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माहेश्वर खण्ड · अध्याय 132

पार्वती द्वारा अरुणाचलेश्वर की सेवा

अध्याय 131अध्याय-सूचीअध्याय 133

श्लोक 1 (skanda.1.132.1)

नंदिकेश्वर उवाच । गार्हस्थ्यं बिभ्रती भर्तुरेकाम्रतलवासिनः । पक्वान्नपानैस्सा तत्र पर्य्यतर्पयत प्रजाः

naṁdikeśvara uvāca gārhasthyaṁ bibhratī bharturekāmratalavāsinaḥ pakvānnapānaissā tatra paryyatarpayata prajāḥ

नन्दिकेश्वर जी ने कहा — आम्रवृक्ष के नीचे निवास करने वाले अपने पति के गार्हस्थ्य को धारण करती हुई, वह वहाँ पके हुए अन्न और पेय पदार्थों से प्रजा को तृप्त करती थी।

श्लोक 2 (skanda.1.132.2)

जातु संध्यानुसंधानमुकुलीकृतलोचनम् । बद्धांजलिपुटं देवमद्राक्षीदद्रिनंदिनी

jātu saṁdhyānusaṁdhānamukulīkṛtalocanam baddhāṁjalipuṭaṁ devamadrākṣīdadrinaṁdinī

एक बार पर्वत-पुत्री ने देव को संध्या-वंदना में लीन, कली के समान अर्ध-निमीलित नेत्रों वाला, तथा हाथ जोड़े हुए देखा।

श्लोक 3 (skanda.1.132.3)

ध्यायते नूनमधुना कापि सौभाग्यशालिनी । क्रियते यन्मयि प्रेम तन्मन्ये वचनं महत्

dhyāyate nūnamadhunā kāpi saubhāgyaśālinī kriyate yanmayi prema tanmanye vacanaṁ mahat

उसने सोचा — "निश्चय ही अभी वे किसी सौभाग्यशालिनी स्त्री का ध्यान कर रहे हैं; मुझसे जो प्रेम प्रकट करते हैं, वह तो मुझे केवल बड़ी-बड़ी बातें ही लगता है।"

श्लोक 4 (skanda.1.132.4)

कथं विज्ञायते पुंसां कुटिला मानसी स्थितिः । मिथ्योपचाराद्दक्षेण वंचितास्म्यमुना भृशम्

kathaṁ vijñāyate puṁsāṁ kuṭilā mānasī sthitiḥ mithyopacārāddakṣeṇa vaṁcitāsmyamunā bhṛśam

पुरुषों की कुटिल मानसिक स्थिति भला कैसे जानी जा सकती है? इस चतुर के मिथ्या शिष्टाचार से मैं बुरी तरह छली गई हूँ।

श्लोक 5 (skanda.1.132.5)

मयि दाक्षिण्यमेवास्य मन्ये मनसि चेद्रहः । जनः सौभाग्यवान्यस्माद्भवति स्नेहभाजनम्

mayi dākṣiṇyamevāsya manye manasi cedrahaḥ janaḥ saubhāgyavānyasmādbhavati snehabhājanam

मैं तो सोचती हूँ, यदि उनके मन में कोई गुप्त बात है, तो मेरे प्रति यह केवल औपचारिक शिष्टता ही है; क्योंकि सौभाग्यशाली व्यक्ति ही स्नेह का पात्र बनता है।

श्लोक 6 (skanda.1.132.6)

अद्यप्रभृति ते दासस्तपोभिः क्रीत इत्यपि । मुग्धेंदुशेखरेणास्मि विप्रलब्धा स्मरारिणा

adyaprabhṛti te dāsastapobhiḥ krīta ityapi mugdheṁduśekhareṇāsmi vipralabdhā smarāriṇā

"आज से मैं तुम्हारा दास हूँ, तुम्हारे तप से मोल लिया गया" — ऐसी बातों से भी मुझे उन भोले प्रतीत होने वाले चन्द्रशेखर, कामारि ने छला है।

श्लोक 7 (skanda.1.132.7)

असमानानुरागेषु नारीणां मूढचेतसाम् । सौभाग्यगर्वो लोकेषु परिहासाय केवलम्

asamānānurāgeṣu nārīṇāṁ mūḍhacetasām saubhāgyagarvo lokeṣu parihāsāya kevalam

जहाँ प्रेम असमान हो, वहाँ मूढ़ हृदय वाली स्त्रियों का सौभाग्य-गर्व संसार में केवल हास्य का ही विषय बन जाता है।

श्लोक 8 (skanda.1.132.8)

इति प्रणयरोषेण देव्याः कलुषचेतसः । हव्यवाहातपालीढमिवाननमलक्ष्यत

iti praṇayaroṣeṇa devyāḥ kaluṣacetasaḥ havyavāhātapālīḍhamivānanamalakṣyata

इस प्रकार प्रणय-रोष से देवी का मन विचलित हो गया, और उनका मुख मानो अग्नि की उष्णता से झुलसा हुआ दिखाई देने लगा।

श्लोक 9 (skanda.1.132.9)

वाष्पवारिप्लवे तस्या आताम्रे च विलोचने । नीलोत्पले जलापूर्णे इव भूम्ना विरेजतुः

vāṣpavāriplave tasyā ātāmre ca vilocane nīlotpale jalāpūrṇe iva bhūmnā virejatuḥ

उनके अश्रुजल से भरे हुए तथा लालिमायुक्त नेत्र, मानो जल से भरे हुए दो नीलकमलों के समान अत्यन्त शोभायमान हो रहे थे।

श्लोक 10 (skanda.1.132.10)

यत्तस्याधीनतिलकं भ्रुवोर्युगमभज्यत । द्वेधाकृतमिवादर्शि मन्मथस्य शरासनम्

yattasyādhīnatilakaṁ bhruvoryugamabhajyata dvedhākṛtamivādarśi manmathasya śarāsanam

