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माहेश्वर खण्ड · अध्याय 115

मुनियों का प्रश्न — सर्वश्रेष्ठ शैव-स्थल

अध्याय 114अध्याय-सूचीअध्याय 116

श्लोक 1 (skanda.1.115.1)

श्रीगणेशाय नमः । अथारुणाचलमाहात्म्योत्तरार्धम् । व्यास उवाच । वसंतो नैमिषारण्ये मुनयः सूतमब्रुवन् । मुनय ऊचुः । स्थानानामुत्तमं शैवं यत्स्थलं तद्वदस्व नः

śrīgaṇeśāya namaḥ athāruṇācalamāhātmyottarārdham vyāsa uvāca vasaṁto naimiṣāraṇye munayaḥ sūtamabruvan munaya ūcuḥ sthānānāmuttamaṁ śaivaṁ yatsthalaṁ tadvadasva naḥ

श्री गणेश जी को नमस्कार। अब अरुणाचल-माहात्म्य का उत्तरार्ध आरम्भ होता है। व्यास जी ने कहा — नैमिषारण्य में निवास करने वाले मुनियों ने सूत जी से कहा — मुनियों ने कहा — स्थानों में जो उत्तम शैव स्थल है, वह हमें बताइए।

श्लोक 2 (skanda.1.115.2)

सूत उवाच । यूयं शृणुत यत्पूर्वं नंदीश्वरमुखाच्छ्रुतम् । मार्कण्डेयेन तद्वक्ष्ये मुनयः शृणुतादरात्

sūta uvāca yūyaṁ śṛṇuta yatpūrvaṁ naṁdīśvaramukhācchrutam mārkaṇḍeyena tadvakṣye munayaḥ śṛṇutādarāt

सूत जी ने कहा — तुम सुनो जो पहले नन्दीश्वर के मुख से सुना गया, और मार्कण्डेय द्वारा वह कहा गया; हे मुनियो! उसे आदरपूर्वक सुनो।

श्लोक 3 (skanda.1.115.3)

मार्कंडेय उवाच । नंदीश्वर त्वया प्रोक्तो महिमा माध्यमेश्वरः । मयाप्यवधृतः सर्वो भक्तिश्रद्धार्द्रचेतसा

mārkaṁḍeya uvāca naṁdīśvara tvayā prokto mahimā mādhyameśvaraḥ mayāpyavadhṛtaḥ sarvo bhaktiśraddhārdracetasā

मार्कण्डेय जी ने कहा — हे नन्दीश्वर! तुमने माध्यमेश्वर की महिमा कही, वह सब मैंने भक्ति और श्रद्धा से आर्द्र हृदय के साथ समझ लिया है।

श्लोक 4 (skanda.1.115.4)

तथापि वद मे भूयो देवदेव दयानिधे । अहं यत्परिपृच्छामि भवंतं विहितादरः

tathāpi vada me bhūyo devadeva dayānidhe ahaṁ yatparipṛcchāmi bhavaṁtaṁ vihitādaraḥ

फिर भी, हे देवाधिदेव! हे दयानिधे! मुझसे और भी कहिए; मैं आदरपूर्वक जो आपसे पूछ रहा हूँ।

श्लोक 5 (skanda.1.115.5)

त्वयाप्यविदितं किंचिन्नास्त्यत्र भुवनत्रये । सर्वागमपुराणेषु बाह्येष्वाभ्यंतरेषु च

tvayāpyaviditaṁ kiṁcinnāstyatra bhuvanatraye sarvāgamapurāṇeṣu bāhyeṣvābhyaṁtareṣu ca

तीनों लोकों में, समस्त बाह्य और आभ्यन्तर आगमों और पुराणों में, आपसे अज्ञात कुछ भी नहीं है।

श्लोक 6 (skanda.1.115.6)

स्वर्गापवर्गयोः पुंसां भूमिरेव विशिष्यते । सर्वकर्माणि निर्मातुं तत्तत्फलपरायणैः

svargāpavargayoḥ puṁsāṁ bhūmireva viśiṣyate sarvakarmāṇi nirmātuṁ tattatphalaparāyaṇaiḥ

स्वर्ग और मोक्ष दोनों के लिए, पुरुषों को अपने-अपने फल में तत्पर होकर समस्त कर्मों को सम्पन्न करने के लिए, भूमि ही विशिष्ट है।

श्लोक 7 (skanda.1.115.7)

फलं च त्रिविधं पुंसां त्वयैव कथितं पुरा । भूमौ सुखं स्वर्गभोगः कैवल्यमिति भेदतः

phalaṁ ca trividhaṁ puṁsāṁ tvayaiva kathitaṁ purā bhūmau sukhaṁ svargabhogaḥ kaivalyamiti bhedataḥ

और पुरुषों का त्रिविध फल आपने ही पहले कहा था — भूमि पर सुख, स्वर्ग का भोग, और मोक्ष — इस भेद से।

श्लोक 8 (skanda.1.115.8)

पुण्यक्षयेण क्षीयेत प्रायः प्राथमिकं द्वयम् । क्षीयते न तृतीयं तु कर्मणामेव नाश्रयात्

puṇyakṣayeṇa kṣīyeta prāyaḥ prāthamikaṁ dvayam kṣīyate na tṛtīyaṁ tu karmaṇāmeva nāśrayāt

