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माहेश्वर खण्ड · अध्याय 20

गिरिजा का प्राकट्य

अध्याय 19अध्याय-सूचीअध्याय 21

श्लोक 1 (skanda.1.20.1)

॥ऋषय ऊचुः॥ ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च सगुणाः कीर्तितास्त्वया॥ लिंगरूपी तथैवेशो निर्गुणोऽसौ कथं वद

||ṛṣaya ūcuḥ|| brahmā viṣṇuśca rudraśca saguṇāḥ kīrtitāstvayā|| liṃgarūpī tathaiveśo nirguṇo'sau kathaṃ vada

ऋषिगण बोले — "आपने ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र को सगुण कहा; परंतु लिंगरूपी ईश्वर उन्हीं की भाँति निर्गुण कैसे हैं, यह हमें बताइए।"

श्लोक 2 (skanda.1.20.2)

त्रिभिर्गुणैर्व्याप्तमिदं चराचरं जगन्महद्व्याप्यथ वाल्पकं वा॥ मायामयं सर्वमिदं विभाति लिंगं विना केन कुतोविभाति

tribhirguṇairvyāptamidaṃ carācaraṃ jaganmahadvyāpyatha vālpakaṃ vā|| māyāmayaṃ sarvamidaṃ vibhāti liṃgaṃ vinā kena kutovibhāti

"यह चराचर जगत, बड़ा हो या छोटा, तीनों गुणों से व्याप्त है; यह सब कुछ माया से युक्त होकर प्रकाशित होता है — बिना लिंग के यह किसके द्वारा और कैसे प्रकाशित हो सकता है?"

श्लोक 3 (skanda.1.20.3)

यद्दृश्यमानं महदल्पकं च तन्नश्वरं कृतकत्वाच्च सूत

yaddṛśyamānaṃ mahadalpakaṃ ca tannaśvaraṃ kṛtakatvācca sūta

"हे सूत, जो कुछ भी दृश्यमान है, बड़ा हो या छोटा, वह कृत्रिम होने के कारण नाशवान ही है।"

श्लोक 4 (skanda.1.20.4)

तस्माद्विमृश्य भोः सूत संशयं छेत्तुमर्हसि॥ व्यासप्रसादात्सकलं जानासि त्वं न चापरः

tasmādvimṛśya bhoḥ sūta saṃśayaṃ chettumarhasi|| vyāsaprasādātsakalaṃ jānāsi tvaṃ na cāparaḥ

"इसलिए, हे सूत, भली-भाँति विचार करके आप ही हमारे इस संशय का निवारण करने योग्य हैं; व्यास जी की कृपा से आप ही सब कुछ जानते हैं, कोई अन्य नहीं।"

श्लोक 5 (skanda.1.20.5)

॥सुत उवाच॥ व्यासेन कथितं सर्वमस्मिन्नर्थे शुकं प्रति॥ शुक उवाच॥ लिंगरूपी कथं शंभुर्निर्गुणः कथते त्वया॥ एतन्मे संशयं तात च्छेत्तुमर्हस्यशेषतः

||suta uvāca|| vyāsena kathitaṃ sarvamasminnarthe śukaṃ prati|| śuka uvāca|| liṃgarūpī kathaṃ śaṃbhurnirguṇaḥ kathate tvayā|| etanme saṃśayaṃ tāta cchettumarhasyaśeṣataḥ

सूत जी बोले — इस विषय में व्यास जी ने शुकदेव से यह सब कहा था। शुकदेव ने पूछा — "आप कहते हैं कि लिंगरूपी शंभु निर्गुण हैं, यह कैसे? हे तात, मेरे इस संशय का पूर्णतः निवारण करें।"

श्लोक 6 (skanda.1.20.6)

॥व्यास उवाच॥ श्रुणु वत्स ब्रवीम्येतत्पुरा प्रोक्तं च नंदिना॥ अगस्त्यं पृच्छमानं च येन सर्वं श्रुतं शुक

||vyāsa uvāca|| śruṇu vatsa bravīmyetatpurā proktaṃ ca naṃdinā|| agastyaṃ pṛcchamānaṃ ca yena sarvaṃ śrutaṃ śuka

व्यास जी बोले — "हे वत्स, सुनो, मैं तुम्हें वही बताता हूँ जो पहले नंदी ने अगस्त्य से पूछे जाने पर कहा था, और जिसे मैंने भी सुना था, हे शुक।"

श्लोक 7 (skanda.1.20.7)

निर्गुणं परमात्मानं विद्धि लिंगस्वरूपिणम्॥ परा शक्तिस्तथा ज्ञेया निर्गुणा शाश्वती सती

nirguṇaṃ paramātmānaṃ viddhi liṃgasvarūpiṇam|| parā śaktistathā jñeyā nirguṇā śāśvatī satī

"लिंग-स्वरूप उस परमात्मा को निर्गुण जानो; और उसी प्रकार परा शक्ति को भी निर्गुण, शाश्वत और सती जानना चाहिए।"

श्लोक 8 (skanda.1.20.8)

यया कृतिमिदं सर्वं गुणत्रयविभावितम्॥ एतच्चराचरं विश्वं नश्वरं परमार्थतः

yayā kṛtimidaṃ sarvaṃ guṇatrayavibhāvitam|| etaccarācaraṃ viśvaṃ naśvaraṃ paramārthataḥ

"उसी शक्ति के द्वारा यह समस्त कृत्रिम, त्रिगुणों से विभावित चराचर विश्व रचा गया है, जो परमार्थतः नाशवान है।"

श्लोक 9 (skanda.1.20.9)

