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माहेश्वर खण्ड · अध्याय 9

समुद्र-मंथन तथा हलाहल विष

अध्याय 8अध्याय-सूचीअध्याय 10

श्लोक 1 (skanda.1.9.1)

॥लोमश उवाच॥ एकदा तु सभामध्य आस्थितो देवराट् स्वयम्॥ लोकपालैः परिवृतो देवैश्च ऋषिभिस्तथा

||lomaśa uvāca|| ekadā tu sabhāmadhya āsthito devarāṭ svayam|| lokapālaiḥ parivṛto devaiśca ṛṣibhistathā

लोमश जी ने कहा — एक बार सभा के मध्य स्वयं देवराज विराजमान थे, लोकपालों तथा देवों और ऋषियों से घिरे हुए,

श्लोक 2 (skanda.1.9.2)

अप्सरोगणसंवीतो गंधर्वैश्च पुरस्कृतः॥ उपगीयमानविजयः सिद्धविद्याधरैरपि

apsarogaṇasaṃvīto gaṃdharvaiśca puraskṛtaḥ|| upagīyamānavijayaḥ siddhavidyādharairapi

अप्सराओं के समूह से घिरे, गंधर्वों द्वारा सम्मानित, सिद्धों और विद्याधरों द्वारा भी अपनी विजय-गाथा गाई जाते हुए।

श्लोक 3 (skanda.1.9.3)

तदा शिष्यैः परिवृतो देवराजगुरुः सुधीः॥ आगतोऽसौ महाभागो बृहस्पति रुदारधीः

tadā śiṣyaiḥ parivṛto devarājaguruḥ sudhīḥ|| āgato'sau mahābhāgo bṛhaspati rudāradhīḥ

उसी समय अपने शिष्यों से घिरे हुए, देवराज के गुरु, विद्वान, महाभाग्यशाली, उदार बुद्धि वाले बृहस्पति वहाँ पधारे।

श्लोक 4 (skanda.1.9.4)

तं दृष्ट्वा सहसा देवाः प्रणेमुः समुपस्थिताः॥ इंद्रोपि ददृशे तत्र प्राप्तं वाचस्पतिं तदा

taṃ dṛṣṭvā sahasā devāḥ praṇemuḥ samupasthitāḥ|| iṃdropi dadṛśe tatra prāptaṃ vācaspatiṃ tadā

उन्हें देखकर उपस्थित देवता सहसा प्रणत हुए; इंद्र ने भी वहाँ पधारे वाचस्पति को देखा,

श्लोक 5 (skanda.1.9.5)

नोवाच किंचिद्दुर्मेधावचो मानुपुरःसरम्॥ नाह्वानं नासनं तस्य न विसर्जनमेव च

novāca kiṃciddurmedhāvaco mānupuraḥsaram|| nāhvānaṃ nāsanaṃ tasya na visarjanameva ca

किंतु मंदबुद्धि होकर उसने सत्कार के अनुरूप कुछ भी नहीं कहा — न आह्वान किया, न आसन दिया, न उचित विदाई ही।

श्लोक 6 (skanda.1.9.6)

शक्रं प्रमत्तं ज्ञात्वाथ मदाद्राज्यस्य दुर्मतिम्॥ तिरोधानमनुप्राप्तो बृहस्पती रुषान्वितः

śakraṃ pramattaṃ jñātvātha madādrājyasya durmatim|| tirodhānamanuprāpto bṛhaspatī ruṣānvitaḥ

शक्र को राज्य के मद से उन्मत्त और दुर्बुद्धि जानकर, क्रोध से भरे बृहस्पति अंतर्धान हो गए।

श्लोक 7 (skanda.1.9.7)

गते देवगुरौ तस्मिन्विमनस्काऽभवन्सुराः॥ यक्षा नागाः सगंधर्वा ऋषयोऽपि तथा द्विजाः

gate devagurau tasminvimanaskā'bhavansurāḥ|| yakṣā nāgāḥ sagaṃdharvā ṛṣayo'pi tathā dvijāḥ

देवगुरु के चले जाने पर देवता उदास हो गए — यक्ष, नाग, गंधर्व, ऋषि और द्विज भी।

श्लोक 8 (skanda.1.9.8)

गांधर्वस्या वसाने तु लब्धसंज्ञो हरिः सुरान्॥ पप्रच्छ त्वरितेनवै क्व गतो हि महातपाः

gāṃdharvasyā vasāne tu labdhasaṃjño hariḥ surān|| papraccha tvaritenavai kva gato hi mahātapāḥ

गंधर्व-गान के समाप्त होने पर सुध में आए इंद्र ने शीघ्रता से देवताओं से पूछा — "वे महातपस्वी कहाँ चले गए?"

श्लोक 9 (skanda.1.9.9)

तदैव नारदेनोक्तः शक्रो देवाधिपस्तथा॥ त्वया कृता ह्यवज्ञा च गुरोर्नस्त्यत्र संशयः

tadaiva nāradenoktaḥ śakro devādhipastathā|| tvayā kṛtā hyavajñā ca gurornastyatra saṃśayaḥ

उसी क्षण नारद ने देवाधिप शक्र से कहा — "तुमने गुरु का अनादर किया है, इसमें संशय नहीं।"

श्लोक 10 (skanda.1.9.10)

गुरोरवज्ञया राज्यं गतं ते बलसूदन॥ तस्मात्क्षमापनीयोऽसौ सर्वभावेन हि त्वया

guroravajñayā rājyaṃ gataṃ te balasūdana|| tasmātkṣamāpanīyo'sau sarvabhāvena hi tvayā

"हे बलसूदन! गुरु के अनादर से ही तुम्हारा राज्य चला गया; इसलिए तुम्हें पूरे हृदय से उन्हें प्रसन्न करना चाहिए।"

श्लोक 11 (skanda.1.9.11)

एतच्छ्रुत्वा वचस्तस्य नारदस्य महात्मनः॥ आसनात्सहसोत्थाय तैः सर्वैः परिवारितः॥ आगच्छत्त्वरया शक्रो गुरोर्गेहमतंद्रितः

etacchrutvā vacastasya nāradasya mahātmanaḥ|| āsanātsahasotthāya taiḥ sarvaiḥ parivāritaḥ|| āgacchattvarayā śakro gurorgehamataṃdritaḥ

महात्मा नारद का यह वचन सुनकर, आसन से सहसा उठकर, उन सबसे घिरे हुए शक्र आलस्य त्यागकर शीघ्र गुरु के घर पहुँचे।

श्लोक 12 (skanda.1.9.12)

पृष्ट्वा तारां प्रणम्यादौ क्व गतो हि महातपाः॥ न जानामीत्युवाचेदं तारा शक्रं निरीक्षती

pṛṣṭvā tārāṃ praṇamyādau kva gato hi mahātapāḥ|| na jānāmītyuvācedaṃ tārā śakraṃ nirīkṣatī

पहले तारा को प्रणाम कर उन्होंने पूछा — "महातपस्वी कहाँ चले गए?" तारा ने शक्र की ओर देखते हुए कहा — "मुझे नहीं पता।"

श्लोक 13 (skanda.1.9.13)

तदा चिंतान्वितो भूत्वा शक्रः स्वगृहमाव्रजत्॥ एतस्मिन्नंतरे स्वर्गे ह्यनिष्टान्द्भुतानि च

tadā ciṃtānvito bhūtvā śakraḥ svagṛhamāvrajat|| etasminnaṃtare svarge hyaniṣṭāndbhutāni ca

तब चिंतायुक्त होकर शक्र अपने घर लौट आए। इसी बीच स्वर्ग में अनिष्ट-सूचक अद्भुत घटनाएँ होने लगीं,

श्लोक 14 (skanda.1.9.14)

अभवन्सर्वदुःखार्थे शक्रस्य च महात्मनः॥ पातालस्थेन बलिना ज्ञातं शक्रस्य चेष्टितम्

abhavansarvaduḥkhārthe śakrasya ca mahātmanaḥ|| pātālasthena balinā jñātaṃ śakrasya ceṣṭitam

जो महात्मा शक्र के लिए दुःखदायी बन गईं। पाताल में स्थित बलि को शक्र की यह दशा ज्ञात हो गई।

श्लोक 15 (skanda.1.9.15)

