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माहेश्वर खण्ड · अध्याय 123

शिव-विष्णु विवाद

अध्याय 122अध्याय-सूचीअध्याय 124

श्लोक 1 (skanda.1.123.1)

नंदिकेश्वर उवाच । अहमेव प्रभुरिति प्ररूढाधिकगर्वयोः । विरंच्यप्युतयोरासीद्विवादो मोहसंभवः

naṁdikeśvara uvāca ahameva prabhuriti prarūḍhādhikagarvayoḥ viraṁcyapyutayorāsīdvivādo mohasaṁbhavaḥ

नन्दिकेश्वर जी ने कहा — "मैं ही सबका स्वामी हूँ" ऐसे प्रबल अहंकार से भरे हुए ब्रह्मा और विष्णु दोनों के बीच मोहवश एक विवाद उत्पन्न हुआ।

श्लोक 2 (skanda.1.123.2)

रजोविकाराभ्यधिको बाह्ये नील इवोत्थितः । विश्वसृष्टिकरो विष्णुं विरंच्योऽब्रूत गर्वतः

rajovikārābhyadhiko bāhye nīla ivotthitaḥ viśvasṛṣṭikaro viṣṇuṁ viraṁcyo'brūta garvataḥ

रजोगुण के विकार से अत्यधिक उद्दीप्त, बाहर से मानो नीलवर्ण होकर उठे हुए, विश्व की सृष्टि करने वाले ब्रह्मा ने गर्वपूर्वक विष्णु से यह कहा...

श्लोक 3 (skanda.1.123.3)

ब्रह्मोवाच । कथं त्वमधिकश्चासि विष्णो जनयितुर्मम । पितामहस्य लोकानां किमेवमतिमोहितः

brahmovāca kathaṁ tvamadhikaścāsi viṣṇo janayiturmama pitāmahasya lokānāṁ kimevamatimohitaḥ

ब्रह्मा जी ने कहा — हे विष्णु! तुम अपने जन्मदाता तथा लोकों के पितामह मुझसे अधिक कैसे हो सकते हो? क्या तुम इतने मोहग्रस्त हो गए हो?

श्लोक 4 (skanda.1.123.4)

त्वत्त एवोदितौ दैत्यौ निहत्य मधुकैटभौ । दैत्यारिरिति मुग्ध त्वं गर्वं वहसि केशव

tvatta evoditau daityau nihatya madhukaiṭabhau daityāririti mugdha tvaṁ garvaṁ vahasi keśava

तुम्हीं से उत्पन्न हुए मधु और कैटभ नामक दैत्यों को मारकर, हे मुग्ध केशव, तुम "मैं दैत्यों का शत्रु हूँ" ऐसा गर्व धारण करते हो!

श्लोक 5 (skanda.1.123.5)

त्वामेव सृजतो नित्यं बहुधा मम वेधसः । अद्याप्यायासजां पीडां न परित्यजतः करौ

tvāmeva sṛjato nityaṁ bahudhā mama vedhasaḥ adyāpyāyāsajāṁ pīḍāṁ na parityajataḥ karau

तुम्हें ही बार-बार अनेक रूपों में उत्पन्न करने वाले मुझ विधाता के दोनों हाथों में आज भी वह परिश्रम से उत्पन्न पीड़ा दूर नहीं हुई है।

श्लोक 6 (skanda.1.123.6)

मम श्रमांभसोद्भूते महांभोधौ निमज्जतः । नैयग्रोधं न चोत्पन्नं कुतस्तेऽस्त्ववलंबनम्

mama śramāṁbhasodbhūte mahāṁbhodhau nimajjataḥ naiyagrodhaṁ na cotpannaṁ kutaste'stvavalaṁbanam

मेरे परिश्रम के पसीने से उत्पन्न महासागर में डूबते हुए तुम्हारे लिए अभी तक कोई वटपत्र भी उत्पन्न नहीं हुआ, फिर तुम्हारा सहारा कहाँ से हो सकता है?

