माहेश्वर खण्ड · अध्याय 136
अरुणाचल-प्रदक्षिणा माहात्म्य में वज्रांगद का वृत्तांत
श्लोक 1 (skanda.1.136.1)
मार्कंडेय उवाच । स्वामिन्नित्यशिवानन्द भगवन्नंदिकेश्वर । आह्लादितोऽस्मि शोणेशमाहात्म्यसुधया त्वया
mārkaṁḍeya uvāca svāminnityaśivānanda bhagavannaṁdikeśvara āhlādito'smi śoṇeśamāhātmyasudhayā tvayā
मार्कण्डेय जी ने कहा — हे स्वामिन्! नित्य शिवानन्द में लीन, हे भगवन् नन्दिकेश्वर! आपने शोणेश की महिमा रूपी अमृत से मुझे आह्लादित कर दिया है।
श्लोक 2 (skanda.1.136.2)
कथं वज्रांगदः पांड्यराजः शोणव्यतिक्रमम् । चक्रे कथं तद्भक्त्यैव प्राप्तवान्संपदं पुनः
kathaṁ vajrāṁgadaḥ pāṁḍyarājaḥ śoṇavyatikramam cakre kathaṁ tadbhaktyaiva prāptavānsaṁpadaṁ punaḥ
पांड्य-नरेश वज्रांगद ने शोण-पर्वत के विषय में किस प्रकार अपराध किया, और उसकी भक्ति से ही उसने पुनः किस प्रकार सम्पदा प्राप्त की?
श्लोक 3 (skanda.1.136.3)
कथं विद्याधराधीशौ कांतिशालिकलाधरौ । दुर्वासःशापनिर्विद्धाववितौ शोणशंभुना
kathaṁ vidyādharādhīśau kāṁtiśālikalādharau durvāsaḥśāpanirviddhāvavitau śoṇaśaṁbhunā
विद्याधरों के दोनों अधिपति कान्तिशाली और कलाधर दुर्वासा मुनि के शाप से किस प्रकार बिंधे और शोण-शम्भु ने उनकी रक्षा किस प्रकार की?
श्लोक 4 (skanda.1.136.4)
नंदिकेश्वर उवाच । दीर्घायुष्यत्वसाफल्यं लब्धवांस्त्वं मृकण्डुज । यदियं स्थेयसी भक्तिर्भवतो भूतनायके
naṁdikeśvara uvāca dīrghāyuṣyatvasāphalyaṁ labdhavāṁstvaṁ mṛkaṇḍuja yadiyaṁ stheyasī bhaktirbhavato bhūtanāyake
नन्दिकेश्वर जी ने कहा — हे मृकण्डु-पुत्र! तुमने अपनी दीर्घायु की सार्थकता प्राप्त कर ली है, क्योंकि भूतनायक के प्रति तुम्हारी यह भक्ति इतनी स्थिर है।
श्लोक 5 (skanda.1.136.5)
वक्ष्ये वज्रांगदोदंतं वृत्तं विद्याभृतोरपि । यतोऽभून्महितो लोके शोणाद्रीश्वरवैभवः
vakṣye vajrāṁgadodaṁtaṁ vṛttaṁ vidyābhṛtorapi yato'bhūnmahito loke śoṇādrīśvaravaibhavaḥ
मैं वज्रांगद का वृत्तान्त और उन दोनों विद्याधरों की कथा भी कहूँगा, जिनके कारण शोणाद्रीश्वर का वैभव संसार में महिमामण्डित हुआ।
श्लोक 6 (skanda.1.136.6)
आसीद्वज्रांगदोनाम पुरा पांड्येषु पार्थिवः । आस्ते यस्य भुजस्तम्भे वसुधा सालभंजिका
āsīdvajrāṁgadonāma purā pāṁḍyeṣu pārthivaḥ āste yasya bhujastambhe vasudhā sālabhaṁjikā
पूर्वकाल में पांड्य वंश में वज्रांगद नामक एक राजा हुआ, जिसकी भुजा रूपी स्तम्भ पर वसुधा ऐसे विराजमान थी मानो कोई शिल्प-प्रतिमा हो।
श्लोक 7 (skanda.1.136.7)
धार्मिको न्यायविज्ज्ञाता गंभीरो दक्षिणम् क्षमः । शांतो विनयवान्धीमानेकदारव्रतः कृती
dhārmiko nyāyavijjñātā gaṁbhīro dakṣiṇam kṣamaḥ śāṁto vinayavāndhīmānekadāravrataḥ kṛtī
