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माहेश्वर खण्ड · अध्याय 133

देवी की तपश्चर्या और महिषासुर-वध

अध्याय 132अध्याय-सूचीअध्याय 134

श्लोक 1 (skanda.1.133.1)

नंदिकेश्वर उवाच । तावत्कुतश्चिदाकर्ण्य तत्रस्थां महिषासुरः । अवज्ञातसुरारातिर्विध्वंसितपुरंदरः

naṁdikeśvara uvāca tāvatkutaścidākarṇya tatrasthāṁ mahiṣāsuraḥ avajñātasurārātirvidhvaṁsitapuraṁdaraḥ

नन्दिकेश्वर जी ने कहा — इसी बीच किसी प्रकार यह सुनकर कि देवी वहाँ निवास कर रही हैं, देवताओं का तिरस्कार करने वाला, इन्द्र का विध्वंसक महिषासुर —

श्लोक 2 (skanda.1.133.2)

सर्वलोकजयी सिद्धविद्याधरभयावहः । दुर्निग्रहो वरादासीच्छस्त्रास्त्रैरखिलैरपि

sarvalokajayī siddhavidyādharabhayāvahaḥ durnigraho varādāsīcchastrāstrairakhilairapi

— सम्पूर्ण लोकों का विजेता, सिद्धों और विद्याधरों के लिए भयंकर, तथा वरदान के कारण समस्त शस्त्रों और अस्त्रों से भी अजेय था।

श्लोक 3 (skanda.1.133.3)

तीक्ष्णानामपि शापानामप्यगोचरतां गतः । दर्पद्भिर्दानवैदैत्यैः कौणपैश्च निषेवितः

tīkṣṇānāmapi śāpānāmapyagocaratāṁ gataḥ darpadbhirdānavaidaityaiḥ kauṇapaiśca niṣevitaḥ

— तीक्ष्ण से तीक्ष्ण शापों की भी पहुँच से परे था, तथा अभिमानी दानवों, दैत्यों और राक्षसों से सेवित रहता था।

श्लोक 4 (skanda.1.133.4)

दूषको मुनिपत्नीनां धर्ममार्गोपघातकः । बलात्पुलोम्नो नमुचेर्वृत्रादपि बलाधिकः

dūṣako munipatnīnāṁ dharmamārgopaghātakaḥ balātpulomno namucervṛtrādapi balādhikaḥ

— मुनि-पत्नियों को दूषित करने वाला, धर्म-मार्ग का घातक, तथा बल में पुलोमा, नमुचि और वृत्र से भी अधिक बलवान था।

श्लोक 5 (skanda.1.133.5)

हिरण्यकशिपोर्वश्यो हिरण्याक्ष इवापरः । तां विलोभयितुं कांचित्प्राहिणोत्किल दूतिकाम्

hiraṇyakaśiporvaśyo hiraṇyākṣa ivāparaḥ tāṁ vilobhayituṁ kāṁcitprāhiṇotkila dūtikām

— हिरण्यकशिपु का अनुगामी, मानो दूसरा हिरण्याक्ष हो — उसने देवी को लुभाने के लिए किसी दूतिका को भेजा।

श्लोक 6 (skanda.1.133.6)

ततः सा तापसीवेषधारिणी गिरिजां प्रति । सखीसमक्ष एवेदमुवाचानुचितं वचः

tataḥ sā tāpasīveṣadhāriṇī girijāṁ prati sakhīsamakṣa evedamuvācānucitaṁ vacaḥ

तब वह तापसी का वेश धारण किए हुए, गिरिजा के समक्ष, सखियों के सामने ही यह अनुचित वचन बोली।

श्लोक 7 (skanda.1.133.7)

अरारु भीषणे भीरो निवसस्यत्र किं वने । विहर्तुमुचिता रम्येष्ववरोधनवेश्मसु

arāru bhīṣaṇe bhīro nivasasyatra kiṁ vane vihartumucitā ramyeṣvavarodhanaveśmasu

"हे भीरु, इस भयंकर वन में तुम क्यों निवास कर रही हो? तुम तो रमणीय अन्तःपुर के भवनों में विहार करने योग्य हो।"

श्लोक 8 (skanda.1.133.8)

किमर्थं वाद्य चित्तं ते यौवने भोगनिःस्पृहम् । निवेशितं तपसि च दैवतैरपि दुष्करे

kimarthaṁ vādya cittaṁ te yauvane bhoganiḥspṛham niveśitaṁ tapasi ca daivatairapi duṣkare

"अभी युवावस्था में ही तुम्हारा मन भोग से विरक्त होकर, देवताओं के लिए भी दुष्कर ऐसे तप में क्यों लगा दिया गया है?"

श्लोक 9 (skanda.1.133.9)

हंसतूलमयीं शय्यां मुक्तामयवितानिकाम् । हित्वा किमिति मृद्वंगि सुप्यते परुषाश्मसु

haṁsatūlamayīṁ śayyāṁ muktāmayavitānikām hitvā kimiti mṛdvaṁgi supyate paruṣāśmasu

"हे कोमलांगी, हंस के रोओं की शय्या और मोतियों की वितानिका को त्यागकर, तुम कठोर पत्थरों पर क्यों सोती हो?"

श्लोक 10 (skanda.1.133.10)

तपोजडो मृडो दिष्ट्या प्रागेवास्ति त्वयोज्झितः । तवानुरूपो नैवान्यो विद्यते दिविषत्सु च

tapojaḍo mṛḍo diṣṭyā prāgevāsti tvayojjhitaḥ tavānurūpo naivānyo vidyate diviṣatsu ca

"सौभाग्य से, तप में जड़ हो चुके मृडेश तो तुमने पहले ही त्याग दिए हैं; तथा देवताओं में भी तुम्हारे योग्य दूसरा कोई नहीं है।"

श्लोक 11 (skanda.1.133.11)

किं तु त्रैलोक्यनाथोऽस्ति महिषो दानवेश्वरः । यदि द्रक्ष्यसि तं सुभ्र त्यक्ष्यस्येव क्षणात्तपः

kiṁ tu trailokyanātho'sti mahiṣo dānaveśvaraḥ yadi drakṣyasi taṁ subhra tyakṣyasyeva kṣaṇāttapaḥ

