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माहेश्वर खण्ड · अध्याय 137

कलाधर और कान्तिशाली का वृत्तांत

अध्याय 136अध्याय-सूचीअध्याय 138

श्लोक 1 (skanda.1.137.1)

कलाधर उवाच । कांबोजेषु हयो भूत्वा कांतिशाली सुहृन्मम । अयासीदौपवाह्यत्वं भवतो राजपुंगव

kalādhara uvāca kāṁbojeṣu hayo bhūtvā kāṁtiśālī suhṛnmama ayāsīdaupavāhyatvaṁ bhavato rājapuṁgava

कलाधर ने कहा — हे राजश्रेष्ठ! मेरा मित्र कान्तिशाली काम्बोज देश में अश्व बनकर आपका वाहन बना।

श्लोक 2 (skanda.1.137.2)

अहं च गंधमृगतां गतः स्वांगप्रसूतिना । सुगंधिना मदेनास्य संचारं चाचरं गिरेः

ahaṁ ca gaṁdhamṛgatāṁ gataḥ svāṁgaprasūtinā sugaṁdhinā madenāsya saṁcāraṁ cācaraṁ gireḥ

और मैं सुगन्धित मृग बनकर, अपने ही शरीर से उत्पन्न सुगन्धित मद के कारण, इस पर्वत के चारों ओर विचरण करता रहा।

श्लोक 3 (skanda.1.137.3)

धर्मात्मन्मृगयाव्याजादागतेन त्वयाधुना । आवां शोणाद्रिनाथस्य प्रापितौ हि प्रदक्षिणाम्

dharmātmanmṛgayāvyājādāgatena tvayādhunā āvāṁ śoṇādrināthasya prāpitau hi pradakṣiṇām

हे धर्मात्मन्! मृगया के बहाने यहाँ आए हुए आपके द्वारा ही हम दोनों को शोणाद्रिनाथ की प्रदक्षिणा प्राप्त हो सकी है।

श्लोक 4 (skanda.1.137.4)

वाहारोहणदोषेण तवासीदीदृशी दशा । पादप्रचारपुण्येन प्राप्तं नौ प्राक्तनं पदम्

vāhārohaṇadoṣeṇa tavāsīdīdṛśī daśā pādapracārapuṇyena prāptaṁ nau prāktanaṁ padam

वाहन पर आरोहण करने के दोष से आपकी ऐसी अवस्था हुई थी; और पैदल चलने के पुण्य से हम दोनों को अपना पूर्व पद पुनः प्राप्त हो गया है।

श्लोक 5 (skanda.1.137.5)

राजेंद्र तव संबंधादस्मात्तिर्यक्त्वबंधनात् । मुक्तावावां स्वकं धाम प्राप्तौ स्वस्त्यस्तु ते सदा

rājeṁdra tava saṁbaṁdhādasmāttiryaktvabaṁdhanāt muktāvāvāṁ svakaṁ dhāma prāptau svastyastu te sadā

हे राजेन्द्र! आपके इस संबंध से ही हम दोनों तिर्यक्-योनि के बन्धन से मुक्त होकर अपने धाम को प्राप्त हुए हैं; आपका सदा कल्याण हो।

श्लोक 6 (skanda.1.137.6)

इत्युदीर्य निजं धाम यियासंतं कलाधरम् । कांतिशालिनं च राजा जगाद रचितांजलिः

ityudīrya nijaṁ dhāma yiyāsaṁtaṁ kalādharam kāṁtiśālinaṁ ca rājā jagāda racitāṁjaliḥ

इस प्रकार कहकर अपने धाम को जाने की इच्छा रखने वाले कलाधर और कान्तिशाली से राजा ने हाथ जोड़कर कहा।

श्लोक 7 (skanda.1.137.7)

एवं युवां शोणशैलशंकरस्य प्रभावतः । शापार्णवं समुत्तीर्णौ कथं मे पुनरुच्छ्रयः

evaṁ yuvāṁ śoṇaśailaśaṁkarasya prabhāvataḥ śāpārṇavaṁ samuttīrṇau kathaṁ me punarucchrayaḥ

इस प्रकार आप दोनों शोण-पर्वत के शंकर के प्रभाव से शाप-सागर को पार कर गए; परन्तु मेरा पतन पुनः किस प्रकार उन्नति में बदलेगा?