वह धर्मात्मा, न्याय का ज्ञाता, गम्भीर, समर्थ और उदार, शान्त, विनयवान्, बुद्धिमान्, एकपत्नीव्रती और गुणवान् था।
श्लोक 8 (skanda.1.136.8)
शिवपूजार्चनरतः श्रीमाञ्छीलवतां वरः । पृथ्वीमासेतुकेदाराच्छशास जितशात्रवः
śivapūjārcanarataḥ śrīmāñchīlavatāṁ varaḥ pṛthvīmāsetukedārācchaśāsa jitaśātravaḥ
वह शिव-पूजा में तत्पर, समृद्धिशाली, सुशीलजनों में श्रेष्ठ था; शत्रुओं को जीतकर वह सेतु से लेकर केदार तक की पृथ्वी पर शासन करता था।
श्लोक 9 (skanda.1.136.9)
कदाचिन्मृगयाव्याजात्स चरन्सुतुरंगमः । अरुणाचलपर्यंतं कांतारं समगाहत
kadācinmṛgayāvyājātsa caransuturaṁgamaḥ aruṇācalaparyaṁtaṁ kāṁtāraṁ samagāhata
एक बार मृगया के बहाने अपने उत्तम अश्व पर सवार होकर विचरण करते हुए वह अरुणाचल तक फैले हुए विशाल वन में घुस गया।
श्लोक 10 (skanda.1.136.10)
स तत्र बहलामोदं कंचित्कस्तूरिकामृगम् । दृष्ट्वा तमन्वक्तुरगं प्रावर्तयत कौतुकात्
sa tatra bahalāmodaṁ kaṁcitkastūrikāmṛgam dṛṣṭvā tamanvakturagaṁ prāvartayata kautukāt
वहाँ अत्यन्त सुगन्धित एक कस्तूरी-मृग को देखकर उसने कौतूहलवश अपने घोड़े को उसके पीछे दौड़ाया।
श्लोक 11 (skanda.1.136.11)
स मृगोऽनुद्रुतस्तेन अभितः शोणपर्वतम् । प्रादक्षिण्यात्परीयाय पपात च मनोजवः
sa mṛgo'nudrutastena abhitaḥ śoṇaparvatam prādakṣiṇyātparīyāya papāta ca manojavaḥ
उसके द्वारा पीछा किया गया वह मृग शोणपर्वत के चारों ओर प्रदक्षिणा-क्रम से घूम गया, और मन के समान वेगवान वह अन्ततः गिर पड़ा।
श्लोक 12 (skanda.1.136.12)
ततः स भग्नसारोपि राजा जातश्रमश्चरन् । पपात वाहाद्विच्छायः क्षीणपुण्य इव द्युतः
tataḥ sa bhagnasāropi rājā jātaśramaścaran papāta vāhādvicchāyaḥ kṣīṇapuṇya iva dyutaḥ
तत्पश्चात् शक्ति क्षीण होकर तथा थककर चलता हुआ वह राजा अपने वाहन से गिर पड़ा, उसकी कान्ति ऐसे उड़ गई मानो उसका पुण्य ही क्षीण हो गया हो।
श्लोक 13 (skanda.1.136.13)
अज्ञातकारणेनैवं मातंगेनेव पीडितः । नाज्ञासीत्क्षणमात्मानं राजा ग्रहगृहीतवत्
ajñātakāraṇenaivaṁ mātaṁgeneva pīḍitaḥ nājñāsītkṣaṇamātmānaṁ rājā grahagṛhītavat
अज्ञात कारण से इस प्रकार पीड़ित, मानो मतवाले हाथी से आक्रान्त, वह राजा ग्रह से गृहीत व्यक्ति के समान क्षणभर के लिए अपने आपको भूल गया।
श्लोक 14 (skanda.1.136.14)
अचिंतयच्च कोयं मे निर्हेतुः सत्त्वविप्लवः । क्व गतः स ह्यकस्मान्मे उपवाह्यस्तुरंगमः
aciṁtayacca koyaṁ me nirhetuḥ sattvaviplavaḥ kva gataḥ sa hyakasmānme upavāhyasturaṁgamaḥ
वह सोचने लगा — यह मेरी बिना किसी कारण के हुई शक्ति-हानि कैसी है? मेरा वह अश्व, जिस पर मैं सवार था, अचानक कहाँ चला गया?