"किन्तु त्रिलोकनाथ महिषासुर, दानवों का स्वामी, विद्यमान है। हे सुभ्रु, यदि तुम उसे देख लोगी, तो निश्चय ही क्षणभर में अपना तप त्याग दोगी।"

श्लोक 12 (skanda.1.133.12)

किं निह्नवेन नन्वेष श्रुत्वा सर्वं चिरात्प्रभुः । स प्राहिणोदुपानेतुं दूतिकां मां स्मरातुरः

kiṁ nihnavena nanveṣa śrutvā sarvaṁ cirātprabhuḥ sa prāhiṇodupānetuṁ dūtikāṁ māṁ smarāturaḥ

"छिपाने से क्या लाभ? यह प्रभु सब कुछ बहुत पहले सुनकर, काम से पीड़ित होकर, मुझे दूतिका बनाकर तुम्हें लाने के लिए भेजा है।"

श्लोक 13 (skanda.1.133.13)

इत्यत्यंतविरुद्धं तां ब्रुवाणामसमंजसम् । देव्याश्चित्तस्थितिं ज्ञात्वा विजया निरकासयत्

ityatyaṁtaviruddhaṁ tāṁ bruvāṇāmasamaṁjasam devyāścittasthitiṁ jñātvā vijayā nirakāsayat

इस प्रकार अत्यन्त विपरीत और असंगत वचन बोलती हुई उस दूती को, देवी के मनोभाव को समझकर, विजया ने वहाँ से निकाल दिया।

श्लोक 14 (skanda.1.133.14)

सा चातिरोषेण कृतप्रतिज्ञा दैत्यरूपिका । गत्वा विदितवृत्तांतमकरोन्महिषासुरम्

sā cātiroṣeṇa kṛtapratijñā daityarūpikā gatvā viditavṛttāṁtamakaronmahiṣāsuram

वह दैत्य-रूपिणी दूती अत्यन्त क्रोध से प्रतिज्ञा करके, जाकर महिषासुर को सम्पूर्ण वृत्तान्त से अवगत कराया।

श्लोक 15 (skanda.1.133.15)

सोऽपि तत्सर्वमाकर्ण्य रुषातीवारुणेक्षणः । देवीं जिघृक्षुरभ्यागाद्वृतो दैतेयकोटिभिः

so'pi tatsarvamākarṇya ruṣātīvāruṇekṣaṇaḥ devīṁ jighṛkṣurabhyāgādvṛto daiteyakoṭibhiḥ

वह भी यह सब सुनकर, अत्यन्त क्रोध से रक्तवर्ण नेत्रों वाला होकर, करोड़ों दैत्यों से घिरा हुआ, देवी को पकड़ने के लिए चढ़ आया।

श्लोक 16 (skanda.1.133.16)

स्यन्दनैर्द्विरदैरश्वैः पत्तिभिश्च समंततः । भुवमाच्छादयामास ध्वजैश्च गगनांतरम्

syandanairdviradairaśvaiḥ pattibhiśca samaṁtataḥ bhuvamācchādayāmāsa dhvajaiśca gaganāṁtaram

रथों, हाथियों, घोड़ों और पैदल सैनिकों से उसने सम्पूर्ण पृथ्वी को ढक दिया, तथा ध्वजाओं से आकाश के मध्य भाग को भी आच्छादित कर दिया।

श्लोक 17 (skanda.1.133.17)

क्ष्वेलितैर्वाद्यघोषैश्च नभः स्फुटदिवाभवत् । पादाघातैश्च दैत्यानां विदद्रे वसुधातलम्

kṣvelitairvādyaghoṣaiśca nabhaḥ sphuṭadivābhavat pādāghātaiśca daityānāṁ vidadre vasudhātalam

सिंह-गर्जना और वाद्यों की गर्जना से आकाश मानो फटा जा रहा हो, तथा दैत्यों के पैरों की धमक से पृथ्वी का तल मानो विदीर्ण हो रहा हो।

श्लोक 18 (skanda.1.133.18)

करालो दुर्द्धरस्तस्य विचष्णुर्विकरालकः । बाष्कलो दुर्मुखश्चंडः प्रचंडश्चामरासुरः

karālo durddharastasya vicaṣṇurvikarālakaḥ bāṣkalo durmukhaścaṁḍaḥ pracaṁḍaścāmarāsuraḥ

करात, दुर्धर, विचष्णु, विकरालक, बाष्कल, दुर्मुख, चण्ड, प्रचण्ड और चामर नामक असुर —

श्लोक 19 (skanda.1.133.19)

महाहनुर्महामौलिरुग्रास्यो विकटेक्षणः । ज्वालास्यो दहनश्चेमे सेनान्योपि प्रतस्थिरे

mahāhanurmahāmaulirugrāsyo vikaṭekṣaṇaḥ jvālāsyo dahanaśceme senānyopi pratasthire

— तथा महाहनु, महामौलि, उग्रास्य, विकटेक्ष, ज्वालास्य और दहन नामक सेनापति भी युद्ध के लिए निकल पड़े।

श्लोक 20 (skanda.1.133.20)

कोलाहलमिमं श्रुत्वा देवी नियमविघ्नतः । शंकिता दैत्यसंहृत्यै दुर्गामादिशति स्म सा

kolāhalamimaṁ śrutvā devī niyamavighnataḥ śaṁkitā daityasaṁhṛtyai durgāmādiśati sma sā

इस कोलाहल को सुनकर देवी को अपने नियम में विघ्न की आशंका हुई, और उसने दैत्यों के संहार के लिए दुर्गा को आदेश दिया।

श्लोक 21 (skanda.1.133.21)

सारुणाद्रिरहोद्रोण्यामधिरूढा मृगाधिपम् । दीप्तायुधधरैर्दोर्भिः कालिकेव महीं गता

sāruṇādrirahodroṇyāmadhirūḍhā mṛgādhipam dīptāyudhadharairdorbhiḥ kālikeva mahīṁ gatā

