः

pradakṣiṇairnamaskāraistapobhirniyamairapi ye'rcayaṁtyaruṇādrīśaṁ teṣāṁ śaṁbhurvaśaṁgataḥ

प्रदक्षिणाओं, नमस्कारों, तपों और नियमों से भी जो अरुणाद्रीश की अर्चना करते हैं, उनके लिए शम्भु वश में आ जाते हैं।

श्लोक 47 (skanda.1.114.47)

न तथा तपसा योगैर्दानैः प्रीणाति शंकरः । यथा सकृदपि प्राप्तादरुणाचलदर्शनात्

na tathā tapasā yogairdānaiḥ prīṇāti śaṁkaraḥ yathā sakṛdapi prāptādaruṇācaladarśanāt

शंकर उतने तप, योग या दान से प्रसन्न नहीं होते, जितने कि एक बार भी प्राप्त अरुणाचल-दर्शन से।

श्लोक 48 (skanda.1.114.48)

स्वयंभुवः सदा वेदाः सेतिहासा दिवि स्थिताः । परितो गिरिरूपास्ते स्तुवंत्यरुणपर्वतम्

svayaṁbhuvaḥ sadā vedāḥ setihāsā divi sthitāḥ parito girirūpāste stuvaṁtyaruṇaparvatam

स्वयंभू वेद, इतिहासों सहित, सदा स्वर्ग में स्थित हैं; वे चारों ओर पर्वत-रूप धारण करके अरुणपर्वत की स्तुति करते हैं।

श्लोक 49 (skanda.1.114.49)

एतस्य वैभवं सर्वं न मया न च शार्ङ्गिणा । वचसा शक्यते वक्तुं वर्षकोटिशतैरपि

etasya vaibhavaṁ sarvaṁ na mayā na ca śārṅgiṇā vacasā śakyate vaktuṁ varṣakoṭiśatairapi

इसके सम्पूर्ण ऐश्वर्य को न तो मैं और न ही शार्ङ्गधारी विष्णु, सैकड़ों करोड़ों वर्षों में भी वाणी से कह सकते हैं।

श्लोक 50 (skanda.1.114.50)

देवाश्च हरिमुख्यास्ते कल्पकाद्याः सुरद्रुमाः । प्रच्छन्नरूपाः सेवंते सर्वदैवारुणाचलम्

devāśca harimukhyāste kalpakādyāḥ suradrumāḥ pracchannarūpāḥ sevaṁte sarvadaivāruṇācalam

हरि आदि देवता, कल्पवृक्ष आदि दिव्य वृक्ष भी, छिपे हुए रूपों में सदा ही अरुणाचल की सेवा करते हैं।

श्लोक 51 (skanda.1.114.51)

न तस्य कलिदोषः स्यान्नाधिव्याधिविजृंभणा । यत्र संपूज्यते लिंगमरुणाचलसंज्ञितम्

na tasya kalidoṣaḥ syānnādhivyādhivijṛṁbhaṇā yatra saṁpūjyate liṁgamaruṇācalasaṁjñitam

वहाँ कलियुग का कोई भी दोष नहीं होता, न ही किसी आधि-व्याधि का उभार होता है, जहाँ अरुणाचल नाम वाले लिंग की पूजा की जाती है।

श्लोक 52 (skanda.1.114.52)

इत्येतत्कथितं सर्वं तव शंभुपदाश्रयम् । चरितं ह्यरुणस्यास्य कल्पपुण्यदुरासदम्

ityetatkathitaṁ sarvaṁ tava śaṁbhupadāśrayam caritaṁ hyaruṇasyāsya kalpapuṇyadurāsadam

इस प्रकार यह सब तुमसे कहा गया — यह अरुण का चरित्र, शम्भु के चरणों का ही आश्रय, एक कल्प के पुण्य से भी दुर्लभ है।

श्लोक 53 (skanda.1.114.53)

सूत उवाच । इति विधिमुखनिःसृतामुदारामरुणगिरीशकथासुधापगां हि । श्रुतिपुटयुगलात्पिबन्मनोज्ञां सनकमुनिस्तपसां फलं स लेभे

sūta uvāca iti vidhimukhaniḥsṛtāmudārāmaruṇagirīśakathāsudhāpagāṁ hi śrutipuṭayugalātpibanmanojñāṁ sanakamunistapasāṁ phalaṁ sa lebhe

सूत जी ने कहा — इस प्रकार ब्रह्मा के मुख से निकली, उदार, अरुणगिरीश की कथा-रूपी अमृत की नदी को अपने दोनों कानों से पीते हुए, सनक मुनि ने अपने तप का फल प्राप्त किया।

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