एक एव परो ह्यात्मा लिंगरूपी निरंजनः॥ प्रकृत्या सह ते सर्वे त्रिगुणा विलयं गताः

eka eva paro hyātmā liṃgarūpī niraṃjanaḥ|| prakṛtyā saha te sarve triguṇā vilayaṃ gatāḥ

"एकमात्र वह परमात्मा ही लिंगरूपी और निरंजन है; प्रकृति सहित वे समस्त तीनों गुण अंततः उसी में विलीन हो जाते हैं।"

श्लोक 10 (skanda.1.20.10)

यस्मिन्नेव ततो लिंगं लयनात्कथितं पुरा॥ तस्माल्लिंगे लयं प्राप्ता परा शक्तिः कुतोऽपरे

yasminneva tato liṃgaṃ layanātkathitaṃ purā|| tasmālliṃge layaṃ prāptā parā śaktiḥ kuto'pare

"जिसमें यह सब लीन होता है, इसीलिए पहले उसे 'लिंग' कहा गया था; उसी लिंग में परा शक्ति भी लय को प्राप्त होती है, तो फिर अन्य कहाँ?"

श्लोक 11 (skanda.1.20.11)

लीना गुणाश्च रुद्रोक्त्या यैरिदं बद्धमेव च॥ चराचरं महाभाग तस्माल्लिंगं प्रपूजयेत्

līnā guṇāśca rudroktyā yairidaṃ baddhameva ca|| carācaraṃ mahābhāga tasmālliṃgaṃ prapūjayet

"हे महाभाग, जिन गुणों से यह चराचर जगत बँधा हुआ है, वे भी रुद्र की ही वाणी से उसी में लीन हो जाते हैं; इसीलिए लिंग की पूजा करनी चाहिए।"

श्लोक 12 (skanda.1.20.12)

लिंगं च निर्गुणं साक्षाज्जानीध्वं भो द्रिजोतमाः॥ लयाल्लिंगस्य माहात्म्यं गुणानां परिकीर्त्यते

liṃgaṃ ca nirguṇaṃ sākṣājjānīdhvaṃ bho drijotamāḥ|| layālliṃgasya māhātmyaṃ guṇānāṃ parikīrtyate

"हे द्विजोत्तमो, लिंग को साक्षात् निर्गुण ही जानो; उसमें गुणों के लय होने के कारण ही लिंग की महिमा गाई जाती है।"

श्लोक 13 (skanda.1.20.13)

शंकरः सुखदाता हि उच्यमानो मनीषिभिः॥ सर्वो हि कथ्यते विप्राः सर्वेषामाश्रयो हि स

śaṃkaraḥ sukhadātā hi ucyamāno manīṣibhiḥ|| sarvo hi kathyate viprāḥ sarveṣāmāśrayo hi sa

"मनीषी जन शंकर को सुखदाता कहते हैं; हे विप्रो, वे 'सर्व' भी कहलाते हैं, क्योंकि वे ही समस्त प्राणियों के आश्रय हैं।"

श्लोक 14 (skanda.1.20.14)

शंभुर्हि कथ्यते विप्रा यस्माच्च शुभसंभवः

śaṃbhurhi kathyate viprā yasmācca śubhasaṃbhavaḥ

"हे विप्रो, वे 'शंभु' कहलाते हैं क्योंकि उन्हीं से समस्त शुभ की उत्पत्ति होती है।"

श्लोक 15 (skanda.1.20.15)

एवं सर्वाणि नामानि सार्थकानि महात्मनः॥ तेनावृतं जगत्सर्वं शंभुना परमेष्ठिना

evaṃ sarvāṇi nāmāni sārthakāni mahātmanaḥ|| tenāvṛtaṃ jagatsarvaṃ śaṃbhunā parameṣṭhinā

"इस प्रकार उस महात्मा के समस्त नाम सार्थक हैं; उस परमेष्ठी शंभु द्वारा ही यह सारा जगत आवृत है।"

श्लोक 16 (skanda.1.20.16)

॥ऋषय ऊचुः॥ यदा दाक्षायणी चाग्नौ पतिता यज्ञकर्मणि॥ दक्षस्य च महाभागा तिरोधानगता सती

||ṛṣaya ūcuḥ|| yadā dākṣāyaṇī cāgnau patitā yajñakarmaṇi|| dakṣasya ca mahābhāgā tirodhānagatā satī

ऋषिगण बोले — "जब दक्ष के यज्ञ-कर्म में दाक्षायणी अग्नि में गिर पड़ीं, और वह महाभागा सती तिरोहित हो गईं —"

श्लोक 17 (skanda.1.20.17)

प्रादुर्भूता कदा सूत कथ्यतां तत्त्वयाऽधुना॥ परा शक्तिर्महेशस्य मिलिता च कथं पुनः

prādurbhūtā kadā sūta kathyatāṃ tattvayā'dhunā|| parā śaktirmaheśasya militā ca kathaṃ punaḥ

"— हे सूत, महेश की वह परा शक्ति फिर कब प्रकट हुई और किस प्रकार उनसे पुनः मिलीं, यह अब आप हमें बताएँ।"

श्लोक 18 (skanda.1.20.18)

एतत्सर्वं महाभाग पूर्ववृत्तं च तत्त्वतः॥ कथनीयं च अस्माकं नान्यो वक्तास्ति कश्चन

etatsarvaṃ mahābhāga pūrvavṛttaṃ ca tattvataḥ|| kathanīyaṃ ca asmākaṃ nānyo vaktāsti kaścana

