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माहेश्वर खण्ड · अध्याय 93

महीसागर संगम की महिमा

अध्याय 92अध्याय-सूचीअध्याय 94

श्लोक 1 (skanda.1.93.1)

॥अर्जुन उवाच॥ गुप्तक्षेत्रमिदं कस्मात्कस्माद्गुप्तं च नारद ॥ यस्य प्रभावः सुमहान्नैव कस्यापि संस्तुतः

||arjuna uvāca|| guptakṣetramidaṁ kasmātkasmādguptaṁ ca nārada || yasya prabhāvaḥ sumahānnaiva kasyāpi saṁstutaḥ

अर्जुन ने कहा - हे नारद! यह गुप्तक्षेत्र किस कारण से गुप्त कहलाता है, और किस कारण से यह छिपा हुआ है - जिसका प्रभाव अत्यंत महान होते हुए भी किसी के द्वारा वर्णित नहीं है?

श्लोक 2 (skanda.1.93.2)

॥नारद उवाच॥ पुरातनामत्र कथां गुप्तक्षेत्रस्य कारणे ॥ शृणु पांडव शापेन गुप्तमासीदिदं यथा

||nārada uvāca|| purātanāmatra kathāṁ guptakṣetrasya kāraṇe || śṛṇu pāṁḍava śāpena guptamāsīdidaṁ yathā

नारद जी ने कहा - हे पांडव! गुप्तक्षेत्र के कारण की यह पुरातन कथा सुनो, कि यह किस प्रकार शाप के द्वारा गुप्त हो गया।

श्लोक 3 (skanda.1.93.3)

पुरा निमित्ते कस्मिंश्चित्सर्वतीर्थाधिदैवताः ॥ प्रणामाय ब्रह्मसदो ब्रह्माणं सहिता ययुः

purā nimitte kasmiṁścitsarvatīrthādhidaivatāḥ || praṇāmāya brahmasado brahmāṇaṁ sahitā yayuḥ

प्राचीन काल में किसी अवसर पर समस्त तीर्थों के अधिष्ठाता देवता एक साथ ब्रह्मा जी को प्रणाम करने हेतु ब्रह्मसभा में गए।

श्लोक 4 (skanda.1.93.4)

पुष्करस्य प्रभासस्य निमिषस्यार्बुदस्य च ॥ कुरुक्षेत्रस्य क्षेत्रस्य धर्मारण्यस्य देवताः

puṣkarasya prabhāsasya nimiṣasyārbudasya ca || kurukṣetrasya kṣetrasya dharmāraṇyasya devatāḥ

पुष्कर, प्रभास, नैमिष और अर्बुद के, कुरुक्षेत्र और धर्मारण्य के देवता,

श्लोक 5 (skanda.1.93.5)

वस्त्रापथस्य श्वेतस्य फल्गुतीर्थं स्य चापि याः ॥ केदारस्य तथान्येषां क्षेत्राणां कोटिशोऽपि याः

vastrāpathasya śvetasya phalgutīrthaṁ sya cāpi yāḥ || kedārasya tathānyeṣāṁ kṣetrāṇāṁ koṭiśo'pi yāḥ

वस्त्रापथ, श्वेत और फल्गुतीर्थ के, केदार के तथा अन्य करोड़ों क्षेत्रों के जो देवता थे -

श्लोक 6 (skanda.1.93.6)

सिंधुसागरयोगस्य महीसागरकस्य च ॥ गंगासागरयोगस्य अधिपाः सूकरस्य च

siṁdhusāgarayogasya mahīsāgarakasya ca || gaṁgāsāgarayogasya adhipāḥ sūkarasya ca

सिन्धु-सागर संगम के, महीसागर के, गंगा-सागर संगम के तथा सूकर तीर्थ के अधिपति,

श्लोक 7 (skanda.1.93.7)

गंगारेवामुखीनां तु नदीनामधिदेवताः ॥ शोणह्रदपुरोगाणां ह्रदानां चाधिदेवताः

gaṁgārevāmukhīnāṁ tu nadīnāmadhidevatāḥ || śoṇahradapurogāṇāṁ hradānāṁ cādhidevatāḥ

गंगा-रेवा आदि नदियों के अधिदेवता तथा शोणह्रद आदि सरोवरों के भी अधिदेवता -

श्लोक 8 (skanda.1.93.8)

ते सर्वे संघशो भूत्वा श्रैष्ठ्य ज्ञानाय चात्मनः ॥ समुपाजग्मुरमला महतीं ब्रह्मणः सभाम्

te sarve saṁghaśo bhūtvā śraiṣṭhya jñānāya cātmanaḥ || samupājagmuramalā mahatīṁ brahmaṇaḥ sabhām

वे सभी निर्मल देवता अपनी-अपनी श्रेष्ठता जानने के लिए समूह बनाकर ब्रह्मा जी की महती सभा में एकत्रित हुए।

श्लोक 9 (skanda.1.93.9)

तत्र तीर्थानि सर्वाणि समायातानि वीक्ष्य सः ॥ उत्तस्थौ सहितः सर्वैः सभासद्भिः पितामहः

tatra tīrthāni sarvāṇi samāyātāni vīkṣya saḥ || uttasthau sahitaḥ sarvaiḥ sabhāsadbhiḥ pitāmahaḥ

वहाँ समस्त तीर्थों को एकत्र आया देखकर पितामह ब्रह्मा अपनी सभा के सभी सदस्यों सहित खड़े हो गए।

