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माहेश्वर खण्ड · अध्याय 62

पार्वती के प्रकोप का वर्णन

अध्याय 61अध्याय-सूचीअध्याय 63

श्लोक 1 (skanda.1.62.1)

॥नारद उवाच॥ ततो निरुपमं दिव्यं सर्वरत्नमयं शुभम्॥ ईशाननिर्मितं साक्षात्सह देव्याविशद्गृहम्

nārada uvāca tato nirupamaṁ divyaṁ sarvaratnamayaṁ śubham īśānanirmitaṁ sākṣātsaha devyāviśadgṛham

नारद बोले — तब देवी सहित वे ईशान द्वारा साक्षात निर्मित, अनुपम, दिव्य, सर्वरत्नमय, शुभ भवन में प्रविष्ट हुए।

श्लोक 2 (skanda.1.62.2)

तत्रासौ मंदरगिरौ सह देव्या भगाक्षहा॥ प्रासादे तत्र चोद्याने रेमे संहृष्टमानसः

tatrāsau maṁdaragirau saha devyā bhagākṣahā prāsāde tatra codyāne reme saṁhṛṣṭamānasaḥ

वहाँ मन्दराचल पर, भग के नेत्रों के संहारक, देवी सहित उस प्रासाद में और उस उद्यान में हर्षित मन से क्रीड़ा करने लगे।

श्लोक 3 (skanda.1.62.3)

एतस्मिन्नंतरे देवास्तारकेणातिपीडिताः॥ प्रोत्साहितेन चात्यर्थं मया कलिचिकीर्षुणा

etasminnaṁtare devāstārakeṇātipīḍitāḥ protsāhitena cātyarthaṁ mayā kalicikīrṣuṇā

इसी बीच तारक से अत्यन्त पीड़ित देवगण, और कलह उत्पन्न करने की इच्छा रखने वाले मेरे द्वारा भी अत्यधिक प्रेरित होकर,

श्लोक 4 (skanda.1.62.4)

आसाद्य ते भवं देवं तुष्टुबुर्बहुधा स्तवैः॥ एतस्मिन्नंतरे देवी प्रोद्वर्तयत गात्रकम्

āsādya te bhavaṁ devaṁ tuṣṭuburbahudhā stavaiḥ etasminnaṁtare devī prodvartayata gātrakam

भव देव के पास जाकर अनेक स्तवों से उनकी स्तुति करने लगे। इसी बीच देवी अपने अंगों पर उबटन मल रही थीं,

श्लोक 5 (skanda.1.62.5)

उद्वर्तनमलेनाथ नरं चक्रे गजाननम्॥ देवानां संस्तवैः पुण्यैः कृपयाभिपरिप्लुता

udvartanamalenātha naraṁ cakre gajānanam devānāṁ saṁstavaiḥ puṇyaiḥ kṛpayābhipariplutā

और उस उबटन के मैल से उन्होंने गजमुख वाले एक पुरुष को रच दिया — देवताओं की पवित्र स्तुतियों से करुणा से भरकर,

श्लोक 6 (skanda.1.62.6)

पुत्रेत्युवाच तं देवी ततः संहृष्टमानसा॥ एतस्मिन्नंतरे शर्वस्तत्रागत्य वचोऽब्रवीत्

putretyuvāca taṁ devī tataḥ saṁhṛṣṭamānasā etasminnaṁtare śarvastatrāgatya vaco'bravīt

देवी ने अत्यन्त हर्षित मन से उसे 'पुत्र' कहकर पुकारा। इसी बीच शर्व वहाँ आकर बोले —

श्लोक 7 (skanda.1.62.7)

पुत्रस्तवायं गिरिजे श्रृणु यादृग्भविष्यति॥ विक्रमेण च वीर्येण कृपया सदृशो मया

putrastavāyaṁ girije śrṛṇu yādṛgbhaviṣyati vikrameṇa ca vīryeṇa kṛpayā sadṛśo mayā

'हे गिरिजे, यह तुम्हारा पुत्र है; सुनो, यह कैसा होगा — पराक्रम और वीर्य में, तथा करुणा में मेरे समान,

श्लोक 8 (skanda.1.62.8)

यथाहं तादृशश्चासौ पुत्रस्ते भविता गुणैः॥ ये च पापा दुराचारा वेदान्धर्मं द्विषंति च

yathāhaṁ tādṛśaścāsau putraste bhavitā guṇaiḥ ye ca pāpā durācārā vedāndharmaṁ dviṣaṁti ca

जैसा मैं हूँ, वैसा ही यह तुम्हारा पुत्र गुणों में होगा। और जो पापी, दुराचारी, वेद और धर्म से द्वेष करने वाले हैं,

श्लोक 9 (skanda.1.62.9)

तेषामामरणांतानि विघ्नान्येष करिष्यति॥ ये च मां नैव मन्यंते विष्णुं वापि जगद्गुरुम्

teṣāmāmaraṇāṁtāni vighnānyeṣa kariṣyati ye ca māṁ naiva manyaṁte viṣṇuṁ vāpi jagadgurum

उनके लिए यह मृत्यु तक विघ्न उत्पन्न करता रहेगा। और जो न मुझे मानते हैं, न जगद्गुरु विष्णु को,

श्लोक 10 (skanda.1.62.10)

विघ्निता विघ्नराजेन ते यास्यंति महत्तमः॥ तेषां गृहेषु कलहः सदा नैवोपसाम्यति

vighnitā vighnarājena te yāsyaṁti mahattamaḥ teṣāṁ gṛheṣu kalahaḥ sadā naivopasāmyati

विघ्नराज द्वारा बाधित होकर वे महान अनर्थ को प्राप्त होंगे; उनके घरों में कलह कभी शान्त नहीं होगा —

श्लोक 11 (skanda.1.62.11)

पुत्रस्य तव विघ्नेन समूलं तस्य नश्यति॥ येषां न पूज्याः पूज्यंते क्रोधासत्यपराश्च ये

putrasya tava vighnena samūlaṁ tasya naśyati yeṣāṁ na pūjyāḥ pūjyaṁte krodhāsatyaparāśca ye