उनकी भौंहों की जोड़ी, जिन पर उनका तिलक निर्भर था, इस प्रकार मुड़ गई कि मानो कामदेव का धनुष दो टुकड़ों में विभक्त हो गया हो।

श्लोक 11 (skanda.1.132.11)

अंतर्मन्युभरेणास्याः कंपते स्माधरच्छदः । मुहुः प्रवालस्थायीव रक्ताशोकस्य पल्लवः

aṁtarmanyubhareṇāsyāḥ kaṁpate smādharacchadaḥ muhuḥ pravālasthāyīva raktāśokasya pallavaḥ

भीतरी क्रोध के भार से उनका अधरोष्ठ बार-बार काँप रहा था, मानो लाल अशोक वृक्ष का कोमल पल्लव, प्रवाल-शाखा पर स्थित होकर हिल रहा हो।

श्लोक 12 (skanda.1.132.12)

अतीव रज्यमाने तत्पार्वत्या गंडमंडलम् । शाणावघर्षमाणिक्यदर्पणप्रतिमं बभौ

atīva rajyamāne tatpārvatyā gaṁḍamaṁḍalam śāṇāvagharṣamāṇikyadarpaṇapratimaṁ babhau

अत्यन्त लालिमायुक्त होने पर पार्वती का गण्ड-मण्डल शाण पर घिसे जा रहे माणिक्य-दर्पण के समान शोभायमान हो रहा था।

श्लोक 13 (skanda.1.132.13)

अंतर्वेपधुतौ तस्याश्चकंपाते पयोधरौ । पद्मकोशाविवांतःस्थ चंचरीकप्रचालितौ

aṁtarvepadhutau tasyāścakaṁpāte payodharau padmakośāvivāṁtaḥstha caṁcarīkapracālitau

भीतरी कम्पन से हिलते हुए उनके दोनों स्तन काँप रहे थे, मानो भीतर बैठे भ्रमरों से हिलाए गए दो कमल-कोश हों।

श्लोक 14 (skanda.1.132.14)

अचिंतयच्च संभूय सौभाग्याभावतो ननु । ममायमन्यस्त्रीचिंतां कुरुते चंद्रभूषणः

aciṁtayacca saṁbhūya saubhāgyābhāvato nanu mamāyamanyastrīciṁtāṁ kurute caṁdrabhūṣaṇaḥ

और मन में विचारकर उसने सोचा — "निश्चय ही मेरे सौभाग्य की कमी के कारण यह चन्द्र-भूषण किसी अन्य स्त्री का चिन्तन कर रहे हैं।"

श्लोक 15 (skanda.1.132.15)

तदैषा क्वापि यास्यामि किमत्रास्त्येकया मम । तपस्यते च सौभाग्यमर्जनीयं मयाधुना

tadaiṣā kvāpi yāsyāmi kimatrāstyekayā mama tapasyate ca saubhāgyamarjanīyaṁ mayādhunā

"तो अब मैं कहीं और चली जाऊँगी; यहाँ अकेली मेरे लिए क्या रखा है? अब मुझे तप करके ही सौभाग्य अर्जित करना चाहिए।"

श्लोक 16 (skanda.1.132.16)

निमीलिताक्षिण्येवास्य गंतव्यं निभृतं मया । न चेन्मां वारयत्येष कंठादुपरि भाषितैः

nimīlitākṣiṇyevāsya gaṁtavyaṁ nibhṛtaṁ mayā na cenmāṁ vārayatyeṣa kaṁṭhādupari bhāṣitaiḥ

"इनकी आँखें बन्द रहते ही मुझे चुपचाप चले जाना चाहिए; यदि ये कण्ठ से वचन कहकर मुझे रोकते नहीं हैं..."

श्लोक 17 (skanda.1.132.17)

वत्सौ तु वर्धयत्येव गंगेयमतिवत्सला । देवस्तु न स्मरत्येव मामन्यस्त्रीपरायणः

vatsau tu vardhayatyeva gaṁgeyamativatsalā devastu na smaratyeva māmanyastrīparāyaṇaḥ

"यह अत्यन्त वत्सल गंगा तो दोनों पुत्रों का पालन-पोषण कर ही रही है; परन्तु अन्य स्त्री में अनुरक्त यह देव तो मेरा स्मरण तक नहीं करते।"

श्लोक 18 (skanda.1.132.18)

इति निश्चित्य देवस्य पार्श्वादाशु निवृत्त्य सा । अनिर्दिश्य दिशं कांचिद्यातुं व्यग्रा प्रचक्रमे

iti niścitya devasya pārśvādāśu nivṛttya sā anirdiśya diśaṁ kāṁcidyātuṁ vyagrā pracakrame

ऐसा निश्चय कर वह तुरन्त देव के पास से लौटकर, बिना किसी दिशा का निर्देश किए ही, व्यग्र होकर चल पड़ी।

श्लोक 19 (skanda.1.132.19)

चलावती माल्यवती मालिनी विजया जया । वारिता अपि संरंभात्स्वामिनीमन्वयुः स्वयम्

calāvatī mālyavatī mālinī vijayā jayā vāritā api saṁraṁbhātsvāminīmanvayuḥ svayam

चलावती, माल्यवती, मालिनी, विजया और जया — मना किए जाने पर भी उतावलेपन में अपनी स्वामिनी के पीछे स्वयं ही चल पड़ीं।

श्लोक 20 (skanda.1.132.20)

तत्र सापि गिरीन्पुण्यान्वनानि नगराणि च । सरांसि सरितश्चैषा विचचार समंततः

tatra sāpi girīnpuṇyānvanāni nagarāṇi ca sarāṁsi saritaścaiṣā vicacāra samaṁtataḥ

