Skip to main content

नागर खण्ड · अध्याय 100

लक्ष्मण-निर्वाण के पश्चात् श्रीराम के सुग्रीव-नगरी गमन का वर्णन

अध्याय 99अध्याय-सूचीअध्याय 101

श्लोक 1 (skanda.6.100.1)

सूत उवाच॥ एवं भुक्त्वा स विप्रर्षिर्वांछया राममंदिरे॥ दत्ताशीर्निर्गतः पश्चादामंत्र्य रघुनंदनम्

sūta uvāca evaṁ bhuktvā sa viprarṣirvāṁchayā rāmamaṁdire dattāśīrnirgataḥ paścādāmaṁtrya raghunaṁdanam

सूत जी ने कहा — इस प्रकार राम के भवन में इच्छानुसार भोजन करके, वह विप्रर्षि आशीर्वाद देकर, रघुनंदन से विदा लेकर वहाँ से निकल गए।

श्लोक 2 (skanda.6.100.2)

अथ याते मुनौ तस्मिन्दुर्वाससि तदंतिकात्॥ लक्ष्मणः खङ्गमादाय रामदेवमुवाच ह

atha yāte munau tasmindurvāsasi tadaṁtikāt lakṣmaṇaḥ khaṅgamādāya rāmadevamuvāca ha

फिर जब वह मुनि दुर्वासा वहाँ से चले गए, तब लक्ष्मण खड्ग लेकर राम से बोले।

श्लोक 3 (skanda.6.100.3)

एतत्खङ्गं गृहीत्वाशु मां प्रभो विनिपातय॥ येन ते स्यादृतं वाक्यं प्रतिज्ञातं च यत्पुरा

etatkhaṅgaṁ gṛhītvāśu māṁ prabho vinipātaya yena te syādṛtaṁ vākyaṁ pratijñātaṁ ca yatpurā

"हे प्रभो! इस खड्ग को लेकर शीघ्र मुझे मार डालिए, जिससे आपकी वह प्रतिज्ञा सत्य हो जाए, जो पहले आपने की थी।"

श्लोक 4 (skanda.6.100.4)

ततो रामश्चिरात्स्मृत्वा तां प्रतिज्ञां स्वयं कृताम्॥ वधार्थं संप्रविष्टस्य समीपे पुरुषस्य च

tato rāmaścirātsmṛtvā tāṁ pratijñāṁ svayaṁ kṛtām vadhārthaṁ saṁpraviṣṭasya samīpe puruṣasya ca

तब राम को उस प्रतिज्ञा का स्मरण हुआ, जो उन्होंने स्वयं की थी — कि मंत्रणा-स्थल में प्रवेश करने वाले किसी भी पुरुष को वे वध के लिए मार डालेंगे।

श्लोक 5 (skanda.6.100.5)

ततोऽतिचिंतयामास व्याकुलेनांतरात्मना॥ बाष्पव्याकुलनेत्रश्च निःष्वसन्पन्नगो यथा

tato'ticiṁtayāmāsa vyākulenāṁtarātmanā bāṣpavyākulanetraśca niḥṣvasanpannago yathā

तत्पश्चात् व्याकुल हृदय से वे अत्यंत चिंतित हो गए, उनके नेत्र अश्रुओं से व्याकुल हो गए, और वे सर्प के समान लंबी साँसें लेने लगे।

श्लोक 6 (skanda.6.100.6)

तं दीनवदनं दृष्ट्वा निःष्वसंतं मुहुर्मुहुः॥ भूयः प्रोवाच सौमित्रिर्विनयावनतः स्थितः

taṁ dīnavadanaṁ dṛṣṭvā niḥṣvasaṁtaṁ muhurmuhuḥ bhūyaḥ provāca saumitrirvinayāvanataḥ sthitaḥ

बार-बार साँसें लेते हुए उस दीन मुख वाले राम को देखकर, विनयपूर्वक झुके हुए लक्ष्मण ने पुनः कहा।

श्लोक 7 (skanda.6.100.7)

एष एव परो धर्मो भूपतीनां विशेषतः॥ यथात्मीयं वचस्तथ्यं क्रियते निर्विकल्पितम्

eṣa eva paro dharmo bhūpatīnāṁ viśeṣataḥ yathātmīyaṁ vacastathyaṁ kriyate nirvikalpitam

"राजाओं का यही सर्वोच्च धर्म विशेष रूप से कहा गया है — कि अपने वचन को बिना किसी संकोच के सत्य किया जाए।"

श्लोक 8 (skanda.6.100.8)

तस्मात्त्वया प्रभो प्रोक्तं स्वयमेव ममाग्रतः॥ तस्यैव देवदूतस्य तारनादेन कोपतः

tasmāttvayā prabho proktaṁ svayameva mamāgrataḥ tasyaiva devadūtasya tāranādena kopataḥ

"इसलिए हे प्रभो! आपने स्वयं ही मेरे समक्ष, उस देवदूत की ऊँची आवाज़ से क्रोधित होकर, यह कहा था..."