ययौ दैत्यैः परिवृतः पातालादमरावतीम्॥ तदा युद्धमतीवासीद्देवानां दानवैः सह

yayau daityaiḥ parivṛtaḥ pātālādamarāvatīm|| tadā yuddhamatīvāsīddevānāṃ dānavaiḥ saha

दैत्यों से घिरा हुआ वह पाताल से अमरावती की ओर गया; तब देवताओं और दानवों में भीषण युद्ध हुआ।

श्लोक 16 (skanda.1.9.16)

देवाः पराजिता दैत्यै राज्यं शक्रस्य तत्क्षणात्॥ संप्राप्तं सकलं तस्य मूढस्य च दुरात्मनः

devāḥ parājitā daityai rājyaṃ śakrasya tatkṣaṇāt|| saṃprāptaṃ sakalaṃ tasya mūḍhasya ca durātmanaḥ

देवता दैत्यों से पराजित हो गए, और शक्र का समस्त राज्य उसी क्षण उस मूढ़ दुरात्मा को प्राप्त हो गया।

श्लोक 17 (skanda.1.9.17)

नीतं सर्वप्रयत्नेन पातालं त्वरितं गताः॥ शुक्रप्रसादात्ते सर्वे तथा विजयिनोऽभवन्

nītaṃ sarvaprayatnena pātālaṃ tvaritaṃ gatāḥ|| śukraprasādātte sarve tathā vijayino'bhavan

पूरे प्रयत्न से वह शीघ्रता से पाताल ले जाया गया; शुक्राचार्य की कृपा से वे सब विजयी हुए।

श्लोक 18 (skanda.1.9.18)

शक्रोऽपि निःश्रिको जातो देवैस्त्यक्तस्ततो भृशम्॥ देवी तिरोधानगता बभूव कमलेक्षणा

śakro'pi niḥśriko jāto devaistyaktastato bhṛśam|| devī tirodhānagatā babhūva kamalekṣaṇā

शक्र भी श्रीहीन हो गए, देवताओं द्वारा पूर्णतः त्यागे गए; कमलनयनी देवी (शची) भी अदृश्य हो गईं।

श्लोक 19 (skanda.1.9.19)

ऐरावतो महानागस्तथैवोच्चैःश्रवा हयः॥ एवमादीनि रत्नानि अनेकानि बहून्यपि॥ नीतानि सहसा दैत्यैर्लोभादसाधुवृत्तिभिः

airāvato mahānāgastathaivoccaiḥśravā hayaḥ|| evamādīni ratnāni anekāni bahūnyapi|| nītāni sahasā daityairlobhādasādhuvṛttibhiḥ

ऐरावत गजराज, वैसे ही उच्चैःश्रवा अश्व — ऐसे अनेक रत्न लोभी और दुराचारी दैत्यों द्वारा सहसा ले जाए गए।

श्लोक 20 (skanda.1.9.20)

पुण्यभांजि च तान्येव पतितानि च सागरे॥ तदा स विस्मयाविष्टो बलिराह गुरुं प्रति

puṇyabhāṃji ca tānyeva patitāni ca sāgare|| tadā sa vismayāviṣṭo balirāha guruṃ prati

किंतु वे पुण्यवान रत्न ही समुद्र में जा गिरे। तब विस्मित होकर बलि ने अपने गुरु से कहा —

श्लोक 21 (skanda.1.9.21)

देवान्निर्जित्य चास्माभिरानीतानि बहूनि च॥ रत्नानि तु समुद्रेऽथ पतितानि तदद्भुतम्

devānnirjitya cāsmābhirānītāni bahūni ca|| ratnāni tu samudre'tha patitāni tadadbhutam

"देवताओं को जीतकर हमने अनेक रत्न ले लिए, फिर भी वे रत्न समुद्र में जा गिरे — यह तो बड़ा आश्चर्य है।"

श्लोक 22 (skanda.1.9.22)

बलेस्तद्वचनं श्रुत्वा उशना प्रत्युवाच तम्॥ अश्वमेधशतेनैव सुरराज्यं भविष्यति॥ दीक्षितस्य न संदेहस्तस्माद्भोक्त स एव च

balestadvacanaṃ śrutvā uśanā pratyuvāca tam|| aśvamedhaśatenaiva surarājyaṃ bhaviṣyati|| dīkṣitasya na saṃdehastasmādbhokta sa eva ca

बलि के इस वचन को सुनकर उशना (शुक्राचार्य) ने उससे कहा — "सौ अश्वमेध यज्ञों से ही देवराज्य प्राप्त होगा; जो दीक्षित होगा, वही निस्संदेह उसका भोक्ता बनेगा।"

श्लोक 23 (skanda.1.9.23)

अश्वमेधं विना किंचित्स्वर्गं भोक्तं न पार्यते

aśvamedhaṃ vinā kiṃcitsvargaṃ bhoktaṃ na pāryate

"अश्वमेध के बिना कोई भी स्वर्ग-सुख नहीं भोग सकता।"

श्लोक 24 (skanda.1.9.24)

गुरोर्वचनमाज्ञाय तूष्णींभूतो बलिस्ततः॥ बभूव देवैः सार्द्धं च यथोचितमकारयत्

gurorvacanamājñāya tūṣṇīṃbhūto balistataḥ|| babhūva devaiḥ sārddhaṃ ca yathocitamakārayat

गुरु के इस वचन को समझकर बलि तब मौन हो गया और देवताओं के साथ यथोचित व्यवहार करने लगा।

श्लोक 25 (skanda.1.9.25)

इन्द्रोपि शोच्यतां प्राप्तो जगाम परमेष्ठिनम्.॥ विज्ञापयामास तथा सर्वं राज्यभयादिकम्

indropi śocyatāṃ prāpto jagāma parameṣṭhinam.|| vijñāpayāmāsa tathā sarvaṃ rājyabhayādikam

इंद्र भी दयनीय दशा को प्राप्त होकर परमेष्ठी (ब्रह्मा) के पास गए और अपने राज्य-भय की सारी बात निवेदित की।

श्लोक 26 (skanda.1.9.26)

शक्रस्य वचनं श्रुत्वा परमेष्ठी उवाच ह

śakrasya vacanaṃ śrutvā parameṣṭhī uvāca ha

शक्र का यह वचन सुनकर परमेष्ठी ने कहा —

श्लोक 27 (skanda.1.9.27)

संमिलित्वा सुरान्सर्वांस्त्वया साकं त्वरान्विताः॥ आराधनार्थं गच्छामो विष्णुं सर्वेश्वरेश्वरम्

saṃmilitvā surānsarvāṃstvayā sākaṃ tvarānvitāḥ|| ārādhanārthaṃ gacchāmo viṣṇuṃ sarveśvareśvaram

"समस्त देवताओं को एकत्र कर, तुम्हारे साथ शीघ्रतापूर्वक, हम आराधना के लिए सर्वेश्वरेश्वर विष्णु के पास चलें।"

श्लोक 28 (skanda.1.9.28)

तथेति गत्वा ते सर्वे शक्राद्या लोकपालकाः॥ ब्रह्माणं च पुरस्कृत्य तटं क्षीरार्णवस्य च॥ प्राप्योपविश्य ते सर्वे हरिं स्तोतुं प्रचक्रमुः

tatheti gatvā te sarve śakrādyā lokapālakāḥ|| brahmāṇaṃ ca puraskṛtya taṭaṃ kṣīrārṇavasya ca|| prāpyopaviśya te sarve hariṃ stotuṃ pracakramuḥ

"ऐसा ही हो" कहकर वे सभी शक्र आदि लोकपाल गए; ब्रह्मा को आगे रखकर क्षीरसागर के तट पर पहुँचकर वे सब बैठकर हरि की स्तुति करने लगे।

श्लोक 29 (skanda.1.9.29)

॥ब्रह्मोवाच॥ देवदेव जगान्नाथ सुरासुरनमस्कृत॥ पुण्यश्लोकाव्ययानंत परमात्मन्नमोऽस्तु ते

||brahmovāca|| devadeva jagānnātha surāsuranamaskṛta|| puṇyaślokāvyayānaṃta paramātmannamo'stu te

ब्रह्मा ने कहा — "हे देवाधिदेव, हे जगन्नाथ, सुर-असुरों द्वारा नमस्कृत, पुण्यश्लोक, अव्यय, अनंत, परमात्मन्, आपको नमस्कार है।"

श्लोक 30 (skanda.1.9.30)