वहाँ वह भी पवित्र पर्वतों, वनों, नगरों, सरोवरों और नदियों में सर्वत्र विचरण करने लगी।

श्लोक 21 (skanda.1.132.21)

भ्रमंती सह्यपादेषु द्राविडाख्ये सुनीवृति । तीर्त्वा शक्त्यापगां देवी विजयां समभाषत

bhramaṁtī sahyapādeṣu drāviḍākhye sunīvṛti tīrtvā śaktyāpagāṁ devī vijayāṁ samabhāṣata

सह्य पर्वत की तराई में, द्राविड़ नामक सुव्यवस्थित प्रदेश में भ्रमण करती हुई, तथा शक्ति नामक नदी को पार करके, देवी ने विजया से कहा।

श्लोक 22 (skanda.1.132.22)

दृश्योऽयं नातिदूरेण पुरस्तात्सकलारुणः । शृंगैस्संलक्ष्यतेऽष्टाभिर्नूनं माहात्म्यवान्गिरिः

dṛśyo'yaṁ nātidūreṇa purastātsakalāruṇaḥ śṛṁgaissaṁlakṣyate'ṣṭābhirnūnaṁ māhātmyavāngiriḥ

"यह सामने न अधिक दूर पर, सम्पूर्ण रूप से अरुण वर्ण का पर्वत दिखाई दे रहा है; निश्चय ही यह अपने आठ शिखरों से पहचाना जाने वाला महिमाशाली गिरि है।"

श्लोक 23 (skanda.1.132.23)

उपत्यकासु चैतस्य दृश्यंते तापसाश्रमाः । अतीव पावनाः शांताः पुण्यारण्यमनोहराः

upatyakāsu caitasya dṛśyaṁte tāpasāśramāḥ atīva pāvanāḥ śāṁtāḥ puṇyāraṇyamanoharāḥ

और इसकी तराइयों में तपस्वियों के आश्रम दिखाई देते हैं, जो अत्यन्त पवित्र, शान्त और पुण्य वन से मनोहर हैं।

श्लोक 24 (skanda.1.132.24)

गत्वा निरूपयामस्तानिमान्पुण्याश्रमान्वयम् । प्रसीदतितरां चेत एषां संदर्शनेन मे

gatvā nirūpayāmastānimānpuṇyāśramānvayam prasīdatitarāṁ ceta eṣāṁ saṁdarśanena me

"चलो, हम जाकर इन पवित्र आश्रमों को देखें; इनके दर्शन मात्र से मेरा मन अत्यन्त प्रसन्न हो रहा है।"

श्लोक 25 (skanda.1.132.25)

एवमाह्रादयत्यालि क्रमेण गिरिनंदिनी । तस्याद्रेर्जग्मुषी पार्श्वमपश्यत्कंचिदाश्रमम्

evamāhrādayatyāli krameṇa girinaṁdinī tasyādrerjagmuṣī pārśvamapaśyatkaṁcidāśramam

इस प्रकार अपनी सखी को प्रसन्न करती हुई गिरिनन्दिनी, क्रमशः उस पर्वत की ओर बढ़ते हुए, किसी आश्रम को देखने लगी।

श्लोक 26 (skanda.1.132.26)

लूतास्तंतून्नयंत्यत्र कुम्भीराः शैवलान्यपि । शिशून्पुष्णंति नीवारैः सफरान्भूरिमायवः

lūtāstaṁtūnnayaṁtyatra kumbhīrāḥ śaivalānyapi śiśūnpuṣṇaṁti nīvāraiḥ sapharānbhūrimāyavaḥ

वहाँ मकड़ियाँ अपने तन्तु बुनती थीं, मगर काई भी एकत्र करते थे, और अत्यन्त चतुर मछलियाँ जंगली धान के दानों से अपने बच्चों का पालन करती थीं।

श्लोक 27 (skanda.1.132.27)

हरंत्यवकरान्वालैश्चमराः स्फीतरोमभिः । समीकुर्वंति चोद्भूतैर्विषाणैर्यत्र सैरिभाः

haraṁtyavakarānvālaiścamarāḥ sphītaromabhiḥ samīkurvaṁti codbhūtairviṣāṇairyatra sairibhāḥ

वहाँ चमरी गाएँ अपनी घनी पूँछों से कूड़ा-कर्कट हटाती थीं, और हाथी अपने उठे हुए दाँतों से भूमि को समतल करते थे।

श्लोक 28 (skanda.1.132.28)

वानराः फलपुष्पाणि मधुपत्राणि भल्लुकाः । क्रोडाः स्नानीयमृत्स्नां च यत्रर्षिभ्यो नयंत्यहो

vānarāḥ phalapuṣpāṇi madhupatrāṇi bhallukāḥ kroḍāḥ snānīyamṛtsnāṁ ca yatrarṣibhyo nayaṁtyaho

वहाँ आश्चर्य की बात है कि वानर फल-फूल, भालू मधु-पत्र, और वराह स्नान की मिट्टी ऋषियों के लिए ले आते थे।

श्लोक 29 (skanda.1.132.29)

काकोलूकैः शुकश्येनैर्मृगव्याघ्रैर्हरिद्विपैः । कलापिसर्पैर्यत्रासुमार्जारैः सौहृदं श्रितम्

kākolūkaiḥ śukaśyenairmṛgavyāghrairharidvipaiḥ kalāpisarpairyatrāsumārjāraiḥ sauhṛdaṁ śritam

वहाँ कौवे और उल्लू, तोते और बाज, हिरण और बाघ, सिंह और हाथी, मोर और सर्प, नेवले और बिल्ली — सभी परस्पर मित्रता का आश्रय लिए हुए थे।

श्लोक 30 (skanda.1.132.30)

