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माहेश्वर खण्ड · अध्याय 124

ब्रह्मा और विष्णु के मध्य तेजोमय लिंग का प्रादुर्भाव

अध्याय 123अध्याय-सूचीअध्याय 125

श्लोक 1 (skanda.1.124.1)

मार्कण्डेय उवाच । आज्ञापय विभो मह्यं यथा शंभुः सनातनः । अनुजग्राह मोहांधो वैकुण्ठपरमेष्ठिनौ

mārkaṇḍeya uvāca ājñāpaya vibho mahyaṁ yathā śaṁbhuḥ sanātanaḥ anujagrāha mohāṁdho vaikuṇṭhaparameṣṭhinau

मार्कण्डेय जी ने कहा — हे प्रभो! मुझे बताइए कि सनातन शिव ने मोह से अंधे हुए विष्णु और ब्रह्मा पर किस प्रकार अनुग्रह किया।

श्लोक 2 (skanda.1.124.2)

नंदिकेश्वर उवाच । शृणुष्व सर्वं वक्ष्यामि विस्तरेण यथातथम् । यदेव देवो विदधे दयया भक्तवत्सलः

naṁdikeśvara uvāca śṛṇuṣva sarvaṁ vakṣyāmi vistareṇa yathātatham yadeva devo vidadhe dayayā bhaktavatsalaḥ

नन्दिकेश्वर जी ने कहा — सुनो, मैं सब कुछ विस्तार से यथार्थ रूप में कहूँगा कि भक्तवत्सल भगवान ने अपनी दया से क्या किया।

श्लोक 3 (skanda.1.124.3)

अथोदस्थात्तयोर्मध्ये तथा विवदमानयोः । ज्योतिःस्तंभत्वमभ्येत्य रोदोरंध्रनिरोधकः

athodasthāttayormadhye tathā vivadamānayoḥ jyotiḥstaṁbhatvamabhyetya rodoraṁdhranirodhakaḥ

तब इस प्रकार विवाद करते हुए उन दोनों के मध्य में, आकाश और पृथ्वी के बीच के अंतराल को अवरुद्ध करने वाला एक ज्योतिस्तंभ प्रकट हुआ।

श्लोक 4 (skanda.1.124.4)

महता जृंभमाणेन तस्य ब्रह्मांडभेदिनः । अन्तरिक्षमतिश्यामं समुत्क्षिप्तमिवाभवत

mahatā jṛṁbhamāṇena tasya brahmāṁḍabhedinaḥ antarikṣamatiśyāmaṁ samutkṣiptamivābhavata

ब्रह्मांड को भेदने वाले उस विशाल तेजस्तंभ के फैलने से आकाश अत्यंत काला होकर मानो ऊपर की ओर उछल पड़ा हो, ऐसा प्रतीत हुआ।

श्लोक 5 (skanda.1.124.5)

विष्वग्विवर्णता तस्य ज्योतिर्लिंगस्य तेजसा । दिशो विरेजिरे सद्यो दूरविस्तारिता इव

viṣvagvivarṇatā tasya jyotirliṁgasya tejasā diśo virejire sadyo dūravistāritā iva

उस ज्योतिर्लिंग के तेज से सभी दिशाओं में तत्काल एक विचित्र आभा फैल गई, मानो दिशाएँ दूर तक विस्तृत हो गई हों।

श्लोक 6 (skanda.1.124.6)

तीव्रैस्तस्य महाज्वालैः शोषिता इव सागराः । विमुक्तवीचिसंक्षोभाः स्वामेव प्रकृतिं ययुः

tīvraistasya mahājvālaiḥ śoṣitā iva sāgarāḥ vimuktavīcisaṁkṣobhāḥ svāmeva prakṛtiṁ yayuḥ

उसकी तीव्र महाज्वालाओं से मानो सागर सूख गए हों, वे तरंगों के क्षोभ से मुक्त होकर अपनी स्वाभाविक शांत स्थिति में लौट आए।

श्लोक 7 (skanda.1.124.7)

व्यद्योतंत दिवि प्राग्वद्वहास्तारागणैः सह । तेजःस्तंभात्समुद्भिन्नाः स्फुलिंगा इव केचन

vyadyotaṁta divi prāgvadvahāstārāgaṇaiḥ saha tejaḥstaṁbhātsamudbhinnāḥ sphuliṁgā iva kecana

उस तेजस्तंभ से फूटने वाली कुछ चिंगारियाँ मानो आकाश में तारागणों के साथ मिलकर पहले की तरह चमकने लगीं।