श्लोक 10 (skanda.1.93.10)

प्रणम्य सर्वतीर्थेभ्यः प्रबद्धकरसंपुटः ॥ तीर्थानि भगवानाह विस्मयोत्फुल्ललोचनः

praṇamya sarvatīrthebhyaḥ prabaddhakarasaṁpuṭaḥ || tīrthāni bhagavānāha vismayotphullalocanaḥ

हाथ जोड़कर समस्त तीर्थों को प्रणाम करते हुए, विस्मय से खिले हुए नेत्रों वाले भगवान ब्रह्मा ने तीर्थों से कहा -

श्लोक 11 (skanda.1.93.11)

अद्य नः सद्म सकलं युष्माभिरतिपावितम् ॥ वयं च पाविता भूयो युष्माकं दर्शनादपि

adya naḥ sadma sakalaṁ yuṣmābhiratipāvitam || vayaṁ ca pāvitā bhūyo yuṣmākaṁ darśanādapi

"आज हमारा यह सम्पूर्ण भवन आप सबके द्वारा अत्यंत पवित्र हो गया है, और आपके दर्शनमात्र से हम भी पुनः पवित्र हो गए हैं।"

श्लोक 12 (skanda.1.93.12)

तीर्थानां दर्शनं श्रेयः स्पर्शनं स्नानमेव च ॥ कीर्तनं स्मरणं चापि न स्यात्पुण्यं विना परम्

tīrthānāṁ darśanaṁ śreyaḥ sparśanaṁ snānameva ca || kīrtanaṁ smaraṇaṁ cāpi na syātpuṇyaṁ vinā param

"तीर्थों का दर्शन कल्याणकारी है, उनका स्पर्श और स्नान भी, तथा उनका कीर्तन और स्मरण भी - इनके बिना कोई भी उत्कृष्ट पुण्य सम्भव नहीं है।"

श्लोक 13 (skanda.1.93.13)

महापापान्विता रौद्रास्त्वपि ये स्युः सुनिष्ठुराः ॥ तेऽपि तीर्थैः प्रपूयंते किं पुनर्धर्मसंस्थिताः

mahāpāpānvitā raudrāstvapi ye syuḥ suniṣṭhurāḥ || te'pi tīrthaiḥ prapūyaṁte kiṁ punardharmasaṁsthitāḥ

"जो महापापों से युक्त, क्रूर और अत्यंत निष्ठुर हैं, वे भी तीर्थों के द्वारा पवित्र हो जाते हैं - फिर धर्म में स्थित व्यक्तियों की तो बात ही क्या!"

श्लोक 14 (skanda.1.93.14)

एवमुक्त्वा पुलस्त्यं स पुत्रमभ्यादिदेश ह ॥ शीघ्रमर्घं तीर्थहेतोः समानय यथार्चये

evamuktvā pulastyaṁ sa putramabhyādideśa ha || śīghramarghaṁ tīrthahetoḥ samānaya yathārcaye

ऐसा कहकर उन्होंने अपने पुत्र पुलस्त्य को आज्ञा दी - "शीघ्र ही तीर्थ हेतु एक अर्घ्य ले आओ, जिससे मैं पूजा कर सकूँ।"

श्लोक 15 (skanda.1.93.15)

॥पुलस्त्य उवाच॥ असंख्यानीह तीर्थानि दृश्यंते पद्मसंभव ॥ यथा दिशसि मां तात अर्घमेकमुपानये

||pulastya uvāca|| asaṁkhyānīha tīrthāni dṛśyaṁte padmasaṁbhava || yathā diśasi māṁ tāta arghamekamupānaye

पुलस्त्य ने कहा - "हे कमलजन्मा! यहाँ असंख्य तीर्थ दिखाई देते हैं। हे तात! जैसा आप निर्देश दें, वैसे ही मैं एक अर्घ्य लाऊँ।"

श्लोक 16 (skanda.1.93.16)

धर्मप्रवचने श्लोको यत एष प्रगीयते

dharmapravacane śloko yata eṣa pragīyate

"- क्योंकि धर्म-प्रवचन में यह श्लोक गाया जाता है -"

श्लोक 17 (skanda.1.93.17)

भवेयुर्यद्यसंख्याता अर्घयोग्याः समर्चने ॥ ततस्तेषां वरिष्ठाय दातव्योऽर्घः किलैकतः

bhaveyuryadyasaṁkhyātā arghayogyāḥ samarcane || tatasteṣāṁ variṣṭhāya dātavyo'rghaḥ kilaikataḥ

"'यदि पूजा में अर्घ्य के योग्य अनगिनत हों, तो निश्चय ही उनमें जो श्रेष्ठ हो, उसी एक को अर्घ्य देना चाहिए।'"

श्लोक 18 (skanda.1.93.18)

॥ब्रह्मोवाच॥ साभिप्रायं साधु वत्स त्वया प्रोक्तमिदं वचः ॥ एवं कुरुष्वैकमर्घमानय त्वं सुशीघ्रतः

||brahmovāca|| sābhiprāyaṁ sādhu vatsa tvayā proktamidaṁ vacaḥ || evaṁ kuruṣvaikamarghamānaya tvaṁ suśīghrataḥ

ब्रह्मा जी ने कहा - "हे वत्स! तुमने यह उत्तम एवं सार्थक वचन कहा है। ऐसा ही करो - शीघ्र ही एक अर्घ्य ले आओ।"