हूयमानपुराडाशद्रव्यसौरभ्यहारिणी । यत्र द्रुमांतरालेभ्यो धूम्या निर्याति पावनी

hūyamānapurāḍāśadravyasaurabhyahāriṇī yatra drumāṁtarālebhyo dhūmyā niryāti pāvanī

वहाँ वृक्षों के बीच से होकर पवित्र धूम्रलता उठती थी, जो हवन में डाली जा रही पुरोडाश-सामग्री की सुगन्ध लिए हुए होती थी।

श्लोक 31 (skanda.1.132.31)

पठंति शतरुद्रीयं यत्र वायसवैरिणः । गृणंति काकाः स्तोत्राणि साम गायंति सारिकाः

paṭhaṁti śatarudrīyaṁ yatra vāyasavairiṇaḥ gṛṇaṁti kākāḥ stotrāṇi sāma gāyaṁti sārikāḥ

वहाँ काकों के शत्रु उल्लू शतरुद्रीय का पाठ करते थे, कौवे स्तोत्रों का उच्चारण करते थे, और मैना पक्षी साम-गान गाती थीं।

श्लोक 32 (skanda.1.132.32)

शाकशालिषु शार्दूलाश्चरंति च तथैव गाः । सिंचंति पुष्करांभोभिः कुंभिनी यत्र पादपान्

śākaśāliṣu śārdūlāścaraṁti ca tathaiva gāḥ siṁcaṁti puṣkarāṁbhobhiḥ kuṁbhinī yatra pādapān

वहाँ शाक और धान के खेतों में बाघ और गाएँ एक साथ विचरण करती थीं, और हथिनियाँ कमल-सरोवर के जल से वृक्षों को सींचती थीं।

श्लोक 33 (skanda.1.132.33)

क्वचिच्च शोभने देशे पुण्ये पुण्यमनोहरे । ददर्श सा तपस्यन्तं यं कंचिद्दृषिसत्तमम्

kvacicca śobhane deśe puṇye puṇyamanohare dadarśa sā tapasyantaṁ yaṁ kaṁciddṛṣisattamam

और उस सुन्दर, पवित्र और मनोहर स्थान में, उसने किसी परम श्रेष्ठ ऋषि को तप करते हुए देखा।

श्लोक 34 (skanda.1.132.34)

अधस्तात्सप्तपर्णस्य चित्रव्याघ्रत्वगासने । बद्धवीरासनं सम्यक्पावने कुशविष्टरे

adhastātsaptaparṇasya citravyāghratvagāsane baddhavīrāsanaṁ samyakpāvane kuśaviṣṭare

सप्तपर्ण वृक्ष के नीचे, चितकबरे व्याघ्रचर्म के आसन पर, पवित्र कुश के विष्टर पर वीरासन लगाए हुए बैठा था।

श्लोक 35 (skanda.1.132.35)

शालिशूकारुणाभाभिर्जटाभिर्भस्मपांडुरम् । अचंचलाभिर्विद्युद्भिरिव शारदवारिदम्

śāliśūkāruṇābhābhirjaṭābhirbhasmapāṁḍuram acaṁcalābhirvidyudbhiriva śāradavāridam

उसकी जटाएँ धान की बालियों के समान अरुण आभा वाली थीं, तथा भस्म से धूसरित शरीर, मानो शरत्कालीन मेघ को स्थिर बिजली की चमक से आभासित कर रहा हो।

श्लोक 36 (skanda.1.132.36)

नासाग्रनिश्चलदृशं समप्रस्फुरिताधरम् । आवर्त्तयन्तं रुद्राक्षमालिकामग्रपाणिना

nāsāgraniścaladṛśaṁ samaprasphuritādharam āvarttayantaṁ rudrākṣamālikāmagrapāṇinā

नासाग्र पर स्थिर दृष्टि रखे, तथा होंठों को धीरे-धीरे कँपाते हुए, वह अपनी अंगुलियों के अग्रभाग से रुद्राक्ष की माला फेर रहा था।

श्लोक 37 (skanda.1.132.37)

प्रत्यग्रनिर्णेजनतो ह्यंत्यश्यानदशांचले । वसानं वल्कलयुगे संध्याभ्रे भूभृतां यथा

pratyagranirṇejanato hyaṁtyaśyānadaśāṁcale vasānaṁ valkalayuge saṁdhyābhre bhūbhṛtāṁ yathā

नित्य नए धुले हुए, किन्तु किनारों से घिसे हुए वल्कल के दो वस्त्र पहने हुए था, मानो पर्वतों पर संध्याकालीन मेघ हो।

श्लोक 38 (skanda.1.132.38)

षड्वर्गहिंस्रबंधाय स्थापितां वागुरामिव । उपवीतत्रयीमारादुरोगर्तस्य बिभ्रतम् । कृतोचितोपचारा सा तमप्राक्षीत्तपोधनम्

ṣaḍvargahiṁsrabaṁdhāya sthāpitāṁ vāgurāmiva upavītatrayīmārādurogartasya bibhratam kṛtocitopacārā sā tamaprākṣīttapodhanam

वह अपने वक्षःस्थल पर त्रिगुण यज्ञोपवीत धारण किए हुए था, मानो षड्रिपुओं को बाँधकर मारने के लिए बिछाया गया जाल हो; उचित शिष्टाचार करके देवी ने उस तपोधन ऋषि से प्रश्न किया।

श्लोक 39 (skanda.1.132.39)

पार्वत्युवाच । कस्त्वं कोऽयं गिरिवरो यत्र त्वं कुरुषे तपः

pārvatyuvāca kastvaṁ ko'yaṁ girivaro yatra tvaṁ kuruṣe tapaḥ

पार्वती जी ने कहा — "तुम कौन हो, और यह कौन-सा श्रेष्ठ पर्वत है जहाँ तुम तप कर रहे हो?"