श्लोक 9 (skanda.6.100.9)

योऽत्रागच्छति सौमित्रे मम दूतस्य संनिधौ॥ तं चेद्धन्मि स्वहस्तेन नाहं तस्मात्सुपापकृत्

yo'trāgacchati saumitre mama dūtasya saṁnidhau taṁ ceddhanmi svahastena nāhaṁ tasmātsupāpakṛt

"'हे सौमित्रि! यहाँ मेरे और इस दूत के निकट जो कोई भी आएगा, उसे यदि मैं अपने ही हाथ से न मारूँ, तो मैं महापापी बनूँगा।'"

श्लोक 10 (skanda.6.100.10)

तदहं चागतस्तात भयाद्दुर्वाससो मुनेः॥ निषिद्धोऽपि त्वयातीव तस्माच्छीघ्रं तु घातय

tadahaṁ cāgatastāta bhayāddurvāsaso muneḥ niṣiddho'pi tvayātīva tasmācchīghraṁ tu ghātaya

"हे तात! मुनि दुर्वासा के भय से मैं ही यहाँ आया था, यद्यपि आपने मुझे अत्यंत निषेध किया था; अतः शीघ्र मुझे मार डालिए।"

श्लोक 11 (skanda.6.100.11)

ततः संमंत्र्य सुचिरं मंत्रिभिः सहितो नृपः॥ ब्राह्मणैर्धर्मशास्त्रज्ञैस्तथान्यैर्वेदपारगैः

tataḥ saṁmaṁtrya suciraṁ maṁtribhiḥ sahito nṛpaḥ brāhmaṇairdharmaśāstrajñaistathānyairvedapāragaiḥ

तत्पश्चात् वह राजा मंत्रियों के साथ, धर्मशास्त्र के ज्ञाता ब्राह्मणों तथा वेदपारंगत अन्य विद्वानों के साथ चिरकाल तक विचार-विमर्श करके...

श्लोक 12 (skanda.6.100.12)

प्रोवाच लक्ष्मणं पश्चाद्विनयावनतं स्थितम्॥ वाष्पक्लिन्नमुखो रामो गद्गदं निःश्वसन्मुहुः

provāca lakṣmaṇaṁ paścādvinayāvanataṁ sthitam vāṣpaklinnamukho rāmo gadgadaṁ niḥśvasanmuhuḥ

...तत्पश्चात् अश्रुओं से भीगे मुख वाले, बार-बार गद्गद स्वर में साँस लेते हुए राम ने विनयपूर्वक खड़े लक्ष्मण से कहा।

श्लोक 13 (skanda.6.100.13)

व्रज लक्ष्मण मुक्तस्त्वं मया देशातरं द्रुतम्॥ त्यागो वाथ वधो वाथ साधूनामुभयं समम्

vraja lakṣmaṇa muktastvaṁ mayā deśātaraṁ drutam tyāgo vātha vadho vātha sādhūnāmubhayaṁ samam

"हे लक्ष्मण! मैं तुम्हें मुक्त करता हूँ; शीघ्र किसी अन्य देश को चले जाओ। सज्जनों के लिए त्याग और वध दोनों समान हैं।"

श्लोक 14 (skanda.6.100.14)

न मया दर्शनं भूयस्तव कार्यं कथंचन॥ न स्थातव्यं च देशेऽपि यदि मे वांछसि प्रियम्

na mayā darśanaṁ bhūyastava kāryaṁ kathaṁcana na sthātavyaṁ ca deśe'pi yadi me vāṁchasi priyam

"मुझे अब तुम्हारा पुनः दर्शन नहीं करना है, यदि तुम मेरा प्रिय चाहते हो, तो तुम्हें इस देश में भी नहीं रहना चाहिए।"

श्लोक 15 (skanda.6.100.15)

तस्य तद्वचनं श्रुत्वा प्रणिपत्य ततः परम्॥ निर्ययौ नगरात्तस्मात्तत्क्षणादेव लक्ष्मणः

tasya tadvacanaṁ śrutvā praṇipatya tataḥ param niryayau nagarāttasmāttatkṣaṇādeva lakṣmaṇaḥ

उनका यह वचन सुनकर, प्रणाम करके, लक्ष्मण उसी क्षण उस नगर से निकल गए।

श्लोक 16 (skanda.6.100.16)

अकृत्वापि समालापं केनचिन्निजमंदिरे॥ मात्रा वा भार्यया वाथ सुतेन सुहृदाथवा

akṛtvāpi samālāpaṁ kenacinnijamaṁdire mātrā vā bhāryayā vātha sutena suhṛdāthavā

उन्होंने अपने घर में माता, पत्नी, पुत्र अथवा मित्र — किसी से भी बात किए बिना यह किया।

श्लोक 17 (skanda.6.100.17)

ततोऽसौ सरयूं गत्वाऽवगाह्याथ च तज्जलम्॥ शुचिर्भूत्वा निविष्टोथ तत्तीरे विजने शुभे

tato'sau sarayūṁ gatvā'vagāhyātha ca tajjalam śucirbhūtvā niviṣṭotha tattīre vijane śubhe

तत्पश्चात् वे सरयू नदी में जाकर उसके जल में डुबकी लगाकर, पवित्र होकर उसके शुभ और एकांत तट पर बैठ गए।

श्लोक 18 (skanda.6.100.18)

पद्मासनं विधायाथ न्यस्यात्मानं तथात्मनि॥ ब्रह्मद्वारेण तं पश्चात्तेजोरूपं व्यसर्जयत्

padmāsanaṁ vidhāyātha nyasyātmānaṁ tathātmani brahmadvāreṇa taṁ paścāttejorūpaṁ vyasarjayat

पद्मासन लगाकर, अपने आत्मा को आत्मा में स्थिर करके, तत्पश्चात् ब्रह्मरंध्र के द्वार से उन्होंने अपने आपको तेजोरूप में विसर्जित कर दिया।

श्लोक 19 (skanda.6.100.19)

अथ तद्राघवो दृष्ट्वा महत्तेजो वियद्गतम्॥ विस्मयेन समायुक्तोऽचिन्तयत्किमिदं ततः

atha tadrāghavo dṛṣṭvā mahattejo viyadgatam vismayena samāyukto'cintayatkimidaṁ tataḥ

तब राम ने उस महान तेज को आकाश में जाते हुए देखकर, आश्चर्यचकित होकर सोचा — "यह क्या है?"