श्लोक 7 (skanda.1.123.7)

मदुपज्ञे महांभोधौ स्रवते कोऽपि पन्नगः । तदाश्रयस्त्वमूर्ध्वं ते पद्मं तच्चासनं मम

madupajñe mahāṁbhodhau sravate ko'pi pannagaḥ tadāśrayastvamūrdhvaṁ te padmaṁ taccāsanaṁ mama

मेरे ही द्वारा प्रवर्तित उस महासागर में कोई शेषनाग तैर रहा है; उसी के आश्रय पर तुम स्थित हो, और तुम्हारे ऊपर जो कमल है, वही मेरा आसन है।

श्लोक 8 (skanda.1.123.8)

कुतस्तमोमये ब्रूहि त्वयि सत्त्वगुणोदयः । स वेत्सि किं त्वं प्रकृतिं निद्राजडिमनिर्भरः

kutastamomaye brūhi tvayi sattvaguṇodayaḥ sa vetsi kiṁ tvaṁ prakṛtiṁ nidrājaḍimanirbharaḥ

बताओ, तमोगुण से भरे हुए तुममें सत्त्वगुण का उदय कहाँ से हो सकता है? क्या तुम, जो निद्रा की जड़ता से भरे रहते हो, प्रकृति के तत्त्व को जानते हो?

श्लोक 9 (skanda.1.123.9)

जलाशये प्रस्वपता दैत्यभीत्या जनार्दन । कथं त्वया रक्षितासौ मदधीना जगत्त्रयी

jalāśaye prasvapatā daityabhītyā janārdana kathaṁ tvayā rakṣitāsau madadhīnā jagattrayī

हे जनार्दन! दैत्यों के भय से जलाशय में सोए रहने वाले तुमने मेरे अधीन इन तीनों लोकों की रक्षा कैसे की?

श्लोक 10 (skanda.1.123.10)

चतुर्भ्यो मम वक्त्रेभ्यो वेदाः समुदयं गताः । चैतन्यरूपिणी शक्तिः कलत्रं मे सरस्वती

caturbhyo mama vaktrebhyo vedāḥ samudayaṁ gatāḥ caitanyarūpiṇī śaktiḥ kalatraṁ me sarasvatī

मेरे चारों मुखों से वेदों का प्राकट्य हुआ है; और चैतन्यस्वरूपा शक्ति सरस्वती मेरी अर्धांगिनी हैं।

श्लोक 11 (skanda.1.123.11)

मया हि सृज्यते विश्वमिदं स्थावरजंगमम् । रक्ष्यते च तदिन्द्राद्यैर्मामकैःपुत्रपौत्रकैः

mayā hi sṛjyate viśvamidaṁ sthāvarajaṁgamam rakṣyate ca tadindrādyairmāmakaiḥputrapautrakaiḥ

यह संपूर्ण स्थावर-जंगम विश्व मेरे ही द्वारा सृजित होता है, और इंद्र आदि, जो मेरे ही पुत्र-पौत्र हैं, उसकी रक्षा करते हैं।

श्लोक 12 (skanda.1.123.12)

ततः कथय वैकुंठ मन्नियोज्येषु कश्चन । जगतामीश्वरान्मत्तः कथं नामातिरिच्यसे

tataḥ kathaya vaikuṁṭha manniyojyeṣu kaścana jagatāmīśvarānmattaḥ kathaṁ nāmātiricyase

अतः बताओ, हे वैकुण्ठ! तुम तो मेरे ही अधीनस्थों में से एक हो; फिर जगत के ईश्वर मुझसे तुम किस प्रकार बढ़कर हो सकते हो?

श्लोक 13 (skanda.1.123.13)

नंदिकेश्वर उवाच । इत्थं सरोषसंरंभे विधौ पौरुषभाषिणि । नारायणोऽपि सासूयं स्मित्वैवं समभाषत

naṁdikeśvara uvāca itthaṁ saroṣasaṁraṁbhe vidhau pauruṣabhāṣiṇi nārāyaṇo'pi sāsūyaṁ smitvaivaṁ samabhāṣata

नन्दिकेश्वर जी ने कहा — जब ब्रह्मा इस प्रकार क्रोध और आवेश में भरकर अहंकारपूर्ण वचन बोल रहे थे, तब नारायण भी ईर्ष्यायुक्त होकर मुस्कराते हुए इस प्रकार बोले।

श्लोक 14 (skanda.1.123.14)

विष्णुरुवाच । विरंचे मुंच संरंभं वृथा खलु विकत्थसे । नाभीसरोजसंजातो मम त्वमवधारय

viṣṇuruvāca viraṁce muṁca saṁraṁbhaṁ vṛthā khalu vikatthase nābhīsarojasaṁjāto mama tvamavadhāraya