तुम्हारे पुत्र के विघ्न से वह जड़ सहित नष्ट हो जाएगा। जो अपूज्यों की पूजा करते हैं, जो क्रोध और असत्य में लीन हैं,

श्लोक 12 (skanda.1.62.12)

रौद्रसाहसिका ये च तेषां विघ्नं करिष्यति॥ श्रुतिधर्माञ्ज्ञातिधर्मान्पालयंति गुरूंश्च ये

raudrasāhasikā ye ca teṣāṁ vighnaṁ kariṣyati śrutidharmāñjñātidharmānpālayaṁti gurūṁśca ye

जो रौद्र और दुःसाहसी हैं, उनके लिए यह विघ्न उत्पन्न करेगा; किन्तु जो श्रुति-धर्म, ज्ञाति-धर्म का पालन करते हैं, और गुरुजनों का,

श्लोक 13 (skanda.1.62.13)

कृपालवो गतक्रोधास्तेषां विघ्नं हरिष्यति॥ सर्वे धर्माश्च कर्माणि तथा नानाविधानि च

kṛpālavo gatakrodhāsteṣāṁ vighnaṁ hariṣyati sarve dharmāśca karmāṇi tathā nānāvidhāni ca

जो दयालु और क्रोध-रहित हैं, उनके विघ्न को यह दूर करेगा। समस्त धर्म और कर्म, तथा नाना प्रकार के कार्य,

श्लोक 14 (skanda.1.62.14)

सविघ्नानि भिवष्यंति पूजयास्य विना शुभे॥ एवं श्रुत्वा उमा प्राह एवमस्त्विति शंकरम्

savighnāni bhivaṣyaṁti pūjayāsya vinā śubhe evaṁ śrutvā umā prāha evamastviti śaṁkaram

इसकी पूजा के बिना, हे शुभे, विघ्नयुक्त हो जाएँगे।' यह सुनकर उमा ने शंकर से कहा — 'ऐसा ही हो।'

श्लोक 15 (skanda.1.62.15)

ततो बृहत्तनुः सोऽभूत्तेजसा द्योतयन्दिशः॥ ततो गणैः समं शर्वः सुराणां प्रददौ च तम्॥ यावत्तार कहंता वो भवेत्तावदयं प्रभुः

tato bṛhattanuḥ so'bhūttejasā dyotayandiśaḥ tato gaṇaiḥ samaṁ śarvaḥ surāṇāṁ pradadau ca tam yāvattāra kahaṁtā vo bhavettāvadayaṁ prabhuḥ

तब वह विशाल देह वाला हो गया, अपने तेज से दिशाओं को आलोकित करता हुआ। तब शर्व ने गणों सहित उसे देवताओं को सौंप दिया — 'जब तक तुम्हारा तारक-हन्ता जन्म न ले, तब तक यह तुम्हारा स्वामी होगा।'

श्लोक 16 (skanda.1.62.16)

ततो विघ्नपतिर्देवैः संस्तुतः प्रमतार्तिहा॥ चकार तेषां कृत्यानि विघ्नानि दितिजन्मनाम्

tato vighnapatirdevaiḥ saṁstutaḥ pramatārtihā cakāra teṣāṁ kṛtyāni vighnāni ditijanmanām

तब देवों द्वारा स्तुति किया गया विघ्नपति, आर्तों की पीड़ा हरने वाला, दितिपुत्रों के कार्यों में विघ्न डालने लगा।

श्लोक 17 (skanda.1.62.17)

पार्वती च पुनर्देवी पुत्रत्वे परिकल्प्य च॥ अशोकस्यांकुरं वार्भिरवर्द्धयत स्वादृतैः

pārvatī ca punardevī putratve parikalpya ca aśokasyāṁkuraṁ vārbhiravarddhayata svādṛtaiḥ

और देवी पार्वती ने पुनः, एक और वस्तु को पुत्र-रूप में मानकर, अशोक वृक्ष के अंकुर को प्रेमपूर्वक अर्पित जल से बढ़ाया।

श्लोक 18 (skanda.1.62.18)

सप्तर्षीनथ चाहूय संस्कारमंगलं तरोः॥ कारयामास तन्वंगी ततस्तां मुनयोऽब्रुवन्

saptarṣīnatha cāhūya saṁskāramaṁgalaṁ taroḥ kārayāmāsa tanvaṁgī tatastāṁ munayo'bruvan

फिर सप्तर्षियों को बुलाकर उस कोमलांगी ने उस वृक्ष का मंगल-संस्कार कराया; तब मुनियों ने उससे कहा —

श्लोक 19 (skanda.1.62.19)

त्वयैव दर्शिते मार्गे मर्यादां कर्तुमर्हसि॥ किं फलं भविता देवि कल्पितैस्तरुपुत्रकैः

tvayaiva darśite mārge maryādāṁ kartumarhasi kiṁ phalaṁ bhavitā devi kalpitaistaruputrakaiḥ

'तुम्हारे ही द्वारा दिखाए गए इस मार्ग पर, तुम्हें एक मर्यादा स्थापित करनी चाहिए। हे देवी, इन कल्पित वृक्ष-पुत्रों से क्या फल प्राप्त होगा?'

श्लोक 20 (skanda.1.62.20)

॥देव्युवाच॥ यो वै निरुदके ग्रामे कूपं कारयते बुधः॥ यावत्तोयं भवेत्कूपे तावत्स्वर्गे स मोदते

devyuvāca yo vai nirudake grāme kūpaṁ kārayate budhaḥ yāvattoyaṁ bhavetkūpe tāvatsvarge sa modate

देवी बोलीं — जो बुद्धिमान जल-रहित गाँव में कुआँ खुदवाता है, उस कुएँ में जब तक जल रहता है, तब तक वह स्वर्ग में आनन्द भोगता है।

श्लोक 21 (skanda.1.62.21)

दशकूपसमावापी दशवापी समं सरः॥ दशसरःसमा कन्या दशकन्यासमः क्रतुः

daśakūpasamāvāpī daśavāpī samaṁ saraḥ daśasaraḥsamā kanyā daśakanyāsamaḥ kratuḥ

दस कुओं के बराबर एक बावली, दस बावलियों के बराबर एक सरोवर, दस सरोवरों के बराबर एक कन्या, दस कन्याओं के बराबर एक यज्ञ,