श्लोक 20 (skanda.6.100.20)

अथ मर्त्ये परित्यक्ते तेजसा तेन तत्क्षणात्॥ वैष्णवेन तुरीयेण भागेन द्विजसत्तमाः

atha martye parityakte tejasā tena tatkṣaṇāt vaiṣṇavena turīyeṇa bhāgena dvijasattamāḥ

हे श्रेष्ठ द्विजो! उस तेज के, विष्णु के चतुर्थांश स्वरूप के, उस मर्त्य शरीर को उसी क्षण त्याग देने पर...

श्लोक 21 (skanda.6.100.21)

पपात भूतले कायं काष्ठलोष्टोपमं द्रुतम्॥ लक्ष्मणस्य गतश्रीकं सरय्वाः पुलिने शुभे

papāta bhūtale kāyaṁ kāṣṭhaloṣṭopamaṁ drutam lakṣmaṇasya gataśrīkaṁ sarayvāḥ puline śubhe

...लक्ष्मण का वह शरीर, अपनी शोभा से रहित होकर, काठ अथवा मिट्टी के ढेले के समान, सरयू के शुभ तट पर तत्काल भूतल पर गिर पड़ा।

श्लोक 22 (skanda.6.100.22)

ततस्तु राघवः श्रुत्वा लक्ष्मणं गतजीवितम्॥ पतितं सरितस्तीरे विललाप सुदुःखितः

tatastu rāghavaḥ śrutvā lakṣmaṇaṁ gatajīvitam patitaṁ saritastīre vilalāpa suduḥkhitaḥ

तत्पश्चात् राम ने लक्ष्मण को प्राणरहित होकर नदी-तट पर गिरा हुआ सुनकर, अत्यंत दुःखी होकर विलाप किया।

श्लोक 23 (skanda.6.100.23)

स्वयं गत्वा तमुद्देशं सामात्यः ससुहृज्जनः॥ लक्ष्मणं पतितं दृष्ट्वा करुणं पर्यदेवयत्

svayaṁ gatvā tamuddeśaṁ sāmātyaḥ sasuhṛjjanaḥ lakṣmaṇaṁ patitaṁ dṛṣṭvā karuṇaṁ paryadevayat

वे स्वयं अपने मंत्रियों और मित्रों सहित उस स्थान पर गए, और गिरे हुए लक्ष्मण को देखकर करुणापूर्वक विलाप करने लगे।

श्लोक 24 (skanda.6.100.24)

हा वत्स मां परित्यज्य किं त्वं संप्रस्थितो दिवम्॥ प्राणेष्टं भ्रातरं श्रेष्ठं सदा तव मते स्थितम्

hā vatsa māṁ parityajya kiṁ tvaṁ saṁprasthito divam prāṇeṣṭaṁ bhrātaraṁ śreṣṭhaṁ sadā tava mate sthitam

"हाय वत्स! मुझे त्यागकर तुम स्वर्ग को क्यों चले गए? तुम्हारे प्राणों से भी प्रिय, सदा तुम्हारे विचार में रहने वाला यह तुम्हारा श्रेष्ठ भाई आज विलाप कर रहा है।"

श्लोक 25 (skanda.6.100.25)

तस्मिन्नपि महारण्ये गच्छमानः पुरादहम्॥ अपि संधार्यमाणेन अनुयातस्त्वया तदा

tasminnapi mahāraṇye gacchamānaḥ purādaham api saṁdhāryamāṇena anuyātastvayā tadā

"जब मैं उस महान वन को नगर से जाते हुए भी अकेला ही चल रहा था, तब भी तुमने मुझे संभालते हुए मेरा अनुसरण किया था।"

श्लोक 26 (skanda.6.100.26)

संप्राप्तेऽपि कबंधाख्ये राक्षसे बलवत्तरे॥ त्वया रात्रिमुखे घोरे सभार्योऽहं प्ररक्षितः

saṁprāpte'pi kabaṁdhākhye rākṣase balavattare tvayā rātrimukhe ghore sabhāryo'haṁ prarakṣitaḥ

"जब वह अत्यंत बलवान कबंध नामक राक्षस सामने आया, तब उस भयंकर रात्रि के प्रारंभ में तुमने मुझे मेरी पत्नी सहित सुरक्षित रखा था।"

श्लोक 27 (skanda.6.100.27)

येनेन्द्रजिद्धतो युद्धे तादृग्रूपो निशाचरः॥ स एष पतितः शेते गतासुर्धरणीतले

yenendrajiddhato yuddhe tādṛgrūpo niśācaraḥ sa eṣa patitaḥ śete gatāsurdharaṇītale

"जिसने युद्ध में उस भयंकर राक्षस इन्द्रजित का वध किया, वही यह भाई आज प्राणरहित होकर पृथ्वी पर पड़ा हुआ है।"

श्लोक 28 (skanda.6.100.28)

येन शूर्पणखा ध्वस्ता राक्षसी सा च दारुणा॥ लीलयापि ममादेशात्सोयमेवंविधः स्थितः

yena śūrpaṇakhā dhvastā rākṣasī sā ca dāruṇā līlayāpi mamādeśātsoyamevaṁvidhaḥ sthitaḥ