"हे महाभाग, यह समस्त पूर्ववृत्तांत हमें यथार्थ रूप से बताया जाना चाहिए; इसे बताने वाला आपके अतिरिक्त अन्य कोई नहीं है।"

श्लोक 19 (skanda.1.20.19)

॥सूत उवाच॥ जज्ञे दाक्षायणी ब्रह्मन्विदग्धावयवा यदा॥ विना शक्त्या महेशोऽपि तताप परमं तपः

||sūta uvāca|| jajñe dākṣāyaṇī brahmanvidagdhāvayavā yadā|| vinā śaktyā maheśo'pi tatāpa paramaṃ tapaḥ

सूत जी बोले — "हे ब्राह्मणो, जब दाक्षायणी के अंग अग्नि में दग्ध हो गए, तब शक्ति से विहीन होकर महेश ने भी परम तप करना आरंभ किया।"

श्लोक 20 (skanda.1.20.20)

लीलागृहीतवपुषा पर्वते हिमवद्गिरौ॥ भृंगिणा सह विश्वेन नंदिना च तथैव च

līlāgṛhītavapuṣā parvate himavadgirau|| bhṛṃgiṇā saha viśvena naṃdinā ca tathaiva ca

उन्होंने लीला से एक शरीर धारण करके हिमालय पर्वत पर, भृंगी, विश्व और नंदी सहित —

श्लोक 21 (skanda.1.20.21)

तथा चंडेन मुंडेन तथान्यैर्बहुभिर्वृतः॥ दशभिः कोटिगुणितैर्गणैश्च परिवारितः

tathā caṃḍena muṃḍena tathānyairbahubhirvṛtaḥ|| daśabhiḥ koṭiguṇitairgaṇaiśca parivāritaḥ

— तथा चंड, मुंड और अन्य अनेक गणों सहित, दस करोड़ गणों से घिरे हुए वे वहाँ विराजमान हुए।

श्लोक 22 (skanda.1.20.22)

गणानां चैव कोट्या च तथा षष्टिसहस्रकैः॥ एवं तत्र गणैर्देव आवृतो वृषभध्वजः

gaṇānāṃ caiva koṭyā ca tathā ṣaṣṭisahasrakaiḥ|| evaṃ tatra gaṇairdeva āvṛto vṛṣabhadhvajaḥ

करोड़ों गणों और साठ हजार अन्य गणों सहित, इस प्रकार वहाँ वे वृषभध्वज देव अपने गणों से घिरे हुए थे।

श्लोक 23 (skanda.1.20.23)

तपो जुषाणः सहसा महात्मा हिमालयस्याग्रगतस्तथैव॥ गणैर्वृतो वीरभद्रप्रधानैः स केवलो मूलविद्याविहीनः

tapo juṣāṇaḥ sahasā mahātmā himālayasyāgragatastathaiva|| gaṇairvṛto vīrabhadrapradhānaiḥ sa kevalo mūlavidyāvihīnaḥ

वे महात्मा हिमालय के शिखर पर जाकर सहसा तप करने लगे, वीरभद्र आदि प्रमुख गणों से घिरे हुए, अपनी मूल विद्या से रहित होकर, अकेले ही।

श्लोक 24 (skanda.1.20.24)

एतस्मिन्नंतरे दैत्याः प्रादुर्भूता ह्यविद्यया॥ विष्णुना हि बलिर्बद्धस्तथा ते वै महाबलाः

etasminnaṃtare daityāḥ prādurbhūtā hyavidyayā|| viṣṇunā hi balirbaddhastathā te vai mahābalāḥ

इसी बीच अविद्या से अनेक दैत्य प्रकट हो गए; विष्णु द्वारा बलि को बाँध दिया गया था, फिर भी वे महाबली दैत्य उत्पन्न होते ही रहे।

श्लोक 25 (skanda.1.20.25)

जाता दैत्यास्ततो विप्रा इंद्रोपद्रवकारकाः॥ कालखंजा महारौद्राः कालकायास्तथापरे

jātā daityāstato viprā iṃdropadravakārakāḥ|| kālakhaṃjā mahāraudrāḥ kālakāyāstathāpare

हे विप्रो, तब इंद्र को उपद्रव पहुँचाने वाले दैत्य उत्पन्न हुए — कालखंज, महारौद्र, कालकाय और अन्य भी।

श्लोक 26 (skanda.1.20.26)

निवातकवचाः सर्वे रवरावकसंज्ञकाः॥ अन्ये च बहवो दैत्याः प्रजासंहारकारकाः

nivātakavacāḥ sarve ravarāvakasaṃjñakāḥ|| anye ca bahavo daityāḥ prajāsaṃhārakārakāḥ

निवातकवच नामक असुर, रवरावक नामक असुर, और अन्य भी अनेक दैत्य, जो प्रजा का संहार करने वाले थे।

श्लोक 27 (skanda.1.20.27)

तारको नमुचेः पुत्रस्तपसा परमेण हि॥ ब्रह्माणं तोषयामास ब्रह्मा तस्य तुतोष वै

tārako namuceḥ putrastapasā parameṇa hi|| brahmāṇaṃ toṣayāmāsa brahmā tasya tutoṣa vai

नमुचि का पुत्र तारक भी था, जिसने परम तप से ब्रह्मा को संतुष्ट किया; ब्रह्मा उससे अत्यंत प्रसन्न हुए।

श्लोक 28 (skanda.1.20.28)

वरान्ददौ यथेष्टांश्च तारकाय दुरात्मने॥ वरं वृणीष्व भद्रं ते सर्वान्कामान्ददामि ते

varāndadau yatheṣṭāṃśca tārakāya durātmane|| varaṃ vṛṇīṣva bhadraṃ te sarvānkāmāndadāmi te