श्लोक 22 (skanda.1.62.22)

दशक्रतुसमः पुत्रो दशपुत्रसमो द्रुमः

daśakratusamaḥ putro daśaputrasamo drumaḥ

दस यज्ञों के बराबर एक पुत्र, और दस पुत्रों के बराबर एक वृक्ष है।

श्लोक 23 (skanda.1.62.23)

एषैव मम मर्यादा नियता लोकभाविनी॥ जीर्णोद्धारे कृते वापि फलं तद्द्विगुणं मतम्

eṣaiva mama maryādā niyatā lokabhāvinī jīrṇoddhāre kṛte vāpi phalaṁ taddviguṇaṁ matam

यही मेरी लोक-हितकारी, निश्चित मर्यादा है। और यदि जीर्ण वृक्ष का उद्धार किया जाए, तो उसका फल दुगुना माना गया है।

श्लोक 24 (skanda.1.62.24)

॥इति गणेशोत्पत्तिः॥ ततः कदाचिद्भगवानुमया सह मंदरे॥ मंदिरे हर्षजनने कलधौतमये शुभे

iti gaṇeśotpattiḥ tataḥ kadācidbhagavānumayā saha maṁdare maṁdire harṣajanane kaladhautamaye śubhe

(इस प्रकार गणेश की उत्पत्ति की कथा हुई) फिर एक बार भगवान उमा के साथ मन्दराचल पर, हर्ष उत्पन्न करने वाले, स्वर्ण-रजत-मय, शुभ भवन में,

श्लोक 25 (skanda.1.62.25)

प्रकीर्णकुसुमामोदमहालिकुलकूजिते॥ किंनरोद्गीतसंगीत प्रतिशब्दितमध्यके

prakīrṇakusumāmodamahālikulakūjite kiṁnarodgītasaṁgīta pratiśabditamadhyake

जो बिखरे पुष्पों की सुगन्ध और बड़े भ्रमर-समूहों की गुँजार से युक्त, किन्नरों के गाए गीत-संगीत से गूँजते भीतरी कक्षों वाला था,

श्लोक 26 (skanda.1.62.26)

क्रीडामयूरैर्हसैश्च श्रुतैश्चैवाभिनादिते॥ मौक्तिकैर्विविध रत्नैर्विनिर्मितगवाक्षके

krīḍāmayūrairhasaiśca śrutaiścaivābhinādite mauktikairvividha ratnairvinirmitagavākṣake

क्रीड़ा-मयूरों और हंसों के मधुर स्वरों से गुँजायमान, मोतियों और नाना रत्नों से बने झरोखों वाला —

श्लोक 27 (skanda.1.62.27)

तत्र पुण्यकथाभिश्च क्रीडतो रुभयोस्तयोः॥ प्रादुरभून्महाञ्छब्दः पूरितांबरगोचरः

tatra puṇyakathābhiśca krīḍato rubhayostayoḥ prādurabhūnmahāñchabdaḥ pūritāṁbaragocaraḥ

वहाँ उन दोनों के पवित्र कथाओं में क्रीड़ा करते हुए, एक महान शब्द उत्पन्न हुआ, जो आकाश-मण्डल को भर देने वाला था।

श्लोक 28 (skanda.1.62.28)

तं श्रुत्वा कौतुकाद्देवी किमेतदिति शंकरम्॥ पर्यपृच्छच्छुभतनूर्हरं विस्मयपूर्वकम्

taṁ śrutvā kautukāddevī kimetaditi śaṁkaram paryapṛcchacchubhatanūrharaṁ vismayapūrvakam

उसे सुनकर कुतूहलवश देवी ने विस्मित होकर शुभ-तनु हर शंकर से पूछा — 'यह क्या है?'

श्लोक 29 (skanda.1.62.29)

तामाह देवीं गिरिशो दृष्टपूर्वास्तु ते त्वया॥ एते गणा मे क्रीडंति शैलेऽस्मिंस्त्वत्प्रियाः शुभे

tāmāha devīṁ giriśo dṛṣṭapūrvāstu te tvayā ete gaṇā me krīḍaṁti śaile'smiṁstvatpriyāḥ śubhe

गिरीश ने देवी से कहा — 'तुमने इन्हें पहले भी देखा है; ये मेरे गण हैं, हे शुभे, तुम्हारे प्रिय, इस पर्वत पर क्रीड़ा कर रहे हैं।

श्लोक 30 (skanda.1.62.30)

तपसा ब्रह्मचर्येण क्लेशेन क्षेत्रसाधनैः॥ यैरहं तोषितः पृथ्व्यां त एते मनुजोत्तमाः

tapasā brahmacaryeṇa kleśena kṣetrasādhanaiḥ yairahaṁ toṣitaḥ pṛthvyāṁ ta ete manujottamāḥ

तप, ब्रह्मचर्य, क्लेश और क्षेत्र-साधनों से, जिनके द्वारा मैं पृथ्वी पर सन्तुष्ट किया गया, वे ही ये मनुष्यों में श्रेष्ठ,

श्लोक 31 (skanda.1.62.31)

मत्समीपमनुप्राप्ता मम लोकं वरानने॥ चराचरस्य जगतः सृष्टिसंहारणक्षमाः

matsamīpamanuprāptā mama lokaṁ varānane carācarasya jagataḥ sṛṣṭisaṁhāraṇakṣamāḥ

मेरे निकट पहुँचकर मेरे लोक को, हे वरानने, प्राप्त हुए हैं; ये चराचर जगत की सृष्टि और संहार में समर्थ हैं।

श्लोक 32 (skanda.1.62.32)

विनैतान्नैव मे प्रीतिर्नैभिर्विरहितो रमे॥ एते अहमहं चैते तानेतान्पस्य पार्वति

vinaitānnaiva me prītirnaibhirvirahito rame ete ahamahaṁ caite tānetānpasya pārvati

इनके बिना मुझे कोई प्रीति नहीं है, इनसे रहित होकर मैं आनन्द नहीं पाता; ये ही मैं हूँ, और मैं ही ये हूँ — हे पार्वती, उन्हें देखो।

श्लोक 33 (skanda.1.62.33)

