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माहेश्वर खण्ड · अध्याय 29

सुर-तारकासुर संग्राम वर्णन

अध्याय 28अध्याय-सूचीअध्याय 30

श्लोक 1 (skanda.1.29.1)

॥लोमश उवाच॥ उभे सेने तदा तेषां सुराणां चामरद्विषाम्॥ अनेकाश्चर्यसंवीते चतुरंगबलान्विते॥ विरेजतुस्तदान्योऽन्यं गर्जतो वांबुदागमे

||lomaśa uvāca|| ubhe sene tadā teṣāṃ surāṇāṃ cāmaradviṣām|| anekāścaryasaṃvīte caturaṃgabalānvite|| virejatustadānyo'nyaṃ garjato vāṃbudāgame

लोमश जी ने कहा — तब देवताओं और उनके शत्रु दैत्यों की वे दोनों सेनाएँ, अनेक आश्चर्यों से युक्त और चतुरंगिणी बल से संपन्न, वर्षा-ऋतु के आगमन पर गरजते बादलों के समान परस्पर एक-दूसरे के सम्मुख शोभायमान हो उठीं।

श्लोक 2 (skanda.1.29.2)

एतस्मिन्नन्तरे तत्र वल्गमानाः परस्परम्॥ देवासुरास्तदा सर्वे युयुधुश्च महाबलाः

etasminnantare tatra valgamānāḥ parasparam|| devāsurāstadā sarve yuyudhuśca mahābalāḥ

इसी बीच परस्पर एक-दूसरे पर झपटते हुए वे समस्त महाबली देवता और असुर आपस में युद्ध करने लगे।

श्लोक 3 (skanda.1.29.3)

युद्धं सुतुमुलं ह्यासीद्देवदैत्यसमाकुलम्॥ रुण्डमुण्डांकितं सर्वं क्षणेन समपद्यत

yuddhaṃ sutumulaṃ hyāsīddevadaityasamākulam|| ruṇḍamuṇḍāṃkitaṃ sarvaṃ kṣaṇena samapadyata

देवताओं और दैत्यों से भरा हुआ अत्यंत घमासान युद्ध छिड़ गया; क्षणभर में ही समूचा रणक्षेत्र कटे हुए धड़ों और सिरों से पट गया।

श्लोक 4 (skanda.1.29.4)

भूमौ निपतितास्तत्र शतशोऽथ सहस्रशः॥ केषांचिद्बाहविश्छिन्नाः खड्गपातैः सुदारुणैः

bhūmau nipatitāstatra śataśo'tha sahasraśaḥ|| keṣāṃcidbāhaviśchinnāḥ khaḍgapātaiḥ sudāruṇaiḥ

वहाँ सैकड़ों और हजारों की संख्या में योद्धा भूमि पर गिर पड़े; कितनों की भुजाएँ भीषण खड्ग-प्रहारों से कट गईं।

श्लोक 5 (skanda.1.29.5)

मुचुकुंदो हि बलवांस्त्रैलोक्येऽमितविक्रमः

mucukuṃdo hi balavāṃstrailokye'mitavikramaḥ

मुचुकुंद अत्यंत बलवान् थे, तीनों लोकों में उनके पराक्रम की कोई सीमा न थी।

श्लोक 6 (skanda.1.29.6)

तारको हि तदा तेन मुचुकुंदेन धीमता॥ खड्गेन चाहतास्तत्र सर्वप्राणेन वक्षसि॥ प्रसह्य तत्प्रहारं च प्रहसन्वाक्यमब्रवीत्

tārako hi tadā tena mucukuṃdena dhīmatā|| khaḍgena cāhatāstatra sarvaprāṇena vakṣasi|| prasahya tatprahāraṃ ca prahasanvākyamabravīt

तब बुद्धिमान् मुचुकुंद ने अपने पूरे बल से तलवार के प्रहार से तारक की छाती पर वार किया; उस प्रहार को सहन कर तारक हँसते हुए बोला।

श्लोक 7 (skanda.1.29.7)

किं रे मूढ त्वया चाद्य कृतमस्ति बलादिदम्॥ न त्वया योद्धुमिच्छामि मानुषेणैव लज्जया

kiṃ re mūḍha tvayā cādya kṛtamasti balādidam|| na tvayā yoddhumicchāmi mānuṣeṇaiva lajjayā

'अरे मूर्ख, तूने आज बलपूर्वक यह क्या कर डाला? मैं तुझसे युद्ध नहीं करना चाहता, केवल इसलिए कि तू एक मनुष्य है और मुझे लज्जा आती है।'

श्लोक 8 (skanda.1.29.8)

तारकस्य वचः श्रुत्वा मुचुकुंदोऽभ्यभाषत॥ मया हतोऽसि दैत्येंद्र नान्यो भवितुमर्हसि

tārakasya vacaḥ śrutvā mucukuṃdo'bhyabhāṣata|| mayā hato'si daityeṃdra nānyo bhavitumarhasi

तारक की यह बात सुनकर मुचुकुंद बोले — 'हे दैत्येंद्र, तू मेरे हाथों मारा जा चुका है; इसके सिवा तेरी और कोई गति नहीं हो सकती।'

श्लोक 9 (skanda.1.29.9)

दृष्ट्वा मे खड्गसंपातं न त्वं तिष्ठसि चाग्रतः॥ त्वां हन्मि पश्य मे शौर्यं दैत्यराज स्थिरो भव

dṛṣṭvā me khaḍgasaṃpātaṃ na tvaṃ tiṣṭhasi cāgrataḥ|| tvāṃ hanmi paśya me śauryaṃ daityarāja sthiro bhava

'मेरे खड्ग के प्रहार को देखकर तू मेरे सामने टिक नहीं सकेगा; मैं तुझे मार डालूँगा — हे दैत्यराज, मेरा पराक्रम देख और स्थिर होकर खड़ा रह।'

श्लोक 10 (skanda.1.29.10)

एवमुक्त्वा तदा वीरो मुचुकुंदो महाबलः॥ यावज्जघान खड्गेन तावच्छक्त्या समाहतः॥ मांधातुस्तनयस्तत्र पपात रणमंडले

evamuktvā tadā vīro mucukuṃdo mahābalaḥ|| yāvajjaghāna khaḍgena tāvacchaktyā samāhataḥ|| māṃdhātustanayastatra papāta raṇamaṃḍale