यज्ञोऽसि यज्ञरूपोऽसि यज्ञांगोऽसि रमापते॥ ततोऽद्य कृपया विष्णो देवानां वरदो भव

yajño'si yajñarūpo'si yajñāṃgo'si ramāpate|| tato'dya kṛpayā viṣṇo devānāṃ varado bhava

"आप यज्ञ हैं, आप यज्ञ-स्वरूप हैं, आप यज्ञ के अंग हैं, हे रमापते; इसलिए आज कृपापूर्वक, हे विष्णु, देवताओं के वरदाता बनिए।"

श्लोक 31 (skanda.1.9.31)

गुरोरवज्ञया चाद्य भ्रष्टराज्यः शतक्रतुः॥ जातः सुरर्षिभिः साकं तस्मादेनं समुद्धर

guroravajñayā cādya bhraṣṭarājyaḥ śatakratuḥ|| jātaḥ surarṣibhiḥ sākaṃ tasmādenaṃ samuddhara

"गुरु के अनादर से आज शतक्रतु (इंद्र) देवर्षियों सहित राज्यभ्रष्ट हो गया है; इसलिए इसका उद्धार कीजिए।"

श्लोक 32 (skanda.1.9.32)

॥श्रीभगवानुवाच॥ दुकोकलज्ञया सर्वं नस्यतीति किमद्भुतम्॥ ये पापिनो ह्यधर्मिष्ठाः केवलं विषयात्मकाः॥ पितरौ निंदितौ यैश्च निर्दैवात्वेन संशयः

||śrībhagavānuvāca|| dukokalajñayā sarvaṃ nasyatīti kimadbhutam|| ye pāpino hyadharmiṣṭhāḥ kevalaṃ viṣayātmakāḥ|| pitarau niṃditau yaiśca nirdaivātvena saṃśayaḥ

श्रीभगवान ने कहा — "अज्ञान की मूर्खता से सब कुछ नष्ट हो जाता है, इसमें क्या आश्चर्य? जो पापी, अधर्मी, केवल विषयासक्त हैं, जिन्होंने अपने माता-पिता (गुरुजनों) की निंदा की है, उनका पतन निश्चित है, इसमें संशय नहीं।"

श्लोक 33 (skanda.1.9.33)

अनेन यत्कृतं ब्रह्मन्सद्यस्तत्फलमागतम्॥ कर्मणा चास्य शक्रस्य सर्वेषां संकटागमः

anena yatkṛtaṃ brahmansadyastatphalamāgatam|| karmaṇā cāsya śakrasya sarveṣāṃ saṃkaṭāgamaḥ

"हे ब्रह्मन्! इसने जो कुछ किया, उसका फल इसे शीघ्र ही मिल गया; इसी के कर्म से शक्र सहित तुम सबके लिए संकट आ पड़ा।"

श्लोक 34 (skanda.1.9.34)

विपरीतो यदा कालः पुरुषस्य भवेत्तदा॥ भूतमैत्रीं प्रकुर्वंति सर्वकार्यार्थसिद्धये

viparīto yadā kālaḥ puruṣasya bhavettadā|| bhūtamaitrīṃ prakurvaṃti sarvakāryārthasiddhaye

"जब मनुष्य का समय प्रतिकूल हो जाता है, तब वह अपने सभी कार्यों की सिद्धि के लिए (छोटे-बड़े) प्राणियों से भी मैत्री करता है।"

श्लोक 35 (skanda.1.9.35)

तेन वै कारणेनेंद्र मदीयं वचनं कुरु॥ कार्यहेतोस्त्वया कार्यो दैत्यैः सह समागमः

tena vai kāraṇeneṃdra madīyaṃ vacanaṃ kuru|| kāryahetostvayā kāryo daityaiḥ saha samāgamaḥ

"इसी कारण से, हे इंद्र, मेरी बात मानो; अपने कार्य की सिद्धि के लिए तुम्हें दैत्यों के साथ मेल-मिलाप करना चाहिए।"

श्लोक 36 (skanda.1.9.36)

एवं भगवतादिष्टः शक्रः परमबुद्धिमान्॥ अमरावतीं ययौ हित्वा सुतलं दैवतैः सह

evaṃ bhagavatādiṣṭaḥ śakraḥ paramabuddhimān|| amarāvatīṃ yayau hitvā sutalaṃ daivataiḥ saha

इस प्रकार भगवान द्वारा आदिष्ट होकर, परम बुद्धिमान शक्र अमरावती त्यागकर देवताओं सहित सुतल गए।

श्लोक 37 (skanda.1.9.37)

इन्द्रं समागतं श्रुत्वा इंद्रसेनो रुषान्वितः॥ बभूव सह सैन्येन हंतुकामः पुरंदरम्

indraṃ samāgataṃ śrutvā iṃdraseno ruṣānvitaḥ|| babhūva saha sainyena haṃtukāmaḥ puraṃdaram

इंद्र के आगमन को सुनकर क्रोध से भरा इंद्रसेन (बलि) अपनी सेना सहित पुरंदर का वध करने को उद्यत हुआ।

श्लोक 38 (skanda.1.9.38)

नारदेन तदा दैत्या बलिश्च बलिनां वरः॥ निवारितस्तद्वधाच्च वाक्यैरुच्चावचैस्तथा

nāradena tadā daityā baliśca balināṃ varaḥ|| nivāritastadvadhācca vākyairuccāvacaistathā

तब नारद ने कठोर और मृदु दोनों प्रकार के वचनों से दैत्यों और बलवानों में श्रेष्ठ बलि को उसके वध से रोक दिया।

श्लोक 39 (skanda.1.9.39)

ऋषेस्तस्यैव वचनात्त्यक्तमन्युर्बलिस्तदा॥ बभूव सह सैन्येन आगतो हि शतक्रतुः

ṛṣestasyaiva vacanāttyaktamanyurbalistadā|| babhūva saha sainyena āgato hi śatakratuḥ

उसी ऋषि के वचन से क्रोध त्यागकर बलि ने तब अपनी सेना सहित आए हुए शतक्रतु का स्वागत किया।

श्लोक 40 (skanda.1.9.40)

इन्द्रसेनेन दृष्टोऽसौ लोकपालैः समावृतः॥ उवाच त्वरया युक्तः प्रहसन्निव दैत्यराट्

indrasenena dṛṣṭo'sau lokapālaiḥ samāvṛtaḥ|| uvāca tvarayā yuktaḥ prahasanniva daityarāṭ

लोकपालों से घिरे हुए इंद्र को देखकर वह दैत्यराज शीघ्रता से, मानो हँसते हुए, बोला —

श्लोक 41 (skanda.1.9.41)

कस्मादिहागतः शक्र सुतलं प्रति कथ्यताम्॥ तस्यैतद्वचनं श्रुत्वा स्मयमान उवाचतम्.। वयं कश्यपदायादा यूयं सर्वे तथैव च॥ यथा वयं तथा यूयं विग्रहो हि निरर्थकः

kasmādihāgataḥ śakra sutalaṃ prati kathyatām|| tasyaitadvacanaṃ śrutvā smayamāna uvācatam.| vayaṃ kaśyapadāyādā yūyaṃ sarve tathaiva ca|| yathā vayaṃ tathā yūyaṃ vigraho hi nirarthakaḥ

"हे शक्र, यहाँ सुतल में क्यों आए हो, बताओ।" उसका यह वचन सुनकर मुस्कुराते हुए उसने कहा — "हम दोनों कश्यप की ही संतान हैं; जैसे हम हैं, वैसे ही तुम हो, यह विग्रह व्यर्थ है।"

श्लोक 42 (skanda.1.9.42)

मम राज्यं क्षणेनैव नीतं दैववशात्तवया॥ तथा ह्येतानि तान्येन रत्नानि सुबहून्यपि॥ गतानि तत्क्षणादेव यत्नानीतानि वै त्वया

mama rājyaṃ kṣaṇenaiva nītaṃ daivavaśāttavayā|| tathā hyetāni tānyena ratnāni subahūnyapi|| gatāni tatkṣaṇādeva yatnānītāni vai tvayā

"मेरा राज्य दैववश तुमने क्षणभर में ले लिया; उसी प्रकार मेरे वे बहुत से रत्न भी, जो प्रयत्नपूर्वक जुटाए गए थे, उसी क्षण तुमसे चले गए।"

श्लोक 43 (skanda.1.9.43)