"जिसने मेरे आदेश से लीलामात्र में ही उस भयंकर राक्षसी शूर्पणखा को क्षत-विक्षत किया था, वही यह आज इस अवस्था में पड़ा हुआ है।"

श्लोक 29 (skanda.6.100.29)

यद्बाहुबलमाश्रित्य मया ध्वस्ता निशाचराः॥ सोऽयं निपतितः शेते मम भ्राता ह्यनाथवत्

yadbāhubalamāśritya mayā dhvastā niśācarāḥ so'yaṁ nipatitaḥ śete mama bhrātā hyanāthavat

"जिसके बाहुबल के सहारे मैंने राक्षसों का विनाश किया, वही यह मेरा भाई आज अनाथ के समान गिरा हुआ पड़ा है।"

श्लोक 30 (skanda.6.100.30)

हा वत्स क्व गतो मां त्वं विमुच्य भ्रातरं निजम्॥ ज्येष्ठं प्राणसमं किं ते स्नेहोऽद्य विगतः क्वचित्

hā vatsa kva gato māṁ tvaṁ vimucya bhrātaraṁ nijam jyeṣṭhaṁ prāṇasamaṁ kiṁ te sneho'dya vigataḥ kvacit

"हाय वत्स! अपने ज्येष्ठ भाई, जो तुम्हें प्राणों के समान प्रिय था, उसे त्यागकर तुम कहाँ चले गए? क्या आज तुम्हारा वह स्नेह कहीं लुप्त हो गया?"

श्लोक 31 (skanda.6.100.31)

सूत उवाच॥ एवं बहुविधान्कृत्वा प्रलापान्रघुनन्दनः॥ मातृभिः सहितो दीनः शोकेन महतान्वितः

sūta uvāca evaṁ bahuvidhānkṛtvā pralāpānraghunandanaḥ mātṛbhiḥ sahito dīnaḥ śokena mahatānvitaḥ

सूत जी ने कहा — इस प्रकार अनेक प्रकार से विलाप करते हुए रघुनंदन राम, अपनी माताओं के साथ अत्यंत दुःखी और महान शोक से युक्त होकर...

श्लोक 32 (skanda.6.100.32)

ततस्ते मंत्रिणस्तस्य प्रोचुस्तं वीक्ष्य दुःखितम्॥ विलपंतं रघुश्रेष्ठं स्त्रीजनेन समन्वितम्

tataste maṁtriṇastasya procustaṁ vīkṣya duḥkhitam vilapaṁtaṁ raghuśreṣṭhaṁ strījanena samanvitam

...तब उनके मंत्रियों ने, स्त्रियों सहित विलाप करते हुए दुःखी रघुश्रेष्ठ राम को देखकर, उनसे कहा।

श्लोक 33 (skanda.6.100.33)

मंत्रिण ऊचुः॥ मा शोकं कुरु राजेन्द्र यथान्यः प्राकृतः स्थितः॥ कुरुष्व च यथेदं स्यात्सांप्रतं चौर्ध्वदैहिकम्

maṁtriṇa ūcuḥ mā śokaṁ kuru rājendra yathānyaḥ prākṛtaḥ sthitaḥ kuruṣva ca yathedaṁ syātsāṁprataṁ caurdhvadaihikam

मंत्रियों ने कहा — "हे राजेंद्र! सामान्य व्यक्ति के समान शोक न कीजिए; अब वह कार्य कीजिए, जिससे इनका अंतिम संस्कार सम्पन्न हो सके।"

श्लोक 34 (skanda.6.100.34)

नष्टं मृतमतीतं च ये शोचन्ति कुबुद्धयः॥ धीराणां तु पुरा राजन्नष्टं नष्टं मृतं मृतम्

naṣṭaṁ mṛtamatītaṁ ca ye śocanti kubuddhayaḥ dhīrāṇāṁ tu purā rājannaṣṭaṁ naṣṭaṁ mṛtaṁ mṛtam

"जो कुबुद्धि लोग होते हैं, वे नष्ट, मृत तथा बीते हुए के लिए शोक करते हैं; परंतु हे राजन्! पूर्वकाल से धीर पुरुषों के लिए तो जो नष्ट हो गया वह नष्ट ही है, और जो मृत हो गया वह मृत ही है।"

श्लोक 35 (skanda.6.100.35)

एवं ते मन्त्रिणः प्रोच्य ततस्तस्य कलेवरम्॥ लक्ष्मणस्य विलप्यौच्चैश्चन्दनोशीरकुंकुमैः

evaṁ te mantriṇaḥ procya tatastasya kalevaram lakṣmaṇasya vilapyauccaiścandanośīrakuṁkumaiḥ

उन मंत्रियों ने इस प्रकार कहकर, उच्च स्वर से विलाप करते हुए, तत्पश्चात् लक्ष्मण के उस शरीर को चंदन, खस तथा कुंकुम से...