श्लोक 40 (skanda.1.132.40)

स चाहारुणशैलोऽयं पुण्यक्षेत्रेषु पूजितः । गौतमोऽहं मुनिर्मुक्त्यै तपसाराधये शिवम्

sa cāhāruṇaśailo'yaṁ puṇyakṣetreṣu pūjitaḥ gautamo'haṁ munirmuktyai tapasārādhaye śivam

उसने कहा — "यह अरुण पर्वत है, जो पुण्य-क्षेत्रों में पूजित है; मैं गौतम मुनि हूँ, और मोक्ष के लिए तप द्वारा शिव जी की आराधना करता हूँ।"

श्लोक 41 (skanda.1.132.41)

इत्युक्त्वा विजयादीनां मुखेनैनामुमां विदन् । प्रणम्य भक्त्या बहुशो नीतवानुटजं निजम्

ityuktvā vijayādīnāṁ mukhenaināmumāṁ vidan praṇamya bhaktyā bahuśo nītavānuṭajaṁ nijam

ऐसा कहकर, विजया आदि के मुख से यह जानकर कि यह स्वयं उमा ही हैं, उसने भक्तिपूर्वक बार-बार प्रणाम कर उन्हें अपनी कुटिया में ले गया।

श्लोक 42 (skanda.1.132.42)

कन्दमूलफलाद्यैश्च कृतातिथ्यामिमां मुनिः । जगन्मंगलमूलाय तपसे चान्वमन्यत

kandamūlaphalādyaiśca kṛtātithyāmimāṁ muniḥ jaganmaṁgalamūlāya tapase cānvamanyata

उस मुनि ने कन्द, मूल, फल आदि से उनका आतिथ्य-सत्कार करके, जगत् के मंगल हेतु उन्हें वहाँ तप करने की अनुमति दे दी।

श्लोक 43 (skanda.1.132.43)

ज्योतिःस्तम्भस्य संभूतिमारभ्यानुक्रमेण सः । जगाद चास्यै शोणाद्रेर्महिमानमशेषतः

jyotiḥstambhasya saṁbhūtimārabhyānukrameṇa saḥ jagāda cāsyai śoṇādrermahimānamaśeṣataḥ

तत्पश्चात् उस मुनि ने ज्योतिःस्तम्भ की उत्पत्ति से लेकर क्रमशः शोणाद्रि की सम्पूर्ण महिमा उन्हें कह सुनाई।

श्लोक 44 (skanda.1.132.44)

शोणाद्रेः पूर्वदिग्भागे स्थलीश्वरमिति स्थलम् । यत्र संनिहितः शंभुर्ज्योतिर्लिंगात्मतां गतः

śoṇādreḥ pūrvadigbhāge sthalīśvaramiti sthalam yatra saṁnihitaḥ śaṁbhurjyotirliṁgātmatāṁ gataḥ

"शोणाद्रि की पूर्व दिशा में स्थलीश्वर नामक एक स्थान है, जहाँ ज्योतिर्लिंग रूप धारण किए हुए शम्भु स्वयं विराजमान हैं।"

श्लोक 45 (skanda.1.132.45)

वैकुण्ठपरमेष्ठ्यादि गीर्वाण निबिडीकृते । न तत्र मे तपः कर्तुमव्याक्षेपेण शक्यते

vaikuṇṭhaparameṣṭhyādi gīrvāṇa nibiḍīkṛte na tatra me tapaḥ kartumavyākṣepeṇa śakyate

"वहाँ विष्णु, ब्रह्मा आदि देवताओं की अत्यन्त भीड़ रहती है; इसलिए वहाँ मैं निर्विघ्न रूप से तप नहीं कर सकता।"

श्लोक 46 (skanda.1.132.46)

अयं शोणगिरेः पादः प्रवालाचलनामवान् । पुण्यारण्योपरुद्धत्वाद्रहस्यत्वं विगाहते

ayaṁ śoṇagireḥ pādaḥ pravālācalanāmavān puṇyāraṇyoparuddhatvādrahasyatvaṁ vigāhate

"शोणगिरि का यह पादप्रदेश, जिसका नाम प्रवालाचल है, पुण्य वन से घिरा होने के कारण एकान्तता को प्राप्त है।"

श्लोक 47 (skanda.1.132.47)

तत एवाहमत्रैव प्रतिष्ठाप्य त्रिलोचनम् । आराधये यथाशक्ति तपोभिः कल्पितात्मभिः

tata evāhamatraiva pratiṣṭhāpya trilocanam ārādhaye yathāśakti tapobhiḥ kalpitātmabhiḥ

"इसलिए यहीं मैंने त्रिनेत्रधारी शिव जी की स्थापना कर, अपनी शक्ति के अनुसार आत्म-निर्मित तपस्याओं द्वारा उनकी आराधना की है।"

श्लोक 48 (skanda.1.132.48)

ममाश्रमसमीपेऽस्मिन्पुण्यक्षेत्रमिदं महत् । क्रियतामाश्रमो देव्या कर्त्तव्यं हि तपश्चिरम्

mamāśramasamīpe'sminpuṇyakṣetramidaṁ mahat kriyatāmāśramo devyā karttavyaṁ hi tapaściram

"मेरे इस आश्रम के समीप यह महान् पुण्यक्षेत्र है; देवी यहीं अपना आश्रम बना लें, क्योंकि उन्हें दीर्घकाल तक तप करना है।"

श्लोक 49 (skanda.1.132.49)

मुनेरेवमनुज्ञानात्कृताश्रमपरिग्रहा । उदयुंक्त तपः कर्त्तुं सुमहत्पर्वतात्मजा

munerevamanujñānātkṛtāśramaparigrahā udayuṁkta tapaḥ karttuṁ sumahatparvatātmajā

इस प्रकार मुनि की अनुमति पाकर, पर्वतपुत्री ने वहाँ अपना आश्रम स्थापित किया और तप करने में स्वयं को लगा दिया।