श्लोक 19 (skanda.1.93.19)

॥नारद उवाच॥ ततः पुलस्त्यो वेगेन समानिन्येऽर्घमुत्तमम् ॥ तं च ब्रह्मा करे गृह्य तीर्थान्याहेति भारतीम्

||nārada uvāca|| tataḥ pulastyo vegena samāninye'rghamuttamam || taṁ ca brahmā kare gṛhya tīrthānyāheti bhāratīm

नारद जी ने कहा - तब पुलस्त्य ने तीव्रता से एक उत्तम अर्घ्य ला दिया। उसे हाथ में लेकर ब्रह्मा जी ने तीर्थों से यह वाणी कही -

श्लोक 20 (skanda.1.93.20)

सर्वैर्भवद्भिः संहत्य मुख्यस्त्वेकः प्रकीर्त्यताम् ॥ तस्मै चार्घं प्रयच्छामि नैवं मामनयः स्पृशेत्

sarvairbhavadbhiḥ saṁhatya mukhyastvekaḥ prakīrtyatām || tasmai cārghaṁ prayacchāmi naivaṁ māmanayaḥ spṛśet

"आप सब मिलकर यह घोषित करें कि आप में श्रेष्ठ कौन है, और मैं उसी को यह अर्घ्य प्रदान करूँगा - मुझे किसी प्रकार का अन्याय स्पर्श न करे।"

श्लोक 21 (skanda.1.93.21)

॥तीर्थान्यूचुः॥ न वयं श्रेष्ठतां विद्मः कथंचन परस्परम् ॥ अस्माद्धेतोश्च संप्राप्ता ज्ञात्वा देहि त्वमेव तत्

||tīrthānyūcuḥ|| na vayaṁ śreṣṭhatāṁ vidmaḥ kathaṁcana parasparam || asmāddhetośca saṁprāptā jñātvā dehi tvameva tat

तीर्थों ने कहा - "हम आपस में किसी प्रकार यह नहीं जानते कि कौन श्रेष्ठ है। इसी कारण हम यहाँ आए हैं - आप ही जानकर वह अर्घ्य प्रदान करें।"

श्लोक 22 (skanda.1.93.22)

॥ब्रह्मोवाच॥ नाहं वेद्मि श्रेष्ठतां वः कथंचन नमोऽस्तु वः ॥ सर्वे चापारमाहात्म्यं स्वयं मे वक्तुमर्हथ

||brahmovāca|| nāhaṁ vedmi śreṣṭhatāṁ vaḥ kathaṁcana namo'stu vaḥ || sarve cāpāramāhātmyaṁ svayaṁ me vaktumarhatha

ब्रह्मा जी ने कहा - "मैं भी किसी प्रकार आपकी श्रेष्ठता नहीं जानता - आप सबको नमस्कार है! आप सभी अपनी अपार महिमा स्वयं मुझसे कहें।"

श्लोक 23 (skanda.1.93.23)

यत्र गंगा गया काशी पुष्करं नैमिषं तथा ॥ कुरुक्षेत्रं तथा रेवा महीसागरसंगमः

yatra gaṁgā gayā kāśī puṣkaraṁ naimiṣaṁ tathā || kurukṣetraṁ tathā revā mahīsāgarasaṁgamaḥ

"जब आप में गंगा, गया, काशी, पुष्कर, नैमिष, कुरुक्षेत्र, रेवा तथा महीसागर संगम जैसे तीर्थ विद्यमान हैं,

श्लोक 24 (skanda.1.93.24)

प्रभासाद्यानि शतशो यत्र नस्तत्र का मतिः

prabhāsādyāni śataśo yatra nastatra kā matiḥ

तथा प्रभास आदि सैकड़ों तीर्थ हैं, तो वहाँ हमारी क्या राय हो सकती है?"

श्लोक 25 (skanda.1.93.25)

॥नारद उवाच॥ एवमुक्ते पद्मभुवा कोपि नोवाच किंचन ॥ चिरेणेदं ततः प्राह महीसागरसंगमः

||nārada uvāca|| evamukte padmabhuvā kopi novāca kiṁcana || cireṇedaṁ tataḥ prāha mahīsāgarasaṁgamaḥ

नारद जी ने कहा - कमलजन्मा ब्रह्मा के ऐसा कहने पर कोई कुछ नहीं बोला। तब बहुत देर बाद महीसागर संगम ने यह कहा -

श्लोक 26 (skanda.1.93.26)

ममैनमर्घं त्वं यच्छ चतुरानन शीघ्रतः ॥ यतः कोटिकलायां वा मम कोऽपि न पूर्यते

mamainamarghaṁ tvaṁ yaccha caturānana śīghrataḥ || yataḥ koṭikalāyāṁ vā mama ko'pi na pūryate

"हे चतुरानन! यह अर्घ्य शीघ्र मुझे ही दीजिए - क्योंकि मेरे करोड़वें अंश की भी बराबरी कोई नहीं कर सकता।"

श्लोक 27 (skanda.1.93.27)

यतश्चेन्द्रद्युम्नराज्ञा ताप्यमाना वसुंधरा ॥ सर्वतीर्थद्रवीभूता महीनामाभवन्नदी

yataścendradyumnarājñā tāpyamānā vasuṁdharā || sarvatīrthadravībhūtā mahīnāmābhavannadī

"क्योंकि राजा इंद्रद्युम्न के तप से संतप्त होकर पृथ्वी समस्त तीर्थों सहित द्रवित हो गई, और महीनामक नदी बन गई।"