यह कहकर वीर महाबली मुचुकुंद ने ज्यों ही तलवार से वार किया, त्यों ही वे स्वयं शक्ति के प्रहार से आहत हो गए; और मांधाता-पुत्र उस रणभूमि में गिर पड़े।

श्लोक 11 (skanda.1.29.11)

पतितस्तत्क्षणादेव चोत्थितः परवीरहा

patitastatkṣaṇādeva cotthitaḥ paravīrahā

गिरते ही उसी क्षण वे शत्रु-वीरों के संहारक मुचुकुंद पुनः उठ खड़े हुए।

श्लोक 12 (skanda.1.29.12)

स सज्जमानोतिमहाबलो वै हंतुं तदा दैत्यपतिं च तारकम्॥ ब्रह्मास्त्रमुद्यम्य धनुर्गृहीत्वा मांधातृपुत्रो भुवनैकजेता

sa sajjamānotimahābalo vai haṃtuṃ tadā daityapatiṃ ca tārakam|| brahmāstramudyamya dhanurgṛhītvā māṃdhātṛputro bhuvanaikajetā

वह अत्यंत महाबली और समस्त भुवन का अद्वितीय विजेता मांधाता-पुत्र दैत्यपति तारक का वध करने के लिए तत्पर हो गया, और धनुष हाथ में लेकर उसने ब्रह्मास्त्र उठाया।

श्लोक 13 (skanda.1.29.13)

स तारकं योद्धकामस्तरस्वी रुषान्वितोत्फुल्लविलोचनो महान्॥ स नारदो ब्रह्मसुतो बभाषे तदा नृवीरं मुचुकुंदमेवम्

sa tārakaṃ yoddhakāmastarasvī ruṣānvitotphullavilocano mahān|| sa nārado brahmasuto babhāṣe tadā nṛvīraṃ mucukuṃdamevam

जब वह वेगवान् और महान् मुचुकुंद क्रोध से आँखें फाड़े हुए तारक से युद्ध करने के लिए उद्यत था, तभी ब्रह्मा-पुत्र नारद जी उस नरवीर मुचुकुंद से इस प्रकार बोले।

श्लोक 14 (skanda.1.29.14)

न तारको हन्यते मानुषेण तस्मादेतन्मा विमोचीर्महास्त्रम्

na tārako hanyate mānuṣeṇa tasmādetanmā vimocīrmahāstram

'तारक किसी मनुष्य के हाथों नहीं मारा जा सकता; अतः यह महास्त्र मत छोड़ो।'

श्लोक 15 (skanda.1.29.15)

निशम्य वचनं तस्य देवर्षेर्नारदस्य च॥ मुचुकुंद उवाचेदं भविता कोऽस्य मारकः

niśamya vacanaṃ tasya devarṣernāradasya ca|| mucukuṃda uvācedaṃ bhavitā ko'sya mārakaḥ

देवर्षि नारद के इस वचन को सुनकर मुचुकुंद बोले — 'तो फिर इसका वध करने वाला कौन होगा?'

श्लोक 16 (skanda.1.29.16)

तदोवाच महातेजा नारदो दिव्यदर्शनः॥ एनं हंता कुमारश्च कुमारोऽयं शिवात्मजः

tadovāca mahātejā nārado divyadarśanaḥ|| enaṃ haṃtā kumāraśca kumāro'yaṃ śivātmajaḥ

तब दिव्यदृष्टि-संपन्न महातेजस्वी नारद जी बोले — 'इसका वध कुमार करेंगे; यह शिव-पुत्र कुमार ही इसका संहारक है।'

श्लोक 17 (skanda.1.29.17)

तस्माद्भवद्भिः स्थातव्यमैकपद्येन युध्यताम्॥ तिष्ठ त्वं चायतो भूत्वा मुचुकुंद महामते

tasmādbhavadbhiḥ sthātavyamaikapadyena yudhyatām|| tiṣṭha tvaṃ cāyato bhūtvā mucukuṃda mahāmate

'अतः तुम सब एक ओर खड़े रहो और उसी को अकेले युद्ध करने दो; हे महामते मुचुकुंद, तुम संयत होकर पीछे हट जाओ।'

श्लोक 18 (skanda.1.29.18)

निशम्य वाक्यं च मनोहरं शुभं ह्युदीरितं तेन महाप्रभेण॥ सर्वे सुराः शांतिपरा बभूवुस्तेनैव साकं नृवरेणयत्नात्

niśamya vākyaṃ ca manoharaṃ śubhaṃ hyudīritaṃ tena mahāprabheṇa|| sarve surāḥ śāṃtiparā babhūvustenaiva sākaṃ nṛvareṇayatnāt

उस महातेजस्वी नारद जी द्वारा कहे गए उस मनोहर और शुभ वचन को सुनकर समस्त देवता उस श्रेष्ठ नरवीर मुचुकुंद के साथ, उनके ही प्रयत्न से शांत हो गए।

श्लोक 19 (skanda.1.29.19)

ततो दुंदुभयो नेदुः शंखाश्च कृतनिश्चयाः॥ ताडिता विविधैर्वाद्यैः सुरासुरसमन्वितैः

tato duṃdubhayo neduḥ śaṃkhāśca kṛtaniścayāḥ|| tāḍitā vividhairvādyaiḥ surāsurasamanvitaiḥ

तब दुंदुभियाँ बज उठीं, और युद्ध के लिए दृढ़-संकल्प हो चुके देवों और असुरों दोनों की ओर से बजाए गए शंख तथा विविध वाद्य भी गूँज उठे।

श्लोक 20 (skanda.1.29.20)

जगर्जुरसुरास्तत्र देवान्प्रति कृतोद्यमाः॥ शिवकोपोद्भवो वीरो वीरभद्रो रुषान्वितः

jagarjurasurāstatra devānprati kṛtodyamāḥ|| śivakopodbhavo vīro vīrabhadro ruṣānvitaḥ

वहाँ देवताओं पर आक्रमण करने का संकल्प कर असुर गरजने लगे; और शिव के क्रोध से उत्पन्न वीर वीरभद्र, क्रोध से भरकर,

श्लोक 21 (skanda.1.29.21)

गणैर्बहुभिरासाद्य तारकं च महाबलम्॥ मुचुकुंदं पृष्ठतः कृत्वा तथैव च सुरानपि

gaṇairbahubhirāsādya tārakaṃ ca mahābalam|| mucukuṃdaṃ pṛṣṭhataḥ kṛtvā tathaiva ca surānapi