अरुणाचल की गुप्त घाटी में सिंह पर आरूढ़ होकर, अपनी भुजाओं में प्रज्वलित आयुध धारण किए हुए, वह मानो कालिका के समान पृथ्वी पर उतर आई।

श्लोक 22 (skanda.1.133.22)

घनाघनरवोदग्रं सिंहनादमचीकरत् । स्फुरद्दंतच्छदोपांतं वल्गदंगुलिपल्लवा

ghanāghanaravodagraṁ siṁhanādamacīkarat sphuraddaṁtacchadopāṁtaṁ valgadaṁgulipallavā

उसने बादलों की गर्जना के समान भीषण सिंहनाद किया, उसके ओठों के कोने कँपकँपा रहे थे, तथा उसकी कोमल अंगुलियाँ भी काँप रही थीं।

श्लोक 23 (skanda.1.133.23)

स्वांगेभ्यो योगिनीचक्रं मातरोऽप्यसृजन्रुषा । देव्याः प्रियाय दैतेयसंहारार्हाः सहस्रशः

svāṁgebhyo yoginīcakraṁ mātaro'pyasṛjanruṣā devyāḥ priyāya daiteyasaṁhārārhāḥ sahasraśaḥ

क्रोध में आकर मातृगण ने अपने ही अंगों से हजारों की संख्या में योगिनी-चक्र को उत्पन्न किया, जो दैत्यों के संहार में समर्थ था, देवी की प्रसन्नता के लिए।

श्लोक 24 (skanda.1.133.24)

काश्चित्तत्रारुणच्छाया दंडिन्यो हंसवाहनाः । मुखैश्चतुर्भिराजग्मुः कोपप्रस्फुरिताधरैः

kāścittatrāruṇacchāyā daṁḍinyo haṁsavāhanāḥ mukhaiścaturbhirājagmuḥ kopaprasphuritādharaiḥ

उनमें से कुछ अरुण वर्ण की, दण्ड धारण किए हुए, हंस-वाहिनी योगिनियाँ चार मुखों वाली होकर, क्रोध से कँपकँपाते होठों के साथ आ पहुँचीं।

श्लोक 25 (skanda.1.133.25)

निर्ययुः काश्चन क्रुद्धा ज्वलत्त्रिशिखपाणयः । निस्वनद्भूषणाः पंसल्ललाटा वृषवाहनाः

niryayuḥ kāścana kruddhā jvalattriśikhapāṇayaḥ nisvanadbhūṣaṇāḥ paṁsallalāṭā vṛṣavāhanāḥ

कुछ अन्य क्रोधित होकर, हाथों में प्रज्वलित त्रिशूल लिए, झंकृत आभूषणों वाली, तथा वृषभ पर सवार होकर निकलीं।

श्लोक 26 (skanda.1.133.26)

निर्जग्मुरपराः सेनासहिताः शिखिवाहनैः । शक्तिदंडाभयकराः शतशः षड्भिराननैः

nirjagmuraparāḥ senāsahitāḥ śikhivāhanaiḥ śaktidaṁḍābhayakarāḥ śataśaḥ ṣaḍbhirānanaiḥ

कुछ और सेनाओं सहित, मयूर-वाहन पर, हाथों में शक्ति, दण्ड और अभयमुद्रा धारण किए, सैकड़ों की संख्या में छह मुखों वाली होकर निकलीं।

श्लोक 27 (skanda.1.133.27)

निश्चक्रमुः परास्तार्क्ष्यमधिरुह्याधिकक्रुधा । शंखचक्रधराः सूर्यचंद्रमोभ्यां दिवो यथा

niścakramuḥ parāstārkṣyamadhiruhyādhikakrudhā śaṁkhacakradharāḥ sūryacaṁdramobhyāṁ divo yathā

अन्य कुछ अत्यधिक क्रोध से गरुड़ पर आरूढ़ होकर, शंख और चक्र धारण किए हुए, मानो आकाश से सूर्य और चन्द्रमा के समान निकलीं।

श्लोक 28 (skanda.1.133.28)

प्रतिष्ठंते तथा व्याघ्रवाहाः कुवलयत्विषः । पोत्रैः सद्घर्घरारावैर्बिभ्रत्यो मुसलं हलम्

pratiṣṭhaṁte tathā vyāghravāhāḥ kuvalayatviṣaḥ potraiḥ sadghargharārāvairbibhratyo musalaṁ halam

कमल के समान श्याम वर्ण वाली, बाघ पर सवार, तथा गुर्राती हुई ध्वनि करते हुए थूथन से मूसल और हल धारण किए हुए योगिनियाँ भी निकलीं।

श्लोक 29 (skanda.1.133.29)

रोषारुणसहस्राक्ष्यो वलक्षद्विपवाहनाः । प्रतस्थिरे शातकोटिशतकोटिधराः पराः

roṣāruṇasahasrākṣyo valakṣadvipavāhanāḥ pratasthire śātakoṭiśatakoṭidharāḥ parāḥ

क्रोध से लाल हजार नेत्रों वाली, श्वेत गजों पर सवार, तथा करोड़ों-करोड़ों शस्त्र धारण किए हुए अन्य योगिनियाँ भी चल पड़ीं।

श्लोक 30 (skanda.1.133.30)

अश्वारूढा समापेतुरेकाः सौदामिनीनिभाः । खड्गखेटकधारिण्यः कोपेन कपिलाननाः

aśvārūḍhā samāpeturekāḥ saudāminīnibhāḥ khaḍgakheṭakadhāriṇyaḥ kopena kapilānanāḥ

घोड़ों पर सवार, बिजली के समान चमकती हुई, तलवार और ढाल धारण किए हुए, क्रोध से पिंगल मुख वाली कुछ योगिनियाँ दौड़ पड़ीं।

श्लोक 31 (skanda.1.133.31)

ताश्च कोटिचतुःषष्टिमसुरानाश्रमाद्बहिः । अरुन्धन्प्रसभं ध्वांतराशीनिव रवेस्त्विषः

tāśca koṭicatuḥṣaṣṭimasurānāśramādbahiḥ arundhanprasabhaṁ dhvāṁtarāśīniva ravestviṣaḥ