श्लोक 28 (skanda.1.93.28)

सा च सर्वाणि तीर्थानि संयुक्तानि मया सह ॥ सर्वतीर्थमयस्तस्मादस्मि ख्यातो जगत्त्रये

sā ca sarvāṇi tīrthāni saṁyuktāni mayā saha || sarvatīrthamayastasmādasmi khyāto jagattraye

"और वह समस्त तीर्थों से युक्त होकर मेरे साथ मिली, इसीलिए मैं तीनों लोकों में सर्वतीर्थमय (समस्त तीर्थस्वरूप) के नाम से विख्यात हूँ।"

श्लोक 29 (skanda.1.93.29)

गुहेन च महालिंगं कुमारेश्वरमीश्वरम् ॥ संस्थाप्य तीर्थमुख्यत्वं मम दत्तं महात्मना

guhena ca mahāliṁgaṁ kumāreśvaramīśvaram || saṁsthāpya tīrthamukhyatvaṁ mama dattaṁ mahātmanā

"तथा गुह (स्कन्द) ने यहाँ महालिंग कुमारेश्वर की स्थापना करके, उस महात्मा ने मुझे तीर्थों में मुख्यत्व प्रदान किया।"

श्लोक 30 (skanda.1.93.30)

नारदेनापि मत्तीरे स्थानं संस्थाप्य शोभनम् ॥ सर्वेभ्यः पुण्यक्षेत्रेभ्यो दत्तं श्रैष्ठ्यं पुरा मम

nāradenāpi mattīre sthānaṁ saṁsthāpya śobhanam || sarvebhyaḥ puṇyakṣetrebhyo dattaṁ śraiṣṭhyaṁ purā mama

"नारद जी ने भी मेरे तट पर एक सुंदर स्थान की स्थापना करके, प्राचीन काल में मुझे समस्त पुण्यक्षेत्रों से श्रेष्ठता प्रदान की।"

श्लोक 31 (skanda.1.93.31)

एवं त्रिभिर्हेतुवरैर्ममेवार्घः प्रदीयताम् ॥ गुणैकदेशेऽपि समं मम तीर्थं न वै परम्

evaṁ tribhirhetuvarairmamevārghaḥ pradīyatām || guṇaikadeśe'pi samaṁ mama tīrthaṁ na vai param

"अतः इन तीन उत्तम कारणों से यह अर्घ्य मुझे ही दिया जाए - मेरे गुणों के एक अंश के बराबर भी कोई अन्य तीर्थ नहीं है।"

श्लोक 32 (skanda.1.93.32)

इत्युक्ते वचने पार्थ तीर्थराजेन भारत॥ सर्वे नोचुः किंचनापि किं ब्रह्मा वक्ष्यतीति यत्

ityukte vacane pārtha tīrtharājena bhārata|| sarve nocuḥ kiṁcanāpi kiṁ brahmā vakṣyatīti yat

हे पार्थ! हे भारत! तीर्थराज के इस प्रकार कहने पर शेष सभी तीर्थ कुछ भी नहीं बोले, यह सोचकर कि अब ब्रह्मा जी क्या कहेंगे।

श्लोक 33 (skanda.1.93.33)

ततो ब्रह्मसुतो ज्येष्ठः श्वेतमाल्यानुलेपनः ॥ दक्षिणं बाहुमुद्धत्य धर्मो वचनमब्रवीत्

tato brahmasuto jyeṣṭhaḥ śvetamālyānulepanaḥ || dakṣiṇaṁ bāhumuddhatya dharmo vacanamabravīt

तब श्वेत माला और चंदन से सुशोभित ब्रह्मा जी के ज्येष्ठ पुत्र धर्म ने अपनी दाहिनी भुजा उठाकर यह वचन कहा -

श्लोक 34 (skanda.1.93.34)

अहो कष्टमिदं कूक्तं तीर्थराजेन मोहतः ॥ सन्तोऽपि न गुणा वाच्याः स्वयं सद्भिः स्वका यतः

aho kaṣṭamidaṁ kūktaṁ tīrtharājena mohataḥ || santo'pi na guṇā vācyāḥ svayaṁ sadbhiḥ svakā yataḥ

"हाय! तीर्थराज ने मोहवश यह कितनी दुःखद बात कह दी! क्योंकि सद्गुण होते हुए भी सज्जन कभी स्वयं अपने गुणों का बखान नहीं करते।"

श्लोक 35 (skanda.1.93.35)

स्वीयान्गुणान्स्वयं यो हि सम्पत्सु प्रक्षिपन्परान् ॥ ब्रवीति राजसस्त्वेष ह्यहंकारो जुगुप्सितः

svīyānguṇānsvayaṁ yo hi sampatsu prakṣipanparān || bravīti rājasastveṣa hyahaṁkāro jugupsitaḥ

"जो अपने गुणों को स्वयं बखानते हुए अपनी संपन्नता में दूसरों को नीचा दिखाता है, यह उसका राजसिक और घृणित अहंकार ही बोलता है।"

श्लोक 36 (skanda.1.93.36)

तस्मादस्मादहंकारात्सत्स्वप्येषु गुणेषु च ॥ अप्रख्यातं ध्वस्तरूपमिदं तीर्थं भविष्यति

tasmādasmādahaṁkārātsatsvapyeṣu guṇeṣu ca || aprakhyātaṁ dhvastarūpamidaṁ tīrthaṁ bhaviṣyati

