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माहेश्वर खण्ड · अध्याय 131

शिव-पार्वती विहार

अध्याय 130अध्याय-सूचीअध्याय 132

श्लोक 1 (skanda.1.131.1)

सूत उवाच । इति श्रुत्वास्य वचनं मार्कंडेयोऽभ्यभाषत । मार्कंडेय उवाच । श्रुतमेव मया देव श्रोतव्यं भवतो मुखात्

sūta uvāca iti śrutvāsya vacanaṁ mārkaṁḍeyo'bhyabhāṣata mārkaṁḍeya uvāca śrutameva mayā deva śrotavyaṁ bhavato mukhāt

सूत जी ने कहा — उनके वचन सुनकर मार्कण्डेय जी बोले। मार्कण्डेय जी ने कहा — हे देव, मैंने यह पहले भी सुना है, किन्तु आपके ही मुख से सुनना चाहता हूँ।

श्लोक 2 (skanda.1.131.2)

तथापि कौतुकेनाहमाक्रांतो मुनयोऽप्यमी । गौर्या कथं तपस्तप्तं महादेव्यात्र कथ्यताम्

tathāpi kautukenāhamākrāṁto munayo'pyamī gauryā kathaṁ tapastaptaṁ mahādevyātra kathyatām

तथापि मैं कौतूहल से भर गया हूँ, और ये मुनिजन भी वैसे ही हैं। कृपया कहिए कि महादेवी गौरी ने यहाँ किस प्रकार तप किया था।

श्लोक 3 (skanda.1.131.3)

नंदिकेश्वर उवाच । कथयामि तदप्येतद्यथाऽधिगतमात्मना । शृणु त्वमवधानेन मार्कंडेय महामते

naṁdikeśvara uvāca kathayāmi tadapyetadyathā'dhigatamātmanā śṛṇu tvamavadhānena mārkaṁḍeya mahāmate

नन्दिकेश्वर जी ने कहा — मैं यह भी कहता हूँ, जैसा मैंने स्वयं जाना है। हे महामते मार्कण्डेय, तुम एकाग्रचित्त होकर सुनो।

श्लोक 4 (skanda.1.131.4)

ननु जानासि तत्पूर्वं यथा दाक्षायणी शिवः । उपयेमे सतीं नाम सतीनामधिदेवताम्

nanu jānāsi tatpūrvaṁ yathā dākṣāyaṇī śivaḥ upayeme satīṁ nāma satīnāmadhidevatām

तुम पहले से ही जानते हो कि किस प्रकार शिव जी ने दक्ष-पुत्री सती नामक, सती-स्त्रियों की अधिष्ठात्री देवी का, वरण किया था।

श्लोक 5 (skanda.1.131.5)

यथा च सा क्रुधा भर्तुर्द्रुहि दक्षप्रजापतौ । योगादहासीदात्मीयं वपुरित्यपि ते श्रुतम्

yathā ca sā krudhā bharturdruhi dakṣaprajāpatau yogādahāsīdātmīyaṁ vapurityapi te śrutam

और यह भी तुमने सुना है कि किस प्रकार उसने अपने पति के अपराधी दक्ष प्रजापति पर क्रोधित होकर योगबल से अपने ही शरीर का त्याग कर दिया था।

श्लोक 6 (skanda.1.131.6)

तदा हराज्ञानिघ्नेन वीरभद्रेण यत्कृतम् । अध्वरध्वंसनं दक्षस्यापि ते विदितं महत्

tadā harājñānighnena vīrabhadreṇa yatkṛtam adhvaradhvaṁsanaṁ dakṣasyāpi te viditaṁ mahat

तब हर की आज्ञा से उत्पन्न वीरभद्र ने जो दक्ष के यज्ञ का महान् विध्वंस किया था, वह भी तुम्हें ज्ञात है।

श्लोक 7 (skanda.1.131.7)

अश्रौषीस्तस्य दक्षस्य गणैः शीर्षासखंडनम् । ब्रह्माच्युतेंद्रमुख्यानां देवानामपि शिक्षणम्

aśrauṣīstasya dakṣasya gaṇaiḥ śīrṣāsakhaṁḍanam brahmācyuteṁdramukhyānāṁ devānāmapi śikṣaṇam

तुमने सुना है कि उस दक्ष का शिर गणों द्वारा किस प्रकार काटा गया, तथा ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र आदि प्रमुख देवताओं को भी किस प्रकार दण्डित किया गया था।

श्लोक 8 (skanda.1.131.8)

दंतघातं रवेः पाणिपाटनं जातवेदसः । अदितिप्रभृतीनां च दिव्यस्त्रीणां पराभवम्

daṁtaghātaṁ raveḥ pāṇipāṭanaṁ jātavedasaḥ aditiprabhṛtīnāṁ ca divyastrīṇāṁ parābhavam