और उन्होंने आश्रम के बाहर चौंसठ करोड़ असुरों को बलपूर्वक रोक दिया, जैसे सूर्य की किरणें अन्धकार के समूहों को रोक देती हैं।

श्लोक 32 (skanda.1.133.32)

ततश्च योगिनीचक्रदानवानीकयोर्मिथः । प्रावर्त्तत रणं घोरं मुष्टामुष्टि कचाकचि

tataśca yoginīcakradānavānīkayormithaḥ prāvarttata raṇaṁ ghoraṁ muṣṭāmuṣṭi kacākaci

तत्पश्चात् योगिनी-चक्र और दानव-सेना के बीच मुष्टि-प्रहार और केश-खिंचाव सहित एक घोर युद्ध छिड़ गया।

श्लोक 33 (skanda.1.133.33)

सायकैर्योगिनीमुक्तैर्दलिता दैत्यमौलयः । आच्छादयन्महीपृष्ठं स्थलजानीव सर्वतः

sāyakairyoginīmuktairdalitā daityamaulayaḥ ācchādayanmahīpṛṣṭhaṁ sthalajānīva sarvataḥ

योगिनियों द्वारा छोड़े गए बाणों से चूर-चूर हुए दैत्यों के मस्तक, पृथ्वी के तल को मानो स्थलज पुष्पों के समान सर्वत्र ढक रहे थे।

श्लोक 34 (skanda.1.133.34)

प्रसस्रू रक्तसरितो लगत्कैशिकशैवलाः । लुठद्विपाठपाठीनाः स्मरैर्देवीमुखांबुजैः

prasasrū raktasarito lagatkaiśikaśaivalāḥ luṭhadvipāṭhapāṭhīnāḥ smarairdevīmukhāṁbujaiḥ

लटकते हुए बालों को जलीय शैवाल के समान लिए हुए, तथा लुढ़कते हुए कटे शिरों को मछलियों के समान लिए हुए, रक्त की नदियाँ बहने लगीं, मानो देवी के मुख-कमलों से भयभीत होकर।

श्लोक 35 (skanda.1.133.35)

वेतण्डतुण्डान्यारुह्य सौधानिव पिशाचिकाः । प्रचण्ड तांडवाः पीतरक्तमद्याश्चकाशिरे

vetaṇḍatuṇḍānyāruhya saudhāniva piśācikāḥ pracaṇḍa tāṁḍavāḥ pītaraktamadyāścakāśire

हाथियों की सूँड़ों पर मानो राजप्रासादों की भाँति चढ़कर, प्रचण्ड ताण्डव करती हुई, तथा रक्त-मद्य पीकर उन्मत्त हुई पिशाचिनियाँ शोभायमान हो रही थीं।

श्लोक 36 (skanda.1.133.36)

कपालैर्दैत्यवीराणामघासुरसृगासवान् । क्रीडड्डमरुकाकारैर्डामरैर्योगिनीगणाः

kapālairdaityavīrāṇāmaghāsurasṛgāsavān krīḍaḍḍamarukākārairḍāmarairyoginīgaṇāḥ

योगिनी-गणों ने दैत्य-वीरों की खोपड़ियों से, जिनमें पापी असुरों के रक्त-रूपी मद्य भरा था, डमरू के समान बजते हुए डामरों से क्रीड़ा की।

श्लोक 37 (skanda.1.133.37)

परिजह्रुस्तथांत्राणि कंकौघाः पाशशंकया । क्षुधिता अपि मांसानि सशल्यान्यजहुः शिवाः

parijahrustathāṁtrāṇi kaṁkaughāḥ pāśaśaṁkayā kṣudhitā api māṁsāni saśalyānyajahuḥ śivāḥ

कंकों के झुण्ड ने आँतों को पाश समझकर उठा लिया, तथा भूखे रहते हुए भी सियारों ने शल्य-युक्त मांस को त्याग दिया।

श्लोक 38 (skanda.1.133.38)

सिद्धविद्याधरोन्मुक्तमंदारप्रसवासवैः । इयाय शांतिं भूरेणुः संग्रामे क्षोभसम्भवः

siddhavidyādharonmuktamaṁdāraprasavāsavaiḥ iyāya śāṁtiṁ bhūreṇuḥ saṁgrāme kṣobhasambhavaḥ

सिद्धों और विद्याधरों द्वारा बरसाए गए मन्दार-पुष्पों की सुगन्ध से, युद्ध के क्षोभ से उठी हुई पृथ्वी की धूल शान्त हो गई।

श्लोक 39 (skanda.1.133.39)

विरेजुर्योगिनीमुक्तैर्देहलग्नैर्द्विषां हयाः । अमर्षातिशयोत्क्षिप्तैः शल्यैः शल्यमृगा इव

virejuryoginīmuktairdehalagnairdviṣāṁ hayāḥ amarṣātiśayotkṣiptaiḥ śalyaiḥ śalyamṛgā iva

योगिनियों द्वारा अत्यधिक क्रोधवश छोड़े गए बाणों से जिनके शरीर बिंध गए थे, वे शत्रुओं के घोड़े मानो शल्य-मृगों के समान शोभायमान हो रहे थे।

श्लोक 40 (skanda.1.133.40)

दंडैः केचित्परे शूलैर्निशितैः केऽपि शक्तिभिः । चक्रैरन्ये हलैरेके कतिचिच्छतकोटिभिः

daṁḍaiḥ kecitpare śūlairniśitaiḥ ke'pi śaktibhiḥ cakrairanye halaireke katicicchatakoṭibhiḥ

कुछ दैत्य दण्डों से, कुछ तीक्ष्ण त्रिशूलों से, कुछ शक्तियों से, कुछ चक्रों से, कुछ हलों से, तथा कुछ करोड़ों प्रकार के अन्य आयुधों से मारे गए।

श्लोक 41 (skanda.1.133.41)

योगिनीनां परे खड्गैर्दलिता दानवेश्वराः । निःशेषतामुपाजग्मुर्विना सेनाधिपान्निजान्

yoginīnāṁ pare khaḍgairdalitā dānaveśvarāḥ niḥśeṣatāmupājagmurvinā senādhipānnijān