"अतः इस अहंकार के कारण, इन गुणों के सत्य होते हुए भी, यह तीर्थ अप्रसिद्ध होकर नष्टप्राय रूप वाला हो जाएगा।"

श्लोक 37 (skanda.1.93.37)

स्तंभतीर्थमिति ख्यातं स्तम्भो गर्वः कृतो यतः ॥ स्तंभस्य हि फलं सद्यो ब्रह्मापि प्राप किं परः

staṁbhatīrthamiti khyātaṁ stambho garvaḥ kṛto yataḥ || staṁbhasya hi phalaṁ sadyo brahmāpi prāpa kiṁ paraḥ

"यह 'स्तम्भतीर्थ' के नाम से प्रसिद्ध होगा, क्योंकि इसने स्तम्भ (गर्व) किया - स्तम्भ का फल तो स्वयं ब्रह्मा को भी तत्काल भोगना पड़ा, फिर औरों की तो बात ही क्या!"

श्लोक 38 (skanda.1.93.38)

इत्युक्ते धर्मदेवेन हाहेति रव उत्थितः ॥ ततः शीघ्रं समायातो योगीशोऽहं च पांडव

ityukte dharmadevena hāheti rava utthitaḥ || tataḥ śīghraṁ samāyāto yogīśo'haṁ ca pāṁḍava

धर्मदेव के ऐसा कहने पर "हाय-हाय" का शोर उठा। तब हे पांडव! योगीश्वर (गुह) शीघ्र वहाँ आ पहुँचे, और मैं भी वहीं था।

श्लोक 39 (skanda.1.93.39)

गुहस्ततो वचः प्राह धर्मदेवसमागमे ॥ अयुक्तमेतच्छापोऽयं दत्तो यद्धर्म धार्ष्ट्यतः

guhastato vacaḥ prāha dharmadevasamāgame || ayuktametacchāpo'yaṁ datto yaddharma dhārṣṭyataḥ

तब गुह ने धर्मदेव की उपस्थिति में यह वचन कहा - "हे धर्म! तुमने जो यह शाप उतावलेपन में दिया है, यह अनुचित है।"

श्लोक 40 (skanda.1.93.40)

ब्रवीतु कोऽपि सर्वेषां तीर्थानां तेषु वर्तताम् ॥ यद्यैश्वर्यं नार्हतेसौ महीसागरसंगमः

bravītu ko'pi sarveṣāṁ tīrthānāṁ teṣu vartatām || yadyaiśvaryaṁ nārhatesau mahīsāgarasaṁgamaḥ

"इन समस्त तीर्थों में से कोई भी कहे कि यदि यह महीसागर संगम अपने ऐश्वर्य के योग्य नहीं है..."

श्लोक 41 (skanda.1.93.41)

तिष्ठत्वात्मगुणो यच्च तीर्थराजेन वर्णितः ॥ तत्र को विगुणो नाम मिथ्यावादी यतो गुणः

tiṣṭhatvātmaguṇo yacca tīrtharājena varṇitaḥ || tatra ko viguṇo nāma mithyāvādī yato guṇaḥ

"तीर्थराज ने जो अपने गुणों का वर्णन किया, वे वस्तुतः उसके अपने ही गुण हैं - इसमें दोष कहाँ है, जबकि वह गुण मिथ्या भाषण नहीं था?"

श्लोक 42 (skanda.1.93.42)

अहो न युक्तं पालानां यदि तेऽप्यविमृश्य च ॥ एवमर्थान्करिष्यंति कं यांति शरणं प्रजाः

aho na yuktaṁ pālānāṁ yadi te'pyavimṛśya ca || evamarthānkariṣyaṁti kaṁ yāṁti śaraṇaṁ prajāḥ

"हाय! यह पालकों के लिए उचित नहीं - यदि वे भी बिना सोचे-समझे इस प्रकार कार्य करेंगे, तो प्रजा किसकी शरण में जाएगी?"

श्लोक 43 (skanda.1.93.43)

एवमुक्ते गुहेनाथ धर्मो वचनमब्रवीत् ॥ सत्यमेतद्यदर्होऽयं महीसागरसंगमः

evamukte guhenātha dharmo vacanamabravīt || satyametadyadarho'yaṁ mahīsāgarasaṁgamaḥ

गुह के ऐसा कहने पर धर्म ने यह वचन कहा - "यह सत्य है कि यह महीसागर संगम वास्तव में योग्य है -

श्लोक 44 (skanda.1.93.44)

मुख्यत्वं सर्वतीर्थानामर्घं चापि पितामहात् ॥ किंतु नात्मगुणा वाच्याः सतामेतत्सदा व्रतम् ॥ परोक्षेपि स्वप्रशंसा ब्रह्माणमपि चालयेत्

mukhyatvaṁ sarvatīrthānāmarghaṁ cāpi pitāmahāt || kiṁtu nātmaguṇā vācyāḥ satāmetatsadā vratam || parokṣepi svapraśaṁsā brahmāṇamapi cālayet

"- वह समस्त तीर्थों में मुख्यता तथा पितामह से अर्घ्य पाने योग्य है। किंतु अपने गुणों का बखान स्वयं नहीं करना चाहिए - यही सज्जनों का सदा का व्रत है। परोक्ष में की गई आत्मप्रशंसा भी स्वयं ब्रह्मा को विचलित कर सकती है।"