सूर्य के दाँत तोड़े गए, अग्नि के हाथ काटे गए, तथा अदिति आदि दिव्य स्त्रियों का भी अपमान किया गया।

श्लोक 9 (skanda.1.131.9)

सा च देवी पुनर्जन्म लेभे हिमवतो गृहे । उमेति पार्वतीत्याख्यां द्वितीयां विभ्रती पुनः

sā ca devī punarjanma lebhe himavato gṛhe umeti pārvatītyākhyāṁ dvitīyāṁ vibhratī punaḥ

वह देवी हिमवान् के घर में पुनर्जन्म पाकर, उमा और पार्वती नामक द्वितीय नाम को धारण करती हुई प्रकट हुई।

श्लोक 10 (skanda.1.131.10)

देवः स्थाणुवने तां च परिचर्यापरं रहः । अरुरोचयिषुः काममधाक्षीत्कालवह्निना

devaḥ sthāṇuvane tāṁ ca paricaryāparaṁ rahaḥ arurocayiṣuḥ kāmamadhākṣītkālavahninā

देव शिव स्थाणुवन में थे, और वह पार्वती वहाँ गुप्त रूप से उनकी सेवा में तत्पर रहती थी; तभी उन्हें रिझाने की इच्छा से आए काम को शिव जी ने अपनी कालाग्नि से भस्म कर दिया।

श्लोक 11 (skanda.1.131.11)

जितेंद्रियं च तं देवं क्वापि यातं गणैः सह । तपोभिस्तोषयामास गौरी शिखरवासिनी

jiteṁdriyaṁ ca taṁ devaṁ kvāpi yātaṁ gaṇaiḥ saha tapobhistoṣayāmāsa gaurī śikharavāsinī

इन्द्रियों को जीतने वाले वे देव अपने गणों सहित कहीं और चले गए थे, तब शिखर पर निवास करने वाली गौरी ने अपने तप से उन्हें प्रसन्न किया।

श्लोक 12 (skanda.1.131.12)

उपयम्याथ तां देवो वृत्तांतैश्चित्तखंडिभिः । रमयामास चैकांते मोदस्वेति विलासिनीम्

upayamyātha tāṁ devo vṛttāṁtaiścittakhaṁḍibhiḥ ramayāmāsa caikāṁte modasveti vilāsinīm

तत्पश्चात् देव ने उससे विवाह कर, हृदय को हर लेने वाली बातों से, एकान्त में उस विलासिनी को "आनन्दित रहो" कहते हुए रमाया।

श्लोक 13 (skanda.1.131.13)

वैधव्यखिन्नया रत्या प्रार्थिता शैलनंदिनी । कामपीठे तपस्यंती कामं प्रत्युददीपयत्

vaidhavyakhinnayā ratyā prārthitā śailanaṁdinī kāmapīṭhe tapasyaṁtī kāmaṁ pratyudadīpayat

विधवा होने से दुखी रति के प्रार्थना करने पर, पर्वत-पुत्री ने कामपीठ में तप करके काम को पुनः प्रज्वलित कर दिया।

श्लोक 14 (skanda.1.131.14)

पुनश्च मेनया मात्रा पित्रा च हिमभूभृता । आनीता भवनं भर्त्रा साकं चिरमरंस्त सा

punaśca menayā mātrā pitrā ca himabhūbhṛtā ānītā bhavanaṁ bhartrā sākaṁ ciramaraṁsta sā

फिर माता मेना और पिता हिमाचल के द्वारा भवन में लाई जाकर, वह अपने पति के साथ चिरकाल तक आनन्दपूर्वक रही।

श्लोक 15 (skanda.1.131.15)

तदा शुंभनिशुंभाख्यौ लेभाते वेधसो वरम् । देवदानवमर्त्येषु मास्तु नौ पुरुषान्मृतिः

tadā śuṁbhaniśuṁbhākhyau lebhāte vedhaso varam devadānavamartyeṣu māstu nau puruṣānmṛtiḥ

उसी समय शुम्भ और निशुम्भ नामक दैत्यों ने ब्रह्मा जी से यह वरदान प्राप्त किया — "देव, दानव अथवा मनुष्यों में से किसी भी पुरुष के हाथों हमारी मृत्यु न हो।"

श्लोक 16 (skanda.1.131.16)

इति तद्वचनं श्रुत्वा जातत्रासैः सुपर्वभिः । अभ्यर्थितोऽवदद्देवो रहश्चक्रधरादिभिः

iti tadvacanaṁ śrutvā jātatrāsaiḥ suparvabhiḥ abhyarthito'vadaddevo rahaścakradharādibhiḥ