योगिनियों की तलवारों से कटे हुए अन्य दानव-स्वामी, अपने सेनापतियों के अतिरिक्त, समस्त रूप से नष्ट हो गए।

श्लोक 42 (skanda.1.133.42)

ब्राह्मी स्वयमुपागम्य विहितायोधनावधीत् । करालं विकरालेन दण्डेन ज्वलिता चिरात्

brāhmī svayamupāgamya vihitāyodhanāvadhīt karālaṁ vikarālena daṇḍena jvalitā cirāt

ब्राह्मी स्वयं आगे आकर, दीर्घकाल तक युद्ध करने के बाद क्रोध से प्रज्वलित होकर, विकराल दण्ड से करात का वध किया।

श्लोक 43 (skanda.1.133.43)

माहेश्वरी त्रिशूलेन सुचिरं कृतसंगरा । चकर्त दुर्द्धरस्याशु मूर्द्धानमतिरोषणा

māheśvarī triśūlena suciraṁ kṛtasaṁgarā cakarta durddharasyāśu mūrddhānamatiroṣaṇā

माहेश्वरी ने दीर्घकाल तक युद्ध करने के बाद, अत्यन्त क्रोधित होकर, त्रिशूल से दुर्धर का शिर तुरन्त काट डाला।

श्लोक 44 (skanda.1.133.44)

शक्त्या लुलाव कौमारी चिक्षुरासुरमस्तकम् । चक्रेण चालुनान्मौलिं विकरालस्य वैष्णवी

śaktyā lulāva kaumārī cikṣurāsuramastakam cakreṇa cālunānmauliṁ vikarālasya vaiṣṇavī

कौमारी ने अपनी शक्ति से चिक्षुर असुर का सिर काट डाला, तथा वैष्णवी ने चक्र से विकराल का मस्तक काट डाला।

श्लोक 45 (skanda.1.133.45)

बाष्कलस्याशु वाराही मुसलेनालुनाच्छिरः । दुर्मुखं चाशु वज्रेण व्यधादैंद्री गतायुषम्

bāṣkalasyāśu vārāhī musalenālunācchiraḥ durmukhaṁ cāśu vajreṇa vyadhādaiṁdrī gatāyuṣam

वाराही ने मूसल से बाष्कल का सिर तुरन्त काट डाला, तथा ऐन्द्री ने वज्र से दुर्मुख को तत्काल प्राणहीन कर दिया।

श्लोक 46 (skanda.1.133.46)

ख्यातं यस्याश्च नामेदं तयोरेव निदूषनात् । चामुण्डा चण्डमुण्डौ च मण्डलाग्रेण चिच्छिदे

khyātaṁ yasyāśca nāmedaṁ tayoreva nidūṣanāt cāmuṇḍā caṇḍamuṇḍau ca maṇḍalāgreṇa cicchide

तथा जिसका यह नाम उन्हीं दोनों के विनाश से विख्यात हुआ — चामुण्डा ने चण्ड और मुण्ड को अपने मण्डलाग्र से काट डाला।

श्लोक 47 (skanda.1.133.47)

प्रचण्डचामरौ वीरौ महामौलिं महाहनुम् । उग्रास्यविकटाक्षौ च ज्वालास्यदहनावपि

pracaṇḍacāmarau vīrau mahāmauliṁ mahāhanum ugrāsyavikaṭākṣau ca jvālāsyadahanāvapi

प्रचण्ड और वीर चामर, महामौलि और महाहनु, उग्रास्य और विकटाक्ष, तथा ज्वालास्य और दहन भी —

श्लोक 48 (skanda.1.133.48)

अनुजग्मुः क्रुधा यान्तं युद्धाय महिषासुरम् । कालनेमिप्रभृतयो विप्रचित्तिमिवासुराः

anujagmuḥ krudhā yāntaṁ yuddhāya mahiṣāsuram kālanemiprabhṛtayo vipracittimivāsurāḥ

— क्रोध से भरे हुए महिषासुर के पीछे-पीछे युद्ध के लिए चल पड़े, जैसे कालनेमि आदि असुर विप्रचित्ति के पीछे चलते थे।

श्लोक 49 (skanda.1.133.49)

शिरस्त्रवंतो रथिनः सुनिषंगा धनुर्धराः । उद्भूतकटकाः प्रापुर्युद्धभूमिं चलद्ध्वजाः

śirastravaṁto rathinaḥ suniṣaṁgā dhanurdharāḥ udbhūtakaṭakāḥ prāpuryuddhabhūmiṁ caladdhvajāḥ

शिरस्त्राण धारण किए, रथों पर सवार, तरकश बाँधे, धनुष लिए, कटकों से सुशोभित तथा फहराती ध्वजाओं के साथ, वे युद्धभूमि में पहुँचे।

श्लोक 50 (skanda.1.133.50)

समंतात्पूरितदिशः सिंहनादैर्भयंकरैः । पृषत्कवर्षिणो मातृमंडलान्यभिदुद्रुवुः

samaṁtātpūritadiśaḥ siṁhanādairbhayaṁkaraiḥ pṛṣatkavarṣiṇo mātṛmaṁḍalānyabhidudruvuḥ

चारों ओर की दिशाओं को भयंकर सिंहनाद से भरते हुए, तथा बाणों की वर्षा करते हुए, वे मातृ-मण्डलों पर टूट पड़े।

श्लोक 51 (skanda.1.133.51)

ताश्च तैर्बलिभिः कृत्वा संग्रामं निस्सहत्वतः । दुर्गां प्रपेदिरे देवीं शरणं सिंहवाहनाम्

tāśca tairbalibhiḥ kṛtvā saṁgrāmaṁ nissahatvataḥ durgāṁ prapedire devīṁ śaraṇaṁ siṁhavāhanām

और वे शक्तिशाली दैत्यों से युद्ध करने के बाद, असमर्थ होकर, सिंह-वाहिनी देवी दुर्गा की शरण में चली गईं।

श्लोक 52 (skanda.1.133.52)