उन्होंने उस दुरात्मा तारक को इच्छानुसार वर दिए — "वर माँगो, तुम्हारा कल्याण हो, मैं तुम्हारी समस्त कामनाएँ पूर्ण करूँगा।"

श्लोक 29 (skanda.1.20.29)

तच्छत्वा वचनं तस्य ब्रह्मणः परमेष्ठिनः॥ वरयामास च तदा वरं लोकभयावहम्

tacchatvā vacanaṃ tasya brahmaṇaḥ parameṣṭhinaḥ|| varayāmāsa ca tadā varaṃ lokabhayāvaham

परमेष्ठी ब्रह्मा का यह वचन सुनकर, उसने तब एक ऐसा वर माँगा जो समस्त लोकों के लिए भयावह था।

श्लोक 30 (skanda.1.20.30)

यदि मे त्वं प्रसन्नऽसि अजरामरतां प्रभो॥ देहि मे यद्विजानासि अजेयत्वं तथैव च

yadi me tvaṃ prasanna'si ajarāmaratāṃ prabho|| dehi me yadvijānāsi ajeyatvaṃ tathaiva ca

"यदि आप मुझसे प्रसन्न हैं, हे प्रभो, तो मुझे अजर-अमरता प्रदान करें; और आप जो कुछ भी उपयुक्त समझें, वह अजेयत्व भी मुझे दें।"

श्लोक 31 (skanda.1.20.31)

एवमुक्तस्तदा तेन तारकेण दुरात्मना॥ उवाच प्रहसन्वाक्यममरत्वं कुतस्तव

evamuktastadā tena tārakeṇa durātmanā|| uvāca prahasanvākyamamaratvaṃ kutastava

उस दुरात्मा तारक द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर, ब्रह्मा ने हँसते हुए कहा — "तुम्हें अमरत्व कहाँ से मिल सकता है?"

श्लोक 32 (skanda.1.20.32)

जातस्य हि ध्रुवो मृत्युरेतज्जानीहि तत्त्वतः॥ प्रहस्य तारकः प्राह अजेयत्वं च देहि मे

jātasya hi dhruvo mṛtyuretajjānīhi tattvataḥ|| prahasya tārakaḥ prāha ajeyatvaṃ ca dehi me

"जो जन्मा है, उसकी मृत्यु निश्चित है — इसे यथार्थ रूप से जान लो।" तब तारक ने भी हँसते हुए कहा — "तो मुझे अजेयत्व ही दे दीजिए।"

श्लोक 33 (skanda.1.20.33)

ब्रह्मोवाच तदा दैत्यजेयत्वं तवानघ॥ विनार्भकेण दत्तं वै ह्यर्भकस्त्वां विजेष्यते

brahmovāca tadā daityajeyatvaṃ tavānagha|| vinārbhakeṇa dattaṃ vai hyarbhakastvāṃ vijeṣyate

ब्रह्मा ने कहा — "हे निष्पाप दैत्य, तुम्हारा अजेयत्व यही होगा कि तुम्हें कोई भी नहीं जीत सकेगा, सिवाय एक बालक के — केवल वही बालक तुम्हें पराजित करेगा।"

श्लोक 34 (skanda.1.20.34)

तदा स तारकः प्राह ब्रह्माणं प्रणतः प्रभो॥ कृतार्थोऽहं हि देवेश प्रसादात्तव संप्रति

tadā sa tārakaḥ prāha brahmāṇaṃ praṇataḥ prabho|| kṛtārtho'haṃ hi deveśa prasādāttava saṃprati

तब तारक ने प्रणाम करके ब्रह्मा से कहा — "हे देवेश, हे प्रभो, आपकी कृपा से अब मैं कृतार्थ हो गया हूँ।"

श्लोक 35 (skanda.1.20.35)

एवं लब्धवरो भूत्वा तारको हि महाबलः॥ देवान्युद्धार्थमाहूय युयुधे तैः सहासुरः

evaṃ labdhavaro bhūtvā tārako hi mahābalaḥ|| devānyuddhārthamāhūya yuyudhe taiḥ sahāsuraḥ

इस प्रकार वर प्राप्त करके, वह महाबली तारक असुर, देवताओं को युद्ध के लिए ललकार कर उनसे युद्ध करने लगा।

श्लोक 36 (skanda.1.20.36)

मुचुकुन्दं समाश्रित्य देवास्ते जयिनोऽभवन्॥ पुनः पुनर्विकुर्वाणा देवास्ते तारकेण हि

mucukundaṃ samāśritya devāste jayino'bhavan|| punaḥ punarvikurvāṇā devāste tārakeṇa hi

मुचुकुंद का सहारा लेकर देवता विजयी हुए, परंतु तारक द्वारा वे बार-बार पराजित भी होते रहे।

श्लोक 37 (skanda.1.20.37)

मुचुकुन्दबलेनैव जयमापुःसुरास्तदा॥ किं कर्तव्यं हि चास्माकं युध्यमानैर्निरंतरम्

mucukundabalenaiva jayamāpuḥsurāstadā|| kiṃ kartavyaṃ hi cāsmākaṃ yudhyamānairniraṃtaram

मुचुकुंद के बल से ही उस समय देवता विजय प्राप्त करते रहे — "अब हमें निरंतर युद्ध करते हुए और क्या करना चाहिए?" — यह सोचने लगे।

श्लोक 38 (skanda.1.20.38)