विष्णु ने कहा — हे विरंचि! अपना आवेश त्याग दो, तुम व्यर्थ ही डींगें मार रहे हो। यह जान लो कि तुम मेरी ही नाभि-कमल से उत्पन्न हुए हो।

श्लोक 15 (skanda.1.123.15)

योगनिद्रां मयोन्मुच्य पुरा ह मधुकैटभौ । न चेद्यन्मथितौ ताभ्यां तथैव स्याः प्रणाशितः

yoganidrāṁ mayonmucya purā ha madhukaiṭabhau na cedyanmathitau tābhyāṁ tathaiva syāḥ praṇāśitaḥ

यदि मैं अपनी योगनिद्रा से न जागता और उन मधु-कैटभ दैत्यों का नाश न करता, तो तुम भी उन्हीं के द्वारा निश्चय ही नष्ट कर दिए गए होते।

श्लोक 16 (skanda.1.123.16)

सोमकप्रमुखान्दैत्यान्हंतुमात्मेच्छया मम । धृतमत्स्यादिरूपस्य को वान्यः सृष्टिकारणम्

somakapramukhāndaityānhaṁtumātmecchayā mama dhṛtamatsyādirūpasya ko vānyaḥ sṛṣṭikāraṇam

सोमक आदि दैत्यों को मारने के लिए मैंने ही अपनी इच्छा से मत्स्य आदि रूप धारण किए; ऐसे मुझ जैसे के लिए सृष्टि का कारण भला और कौन हो सकता है?

श्लोक 17 (skanda.1.123.17)

न किंचिदपि पश्यंति रजसारूढदृष्टयः । रजोमयेन भवता किं निरूपयितुं क्षमम्

na kiṁcidapi paśyaṁti rajasārūḍhadṛṣṭayaḥ rajomayena bhavatā kiṁ nirūpayituṁ kṣamam

रजोगुण से आच्छादित दृष्टि वाले कुछ भी नहीं देख पाते; रजोमय तुम भला किस वस्तु का यथार्थ निरूपण करने में समर्थ हो सकते हो?

श्लोक 18 (skanda.1.123.18)

अविनाभाविनी शक्तिर्ननु मे पद्मवासिनी । यस्याः कटाक्षमात्रेण जगवितयमेधते

avinābhāvinī śaktirnanu me padmavāsinī yasyāḥ kaṭākṣamātreṇa jagavitayamedhate

कमलवासिनी लक्ष्मी मेरी अविनाभावी शक्ति हैं, जिनके कटाक्ष मात्र से यह संपूर्ण जगत समृद्ध होता है।

श्लोक 19 (skanda.1.123.19)

भूतान्यमूनि कालोऽयमात्मनोप्यहमेव हि । मया विरहितं कि वा त्रिषु लोकेषु विद्यते

bhūtānyamūni kālo'yamātmanopyahameva hi mayā virahitaṁ ki vā triṣu lokeṣu vidyate

ये समस्त भूत, यह काल, और स्वयं आत्मा भी—सब कुछ मैं ही हूँ। तीनों लोकों में ऐसा क्या है जो मुझसे रहित हो?

श्लोक 20 (skanda.1.123.20)

प्र आदित्या वसवो रुद्रा दिक्पाला मनवोऽप्यहम् । भूर्भुवःस्वस्त्रयीमेनां मदधीनां विचिंतय

pra ādityā vasavo rudrā dikpālā manavo'pyaham bhūrbhuvaḥsvastrayīmenāṁ madadhīnāṁ viciṁtaya

आदित्यगण, वसुगण, रुद्रगण, दिक्पाल तथा मनु भी मैं ही हूँ; भूः, भुवः, स्वः इन तीनों लोकों को भी मेरे ही अधीन जानो।

श्लोक 21 (skanda.1.123.21)

ममैव विनियोगेन सृष्टिशक्तिः स्वयं स्थिता । तन्मे त्रैलोक्यनाथस्यकि त्वंज्येष्ठः समोऽथवा

mamaiva viniyogena sṛṣṭiśaktiḥ svayaṁ sthitā tanme trailokyanāthasyaki tvaṁjyeṣṭhaḥ samo'thavā

सृष्टि की शक्ति मेरे ही आदेश से स्वयं स्थित है। ऐसे मुझ त्रैलोक्यनाथ से क्या तुम ज्येष्ठ हो अथवा समान हो?