तस्माद्विमर्शः कर्तव्यः पुरुषेण विपश्चिता॥ विमर्शज्जायते ज्ञानं ज्ञानान्मोक्षो भविष्यति

tasmādvimarśaḥ kartavyaḥ puruṣeṇa vipaścitā|| vimarśajjāyate jñānaṃ jñānānmokṣo bhaviṣyati

"इसलिए बुद्धिमान पुरुष को विचार करना चाहिए; विचार से ज्ञान उत्पन्न होता है, और ज्ञान से मोक्ष प्राप्त होगा।"

श्लोक 44 (skanda.1.9.44)

किं तु मे बत उक्तेन जाने न च तवाग्रतः॥ शरणार्थी ह्यहं प्राप्तः सुरैः सह तवांतिकम्

kiṃ tu me bata uktena jāne na ca tavāgrataḥ|| śaraṇārthī hyahaṃ prāptaḥ suraiḥ saha tavāṃtikam

"किंतु अधिक कहने से क्या लाभ — मुझे तुम्हारे सामने कुछ नहीं करना है; मैं देवताओं सहित शरण के लिए ही तुम्हारे पास आया हूँ।"

श्लोक 45 (skanda.1.9.45)

एतच्छ्रुत्वा तु शक्रस्य वाक्यं वाक्यविदां वरः॥ प्रहस्योवाच मतिमाञ्छक्रं प्रति विदां वरः

etacchrutvā tu śakrasya vākyaṃ vākyavidāṃ varaḥ|| prahasyovāca matimāñchakraṃ prati vidāṃ varaḥ

शक्र के इस वचन को सुनकर वाणी-विदों में श्रेष्ठ, बुद्धिमान बलि ने हँसते हुए शक्र से कहा —

श्लोक 46 (skanda.1.9.46)

त्वमागतोसि देवेंद्र किमर्थं तन्न वेद्मयहम्

tvamāgatosi deveṃdra kimarthaṃ tanna vedmayaham

"हे देवेंद्र, तुम आए तो हो, पर किसलिए, यह मुझे ज्ञात नहीं है।"

श्लोक 47 (skanda.1.9.47)

शक्रस्तद्वचनं श्रुत्वा ह्यश्रुपूर्णाकुलेक्षणः॥ किंचिन्नोवाच तत्रैनं नारदो वाक्यमब्रवीत्

śakrastadvacanaṃ śrutvā hyaśrupūrṇākulekṣaṇaḥ|| kiṃcinnovāca tatrainaṃ nārado vākyamabravīt

शक्र यह वचन सुनकर, आँसुओं से भरे व्याकुल नेत्रों से, वहाँ कुछ न बोल सका; तब नारद ने यह वचन कहा —

श्लोक 48 (skanda.1.9.48)

बले त्वं किं न जानासि कार्याकार्यविचारणाम्॥ धर्मो हि महतामेष शरणागतपालनम्

bale tvaṃ kiṃ na jānāsi kāryākāryavicāraṇām|| dharmo hi mahatāmeṣa śaraṇāgatapālanam

"हे बलि, क्या तुम कार्य-अकार्य का विचार नहीं जानते? महापुरुषों का यही धर्म है — शरणागत की रक्षा करना।"

श्लोक 49 (skanda.1.9.49)

शरणागतं च विप्रं च रोगिणं वृद्धमेव च॥ यएतान्न च रक्षंति ते वै ब्रह्महणो नराः

śaraṇāgataṃ ca vipraṃ ca rogiṇaṃ vṛddhameva ca|| yaetānna ca rakṣaṃti te vai brahmahaṇo narāḥ

"जो शरणागत, ब्राह्मण, रोगी और वृद्ध की रक्षा नहीं करते, वे मनुष्य निश्चय ही ब्रह्महत्यारे हैं।"

श्लोक 50 (skanda.1.9.50)

शरणागतशब्देन आगतस्तव सन्निधौ॥ संरक्षणाय योग्यश्च त्वया नास्त्यत्र संशयः॥ एवमुक्तो नारदेन तदा दैत्यपतिः स्वयम्

śaraṇāgataśabdena āgatastava sannidhau|| saṃrakṣaṇāya yogyaśca tvayā nāstyatra saṃśayaḥ|| evamukto nāradena tadā daityapatiḥ svayam

"'शरणागत' इस शब्द के साथ ही वह तुम्हारे पास आया है; निश्चय ही वह तुम्हारे द्वारा रक्षा किए जाने योग्य है।" नारद द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर स्वयं दैत्यपति ने,

श्लोक 51 (skanda.1.9.51)

विमृश्य परया बुद्ध्या कार्याकार्यविचारणाम्॥ शक्रं प्रपूजयामास बहुमानपुरःसरम्॥ लोकपालैः समेतं च तथा सुरगणैः सह

vimṛśya parayā buddhyā kāryākāryavicāraṇām|| śakraṃ prapūjayāmāsa bahumānapuraḥsaram|| lokapālaiḥ sametaṃ ca tathā suragaṇaiḥ saha

परम बुद्धि से कार्य-अकार्य का विचार कर, लोकपालों तथा देवगणों सहित शक्र का बड़े सम्मान के साथ सत्कार किया।

श्लोक 52 (skanda.1.9.52)

प्रत्ययार्थं च सत्त्वानि ह्यनेकानि व्रतानि वै॥ बलिप्रत्ययभूतानि स चकारः पुरंदरः

pratyayārthaṃ ca sattvāni hyanekāni vratāni vai|| balipratyayabhūtāni sa cakāraḥ puraṃdaraḥ

और, विश्वास दिलाने के लिए, पुरंदर ने बलि के प्रति विश्वास-स्वरूप अनेक व्रत और प्रतिज्ञाएँ कीं।

श्लोक 53 (skanda.1.9.53)

एवं स समयं कृत्वा शक्रः स्वार्थपरायणः॥ बलिना सह चावासीदर्थशास्त्रपरो महान्

evaṃ sa samayaṃ kṛtvā śakraḥ svārthaparāyaṇaḥ|| balinā saha cāvāsīdarthaśāstraparo mahān

इस प्रकार वह प्रतिज्ञा कर, अपने स्वार्थ में तत्पर शक्र, अर्थशास्त्र में निपुण महान बलि के साथ रहने लगा।

श्लोक 54 (skanda.1.9.54)

एवं निवसतस्तस्य सुतलेऽपि शतक्रतोः॥ वत्सरा बहवो ह्यासंस्तदा बुद्धिमकल्पयत्॥ संस्मृत्य वचनं विष्णोर्विमृश्य च पुनःपुनः

evaṃ nivasatastasya sutale'pi śatakratoḥ|| vatsarā bahavo hyāsaṃstadā buddhimakalpayat|| saṃsmṛtya vacanaṃ viṣṇorvimṛśya ca punaḥpunaḥ

इस प्रकार सुतल में रहते हुए शतक्रतु को बहुत वर्ष बीत गए; तब उसने विष्णु के वचन को बार-बार स्मरण और विचार कर एक योजना बनाई।

श्लोक 55 (skanda.1.9.55)

एकदा तु सभामध्य आसीनो देवराट्स्वयम्॥ उवाच प्रहसन्वाक्यं बलिमुद्दिश्य नीतिमान्

ekadā tu sabhāmadhya āsīno devarāṭsvayam|| uvāca prahasanvākyaṃ balimuddiśya nītimān

एक बार सभा के मध्य स्वयं बैठे हुए, नीतिज्ञ देवराज ने बलि की ओर संकेत कर हँसते हुए यह कहा —

श्लोक 56 (skanda.1.9.56)

प्राप्तव्यानि त्वया वीर अस्माकं च त्वया बले॥ गजादीनि बहून्येव रत्नानि विविधानि च

prāptavyāni tvayā vīra asmākaṃ ca tvayā bale|| gajādīni bahūnyeva ratnāni vividhāni ca

"हे वीर बलि, हम दोनों को गज आदि तथा नाना प्रकार के बहुत से रत्न प्राप्त होने वाले थे —"

श्लोक 57 (skanda.1.9.57)

गतानि तत्क्षणादेव सागरे पतितानि वै॥ प्रयत्नो हि प्रकर्तव्यो ह्यस्माभिस्त्वयान्वितैः

gatāni tatkṣaṇādeva sāgare patitāni vai|| prayatno hi prakartavyo hyasmābhistvayānvitaiḥ

"— वे सब उसी क्षण समुद्र में जा गिरे। इसलिए हमें, तुम्हारे साथ मिलकर, प्रयत्न करना चाहिए।"

श्लोक 58 (skanda.1.9.58)

तेषां चोद्धरणे दैत्य रत्नानामिह सागरात्॥ तर्हि निर्मथनं कार्यं भवता कार्यसिद्धये

teṣāṃ coddharaṇe daitya ratnānāmiha sāgarāt|| tarhi nirmathanaṃ kāryaṃ bhavatā kāryasiddhaye

"हे दैत्य, समुद्र से उन रत्नों को निकालने के लिए, कार्य-सिद्धि हेतु तुम्हें मंथन करना चाहिए।"

श्लोक 59 (skanda.1.9.59)

बलिः प्रवर्तितस्तेन शक्रेण सुरसूदनः॥ उवाच शक्रं त्वरितः केनेदं मथनं भवेत्

baliḥ pravartitastena śakreṇa surasūdanaḥ|| uvāca śakraṃ tvaritaḥ kenedaṃ mathanaṃ bhavet

इस प्रकार शक्र द्वारा प्रेरित बलि ने शीघ्रता से शक्र से पूछा — "यह मंथन किससे होगा?"