श्लोक 15 (skanda.1.136.15)
इति चिंताकुले तस्मिंस्तज्ज्ञानेप्यपटीयसि । तडित्तटजटालेव सहसा द्यौरदृश्यत
iti ciṁtākule tasmiṁstajjñānepyapaṭīyasi taḍittaṭajaṭāleva sahasā dyauradṛśyata
इस प्रकार चिन्ता में डूबे हुए, इस रहस्य को समझने में असमर्थ उस राजा को अचानक आकाश बिजली की चमकती हुई घटाओं से युक्त दिखाई देने लगा।
श्लोक 16 (skanda.1.136.16)
निरीक्षमाण एवास्मिन्हित्वा तिर्यक्कलेवरम् । तूर्णं तुरंगसारंगौ खेचरत्वमुपागतौ
nirīkṣamāṇa evāsminhitvā tiryakkalevaram tūrṇaṁ turaṁgasāraṁgau khecaratvamupāgatau
उसके देखते ही देखते वह अश्व और मृग अपने पशु-शरीर को त्यागकर शीघ्र ही आकाशचारी विद्याधर रूप को प्राप्त हो गए।
श्लोक 17 (skanda.1.136.17)
किरीटिनौ कुण्डलिनौ हारकेयूरधारिणौ । क्षौमांतरीयोत्तरीयौ स्रग्विणौ च विरेजतुः
kirīṭinau kuṇḍalinau hārakeyūradhāriṇau kṣaumāṁtarīyottarīyau sragviṇau ca virejatuḥ
मुकुट और कुण्डल धारण किए, हार और केयूर से सुशोभित, रेशमी अन्तरीय-उत्तरीय वस्त्र पहने तथा माला धारण किए वे दोनों अत्यन्त सुशोभित हुए।
श्लोक 18 (skanda.1.136.18)
अवोचतां च नृपतिमाश्चर्याकृष्टमानसम् । हरंताविव दन्तांशुजालैस्त्वस्यार्त्तिजं तमः
avocatāṁ ca nṛpatimāścaryākṛṣṭamānasam haraṁtāviva dantāṁśujālaistvasyārttijaṁ tamaḥ
मानो अपने दाँतों की कान्ति के जाल से राजा की पीड़ा से उत्पन्न अन्धकार को हरते हुए, आश्चर्य से आकर्षित मन वाले उस राजा से वे दोनों बोले।
श्लोक 19 (skanda.1.136.19)
राजन्नलं विषादेन शोणाद्रीशप्रभावतः । एतां जानीहि संजातां नवां नौ चेदृशी दशाम्
rājannalaṁ viṣādena śoṇādrīśaprabhāvataḥ etāṁ jānīhi saṁjātāṁ navāṁ nau cedṛśī daśām
हे राजन्! शोक करने की आवश्यकता नहीं है; जान लीजिए कि हम दोनों की यह नई अवस्था शोणाद्रीश्वर के प्रभाव से ही उत्पन्न हुई है।
श्लोक 20 (skanda.1.136.20)
तदोवाच तयोः किंचिदाश्वस्तइव पार्थिवः । कृतांजलिरभाषिष्ट तावुभौ विनयान्वितः
tadovāca tayoḥ kiṁcidāśvastaiva pārthivaḥ kṛtāṁjalirabhāṣiṣṭa tāvubhau vinayānvitaḥ
तब कुछ आश्वस्त हुए उस राजा ने विनयपूर्वक हाथ जोड़कर उन दोनों से इस प्रकार कहा।
श्लोक 21 (skanda.1.136.21)
कौ युवां निर्मितो याभ्यामभिषंगो ममेदृशः । भद्रौ भणतमार्त्तानां त्राणं हि महतां गुणः
kau yuvāṁ nirmito yābhyāmabhiṣaṁgo mamedṛśaḥ bhadrau bhaṇatamārttānāṁ trāṇaṁ hi mahatāṁ guṇaḥ
आप दोनों कौन हैं, जिनके कारण मेरी यह ऐसी विपत्ति उत्पन्न हुई है? हे भद्रजनो! बताइए — क्योंकि पीड़ितों की रक्षा करना ही महापुरुषों का गुण है।