इत्युक्ता विस्मिता देवी ददृशे तान्गवाक्षके॥ स्थिता पद्मपलाशाक्षी महादेवेन भाषिता

ityuktā vismitā devī dadṛśe tāngavākṣake sthitā padmapalāśākṣī mahādevena bhāṣitā

यह सुनकर विस्मित देवी ने, झरोखे में खड़ी होकर, महादेव द्वारा बताए गए उन कमल-दल-नयनी ने उन्हें देखा —

श्लोक 34 (skanda.1.62.34)

केचित्कृशा ह्रस्वदीर्घाः केचित्स्थूलमहोदराः॥ व्याघ्रेभमेषाजमुखा नानाप्राणिमहामुखाः

kecitkṛśā hrasvadīrghāḥ kecitsthūlamahodarāḥ vyāghrebhameṣājamukhā nānāprāṇimahāmukhāḥ

कोई कृश, कोई छोटे-लम्बे, कोई स्थूल और बड़े उदर वाले; व्याघ्र, हाथी, मेष, बकरे के मुख वाले, नाना प्राणियों के विशाल मुख वाले,

श्लोक 35 (skanda.1.62.35)

व्याघ्रचर्मपरीधाना नग्ना ज्वालामुखाः परे॥ गोकर्णा गजकर्णाश्च बहुपादमुखेक्षणाः

vyāghracarmaparīdhānā nagnā jvālāmukhāḥ pare gokarṇā gajakarṇāśca bahupādamukhekṣaṇāḥ

व्याघ्र-चर्म पहने, नग्न, कुछ अग्नि-मुख वाले, गोकर्ण और गजकर्ण वाले, अनेक पैरों-मुखों-नेत्रों वाले,

श्लोक 36 (skanda.1.62.36)

विचित्रवाहनाश्चैव नानायुधधरास्तथा॥ गीतवादित्रतत्त्वज्ञाः सत्त्वगीतरसप्रियाः

vicitravāhanāścaiva nānāyudhadharāstathā gītavāditratattvajñāḥ sattvagītarasapriyāḥ

विचित्र वाहनों वाले, नाना अस्त्र-शस्त्र धारण किए, गीत-वाद्य के तत्त्वज्ञ, सत्त्व-गीत के रस-प्रेमी।

श्लोक 37 (skanda.1.62.37)

तान्दृष्ट्वा पार्वती प्राह कतिसंख्याभिधास्त्वमी

tāndṛṣṭvā pārvatī prāha katisaṁkhyābhidhāstvamī

उन्हें देखकर पार्वती ने पूछा — 'इनकी संख्या और नाम कितने हैं?'

श्लोक 38 (skanda.1.62.38)

॥श्रीशंकर उवाच॥ असंख्ये यास्त्वमी देवी असंख्येयाभिधास्तथा॥ जगदापूरितं सर्वमेतैर्भीमैर्महाबलैः

śrīśaṁkara uvāca asaṁkhye yāstvamī devī asaṁkhyeyābhidhāstathā jagadāpūritaṁ sarvametairbhīmairmahābalaiḥ

श्री शंकर बोले — हे देवी, ये असंख्य हैं, और इनके नाम भी असंख्य हैं; यह सम्पूर्ण जगत इन भयंकर, महाबली गणों से भरा हुआ है।

श्लोक 39 (skanda.1.62.39)

सिद्धक्षेत्रेषु रथ्यासु जीर्णोद्यानेषु वेश्मसु॥ दानवानां शरीरेषु बालेषून्मत्तकेषु च

siddhakṣetreṣu rathyāsu jīrṇodyāneṣu veśmasu dānavānāṁ śarīreṣu bāleṣūnmattakeṣu ca

सिद्ध-क्षेत्रों में, गलियों में, जीर्ण उद्यानों में, घरों में, दानवों के शरीरों में, बालकों में और उन्मत्तों में,

श्लोक 40 (skanda.1.62.40)

एते विशति मुदिता नानाहारविहारिणः॥ ऊष्मपाः फेनपाश्चैव धूम्रपा मधुपायिनः॥ मदाहाराः सर्वभक्ष्यास्तथान्ये चाप्यभोजनाः

ete viśati muditā nānāhāravihāriṇaḥ ūṣmapāḥ phenapāścaiva dhūmrapā madhupāyinaḥ madāhārāḥ sarvabhakṣyāstathānye cāpyabhojanāḥ

ये हर्षित होकर प्रवेश करते हैं, नाना आहार-विहार करते हुए — भाप पीने वाले, फेन पीने वाले, धूम्र पीने वाले, मधु पीने वाले, मद ही जिनका आहार है, सर्वभक्षी, तथा कुछ अन्न-रहित भी।

श्लोक 41 (skanda.1.62.41)

गीतनृत्योपहाराश्च नानावाद्यरवप्रियाः॥ अनंतत्वादमीषां च वक्तुं शक्या न वै गुणाः

gītanṛtyopahārāśca nānāvādyaravapriyāḥ anaṁtatvādamīṣāṁ ca vaktuṁ śakyā na vai guṇāḥ

इनका उपहार गीत और नृत्य है, ये नाना वाद्यों की ध्वनि से प्रसन्न होते हैं; इनकी अनन्तता के कारण इनके गुणों का वर्णन करना सम्भव नहीं है।

श्लोक 42 (skanda.1.62.42)

॥श्रीदेव्युवाच॥ मनःशिलेन कल्केन य एष च्छुरिताननः॥ तेजसा भास्कराकारो रूपेण सदृशस्तव

śrīdevyuvāca manaḥśilena kalkena ya eṣa cchuritānanaḥ tejasā bhāskarākāro rūpeṇa sadṛśastava

श्री देवी बोलीं — मैनसिल के लेप से जिसका मुख रँगा है, तेज में सूर्य-सम आकृति वाला, रूप में आपके सदृश — यह कौन है?

