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माहेश्वर खण्ड · अध्याय 92

नीलकण्ठ-माहात्म्य

अध्याय 91अध्याय-सूचीअध्याय 93

श्लोक 1 (skanda.1.92.1)

॥नारद उवाच॥ ततो विप्रा नारदश्च समाराध्य महेश्वरम्॥ महीनगरके पुण्ये स्थापयामास शंकरम्

nārada uvāca tato viprā nāradaśca samārādhya maheśvaram mahīnagarake puṇye sthāpayāmāsa śaṁkaram

नारद ने कहा — फिर ब्राह्मणों ने और नारद ने भी महेश्वर की आराधना कर पुण्य महीनगरक में शंकर को स्थापित किया।

श्लोक 2 (skanda.1.92.2)

लोकानां च हितार्थाय केदारं लिंगमुत्तमम्॥ अत्रीशादुत्तरे भागे महापातकनाशनम्

lokānāṁ ca hitārthāya kedāraṁ liṁgamuttamam atrīśāduttare bhāge mahāpātakanāśanam

लोगों के हित के लिए, अत्रीश्वर के उत्तर भाग में महापातकों का नाश करने वाला उत्तम केदार लिंग स्थापित किया गया।

श्लोक 3 (skanda.1.92.3)

अत्रिकुण्डे नरः स्नात्वा श्राद्धं कृत्वा यथाविधि॥ अत्रीशं च नमस्कृत्य केदारं यः प्रपश्यति

atrikuṇḍe naraḥ snātvā śrāddhaṁ kṛtvā yathāvidhi atrīśaṁ ca namaskṛtya kedāraṁ yaḥ prapaśyati

जो मनुष्य अत्रि-कुंड में स्नान कर, विधिपूर्वक श्राद्ध कर, अत्रीश्वर को नमस्कार कर, केदार का दर्शन करता है—

श्लोक 4 (skanda.1.92.4)

मातुः स्तन्यं पुनर्नैव स पिबेन्मुक्तिभाग्भवेत्॥ ततो रुद्रो नीलकंठं नारदाय महात्मने

mātuḥ stanyaṁ punarnaiva sa pibenmuktibhāgbhavet tato rudro nīlakaṁṭhaṁ nāradāya mahātmane

—वह पुनः माता का स्तनपान नहीं करता (पुनर्जन्म नहीं लेता) और मुक्ति का भागी होता है। फिर रुद्र ने महात्मा नारद को नीलकंठ (लिंग)—

श्लोक 5 (skanda.1.92.5)

स्वयं दत्त्वा स्वयं तस्थौ महीनगरके शुभे॥ कोटितीर्थे नरः स्नात्वा नीलकंठं प्रपश्यति

svayaṁ dattvā svayaṁ tasthau mahīnagarake śubhe koṭitīrthe naraḥ snātvā nīlakaṁṭhaṁ prapaśyati

—स्वयं नीलकंठ प्रदान कर, स्वयं भी शुभ महीनगरक में विराजमान हो गए। जो मनुष्य कोटितीर्थ में स्नान कर नीलकंठ का दर्शन करता है—

श्लोक 6 (skanda.1.92.6)

जयादित्यं नमस्कृत्य रुद्रलोकमवाप्नुयात्॥ जयादित्यं पूजयंति कूपे स्नात्वा नरोत्तमाः

jayādityaṁ namaskṛtya rudralokamavāpnuyāt jayādityaṁ pūjayaṁti kūpe snātvā narottamāḥ

—और जयादित्य को नमस्कार करता है, वह रुद्रलोक को प्राप्त करता है। श्रेष्ठ मनुष्य कूप में स्नान कर जयादित्य की पूजा करते हैं,

श्लोक 7 (skanda.1.92.7)

न तेषां वंशनाशोऽस्ति जयादित्यप्रसादतः॥ इदं ते कथितं पार्थ महीनगरकस्य च

na teṣāṁ vaṁśanāśo'sti jayādityaprasādataḥ idaṁ te kathitaṁ pārtha mahīnagarakasya ca

—और जयादित्य की कृपा से उनके वंश का नाश नहीं होता। हे पार्थ, यह महीनगरक के विषय में तुम्हें बताया गया।

श्लोक 8 (skanda.1.92.8)

आख्यानं सकलं श्रुत्वा सर्वपापैः प्रमुच्यते

ākhyānaṁ sakalaṁ śrutvā sarvapāpaiḥ pramucyate

इस संपूर्ण आख्यान को सुनकर मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।

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