श्लोक 8 (skanda.1.124.8)

तेजसा तस्य शोणेन गैरिकेणेव रंजिताः । भौमरविश्रियं सर्वेऽप्यवहन्नवनीभृतः

tejasā tasya śoṇena gairikeṇeva raṁjitāḥ bhaumaraviśriyaṁ sarve'pyavahannavanībhṛtaḥ

उसके लाल तेज से मानो गेरू से रंगे हुए, समस्त पर्वत मंगलग्रह के समान लालिमायुक्त शोभा धारण करने लगे।

श्लोक 9 (skanda.1.124.9)

समुद्रास्तत्प्रतिच्छायानिर्भराश्लिष्ट यादसः । पद्मरागशिलाखण्डे घटिता इव रेजिरे

samudrāstatpraticchāyānirbharāśliṣṭa yādasaḥ padmarāgaśilākhaṇḍe ghaṭitā iva rejire

उसकी प्रतिच्छाया से पूरी तरह आलिंगित समुद्र, अपने जलचरों सहित, मानो पद्मराग मणि के खंडों से रचे गए हों, ऐसे शोभित होने लगे।

श्लोक 10 (skanda.1.124.10)

प्रवालगुच्छैः प्रत्यग्रैर्लंबिता इव पादपाः । नद्यश्च निर्भरोत्फुल्लकह्लारा इव रेजिरे

pravālagucchaiḥ pratyagrairlaṁbitā iva pādapāḥ nadyaśca nirbharotphullakahlārā iva rejire

वृक्ष मानो ताजे मूँगे के गुच्छों से लदे हुए दिखाई देने लगे, तथा नदियाँ मानो पूर्ण रूप से खिले हुए लाल कमलों से सुशोभित हो गईं।

श्लोक 11 (skanda.1.124.11)

मही कुंकुमलिप्तेव दिशः सिंदूरिता इव । सर्वारुणमिव व्योम समगत्प्रत्यदृश्यत

mahī kuṁkumalipteva diśaḥ siṁdūritā iva sarvāruṇamiva vyoma samagatpratyadṛśyata

पृथ्वी मानो केसर से लिपी हुई तथा दिशाएँ मानो सिंदूर से रंगी हुई दिखने लगीं; संपूर्ण आकाश ही मानो एक साथ लाल वर्ण का दिखाई देने लगा।

श्लोक 12 (skanda.1.124.12)

ब्रह्मांडकर्परमभूत्तन्महः पूरितांतरम् । शोणितेनेव संपूर्णं कपालं कृत्तिवाससः

brahmāṁḍakarparamabhūttanmahaḥ pūritāṁtaram śoṇiteneva saṁpūrṇaṁ kapālaṁ kṛttivāsasaḥ

वह तेज ब्रह्मांड के भीतरी भाग को इस प्रकार भर गया कि मानो कृत्तिवासा शिव की खोपड़ी रक्त से पूर्ण हो गई हो।

श्लोक 13 (skanda.1.124.13)

एवं प्रवर्द्धमानेन तेजःस्तम्भेन तेन च । अरुणाकारतां भेजे विश्वं स्थावरजंगमम्

evaṁ pravarddhamānena tejaḥstambhena tena ca aruṇākāratāṁ bheje viśvaṁ sthāvarajaṁgamam

इस प्रकार निरंतर बढ़ते हुए उस तेजस्तंभ के कारण संपूर्ण स्थावर-जंगम विश्व लाल वर्ण को प्राप्त हो गया।

श्लोक 14 (skanda.1.124.14)

तेजोलिंगं तदाश्चर्यं दृष्ट्वा त्यक्तमिथः क्रुधौ । अचिंतयेतामेकैकं चतुर्मुखचतुर्भुजौ

tejoliṁgaṁ tadāścaryaṁ dṛṣṭvā tyaktamithaḥ krudhau aciṁtayetāmekaikaṁ caturmukhacaturbhujau

उस अद्भुत तेजोलिंग को देखकर, चतुर्मुख ब्रह्मा और चतुर्भुज विष्णु दोनों ने परस्पर क्रोध त्याग दिया और अलग-अलग विचार करने लगे।

श्लोक 15 (skanda.1.124.15)

किमेष वसुधां भित्त्वा शेषादीनां फणाभृताम् । फणामाणिक्यमहसां राशिरुन्मुखतां गतः

kimeṣa vasudhāṁ bhittvā śeṣādīnāṁ phaṇābhṛtām phaṇāmāṇikyamahasāṁ rāśirunmukhatāṁ gataḥ

क्या यह पृथ्वी को भेदकर शेषनाग आदि फणधारी सर्पों की फणों में जड़े मणियों की प्रभा-राशि है, जो ऊपर की ओर उठ आई है?