श्लोक 43 (skanda.1.62.43)

आकर्ण्याकर्ण्य ते देव गणैर्गीतान्महागुणान्॥ मुहुर्नृत्यति हास्यं च विदधाति मुहुर्मुहुः

ākarṇyākarṇya te deva gaṇairgītānmahāguṇān muhurnṛtyati hāsyaṁ ca vidadhāti muhurmuhuḥ

बार-बार सुनकर, हे देव, गणों द्वारा गाए गए आपके महान गुणों को, यह बार-बार नाचता है, और बार-बार हँसता है,

श्लोक 44 (skanda.1.62.44)

सदाशिवशिवेत्येवं विह्वलो वक्ति यो मुहुः॥ धन्योऽमीदृशी यस्य भक्तिस्त्वयि महेश्वरे

sadāśivaśivetyevaṁ vihvalo vakti yo muhuḥ dhanyo'mīdṛśī yasya bhaktistvayi maheśvare

'सदाशिव, शिव' — ऐसा कहता हुआ यह विह्वल होकर बार-बार बोलता है; धन्य है वह, जिसकी आप महेश्वर में ऐसी भक्ति है।

श्लोक 45 (skanda.1.62.45)

एनं विज्ञातुमिच्छामि किंनामासौ गणस्तव॥ ॥श्रीशंकर उवाच॥ स एष वीरक देवी सदा मेद्रिसुते प्रियः

enaṁ vijñātumicchāmi kiṁnāmāsau gaṇastava śrīśaṁkara uvāca sa eṣa vīraka devī sadā medrisute priyaḥ

मैं इसे जानना चाहती हूँ — आपके इस गण का नाम क्या है?' श्री शंकर बोले — हे देवी, यह वीरक है, हे मैनाक की बहन, सदा मेरा प्रिय,

श्लोक 46 (skanda.1.62.46)

नानाश्चर्यगुणाधारः प्रतीहारो मतोंऽबिके॥ ॥देव्युवाच॥ ईदृशस्य सुतस्यापि ममोऽकंठा पुरांतक

nānāścaryaguṇādhāraḥ pratīhāro matoṁ'bike devyuvāca īdṛśasya sutasyāpi mamo'kaṁṭhā purāṁtaka

नाना आश्चर्यजनक गुणों का आधार, हे अम्बिके, मेरा द्वारपाल माना जाता है।' देवी बोलीं — हे पुरान्तक, ऐसे ही पुत्र के लिए मेरा कण्ठ भी लालायित है —

श्लोक 47 (skanda.1.62.47)

कदाहमीदृशं पुत्रं लप्स्याम्यानंददायकम्॥ ॥शर्व उवाच॥ एष एव सुतस्तेस्तु यावदीदृक्परो भवेत्

kadāhamīdṛśaṁ putraṁ lapsyāmyānaṁdadāyakam śarva uvāca eṣa eva sutastestu yāvadīdṛkparo bhavet

मुझे ऐसा आनन्ददायक पुत्र कब मिलेगा?' शर्व बोले — यही तुम्हारा पुत्र हो, जब तक इससे श्रेष्ठ या समान कोई न मिले।

श्लोक 48 (skanda.1.62.48)

इत्युक्ता विजयां प्राह शीघ्रमानय वीरकम्॥ विजया च ततो गत्वा वीरकं वाक्यमब्रवीत्

ityuktā vijayāṁ prāha śīghramānaya vīrakam vijayā ca tato gatvā vīrakaṁ vākyamabravīt

यह कहकर उन्होंने विजया से कहा — 'शीघ्र वीरक को यहाँ ले आओ।' तब विजया ने जाकर वीरक से कहा —

श्लोक 49 (skanda.1.62.49)

एहि वीरक ते देवी गिरिजा तोषिता शुभा॥ त्वममाह्वयति सा देवी भवस्यानुमते स्वयम्

ehi vīraka te devī girijā toṣitā śubhā tvamamāhvayati sā devī bhavasyānumate svayam

'आओ वीरक, शुभा देवी गिरिजा तुमसे प्रसन्न हैं; स्वयं वे देवी, भव की अनुमति से, तुम्हें बुला रही हैं।'

श्लोक 50 (skanda.1.62.50)

इत्युक्तः संभ्रमयुतो मुखं संमार्ज्य पाणिना॥ देव्याः समीपमागच्छज्जययाऽनुगतः शनैः

ityuktaḥ saṁbhramayuto mukhaṁ saṁmārjya pāṇinā devyāḥ samīpamāgacchajjayayā'nugataḥ śanaiḥ

यह सुनकर उत्साह से भरकर, हाथ से मुख पोंछते हुए, वह जया के पीछे-पीछे धीरे-धीरे देवी के निकट आया।

श्लोक 51 (skanda.1.62.51)

तं दृष्ट्वा गिरिजा प्राह गिरामधुरवर्णया॥ एह्येहि पुत्र दत्तस्त्वं भवेन मम पुत्रकः

taṁ dṛṣṭvā girijā prāha girāmadhuravarṇayā ehyehi putra dattastvaṁ bhavena mama putrakaḥ

उसे देखकर गिरिजा ने मधुर स्वर में कहा — 'आओ, आओ, पुत्र! तुम भव द्वारा मुझे दिया गया मेरा पुत्र हो।'

श्लोक 52 (skanda.1.62.52)

इत्युक्तो दंडवद्देवीं प्रणम्यावस्थितः पुरः॥ माता ततस्तमालिंग्य कृत्वोत्संगे च वीरकम्

ityukto daṁḍavaddevīṁ praṇamyāvasthitaḥ puraḥ mātā tatastamāliṁgya kṛtvotsaṁge ca vīrakam

यह सुनकर वह देवी को दण्डवत प्रणाम कर सामने खड़ा हो गया। तब माता ने उसे गले लगाकर, गोद में बिठाकर,

श्लोक 53 (skanda.1.62.53)

चुचुंब च कपोले तं गात्राणि च प्रमार्जयत्॥ भूषयामास दिव्यैस्तं स्वयं नानाविभूषणैः

cucuṁba ca kapole taṁ gātrāṇi ca pramārjayat bhūṣayāmāsa divyaistaṁ svayaṁ nānāvibhūṣaṇaiḥ

उसके कपोल का चुम्बन लिया और उसके अंगों को सहलाया; और स्वयं उसे नाना दिव्य आभूषणों से सजाया।

श्लोक 54 (skanda.1.62.54)