श्लोक 22 (skanda.1.136.22)
इति तेन कृते प्रश्ने तमुवाच कलाधरः । राजानं जनिताश्चर्यं निर्दिष्टः कांतिशालिना
iti tena kṛte praśne tamuvāca kalādharaḥ rājānaṁ janitāścaryaṁ nirdiṣṭaḥ kāṁtiśālinā
इस प्रकार प्रश्न किए जाने पर, कान्तिशाली के द्वारा संकेत पाकर, कलाधर ने आश्चर्यचकित राजा से कहा।
श्लोक 23 (skanda.1.136.23)
अवेहि राजन्नावां हि पुराविद्याधरेश्वरौ । परस्परातिसौहार्दौ वसंतमदनाविव
avehi rājannāvāṁ hi purāvidyādhareśvarau parasparātisauhārdau vasaṁtamadanāviva
हे राजन्! जान लीजिए कि हम दोनों पूर्वकाल में विद्याधरों के अधिपति थे, परस्पर अत्यन्त गहरी मित्रता से युक्त, जैसे वसन्त और कामदेव।
श्लोक 24 (skanda.1.136.24)
एकदा तु सुवर्णाद्रेः पार्श्वे दुर्वाससो मुनेः । तपोवनमगच्छाव मनसोऽपि दुरासदम्
ekadā tu suvarṇādreḥ pārśve durvāsaso muneḥ tapovanamagacchāva manaso'pi durāsadam
एक बार सुवर्णाचल के समीप हम दोनों मुनि दुर्वासा के तपोवन में गए, जो मन से भी दुर्गम था।
श्लोक 25 (skanda.1.136.25)
क्रोशेद्धां तपसस्तस्य शिवाराधनसाधनीम् । पुष्पोज्ज्वलामपश्याव पुण्यामारामवाटिकाम्
krośeddhāṁ tapasastasya śivārādhanasādhanīm puṣpojjvalāmapaśyāva puṇyāmārāmavāṭikām
उसके तप-स्थल से एक क्रोश की दूरी पर, जो शिव-आराधना का साधन था, हमने पुष्पों से देदीप्यमान एक पवित्र उद्यान-वाटिका देखी।
श्लोक 26 (skanda.1.136.26)
विनीतावप्यसंजातौ तत्त्वोचितसुधीगणौ । प्राविशाव तदुद्यानं प्रसूनावचयोत्सुकौ
vinītāvapyasaṁjātau tattvocitasudhīgaṇau prāviśāva tadudyānaṁ prasūnāvacayotsukau
यद्यपि हम विनम्र स्वभाव के तथा तत्त्व को समझने योग्य बुद्धि से युक्त थे, तथापि परिपक्व विवेक से रहित थे; पुष्प चुनने की उत्सुकता से हम उस उद्यान में प्रविष्ट हुए।
श्लोक 27 (skanda.1.136.27)
स्थलस्य तस्य सौहार्दात्कांतिशाल्यतिगर्वितः । संचचार मुहुः पादन्यासैराघट्टयन्महीम्
sthalasya tasya sauhārdātkāṁtiśālyatigarvitaḥ saṁcacāra muhuḥ pādanyāsairāghaṭṭayanmahīm
उस स्थान के प्रति स्नेहवश अत्यन्त गर्वित हुआ कान्तिशाली बार-बार पैरों की चोट से भूमि को कुरेदते हुए वहाँ घूमने लगा।
श्लोक 28 (skanda.1.136.28)
अहं तु तत्र पुष्पाणां गंधातिशयमोहितः । विकस्वरेषु पुष्पेषु न्यस्तहस्तो दुराशयः
ahaṁ tu tatra puṣpāṇāṁ gaṁdhātiśayamohitaḥ vikasvareṣu puṣpeṣu nyastahasto durāśayaḥ
और मैं वहाँ पुष्पों की अतिशय सुगन्ध से मोहित होकर, दुष्ट भाव से पूर्ण खिले हुए फूलों पर अपने हाथ रख बैठा।