श्लोक 8 (skanda.1.137.8)

भ्राम्यतीव मम स्वांतमाधाय तदवेक्षणम् । निर्यांतीव मम प्राणास्तत्र दैवं बलोत्तरम्

bhrāmyatīva mama svāṁtamādhāya tadavekṣaṇam niryāṁtīva mama prāṇāstatra daivaṁ balottaram

उसी चिन्ता में लगा हुआ मेरा हृदय मानो घूम रहा है, मेरे प्राण मानो निकले जा रहे हैं; इस विषय में दैव ही अधिक बलवान है।

श्लोक 9 (skanda.1.137.9)

कलाधरकांतिशालिनावूचतुः । अवधारय निस्तारं कथयाव तवास्यदम् । समाहितेन मनसा निर्धूतनिखिलाधिना

kalādharakāṁtiśālināvūcatuḥ avadhāraya nistāraṁ kathayāva tavāsyadam samāhitena manasā nirdhūtanikhilādhinā

कलाधर और कान्तिशाली ने कहा — अपने उद्धार का उपाय सुनिए; हम आपको वह बताते हैं जो आपके लिए सुखकर है — समस्त चिन्ताओं से रहित शान्त मन से सुनिए।

श्लोक 10 (skanda.1.137.10)

जगत्सर्गस्थितिध्वंसविधानानुग्रहेश्वरे । अरुणाद्रीश्वरे चित्तं निधेहि करुणानिधौ

jagatsargasthitidhvaṁsavidhānānugraheśvare aruṇādrīśvare cittaṁ nidhehi karuṇānidhau

जगत् की सृष्टि, स्थिति, संहार, विधान और अनुग्रह करने वाले, करुणा के सागर उन अरुणाद्रीश्वर में अपना मन लगाइए।

श्लोक 11 (skanda.1.137.11)

प्रत्यक्षितं त्वयेदानीमस्य देवस्य वैभवम् । तिरश्चोरावयोरेतदीदृशत्वं वितन्वतः

pratyakṣitaṁ tvayedānīmasya devasya vaibhavam tiraścorāvayoretadīdṛśatvaṁ vitanvataḥ

आपने अभी इस देव के इस वैभव को साक्षात् देख लिया है, जिसने पशु-योनि में पड़े हम दोनों को इस प्रकार परिवर्तित कर दिया।

श्लोक 12 (skanda.1.137.12)

कुरु प्रदक्षिणां पादचारी मृगमदादृतैः । कल्हारैः पूजयेशानं देवं मृगमदप्रियम्

kuru pradakṣiṇāṁ pādacārī mṛgamadādṛtaiḥ kalhāraiḥ pūjayeśānaṁ devaṁ mṛgamadapriyam

पैदल चलकर प्रदक्षिणा कीजिए, और कस्तूरी से सुगन्धित कमलों से मृगमद-प्रिय ईशान देव की पूजा कीजिए।

श्लोक 13 (skanda.1.137.13)

यावती तव संपत्तिस्तावतीमखिलां विभो । प्राकारगोपुरागारनवीकाराय कल्पय

yāvatī tava saṁpattistāvatīmakhilāṁ vibho prākāragopurāgāranavīkārāya kalpaya

हे विभो! आपकी जितनी भी सम्पत्ति है, वह सारी की सारी प्राकार, गोपुर और भवनों के जीर्णोद्धार के लिए लगा दीजिए।

श्लोक 14 (skanda.1.137.14)

अचिरादेव सिद्धिस्ते भविष्यति गरीयसी । मनुमांधातृनाभागभगीरथवदाधिका

acirādeva siddhiste bhaviṣyati garīyasī manumāṁdhātṛnābhāgabhagīrathavadādhikā

बहुत शीघ्र ही आपको मनु, मान्धाता, नाभाग और भगीरथ से भी बढ़कर महान् सिद्धि प्राप्त होगी।

श्लोक 15 (skanda.1.137.15)

नंदिकेश्वर उवाच । इत्थं निशम्य च तयोर्निजमेव धाम विद्याभृतोः सपदि संश्रुतयोर्नरेन्द्रः । निःसंशयेन मनसा निरतस्तदानीं भक्तिं बबंध भगवत्यरुणाद्रिनाथे

naṁdikeśvara uvāca itthaṁ niśamya ca tayornijameva dhāma vidyābhṛtoḥ sapadi saṁśrutayornarendraḥ niḥsaṁśayena manasā niratastadānīṁ bhaktiṁ babaṁdha bhagavatyaruṇādrināthe

नन्दिकेश्वर जी ने कहा — इस प्रकार सुनकर, और उन दोनों विद्याधरों के तत्काल अपने-अपने धाम को चले जाने पर, वह नरेन्द्र निःसन्देह मन से तभी से भगवान अरुणाद्रिनाथ के प्रति अटूट भक्ति में लीन हो गया।

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