एवं संकल्प्य तं पुत्रं लालयित्वा उमाचिरम्॥ उवाच पुत्र क्रीडेति गच्छ सार्धं गणैरिति

evaṁ saṁkalpya taṁ putraṁ lālayitvā umāciram uvāca putra krīḍeti gaccha sārdhaṁ gaṇairiti

इस प्रकार उस पुत्र को स्वीकार कर, दीर्घकाल तक लाड़ करके, उमा ने कहा — 'पुत्र, अब खेलो, गणों के साथ जाओ।'

श्लोक 55 (skanda.1.62.55)

ततश्चिक्रीड मध्ये स गणानां पार्वतीसुतः॥ मुहुर्मुहुः स्वमनसि स्तुवन्भक्तिं स शांकरीम्

tataścikrīḍa madhye sa gaṇānāṁ pārvatīsutaḥ muhurmuhuḥ svamanasi stuvanbhaktiṁ sa śāṁkarīm

तब पार्वती-पुत्र गणों के बीच क्रीड़ा करने लगा, बार-बार अपने ही मन में शांकरी (पार्वती) के प्रति भक्ति का स्तवन करते हुए —

श्लोक 56 (skanda.1.62.56)

प्रणम्य सर्वभूतानि प्रार्थयाम्यस्मि दुष्करम्॥ भक्त्या भजध्वमीशानं यस्या भक्तेरिदं फलम्

praṇamya sarvabhūtāni prārthayāmyasmi duṣkaram bhaktyā bhajadhvamīśānaṁ yasyā bhakteridaṁ phalam

'सम्पूर्ण प्राणियों को प्रणाम कर मैं यह दुष्कर वस्तु माँगता हूँ — भक्तिपूर्वक ईशान की उपासना करो, जिसकी भक्ति का यही फल है।'

श्लोक 57 (skanda.1.62.57)

क्रीडितुं वीरके याते ततो देवी च पार्वती॥ नानाकथाभिस्चिक्रीड पुनरेव जटाभृता

krīḍituṁ vīrake yāte tato devī ca pārvatī nānākathābhiscikrīḍa punareva jaṭābhṛtā

वीरक के खेलने चले जाने पर देवी पार्वती जटाधारी के साथ नाना वार्तालापों में पुनः क्रीड़ा करने लगीं।

श्लोक 58 (skanda.1.62.58)

ततो गिरिसुताकण्ठे क्षिप्तबाहुर्महेश्वरः॥ तपसस्तु विशेषार्थं नर्म देवीं किलाब्रवीत्

tato girisutākaṇṭhe kṣiptabāhurmaheśvaraḥ tapasastu viśeṣārthaṁ narma devīṁ kilābravīt

तब पर्वत-पुत्री के कण्ठ में भुजा डालकर महेश्वर ने, उसके तप के विषय में एक विशेष कारणवश, उससे हँसी-हँसी में एक बात कही।

श्लोक 59 (skanda.1.62.59)

स हि गौरतनुः शर्वो विशेषाच्छशिशोभितः॥ रंजिता च विभावर्या देवी नीलोत्पलच्छविः

sa hi gauratanuḥ śarvo viśeṣācchaśiśobhitaḥ raṁjitā ca vibhāvaryā devī nīlotpalacchaviḥ

शर्व का शरीर तो गौर था, विशेष रूप से चन्द्र से सुशोभित; और देवी, अपनी पूर्व की श्यामता से रँगी, नीलकमल के समान वर्ण वाली थीं।

श्लोक 60 (skanda.1.62.60)

॥शर्व उवाच॥ शरीरे मम तन्वंगी सिते भास्यसितद्युतिः॥ भुजंगीवासिता शुभ्रे संश्लिष्टा चन्दने तरौ

śarva uvāca śarīre mama tanvaṁgī site bhāsyasitadyutiḥ bhujaṁgīvāsitā śubhre saṁśliṣṭā candane tarau

शर्व बोले — हे कृशांगी, मेरे श्वेत शरीर पर तुम अपनी श्याम कान्ति से चमकती हो, मानो कोई काली नागिन श्वेत चन्दन-वृक्ष से लिपटी हो।

श्लोक 61 (skanda.1.62.61)

चंद्रज्योत्स्नाभिसंपृक्ता तामसी रजनी यथा॥ रजनी वा सिते पक्षे दृष्टिदोषं ददासि मे

caṁdrajyotsnābhisaṁpṛktā tāmasī rajanī yathā rajanī vā site pakṣe dṛṣṭidoṣaṁ dadāsi me

चन्द्र-ज्योत्स्ना से मिली तमोमयी रात्रि के समान, या शुक्ल पक्ष में रात्रि के समान — तुम मेरी दृष्टि में दोष उत्पन्न कर देती हो।

श्लोक 62 (skanda.1.62.62)

इत्युक्ता गिरिजा तेन कण्ठं शर्वाद्विमुच्य सा॥ उवाच कोपरक्ताक्षी भृकुटीविकृतानना

ityuktā girijā tena kaṇṭhaṁ śarvādvimucya sā uvāca koparaktākṣī bhṛkuṭīvikṛtānanā

यह सुनकर गिरिजा ने शर्व से अपना कण्ठ छुड़ा लिया, और क्रोध से लाल नेत्रों वाली, भौंहें टेढ़ी किए हुए मुख से बोली —

श्लोक 63 (skanda.1.62.63)

स्वकृतेन जनः सर्वो जनेन परिभूयते॥ अवश्यमर्थी प्राप्नोति खण्डनां शशिखंडभृत्

svakṛtena janaḥ sarvo janena paribhūyate avaśyamarthī prāpnoti khaṇḍanāṁ śaśikhaṁḍabhṛt

'हर व्यक्ति अपने ही किए हुए से दूसरों द्वारा तिरस्कृत होता है। जो चन्द्र-कला धारण करता है, वह अवश्य ही उपहास का पात्र बनता है।

श्लोक 64 (skanda.1.62.64)

तपोभिर्दीप्तचरितैर्यत्त्वां प्रार्थितवत्यहम्॥ तस्य मे नियमस्यैवमवमानः पदेपदे

tapobhirdīptacaritairyattvāṁ prārthitavatyaham tasya me niyamasyaivamavamānaḥ padepade