श्लोक 29 (skanda.1.136.29)
ततः शांडिल्यमूलस्थो व्याघ्रचर्मासने स्थितः । दुर्वासास्तपसां राशिर्ज्वलन्निव हुताशनः
tataḥ śāṁḍilyamūlastho vyāghracarmāsane sthitaḥ durvāsāstapasāṁ rāśirjvalanniva hutāśanaḥ
तभी शांडिल्य वृक्ष के मूल में व्याघ्रचर्म के आसन पर बैठे हुए, तपस्याओं की राशि, अग्नि के समान प्रज्वलित दुर्वासा मुनि—
श्लोक 30 (skanda.1.136.30)
अमर्षोत्कर्षनीरंध्रस्पंदमानाधरच्छदः । कराल भृकुटीबंधसारालितविशालभूः
amarṣotkarṣanīraṁdhraspaṁdamānādharacchadaḥ karāla bhṛkuṭībaṁdhasārālitaviśālabhūḥ
—क्रोध की अधिकता से जिनके अधरोष्ठ निरन्तर काँप रहे थे, तथा जिनका विशाल मस्तक भयंकर भृकुटी से तना हुआ था—
श्लोक 31 (skanda.1.136.31)
सरोषोऽभूत्तेजसाढ्यो घर्मदंतुरविग्रहः । दहन्निव दृशा पश्यन्नभर्त्सयत नौ मुनिः
saroṣo'bhūttejasāḍhyo gharmadaṁturavigrahaḥ dahanniva dṛśā paśyannabhartsayata nau muniḥ
—क्रोध से भर उठे, तेज से परिपूर्ण, पसीने की बूँदों से खुरदुरे शरीर वाले उस मुनि ने हमें जलाती हुई दृष्टि से देखते हुए फटकारा।
श्लोक 32 (skanda.1.136.32)
आः पापौ प्रच्युताचारौ कौ युवामतिगर्वितौ । ज्वलतः कोपवह्नेर्मे शलभत्वमुपागतौ
āḥ pāpau pracyutācārau kau yuvāmatigarvitau jvalataḥ kopavahnerme śalabhatvamupāgatau
अरे! आचार से भ्रष्ट, अत्यन्त घमंडी तुम दोनों पापी कौन हो! तुम दोनों मेरे प्रज्वलित क्रोध-अग्नि के लिए पतंगे के समान बन गए हो।
श्लोक 33 (skanda.1.136.33)
तपोवनमिदं मत्कं पावनं भूतभावनम् । पादैर्न स्पृशतः क्वापि सूर्याचंद्रमसावपि
tapovanamidaṁ matkaṁ pāvanaṁ bhūtabhāvanam pādairna spṛśataḥ kvāpi sūryācaṁdramasāvapi
यह मेरा तपोवन पवित्र और समस्त प्राणियों को पोषित करने वाला है; इसे सूर्य और चन्द्रमा भी कहीं भी कभी अपने पैरों से स्पर्श नहीं करते।
श्लोक 34 (skanda.1.136.34)
पुरवैरिसपर्यायाः पर्यायकमिदं वनम् । न स्पंदतेऽत्र वातोपि न लिप्यंतेऽत्र षटपदाः
puravairisaparyāyāḥ paryāyakamidaṁ vanam na spaṁdate'tra vātopi na lipyaṁte'tra ṣaṭapadāḥ
यह वन त्रिपुरारि की उपासना के लिए ही समर्पित है; यहाँ वायु भी नहीं हिलती और भ्रमर भी यहाँ नहीं आ लिपटते।
श्लोक 35 (skanda.1.136.35)
तदेतत्पादसंचारैर्दूषयन्नेष पातकी । हयो भवतु भूलोके परवाह्यत्वपीडितः
tadetatpādasaṁcārairdūṣayanneṣa pātakī hayo bhavatu bhūloke paravāhyatvapīḍitaḥ
यह पापी जो अपने चरणों के संचार से इसे दूषित कर रहा है, यह भूलोक में दूसरे को ढोने की पीड़ा सहने वाला अश्व बन जाए।