श्लोक 50 (skanda.1.132.50)

आश्रमं रक्षितुं सत्यवतीं काननवासिनीम् । शुभगां धुंधुमारिं च प्रागाद्याशास्वतिष्ठिपत्

āśramaṁ rakṣituṁ satyavatīṁ kānanavāsinīm śubhagāṁ dhuṁdhumāriṁ ca prāgādyāśāsvatiṣṭhipat

अपने आश्रम की रक्षा के लिए उसने वनवासिनी सत्यवती, तथा सुन्दरी धुन्धुमारी आदि को पूर्व आदि दिशाओं में नियुक्त किया।

श्लोक 51 (skanda.1.132.51)

तपोवनस्य सर्वस्य रक्षार्थं सा समादिशत् । दुर्गामनर्गलस्फूर्तिमाज्ञानिर्वाहणक्षमाम्

tapovanasya sarvasya rakṣārthaṁ sā samādiśat durgāmanargalasphūrtimājñānirvāhaṇakṣamām

सम्पूर्ण तपोवन की रक्षा के लिए उसने अबाध शक्ति वाली, तथा आज्ञा-पालन में समर्थ दुर्गा को नियुक्त किया।

श्लोक 52 (skanda.1.132.52)

अनंतरं सा धम्मिल्लं मंदारप्रसवोचितम् । जटाभरत्वं तपसे गमयामास पार्वती

anaṁtaraṁ sā dhammillaṁ maṁdāraprasavocitam jaṭābharatvaṁ tapase gamayāmāsa pārvatī

तत्पश्चात् पार्वती ने मन्दार-पुष्पों के योग्य अपने केश-बन्ध को तप के लिए जटाओं के रूप में परिणत कर दिया।

श्लोक 53 (skanda.1.132.53)

हंसचिह्नदशं हित्वा दुकूलं मिहकालघु । परुषं सुकुमारांगी परिधत्तेस्म वल्कलम्

haṁsacihnadaśaṁ hitvā dukūlaṁ mihakālaghu paruṣaṁ sukumārāṁgī paridhattesma valkalam

हंस-चिह्न से युक्त, कुहासे के समान हल्के रेशमी वस्त्र को त्यागकर, उस सुकुमारांगी ने कठोर वल्कल वस्त्र धारण कर लिया।

श्लोक 54 (skanda.1.132.54)

अपि प्रसूनावचयनिस्सहांगुलिपल्लवा । अलावीदतितीक्ष्णाग्राण्यविकारं कुशानि सा

api prasūnāvacayanissahāṁgulipallavā alāvīdatitīkṣṇāgrāṇyavikāraṁ kuśāni sā

फूल तोड़ने में भी असमर्थ जान पड़ने वाली उन कोमल अंगुलियों से, वह बिना किसी विकार के अत्यन्त तीक्ष्ण अग्रभाग वाली कुश घास काटती थी।

श्लोक 55 (skanda.1.132.55)

वज्रसूचिनिर्भरांगैरवच्छिन्नानि कंटकैः । शिरीषमृद्वी शांडिल्यपल्लवान्युच्चिकाय या

vajrasūcinirbharāṁgairavacchinnāni kaṁṭakaiḥ śirīṣamṛdvī śāṁḍilyapallavānyuccikāya yā

शिरीष के समान कोमल वह, वज्र-सूचि के समान कठोर काँटों से कटी हुई शाण्डिल्य-वृक्ष की पत्तियों को बीनती थी।

श्लोक 56 (skanda.1.132.56)

पावन्यां कमलानद्यां प्रातर्विहितमज्जना । अर्चयामास रक्ताब्जैर्यथाविधि विभाकरम्

pāvanyāṁ kamalānadyāṁ prātarvihitamajjanā arcayāmāsa raktābjairyathāvidhi vibhākaram

प्रातःकाल पवित्र कमला नदी में स्नान करके, वह विधिपूर्वक लाल कमलों से सूर्यदेव की पूजा करती थी।

श्लोक 57 (skanda.1.132.57)

दर्भाक्षततिलोन्मिश्रैर्गौरी श्रीनदिवारिभिः । देवी निर्वर्तयामास देवर्षिपितृतर्पणम्

darbhākṣatatilonmiśrairgaurī śrīnadivāribhiḥ devī nirvartayāmāsa devarṣipitṛtarpaṇam

गौरी देवी दर्भ, अक्षत और तिल से मिश्रित पवित्र नदी के जल द्वारा देव, ऋषि और पितरों का तर्पण करती थी।

श्लोक 58 (skanda.1.132.58)

वालुकामंडले सूर्यमावाह्याभ्यर्च्य पंकजैः । कृतप्रदक्षिणा गौरी प्रणनाम सहस्रशः

vālukāmaṁḍale sūryamāvāhyābhyarcya paṁkajaiḥ kṛtapradakṣiṇā gaurī praṇanāma sahasraśaḥ

बालू के मण्डल पर सूर्य का आवाहन कर, कमलों से उनकी पूजा करके, गौरी ने प्रदक्षिणा कर सहस्र बार प्रणाम किया।

श्लोक 59 (skanda.1.132.59)

स्वयमेव प्रतिष्ठाप्य लिंगं किमपि शंकरम् । आगमोक्तेन विधिना पूजयामास पार्वती

svayameva pratiṣṭhāpya liṁgaṁ kimapi śaṁkaram āgamoktena vidhinā pūjayāmāsa pārvatī

स्वयं ही किसी शंकर-लिंग की स्थापना कर, पार्वती ने आगमोक्त विधि से उसकी पूजा की।

श्लोक 60 (skanda.1.132.60)