श्लोक 60 (skanda.1.9.60)

तदा नभोगता वाणी मेघगंभीरनिःस्वना॥ उवाच देवा दैत्याश्च मंथध्वं क्षीरसागरम्

tadā nabhogatā vāṇī meghagaṃbhīraniḥsvanā|| uvāca devā daityāśca maṃthadhvaṃ kṣīrasāgaram

तब आकाश से मेघ के समान गंभीर ध्वनि वाली एक वाणी हुई — "हे देवो और दैत्यो, क्षीरसागर का मंथन करो;"

श्लोक 61 (skanda.1.9.61)

भवतां बलवृद्धिश्च भविष्यति न संशयः

bhavatāṃ balavṛddhiśca bhaviṣyati na saṃśayaḥ

"तुम्हारा बल अवश्य बढ़ेगा, इसमें संशय नहीं।"

श्लोक 62 (skanda.1.9.62)

मंदरं चैव मंथानं रज्जुं कुरुत वासुकिम्॥ पश्चाद्देवाश्च दैत्याश्च मेलयित्वा विमथ्यताम्

maṃdaraṃ caiva maṃthānaṃ rajjuṃ kuruta vāsukim|| paścāddevāśca daityāśca melayitvā vimathyatām

"मंदराचल को मथानी और वासुकि को रस्सी बनाओ; फिर देवता और दैत्य मिलकर मंथन करें।"

श्लोक 63 (skanda.1.9.63)

नभोगतां च तां वाणीं निशम्याथ तदाःसुराः॥ दैत्यैः सार्द्धं ततः सर्व उद्यमं चक्रुरुद्यताः

nabhogatāṃ ca tāṃ vāṇīṃ niśamyātha tadāḥsurāḥ|| daityaiḥ sārddhaṃ tataḥ sarva udyamaṃ cakrurudyatāḥ

आकाशवाणी सुनकर उन देवताओं ने दैत्यों के साथ मिलकर तुरंत उद्यम आरंभ कर दिया।

श्लोक 64 (skanda.1.9.64)

पातालान्निर्गताः सर्वे तदा तेऽथ सुरासुराः॥ आजग्मुरतुलं सर्वे मंदरं पर्वतोत्तमम्

pātālānnirgatāḥ sarve tadā te'tha surāsurāḥ|| ājagmuratulaṃ sarve maṃdaraṃ parvatottamam

पाताल से निकलकर वे सभी देव-दानव अतुलनीय श्रेष्ठ पर्वत मंदराचल पर आ पहुँचे।

श्लोक 65 (skanda.1.9.65)

दैत्याश्च कोटिसंख्याकास्तथा देवा न संशयः॥ उद्युक्ताः सहसा प्राऽयुर्मंदरं कनकप्रभम्

daityāśca koṭisaṃkhyākāstathā devā na saṃśayaḥ|| udyuktāḥ sahasā prā'yurmaṃdaraṃ kanakaprabham

करोड़ों संख्या में दैत्य और देवता, इसमें संशय नहीं, उत्साहपूर्वक तुरंत ही स्वर्णप्रभ मंदराचल पर पहुँच गए,

श्लोक 66 (skanda.1.9.66)

सरत्नं वर्तुलाकारं स्थूलं चैव महाप्रभम्॥ अनेकरत्नसंवीतं नानाद्रुमनिषेवितम्

saratnaṃ vartulākāraṃ sthūlaṃ caiva mahāprabham|| anekaratnasaṃvītaṃ nānādrumaniṣevitam

रत्नों से सज्जित, गोलाकार, विशाल और महाप्रभावशाली, अनेक रत्नों से घिरा और नाना वृक्षों से सेवित,

श्लोक 67 (skanda.1.9.67)

चंदनैः पारिजातैश्च नागपुन्नागचंपकैः॥ नानामृगगणाकीर्णं सिंहशार्दूलसेवितम्

caṃdanaiḥ pārijātaiśca nāgapunnāgacaṃpakaiḥ|| nānāmṛgagaṇākīrṇaṃ siṃhaśārdūlasevitam

चंदन, पारिजात, नाग, पुन्नाग और चंपक वृक्षों से युक्त, नाना मृगों से भरा, सिंह-व्याघ्रों से सेवित उस पर्वत को —

श्लोक 68 (skanda.1.9.68)

महाशैलं दृष्ट्वा ते सुरसत्तमाः॥ ऊचुः प्रांजलयः सर्वे तदा ते सुरसत्तमाः

mahāśailaṃ dṛṣṭvā te surasattamāḥ|| ūcuḥ prāṃjalayaḥ sarve tadā te surasattamāḥ

उस महाशैल को देखकर वे सब श्रेष्ठ देवगण हाथ जोड़कर बोले।

श्लोक 69 (skanda.1.9.69)

॥देवा ऊचुः॥ अद्रे सुरा वयं सर्वे विज्ञप्तुमिह चागताः॥ तच्छृणुष्व महाशैल परेषामुपकारकः

||devā ūcuḥ|| adre surā vayaṃ sarve vijñaptumiha cāgatāḥ|| tacchṛṇuṣva mahāśaila pareṣāmupakārakaḥ

देवताओं ने कहा — "हे पर्वत! हम सभी देव यहाँ निवेदन करने आए हैं; हे महाशैल, दूसरों के उपकारी, यह सुनिए।"

श्लोक 70 (skanda.1.9.70)

एवमुक्तस्तदा शैलो दवैर्दैत्यैः स मंदरः॥ उवाच निःसृतो भूत्वा परं विग्रहवान्वचः

evamuktastadā śailo davairdaityaiḥ sa maṃdaraḥ|| uvāca niḥsṛto bhūtvā paraṃ vigrahavānvacaḥ

इस प्रकार कहे जाने पर वह पर्वत मंदराचल शरीर धारण कर, बाहर आकर, आगे यह वचन बोला —

श्लोक 71 (skanda.1.9.71)

तेन रूपेण रूपी स पर्वतो मंदराचलः॥ किमर्थमागताः सर्वे मत्समीपं तदुच्यताम्

tena rūpeṇa rūpī sa parvato maṃdarācalaḥ|| kimarthamāgatāḥ sarve matsamīpaṃ taducyatām

उसी रूप में शरीरधारी बना वह पर्वत मंदराचल बोला — "तुम सब मेरे पास किसलिए आए हो, यह कहो।"

श्लोक 72 (skanda.1.9.72)

तदा बलिरुवाचेदं प्रस्तावसदृशं वचः॥ इंद्रोपि त्वरया युक्तो बभाषे सूनृतं वचः

tadā baliruvācedaṃ prastāvasadṛśaṃ vacaḥ|| iṃdropi tvarayā yukto babhāṣe sūnṛtaṃ vacaḥ

तब बलि ने अवसर के अनुरूप यह वचन कहा; इंद्र ने भी शीघ्रता से सत्य और मधुर वचन कहा —

श्लोक 73 (skanda.1.9.73)

अस्माभिः सह कार्यार्थे भव त्वं मंदराचल॥ अमृतोत्पादनार्थे त्वं मंथानं भव सुव्रत

asmābhiḥ saha kāryārthe bhava tvaṃ maṃdarācala|| amṛtotpādanārthe tvaṃ maṃthānaṃ bhava suvrata