श्लोक 36 (skanda.1.136.36)
अपरोप्ययमत्युग्रे पतत्वचलकंदरे । प्रसूनगंधलोभाद्यो गंधसारंगतां गतः
aparopyayamatyugre patatvacalakaṁdare prasūnagaṁdhalobhādyo gaṁdhasāraṁgatāṁ gataḥ
और यह दूसरा भी, जो पुष्पों की सुगन्ध के लोभ से सुगन्धित मृग बन बैठा है, अत्यन्त भयंकर पर्वत की कन्दराओं में जा गिरे।
श्लोक 37 (skanda.1.136.37)
इति तेनोग्ररोषेण शापवज्रे निपातिते । तत्क्षणाद्विगलद्गर्वावावां तं शरणं गतौ
iti tenograroṣeṇa śāpavajre nipātite tatkṣaṇādvigaladgarvāvāvāṁ taṁ śaraṇaṁ gatau
इस प्रकार उनके द्वारा उग्र क्रोध से शाप का वज्र गिराए जाने पर, हमारा गर्व तत्क्षण गल गया और हम दोनों उनकी शरण में गए।
श्लोक 38 (skanda.1.136.38)
अभिधाय च तं देवमाहितांघ्रिपरिग्रहैः । अमोघ एष त्वच्छापस्तदस्यांतो निवेद्यताम्
abhidhāya ca taṁ devamāhitāṁghriparigrahaiḥ amogha eṣa tvacchāpastadasyāṁto nivedyatām
उनके चरण पकड़कर उस देवतुल्य मुनि से हमने निवेदन किया — आपका यह शाप अमोघ है, अतः इसकी समाप्ति किस प्रकार होगी, यह हमें बताइए।
श्लोक 39 (skanda.1.136.39)
अथातिदीनमनसावावामालोक्य पार्थिव । सानुग्रहोऽभून्मुनिराट् कारुण्यादतिशीतलः
athātidīnamanasāvāvāmālokya pārthiva sānugraho'bhūnmunirāṭ kāruṇyādatiśītalaḥ
हे राजन्! तब अत्यन्त दीन मन वाले हम दोनों को देखकर करुणा से शीतल हुए मुनिराज दुर्वासा हम पर अनुग्रह करने लगे।
श्लोक 40 (skanda.1.136.40)
अभाषत च मैवं भो भवतोः क्वापि दुर्धियोः । शापस्य भविता शांतिररुणाद्रेः प्रदक्षिणात्
abhāṣata ca maivaṁ bho bhavatoḥ kvāpi durdhiyoḥ śāpasya bhavitā śāṁtiraruṇādreḥ pradakṣiṇāt
उन्होंने कहा — अरे दुर्बुद्धि वालो! अब शोक मत करो; तुम दोनों के इस शाप की शान्ति अरुणाचल की प्रदक्षिणा से हो जाएगी।
श्लोक 41 (skanda.1.136.41)
पुरा खलु पुरारातिरध्यतिष्ठच्छुभां सभाम् । पर्युपास्यत दिक्पालैरिंद्रोपेंद्रयमादिभिः
purā khalu purārātiradhyatiṣṭhacchubhāṁ sabhām paryupāsyata dikpālairiṁdropeṁdrayamādibhiḥ
पूर्वकाल में एक बार त्रिपुरारि एक शुभ सभा में विराजमान थे, जिनकी सेवा इन्द्र, उपेन्द्र, यम आदि दिक्पाल कर रहे थे।
श्लोक 42 (skanda.1.136.42)
तदा च देवदेवाय नंदनारण्यदेवता । उपायनीकृतवती फलं किमपि पाटलम्
tadā ca devadevāya naṁdanāraṇyadevatā upāyanīkṛtavatī phalaṁ kimapi pāṭalam
उस समय नन्दनवन की देवता ने देवाधिदेव को भेंट के रूप में कोई अद्भुत गुलाबी फल अर्पित किया।
श्लोक 43 (skanda.1.136.43)