आसनेन च मूर्त्या च मूलेनांगैश्च सा रविम् । दंडिपिंगलमुख्यांश्च शक्तीर्दीप्तादिका अपि

āsanena ca mūrtyā ca mūlenāṁgaiśca sā ravim daṁḍipiṁgalamukhyāṁśca śaktīrdīptādikā api

वह आसन-मन्त्र, मूर्ति-मन्त्र, मूल-मन्त्र और अंग-मन्त्रों से सूर्य की, तथा दण्डि-पिंगल आदि प्रमुख पार्षदों और दीप्ता आदि शक्तियों की भी पूजा करती थी।

श्लोक 61 (skanda.1.132.61)

तत्तद्दिक्षु च सोमादीन्ग्रहान्धेन्वादिमुद्रया । तेजश्चंडे चार्चयित्वा निर्माल्यं च न्यवेदयत्

tattaddikṣu ca somādīngrahāndhenvādimudrayā tejaścaṁḍe cārcayitvā nirmālyaṁ ca nyavedayat

उस-उस दिशा में सोम आदि ग्रहों की धेनु-मुद्रा आदि से, तथा तेज को चण्ड में अर्चना कर, वह निर्माल्य अर्पित करती थी।

श्लोक 62 (skanda.1.132.62)

अर्घेणातीव शुद्धेन संप्रोक्ष्य च समंततः । द्वारवास्तु समभ्यर्च्य न्यासानपि चकार सा

argheṇātīva śuddhena saṁprokṣya ca samaṁtataḥ dvāravāstu samabhyarcya nyāsānapi cakāra sā

अत्यन्त पवित्र अर्घ्य से चारों ओर छिड़काव कर, तथा द्वार और वास्तु देवताओं की पूजा कर, वह न्यास भी करती थी।

श्लोक 63 (skanda.1.132.63)

भूतशुद्धिं विधायान्वगंतर्यागं चकार सा । हृदि पद्मासने चार्च्य ज्ञानधर्मादिकान्क्रमात्

bhūtaśuddhiṁ vidhāyānvagaṁtaryāgaṁ cakāra sā hṛdi padmāsane cārcya jñānadharmādikānkramāt

भूतशुद्धि करके उसके बाद वह अन्तर्यजन करती थी, तथा हृदय में पद्मासन पर ज्ञान, धर्म आदि का क्रमशः पूजन करती थी।

श्लोक 64 (skanda.1.132.64)

शक्तीर्दलेषु वामादीर्दलाग्रे सूर्यवेधसौ । केसराग्रे सोमविष्णू कर्णिकाग्रेऽग्निधूर्जटी

śaktīrdaleṣu vāmādīrdalāgre sūryavedhasau kesarāgre somaviṣṇū karṇikāgre'gnidhūrjaṭī

पंखुड़ियों पर वामा आदि शक्तियों को, पंखुड़ियों के अग्रभाग पर सूर्य और ब्रह्मा को, केसर के अग्रभाग पर चन्द्रमा और विष्णु को, तथा कर्णिका के अग्रभाग पर अग्नि और शिव को उसने पूजा।

श्लोक 65 (skanda.1.132.65)

तदूर्ध्वे शक्तिचक्रं च विन्यस्तब्रह्मपंचका । अंगैर्दत्त्वा च पाद्यादीनुपचर्याभिषिच्य सा

tadūrdhve śakticakraṁ ca vinyastabrahmapaṁcakā aṁgairdattvā ca pādyādīnupacaryābhiṣicya sā

उसके ऊपर पाँच ब्रह्मों से युक्त शक्ति-चक्र की पूजा कर, अंग-मन्त्रों सहित पाद्य आदि उपचार देकर, तथा अभिषेक करके।

श्लोक 66 (skanda.1.132.66)

प्रादाच्चंदनपुष्पादि धूपदीपप्रदायिनी । भूयोपि पंचब्रह्माणि षडंगान्यप्यपूजयत्

prādāccaṁdanapuṣpādi dhūpadīpapradāyinī bhūyopi paṁcabrahmāṇi ṣaḍaṁgānyapyapūjayat

उसने चन्दन, पुष्प आदि अर्पित किए तथा धूप-दीप भी दिए; और पुनः पाँच ब्रह्मों तथा छह अंगों की भी पूजा की।

श्लोक 67 (skanda.1.132.67)

तत्तद्दिक्षु च शक्रादीन्वज्रादींश्च विधानतः । कृत्वा सर्वोपचारांश्च वितताराष्टपुष्पिकाम्

tattaddikṣu ca śakrādīnvajrādīṁśca vidhānataḥ kṛtvā sarvopacārāṁśca vitatārāṣṭapuṣpikām

उस-उस दिशा में इन्द्र आदि दिक्पालों तथा वज्र आदि आयुधों की विधिपूर्वक पूजा कर, तथा सम्पूर्ण उपचार देकर, उसने अष्टपुष्पिका अर्पित की।

श्लोक 68 (skanda.1.132.68)

पंचवक्त्राणि चाभ्यर्च्य कृतचंडेश्वरार्चना । प्रदक्षिणा प्रणामाद्यैर्नित्यं शिवमपूजयत्

paṁcavaktrāṇi cābhyarcya kṛtacaṁḍeśvarārcanā pradakṣiṇā praṇāmādyairnityaṁ śivamapūjayat

शिव के पाँचों मुखों की पूजा कर तथा चण्डेश्वर की अर्चना करके, वह प्रतिदिन प्रदक्षिणा और प्रणाम आदि से शिव की पूजा करती थी।

श्लोक 69 (skanda.1.132.69)