भवितव्यमिति स्मृत्वा गतास्ते ब्रह्मणः पदम्॥ ब्रह्मणश्चाग्रतो भूत्वा ह्यब्रुवंस्ते सवासवाः

bhavitavyamiti smṛtvā gatāste brahmaṇaḥ padam|| brahmaṇaścāgrato bhūtvā hyabruvaṃste savāsavāḥ

"जो होना है, वह हो ही" — यह सोचकर वे ब्रह्मा के पास गए; ब्रह्मा के सम्मुख खड़े होकर इंद्र सहित उन देवताओं ने यह कहा —

श्लोक 39 (skanda.1.20.39)

॥ देवा ऊचूः॥ बलिना सह पातालमास्तेऽसौ मधुसूदनः॥ विष्णुं विना हि ते सर्वे वृषाद्याः पतिताः परैः

|| devā ūcūḥ|| balinā saha pātālamāste'sau madhusūdanaḥ|| viṣṇuṃ vinā hi te sarve vṛṣādyāḥ patitāḥ paraiḥ

देवता बोले — "वह मधुसूदन विष्णु बलि के साथ ही पाताल में निवास कर रहे हैं; विष्णु के बिना हम सब वृषभ आदि शत्रुओं द्वारा पराजित हो गए हैं।"

श्लोक 40 (skanda.1.20.40)

दैत्येंद्रैश्च महाभाग त्रातुमर्हसि नः प्रभो॥ तदा नभोगता वाणी ह्युवाच परिसांत्व्य वै

daityeṃdraiśca mahābhāga trātumarhasi naḥ prabho|| tadā nabhogatā vāṇī hyuvāca parisāṃtvya vai

"हे महाभाग, हे प्रभो, उन दैत्येंद्रों से आप ही हमारी रक्षा करने योग्य हैं" — तभी सांत्वनापूर्वक एक आकाशवाणी हुई —

श्लोक 41 (skanda.1.20.41)

हे देवाः क्रियतामाशु मम वाक्यं हि तत्त्वतः॥ शिवात्मजो यदा देवा भविष्यति महाबलः

he devāḥ kriyatāmāśu mama vākyaṃ hi tattvataḥ|| śivātmajo yadā devā bhaviṣyati mahābalaḥ

"हे देवो, मेरी यह बात सत्य मानकर शीघ्र करो — जब शिव का महाबली पुत्र उत्पन्न होगा —"

श्लोक 42 (skanda.1.20.42)

युद्धे पुनस्तारकं च वधिष्यति न संशयः॥ येनोपायेन भगवाञ्छंभुः सर्वगुहाशयः

yuddhe punastārakaṃ ca vadhiṣyati na saṃśayaḥ|| yenopāyena bhagavāñchaṃbhuḥ sarvaguhāśayaḥ

"— तब वह युद्ध में तारक का वध कर देगा, इसमें कोई संदेह नहीं। जिस उपाय से समस्त हृदयों में निवास करने वाले भगवान शंभु —"

श्लोक 43 (skanda.1.20.43)

दारापरिग्रही देवास्तथा नीतिर्विधीयताम्॥ क्रियतां च परो यत्नो भवद्भिर्नान्यथा वचः

dārāparigrahī devāstathā nītirvidhīyatām|| kriyatāṃ ca paro yatno bhavadbhirnānyathā vacaḥ

"— फिर से पत्नी ग्रहण करें, हे देवो, वही नीति अपनाई जाए; उसके लिए तुम्हें परम प्रयत्न करना चाहिए, मेरा यह वचन अन्यथा नहीं है।"

श्लोक 44 (skanda.1.20.44)

यूयं देवा विजानीध्वमित्युवाचाशरीरवाक्॥ परं विस्मयमापन्ना ऊचुर्देवाः परस्परम्

yūyaṃ devā vijānīdhvamityuvācāśarīravāk|| paraṃ vismayamāpannā ūcurdevāḥ parasparam

"हे देवो, तुम स्वयं इसे समझ लो" — इस प्रकार उस अशरीर वाणी ने कहा; तब देवगण परम विस्मय को प्राप्त होकर आपस में बोलने लगे —

श्लोक 45 (skanda.1.20.45)

श्रुत्वा नभोगतां वाणीमाजग्मुस्ते हिमालयम्॥ बृहस्पतिं पुरस्कृत्य सर्वे देवा वचोऽब्रुवन्

śrutvā nabhogatāṃ vāṇīmājagmuste himālayam|| bṛhaspatiṃ puraskṛtya sarve devā vaco'bruvan

उस आकाशवाणी को सुनकर वे सभी हिमालय के पास आ पहुँचे; बृहस्पति को आगे करके समस्त देवताओं ने यह वचन कहा —

श्लोक 46 (skanda.1.20.46)

हिमालयं महाभागाः सर्वे कार्यार्थगौरवात्॥ हिमालय महाभाग श्रूयतां नोऽधुना वचः

himālayaṃ mahābhāgāḥ sarve kāryārthagauravāt|| himālaya mahābhāga śrūyatāṃ no'dhunā vacaḥ

वे सभी महाभाग देवता, कार्य की गंभीरता से प्रेरित होकर हिमालय से बोले — "हे महाभाग हिमालय, अब हमारा वचन सुनिए।"

श्लोक 47 (skanda.1.20.47)

तारकस्त्रासयत्यस्मान्साहाय्यं तद्वधे कुरु॥ त्वं शरण्यो भवास्माकं सर्वेषां च तपस्विनाम्॥ तस्मात्सर्वे वयं याता महेंद्रसहिता विभो

tārakastrāsayatyasmānsāhāyyaṃ tadvadhe kuru|| tvaṃ śaraṇyo bhavāsmākaṃ sarveṣāṃ ca tapasvinām|| tasmātsarve vayaṃ yātā maheṃdrasahitā vibho