"हे मंदराचल, हमारे इस कार्य में सहायक बनो; हे सुव्रत, अमृत उत्पन्न करने के लिए तुम मथानी बनो।"

श्लोक 74 (skanda.1.9.74)

तथेति मत्वा तद्वाक्यं देवानां कार्यसिद्धये॥ ऊचे देवासुरांश्चेदमिन्द्रं प्रति विशेषतः

tatheti matvā tadvākyaṃ devānāṃ kāryasiddhaye|| ūce devāsurāṃścedamindraṃ prati viśeṣataḥ

देवताओं के कार्य की सिद्धि के लिए इसे स्वीकार कर, उसने देवों और असुरों से, विशेष रूप से इंद्र को संबोधित कर कहा —

श्लोक 75 (skanda.1.9.75)

छेदितौ च त्वया पक्षौ वज्रेण शतपर्वणा॥ गंतुं कथं समर्थोऽहं भवतां कार्यसिद्धये

cheditau ca tvayā pakṣau vajreṇa śataparvaṇā|| gaṃtuṃ kathaṃ samartho'haṃ bhavatāṃ kāryasiddhaye

"मेरे दोनों पंख तुमने ही शतपर्वा वज्र से काटे थे; फिर मैं तुम्हारे कार्य की सिद्धि के लिए जाने में कैसे समर्थ हो सकता हूँ?"

श्लोक 76 (skanda.1.9.76)

तदा देवासुराः सर्वे स्तूयमाना महाचलम्॥ उत्पाटयेयुरतुलं मंदरं च ततोद्भुतम्

tadā devāsurāḥ sarve stūyamānā mahācalam|| utpāṭayeyuratulaṃ maṃdaraṃ ca tatodbhutam

तब समस्त देव-असुरों ने उस अतुलनीय अद्भुत महापर्वत की स्तुति करते हुए उसे उखाड़ लिया।

श्लोक 77 (skanda.1.9.77)

क्षीरार्णवं नेतुकामा ह्यशक्तास्ते ततोऽभवन्॥ पर्वतः पतितः सद्यो देवदैत्योपरि ध्रुवम्

kṣīrārṇavaṃ netukāmā hyaśaktāste tato'bhavan|| parvataḥ patitaḥ sadyo devadaityopari dhruvam

उसे क्षीरसागर तक ले जाने की इच्छा से वे असमर्थ हो गए; वह पर्वत तत्काल ही देव-दैत्यों के ऊपर निश्चित रूप से गिर पड़ा।

श्लोक 78 (skanda.1.9.78)

केचिद्भग्ना मृताः केचित्केचिन्मूर्छापरा भवन्॥ परीवादरताः केचित्केचित्क्लेशत्वमागताः

kecidbhagnā mṛtāḥ kecitkecinmūrchāparā bhavan|| parīvādaratāḥ kecitkecitkleśatvamāgatāḥ

कुछ कुचलकर मर गए, कुछ मूर्छित हो गए; कुछ आपस में दोषारोपण करने लगे, कुछ क्लेश को प्राप्त हुए।

श्लोक 79 (skanda.1.9.79)

ेवं भग्नोद्यमा जाता असुराःसुरदानवाः॥ चेतनां परमां प्राप्तास्तुष्टुवुर्जगदीश्वरम्

evaṃ bhagnodyamā jātā asurāḥsuradānavāḥ|| cetanāṃ paramāṃ prāptāstuṣṭuvurjagadīśvaram

इस प्रकार प्रयत्न में विफल हुए असुर, देव और दानव, परम चेतना को प्राप्त होकर जगदीश्वर की स्तुति करने लगे।

श्लोक 80 (skanda.1.9.80)

रक्षरक्ष महाविष्णो शरणागतवत्सल॥ त्वया ततमिदं सर्वं जंगमाजंगमं च यत्

rakṣarakṣa mahāviṣṇo śaraṇāgatavatsala|| tvayā tatamidaṃ sarvaṃ jaṃgamājaṃgamaṃ ca yat

"रक्षा कीजिए, रक्षा कीजिए, हे महाविष्णु, शरणागतवत्सल! आपसे ही यह सम्पूर्ण जंगम-अजंगम जगत व्याप्त है।"

श्लोक 81 (skanda.1.9.81)

देवानां कार्यसिद्ध्यर्थं प्रादुर्भूतो हरिस्तदा॥ तान्दृष्ट्वा सहसा विष्णुर्गरुडोपरि संस्थितः

devānāṃ kāryasiddhyarthaṃ prādurbhūto haristadā|| tāndṛṣṭvā sahasā viṣṇurgaruḍopari saṃsthitaḥ

तब देवताओं के कार्य की सिद्धि के लिए हरि प्रकट हुए; उन्हें देखकर विष्णु सहसा गरुड़ पर विराजमान होकर,

श्लोक 82 (skanda.1.9.82)

लीलया पर्वतश्रेष्ठमुत्तभ्यारोपयत्क्षणात्॥ गरुत्मति तदा देवः सर्वेषामभयं ददौ

līlayā parvataśreṣṭhamuttabhyāropayatkṣaṇāt|| garutmati tadā devaḥ sarveṣāmabhayaṃ dadau

लीलापूर्वक उस श्रेष्ठ पर्वत को क्षणभर में उठाकर स्थापित कर दिया; तब गरुड़ पर बैठे उन देव ने सबको अभय दान दिया।

श्लोक 83 (skanda.1.9.83)

तत उत्थाय तान्देवान्क्षीरोस्योत्तरं तटम्॥ नीत्वा तं पर्वतं वृद्धं निक्षिप्याप्सु ततो ययौ

tata utthāya tāndevānkṣīrosyottaraṃ taṭam|| nītvā taṃ parvataṃ vṛddhaṃ nikṣipyāpsu tato yayau

फिर उठकर उन देवताओं को क्षीरसागर के उत्तरी तट पर ले जाकर, उस विशाल प्राचीन पर्वत को जल में रखकर वे चले गए।

श्लोक 84 (skanda.1.9.84)

तदा सर्वे सुरगणाः स्वागत्य असुरैः सह॥ वासुकिं च समादाय चक्रिरे समयंच तम्

tadā sarve suragaṇāḥ svāgatya asuraiḥ saha|| vāsukiṃ ca samādāya cakrire samayaṃca tam

तब समस्त देवगण असुरों सहित मिलकर वासुकि को लेकर उसके साथ एक प्रतिज्ञा-संधि की।

श्लोक 85 (skanda.1.9.85)

मंथानं मंदरं चैव वासुकिं रज्जुमेव च॥ कृत्वा सुराऽसुराः सर्वे ममंथुः श्रीरसागरम्

maṃthānaṃ maṃdaraṃ caiva vāsukiṃ rajjumeva ca|| kṛtvā surā'surāḥ sarve mamaṃthuḥ śrīrasāgaram

मंदराचल को मथानी और वासुकि को रस्सी बनाकर, देव और असुर सभी ने मिलकर उस श्री के निवासस्थान क्षीरसागर का मंथन किया।

श्लोक 86 (skanda.1.9.86)

क्षीराब्धेर्मथ्यमानस्य पर्वतो हि रसातलम्॥ गतः स तत्क्षणादेव कूर्मो भूत्वा रमापतिः॥ उद्धृतस्तत्क्षणादेव तदद्भुतमिवाभवत्

kṣīrābdhermathyamānasya parvato hi rasātalam|| gataḥ sa tatkṣaṇādeva kūrmo bhūtvā ramāpatiḥ|| uddhṛtastatkṣaṇādeva tadadbhutamivābhavat

क्षीरसागर के मंथन के समय वह पर्वत रसातल की ओर धँसने लगा; उसी क्षण रमापति विष्णु कच्छप बनकर उसे उठा ले आए — यह एक अद्भुत घटना थी।

श्लोक 87 (skanda.1.9.87)

भ्राम्यमाणस्ततः शैलो नोदितः सुरदानवैः॥ भ्रममाणो निराधारो बोधश्चेव गुरुं विना

bhrāmyamāṇastataḥ śailo noditaḥ suradānavaiḥ|| bhramamāṇo nirādhāro bodhaśceva guruṃ vinā

देव-दानवों द्वारा प्रेरित घूमता हुआ वह पर्वत, बिना आधार के, गुरु के बिना समझ की भाँति, भ्रमित होता रहा।

श्लोक 88 (skanda.1.9.88)