अनेक गणों के साथ महाबली तारक पर टूट पड़ा, मुचुकुंद को तथा देवताओं को भी पीछे रखकर।

श्लोक 22 (skanda.1.29.22)

तदा ते प्रमथाः सर्वे पुरस्कृत्य कुमारकम्॥ युयुधुः संयुगे तत्र वीरभद्रादयो गणाः

tadā te pramathāḥ sarve puraskṛtya kumārakam|| yuyudhuḥ saṃyuge tatra vīrabhadrādayo gaṇāḥ

तब वीरभद्र आदि समस्त प्रमथगण कुमार को आगे रखकर उस संग्राम में जूझने लगे।

श्लोक 23 (skanda.1.29.23)

त्रिशूलैर्ऋष्टिभिः पाशैः खड्गैः परशुपाट्टिशैः॥ निजघ्नुः समरेन्योन्यं सुरासुरविमर्द्दने

triśūlairṛṣṭibhiḥ pāśaiḥ khaḍgaiḥ paraśupāṭṭiśaiḥ|| nijaghnuḥ samarenyonyaṃ surāsuravimarddane

त्रिशूल, ऋष्टि, पाश, खड्ग, परशु और पट्टिश आदि शस्त्रों से देवों और असुरों के उस संघर्ष में वे एक-दूसरे पर वार करने लगे।

श्लोक 24 (skanda.1.29.24)

तारको वीरभद्रेण त्रिशूलेन हतो भृशम्॥ पपात सहसा तत्र क्षण मूर्छापरिप्लुतः

tārako vīrabhadreṇa triśūlena hato bhṛśam|| papāta sahasā tatra kṣaṇa mūrchāpariplutaḥ

वीरभद्र के त्रिशूल से गहरी चोट खाकर तारक तत्क्षण वहीं गिर पड़ा और क्षणभर के लिए मूर्च्छित हो गया।

श्लोक 25 (skanda.1.29.25)

उत्थाय च मुहूर्त्ताच्च तारको दैत्यपुंगवः॥ लब्धसंज्ञो बलाविष्टो वीरभद्रं जघान च

utthāya ca muhūrttācca tārako daityapuṃgavaḥ|| labdhasaṃjño balāviṣṭo vīrabhadraṃ jaghāna ca

किंतु क्षणभर बाद ही वह दैत्यश्रेष्ठ तारक उठ खड़ा हुआ, चेतना पाकर बल से भरकर उसने वीरभद्र पर प्रहार किया।

श्लोक 26 (skanda.1.29.26)

स शक्तिं च महातेजा वीरभद्रो हि तारकम्॥ त्रिशूलेन च घोरेण शिवस्यानुचरो बली

sa śaktiṃ ca mahātejā vīrabhadro hi tārakam|| triśūlena ca ghoreṇa śivasyānucaro balī

तब उस महातेजस्वी और बलशाली शिवानुचर वीरभद्र ने अपने भीषण त्रिशूल से तारक पर प्रहार किया, उसके शक्ति-प्रहार के उत्तर में।

श्लोक 27 (skanda.1.29.27)

एवं संयुध्यमानौ तौ जघ्नतुश्चेतरेतरम्॥ द्वंद्वयुद्धं सुतुमुलं तयोर्जातं महात्मनोः

evaṃ saṃyudhyamānau tau jaghnatuścetaretaram|| dvaṃdvayuddhaṃ sutumulaṃ tayorjātaṃ mahātmanoḥ

इस प्रकार युद्धरत वे दोनों एक-दूसरे पर प्रहार करने लगे; उन दोनों महात्माओं के बीच अत्यंत घमासान द्वंद्व-युद्ध छिड़ गया।

श्लोक 28 (skanda.1.29.28)

सुरास्तत्रैव समरे प्रेक्षकाह्यभवंस्तदा॥ तयोर्भेरीमृदंगाश्च पटहानकगोमुखाः

surāstatraiva samare prekṣakāhyabhavaṃstadā|| tayorbherīmṛdaṃgāśca paṭahānakagomukhāḥ

उस संग्राम में देवगण मात्र दर्शक बनकर रह गए; और उन दोनों के युद्ध में भेरी, मृदंग, पटह, आनक तथा गोमुख बज उठे।

श्लोक 29 (skanda.1.29.29)

तथा डमरूनादेन व्याप्तमासीज्जगत्त्रयम्॥ तेन घोषेण महता युद्यमानौ महाबलौ

tathā ḍamarūnādena vyāptamāsījjagattrayam|| tena ghoṣeṇa mahatā yudyamānau mahābalau

डमरू के नाद से तीनों लोक व्याप्त हो गए; उसी महाघोष के बीच वे दोनों महाबली युद्धरत रहे।

श्लोक 30 (skanda.1.29.30)

शुशुभातेऽतिसंरब्धौ प्रहारैर्जरीकृतौ॥ अन्योन्यमभिसंरब्धौ तौ बुधांगारकाविव

śuśubhāte'tisaṃrabdhau prahārairjarīkṛtau|| anyonyamabhisaṃrabdhau tau budhāṃgārakāviva

अत्यंत क्रुद्ध और प्रहारों से जर्जर हुए वे दोनों परस्पर एक-दूसरे पर क्रोधित होकर बुध और मंगल ग्रहों के समान शोभायमान हो रहे थे।

श्लोक 31 (skanda.1.29.31)

नारदेन तदा ख्यातो वीरभद्रस्य तद्वधः॥ न रोचते च तद्वाक्यं वीरभद्रस्य वै तदा

nāradena tadā khyāto vīrabhadrasya tadvadhaḥ|| na rocate ca tadvākyaṃ vīrabhadrasya vai tadā

तब नारद जी ने यह प्रकट कर दिया कि तारक का वध वीरभद्र के हाथों नहीं होगा; और यह बात वीरभद्र को तनिक भी अच्छी नहीं लगी।

श्लोक 32 (skanda.1.29.32)

नारदेन यदुक्तं हि तारकस्य वधं प्रति॥ यथा रुद्रस्तथा सोऽपि वीरभद्रो महाबलः

nāradena yaduktaṃ hi tārakasya vadhaṃ prati|| yathā rudrastathā so'pi vīrabhadro mahābalaḥ

'तारक के वध के विषय में नारद जी ने जो कहा है, सो कहा — परंतु मैं, महाबली वीरभद्र, रुद्र से किसी प्रकार कम नहीं हूँ!'