"तारक हमें भयभीत कर रहा है; उसके वध में सहायता कीजिए। हे प्रभो, आप ही हम सबके और समस्त तपस्वियों के शरणदाता बनें; इसीलिए हम सब महेंद्र सहित यहाँ आए हैं।"

श्लोक 48 (skanda.1.20.48)

॥ लोमश उवाच॥ एवमभ्यर्थितो देवैर्हिमवान्गिरिसत्तमः॥ उवाच देवान्प्रहसन्वाक्यं वाक्यविदां वरः

|| lomaśa uvāca|| evamabhyarthito devairhimavāngirisattamaḥ|| uvāca devānprahasanvākyaṃ vākyavidāṃ varaḥ

लोमश जी बोले — देवताओं द्वारा इस प्रकार प्रार्थना किए जाने पर, वाक्य-कुशलों में श्रेष्ठ पर्वतश्रेष्ठ हिमवान ने हँसते हुए देवताओं से यह वचन कहा —

श्लोक 49 (skanda.1.20.49)

महेन्द्र मुद्दिश्य तदा ह्युपहाससमन्वितः॥ अक्षमाश्च वयं सर्वे महेन्द्रेण कृताः सुराः

mahendra muddiśya tadā hyupahāsasamanvitaḥ|| akṣamāśca vayaṃ sarve mahendreṇa kṛtāḥ surāḥ

उन्होंने महेंद्र का उल्लेख करते हुए उपहासपूर्वक कहा — "हम सभी देवता महेंद्र द्वारा ही असहाय बना दिए गए हैं।"

श्लोक 50 (skanda.1.20.50)

किं कुर्मः सुरकार्यं च तारकस्य वधं प्रति॥ पक्षयुक्ता वयं सर्वे यदि स्याम सुरोत्तमाः

kiṃ kurmaḥ surakāryaṃ ca tārakasya vadhaṃ prati|| pakṣayuktā vayaṃ sarve yadi syāma surottamāḥ

"तारक के वध के लिए हम देवताओं का कार्य क्या करें? यदि हम सभी श्रेष्ठ देवता किसी पक्ष से युक्त हों —"

श्लोक 51 (skanda.1.20.51)

तदा वयं घातयामस्तारकं सह बांधवैः॥ अचलोहं विपक्षश्च किं कार्यं करवाणि व

tadā vayaṃ ghātayāmastārakaṃ saha bāṃdhavaiḥ|| acalohaṃ vipakṣaśca kiṃ kāryaṃ karavāṇi va

"— तो हम तारक को उसके बंधुओं सहित मार डालें। मैं तो अचल हूँ, विपक्ष भी नहीं हूँ; मुझे क्या करना चाहिए?"

श्लोक 52 (skanda.1.20.52)

तस्य तद्वचनं श्रुत्वा सर्वे देवास्तमब्रुवन्॥ सर्वे यूयं वयं चैव असमर्था वधं प्रति॥ तारकस्य महाभाग एतत्कार्यं विचंत्यताम्

tasya tadvacanaṃ śrutvā sarve devāstamabruvan|| sarve yūyaṃ vayaṃ caiva asamarthā vadhaṃ prati|| tārakasya mahābhāga etatkāryaṃ vicaṃtyatām

उसका यह वचन सुनकर समस्त देवताओं ने उससे कहा — "हम सब और आप — दोनों ही तारक के वध में असमर्थ हैं; हे महाभाग, इस कार्य पर विचार कीजिए।"

श्लोक 53 (skanda.1.20.53)

येन साध्यो भवेच्छत्रुस्तारको हि महाबलः॥ तदोवाच महातेजा हिमवान्स सुरान्प्रति

yena sādhyo bhavecchatrustārako hi mahābalaḥ|| tadovāca mahātejā himavānsa surānprati

"जिस उपाय से यह महाबली तारक शत्रु साध्य हो सके, वह उपाय बताइए" — तब महातेजस्वी हिमवान ने देवताओं से कहा —

श्लोक 54 (skanda.1.20.54)

केनोपायेन भो देवास्तारकं हंतुमिच्छथ॥ कथयंतुत्वरेणैव कार्यं वेत्तुं ममैव हि

kenopāyena bho devāstārakaṃ haṃtumicchatha|| kathayaṃtutvareṇaiva kāryaṃ vettuṃ mamaiva hi

"हे देवो, किस उपाय से तुम तारक का वध करना चाहते हो? यह मुझे शीघ्रता से बताओ, जिससे मैं भी अपना कार्य समझ सकूँ।"

श्लोक 55 (skanda.1.20.55)

तदा सुरैः कथितं सर्वमेतद्वाण्या चोक्तं यत्पुरा कार्यहेतोः॥ श्रुतं तदा गिरिणा वाक्यमेत xxxxxxx हिमवान्पर्वतो हि

tadā suraiḥ kathitaṃ sarvametadvāṇyā coktaṃ yatpurā kāryahetoḥ|| śrutaṃ tadā giriṇā vākyameta xxxxxxx himavānparvato hi

तब देवताओं ने पहले कार्य-सिद्धि के लिए जो आकाशवाणी हुई थी, वह सब कह सुनाया; तब वह वचन पर्वत हिमवान द्वारा सुना गया।

श्लोक 56 (skanda.1.20.56)

शिवस्य पुत्रेण च धीमता यदा वध्यो दैत्यस्तारको वै महात्मा॥ तदा सर्वं सुरगकार्यं शुभंस्याद्वाण्या चोक्तं सत्यमेतद्भवेच्च