श्लोक 36 (skanda.6.100.36)

कर्पूरागुरुमिश्रैश्च तथान्यैः सुसुगन्धिभिः॥ परिवेष्ट्य शुभैर्वस्त्रैः पुष्पैः संभूष्य शोभनैः

karpūrāgurumiśraiśca tathānyaiḥ susugandhibhiḥ pariveṣṭya śubhairvastraiḥ puṣpaiḥ saṁbhūṣya śobhanaiḥ

...कपूर और अगर मिश्रित तथा अन्य सुगंधित पदार्थों से लेपित कर, शुभ वस्त्रों में लपेटकर तथा सुंदर पुष्पों से सुसज्जित किया।

श्लोक 37 (skanda.6.100.37)

चन्दनागुरुकाष्ठैश्च चितिं कृत्वा सुविस्तराम्॥ न्यदधुस्तस्य तद्गात्रं तत्र दक्षिणदिङ्मुखम्

candanāgurukāṣṭhaiśca citiṁ kṛtvā suvistarām nyadadhustasya tadgātraṁ tatra dakṣiṇadiṅmukham

चंदन और अगर की लकड़ी से एक विशाल चिता बनाकर, उन्होंने उनके उस शरीर को दक्षिण दिशा की ओर मुख करके वहाँ रखा।

श्लोक 38 (skanda.6.100.38)

एतस्मिन्नंतरे जातं तत्राश्चर्यं द्विजोत्तमाः॥ तन्मे निगदतः सर्वं शृण्वंतु सकलं द्विजाः

etasminnaṁtare jātaṁ tatrāścaryaṁ dvijottamāḥ tanme nigadataḥ sarvaṁ śṛṇvaṁtu sakalaṁ dvijāḥ

हे श्रेष्ठ द्विजो! इसी बीच वहाँ एक आश्चर्यजनक घटना घटी; हे समस्त द्विजो! मेरे द्वारा कहा जा रहा वह सब सुनिए।

श्लोक 39 (skanda.6.100.39)

यावत्तेंऽतः समारोप्य चितां तस्य कलेवरम्॥ प्रयच्छंति हविर्वाहं तावन्नष्टं कलेवरम्

yāvatteṁ'taḥ samāropya citāṁ tasya kalevaram prayacchaṁti havirvāhaṁ tāvannaṣṭaṁ kalevaram

जैसे ही वे उसके शरीर को चिता पर रखकर अग्नि देने ही वाले थे, कि उतने में ही वह शरीर विलुप्त हो गया।

श्लोक 40 (skanda.6.100.40)

एतस्मिन्नंतरे वाणी निर्गता गगनांगणात्॥ नादयंती दिशः सर्वाः पुष्पवर्षादनंतरम्

etasminnaṁtare vāṇī nirgatā gaganāṁgaṇāt nādayaṁtī diśaḥ sarvāḥ puṣpavarṣādanaṁtaram

इसी बीच आकाश-मंडल से एक वाणी निकली, जो पुष्पवर्षा के पश्चात् समस्त दिशाओं को गुंजायमान करती हुई सुनाई पड़ी।

श्लोक 41 (skanda.6.100.41)

रामराम महाबाहो मा त्वं शोकपरो भव॥ न चास्य युज्यते वह्निर्दातुं चैव कथंचन

rāmarāma mahābāho mā tvaṁ śokaparo bhava na cāsya yujyate vahnirdātuṁ caiva kathaṁcana

"हे राम, राम! हे महाबाहो! तुम शोक मत करो। इसे किसी भी प्रकार अग्नि देना उचित नहीं है।"

श्लोक 42 (skanda.6.100.42)

ब्रह्मज्ञानप्रयुक्तस्य संन्यस्तस्य विशेषतः॥ अग्निदानं न युक्तं स्यात्सर्वेषामपि योगिनाम्

brahmajñānaprayuktasya saṁnyastasya viśeṣataḥ agnidānaṁ na yuktaṁ syātsarveṣāmapi yoginām

"ब्रह्मज्ञान में स्थित संन्यासी, तथा विशेष रूप से समस्त योगियों के लिए भी, अग्निदान उचित नहीं होता।"

श्लोक 43 (skanda.6.100.43)

तवायं बांधवो राम ब्रह्मणः सदनं गतः॥ ब्रह्मद्वारेण चात्मानं निष्क्रम्य सुमहायशाः

tavāyaṁ bāṁdhavo rāma brahmaṇaḥ sadanaṁ gataḥ brahmadvāreṇa cātmānaṁ niṣkramya sumahāyaśāḥ

"हे राम! तुम्हारा यह भाई, अत्यंत यशस्वी, ब्रह्मरंध्र के द्वार से अपने आपको बाहर निकालकर ब्रह्मलोक को चला गया है।"

श्लोक 44 (skanda.6.100.44)

अथ ते मंत्रिणः प्रोचुस्तच्छ्रुत्वाऽऽकाशगं वचः॥ अशोच्यो यं महाराज संसिद्धिं परमां गतः॥ लक्ष्मणो गम्यतां शीघ्रं तस्मात्स्वभवने विभो

atha te maṁtriṇaḥ procustacchrutvā''kāśagaṁ vacaḥ aśocyo yaṁ mahārāja saṁsiddhiṁ paramāṁ gataḥ lakṣmaṇo gamyatāṁ śīghraṁ tasmātsvabhavane vibho

उस आकाशवाणी को सुनकर, तत्पश्चात् मंत्रियों ने कहा — "हे महाराज! जो परम सिद्धि को प्राप्त हो चुके हैं, उन लक्ष्मण के लिए शोक करना उचित नहीं है; अतः हे प्रभो! अब शीघ्र अपने भवन को चलिए।"

श्लोक 45 (skanda.6.100.45)

चिन्त्यन्तां राजकार्याणि तथा यच्चौर्ध्वदैहिकम्॥ कुरु स्नेहोचितं तस्य पृष्ट्वा ब्राह्मणसत्तमान्

cintyantāṁ rājakāryāṇi tathā yaccaurdhvadaihikam kuru snehocitaṁ tasya pṛṣṭvā brāhmaṇasattamān