श्लोक 22 (skanda.1.123.22)

नंदिकेश्वर उवाच । एवं मोहांधमनसोरन्योन्यं प्रतिगर्जतोः । ययावनल्पसमयःसवर्तसदृशस्तयो.

naṁdikeśvara uvāca evaṁ mohāṁdhamanasoranyonyaṁ pratigarjatoḥ yayāvanalpasamayaḥsavartasadṛśastayo.

नन्दिकेश्वर जी ने कहा — इस प्रकार मोह से अंधे हुए मन वाले वे दोनों परस्पर गरजते रहे, और उनके बीच प्रलयकाल के समान यह विवाद दीर्घकाल तक चलता रहा।

श्लोक 23 (skanda.1.123.23)

उदयास्तमयौ स्यातां न तदा चंद्रसूर्ययोः । नक्षत्राणि च ताराश्च ग्रहाश्च क्षीणतां ययुः

udayāstamayau syātāṁ na tadā caṁdrasūryayoḥ nakṣatrāṇi ca tārāśca grahāśca kṣīṇatāṁ yayuḥ

उस समय चंद्रमा और सूर्य का उदय-अस्त होना बंद हो गया; नक्षत्र, तारे और ग्रह सभी क्षीण होने लगे।

श्लोक 24 (skanda.1.123.24)

नाववुर्मरुतो वा न जज्वलुर्जातवेदसः । नांतरिक्षं न च क्षोणी न दिशोऽपि चकाशिरे

nāvavurmaruto vā na jajvalurjātavedasaḥ nāṁtarikṣaṁ na ca kṣoṇī na diśo'pi cakāśire

वायु का प्रवाह भी थम गया, अग्नि भी प्रज्वलित नहीं हुई; न आकाश, न पृथ्वी, और न दिशाएँ ही प्रकाशित रहीं।

श्लोक 25 (skanda.1.123.25)

समुद्राश्चुक्षुभुस्सर्वे पर्वताश्च चकंपिरे । औषध्यः शोषमासेदुरवसेदुश्च जंतवः

samudrāścukṣubhussarve parvatāśca cakaṁpire auṣadhyaḥ śoṣamāseduravaseduśca jaṁtavaḥ

सभी समुद्र क्षुब्ध हो उठे, पर्वत काँपने लगे; औषधियाँ सूखने लगीं तथा जीव-जंतु व्याकुल हो उठे।

श्लोक 26 (skanda.1.123.26)

पक्षमासर्तुवर्षादिकालस्य नियमो गतः । अहोरात्रव्यवस्थापि प्रणाश समुपाययौ

pakṣamāsartuvarṣādikālasya niyamo gataḥ ahorātravyavasthāpi praṇāśa samupāyayau

पक्ष, मास, ऋतु और वर्ष आदि काल के नियम भंग हो गए; दिन-रात की व्यवस्था भी नष्ट होने लगी।

श्लोक 27 (skanda.1.123.27)

इन्द्रादयो लोकपाला मरीच्याद्या महर्षयः । सर्वेप्यकाले संप्राप्तं कल्पांतं मेनिरे तदा

indrādayo lokapālā marīcyādyā maharṣayaḥ sarvepyakāle saṁprāptaṁ kalpāṁtaṁ menire tadā

इंद्र आदि लोकपाल तथा मरीचि आदि महर्षि — सभी ने उस समय यह समझा कि असमय में ही कल्पांत आ गया है।

श्लोक 28 (skanda.1.123.28)

एवं जाते महाक्षोभे भूताक्रन्दप्रचोदितः । भूतनाथो जगज्जातमविद्यायामबुध्यत

evaṁ jāte mahākṣobhe bhūtākrandapracoditaḥ bhūtanātho jagajjātamavidyāyāmabudhyata

इस प्रकार महान क्षोभ उत्पन्न होने पर, समस्त प्राणियों की करुण पुकार से प्रेरित होकर, भूतनाथ शिव ने जान लिया कि यह संपूर्ण जगत अविद्या में पड़ गया है।