श्लोक 45 (skanda.1.93.45)

स्वप्रशंसां प्रकुर्वाणः पराक्षेपसमन्विताम् ॥ किं दिवः पृथिवीं पूर्वं ययातिर्न पपात ह ॥ यानि पूर्वं प्रमाणानि कृतानीशेन धीमता

svapraśaṁsāṁ prakurvāṇaḥ parākṣepasamanvitām || kiṁ divaḥ pṛthivīṁ pūrvaṁ yayātirna papāta ha || yāni pūrvaṁ pramāṇāni kṛtānīśena dhīmatā

"क्या राजा ययाति पूर्वकाल में दूसरों की निंदा से युक्त आत्मप्रशंसा करने के कारण स्वर्ग से पृथ्वी पर नहीं गिरे थे? ये वे मानदंड हैं जो प्राचीन काल में बुद्धिमान ईश्वर द्वारा निश्चित किए गए थे -

श्लोक 46 (skanda.1.93.46)

तानि सम्पालनीयानि तानि कोऽति क्रमेद्बुधः ॥ तव पित्रा समादिश्य यदर्थं स्थापिता वयम्

tāni sampālanīyāni tāni ko'ti kramedbudhaḥ || tava pitrā samādiśya yadarthaṁ sthāpitā vayam

"- उनका पालन किया जाना चाहिए; कौन बुद्धिमान उनका उल्लंघन करेगा? जिस प्रयोजन के लिए आपके पिता ने हमें नियुक्त कर स्थापित किया था,

श्लोक 47 (skanda.1.93.47)

पालयामास एतच्च त्वं पालयितुमर्हसि ॥ ईश्वराः स्वप्रमाणेन भवंतो यदि कुर्वते

pālayāmāsa etacca tvaṁ pālayitumarhasi || īśvarāḥ svapramāṇena bhavaṁto yadi kurvate

"- उसी का उन्होंने पालन किया, और तुम्हें भी उसी का पालन करना चाहिए। यदि आप जैसे ईश्वर भी अपने ही प्रमाण से कार्य करने लगें,

श्लोक 48 (skanda.1.93.48)

तदस्माभिरिदं युक्तं शासनं दिश्यतां परम् ॥ एवमुक्त्वा स्वीयमुद्रां मोक्तुकामं वृषं तदा

tadasmābhiridaṁ yuktaṁ śāsanaṁ diśyatāṁ param || evamuktvā svīyamudrāṁ moktukāmaṁ vṛṣaṁ tadā

"- तो हम यह उचित समझेंगे कि इसकी और कठोर व्यवस्था दी जाए।" ऐसा कहकर, अपनी मुद्रा (चिह्न) रूपी वृष (बैल) को छोड़ने की इच्छा करते हुए,

श्लोक 49 (skanda.1.93.49)

अहं प्रस्तावमन्वीक्ष्य वाक्यमेतदुदैरयम्॥ नमो धर्माय महते विश्वधात्रे महात्मने

ahaṁ prastāvamanvīkṣya vākyametadudairayam|| namo dharmāya mahate viśvadhātre mahātmane

तब स्थिति को देखते हुए मैंने (नारद ने) यह वचन कहा - "हे धर्म! विश्व को धारण करने वाले महात्मा को नमस्कार है!

श्लोक 50 (skanda.1.93.50)

ब्रह्मविष्णुशिवैर्नित्यं पूजितायाघनाशिने ॥ यदि मुद्रां भवान्धर्म परित्यक्ष्यति कर्हिचित्

brahmaviṣṇuśivairnityaṁ pūjitāyāghanāśine || yadi mudrāṁ bhavāndharma parityakṣyati karhicit

"- जो ब्रह्मा, विष्णु और शिव के द्वारा नित्य पूजित हैं, जो पापनाशक हैं! हे धर्म! यदि आप कभी अपनी मुद्रा त्याग दें,

श्लोक 51 (skanda.1.93.51)

तदस्माकं कुतो भावो मा विश्वं नाशय प्रभो ॥ योगीश्वरं गुहं चापि संमानयितुमर्हसि

tadasmākaṁ kuto bhāvo mā viśvaṁ nāśaya prabho || yogīśvaraṁ guhaṁ cāpi saṁmānayitumarhasi

"- तो हमारा क्या होगा? हे प्रभो! विश्व का नाश मत कीजिए। आपको योगीश्वर गुह का भी सम्मान करना चाहिए।

श्लोक 52 (skanda.1.93.52)

शिववन्माननीयो हि यतः साक्षाच्छिवात्मजः ॥ त्वां च देवो गुहः स्वामी संमानयितुमर्हति

śivavanmānanīyo hi yataḥ sākṣācchivātmajaḥ || tvāṁ ca devo guhaḥ svāmī saṁmānayitumarhati

"वे शिव के समान ही आदरणीय हैं, क्योंकि वे साक्षात् शिवपुत्र हैं; और देव गुह, जो हमारे स्वामी हैं, आपके द्वारा सम्मानित होने योग्य हैं।

श्लोक 53 (skanda.1.93.53)

युवयोरैक्यभावेन सुखं जीवेदिदं जगत् ॥ त्वया प्रदत्तः शापोऽयं मा प्रत्याख्यातिलक्षणः

yuvayoraikyabhāvena sukhaṁ jīvedidaṁ jagat || tvayā pradattaḥ śāpo'yaṁ mā pratyākhyātilakṣaṇaḥ