"अब राज्य के कार्यों का विचार कीजिए, तथा उनके स्नेह के अनुकूल जो भी अंत्येष्टि-संबंधी कर्तव्य हो, वह श्रेष्ठ ब्राह्मणों से पूछकर सम्पन्न कीजिए।"

श्लोक 46 (skanda.6.100.46)

राम उवाच॥ नाहं गृहं गमिष्यामि लक्ष्मणेन विनाऽधुना॥ प्राणानत्र विहास्यामि यथा तेन महात्मना

rāma uvāca nāhaṁ gṛhaṁ gamiṣyāmi lakṣmaṇena vinā'dhunā prāṇānatra vihāsyāmi yathā tena mahātmanā

राम ने कहा — "मैं अब लक्ष्मण के बिना घर नहीं जाऊँगा; मैं भी उस महात्मा की भाँति यहीं अपने प्राण त्याग दूँगा।"

श्लोक 47 (skanda.6.100.47)

एष पुत्रो मया दत्तः कुशाख्यो मम संमतः॥ युष्मभ्यं क्रियतां राज्ये मदीये यदि रोचते

eṣa putro mayā dattaḥ kuśākhyo mama saṁmataḥ yuṣmabhyaṁ kriyatāṁ rājye madīye yadi rocate

"यह मेरा प्रिय पुत्र, कुश नामक, तुम्हें सौंपता हूँ; यदि तुम्हें रुचिकर लगे, तो इसे मेरे राज्य पर अभिषिक्त कर दो।"

श्लोक 48 (skanda.6.100.48)

एवमुक्त्वा ततो रामो गन्तुकामो दिवालयम्॥ चिन्तयामास भूयोऽपि स्मृत्वा मित्रं विभीषणम्

evamuktvā tato rāmo gantukāmo divālayam cintayāmāsa bhūyo'pi smṛtvā mitraṁ vibhīṣaṇam

ऐसा कहकर तत्पश्चात् राम, स्वर्गलोक जाने की इच्छा रखते हुए, अपने मित्र विभीषण का स्मरण कर पुनः विचार करने लगे।

श्लोक 49 (skanda.6.100.49)

मया तस्य तदा दत्तं लंकायां राज्यमक्षयम्॥ बहुभक्तिप्रतुष्टेन यावच्चन्द्रार्कतारकाः

mayā tasya tadā dattaṁ laṁkāyāṁ rājyamakṣayam bahubhaktipratuṣṭena yāvaccandrārkatārakāḥ

"मैंने उसकी अत्यंत भक्ति से प्रसन्न होकर उसे लंका का अक्षय राज्य दिया था, जो चंद्र, सूर्य और तारों के रहने तक स्थायी हो।"

श्लोक 50 (skanda.6.100.50)

अतिक्रूरतरा जाती राक्षसानां यतः स्मृता॥ विशेषाद्वरपुष्टानां जायतेऽत्र धरातले

atikrūratarā jātī rākṣasānāṁ yataḥ smṛtā viśeṣādvarapuṣṭānāṁ jāyate'tra dharātale

"क्योंकि राक्षसों की जाति अत्यंत क्रूर मानी गई है, और वह इस भूतल पर विशेष रूप से वर से पोषित हुए लोगों में भी उत्पन्न हो सकती है।"

श्लोक 51 (skanda.6.100.51)

तच्चेद्राक्षसभावेन स महात्मा विभीषणः॥ करिष्यति सुरैः सार्धं विरोधं रावणो यथा

taccedrākṣasabhāvena sa mahātmā vibhīṣaṇaḥ kariṣyati suraiḥ sārdhaṁ virodhaṁ rāvaṇo yathā

"यदि वह महात्मा विभीषण भी राक्षस-स्वभाव के कारण देवताओं से वैसा ही विरोध करने लगे, जैसा रावण ने किया था..."

श्लोक 52 (skanda.6.100.52)

तं देवाः सूदयिष्यंति उपायैः सामपूर्वकैः॥ त्रैलोक्यकण्टको यद्वत्तस्य भ्राता दशाननः

taṁ devāḥ sūdayiṣyaṁti upāyaiḥ sāmapūrvakaiḥ trailokyakaṇṭako yadvattasya bhrātā daśānanaḥ

"...तो देवता उपायों तथा साम-नीति द्वारा उसे भी उसी प्रकार नष्ट कर देंगे, जिस प्रकार त्रिलोक के कंटकरूप उसके भाई रावण को नष्ट किया गया।"

श्लोक 53 (skanda.6.100.53)

ततो मे स्यान्मृषा वाणी तस्माद्गत्वा तदंतिकम्॥ शिक्षां ददामि तस्याहं यथा देवान्न दूषयेत्

tato me syānmṛṣā vāṇī tasmādgatvā tadaṁtikam śikṣāṁ dadāmi tasyāhaṁ yathā devānna dūṣayet

"तब मेरी वह वाणी मिथ्या हो जाएगी; इसलिए मैं उसके निकट जाकर उसे यह शिक्षा दूँगा, जिससे वह देवताओं के प्रति कोई दोष न करे।"

श्लोक 54 (skanda.6.100.54)

तथा मे परमं मित्रं द्वितीयं वानरः स्थितः॥ सुग्रीवाख्यो महाभागो जांबवांश्च तथाऽपरः

tathā me paramaṁ mitraṁ dvitīyaṁ vānaraḥ sthitaḥ sugrīvākhyo mahābhāgo jāṁbavāṁśca tathā'paraḥ

"इसके साथ ही मेरा दूसरा परम मित्र, महाभाग वानर सुग्रीव है, तथा एक अन्य जाम्बवान भी है।"