उक्त्वा मायालुलायस्य दुर्जयत्वं दुरात्मनः । देवी तां तुष्टुवुर्दुर्गामेवं सप्तापि मातरः

uktvā māyālulāyasya durjayatvaṁ durātmanaḥ devī tāṁ tuṣṭuvurdurgāmevaṁ saptāpi mātaraḥ

उस मायावी और दुरात्मा महिष की अजेयता का वर्णन कर, वे सातों मातृकाएँ देवी दुर्गा की इस प्रकार स्तुति करने लगीं।

श्लोक 53 (skanda.1.133.53)

योगनिद्रेति रूपेण विष्णोर्नयनपद्मयोः । त्वया निलीयते देवि मधुकार्येव लीलया

yoganidreti rūpeṇa viṣṇornayanapadmayoḥ tvayā nilīyate devi madhukāryeva līlayā

"हे देवी, तुम योगनिद्रा के रूप में विष्णु के नेत्र-कमलों में लीला से इस प्रकार छिप जाती हो, मानो मधु के प्रयोजन के लिए हो।"

श्लोक 54 (skanda.1.133.54)

अमूमुहस्तं न तथा मातश्च मधुकैटभौ । कथं जघान तौ विष्णुस्तयोरेवाभ्यनुज्ञया

amūmuhastaṁ na tathā mātaśca madhukaiṭabhau kathaṁ jaghāna tau viṣṇustayorevābhyanujñayā

"हे माता, यदि तुमने उस मधु और कैटभ को इस प्रकार मोहित न किया होता, तो विष्णु उन दोनों को उन्हीं की अनुमति से कैसे मार पाते?"

श्लोक 55 (skanda.1.133.55)

त्वं कौशिकी न चेज्जाता मृत्युः शुंभनिशंभयोः । कथं तु लोकपालानामैश्वर्यं देवि एष्यति

tvaṁ kauśikī na cejjātā mṛtyuḥ śuṁbhaniśaṁbhayoḥ kathaṁ tu lokapālānāmaiśvaryaṁ devi eṣyati

"हे देवी, यदि तुम कौशिकी के रूप में जन्म लेकर शुम्भ-निशुम्भ की मृत्यु का कारण न बनतीं, तो लोकपालों को ऐश्वर्य कैसे प्राप्त होता?"

श्लोक 56 (skanda.1.133.56)

विंध्यवासिनि विंध्येन किमवंध्यं कृतं तपः । यत्र मैत्री किरातीभिरपि लभ्या त्वया समम्

viṁdhyavāsini viṁdhyena kimavaṁdhyaṁ kṛtaṁ tapaḥ yatra maitrī kirātībhirapi labhyā tvayā samam

"हे विन्ध्यवासिनी, विन्ध्य पर्वत ने ऐसा कौन-सा सफल तप किया कि किरात स्त्रियाँ भी तुम्हारे साथ मित्रता प्राप्त कर सकीं?"

श्लोक 57 (skanda.1.133.57)

कापिशायनमापीतं धनदोपायनीकृतम् । त्वयांब नीतं दैत्यानां रसैर्नियतमानवैः

kāpiśāyanamāpītaṁ dhanadopāyanīkṛtam tvayāṁba nītaṁ daityānāṁ rasairniyatamānavaiḥ

"हे अम्बा, कुबेर द्वारा भेंट किए गए कापिशायन मद्य को, तुमने भक्त मनुष्यों द्वारा लाए हुए, दैत्यों के सार-तत्त्वों से युक्त रूप में पान किया।"

श्लोक 58 (skanda.1.133.58)

ब्रह्मणः सृष्टिशक्तिस्त्वं स्थितिशक्तिर्मधुद्विषः । अंब संहारशक्तिश्च रुद्रस्यापि प्रगल्भसे

brahmaṇaḥ sṛṣṭiśaktistvaṁ sthitiśaktirmadhudviṣaḥ aṁba saṁhāraśaktiśca rudrasyāpi pragalbhase

"हे अम्बा, तुम ब्रह्मा की सृष्टि-शक्ति हो, विष्णु की स्थिति-शक्ति हो, तथा रुद्र की संहार-शक्ति के रूप में भी प्रकट होती हो।"

श्लोक 59 (skanda.1.133.59)

यशोदानंदजाता त्वमेकानंशेति नामतः । कंसाद्यसुरसंहारे हरेः साह्यं करिष्यसि

yaśodānaṁdajātā tvamekānaṁśeti nāmataḥ kaṁsādyasurasaṁhāre hareḥ sāhyaṁ kariṣyasi

"यशोदा-नन्दन के रूप में जन्म लेकर, एकानंशा नाम से तुम कंस आदि असुरों के संहार में हरि की सहायता करोगी।"

श्लोक 60 (skanda.1.133.60)

त्वं विद्या त्वं महामाया त्वं लक्ष्मीस्त्वं सरस्वती । त्वं देवी पार्वतीशापि दुर्गे किं वा न जायसे

tvaṁ vidyā tvaṁ mahāmāyā tvaṁ lakṣmīstvaṁ sarasvatī tvaṁ devī pārvatīśāpi durge kiṁ vā na jāyase

"तुम विद्या हो, तुम महामाया हो, तुम लक्ष्मी हो, तुम सरस्वती हो; तुम देवी पार्वती भी हो — हे दुर्गे, तुम क्या नहीं बन जातीं?"