पुण्य के क्षय से प्रायः पहले के दोनों क्षीण हो जाते हैं; परन्तु तीसरा क्षीण नहीं होता, क्योंकि वह कर्मों के ही आश्रय पर निर्भर नहीं है।

श्लोक 9 (skanda.1.115.9)

तत्सिद्धिस्तु त्वया प्रोक्ता विशुद्धज्ञानगोचरा । सर्वेषां दुर्लभं शुद्धज्ञानं देहभृतां पुनः

tatsiddhistu tvayā proktā viśuddhajñānagocarā sarveṣāṁ durlabhaṁ śuddhajñānaṁ dehabhṛtāṁ punaḥ

उसकी सिद्धि आपने विशुद्ध ज्ञान के ही क्षेत्र में कही है; परन्तु देहधारियों के लिए वह शुद्ध ज्ञान भी दुर्लभ है।

श्लोक 10 (skanda.1.115.10)

तज्ज्ञानं कुत्र वा क्षेत्रे शास्त्रादिपठनं विना । शिवपूजनमात्रेण सिद्ध्येत्सर्वशरीरिणाम्

tajjñānaṁ kutra vā kṣetre śāstrādipaṭhanaṁ vinā śivapūjanamātreṇa siddhyetsarvaśarīriṇām

वह ज्ञान किस स्थान में, शास्त्रादि के अध्ययन के बिना ही, केवल शिव-पूजन मात्र से, समस्त शरीरधारियों को सिद्ध हो सकता है?

श्लोक 11 (skanda.1.115.11)

ज्ञानयोगक्रियाचर्यास्वशेषाणां शरीरिणाम् । अपि शैवागमोक्तासु न बुद्धिः संप्रवर्त्तते

jñānayogakriyācaryāsvaśeṣāṇāṁ śarīriṇām api śaivāgamoktāsu na buddhiḥ saṁpravarttate

समस्त देहधारियों की बुद्धि, शैवागमों में कही गई ज्ञान, योग, क्रिया और चर्या की साधनाओं में भी प्रवृत्त नहीं हो पाती।

श्लोक 12 (skanda.1.115.12)

यस्य स्थानस्य माहात्म्यादल्पैरपि शरीरिणः । लप्स्यते नियमैः शुद्धज्ञानं तन्मम कथ्यताम्

yasya sthānasya māhātmyādalpairapi śarīriṇaḥ lapsyate niyamaiḥ śuddhajñānaṁ tanmama kathyatām

जिस स्थान के माहात्म्य से अल्प नियमों वाले देहधारी को भी शुद्ध ज्ञान प्राप्त होगा, वह मुझसे कहिए।

श्लोक 13 (skanda.1.115.13)

भस्मरुद्राक्षवहनादीश्वरस्मरणात्सकृत् । यत्र मुग्धैरपि श्रेयो लभ्यं तत्स्थानमुच्यताम्

bhasmarudrākṣavahanādīśvarasmaraṇātsakṛt yatra mugdhairapi śreyo labhyaṁ tatsthānamucyatām

भस्म और रुद्राक्ष धारण करने से, अथवा ईश्वर के एक बार के स्मरण मात्र से, जहाँ मुग्ध जनों को भी कल्याण प्राप्त हो, वह स्थान बताइए।

श्लोक 14 (skanda.1.115.14)

अबुद्धिपूर्वकेणापि यत्र वासेन देहिनाम् । अविघ्नं सेत्स्यते श्रेयः स्थानं तन्मेऽनुगृह्यताम्

abuddhipūrvakeṇāpi yatra vāsena dehinām avighnaṁ setsyate śreyaḥ sthānaṁ tanme'nugṛhyatām

जहाँ प्राणियों को अनजाने में किए गए निवास से भी निर्विघ्न कल्याण सिद्ध हो जाए, वह स्थान मुझ पर कृपा करके बताइए।

श्लोक 15 (skanda.1.115.15)

जातानां वर्णसांकर्य्ये तैरश्ची योनिमीयुषाम् । स्थावराणामपि श्रेयो यत्र तत्क्षेत्रमुच्यताम्

jātānāṁ varṇasāṁkaryye tairaścī yonimīyuṣām sthāvarāṇāmapi śreyo yatra tatkṣetramucyatām

वर्ण-संकर से उत्पन्न जनों को, पशु-योनि को प्राप्त हुओं को, और स्थावर प्राणियों को भी जहाँ कल्याण प्राप्त हो, वह क्षेत्र बताइए।

श्लोक 16 (skanda.1.115.16)

इतीरयित्वा स मृकंडुनंदनः समं मुनींद्रैरपरैर्महात्मभिः । पपात तस्यांघ्रिसरोरुहद्वये शिलादसूनोरखिलागमाब्धेः

itīrayitvā sa mṛkaṁḍunaṁdanaḥ samaṁ munīṁdrairaparairmahātmabhiḥ papāta tasyāṁghrisaroruhadvaye śilādasūnorakhilāgamābdheḥ

इस प्रकार कहकर, मृकण्डु के पुत्र मार्कण्डेय ने, अन्य महात्मा मुनीश्वरों के साथ, समस्त आगमों के सागर, शिलाद के पुत्र नन्दीश्वर के दोनों चरण-कमलों पर गिरकर प्रणाम किया।

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