श्लोक 55 (skanda.6.100.55)

सभृत्यो वायुपुत्रश्च वालिपुत्रसमन्वितः॥ कुमुदाख्यश्च तारश्च तथान्येऽपि च वानराः

sabhṛtyo vāyuputraśca vāliputrasamanvitaḥ kumudākhyaśca tāraśca tathānye'pi ca vānarāḥ

सेवकों सहित वायुपुत्र हनुमान, वालिपुत्र अंगद सहित, तथा कुमुद, तार और अन्य भी अनेक वानर मेरे मित्र हैं।

श्लोक 56 (skanda.6.100.56)

तस्मात्तानपि संभाष्य सर्वान्संमंत्र्य सादरम्॥ ततो गच्छामि देवानां कृतकृत्यो गृहं प्रति

tasmāttānapi saṁbhāṣya sarvānsaṁmaṁtrya sādaram tato gacchāmi devānāṁ kṛtakṛtyo gṛhaṁ prati

"इसलिए उन सबसे भी मिलकर, आदरपूर्वक सबसे विचार-विमर्श करके, तत्पश्चात् मैं कृतकृत्य होकर देवताओं के घर को जाऊँगा।"

श्लोक 57 (skanda.6.100.57)

एवं संचिन्त्य सुचिरं समाहूय च पुष्पकम्॥ तत्रारुह्य ययौ तूर्णं किष्किन्धाख्यां पुरीं प्रति

evaṁ saṁcintya suciraṁ samāhūya ca puṣpakam tatrāruhya yayau tūrṇaṁ kiṣkindhākhyāṁ purīṁ prati

इस प्रकार चिरकाल तक विचार कर, पुष्पक विमान को बुलाकर, उस पर आरूढ़ होकर वे शीघ्र किष्किंधा नामक नगरी की ओर चल पड़े।

श्लोक 58 (skanda.6.100.58)

अथ ते वानरा दृष्ट्वा प्रोद्द्योतं पुष्पकोद्भवम्॥ विज्ञाय राघवं प्राप्तं सत्वरं सम्मुखा ययुः

atha te vānarā dṛṣṭvā proddyotaṁ puṣpakodbhavam vijñāya rāghavaṁ prāptaṁ satvaraṁ sammukhā yayuḥ

तब उन वानरों ने पुष्पक विमान से निकलती हुई प्रचंड आभा को देखकर, राघव के आगमन को जानकर, शीघ्र उनके सम्मुख आ पहुँचे।

श्लोक 59 (skanda.6.100.59)

ततः प्रणम्य ते दूराज्जानुभ्यामवनिं गताः॥ जयेति शब्दमादाय मुहुर्मुहुरितस्ततः

tataḥ praṇamya te dūrājjānubhyāmavaniṁ gatāḥ jayeti śabdamādāya muhurmuhuritastataḥ

तत्पश्चात् दूर से ही प्रणाम कर, वे घुटनों के बल भूमि पर गिर पड़े, और बार-बार चारों ओर से "जय हो, जय हो" का शब्द करने लगे।

श्लोक 60 (skanda.6.100.60)

ततस्तेनैव संयुक्ताः किष्किन्धां तां महापुरीम्॥ विविशुः सत्पताकाभिः समंतात्समलंकृताम्

tatastenaiva saṁyuktāḥ kiṣkindhāṁ tāṁ mahāpurīm viviśuḥ satpatākābhiḥ samaṁtātsamalaṁkṛtām

तत्पश्चात् उनके साथ मिलकर वे उस महानगरी किष्किंधा में प्रविष्ट हुए, जो चारों ओर से सुंदर पताकाओं से सुसज्जित थी।

श्लोक 61 (skanda.6.100.61)

अथोत्तीर्य विमानाग्र्यात्सुग्रीवभवने शुभे॥ प्रविवेश द्रुतं रामः सर्वतः सुविभूषिते

athottīrya vimānāgryātsugrīvabhavane śubhe praviveśa drutaṁ rāmaḥ sarvataḥ suvibhūṣite

तत्पश्चात् उस उत्तम विमान से उतरकर, राम शीघ्र ही सुग्रीव के, चारों ओर से सुसज्जित उस शुभ भवन में प्रविष्ट हुए।

श्लोक 62 (skanda.6.100.62)

तत्र रामं निविष्टं ते विश्रांतं वीक्ष्य वानराः॥ अर्घ्यादिभिश्च संपूज्य पप्रच्छुस्तदनन्तरम्

tatra rāmaṁ niviṣṭaṁ te viśrāṁtaṁ vīkṣya vānarāḥ arghyādibhiśca saṁpūjya papracchustadanantaram

वहाँ विराजमान और विश्राम करते हुए राम को देखकर उन वानरों ने अर्घ्य आदि से उनकी पूजा की, और तत्पश्चात् उनसे पूछा।

श्लोक 63 (skanda.6.100.63)

वानरा ऊचुः॥ तेजसा त्वं विनिर्मुक्तो दृश्यसे रघुनन्दन॥ कृशोऽस्यतीव चोद्विग्नः कच्चित्क्षेमं गृहे तव

vānarā ūcuḥ tejasā tvaṁ vinirmukto dṛśyase raghunandana kṛśo'syatīva codvignaḥ kaccitkṣemaṁ gṛhe tava

वानरों ने कहा — "हे रघुनंदन! आप तेजरहित प्रतीत हो रहे हैं, अत्यंत दुर्बल और व्याकुल भी हैं; क्या आपके घर में सब कुशल है?"