बाल्यात्कुतूहलाक्रान्तौ गजाननषडाननौ । पितरं तदयाचेतां लोभनीयतरं फलम्
bālyātkutūhalākrāntau gajānanaṣaḍānanau pitaraṁ tadayācetāṁ lobhanīyataraṁ phalam
बाल्यसुलभ कौतूहल से भरे गजानन और षडानन ने अपने पिता से उस अत्यन्त लोभनीय फल की याचना की।
श्लोक 44 (skanda.1.136.44)
अथ ताववदद्देवस्तनयौ फलतर्षितौ । गोपयित्वा फलं पाणिसंपुटेन कुमारकौ
atha tāvavadaddevastanayau phalatarṣitau gopayitvā phalaṁ pāṇisaṁpuṭena kumārakau
तब उस फल की चाह से व्याकुल अपने दोनों पुत्रों से, हथेलियों में उस फल को छिपाकर भगवान ने कहा।
श्लोक 45 (skanda.1.136.45)
इमां समस्तां पृथिवीं लोकालोकेन वेष्टिताम् । यो वां प्रदक्षिणीकर्तुमीष्टे तस्मै ददाम्यहम्
imāṁ samastāṁ pṛthivīṁ lokālokena veṣṭitām yo vāṁ pradakṣiṇīkartumīṣṭe tasmai dadāmyaham
तुम दोनों में से जो लोकालोक पर्वत से घिरी इस समस्त पृथ्वी की प्रदक्षिणा करने में समर्थ होगा, उसी को मैं यह फल दूँगा।
श्लोक 46 (skanda.1.136.46)
इत्युक्ते पार्वतीशेन स्मयमानमुखेंदुना । स्कंदः प्रदक्षिणीकर्तुं मेदिनीमुपचक्रमे
ityukte pārvatīśena smayamānamukheṁdunā skaṁdaḥ pradakṣiṇīkartuṁ medinīmupacakrame
पार्वतीपति के मुस्कुराते हुए मुख-चन्द्र से इस प्रकार कहे जाने पर स्कन्द पृथ्वी की प्रदक्षिणा करने के लिए चल पड़े।
श्लोक 47 (skanda.1.136.47)
लंबोदरस्तु देवस्य शोणशैलाकृतेः पितुः । प्रदक्षिणं ततः कृत्वा पुरस्तादेव तत्क्षणात्
laṁbodarastu devasya śoṇaśailākṛteḥ pituḥ pradakṣiṇaṁ tataḥ kṛtvā purastādeva tatkṣaṇāt
किन्तु लम्बोदर ने शोण-पर्वत के रूप में स्थित अपने पिता की ही प्रदक्षिणा कर ली, वह भी वहीं तत्काल—
श्लोक 48 (skanda.1.136.48)
तद्दृष्ट्वा तस्य चातुर्यं हेरंबाय त्रियंवकः । फलं वितीर्णवानस्मै प्रणयाघ्रातमस्तकः
taddṛṣṭvā tasya cāturyaṁ heraṁbāya triyaṁvakaḥ phalaṁ vitīrṇavānasmai praṇayāghrātamastakaḥ
—उसकी चतुराई देखकर त्र्यम्बक शिव ने हेरम्ब के मस्तक को प्रेमपूर्वक सूँघकर उसे वह फल प्रदान कर दिया।
श्लोक 49 (skanda.1.136.49)
अद्यप्रभृति सर्वेषां फलानामधिनायकः । भवेत्यस्मै वरं दत्त्वा ह्येकदंताय शंकरः
adyaprabhṛti sarveṣāṁ phalānāmadhināyakaḥ bhavetyasmai varaṁ dattvā hyekadaṁtāya śaṁkaraḥ
साथ ही शंकर ने एकदन्त को यह वरदान भी दिया — आज से तुम समस्त फलों के अधिपति बनो।
श्लोक 50 (skanda.1.136.50)
बभाषे च सभास्तारान्सर्वानपि सुरासुरान् । प्रसरद्दशनज्योत्स्नाकर्बुरीकृतमंदिरः
babhāṣe ca sabhāstārānsarvānapi surāsurān prasaraddaśanajyotsnākarburīkṛtamaṁdiraḥ