"आप दोनों की एकता से यह जगत सुखपूर्वक जीवित रह सकेगा। आपके द्वारा दिया गया यह शाप अस्वीकार्य रूप वाला न हो -

श्लोक 54 (skanda.1.93.54)

अनुग्रहश्च क्रियतां तीर्थराजस्य मानद

anugrahaśca kriyatāṁ tīrtharājasya mānada

"- हे मानद! तीर्थराज पर अनुग्रह भी कीजिए।"

श्लोक 55 (skanda.1.93.55)

एवमुच्चरमाणं मां प्रशस्याहापि पद्मभूः॥ साध्वेतन्नारदेनोक्तं धर्मैतद्वचनं कुरु

evamuccaramāṇaṁ māṁ praśasyāhāpi padmabhūḥ|| sādhvetannāradenoktaṁ dharmaitadvacanaṁ kuru

मेरे इस प्रकार कहने पर कमलजन्मा ब्रह्मा जी ने भी मेरी प्रशंसा की - "नारद ने यह उत्तम कहा है; हे धर्म! इस वचन के अनुसार करो।

श्लोक 56 (skanda.1.93.56)

सम्मानय गुहं चापि गुहः स्वामी यतो हि नः॥ एवमुक्ते ब्रह्मणा च धर्मो वचनमब्रवीत्

sammānaya guhaṁ cāpi guhaḥ svāmī yato hi naḥ|| evamukte brahmaṇā ca dharmo vacanamabravīt

"गुह का भी सम्मान करो, क्योंकि गुह ही हमारे स्वामी हैं।" ब्रह्मा जी के ऐसा कहने पर धर्म ने यह वचन कहा -

श्लोक 57 (skanda.1.93.57)

नमो गुहाय सिद्धाय किंकरायस्य ते वयम्॥ मदीयां स्कन्द विज्ञप्तिं नाथैनामवधारय

namo guhāya siddhāya kiṁkarāyasya te vayam|| madīyāṁ skanda vijñaptiṁ nāthaināmavadhāraya

"गुह को नमस्कार है, जो सिद्ध हैं, जिनके हम सेवक हैं! हे स्कन्द! हे नाथ! मेरी यह विनती सुनिए -

श्लोक 58 (skanda.1.93.58)

स्तंभादेतन्महातीर्थमप्रसिद्धं भविष्यति ॥ स्तंभतीर्थमिति ख्यातं सुप्रसिद्धं भविष्यति

staṁbhādetanmahātīrthamaprasiddhaṁ bhaviṣyati || staṁbhatīrthamiti khyātaṁ suprasiddhaṁ bhaviṣyati

"- स्तम्भ (गर्व) के कारण यह महातीर्थ अप्रसिद्ध रहेगा; किंतु 'स्तम्भतीर्थ' नाम से यह अत्यंत प्रसिद्ध हो जाएगा।

श्लोक 59 (skanda.1.93.59)

स्तम्भतीर्थमिति ख्यातं सर्वतीर्थफलप्रदम् ॥ यश्चात्र स्नानदानानि प्रकरिष्यति मानवः

stambhatīrthamiti khyātaṁ sarvatīrthaphalapradam || yaścātra snānadānāni prakariṣyati mānavaḥ

"'स्तम्भतीर्थ' नाम से प्रसिद्ध यह समस्त तीर्थों का फल देने वाला होगा; और यहाँ जो मनुष्य स्नान-दान करेगा,

श्लोक 60 (skanda.1.93.60)

यथोक्तं च फलं तस्य स्फुटं सर्वं भविष्यति ॥ शनिवारे ह्यमावास्या भवेत्तस्याः फलं च यत्

yathoktaṁ ca phalaṁ tasya sphuṭaṁ sarvaṁ bhaviṣyati || śanivāre hyamāvāsyā bhavettasyāḥ phalaṁ ca yat

"- उसे यथावर्णित सम्पूर्ण फल स्पष्ट रूप से प्राप्त होगा। तथा शनिवार को पड़ने वाली अमावस्या का जो फल है,

श्लोक 61 (skanda.1.93.61)

महीसागरयात्रायां भवेत्तच्चावधारय ॥ प्रभासदशयात्राभिः सप्तभिः पुष्करस्य च

mahīsāgarayātrāyāṁ bhavettaccāvadhāraya || prabhāsadaśayātrābhiḥ saptabhiḥ puṣkarasya ca

"- वह महीसागर की यात्रा से प्राप्त होगा, यह जानो। तथा प्रभास की दस यात्राओं तथा पुष्कर की सात यात्राओं के,

श्लोक 62 (skanda.1.93.62)

अष्टाभिश्च प्रयागस्य तत्फलं प्रभविष्यति ॥ पंचभिः कुरुक्षेत्रस्य नकुलीशस्य च त्रिभिः

aṣṭābhiśca prayāgasya tatphalaṁ prabhaviṣyati || paṁcabhiḥ kurukṣetrasya nakulīśasya ca tribhiḥ

"- तथा प्रयाग की आठ यात्राओं के फल के समान वह फल होगा; कुरुक्षेत्र की पाँच तथा नकुलीश की तीन यात्राओं के,

श्लोक 63 (skanda.1.93.63)

अर्बुदस्य च यत्षड्भिस्तत्फलं च भविष्यति ॥ वस्त्रापथस्य तिसृभिर्गंगायाः पंचभिश्च यत्

arbudasya ca yatṣaḍbhistatphalaṁ ca bhaviṣyati || vastrāpathasya tisṛbhirgaṁgāyāḥ paṁcabhiśca yat