मैंने तपों से, दीप्त आचरण से जो तुम्हें प्राप्त करने की प्रार्थना की थी — उस मेरे व्रत का ही यह पग-पग पर अपमान है।

श्लोक 65 (skanda.1.62.65)

नैवाहं कुटिला शर्व विषमा न च धूर्जटे॥ स्वदोषैस्त्वं गतः क्षांतिं तथा दोषाकरश्रियः

naivāhaṁ kuṭilā śarva viṣamā na ca dhūrjaṭe svadoṣaistvaṁ gataḥ kṣāṁtiṁ tathā doṣākaraśriyaḥ

मैं न तो कुटिल हूँ, हे शर्व, न ही विषम, हे जटाधारी; तुम स्वयं अपने ही दोषों से क्षमा भी खो चुके हो, और उस दोष-धारक (चन्द्र) की शोभा को भी।

श्लोक 66 (skanda.1.62.66)

नाहं मुष्णामि नयने नेत्रहंता भवान्भव॥ भगस्तत्ते विजानाति तथैवेदं जगत्त्रयमा

nāhaṁ muṣṇāmi nayane netrahaṁtā bhavānbhava bhagastatte vijānāti tathaivedaṁ jagattrayamā

मैं किसी के नेत्र नहीं चुराती — हे भव, नेत्रों का नाशक तो तुम स्वयं हो! यह भग स्वयं जानता है, और यह त्रिलोक भी।

श्लोक 67 (skanda.1.62.67)

मूर्ध्नि शूलं जनयसे स्वैर्दोषैर्मामदिक्षिपन्॥ यत्त्वं मामाह कृष्णेति महाकालोऽसि विश्रुतः

mūrdhni śūlaṁ janayase svairdoṣairmāmadikṣipan yattvaṁ māmāha kṛṣṇeti mahākālo'si viśrutaḥ

तुम अपने ही दोष मुझ पर मढ़ते हुए अपने सिर पर ही शूल उत्पन्न कर रहे हो; तुम मुझे 'कृष्णा' (काली) कहते हो, जबकि तुम स्वयं महाकाल कहलाते हो।

श्लोक 68 (skanda.1.62.68)

यास्याम्यहं परित्यक्तुमात्मानं तपसा गिरिम्॥ जीवंत्या नास्ति मे कृत्यं धूर्तेन परिभूतया

yāsyāmyahaṁ parityaktumātmānaṁ tapasā girim jīvaṁtyā nāsti me kṛtyaṁ dhūrtena paribhūtayā

मैं तप से इस देह को त्यागने के लिए पर्वत पर जाऊँगी — एक धूर्त द्वारा अपमानित होकर जीवित रहने में मेरा कोई प्रयोजन नहीं है।

श्लोक 69 (skanda.1.62.69)

निशम्य तस्या वचनं कोपतीक्ष्णाक्षरं भवः॥ उवाचाथ च संभ्रांतो दुर्ज्ञेयचरितो हरः

niśamya tasyā vacanaṁ kopatīkṣṇākṣaraṁ bhavaḥ uvācātha ca saṁbhrāṁto durjñeyacarito haraḥ

उसके क्रोध से तीक्ष्ण शब्दों वाले वचन सुनकर, दुर्ज्ञेय-चरित हर भव, स्वयं भी घबराकर बोले —

श्लोक 70 (skanda.1.62.70)

न तत्त्वज्ञासि गिरिजे नाहं निंदापरस्तव॥ चाटूक्तिबुद्ध्या कृतवांस्त वाहं नर्मकीर्तनम्

na tattvajñāsi girije nāhaṁ niṁdāparastava cāṭūktibuddhyā kṛtavāṁsta vāhaṁ narmakīrtanam

'हे गिरिजे, तुम सत्य को नहीं समझतीं — मैं तुम्हारी निन्दा करने वाला नहीं हूँ; मैंने तो चाटु-वचन की बुद्धि से ही तुमसे यह हास्य-कथन किया था।

श्लोक 71 (skanda.1.62.71)

विकल्पः स्वच्छचित्तेति गिरिजैषा मम प्रिया॥ प्रायेण भूतिलिप्तानामन्यथा चिंतिता हृदि

vikalpaḥ svacchacitteti girijaiṣā mama priyā prāyeṇa bhūtiliptānāmanyathā ciṁtitā hṛdi

'गिरिजा स्वच्छ-चित्त है, मेरी प्रिया है' — यही मेरा भाव था; प्रायः भस्म-लिप्त जनों (हम जैसे तपस्वियों) के वचन सुनने वाले के हृदय में अन्यथा ही सोचे जाते हैं।

श्लोक 72 (skanda.1.62.72)

अस्मादृशानां कृष्णांगि प्रवर्तंतेऽन्यथा गिरः॥ यद्येवं कुपिता भीरु न ते वक्ष्याम्यहं पुनः

asmādṛśānāṁ kṛṣṇāṁgi pravartaṁte'nyathā giraḥ yadyevaṁ kupitā bhīru na te vakṣyāmyahaṁ punaḥ

हे कृष्णांगी, हम जैसों की वाणी अन्यथा ही प्रकट होती है। यदि इससे तुम इतनी क्रुद्ध हुई हो, हे भीरु, तो मैं फिर कभी तुमसे ऐसा नहीं कहूँगा —

श्लोक 73 (skanda.1.62.73)

नर्मवादी भविष्यामि जहि कोपं सुचिस्मिते॥ शिरसा प्रणतस्तेऽहं रचितस्ते मयाञ्जलिः

narmavādī bhaviṣyāmi jahi kopaṁ sucismite śirasā praṇataste'haṁ racitaste mayāñjaliḥ

मैं हास्य-वादी नहीं रहूँगा, क्रोध त्याग दो, हे सुन्दर मुस्कान वाली। मैं तुम्हें सिर झुकाकर प्रणाम करता हूँ, तुम्हारे लिए हाथ जोड़ता हूँ।

श्लोक 74 (skanda.1.62.74)

दीनेनाप्यपमानेन निंदिता नमि विक्रियाम्॥ वरमस्मि विनम्रोऽपि न त्वं देवि गुणान्विता

dīnenāpyapamānena niṁditā nami vikriyām varamasmi vinamro'pi na tvaṁ devi guṇānvitā