श्लोक 29 (skanda.1.123.29)

व्यचिंतयच्च विश्वात्मा विश्वसंरक्षणोद्यतः । अवाह्यया दृशाऽपश्यदनयोमोहकारणम्

vyaciṁtayacca viśvātmā viśvasaṁrakṣaṇodyataḥ avāhyayā dṛśā'paśyadanayomohakāraṇam

विश्व की रक्षा में तत्पर विश्वात्मा शिव ने विचार किया, और अपनी अंतर्दृष्टि से उन दोनों के मोह का कारण देख लिया।

श्लोक 30 (skanda.1.123.30)

स्वामिनं सकलैश्वर्यदातारं मां मदोद्धतौ । विस्मृत्य स्वं स्वमेवैतावमंसेतां जगत्प्रभू

svāminaṁ sakalaiśvaryadātāraṁ māṁ madoddhatau vismṛtya svaṁ svamevaitāvamaṁsetāṁ jagatprabhū

वे दोनों जगत्प्रभु, मद में उन्मत्त होकर, समस्त ऐश्वर्य के दाता तथा उनके स्वामी मुझे भूल बैठे थे, और अपने-आपको ही सर्वश्रेष्ठ मान बैठे थे।

श्लोक 31 (skanda.1.123.31)

अहो मोहस्य माहात्म्यं वदिमौ द्रुहिणाच्युतौ । जानानावपि मां सम्यगभूतामेवमुद्धतौ

aho mohasya māhātmyaṁ vadimau druhiṇācyutau jānānāvapi māṁ samyagabhūtāmevamuddhatau

अहो, यह मोह की कैसी महिमा है! ये ब्रह्मा और विष्णु मुझे भलीभाँति जानते हुए भी इस प्रकार अहंकार से उद्धत हो उठे।

श्लोक 32 (skanda.1.123.32)

अज्ञानतिमिरोद्भूति दूषिताशयलोचनः । जनः प्राप्तं स्तुतमपि प्रायो वस्तु न पश्यति

ajñānatimirodbhūti dūṣitāśayalocanaḥ janaḥ prāptaṁ stutamapi prāyo vastu na paśyati

अज्ञान के अंधकार से जिसकी दृष्टि और मन दूषित हो गए हैं, ऐसा मनुष्य सामने पड़ी हुई तथा प्रशंसित वस्तु को भी प्रायः नहीं देख पाता।

श्लोक 33 (skanda.1.123.33)

कृतापराधावप्येतौ निमग्नौ मोहसागरे । मया नोपेक्षणीयौ हि लोकानां हितकाम्यया

kṛtāparādhāvapyetau nimagnau mohasāgare mayā nopekṣaṇīyau hi lokānāṁ hitakāmyayā

अपराध करने पर भी मोह-सागर में डूबे हुए ये दोनों मेरे द्वारा उपेक्षा के योग्य नहीं हैं, क्योंकि मुझे तो लोकों के हित की कामना करनी है।

श्लोक 34 (skanda.1.123.34)

इति निश्चित्य मनसा माया वैवश्यमेतयोः । देवो दयामहांभोधिर्व्यपोहयितुमैहत

iti niścitya manasā māyā vaivaśyametayoḥ devo dayāmahāṁbhodhirvyapohayitumaihata

मन में ऐसा निश्चय करके, दया के महासागर भगवान शिव ने इन दोनों के माया-जनित पराधीनता को दूर करने का प्रयत्न किया।

श्लोक 35 (skanda.1.123.35)

अहोऽनुकम्पा तरुणेंदुमौलेः स्वभावसिद्धा भुवनत्रयेऽस्मिन् । असौ प्रमोहांबुधिमध्यतोभूदाविर्निरस्तावपि धातृविष्णू

aho'nukampā taruṇeṁdumauleḥ svabhāvasiddhā bhuvanatraye'smin asau pramohāṁbudhimadhyatobhūdāvirnirastāvapi dhātṛviṣṇū

अहो! युवा चंद्रमा को मस्तक पर धारण करने वाले शिव की करुणा इन तीनों लोकों में स्वभाव-सिद्ध है; उन्होंने ब्रह्मा और विष्णु द्वारा तिरस्कृत होने पर भी मोह-सागर के मध्य से प्रकट होकर उन्हें उबारा।

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