श्लोक 64 (skanda.6.100.64)

काये वाऽनुगतो नित्यं तथा ते लक्ष्मणोऽनुजः॥ न दृश्यते समीपस्थः किमद्य तव राघव

kāye vā'nugato nityaṁ tathā te lakṣmaṇo'nujaḥ na dṛśyate samīpasthaḥ kimadya tava rāghava

"और आपके साथ सदा छाया की भाँति रहने वाला आपका अनुज लक्ष्मण भी आज आपके समीप दिखाई नहीं दे रहा है — हे राघव! यह क्या है?"

श्लोक 65 (skanda.6.100.65)

तथा प्राणसमाऽभीष्टा सीता तव प्रभो॥ दृश्यते किं न पार्श्वस्था एतन्नः कौतुकं परम्

tathā prāṇasamā'bhīṣṭā sītā tava prabho dṛśyate kiṁ na pārśvasthā etannaḥ kautukaṁ param

"हे प्रभो! तथा आपको प्राणों के समान प्रिय सीता भी आपके पास दिखाई नहीं दे रही हैं; यह हमारे लिए अत्यंत कौतूहल की बात है।"

श्लोक 66 (skanda.6.100.66)

सूत उवाच॥ तेषां तद्वचनं श्रुत्वा चिरं निःश्वस्य राघवः॥ वाष्पपूर्णेक्षणो भूत्वा सर्वं तेषां न्यवेदयत्

sūta uvāca teṣāṁ tadvacanaṁ śrutvā ciraṁ niḥśvasya rāghavaḥ vāṣpapūrṇekṣaṇo bhūtvā sarvaṁ teṣāṁ nyavedayat

सूत जी ने कहा — उनका यह वचन सुनकर राघव ने चिरकाल तक साँस लेकर, नेत्रों में अश्रु भरकर, उन्हें सब कुछ बता दिया।

श्लोक 67 (skanda.6.100.67)

अथ सीता परित्यक्ता तथा भ्राता स लक्ष्मणः॥ यदर्थं तत्र संप्राप्तः स्वयमेव द्विजोत्तमाः

atha sītā parityaktā tathā bhrātā sa lakṣmaṇaḥ yadarthaṁ tatra saṁprāptaḥ svayameva dvijottamāḥ

हे श्रेष्ठ द्विजो! उन्होंने बताया कि किस प्रकार सीता का परित्याग हुआ, तथा किस कारण से उनके भाई लक्ष्मण भी वहाँ से स्वयं चले गए।

श्लोक 68 (skanda.6.100.68)

तच्छ्रुत्वा वानराः सर्वे सुग्रीवप्रमुखास्ततः॥ रुरुदुस्ते सुदुःखार्ताः समालिंग्य ततः परम्

tacchrutvā vānarāḥ sarve sugrīvapramukhāstataḥ ruruduste suduḥkhārtāḥ samāliṁgya tataḥ param

यह सुनकर सुग्रीव प्रमुख सभी वानर अत्यंत दुःख से पीड़ित हो गए, और तत्पश्चात् उन्हें आलिंगन कर रोने लगे।

श्लोक 69 (skanda.6.100.69)

एवं चिरं प्रलप्योच्चैस्ततः प्रोचू रघूत्तमम्॥ आदेशो दीयतां राजन्योऽस्माभिरिह सिध्यति

evaṁ ciraṁ pralapyoccaistataḥ procū raghūttamam ādeśo dīyatāṁ rājanyo'smābhiriha sidhyati

इस प्रकार चिरकाल तक उच्च स्वर में विलाप करके, तत्पश्चात् उन्होंने रघुश्रेष्ठ से कहा — "हे राजन्! ऐसी आज्ञा दीजिए, जो हमारे द्वारा यहाँ पूर्ण की जा सके।"

श्लोक 70 (skanda.6.100.70)

धन्या वयं धरापृष्ठे येषां त्वं रघुसत्तम॥ ईदृक्स्नेहसमायुक्तः समागच्छसि मंदिरे

dhanyā vayaṁ dharāpṛṣṭhe yeṣāṁ tvaṁ raghusattama īdṛksnehasamāyuktaḥ samāgacchasi maṁdire

"हे रघुसत्तम! धन्य हैं हम, जिनके लिए आप इतने स्नेह से युक्त होकर हमारे घर पधारते हैं।"

श्लोक 71 (skanda.6.100.71)

राम उवाच॥ उषित्वा रजनीमेकां सुग्रीव तव मंदिरे॥ प्रातर्लंकां गमिष्यामि यत्रास्ते स विभीषणः

rāma uvāca uṣitvā rajanīmekāṁ sugrīva tava maṁdire prātarlaṁkāṁ gamiṣyāmi yatrāste sa vibhīṣaṇaḥ

राम ने कहा — "हे सुग्रीव! तुम्हारे भवन में एक रात्रि निवास करके, प्रातःकाल मैं उस लंका को जाऊँगा, जहाँ विभीषण रहते हैं।"

श्लोक 72 (skanda.6.100.72)

प्रधानामात्ययुक्तेन त्वयापि कपिसत्तम॥ आगंतव्यं मया सार्धं विभीषणगृहं प्रति

pradhānāmātyayuktena tvayāpi kapisattama āgaṁtavyaṁ mayā sārdhaṁ vibhīṣaṇagṛhaṁ prati

"हे कपिश्रेष्ठ! तुम्हें भी अपने प्रमुख मंत्रियों सहित मेरे साथ विभीषण के भवन को चलना होगा।"

अध्याय 99अध्याय-सूचीअध्याय 101