शिवागमोक्तविधिना द्रव्यैः सौभाग्यदायिभिः । सा जुहाव च पूजांते प्रणीते जातवेदसि

śivāgamoktavidhinā dravyaiḥ saubhāgyadāyibhiḥ sā juhāva ca pūjāṁte praṇīte jātavedasi

शिवागम में कहे गए विधान के अनुसार, सौभाग्यप्रद द्रव्यों से, पूजा के अन्त में उसने प्रज्वलित अग्नि में हवन किया।

श्लोक 70 (skanda.1.132.70)

परिकल्पितोपचारा च कंदमूलफलादिकैः । स्वयं कृतोपचारेयमतिथीनभ्यपूजयत्

parikalpitopacārā ca kaṁdamūlaphalādikaiḥ svayaṁ kṛtopacāreyamatithīnabhyapūjayat

कन्द, मूल, फल आदि से स्वयं तैयार किए गए उपचारों द्वारा, वह स्वयं अतिथियों का सत्कार करती थी।

श्लोक 71 (skanda.1.132.71)

अंगुष्ठाग्रेण तिष्ठंती ग्रीष्ये पंचाग्निमध्यतः । ह्रदे च शिशिरे चंद्रपीयूषाप्यायिताऽभवत्

aṁguṣṭhāgreṇa tiṣṭhaṁtī grīṣye paṁcāgnimadhyataḥ hrade ca śiśire caṁdrapīyūṣāpyāyitā'bhavat

ग्रीष्म ऋतु में पंचाग्नि के मध्य पैर के अंगूठे के अग्रभाग पर खड़ी रहती थी, और शिशिर ऋतु में जलाशय में रहकर केवल चन्द्रमा के अमृत से ही तृप्त होती थी।

श्लोक 72 (skanda.1.132.72)

वर्षरात्रीषु धाराभिः सह वारिधरा पुनः । सौदामिनीव ददृशे तमसि स्तिमिता कृतिः

varṣarātrīṣu dhārābhiḥ saha vāridharā punaḥ saudāminīva dadṛśe tamasi stimitā kṛtiḥ

वर्षा ऋतु की रातों में जलधाराओं के साथ भीगती हुई, वह स्थिर कृति अन्धकार में मानो बिजली के समान दिखाई पड़ती थी।

श्लोक 73 (skanda.1.132.73)

पाणिपादेन पद्मानि मुखेन च कलानिधिम् । प्रदर्शयत्यनायासान्निन्ये सा हैमनीर्निशाः

pāṇipādena padmāni mukhena ca kalānidhim pradarśayatyanāyāsānninye sā haimanīrniśāḥ

बिना किसी प्रयास के अपने हाथों और चरणों से कमलों को, तथा मुख से चन्द्रमा को मानो प्रदर्शित करती हुई, उसने हेमन्त की रातें व्यतीत कीं।

श्लोक 74 (skanda.1.132.74)

नीवारबीजदानेन सा मृगानप्यपोषयत् । अज्ञातहिंसाभिभवानाश्रमोपांतवर्तिनः

nīvārabījadānena sā mṛgānapyapoṣayat ajñātahiṁsābhibhavānāśramopāṁtavartinaḥ

जंगली धान के बीज देकर, उसने आश्रम के समीप रहने वाले मृगों का भी पालन-पोषण किया, जो हिंसा और अपमान से अनजान ही रहते थे।

श्लोक 75 (skanda.1.132.75)

कृतालवालसलिलैः सुवालाकलशाहृतैः । वात्सल्याद्वर्द्धयामास पूर्णानाश्रमपादपान्

kṛtālavālasalilaiḥ suvālākalaśāhṛtaiḥ vātsalyādvarddhayāmāsa pūrṇānāśramapādapān

छोटी-छोटी बालिकाओं द्वारा घड़ों में लाए गए जल से बनाए गए आलवालों में जल देकर, उसने वात्सल्यभाव से आश्रम के पूर्ण वृक्षों को सींचा।

श्लोक 76 (skanda.1.132.76)

प्रदक्षिणां कृतवती शोणशैलं गिरींद्रजा । सा मनोरथसंसिद्ध्यै नित्यं सह सखीजनैः

pradakṣiṇāṁ kṛtavatī śoṇaśailaṁ girīṁdrajā sā manorathasaṁsiddhyai nityaṁ saha sakhījanaiḥ

पर्वतराज-पुत्री ने अपने मनोरथ की सिद्धि के लिए, प्रतिदिन अपनी सखियों के साथ शोणशैल की प्रदक्षिणा की।

श्लोक 77 (skanda.1.132.77)

पंचाक्षरी जजापैषा शिवस्तोत्राण्युदैरयत् । दध्यौ च देवं मनसा शोणपर्वतरूपिणम्

paṁcākṣarī jajāpaiṣā śivastotrāṇyudairayat dadhyau ca devaṁ manasā śoṇaparvatarūpiṇam

वह पंचाक्षरी मन्त्र का जप करती थी, शिव-स्तोत्रों का उच्चारण करती थी, तथा मन ही मन शोणपर्वत के रूप में देव का ध्यान करती थी।

श्लोक 78 (skanda.1.132.78)

अनुदिनमरुणाचलेश्वरं सा प्रणतवती विहितप्रदक्षिणाद्यैः । शिवनिगमविधानवेदिनी सा व्यरचयदद्रिसुता चिरं तपस्याम्

anudinamaruṇācaleśvaraṁ sā praṇatavatī vihitapradakṣiṇādyaiḥ śivanigamavidhānavedinī sā vyaracayadadrisutā ciraṁ tapasyām

प्रतिदिन विधिपूर्वक प्रदक्षिणा आदि करके, वह अरुणाचलेश्वर को प्रणाम करती थी; शिवागम के विधान की ज्ञाता वह गिरिपुत्री इस प्रकार दीर्घकाल तक तपस्या करती रही।

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