श्लोक 33 (skanda.1.29.33)

एवं प्रयुध्यमानौ तौ जघ्नतुश्चेतरेतरम्॥ अन्योन्यं स्वर्द्धमानौ तौ गर्जंतौ सिंहयोरिव

evaṃ prayudhyamānau tau jaghnatuścetaretaram|| anyonyaṃ svarddhamānau tau garjaṃtau siṃhayoriva

इस प्रकार युद्धरत रहकर वे दोनों एक-दूसरे पर प्रहार करते रहे, दो सिंहों के समान परस्पर गरजते हुए।

श्लोक 34 (skanda.1.29.34)

एवं तदा तौ भुवि युध्यमानौ महात्मना ज्ञानवतां वरेण॥ स वीरभद्रो हि तदा निवारितो वाक्यैरनेकैरथ नारदेन

evaṃ tadā tau bhuvi yudhyamānau mahātmanā jñānavatāṃ vareṇa|| sa vīrabhadro hi tadā nivārito vākyairanekairatha nāradena

जब वे दोनों पृथ्वी पर इस प्रकार युद्धरत थे, तब ज्ञानियों में श्रेष्ठ महात्मा नारद जी ने अनेक वचनों से वीरभद्र को रोकने का प्रयत्न किया।

श्लोक 35 (skanda.1.29.35)

तथा निशम्य तद्वाक्यं नारदस्य मुखोद्गतम्॥ वीरभद्रो रुषाविष्टो नारदं प्रत्युवाच ह

tathā niśamya tadvākyaṃ nāradasya mukhodgatam|| vīrabhadro ruṣāviṣṭo nāradaṃ pratyuvāca ha

नारद जी के मुख से निकले उस वचन को सुनकर वीरभद्र क्रोध से भरकर नारद जी से बोला।

श्लोक 36 (skanda.1.29.36)

तारकं च वधिष्यामि पश्य मेऽद्य पराक्रमम्॥ आनयंति च ये वीराः स्वामिनं रणसंसदि॥ ते पापिनो ह्यधर्मिष्ठा विमृशंतिरणं गताः

tārakaṃ ca vadhiṣyāmi paśya me'dya parākramam|| ānayaṃti ca ye vīrāḥ svāminaṃ raṇasaṃsadi|| te pāpino hyadharmiṣṭhā vimṛśaṃtiraṇaṃ gatāḥ

'मैं ही तारक का वध करूँगा — आज तुम मेरा पराक्रम देख लो! जो वीर अपने स्वामी को युद्ध-सभा में लाकर भी रणभूमि में जाकर विचार-विमर्श करने लगते हैं, वे पापी और अधर्मी होते हैं।'

श्लोक 37 (skanda.1.29.37)

भीरवस्ते तु विज्ञेया न वाच्यास्ते कदाचन॥ त्वं न जानासि देवर्षे योधानां च प्रतिक्रियाम्

bhīravaste tu vijñeyā na vācyāste kadācana|| tvaṃ na jānāsi devarṣe yodhānāṃ ca pratikriyām

'ऐसे लोगों को केवल कायर ही समझना चाहिए; उनकी कभी प्रशंसा नहीं करनी चाहिए। हे देवर्षे, आप योद्धाओं की प्रतिक्रिया को नहीं समझते।'

श्लोक 38 (skanda.1.29.38)

मृत्युं च पृष्ठतः कृत्वा रणभूमौ गतव्यथाः॥ शस्त्राशस्त्रैर्भिन्नगात्राः प्रशस्ता नात्र संशयः

mṛtyuṃ ca pṛṣṭhataḥ kṛtvā raṇabhūmau gatavyathāḥ|| śastrāśastrairbhinnagātrāḥ praśastā nātra saṃśayaḥ

'जो मृत्यु को पीछे छोड़कर रणभूमि में निर्भय खड़े रहते हैं, चाहे शस्त्रों और अस्त्रों से उनके अंग-अंग क्षत-विक्षत क्यों न हो जाएँ — वे ही प्रशंसनीय हैं, इसमें कोई संशय नहीं।'

श्लोक 39 (skanda.1.29.39)

इत्युक्त्वा चावदद्देवान्वीरभद्रो महाबलः॥ श्रुण्वंतु मम वाक्यानि देवा इन्द्रपुरोगमाः

ityuktvā cāvadaddevānvīrabhadro mahābalaḥ|| śruṇvaṃtu mama vākyāni devā indrapurogamāḥ

यह कहकर महाबली वीरभद्र ने देवताओं से और भी कहा — 'हे इंद्र आदि देवताओ, मेरी बात सुनो।'

श्लोक 40 (skanda.1.29.40)

अतारकां महीं चाद्य करिष्ये नात्र संशयः

atārakāṃ mahīṃ cādya kariṣye nātra saṃśayaḥ

'आज ही मैं इस पृथ्वी को तारक-रहित कर दूँगा, इसमें कोई संशय नहीं।'

श्लोक 41 (skanda.1.29.41)

अथ त्रिशूलमादाय तारकेण युयोध सः॥ वृषारूढैरनेकैश्च त्रिशूलवरधारिभिः

atha triśūlamādāya tārakeṇa yuyodha saḥ|| vṛṣārūḍhairanekaiśca triśūlavaradhāribhiḥ

तब त्रिशूल हाथ में लेकर वह तारक से युद्ध करने लगा; और उसके साथ बैलों पर सवार, उत्तम त्रिशूल धारण किए अनेक गण भी युद्ध करने लगे,

श्लोक 42 (skanda.1.29.42)

कपर्द्दिनो वृषांकाश्च गणास्तेतिप्रहारिणः॥ वीरभद्रं पुरस्कृत्य वीरभद्रपराक्रमाः

kaparddino vṛṣāṃkāśca gaṇāstetiprahāriṇaḥ|| vīrabhadraṃ puraskṛtya vīrabhadraparākramāḥ

— जटाधारी और वृषभ-चिह्न से युक्त वे प्रचंड प्रहारकारी गण, वीरभद्र को आगे रखकर, उन्हीं के समान पराक्रम दिखाते हुए युद्ध करने लगे।