श्लोक 61 (skanda.1.133.61)

नन्दिकेश्वर उवाच । स्तोत्रेणानेन मातृभ्यो दुर्गा दत्ताभया स्वयम् । महिषासुरयुद्धाय संतुष्टा निर्ययौ तदा

nandikeśvara uvāca stotreṇānena mātṛbhyo durgā dattābhayā svayam mahiṣāsurayuddhāya saṁtuṣṭā niryayau tadā

नन्दिकेश्वर जी ने कहा — इस स्तोत्र से प्रसन्न होकर, दुर्गा ने स्वयं मातृकाओं को अभय प्रदान किया, तथा संतुष्ट होकर महिषासुर से युद्ध के लिए निकल पड़ीं।

श्लोक 62 (skanda.1.133.62)

प्रचंडमंडलाग्रेण भिंडिपालेन चामरम् । महामौलिं क्षुरिकया कर्परेण महाहनुम्

pracaṁḍamaṁḍalāgreṇa bhiṁḍipālena cāmaram mahāmauliṁ kṣurikayā karpareṇa mahāhanum

उसने अपने प्रचण्ड मण्डलाग्र से चामर को, भिण्डिपाल से महामौलि को, छुरिका से महाहनु को कर्पर के द्वारा मारा।

श्लोक 63 (skanda.1.133.63)

उग्रवक्त्रं कुठारेण शक्त्या विकटचक्षुषम् । ज्वालामुखं मुद्गरेण दहनं मुसलेन च

ugravaktraṁ kuṭhāreṇa śaktyā vikaṭacakṣuṣam jvālāmukhaṁ mudgareṇa dahanaṁ musalena ca

उग्रवक्त्र को कुठार से, विकटचक्षु को शक्ति से, ज्वालामुख को मुद्गर से, तथा दहन को मूसल से उसने मार डाला।

श्लोक 64 (skanda.1.133.64)

निहत्य महिषस्याग्रे सरोषं युध्यती स्वयम् । सिंहनादं महाघोरं चक्रेण मुदिताशया

nihatya mahiṣasyāgre saroṣaṁ yudhyatī svayam siṁhanādaṁ mahāghoraṁ cakreṇa muditāśayā

उन्हें मारकर महिष के समक्ष स्वयं रोषपूर्वक युद्ध करती हुई, तथा हर्षित मन से चक्र चलाते हुए, उसने महाघोर सिंहनाद किया।

श्लोक 65 (skanda.1.133.65)

अथात्यमर्षितो दुर्गां विशिखैर्महिषासुरः । विव्याध फालफलके स्तनयोर्गडयोरपि

athātyamarṣito durgāṁ viśikhairmahiṣāsuraḥ vivyādha phālaphalake stanayorgaḍayorapi

तब अत्यन्त क्रोधित हुए महिषासुर ने दुर्गा को बाणों से ललाट पर, दोनों स्तनों पर, तथा दोनों गालों पर भी बींध डाला।

श्लोक 66 (skanda.1.133.66)

ततो दुर्गाथ संरंभात्प्रजहारासुरेश्वरम् । बाह्वोर्वक्षसि वक्त्रे च क्षुरप्रैः प्रज्वलत्फलैः

tato durgātha saṁraṁbhātprajahārāsureśvaram bāhvorvakṣasi vaktre ca kṣurapraiḥ prajvalatphalaiḥ

तब दुर्गा ने अत्यन्त क्रोध से, असुरेश्वर की भुजाओं, वक्षःस्थल और मुख पर, प्रज्वलित फलक वाले क्षुरप्र बाणों से प्रहार किया।

श्लोक 67 (skanda.1.133.67)

ततो दैत्यस्त्रिभिर्दुर्गां जघान विशिखैर्मुखे । पंचभिः पंचभिर्बाह्वोर्द्वाभ्यां द्वाभ्यां च नेत्रयोः

tato daityastribhirdurgāṁ jaghāna viśikhairmukhe paṁcabhiḥ paṁcabhirbāhvordvābhyāṁ dvābhyāṁ ca netrayoḥ

तब दैत्य ने दुर्गा के मुख पर तीन बाणों से, दोनों भुजाओं पर पाँच-पाँच बाणों से, तथा दोनों नेत्रों पर दो-दो बाणों से प्रहार किया।

श्लोक 68 (skanda.1.133.68)

एकेन सारथिं रथ्यानष्टभिः कार्मुकं त्रिभिः । चतुर्भिश्च ध्वजं तस्य दुर्गा चिच्छेद सायकैः

ekena sārathiṁ rathyānaṣṭabhiḥ kārmukaṁ tribhiḥ caturbhiśca dhvajaṁ tasya durgā ciccheda sāyakaiḥ

दुर्गा ने एक बाण से उसके सारथि को, आठ बाणों से रथ के घोड़ों को, तीन बाणों से धनुष को, तथा चार बाणों से ध्वजा को काट डाला।

श्लोक 69 (skanda.1.133.69)

पदातिरथ दैत्येंद्रः शतघ्नीं ज्वलदाकृतिम् । कालदंडप्रतीकाशां दुर्गां प्रति विमुक्तवान्

padātiratha daityeṁdraḥ śataghnīṁ jvaladākṛtim kāladaṁḍapratīkāśāṁ durgāṁ prati vimuktavān

तब दैत्येन्द्र ने पैदल होकर, दुर्गा पर काल-दण्ड के समान प्रज्वलित शतघ्नी नामक अस्त्र का प्रहार किया।

श्लोक 70 (skanda.1.133.70)

हाहाकुर्वस्तु देवेषु विद्राणे मातृमंडले । तामापतंतीमादाय दुर्गा जग्राह लीलया

hāhākurvastu deveṣu vidrāṇe mātṛmaṁḍale tāmāpataṁtīmādāya durgā jagrāha līlayā

देवताओं के हाहाकार करने पर, तथा मातृ-मण्डल के भयभीत होकर भागने पर, दुर्गा ने उस आते हुए अस्त्र को लीलामात्र में पकड़ लिया।

श्लोक 71 (skanda.1.133.71)

कृपाणमंकुशं पाशं भुशुंडीं करवालिकाम् । शंकुं शक्तिं गदां चक्रं तोमरं फलकं सृणिम्

kṛpāṇamaṁkuśaṁ pāśaṁ bhuśuṁḍīṁ karavālikām śaṁkuṁ śaktiṁ gadāṁ cakraṁ tomaraṁ phalakaṁ sṛṇim

कृपाण, अंकुश, पाश, भुशुण्डी, करवालिका, शंकु, शक्ति, गदा, चक्र, तोमर, फलक, तथा सृणि —

श्लोक 72 (skanda.1.133.72)

परश्वधं भिंडिपालं पट्टिशं लगुडं च सः । दुर्गां प्रति विचिक्षेप क्षयांभोद इवाशनिम्

paraśvadhaṁ bhiṁḍipālaṁ paṭṭiśaṁ laguḍaṁ ca saḥ durgāṁ prati vicikṣepa kṣayāṁbhoda ivāśanim