śivasya putreṇa ca dhīmatā yadā vadhyo daityastārako vai mahātmā|| tadā sarvaṃ suragakāryaṃ śubhaṃsyādvāṇyā coktaṃ satyametadbhavecca

जब शिव के बुद्धिमान पुत्र द्वारा उस महात्मा दैत्य तारक का वध होना निश्चित हुआ, तब देवताओं का समस्त कार्य शुभ हो जाएगा — यह आकाशवाणी सत्य ही होगी।

श्लोक 57 (skanda.1.20.57)

तस्मात्तदेनत्क्रियतां भवद्भिर्यथा महेशः कुरुते परिग्रहम्॥ कन्या यथा तस्य शिवस्य योग्या निरीक्ष्यतामाशु सुरैरिदानीम्

tasmāttadenatkriyatāṃ bhavadbhiryathā maheśaḥ kurute parigraham|| kanyā yathā tasya śivasya yogyā nirīkṣyatāmāśu surairidānīm

"इसलिए अब आप लोग ऐसा उपाय कीजिए जिससे महेश विवाह करें; अब देवताओं को शीघ्र यह देखना चाहिए कि उस शिव के योग्य कन्या कौन है।"

श्लोक 58 (skanda.1.20.58)

तस्य तद्वचनं श्रुत्वा प्रहस्योचुः सुरास्तदा॥ जनितव्या त्वया कन्या शिवार्थं कार्यसिद्धये

tasya tadvacanaṃ śrutvā prahasyocuḥ surāstadā|| janitavyā tvayā kanyā śivārthaṃ kāryasiddhaye

उसका यह वचन सुनकर देवगण हँसते हुए बोले — "आपको ही शिव के हेतु, कार्य की सिद्धि के लिए एक कन्या को जन्म देना होगा।"

श्लोक 59 (skanda.1.20.59)

सुराणां च गिरे वाक्यं कुरु शीघ्रं महामते॥ आधारस्त्वं तु देवानां भविष्यसि न संशयः

surāṇāṃ ca gire vākyaṃ kuru śīghraṃ mahāmate|| ādhārastvaṃ tu devānāṃ bhaviṣyasi na saṃśayaḥ

"हे महामते, देवताओं की इस बात को शीघ्र स्वीकार कीजिए; आप ही देवताओं के आधार बनेंगे, इसमें कोई संदेह नहीं।"

श्लोक 60 (skanda.1.20.60)

इत्युक्तो गिरिराजोऽथ देवैः स्वगृहमामाविशत्॥ पत्नीं मेनां च पप्रच्छ सुकार्यं समागतम्

ityukto girirājo'tha devaiḥ svagṛhamāmāviśat|| patnīṃ menāṃ ca papraccha sukāryaṃ samāgatam

गिरिराज हिमवान इस प्रकार देवताओं द्वारा कहे जाने पर अपने घर लौट आए, और अपनी पत्नी मेना से इस शुभ कार्य के बारे में पूछा जो उनके पास आया था।

श्लोक 61 (skanda.1.20.61)

जनितव्या सुकन्यैका सुरकार्यार्थसिद्धये॥ देवानां च ऋषीणां च तथैव च तपस्विनाम्

janitavyā sukanyaikā surakāryārthasiddhaye|| devānāṃ ca ṛṣīṇāṃ ca tathaiva ca tapasvinām

"देवताओं, ऋषियों और तपस्वियों के कार्य की सिद्धि के लिए एक सुंदर कन्या को जन्म देना होगा।"

श्लोक 62 (skanda.1.20.62)

प्रियं न भवति स्त्रीणां कन्याजननसेव च॥ तथापि जनितव्या च कन्यैका च वरानने

priyaṃ na bhavati strīṇāṃ kanyājananaseva ca|| tathāpi janitavyā ca kanyaikā ca varānane

"स्त्रियों के लिए कन्या को जन्म देना प्रिय नहीं होता, फिर भी, हे सुमुखी, हमें एक कन्या को अवश्य जन्म देना होगा।"

श्लोक 63 (skanda.1.20.63)

प्रहस्य मेना प्रोवाच स्वपतिं च हिमालयम्॥ यदुक्तं भवता वाक्यं श्रूयतां मे त्वयाऽधुना

prahasya menā provāca svapatiṃ ca himālayam|| yaduktaṃ bhavatā vākyaṃ śrūyatāṃ me tvayā'dhunā

मेना ने मुस्कुराते हुए अपने पति हिमालय से कहा — "आपने जो यह वचन कहा है, उसे अब आप मुझसे सुनें —"

श्लोक 64 (skanda.1.20.64)

कन्या सदा दुःखकरी नृणां पते स्त्रीणां तथा शोककरी महामते॥ तस्माद्विमृश्य सुचिरं स्वयमेव बुद्ध्या यथा हितं शैलपते तदुच्यताम्

kanyā sadā duḥkhakarī nṛṇāṃ pate strīṇāṃ tathā śokakarī mahāmate|| tasmādvimṛśya suciraṃ svayameva buddhyā yathā hitaṃ śailapate taducyatām

"हे पते, हे महामते, कन्या मनुष्यों के लिए सदा दुःखदायी होती है, और स्त्रियों के लिए तो और भी अधिक शोककारी; इसलिए दीर्घकाल तक भली-भाँति विचार करके, हे शैलपते, जो आपकी बुद्धि में हितकर प्रतीत हो, वही निर्णय करें।"

श्लोक 65 (skanda.1.20.65)