श्लोक 43 (skanda.1.29.43)

त्रिशूलधारिणः सर्वे सर्वे सर्पागभूषणाः॥ सचंद्रशेखराः सर्वे जटाजूटविभूषिताः

triśūladhāriṇaḥ sarve sarve sarpāgabhūṣaṇāḥ|| sacaṃdraśekharāḥ sarve jaṭājūṭavibhūṣitāḥ

वे सभी त्रिशूलधारी थे, सभी सर्पों के आभूषण धारण किए हुए थे, सबके मस्तक पर चंद्रमा शोभित था, और सब जटाजूट से विभूषित थे।

श्लोक 44 (skanda.1.29.44)

निलकण्ठा दशभुजाः पञ्चकत्त्रास्त्रिलोचनाः॥ छत्रचामरसंवीताः सर्वे तेऽत्युग्रबाहवः

nilakaṇṭhā daśabhujāḥ pañcakattrāstrilocanāḥ|| chatracāmarasaṃvītāḥ sarve te'tyugrabāhavaḥ

नीलकंठ, दशभुज, पंचमुख और त्रिनेत्र वे सभी छत्र-चामर से सुशोभित थे, और सबकी भुजाएँ अत्यंत उग्र थीं।

श्लोक 45 (skanda.1.29.45)

वीरभद्रं पुरस्कृत्य सर्वे हरपराक्रमाः॥ युयुधुस्ते तदा दैत्यास्ताकासुरजीविनः

vīrabhadraṃ puraskṛtya sarve haraparākramāḥ|| yuyudhuste tadā daityāstākāsurajīvinaḥ

वीरभद्र को आगे रखकर, शिव के समान पराक्रमी वे सब उस समय तारक के आश्रित दैत्यों से जूझने लगे।

श्लोक 46 (skanda.1.29.46)

पुनः पुनस्तैश्च तदा बभूवुर्गणैर्जितास्ते ह्यसुराः पराङ्मुखाः॥ बभूव तेषां च तदातिसंगरो महाभयो दैत्यवरैस्तदानीम्

punaḥ punastaiśca tadā babhūvurgaṇairjitāste hyasurāḥ parāṅmukhāḥ|| babhūva teṣāṃ ca tadātisaṃgaro mahābhayo daityavaraistadānīm

बार-बार उन गणों के हाथों पराजित होकर असुर पीठ दिखाने लगे; और तभी उन श्रेष्ठ दैत्यों के साथ अत्यंत भयंकर संग्राम छिड़ गया।

श्लोक 47 (skanda.1.29.47)

अमृष्यमाणाः परमास्त्रकोविदैस्ततो गणास्ते जयिनो बभूवुः॥ गणैर्जितास्ते ह्यसुराः पराभवं तं तारकं ते व्यथिताः शशंसुः

amṛṣyamāṇāḥ paramāstrakovidaistato gaṇāste jayino babhūvuḥ|| gaṇairjitāste hyasurāḥ parābhavaṃ taṃ tārakaṃ te vyathitāḥ śaśaṃsuḥ

परम अस्त्रों में निपुण उन गणों के आगे टिक न सकने के कारण वे विजयी हो गए; गणों से पराजित होकर व्यथित असुरों ने अपनी उस पराजय का समाचार तारक को सुनाया।

श्लोक 48 (skanda.1.29.48)

विनाम्य चापं हि तथा च तारकः स योद्धुकामः प्रविवेश सेनाम्॥ यथा झषो वै प्रविवेश सागरं तथा ह्यसौ दैत्यवरो महात्मा

vināmya cāpaṃ hi tathā ca tārakaḥ sa yoddhukāmaḥ praviveśa senām|| yathā jhaṣo vai praviveśa sāgaraṃ tathā hyasau daityavaro mahātmā

तब तारक अपना धनुष झुकाकर युद्ध की इच्छा से सेना में प्रविष्ट हो गया, ठीक जैसे मछली सागर में प्रवेश करती है — उसी प्रकार वह महात्मा दैत्यश्रेष्ठ सेना में प्रविष्ट हुआ।

श्लोक 49 (skanda.1.29.49)

गणैः समेतो युयुधे तदानीं स वीरभद्रो हि महाबलश्च॥ सर्वान्सुरांश्चेंद्रमुखान्महाबलस्तथा गणान्यक्षपिशाचगुह्यकान्॥ स दैत्यवर्योऽतिरुषं प्रविष्टः संमर्दयामास महाबलो हि

gaṇaiḥ sameto yuyudhe tadānīṃ sa vīrabhadro hi mahābalaśca|| sarvānsurāṃśceṃdramukhānmahābalastathā gaṇānyakṣapiśācaguhyakān|| sa daityavaryo'tiruṣaṃ praviṣṭaḥ saṃmardayāmāsa mahābalo hi

तब महाबली वीरभद्र अपने गणों सहित युद्ध करता रहा; और वह अत्यंत क्रोध से भरा हुआ महाबली दैत्यश्रेष्ठ इंद्र आदि समस्त देवताओं तथा गण, यक्ष, पिशाच और गुह्यकों को कुचलने लगा।

श्लोक 50 (skanda.1.29.50)

ततः समभवद्युद्धं देवदानवसंकुलम्॥ देवदानवयक्षाणां सन्निपातकरं महत्

tataḥ samabhavadyuddhaṃ devadānavasaṃkulam|| devadānavayakṣāṇāṃ sannipātakaraṃ mahat

तब देवताओं और दानवों से भरा हुआ एक महान् युद्ध छिड़ गया, जिसमें देव, दानव और यक्ष सब आपस में टकरा गए।

श्लोक 51 (skanda.1.29.51)

तथा वृषा गर्जमाना अश्वाञ्जघ्नुश्च सादिभिः॥ रथिभिश्च रथाञ्जघ्नुः कुंजरान्सादिभिः सह

tathā vṛṣā garjamānā aśvāñjaghnuśca sādibhiḥ|| rathibhiśca rathāñjaghnuḥ kuṃjarānsādibhiḥ saha

गरजते हुए बैलों ने घोड़ों को उनके सवारों सहित मार गिराया; रथियों ने रथों को, और हाथियों को उनके महावतों सहित मार डाला।

श्लोक 52 (skanda.1.29.52)