— कुल्हाड़ी, भिण्डिपाल, पट्टिश और लाठी — इन सबको उसने दुर्गा पर उसी प्रकार फेंका, जैसे प्रलयकालीन मेघ वज्रों की वर्षा करता हो।

श्लोक 73 (skanda.1.133.73)

आपतंत्येव शस्त्राणि क्षिप्तान्यादाय वैरिणाम् । बभंज पाणिभिः स्वैरं करिणीवेक्षुकांडकम्

āpataṁtyeva śastrāṇi kṣiptānyādāya vairiṇām babhaṁja pāṇibhiḥ svairaṁ kariṇīvekṣukāṁḍakam

शत्रुओं द्वारा फेंके गए शस्त्रों को उड़ते ही पकड़कर, वह अपने हाथों से उन्हें उसी सहजता से तोड़ डालती थी, जैसे हथिनी गन्ने के डण्ठल को तोड़ देती है।

श्लोक 74 (skanda.1.133.74)

दुर्गोपवाह्यः सिंहोऽपि लांगूलाग्रेण मुद्रितम् । दंष्ट्रया दारयामास प्रहरन्नखपंकजैः

durgopavāhyaḥ siṁho'pi lāṁgūlāgreṇa mudritam daṁṣṭrayā dārayāmāsa praharannakhapaṁkajaiḥ

दुर्गा का वाहन सिंह भी अपनी पूँछ के अग्रभाग से चिह्नित शत्रु को, अपने कमल के समान पंजों से आघात करते हुए, दाढ़ों से चीर डालता था।

श्लोक 75 (skanda.1.133.75)

क्षणं सिंहः क्षणं क्रोडः क्षणं व्याघ्रः क्षणं गजः । क्षणं च महिषो भूत्वा दैत्यो दुर्गामयोधयत्

kṣaṇaṁ siṁhaḥ kṣaṇaṁ kroḍaḥ kṣaṇaṁ vyāghraḥ kṣaṇaṁ gajaḥ kṣaṇaṁ ca mahiṣo bhūtvā daityo durgāmayodhayat

क्षणभर सिंह, क्षणभर वराह, क्षणभर व्याघ्र, क्षणभर गज, तथा क्षणभर महिष का रूप धारण कर, वह दैत्य दुर्गा से युद्ध करता रहा।

श्लोक 76 (skanda.1.133.76)

महिषोऽथ विषाणाभ्यां तीक्ष्णाभ्यामत्यमर्षितः । ताडयामास सिंहं च देवीमपि मुहुर्मुहुः

mahiṣo'tha viṣāṇābhyāṁ tīkṣṇābhyāmatyamarṣitaḥ tāḍayāmāsa siṁhaṁ ca devīmapi muhurmuhuḥ

तब महिष-रूप में अत्यन्त क्रोधित होकर, वह अपने दोनों तीक्ष्ण सींगों से सिंह पर तथा देवी पर भी बार-बार प्रहार करने लगा।

श्लोक 77 (skanda.1.133.77)

क्षणं गगनमध्यस्थः क्षणं प्राप्तो महीतले । क्षणं दिक्षु भ्रमन्प्राप्तः क्षणं चादृश्यतां गतः

kṣaṇaṁ gaganamadhyasthaḥ kṣaṇaṁ prāpto mahītale kṣaṇaṁ dikṣu bhramanprāptaḥ kṣaṇaṁ cādṛśyatāṁ gataḥ

क्षणभर वह आकाश के मध्य में स्थित होता, क्षणभर पृथ्वी पर आ जाता, क्षणभर दिशाओं में भ्रमण करता दिखाई देता, और क्षणभर अदृश्य हो जाता था।

श्लोक 78 (skanda.1.133.78)

प्रार्थिता मातृचक्रेण दुर्गा महिषदानवम् । अमोघेन त्रिशूलेन दारयामास सस्मिता

prārthitā mātṛcakreṇa durgā mahiṣadānavam amoghena triśūlena dārayāmāsa sasmitā

मातृ-चक्र के प्रार्थना करने पर, दुर्गा ने मन्द मुस्कान के साथ, अपने अमोघ त्रिशूल से महिष-दानव को चीर डाला।

श्लोक 79 (skanda.1.133.79)

मुक्तघर्घरनिर्घोषो यावत्पतति दानवः । तावदस्य हठेनांघ्रिं स्कंधपीठे न्यवेशयत्

muktaghargharanirghoṣo yāvatpatati dānavaḥ tāvadasya haṭhenāṁghriṁ skaṁdhapīṭhe nyaveśayat

जैसे ही दानव घर्घर ध्वनि करते हुए गिरने लगा, वैसे ही देवी ने बलपूर्वक अपने चरण को उसके कन्धे-रूपी पीठ पर रख दिया।

श्लोक 80 (skanda.1.133.80)

कंठपीडनतो यातजीवितस्यामरद्रुहः । छिन्नमूर्द्धानमादाय पाणिनाथ ननर्त्त सा

kaṁṭhapīḍanato yātajīvitasyāmaradruhaḥ chinnamūrddhānamādāya pāṇinātha nanartta sā

देवताओं के उस शत्रु के प्राण कण्ठ दबाए जाने से निकल जाने पर, देवी ने उसके कटे हुए शिर को हाथ में लेकर नृत्य किया।

श्लोक 81 (skanda.1.133.81)

इति दुर्गया समिति कासरासुरे दलिते समस्तभुवनैककंटके । ननृतुः सुराः प्रजहृषुर्महर्षयो ववृषुश्च दिव्यकुमुमानि वारिदाः

iti durgayā samiti kāsarāsure dalite samastabhuvanaikakaṁṭake nanṛtuḥ surāḥ prajahṛṣurmaharṣayo vavṛṣuśca divyakumumāni vāridāḥ

इस प्रकार युद्ध में दुर्गा द्वारा समस्त भुवनों के अद्वितीय कण्टक-स्वरूप महिषासुर के विनष्ट हो जाने पर, देवता नाचने लगे, महर्षिगण हर्षित हुए, तथा मेघों ने दिव्य पुष्पों की वर्षा की।

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