परमात्मा तदा विष्णुराधारो मंदरस्य च॥ दोर्भिश्चतुर्भिः संगृह्य ममंथाब्धिं सुखावहम्

paramātmā tadā viṣṇurādhāro maṃdarasya ca|| dorbhiścaturbhiḥ saṃgṛhya mamaṃthābdhiṃ sukhāvaham

तब परमात्मा विष्णु ही मंदराचल के आधार बन गए; अपनी चार भुजाओं से पकड़कर उन्होंने उस सुखदायी सागर का मंथन किया।

श्लोक 89 (skanda.1.9.89)

तदा सुरासुराः सर्वे ममंथुः क्षीरसागरम्॥ एकीभूत्वा बलेनैवमतिमात्रं बलोत्कटाः

tadā surāsurāḥ sarve mamaṃthuḥ kṣīrasāgaram|| ekībhūtvā balenaivamatimātraṃ balotkaṭāḥ

तब सभी देव और असुरों ने एक होकर, अत्यंत उत्कट बल से, क्षीरसागर का मंथन किया।

श्लोक 90 (skanda.1.9.90)

पृष्ठकंठोरुजान्वंतः कमठस्य महात्मनः॥ तथासौ पर्वतश्रेष्ठो वज्रसारमयो दृढः॥ उभयोर्घर्षणादेव वडवाग्निः समुत्थितः

pṛṣṭhakaṃṭhorujānvaṃtaḥ kamaṭhasya mahātmanaḥ|| tathāsau parvataśreṣṭho vajrasāramayo dṛḍhaḥ|| ubhayorgharṣaṇādeva vaḍavāgniḥ samutthitaḥ

उस महात्मा कच्छप की पीठ, गर्दन, जाँघों और घुटनों पर, और उस वज्रसार दृढ़ श्रेष्ठ पर्वत पर — दोनों के घर्षण से ही वडवाग्नि उत्पन्न हो गई।

श्लोक 91 (skanda.1.9.91)

हलाहलं च संजातं तदॄष्ट्वा नारदेन हि॥ ततो देवानुवाचेदं देवर्षिरमितद्युतिः

halāhalaṃ ca saṃjātaṃ tadṝṣṭvā nāradena hi|| tato devānuvācedaṃ devarṣiramitadyutiḥ

हलाहल विष को उत्पन्न हुआ देखकर, अमित द्युतिमान देवर्षि नारद ने देवताओं से यह कहा —

श्लोक 92 (skanda.1.9.92)

न कार्यं मथनं चाब्धेर्भवद्भिरधुनाऽखिलैः॥ प्रार्थयध्वं शिवं देवाः सर्वे दक्षस्य याजनम्॥ तद्विस्मृतिं च वोयातं वीरभद्रेण यत्कृतम्

na kāryaṃ mathanaṃ cābdherbhavadbhiradhunā'khilaiḥ|| prārthayadhvaṃ śivaṃ devāḥ sarve dakṣasya yājanam|| tadvismṛtiṃ ca voyātaṃ vīrabhadreṇa yatkṛtam

"अब तुम सबको समुद्र-मंथन नहीं करना चाहिए; हे देवो, आप सब शिव से दक्ष के यजन और वीरभद्र द्वारा किए गए कर्म को भुला देने की प्रार्थना कीजिए।"

श्लोक 93 (skanda.1.9.93)

तस्माच्छिवः स्मर्यतां चाशु देवाः परः पराणामपि वा परश्च॥ परात्परः परमानंदरूपो योगिध्येयो निष्प्रपंचो ह्यरूपः

tasmācchivaḥ smaryatāṃ cāśu devāḥ paraḥ parāṇāmapi vā paraśca|| parātparaḥ paramānaṃdarūpo yogidhyeyo niṣprapaṃco hyarūpaḥ

"इसलिए, हे देवो, शीघ्र ही शिव का स्मरण किया जाए — जो परम से भी परम, परात्पर, परमानंद-स्वरूप, योगियों के ध्येय, प्रपंचरहित और अरूप हैं।"

श्लोक 94 (skanda.1.9.94)

ते मथ्यमानास्त्वरिता देवाः स्वात्मार्थसाधकाः॥ अभिलाषपराः सर्वे न श्रृण्वंति यतो जडाः

te mathyamānāstvaritā devāḥ svātmārthasādhakāḥ|| abhilāṣaparāḥ sarve na śrṛṇvaṃti yato jaḍāḥ

मंथन में लगे वे देवता, अपने ही स्वार्थ-साधन में तत्पर, अभिलाषापरायण होकर, अत्यंत जड़बुद्धि होने के कारण कुछ भी नहीं सुन रहे थे।

श्लोक 95 (skanda.1.9.95)

उपदेशैश्च बहुभिर्नोपदेश्याः कदाचन॥ ते रागद्वेषसंघाताः सर्वे शिवपराङ्मुखाः

upadeśaiśca bahubhirnopadeśyāḥ kadācana|| te rāgadveṣasaṃghātāḥ sarve śivaparāṅmukhāḥ

अनेक उपदेशों से भी वे कभी उपदेश ग्रहण करने वाले नहीं थे; राग-द्वेष में बंधे वे सभी शिव से विमुख हो चुके थे।

श्लोक 96 (skanda.1.9.96)

केवलोद्यमसंवीता ममंथुः क्षीरसागरम्॥ अतिनिर्मथनाज्जातं क्षीराब्धेश्चहलाहलम्

kevalodyamasaṃvītā mamaṃthuḥ kṣīrasāgaram|| atinirmathanājjātaṃ kṣīrābdheścahalāhalam

केवल अपने ही उद्यम में लीन होकर उन्होंने क्षीरसागर का मंथन किया; अत्यधिक मंथन से ही क्षीरसागर से हलाहल विष उत्पन्न हुआ।

श्लोक 97 (skanda.1.9.97)

त्रैलोक्यदहने प्रौढं प्राप्तं हंतुं दिवौकसः॥ अत ऊर्ध्वं दिशः सर्वा व्याप्तं कृत्स्नं नभस्तलम्॥ ग्रसितुं सर्वभूतानां कालकूटं समभ्ययात्

trailokyadahane prauḍhaṃ prāptaṃ haṃtuṃ divaukasaḥ|| ata ūrdhvaṃ diśaḥ sarvā vyāptaṃ kṛtsnaṃ nabhastalam|| grasituṃ sarvabhūtānāṃ kālakūṭaṃ samabhyayāt

वह तीनों लोकों को जलाने में समर्थ होकर स्वर्गवासियों को नष्ट करने पर उतारू हो गया; तब सभी दिशाओं और समस्त आकाश-मंडल में व्याप्त होकर वह कालकूट विष समस्त प्राणियों को निगलने के लिए आगे बढ़ने लगा।

श्लोक 98 (skanda.1.9.98)

दृष्ट्वा बृहंतं स्वकरस्थमोजसा तं सर्पराजं सह पर्वतेन॥ तत्रैव हित्वापययुस्तदानीं पलायमाना ह्यसुरैः समेताः

dṛṣṭvā bṛhaṃtaṃ svakarasthamojasā taṃ sarparājaṃ saha parvatena|| tatraiva hitvāpayayustadānīṃ palāyamānā hyasuraiḥ sametāḥ

उस विशाल सर्पराज को पर्वत सहित अपने ही तेज से युक्त देखकर, वे सब असुरों सहित उसे वहीं छोड़कर भाग खड़े हुए।

श्लोक 99 (skanda.1.9.99)

तथैव सर्व ऋषयो भृग्वाद्याः शतशाम्यति॥ दक्षस्य यजनं तेन यथा जातं तथाभवत्

tathaiva sarva ṛṣayo bhṛgvādyāḥ śataśāmyati|| dakṣasya yajanaṃ tena yathā jātaṃ tathābhavat

उसी प्रकार भृगु आदि सभी सैकड़ों ऋषि शांत हो गए — दक्ष के यजन के समय जैसा हुआ था, वैसा ही यहाँ भी हुआ।

श्लोक 100 (skanda.1.9.100)

सत्यलोकं गताः सर्वे भुगुणा नोदिता भृशम्॥ वेदवाक्यैश्च विविधैः कालकूटं शतशस्ततः॥ देवा नास्त्यत्र संदेहः सत्यं सत्यं वदामि वः

satyalokaṃ gatāḥ sarve bhuguṇā noditā bhṛśam|| vedavākyaiśca vividhaiḥ kālakūṭaṃ śataśastataḥ|| devā nāstyatra saṃdehaḥ satyaṃ satyaṃ vadāmi vaḥ