वृषारूढौः सरथैस्ते च सर्वे निष्पाटिता ह्यसुराः पोथिताश्च

vṛṣārūḍhauḥ sarathaiste ca sarve niṣpāṭitā hyasurāḥ pothitāśca

बैलों पर सवार और रथों सहित वे सभी असुर छिन्न-भिन्न और कुचल दिए गए।

श्लोक 53 (skanda.1.29.53)

क्षयं प्रणीता बहवस्तदानीं पेतुः पृथिव्यां निहताश्च केचित्॥ केचित्प्रविष्टा हि रसातलं च पलायमाना बहवस्तथैव

kṣayaṃ praṇītā bahavastadānīṃ petuḥ pṛthivyāṃ nihatāśca kecit|| kecitpraviṣṭā hi rasātalaṃ ca palāyamānā bahavastathaiva

उस समय अनेक असुर विनाश को प्राप्त हुए; कुछ मारे जाकर पृथ्वी पर गिर पड़े; कुछ भागकर रसातल में जा घुसे, और कई अन्य भी उसी प्रकार भाग खड़े हुए।

श्लोक 54 (skanda.1.29.54)

केचिच्च शरणं प्राप्ता रुद्रानुचरकिंकरान्॥ एवं नष्टं तदा सैन्यं विलोक्यासुरपालकः॥ तारको हि रुषाविष्टो हंतुं देवगणान्ययौ

kecicca śaraṇaṃ prāptā rudrānucarakiṃkarān|| evaṃ naṣṭaṃ tadā sainyaṃ vilokyāsurapālakaḥ|| tārako hi ruṣāviṣṭo haṃtuṃ devagaṇānyayau

कुछ ने रुद्र के अनुचर किंकरों की शरण ले ली। अपनी सेना को इस प्रकार नष्ट होते देखकर असुरपालक तारक क्रोध से भर उठा और देवताओं तथा गणों का वध करने के लिए आगे बढ़ा।

श्लोक 55 (skanda.1.29.55)

भुजानामयुतं कृत्वा दैत्यराजो हि तारकः॥ आरुह्य सिंहं सहसा घातयामास तान्रणे

bhujānāmayutaṃ kṛtvā daityarājo hi tārakaḥ|| āruhya siṃhaṃ sahasā ghātayāmāsa tānraṇe

दैत्यराज तारक ने दस हजार भुजाएँ धारण कर सिंह पर सवार होकर तत्क्षण युद्ध में उनका संहार करना आरंभ कर दिया।

श्लोक 56 (skanda.1.29.56)

दंशितेन च सिंहेन वृषाः केचिद्विदारिताः॥ तथैव तारकेणैव घातिता बहवो गणाः

daṃśitena ca siṃhena vṛṣāḥ kecidvidāritāḥ|| tathaiva tārakeṇaiva ghātitā bahavo gaṇāḥ

उस कवचधारी सिंह ने कुछ बैलों को फाड़ डाला; और स्वयं तारक ने भी अनेक गणों का वध कर दिया।

श्लोक 57 (skanda.1.29.57)

एवं कृतं तदा तेन तारकेण महात्मना॥ सर्वेषामेव देवानामशक्यस्तारको महान्

evaṃ kṛtaṃ tadā tena tārakeṇa mahātmanā|| sarveṣāmeva devānāmaśakyastārako mahān

इस प्रकार उस महात्मा तारक ने वह पराक्रम दिखाया; और वह महान् तारक समस्त देवताओं के लिए भी असाध्य हो गया।

श्लोक 58 (skanda.1.29.58)

जातस्तदा महाबाहुस्त्रैलोक्यक्षयकारकः॥ तारकस्यानुगा दैत्या अजेया बलवत्तराः

jātastadā mahābāhustrailokyakṣayakārakaḥ|| tārakasyānugā daityā ajeyā balavattarāḥ

तब वह महाबाहु त्रिलोक-विनाशक बन गया; और तारक के अनुयायी दैत्य भी अजेय और अधिकाधिक बलवान् होते गए।

श्लोक 59 (skanda.1.29.59)

महारूढा दंशिताश्च करालास्ते प्रहारिणः॥ तै राहृता गणाः सर्वे सिंहैश्च वृषभा हताः

mahārūḍhā daṃśitāśca karālāste prahāriṇaḥ|| tai rāhṛtā gaṇāḥ sarve siṃhaiśca vṛṣabhā hatāḥ

ऊँचे वाहनों पर सवार, कवचधारी वे भयंकर योद्धा प्रहार करते रहे; उन्होंने समस्त गणों को हर लिया, और सिंहों ने बैलों को मार डाला।

श्लोक 60 (skanda.1.29.60)

एवं निहन्यमाना वै गणास्ते रणमण्डले॥ प्रहस्य विष्णुः प्रोवाच कुमारं शिववल्लभम्

evaṃ nihanyamānā vai gaṇāste raṇamaṇḍale|| prahasya viṣṇuḥ provāca kumāraṃ śivavallabham

इस प्रकार उस रणभूमि में गणों का संहार होते देख विष्णु मुस्कराते हुए शिव के प्रिय पुत्र कुमार से बोले।

श्लोक 61 (skanda.1.29.61)

॥विष्णुरुवाच॥ नान्यो हंतास्य पापस्य त्वद्विना कृत्तिकासुत॥ तस्मात्त्वया हि कर्त्तव्यं वचनं च महाभुज

||viṣṇuruvāca|| nānyo haṃtāsya pāpasya tvadvinā kṛttikāsuta|| tasmāttvayā hi karttavyaṃ vacanaṃ ca mahābhuja

विष्णु ने कहा — 'हे कृत्तिका-पुत्र, तुम्हारे सिवा इस पापी का वध करने वाला और कोई नहीं है; अतः हे महाभुज, यह कार्य तुम्हें ही करना होगा।'

श्लोक 62 (skanda.1.29.62)

तारकस्य वधार्थाय उत्पन्नोऽसि शिवात्मज॥ तस्मात्त्वयैव कर्त्तव्य निधनं तारकस्य च

tārakasya vadhārthāya utpanno'si śivātmaja|| tasmāttvayaiva karttavya nidhanaṃ tārakasya ca

'हे शिवात्मज, तुम्हारा जन्म ही तारक के वध के लिए हुआ है; अतः तारक का वध केवल तुम्हें ही करना है।'

श्लोक 63 (skanda.1.29.63)