अपने दाँतों की फैलती हुई चाँदनी-जैसी कान्ति से सभा-भवन को चित्रित करते हुए उन्होंने सभा में उपस्थित समस्त देवताओं और असुरों से कहा।
श्लोक 51 (skanda.1.136.51)
स्थावरोयं ममाकारः शोणाद्रिर्योऽस्य भक्तितः । प्रदक्षिणां वितनुते स मे सारूप्यभाग्भवेत्
sthāvaroyaṁ mamākāraḥ śoṇādriryo'sya bhaktitaḥ pradakṣiṇāṁ vitanute sa me sārūpyabhāgbhavet
यह शोणाचल मेरा ही स्थावर रूप है; जो कोई भक्तिपूर्वक इसकी प्रदक्षिणा करता है, वह मेरे ही सारूप्य को प्राप्त होता है।
श्लोक 52 (skanda.1.136.52)
गिरेः प्रदक्षिणेनास्य यस्य धत्तः पदे रुजम् । स सम्राट्सकलोत्कृष्टं लभते शाश्वतं पदम्
gireḥ pradakṣiṇenāsya yasya dhattaḥ pade rujam sa samrāṭsakalotkṛṣṭaṁ labhate śāśvataṁ padam
इस पर्वत की प्रदक्षिणा में जो अपने पैरों में पीड़ा सहन करता है, वह सम्राट सबसे उत्कृष्ट शाश्वत पद को प्राप्त कर लेता है।
श्लोक 53 (skanda.1.136.53)
इति शासनतः शंभोः शोणशैलप्रदक्षिणम् । विधाय सर्वगीर्वाणा लेभिरे स्वं स्वमीप्सितम्
iti śāsanataḥ śaṁbhoḥ śoṇaśailapradakṣiṇam vidhāya sarvagīrvāṇā lebhire svaṁ svamīpsitam
इस प्रकार शम्भु की इस आज्ञा के अनुसार समस्त देवताओं ने शोण-पर्वत की प्रदक्षिणा करके अपनी-अपनी अभीष्ट वस्तु प्राप्त कर ली।
श्लोक 54 (skanda.1.136.54)
युवामपि मदोद्भूतमालिन्यौ शिक्षितौ मया । प्रदक्षिणेन शोणाद्रेः शापांतो वां भविष्यति
yuvāmapi madodbhūtamālinyau śikṣitau mayā pradakṣiṇena śoṇādreḥ śāpāṁto vāṁ bhaviṣyati
तुम दोनों, जिनका यह मालिन्य अहंकार से उत्पन्न हुआ है, अब मेरे द्वारा शिक्षित हो चुके हो; शोणाचल की प्रदक्षिणा से ही तुम्हारे शाप का अन्त होगा।
श्लोक 55 (skanda.1.136.55)
तिरश्चोरपि वां सिध्येदरुणाद्रेः प्रदक्षिणा । वज्रांगदस्य पांड्यस्य नृपतेरनुबंधतः
tiraścorapi vāṁ sidhyedaruṇādreḥ pradakṣiṇā vajrāṁgadasya pāṁḍyasya nṛpateranubaṁdhataḥ
पशु-योनि में रहते हुए भी तुम दोनों की अरुणाचल-प्रदक्षिणा पांड्य-नरेश वज्रांगद के साथ के अनुबन्ध से सिद्ध हो जाएगी।
श्लोक 56 (skanda.1.136.56)
इत्यमर्षणमहर्षिमहाब्धेः शापहालहल शोषितगात्रौ । पातितौ बहुलपातकभारात्क्षिप्रमश्वमृगजातिषु जातौ
ityamarṣaṇamaharṣimahābdheḥ śāpahālahala śoṣitagātrau pātitau bahulapātakabhārātkṣipramaśvamṛgajātiṣu jātau
इस प्रकार उस अत्यन्त क्रोधी महर्षि रूपी महासागर के शाप-रूपी हलाहल विष से हमारे शरीर सूख गए, और अनेक पापों के भार से गिरकर हम शीघ्र ही अश्व और मृग की योनि में जन्मे।