भृगु द्वारा अत्यंत प्रेरित होकर वे सभी सत्यलोक गए और वेदवाक्यों से बार-बार देवताओं से कहा — "कालकूट विष, हे देवो, इसमें संशय नहीं, मैं तुमसे सत्य ही सत्य कहता हूँ।"

श्लोक 101 (skanda.1.9.101)

भृगुणोक्तं वचः श्रुत्वा कालकूटविषार्द्दिताः॥ सत्यलोकं समासाद्य ब्रह्माणं शरणं ययुः

bhṛguṇoktaṃ vacaḥ śrutvā kālakūṭaviṣārdditāḥ|| satyalokaṃ samāsādya brahmāṇaṃ śaraṇaṃ yayuḥ

भृगु का यह वचन सुनकर, कालकूट विष से पीड़ित होकर, वे सत्यलोक पहुँचकर ब्रह्मा की शरण में गए।

श्लोक 102 (skanda.1.9.102)

तदा जाज्वल्यमानं वै कालकूटं प्रभोज्जवलम्॥ दृष्ट्वा ब्रह्माथ तान्दृष्ट्वा ह्यकर्मज्ञानसुरासुरान्॥ तेषां शपितुमारेभे नारदेन निवारितः

tadā jājvalyamānaṃ vai kālakūṭaṃ prabhojjavalam|| dṛṣṭvā brahmātha tāndṛṣṭvā hyakarmajñānasurāsurān|| teṣāṃ śapitumārebhe nāradena nivāritaḥ

तब उस प्रज्वलित, अत्यंत तेजस्वी कालकूट विष को देखकर, और उन कार्य-अकार्य से अनजान देव-असुरों को देखकर, ब्रह्मा उन्हें शाप देने लगे, किंतु नारद ने उन्हें रोक दिया।

श्लोक 103 (skanda.1.9.103)

॥ब्रह्मोवाच॥ अकार्यं किं कृतं देवाः कस्मात्क्षोभोयमुद्यतः॥ ईश्वरस्य च जातोऽद्य नान्यथा मम भाषितम्

||brahmovāca|| akāryaṃ kiṃ kṛtaṃ devāḥ kasmātkṣobhoyamudyataḥ|| īśvarasya ca jāto'dya nānyathā mama bhāṣitam

ब्रह्मा ने कहा — "हे देवो, तुमने कौन सा अकार्य किया है, जिससे यह उपद्रव उठ खड़ा हुआ है? यह आज ईश्वर के कारण ही हुआ है — मेरी बात अन्यथा नहीं है।"

श्लोक 104 (skanda.1.9.104)

ततो देवैः परिवृतो वेदोपनिषदैस्तथा॥ नानागमैः परिवृतः कालकूटभयाद्ययौ

tato devaiḥ parivṛto vedopaniṣadaistathā|| nānāgamaiḥ parivṛtaḥ kālakūṭabhayādyayau

फिर देवताओं, वेदों-उपनिषदों तथा नाना आगमों से घिरे हुए वे कालकूट के भय से चल पड़े।

श्लोक 105 (skanda.1.9.105)

ततश्चिंतान्विता देवा इदमूचुः परस्परम्॥ अविद्याकामसंवीताः कुर्यामः शंकरं च कम्

tataściṃtānvitā devā idamūcuḥ parasparam|| avidyākāmasaṃvītāḥ kuryāmaḥ śaṃkaraṃ ca kam

तब चिंतायुक्त होकर देवता आपस में कहने लगे — "अविद्या और कामना से बंधे हुए हम, अब शंकर के विषय में क्या करें?"

श्लोक 106 (skanda.1.9.106)

ब्रह्माणं च पुरस्कृत्य तदा देवास्त्वरान्विताः॥ वैकुण्ठमाव्रजन्सर्वे कालकूट भयार्द्दिताः

brahmāṇaṃ ca puraskṛtya tadā devāstvarānvitāḥ|| vaikuṇṭhamāvrajansarve kālakūṭa bhayārdditāḥ

तब ब्रह्मा को आगे रखकर, कालकूट के भय से पीड़ित वे सभी देवता शीघ्रतापूर्वक वैकुंठ की ओर चल पड़े।

श्लोक 107 (skanda.1.9.107)

ब्रह्मादयश्चर्षिगणाश्च तदा परेशं विष्णुं पुराणपुरुषं प्रभविष्णुमीशम्॥ वैकुण्ठमाश्रितमधोक्षजमाधवं ते सर्वे सुरासुरगणाः शरणं प्रयाताः

brahmādayaścarṣigaṇāśca tadā pareśaṃ viṣṇuṃ purāṇapuruṣaṃ prabhaviṣṇumīśam|| vaikuṇṭhamāśritamadhokṣajamādhavaṃ te sarve surāsuragaṇāḥ śaraṇaṃ prayātāḥ

ब्रह्मा आदि तथा ऋषिगण उस समय परमेश्वर विष्णु की, जो पुराण-पुरुष, प्रभावशाली ईश, वैकुंठवासी, अधोक्षज माधव हैं, शरण में गए — सभी देव और असुर उनकी शरण में पहुँचे।

श्लोक 108 (skanda.1.9.108)

तावत्प्रवृद्धं सुमहत्कालकूटं समभ्ययात्॥ दग्ध्वादो ब्रह्मणो लोकं वैकुण्ठं च ददाह वै

tāvatpravṛddhaṃ sumahatkālakūṭaṃ samabhyayāt|| dagdhvādo brahmaṇo lokaṃ vaikuṇṭhaṃ ca dadāha vai

इतने में वह अत्यंत विशाल कालकूट विष और आगे बढ़ आया; उसने ब्रह्मा के लोक को जलाकर वैकुंठ को भी दग्ध कर दिया।

श्लोक 109 (skanda.1.9.109)

कालकूटाग्निना दग्धो विष्णुः सर्वगुहाशयः॥ पार्षदैः सहितः सद्यस्तमालसदृशच्छविः

kālakūṭāgninā dagdho viṣṇuḥ sarvaguhāśayaḥ|| pārṣadaiḥ sahitaḥ sadyastamālasadṛśacchaviḥ

कालकूट की अग्नि से दग्ध होकर, समस्त हृदयों में निवास करने वाले विष्णु अपने पार्षदों सहित तत्काल तमाल के समान (श्याम) वर्ण के हो गए।

श्लोक 110 (skanda.1.9.110)

वैकुण्ठं च सुनीलं च सर्वलोकैः समावृतम्॥ जलकल्मषसंवीताः सर्वे लोकास्तदाभवन्

vaikuṇṭhaṃ ca sunīlaṃ ca sarvalokaiḥ samāvṛtam|| jalakalmaṣasaṃvītāḥ sarve lokāstadābhavan

गहरे नीले वैकुंठ को और सभी लोकों को उसने घेर लिया; सभी लोक उस समय विष-जल की मलिनता से आच्छादित हो गए।

श्लोक 111 (skanda.1.9.111)

अष्टावरणसंवीतं ब्रह्मांडं ब्रह्मणा सह॥ भस्मीभूतं चकाराशु जलकल्मषमद्भुतम्

aṣṭāvaraṇasaṃvītaṃ brahmāṃḍaṃ brahmaṇā saha|| bhasmībhūtaṃ cakārāśu jalakalmaṣamadbhutam

आठ आवरणों से घिरा हुआ ब्रह्मांड, ब्रह्मा सहित, उस अद्भुत विष-जल की मलिनता से तत्काल भस्मीभूत हो गया।

श्लोक 112 (skanda.1.9.112)

नोभूमिर्न जलं चाग्निर्न वायुर्न नभस्तदा॥ नाहंकारो न च महान्मूलाविद्या तथैव च॥ शिवस्य कोपात्संजातं तदा भस्माकुलं जगत्

nobhūmirna jalaṃ cāgnirna vāyurna nabhastadā|| nāhaṃkāro na ca mahānmūlāvidyā tathaiva ca|| śivasya kopātsaṃjātaṃ tadā bhasmākulaṃ jagat

तब न पृथ्वी रही, न जल, न अग्नि, न वायु, न आकाश; न अहंकार, न महत्तत्त्व, न मूल-अविद्या ही — शिव के क्रोध से उत्पन्न होकर उस समय संपूर्ण जगत भस्ममय हो गया।

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