तच्छ्रुत्वा भगवान्क्रुद्धः पार्वतीनन्दनो महान्॥ उवाच प्रहसन्वाक्यं विष्णुं प्रति यथोचितम्

tacchrutvā bhagavānkruddhaḥ pārvatīnandano mahān|| uvāca prahasanvākyaṃ viṣṇuṃ prati yathocitam

यह सुनकर पार्वती-नंदन महान् भगवान् कुमार, यद्यपि क्रोधित हुए, फिर भी मुस्कराते हुए विष्णु से यथोचित वचन कहने लगे।

श्लोक 64 (skanda.1.29.64)

मया निरीक्ष्यते सम्यक्चित्रयुद्धं महात्मनाम्॥ अनिभिज्ञोऽस्म्यहं विष्णो कार्याकार्यविचारणे

mayā nirīkṣyate samyakcitrayuddhaṃ mahātmanām|| anibhijño'smyahaṃ viṣṇo kāryākāryavicāraṇe

'मैं तो इन महात्माओं के इस विचित्र युद्ध को देख ही रहा था; हे विष्णो, मैं तो कार्य-अकार्य के विचार में स्वयं को अनुभवहीन ही मानता हूँ।'

श्लोक 65 (skanda.1.29.65)

केऽस्मदीयाः परे चैव न जानामि कथंचन॥ किमर्थं युध्यमाना वै परस्परवधे स्थिताः

ke'smadīyāḥ pare caiva na jānāmi kathaṃcana|| kimarthaṃ yudhyamānā vai parasparavadhe sthitāḥ

'कौन मेरे अपने हैं और कौन पराए, यह मैं तनिक भी नहीं जानता; और न ही यह जानता हूँ कि वे किसलिए एक-दूसरे के वध पर उतारू होकर युद्ध कर रहे हैं।'

श्लोक 66 (skanda.1.29.66)

कुमारस्य वचः श्रुत्वा नारदो वाक्यमब्रवीत्

kumārasya vacaḥ śrutvā nārado vākyamabravīt

कुमार के इस वचन को सुनकर नारद जी बोले।

श्लोक 67 (skanda.1.29.67)

॥नारद उवाच॥ कुमारोऽसि महाबाहो शंकरस्यांशसंभवः॥ त्वं त्राता जगतां स्वामी देवानां च परा गतिः

||nārada uvāca|| kumāro'si mahābāho śaṃkarasyāṃśasaṃbhavaḥ|| tvaṃ trātā jagatāṃ svāmī devānāṃ ca parā gatiḥ

नारद जी ने कहा — 'हे महाबाहो, तुम शंकर के अंश से उत्पन्न कुमार हो; तुम ही लोकों के रक्षक, स्वामी और देवताओं की परम गति हो।'

श्लोक 68 (skanda.1.29.68)

तारकेण पुरा वीर तपस्तप्तं सुदारुणम्॥ येनैव विजिता देवा येन स्वर्गस्तथा जितः

tārakeṇa purā vīra tapastaptaṃ sudāruṇam|| yenaiva vijitā devā yena svargastathā jitaḥ

'हे वीर, पूर्वकाल में तारक ने अत्यंत घोर तप किया था, जिसके प्रभाव से उसने देवताओं को जीत लिया और स्वर्ग पर भी अधिकार कर लिया।'

श्लोक 69 (skanda.1.29.69)

तपसा तेन चोग्रेण अजेयत्वमवाप्तवान्॥ अनेनापि जितश्चेंद्रो लोकपालास्तथैव च

tapasā tena cogreṇa ajeyatvamavāptavān|| anenāpi jitaśceṃdro lokapālāstathaiva ca

'उसी उग्र तप से उसने अजेयता प्राप्त कर ली; उसी के द्वारा इंद्र भी पराजित हुआ, और लोकपाल भी उसी प्रकार पराजित हुए।'

श्लोक 70 (skanda.1.29.70)

त्रैलोक्यं च जितं सर्वं ह्यनेनैव रदुरात्मना॥ तस्मात्त्वया निहंतव्यस्तारकः पापपूरुषः

trailokyaṃ ca jitaṃ sarvaṃ hyanenaiva radurātmanā|| tasmāttvayā nihaṃtavyastārakaḥ pāpapūruṣaḥ

'इस क्रूर-हृदय ने ही समस्त त्रिलोक को जीत लिया है; अतः इस पापी तारक का वध तुम्हें ही करना है।'

श्लोक 71 (skanda.1.29.71)

सर्वेषां शं विधातव्यं त्वया नाथेन चाद्य वै॥ नारदस्य वचः श्रुत्वा कुमारः प्रहसन्महान्॥ विमाना दवतीर्याथ पदातिः परमोऽभवत्

sarveṣāṃ śaṃ vidhātavyaṃ tvayā nāthena cādya vai|| nāradasya vacaḥ śrutvā kumāraḥ prahasanmahān|| vimānā davatīryātha padātiḥ paramo'bhavat

'तुम ही सबके स्वामी हो, अतः आज तुम्हें ही सबका कल्याण करना है।' नारद जी के इस वचन को सुनकर महान् कुमार मुस्कराते हुए अपने विमान से नीचे उतर आए और स्वयं परम पदाति बनकर खड़े हो गए।

श्लोक 72 (skanda.1.29.72)

पद्म्यां तदासौ परिधावमानः शिवात्मजोयं च कुमाररूपी॥ करे समादाय महाप्रभावां शक्तिं महोल्कामिव दीप्तियुक्ताम्

padmyāṃ tadāsau paridhāvamānaḥ śivātmajoyaṃ ca kumārarūpī|| kare samādāya mahāprabhāvāṃ śaktiṃ maholkāmiva dīptiyuktām

तब अपने ही पैरों से दौड़ते हुए वे कुमार-रूपधारी शिव-पुत्र, अपने हाथ में महाप्रभावशाली शक्ति को लेकर, जो महाउल्का के समान देदीप्यमान थी, आगे बढ़े।

श्लोक 73 (skanda.1.29.73)

दृष्ट्वा तमायांतमतीव चंडमव्यक्तरूपं बलिनां वरिष्ठम्॥ दैत्यो बभाषे सुरसत्तमानमसौ कुमारो द्विषतां निहंता

dṛṣṭvā tamāyāṃtamatīva caṃḍamavyaktarūpaṃ balināṃ variṣṭham|| daityo babhāṣe surasattamānamasau kumāro dviṣatāṃ nihaṃtā