दीन होकर, अपमान सहकर भी, निन्दित होकर भी मैं विकार को प्राप्त नहीं होता; हे देवी, यह उत्तम है कि मैं ही विनम्र रहूँ, न कि गुणों से युक्त तुम।

श्लोक 75 (skanda.1.62.75)

इत्यनेकैश्चाटुवाक्यैः सूक्तैर्देवेन बोधिता॥ कोपं तीव्रं न तत्याज सती मर्मणि घट्टिता

ityanekaiścāṭuvākyaiḥ sūktairdevena bodhitā kopaṁ tīvraṁ na tatyāja satī marmaṇi ghaṭṭitā

इस प्रकार अनेक चाटु-वचनों और सुभाषितों से देव द्वारा समझाए जाने पर भी, मर्म में आहत सती ने अपना तीव्र क्रोध नहीं त्यागा।

श्लोक 76 (skanda.1.62.76)

अवष्टब्धावथ क्षिप्त्वा पादौ शंकरपाणिना॥ विपर्यस्तालका वेगाद्गन्तुमैच्छत शैलजा

avaṣṭabdhāvatha kṣiptvā pādau śaṁkarapāṇinā viparyastālakā vegādgantumaicchata śailajā

तब शंकर के हाथ से पकड़े गए दोनों पैरों को झटककर, अस्तव्यस्त अलकों वाली शैलजा वेगपूर्वक जाने की इच्छा करने लगी।

श्लोक 77 (skanda.1.62.77)

तस्यां व्रजन्त्यां कोपेन पुनराह पुरांतकः॥ सत्यं सर्वैरवयवैः सुतेति सदृशी पितुः

tasyāṁ vrajantyāṁ kopena punarāha purāṁtakaḥ satyaṁ sarvairavayavaiḥ suteti sadṛśī pituḥ

उसे जाती हुई देख, क्रोधवश पुरान्तक ने पुनः कहा — 'सचमुच, समस्त अंगों में तुम अपने पिता के ही समान हो —

श्लोक 78 (skanda.1.62.78)

हिमाचलस्य श्रृंगैस्तैर्मेघमालाकुलैर्मनः॥ तथा दुरवागाह्योऽसौ हृदयेभ्यस्तवाशयः

himācalasya śrṛṁgaistairmeghamālākulairmanaḥ tathā duravāgāhyo'sau hṛdayebhyastavāśayaḥ

जैसे हिमाचल के शिखर मेघ-मालाओं से आवृत रहते हैं, वैसे ही तुम्हारा अभिप्राय भी हृदयों के लिए दुर्बोध है।

श्लोक 79 (skanda.1.62.79)

काठिन्यं कष्टमस्मिंस्ते वनेभ्यो बहुधा गतम्॥ कुटिलत्वं नदीभ्यस्ते दुःसेव्यत्वं हिमादपि

kāṭhinyaṁ kaṣṭamasmiṁste vanebhyo bahudhā gatam kuṭilatvaṁ nadībhyaste duḥsevyatvaṁ himādapi

तुम्हारी यह कठोरता उसके वनों से बहुधा आई है; तुम्हारी कुटिलता उसकी नदियों से, और दुःसेव्यता उसकी हिम से भी अधिक है।

श्लोक 80 (skanda.1.62.80)

संक्रांतं सर्वमेवैतत्तव देवी हिमाचलात्॥ इत्युक्ता सा पुनः प्राह गिरिशं सैलजा तदा

saṁkrāṁtaṁ sarvamevaitattava devī himācalāt ityuktā sā punaḥ prāha giriśaṁ sailajā tadā

यह सब, हे देवी, तुम में हिमाचल से ही संक्रमित हुआ है।' यह कहे जाने पर शैलजा ने पुनः गिरीश से कहा —

श्लोक 81 (skanda.1.62.81)

कोपकंपितधूम्रास्या प्रस्फुरद्दशनच्छदा॥ मा शर्वात्मोपमानेन निंद त्वं गुणिनो जनान्

kopakaṁpitadhūmrāsyā prasphuraddaśanacchadā mā śarvātmopamānena niṁda tvaṁ guṇino janān

क्रोध से काँपते धूम्रवर्ण मुख वाली, फड़फड़ाते होंठों वाली — 'हे शर्व, अपनी ही उपमा से तुम गुणी जनों की निन्दा मत करो!

श्लोक 82 (skanda.1.62.82)

तवापि दुष्टसंपर्कात्संक्रांतं सर्वमेवहि॥ व्यालेभ्योऽनेकजिह्वत्वं भस्मनः स्नेहवन्ध्यता

tavāpi duṣṭasaṁparkātsaṁkrāṁtaṁ sarvamevahi vyālebhyo'nekajihvatvaṁ bhasmanaḥ snehavandhyatā

तुम में भी दुष्ट संगति से ही यह सब संक्रमित हुआ है — सर्पों से अनेक-जिह्वता, भस्म से स्नेह-शून्यता,

श्लोक 83 (skanda.1.62.83)

हृत्कालुष्यं शशांकात्ते दुर्बोधत्वं वृषादपि॥ अथवा बहुनोक्तेन अलं वाचा श्रमेण मे

hṛtkāluṣyaṁ śaśāṁkātte durbodhatvaṁ vṛṣādapi athavā bahunoktena alaṁ vācā śrameṇa me

चन्द्रमा से तुम्हारे हृदय की मलिनता, और वृषभ से भी दुर्बोधता। अथवा अधिक कहने से क्या — मुझे वाणी की इस थकान से पर्याप्त है।

श्लोक 84 (skanda.1.62.84)

श्मशानवास आसीस्त्वं नग्नत्वान्न तव त्रपा॥ निर्घृणत्वं कपालित्वादेवं कः शक्नुयात्तवं

śmaśānavāsa āsīstvaṁ nagnatvānna tava trapā nirghṛṇatvaṁ kapālitvādevaṁ kaḥ śaknuyāttavaṁ

श्मशान-निवास से तुममें नग्नता में लज्जा-हीनता आई, और कपाल-धारण से निर्दयता — तुम्हारे समान भला कौन हो सकता है?

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