नागर खण्ड · अध्याय 101
सेतु के मध्य श्रीराम द्वारा रामेश्वर-प्रतिष्ठा का वर्णन
श्लोक 1 (skanda.6.101.1)
सूत उवाच । एवं तां रजनीं तत्र स उषित्वा रघूत्तमः । उपास्यमानः सर्वैस्तैः सद्भक्त्या वानरोत्तमैः
sūta uvāca evaṁ tāṁ rajanīṁ tatra sa uṣitvā raghūttamaḥ upāsyamānaḥ sarvaistaiḥ sadbhaktyā vānarottamaiḥ
सूत जी ने कहा — उस रात्रि को वहाँ बिताकर, रघुश्रेष्ठ राम की उन समस्त श्रेष्ठ वानरों ने सच्ची भक्ति से सेवा की।
श्लोक 2 (skanda.6.101.2)
ततः प्रभाते विमले प्रोद्गते रविमण्डले । कृत्वा प्राभातिकं कर्म समाहूयाथ पुष्पकम्
tataḥ prabhāte vimale prodgate ravimaṇḍale kṛtvā prābhātikaṁ karma samāhūyātha puṣpakam
तत्पश्चात् निर्मल प्रभात में सूर्यमण्डल के उदित होने पर, प्रातःकालीन कर्म करके उन्होंने पुष्पक विमान को बुलाया।
श्लोक 3 (skanda.6.101.3)
सुग्रीवेण सुषेणेन तारेण कुमुदेन च । अंगदेनाथ कुण्डेन वायुपुत्रेण धीमता
sugrīveṇa suṣeṇena tāreṇa kumudena ca aṁgadenātha kuṇḍena vāyuputreṇa dhīmatā
सुग्रीव, सुषेण, तार तथा कुमुद के साथ, अंगद, कुण्ड तथा बुद्धिमान वायुपुत्र हनुमान के साथ,
श्लोक 4 (skanda.6.101.4)
गवाक्षेण नलेनेव तथा जांबवतापि च । दशभिर्वानरैः सार्धं समारूढः स पुष्पके
gavākṣeṇa naleneva tathā jāṁbavatāpi ca daśabhirvānaraiḥ sārdhaṁ samārūḍhaḥ sa puṣpake
तथा गवाक्ष और नल के साथ, और जाम्बवान् के साथ भी — इन दस वानरों सहित वे पुष्पक पर आरूढ़ हुए।
श्लोक 5 (skanda.6.101.5)
ततः संप्रस्थितः काले लंकामुद्दिश्य राघवः । मनोजवेन तेनैव विमानेन सुवर्चसा
tataḥ saṁprasthitaḥ kāle laṁkāmuddiśya rāghavaḥ manojavena tenaiva vimānena suvarcasā
तत्पश्चात् समय आने पर राघव मनोवेगी और तेजस्वी उस विमान से लंका की ओर चल पड़े।
श्लोक 6 (skanda.6.101.6)
संप्राप्तस्तत्क्षणादेव लंकाख्यां च महापुरीम् । वीक्षयंस्तान्प्रदेशांश्च यत्र युद्धं पुराऽभवत्
saṁprāptastatkṣaṇādeva laṁkākhyāṁ ca mahāpurīm vīkṣayaṁstānpradeśāṁśca yatra yuddhaṁ purā'bhavat
उसी क्षण वे लंका नामक उस महापुरी में पहुँच गए, तथा उन प्रदेशों को देखने लगे जहाँ पूर्वकाल में युद्ध हुआ था।
श्लोक 7 (skanda.6.101.7)
ततो विभीषणो दृष्ट्वा प्रोद्द्योतं पुष्पकोद्भवम् । रामं विज्ञाय संप्राप्तं प्रहृष्टः सम्मुखो ययौ । मंत्रिभिः सकलैः सार्धं तथा भृत्यैः सुतैरपि