श्लोक 16 (skanda.1.124.16)

किं वा कल्पांतसुलभप्रादुर्भावाः प्रभाकराः । द्वादशापि नभोभूम्योर्मध्ये युगपदुत्थिताः

kiṁ vā kalpāṁtasulabhaprādurbhāvāḥ prabhākarāḥ dvādaśāpi nabhobhūmyormadhye yugapadutthitāḥ

अथवा क्या यह वे बारह सूर्य हैं, जो प्रलयकाल में सहज ही प्रकट होते हैं, और जो आज एक साथ आकाश और पृथ्वी के बीच उदित हो गए हैं?

श्लोक 17 (skanda.1.124.17)

आहोस्विन्मेघ संघर्षाद्वितता व्योममध्यतः । अन्योन्यं मिलिताः क्षिप्रा निपतंत्यवनीतले

āhosvinmegha saṁgharṣādvitatā vyomamadhyataḥ anyonyaṁ militāḥ kṣiprā nipataṁtyavanītale

अथवा क्या यह मेघों के परस्पर टकराने से आकाश के बीच फैली हुई बिजलियाँ हैं, जो आपस में मिलकर वेग से पृथ्वी पर गिर रही हैं?

श्लोक 18 (skanda.1.124.18)

प्रतिघ्नन्नेष तेजोभिरक्ष्णोः शक्तिमनुक्षणम् । स्वनिर्विशेषिताशेषभूतजालः प्रवर्द्धते

pratighnanneṣa tejobhirakṣṇoḥ śaktimanukṣaṇam svanirviśeṣitāśeṣabhūtajālaḥ pravarddhate

यह अपने तेज से प्रतिक्षण नेत्रों की देखने की शक्ति को कुंठित करता हुआ, समस्त प्राणिजाल को अपने में विलीन करता हुआ बढ़ता चला जा रहा है।

श्लोक 19 (skanda.1.124.19)

एष उद्दीप्यमानोऽपि संतापाय न कल्पते । नेदीयांस्यपि भूतानि न निर्दहति वह्निवत्

eṣa uddīpyamāno'pi saṁtāpāya na kalpate nedīyāṁsyapi bhūtāni na nirdahati vahnivat

यह प्रज्वलित होते हुए भी संताप देने के लिए समर्थ नहीं है; अग्नि के समान यह अत्यंत निकट के प्राणियों को भी नहीं जलाता।

श्लोक 20 (skanda.1.124.20)

एतस्य कांतिसंक्रांत्या जगदेव न केवलम् । मदीयमपि शोणत्वमनुप्राप्तमहो वपुः

etasya kāṁtisaṁkrāṁtyā jagadeva na kevalam madīyamapi śoṇatvamanuprāptamaho vapuḥ

इसकी कांति के संचरण से केवल जगत ही नहीं, बल्कि आश्चर्य है कि मेरा अपना शरीर भी लाल वर्ण को प्राप्त हो गया है!

श्लोक 21 (skanda.1.124.21)

कस्मादेष समुत्पन्नः किं मूलः किमुपाधिकः । कुतस्त्यः किमुपादानः कया भक्त्या प्रकाशते

kasmādeṣa samutpannaḥ kiṁ mūlaḥ kimupādhikaḥ kutastyaḥ kimupādānaḥ kayā bhaktyā prakāśate

यह कहाँ से उत्पन्न हुआ है? इसका मूल क्या है? इसका आधार क्या है? यह कहाँ से आया है, इसका उपादान कारण क्या है, और यह किस शक्ति से प्रकाशित हो रहा है?

श्लोक 22 (skanda.1.124.22)

कियानवधिरेतस्य विष्वक्तिर्यगधोर्ध्वतः । अवगाढश्च पातालं कियन्मात्रमसाविति

kiyānavadhiretasya viṣvaktiryagadhordhvataḥ avagāḍhaśca pātālaṁ kiyanmātramasāviti

इसकी सीमा क्या है—चारों ओर, तिरछी दिशा में, नीचे तथा ऊपर की ओर? और यह पाताल में कितनी गहराई तक धँसा हुआ है?