उस अत्यंत प्रचंड, अव्यक्त-स्वरूप, बलवानों में श्रेष्ठ कुमार को आते देखकर उस दैत्य ने देवश्रेष्ठों से कहा — 'यही वह कुमार है, जो शत्रुओं का संहारक है।'

श्लोक 74 (skanda.1.29.74)

अनेन सार्द्धं ह्यहमेव वीरो योत्स्यामि सर्वानहमेव वीरान्॥ गणांश्च सर्वानपि घातयामि महेश्वराँल्लोकपालांश्च सद्यः

anena sārddhaṃ hyahameva vīro yotsyāmi sarvānahameva vīrān|| gaṇāṃśca sarvānapi ghātayāmi maheśvarā~llokapālāṃśca sadyaḥ

'इसी के साथ अकेला मैं ही युद्ध करूँगा; मैं अकेला ही इन सब वीरों से लड़ूँगा। मैं समस्त गणों को, स्वयं महेश्वर को और लोकपालों को भी तत्क्षण मार डालूँगा।'

श्लोक 75 (skanda.1.29.75)

इत्येवमुक्त्वा सततं महाबलः कुमारमुद्दिश्य ययौ च योद्धम्॥ जग्राह शक्तिं परमाद्भुतां च स तारको वाक्यमिदं बभाषे

ityevamuktvā satataṃ mahābalaḥ kumāramuddiśya yayau ca yoddham|| jagrāha śaktiṃ paramādbhutāṃ ca sa tārako vākyamidaṃ babhāṣe

यह कहकर वह महाबली तारक निरंतर कुमार की ओर बढ़ता हुआ युद्ध के लिए चल पड़ा; उसने अपनी परम अद्भुत शक्ति उठाई और यह वचन कहा।

श्लोक 76 (skanda.1.29.76)

॥तारक उवाच॥ कुमारो मेग्रतश्चाद्य भवद्भिश्च कथं कृतः॥ यूयं गतत्रपा देवा येषां राजा पुरंदरः

||tāraka uvāca|| kumāro megrataścādya bhavadbhiśca kathaṃ kṛtaḥ|| yūyaṃ gatatrapā devā yeṣāṃ rājā puraṃdaraḥ

तारक ने कहा — 'आज तुमने इस कुमार को मेरे सामने कैसे खड़ा कर दिया? तुम देवता तो निर्लज्ज हो, जिनका राजा इंद्र है!'

श्लोक 77 (skanda.1.29.77)

पुरा येन कृतं कर्म विदितं सर्वमेव तत्॥ प्रसुप्ताश्चार्द्दिता गर्भे जठरस्था निपातिताः

purā yena kṛtaṃ karma viditaṃ sarvameva tat|| prasuptāścārdditā garbhe jaṭharasthā nipātitāḥ

'उसने पूर्वकाल में जो कर्म किए, वे सब जगत्-विदित हैं — सोए हुओं को, पीड़ितों को, और गर्भ में स्थित शिशुओं तक को उसने मार गिराया।'

श्लोक 78 (skanda.1.29.78)

कश्यपस्यात्मजेनैव बहुरूपो हतोऽसुरः॥ नमुचिश्च हतो वीरो वृत्रश्चैव तथा हतः

kaśyapasyātmajenaiva bahurūpo hato'suraḥ|| namuciśca hato vīro vṛtraścaiva tathā hataḥ

'कश्यप के ही पुत्र इंद्र ने बहुरूप नामक असुर को मार डाला; वीर नमुचि भी मारा गया, और वृत्र भी उसी प्रकार मारा गया।'

श्लोक 79 (skanda.1.29.79)

कुमारं हंतुमोसौ देवेंद्रो बलघातकः॥ कुमारोऽयं मया देवा घातितोद्य न संशयः

kumāraṃ haṃtumosau deveṃdro balaghātakaḥ|| kumāro'yaṃ mayā devā ghātitodya na saṃśayaḥ

'यह बलघातक देवेंद्र इस कुमार को मरवाने के लिए ही यहाँ लाया है; परंतु हे देवगण, आज इस कुमार को मैं ही मार डालूँगा, इसमें कोई संशय नहीं।'

श्लोक 80 (skanda.1.29.80)

पुरा हतास्त्वया विप्रा दक्षयज्ञे ह्यनेकशः॥ तत्कर्मणः फलं चाद्य वीरभद्र महामते॥ दर्शयिष्यामि ते वीर रणे रणविशारद

purā hatāstvayā viprā dakṣayajñe hyanekaśaḥ|| tatkarmaṇaḥ phalaṃ cādya vīrabhadra mahāmate|| darśayiṣyāmi te vīra raṇe raṇaviśārada

'हे वीरभद्र, पूर्वकाल में दक्ष के यज्ञ में तुमने अनेक ब्राह्मणों का वध किया था; हे महामते, हे रणकुशल वीर, उसी कर्म का फल मैं तुम्हें आज युद्ध में दिखा दूँगा।'

श्लोक 81 (skanda.1.29.81)

इत्येवमुक्त्वा स तदा महात्मा दैत्याधिपो वीरवरः स एकः॥ जग्राह शक्तिं परमाद्भुतां च स तारको युद्धविदां वरिष्ठः

ityevamuktvā sa tadā mahātmā daityādhipo vīravaraḥ sa ekaḥ|| jagrāha śaktiṃ paramādbhutāṃ ca sa tārako yuddhavidāṃ variṣṭhaḥ

यह कहकर वह महात्मा दैत्याधिपति, वीरवरों में अद्वितीय और युद्धविद्याविशारदों में श्रेष्ठ तारक, अपनी परम अद्भुत शक्ति को उठा लिया।

श्लोक 82 (skanda.1.29.82)

इति परमरुषभिभूतो दितितनयः परीवृतोऽसुरेंद्रैः॥ युधि मतिमकरोत्तदा निहंतुं समरविजयी स तारको बलीयान्

iti paramaruṣabhibhūto dititanayaḥ parīvṛto'sureṃdraiḥ|| yudhi matimakarottadā nihaṃtuṃ samaravijayī sa tārako balīyān

इस प्रकार परम क्रोध से अभिभूत होकर, असुरेंद्रों से घिरा हुआ दिति-पुत्र, वह समरविजयी बलशाली तारक, उस समय उसे मार डालने का निश्चय कर बैठा।

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