"- अर्बुद की छह यात्राओं के फल के समान भी वह होगा; वस्त्रापथ की तीन तथा गंगा की पाँच यात्राओं के फल के,

श्लोक 64 (skanda.1.93.64)

कूपोदर्याश्चतुर्भिश्च तत्फलं प्रभविष्यति ॥ काश्याः षड्भिस्तथा यत्स्याद्गोदावर्याश्च पंचभिः

kūpodaryāścaturbhiśca tatphalaṁ prabhaviṣyati || kāśyāḥ ṣaḍbhistathā yatsyādgodāvaryāśca paṁcabhiḥ

"- कूपोदरी की चार यात्राओं के फल के समान भी वह होगा; तथा काशी की छह और गोदावरी की पाँच यात्राओं के जो फल हैं,

श्लोक 65 (skanda.1.93.65)

तत्फलं स्तंभतीर्थे वै शनिदर्शे भविष्यति ॥ एवं दत्ते वरे स्कंदस्तदा प्रीतमनाभवत्

tatphalaṁ staṁbhatīrthe vai śanidarśe bhaviṣyati || evaṁ datte vare skaṁdastadā prītamanābhavat

"- वह सब फल स्तम्भतीर्थ में शनि-अमावस्या के दिन प्राप्त होगा।" इस प्रकार वर दिए जाने पर स्कन्द का मन प्रसन्न हो गया।

श्लोक 66 (skanda.1.93.66)

ब्रह्मापि स्तंभतीर्थाय ददावर्घं समाहितः ॥ ददौ च सर्वतीर्थानां श्रेष्ठत्वममितद्युतिः

brahmāpi staṁbhatīrthāya dadāvarghaṁ samāhitaḥ || dadau ca sarvatīrthānāṁ śreṣṭhatvamamitadyutiḥ

तब ब्रह्मा जी ने भी एकाग्रचित्त होकर स्तम्भतीर्थ को अर्घ्य प्रदान किया; और उस अमित तेजस्वी ने उसे समस्त तीर्थों में श्रेष्ठता प्रदान की।

श्लोक 67 (skanda.1.93.67)

तीर्थानि च गुहं नाथं सम्मान्य विससर्ज सः ॥ एवमेतत्पुरा वृत्तं गुप्तक्षेत्रस्य कारणम्

tīrthāni ca guhaṁ nāthaṁ sammānya visasarja saḥ || evametatpurā vṛttaṁ guptakṣetrasya kāraṇam

फिर तीर्थों तथा नाथ गुह का सम्मान करके उन्होंने सभा को विसर्जित कर दिया। इस प्रकार यह गुप्तक्षेत्र होने का कारण प्राचीन काल में घटित हुआ।

श्लोक 68 (skanda.1.93.68)

भूयश्चापि प्रसिद्ध्यर्थं प्रेषिताप्सरसोऽत्र मे ॥ विमोक्षिता ग्राहरूपात्त्वया ताश्च कुरूद्वह

bhūyaścāpi prasiddhyarthaṁ preṣitāpsaraso'tra me || vimokṣitā grāharūpāttvayā tāśca kurūdvaha

"और हे कुरुश्रेष्ठ! इसकी पुनः प्रसिद्धि के लिए मैंने यहाँ अप्सराओं को भेजा था, और आपने उन्हें ग्राह (मगर) रूप से मुक्त किया -

श्लोक 69 (skanda.1.93.69)

यतो धर्मस्य सर्वस्य नानारूपैः प्रवर्ततः ॥ परित्राणाय भवतः कृष्णस्य च भवो भवे

yato dharmasya sarvasya nānārūpaiḥ pravartataḥ || paritrāṇāya bhavataḥ kṛṣṇasya ca bhavo bhave

"- क्योंकि इस प्रकार समस्त धर्म विभिन्न रूपों में प्रवृत्त होता है; और आपकी तथा कृष्ण की रक्षा के लिए यह जन्म-जन्म में होता रहता है।"

श्लोक 70 (skanda.1.93.70)

तदिदं वर्णितं तुभ्यं सर्वतीर्थफलं महत् ॥ श्रुत्वैतदादितः पूर्वं पुमान्पापैः प्रमुच्यते

tadidaṁ varṇitaṁ tubhyaṁ sarvatīrthaphalaṁ mahat || śrutvaitadāditaḥ pūrvaṁ pumānpāpaiḥ pramucyate

"इस प्रकार तुम्हें समस्त तीर्थों का यह महान फल वर्णित किया गया। जो मनुष्य इसे आरम्भ से सुनता है, वह समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।"

श्लोक 71 (skanda.1.93.71)

॥सूत उवाच॥ श्रुत्वेति विजयो धीमान्प्रशशंस सुविस्मितः ॥ विसृष्टो नारदाद्यैश्च द्वारकां प्रति जग्मिवान्

||sūta uvāca|| śrutveti vijayo dhīmānpraśaśaṁsa suvismitaḥ || visṛṣṭo nāradādyaiśca dvārakāṁ prati jagmivān

सूत जी ने कहा - यह सुनकर बुद्धिमान विजय (अर्जुन) अत्यंत विस्मित होकर इसकी प्रशंसा करने लगे; और नारद आदि के द्वारा विदा किए जाने पर वे द्वारका की ओर चल पड़े।

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