श्लोक 23 (skanda.1.124.23)

तदेतदखिलं ज्ञातुं मनः पर्युत्सुकं मुहुः । इच्छत्युत्पतितुं व्योम प्रवेष्टुं च रसातलम्

tadetadakhilaṁ jñātuṁ manaḥ paryutsukaṁ muhuḥ icchatyutpatituṁ vyoma praveṣṭuṁ ca rasātalam

यह सब कुछ जानने के लिए मेरा मन बार-बार अत्यंत उत्सुक हो रहा है; यह आकाश में उड़ जाने तथा रसातल में प्रवेश करने की इच्छा करता है।

श्लोक 24 (skanda.1.124.24)

इति चिंताभराक्रांतौ तेजःस्तंभावलोकनात् । उभावप्यवकुलितौ वैकुण्ठपरमेष्ठिनौ

iti ciṁtābharākrāṁtau tejaḥstaṁbhāvalokanāt ubhāvapyavakulitau vaikuṇṭhaparameṣṭhinau

इस प्रकार उस तेजस्तंभ को देखने से उत्पन्न चिंता के भार से दबे हुए विष्णु और ब्रह्मा दोनों ही व्याकुल हो उठे।

श्लोक 25 (skanda.1.124.25)

अभाषत च गोविंदः सुतरामेव गर्वितम् । हिरण्यगर्भमालोक्य स्मयमानमुखांबुजः

abhāṣata ca goviṁdaḥ sutarāmeva garvitam hiraṇyagarbhamālokya smayamānamukhāṁbujaḥ

तब गोविंद ने अत्यंत गर्वयुक्त हिरण्यगर्भ को देखकर, अपने मुखकमल पर मुस्कान लाते हुए, इस प्रकार कहा।

श्लोक 26 (skanda.1.124.26)

विष्णुरुवाच । अयमेवावयोर्ब्रह्मन्नन्योन्योत्कर्षकांक्षिणोः । सत्यमेव परीक्षायै निकषः समुपस्थितः

viṣṇuruvāca ayamevāvayorbrahmannanyonyotkarṣakāṁkṣiṇoḥ satyameva parīkṣāyai nikaṣaḥ samupasthitaḥ

विष्णु ने कहा — हे ब्रह्मन्! एक-दूसरे से श्रेष्ठ होने की कामना करने वाले हम दोनों की सच्ची परीक्षा के लिए यही एक निकष उपस्थित हुआ है।

श्लोक 27 (skanda.1.124.27)

अमुष्य तेजसां राशेरपरिच्छेद्यसंपदः । आद्यंतौ ज्ञातुमेकेन न शक्यं ध्रुवमावयोः

amuṣya tejasāṁ rāśeraparicchedyasaṁpadaḥ ādyaṁtau jñātumekena na śakyaṁ dhruvamāvayoḥ

इस अपरिमेय ऐश्वर्य वाले तेजोराशि के आदि और अंत को हम दोनों में से अकेला कोई भी निश्चय ही जानने में समर्थ नहीं है।

श्लोक 28 (skanda.1.124.28)

यः पश्येन्मूलमग्रं वा तेजसोस्य स्वयंभुवः । स एव नावभ्यधिको जगतां नाथकोऽपि सः

yaḥ paśyenmūlamagraṁ vā tejasosya svayaṁbhuvaḥ sa eva nāvabhyadhiko jagatāṁ nāthako'pi saḥ

इस स्वयंभू तेज का जो भी मूल अथवा अग्रभाग देख लेगा, वही हम दोनों में श्रेष्ठ होगा और वही जगत का स्वामी भी होगा।

श्लोक 29 (skanda.1.124.29)

नंदिकेश्वर उवाच । इत्युभावपि विनिश्चिताशयौ मूलमग्रमपि तस्य वीक्षितुम् । तेजसोतिमहतो बभूवतुः स्पर्धया विरचितोद्यमौ मिथः

naṁdikeśvara uvāca ityubhāvapi viniścitāśayau mūlamagramapi tasya vīkṣitum tejasotimahato babhūvatuḥ spardhayā viracitodyamau mithaḥ

नन्दिकेश्वर जी ने कहा — इस प्रकार दोनों ने ही निश्चय कर लिया कि वे उस अत्यंत विशाल तेज के मूल और अग्रभाग को देखेंगे, तथा परस्पर होड़ में लगकर इसके लिए प्रयत्नशील हो गए।

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