यह वचन सुनकर भयभीत हुए देवताओं ने, विष्णु आदि के साथ, एकांत में देव से प्रार्थना की; तब देव ने कहा।

श्लोक 17 (skanda.1.131.17)

माभैष्ट भद्र कालेन तथा प्रतिविधीयते । यथा निषूदितौ स्यातां तादृशौ दानवाविति

mābhaiṣṭa bhadra kālena tathā pratividhīyate yathā niṣūditau syātāṁ tādṛśau dānavāviti

"हे भद्रजनो, भयभीत मत होओ, समय आने पर ऐसा उपाय किया जाएगा जिससे वैसे उन दोनों दानवों का वध हो सके।"

श्लोक 18 (skanda.1.131.18)

दत्ताभयान्मुकुंदादीन्विसृज्यांधकसूदनः । अंतःपुरगतो रेमे देव्या सह यथा पुरा

dattābhayānmukuṁdādīnvisṛjyāṁdhakasūdanaḥ aṁtaḥpuragato reme devyā saha yathā purā

विष्णु आदि देवताओं को अभय देकर विदा करने के पश्चात्, अन्धकासुर के संहारक शिव अन्तःपुर में जाकर पूर्ववत् देवी के साथ विहार करने लगे।

श्लोक 19 (skanda.1.131.19)

कदाचिन्मर्मलक्ष्येण प्रीत्या कालीति निंदिता । तस्य प्रीत्यै कालिका च त्वचमेवाजहान्निजाम्

kadācinmarmalakṣyeṇa prītyā kālīti niṁditā tasya prītyai kālikā ca tvacamevājahānnijām

एक बार प्रेमवश उनके मर्म पर आघात करने वाले वचन से "काली" कहकर उपहास किए जाने पर, कालिका ने उनकी प्रसन्नता के लिए अपनी काली त्वचा का ही त्याग कर दिया।

श्लोक 20 (skanda.1.131.20)

यत्रोत्क्षिप्तवती चर्म स्वेच्छया परमेश्वरी । महाकाशीप्रपाताख्यं तदभूत्क्षेत्रमुत्तमम्

yatrotkṣiptavatī carma svecchayā parameśvarī mahākāśīprapātākhyaṁ tadabhūtkṣetramuttamam

जहाँ परमेश्वरी ने अपनी इच्छा से उस त्वचा को त्यागा था, वही स्थान महाकाशी-प्रपात नामक उत्तम तीर्थ बना।

श्लोक 21 (skanda.1.131.21)

सा च त्वक्कौशिकी नाम्ना काली विंध्याद्रिवासिनी । तपस्यंती वृषस्यंतौ तो जघान महासुरौ

sā ca tvakkauśikī nāmnā kālī viṁdhyādrivāsinī tapasyaṁtī vṛṣasyaṁtau to jaghāna mahāsurau

वह त्वचा कौशिकी नाम से विन्ध्याचल-निवासिनी काली हुई; उसने तप करते हुए, अपने प्रति कामासक्त हुए उन दोनों महादैत्यों का वध किया।

श्लोक 22 (skanda.1.131.22)

देवी च गौरी शिखरे तस्मिन्नेव मनोहरे । तपोभिर्लब्धगौरीत्वाद्भर्त्तारं समतोषयत्

devī ca gaurī śikhare tasminneva manohare tapobhirlabdhagaurītvādbharttāraṁ samatoṣayat

और उसी मनोहर शिखर पर देवी गौरी ने, तप के द्वारा प्राप्त हुए गौरी-भाव से, अपने पति को प्रसन्न किया।

श्लोक 23 (skanda.1.131.23)

क्रमेण दौर्हृदवती भूत्वा प्रासूत पार्वती । गजाननं च हेरंबं सेनान्यं च षडाननम्

krameṇa daurhṛdavatī bhūtvā prāsūta pārvatī gajānanaṁ ca heraṁbaṁ senānyaṁ ca ṣaḍānanam

क्रमशः गर्भवती होकर, पार्वती ने गजानन हेरम्ब को तथा षडानन सेनापति कार्तिकेय को जन्म दिया।

श्लोक 24 (skanda.1.131.24)

तौ चागमविदः प्राहुर्नारायणचतुर्मुखौ । पूर्वापराधशुद्ध्यर्थं देवीगर्भसमुद्भवौ

tau cāgamavidaḥ prāhurnārāyaṇacaturmukhau pūrvāparādhaśuddhyarthaṁ devīgarbhasamudbhavau

आगमों के ज्ञाता कहते हैं कि वे दोनों — नारायण और चतुर्मुख ब्रह्मा — पूर्व अपराधों के शुद्धिकरण के लिए ही देवी के गर्भ से उत्पन्न हुए थे।