हिमवांस्तदुपश्रुत्या प्रियाया वचनं तदा॥ उवाच वाक्यं मेधावी परोपकरणान्वितम्

himavāṃstadupaśrutyā priyāyā vacanaṃ tadā|| uvāca vākyaṃ medhāvī paropakaraṇānvitam

प्रिय पत्नी का यह वचन सुनकर बुद्धिमान हिमवान ने परोपकार से युक्त यह वचन कहा —

श्लोक 66 (skanda.1.20.66)

येनयेन प्रकारेण परेषामुपजीवनम्॥ भविष्यति च तत्कार्यं धीमता पुरुषेण हि

yenayena prakāreṇa pareṣāmupajīvanam|| bhaviṣyati ca tatkāryaṃ dhīmatā puruṣeṇa hi

"जिस भी प्रकार से दूसरों का उपकार हो सके, बुद्धिमान पुरुष को वही कार्य करना चाहिए।"

श्लोक 67 (skanda.1.20.67)

स्त्रियापि चैव तत्कार्यं परोपकरणान्वितम्॥ एवं प्रवर्तिता तेन गिरिणा महिषी तदा॥ दधार जठरे कन्यां मेना भाग्यवती तदा

striyāpi caiva tatkāryaṃ paropakaraṇānvitam|| evaṃ pravartitā tena giriṇā mahiṣī tadā|| dadhāra jaṭhare kanyāṃ menā bhāgyavatī tadā

"स्त्री को भी वही कार्य करना चाहिए जो दूसरों के उपकार से युक्त हो।" इस प्रकार उस पर्वतराज द्वारा प्रेरित होकर, भाग्यवती मेना ने उस समय गर्भ में कन्या धारण की।

श्लोक 68 (skanda.1.20.68)

महाविद्या महामाया महामेधास्वरूपिणी॥ रुद्रकाली च अंबा च सती दाक्षायणी परा

mahāvidyā mahāmāyā mahāmedhāsvarūpiṇī|| rudrakālī ca aṃbā ca satī dākṣāyaṇī parā

वह महाविद्या, महामाया, महामेधा-स्वरूपिणी थी — रुद्रकाली, अंबा और वही परा दाक्षायणी सती।

श्लोक 69 (skanda.1.20.69)

तां विभूतिं विशालाक्षी जठरे परमां सती॥ बभार सा महाभागा मेना चारुविलोचना

tāṃ vibhūtiṃ viśālākṣī jaṭhare paramāṃ satī|| babhāra sā mahābhāgā menā cāruvilocanā

विशाल नेत्रों वाली, सुंदर आँखों वाली वह महाभागा मेना, उस परम विभूति को अपने गर्भ में धारण करती रही।

श्लोक 70 (skanda.1.20.70)

स्तुतिं चक्रुस्तदा देवा ऋषयो यक्षकिन्नराः॥ मेनाया भूरिभाग्यायास्तथा हिमवतो गिरेः

stutiṃ cakrustadā devā ṛṣayo yakṣakinnarāḥ|| menāyā bhūribhāgyāyāstathā himavato gireḥ

तब देवगण, ऋषि, यक्ष और किन्नर, महान भाग्यशालिनी मेना और पर्वतराज हिमवान — दोनों की स्तुति करने लगे।

श्लोक 71 (skanda.1.20.71)

एतस्मिन्नंतरे जाता गिरिजा नाम नामतः॥ प्रादुर्भूता यदा देवी सर्वेषां च सुखप्रदा

etasminnaṃtare jātā girijā nāma nāmataḥ|| prādurbhūtā yadā devī sarveṣāṃ ca sukhapradā

इसी बीच गिरिजा नाम से प्रसिद्ध वह देवी प्रकट हुईं, जो समस्त प्राणियों को सुख प्रदान करने वाली थीं।

श्लोक 72 (skanda.1.20.72)

देवदुंदुभयो नेदुर्ननृतुश्चाप्सरोगणाः॥ जगुर्गंधर्वपतयो ननृतुश्चाप्सरोगणाः

devaduṃdubhayo nedurnanṛtuścāpsarogaṇāḥ|| jagurgaṃdharvapatayo nanṛtuścāpsarogaṇāḥ

देव-दुंदुभियाँ बज उठीं, अप्सराओं के समूह नाचने लगे; गंधर्वों के स्वामी गीत गाने लगे, और अप्सराओं के समूह नृत्य करने लगे।

श्लोक 73 (skanda.1.20.73)

पुष्पवर्षेण महता ववृषुर्विबुधास्तथा॥ तदा प्रसन्नमभवत्सर्वं त्रैलोक्यमेव च

puṣpavarṣeṇa mahatā vavṛṣurvibudhāstathā|| tadā prasannamabhavatsarvaṃ trailokyameva ca

विबुधों ने महान पुष्प-वर्षा की; उस समय समस्त तीनों लोक प्रसन्नता से भर उठे।

श्लोक 74 (skanda.1.20.74)

यदावतीर्णा गिरिजा महासती तदैव दैत्या भयमाविशंस्ते॥ प्राप्ता मुदं देवगणा महर्षयः सचारणाः सिद्धगणास्तथैव

yadāvatīrṇā girijā mahāsatī tadaiva daityā bhayamāviśaṃste|| prāptā mudaṃ devagaṇā maharṣayaḥ sacāraṇāḥ siddhagaṇāstathaiva

जब वह महासती गिरिजा अवतरित हुईं, तभी दैत्यों में भय समा गया, और देवगण, महर्षिगण, चारणगण तथा सिद्धगण सभी आनंद को प्राप्त हुए।

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