श्लोक 25 (skanda.1.131.25)

वर्धमानौ च तौ बालौ पित्रोरालोकमानयोः । मग्नयोरिव वर्षाब्धौ प्रेमग्रंथिरभूद्दृढा

vardhamānau ca tau bālau pitrorālokamānayoḥ magnayoriva varṣābdhau premagraṁthirabhūddṛḍhā

वे दोनों बालक अपने माता-पिता के देखते-देखते बढ़ने लगे, मानो वे प्रेम के सागर में डूबे हों — इस प्रकार उनका प्रेम-बन्धन दृढ़ होता गया।

श्लोक 26 (skanda.1.131.26)

जातु वीणानिनादेन कदाचिच्चित्रलेखनैः । विजह्रतुश्शिवौ स्वैरमेकदा मंडनैर्मिथः

jātu vīṇāninādena kadāciccitralekhanaiḥ vijahratuśśivau svairamekadā maṁḍanairmithaḥ

कभी वीणा की ध्वनि से, कभी चित्र बनाने से, तो कभी परस्पर एक-दूसरे को सजाने से — शिव-पार्वती स्वच्छन्दतापूर्वक क्रीड़ा करते थे।

श्लोक 27 (skanda.1.131.27)

जातु विद्यागमालापैः कदाचिच्चित्रवस्तुभिः । एकदा लोकवृत्तांतैर्दंपतिभ्यां विनोदितम्

jātu vidyāgamālāpaiḥ kadāciccitravastubhiḥ ekadā lokavṛttāṁtairdaṁpatibhyāṁ vinoditam

कभी शास्त्र-चर्चा से, कभी विचित्र वस्तुओं से, तो कभी लोक की बातों से — उस दम्पति ने अपना मनोरंजन किया।

श्लोक 28 (skanda.1.131.28)

पुष्पावचयनैर्जातु कदाचिद्वारिखेलनैः । अदीव्यतां च रागार्द्रौ दोलाकेलिभिरेकदा

puṣpāvacayanairjātu kadācidvārikhelanaiḥ adīvyatāṁ ca rāgārdrau dolākelibhirekadā

कभी फूल चुनकर, कभी जल-क्रीड़ा से, और एक बार प्रेम-विभोर होकर झूले की क्रीड़ा से, वे दोनों क्रीड़ा करते थे।

श्लोक 29 (skanda.1.131.29)

मैनाकेनार्चितौ जातु मेनया जातु पूजितौ । जात्वर्हितौ हिमवता दंपती तौ विनोदितौ

mainākenārcitau jātu menayā jātu pūjitau jātvarhitau himavatā daṁpatī tau vinoditau

कभी मैनाक से सम्मानित, कभी मेना से पूजित, तो कभी हिमवान् से आदरित होकर, वह दम्पति आनन्दित होता था।

श्लोक 30 (skanda.1.131.30)

जातु द्यूतविनोदेन गतिगोष्ठ्या कदाचन । एकदा दानलीलाभिः शिवौ चिक्रीडतुश्चिरम्

jātu dyūtavinodena gatigoṣṭhyā kadācana ekadā dānalīlābhiḥ śivau cikrīḍatuściram

कभी द्यूत-क्रीड़ा से, कभी विहार करते हुए वार्तालाप से, तो कभी दान की लीलाओं से — शिव-पार्वती चिरकाल तक क्रीड़ा करते रहे।

श्लोक 31 (skanda.1.131.31)

द्यूतनिर्जितमाच्छिद्य पत्युरुत्संगतां गतम् । वलयीकृतमेणांकं ताटंकीकृतवत्युमा

dyūtanirjitamācchidya patyurutsaṁgatāṁ gatam valayīkṛtameṇāṁkaṁ tāṭaṁkīkṛtavatyumā

द्यूत में जीतकर, पति के शिर पर सुशोभित चन्द्रमा को छीनकर, उमा ने उसे कभी कंगन तो कभी कुण्डल बना लिया।

श्लोक 32 (skanda.1.131.32)

इति तौ पितरौ चराचराणां निवसंतौ कनकाचलादिकेषु । रुचिरेषु पदेषु कामभोगानतिहृद्यान्सुचिरं किलान्वभूताम्

iti tau pitarau carācarāṇāṁ nivasaṁtau kanakācalādikeṣu rucireṣu padeṣu kāmabhogānatihṛdyānsuciraṁ kilānvabhūtām

इस प्रकार चराचर जगत् के वे माता-पिता, कनकाचल आदि रमणीय स्थानों में निवास करते हुए, दीर्घकाल तक अत्यन्त हृदयग्राही काम-भोगों का आनन्द लेते रहे।

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