tato vibhīṣaṇo dṛṣṭvā proddyotaṁ puṣpakodbhavam rāmaṁ vijñāya saṁprāptaṁ prahṛṣṭaḥ sammukho yayau maṁtribhiḥ sakalaiḥ sārdhaṁ tathā bhṛtyaiḥ sutairapi
तब विभीषण ने पुष्पक से उत्पन्न प्रकाश को देखकर और राम के आगमन को जानकर, हर्षित होकर अपने सभी मंत्रियों, सेवकों और पुत्रों सहित उनके सम्मुख गए।
श्लोक 8 (skanda.6.101.8)
अथ दृष्ट्वा सुदूरात्तं रामदेवं विभीषणः । पपात दण्डवद्भूमौ जयशब्दमुदीरयन्
atha dṛṣṭvā sudūrāttaṁ rāmadevaṁ vibhīṣaṇaḥ papāta daṇḍavadbhūmau jayaśabdamudīrayan
तत्पश्चात् दूर से ही रामदेव को देखकर विभीषण जय-जयकार करते हुए दण्ड के समान भूमि पर गिर पड़े।
श्लोक 9 (skanda.6.101.9)
तथागतं परिष्वज्य सादरं स विभीषणम् । तेनैव सहितः पश्चाल्लंकां तां प्रविवेश ह
tathāgataṁ pariṣvajya sādaraṁ sa vibhīṣaṇam tenaiva sahitaḥ paścāllaṁkāṁ tāṁ praviveśa ha
उस प्रकार आए हुए विभीषण का आदरपूर्वक आलिंगन करके, राम उनके साथ ही उस लंका में प्रविष्ट हुए।
श्लोक 10 (skanda.6.101.10)
विभीषणगृहं प्राप्य तत्र सिंहासने शुभे । निविष्टो वानरैस्तैश्च समन्तात्परिवारितः
vibhīṣaṇagṛhaṁ prāpya tatra siṁhāsane śubhe niviṣṭo vānaraistaiśca samantātparivāritaḥ
विभीषण के घर पहुँचकर, वहाँ शुभ सिंहासन पर विराजमान होकर, चारों ओर से उन वानरों से घिरे हुए।
श्लोक 11 (skanda.6.101.11)
ततो निवेदयामास तस्मै सर्वं विभीषणः । राज्यं पुत्रकलत्रादि यच्चान्यदपि किंचन
tato nivedayāmāsa tasmai sarvaṁ vibhīṣaṇaḥ rājyaṁ putrakalatrādi yaccānyadapi kiṁcana
तब विभीषण ने उन्हें सब कुछ निवेदित किया — राज्य, पुत्र, पत्नी आदि और जो कुछ भी अन्य था।
श्लोक 12 (skanda.6.101.12)
ततः प्रोवाच विनयात्कृतांजलिपुटः स्थितः । आदेशो दीयतां देव ब्रूहि कृत्यं करोमि किम्
tataḥ provāca vinayātkṛtāṁjalipuṭaḥ sthitaḥ ādeśo dīyatāṁ deva brūhi kṛtyaṁ karomi kim
तब विनयपूर्वक हाथ जोड़कर खड़े होकर उन्होंने कहा — हे देव! आदेश दीजिए, बताइए मैं क्या करूँ?
श्लोक 13 (skanda.6.101.13)
अकस्मादेव संप्राप्तः किमर्थं वद मे प्रभो । किं नायातः स सौमित्रिस्त्वया सार्ध च जानकी
akasmādeva saṁprāptaḥ kimarthaṁ vada me prabho kiṁ nāyātaḥ sa saumitristvayā sārdha ca jānakī
आप अकस्मात् ही आए हैं — हे प्रभो! बताइए क्यों? क्या सौमित्र और आपके साथ जानकी नहीं आईं?
श्लोक 14 (skanda.6.101.14)
सूत उवाच । निवेद्य राघवस्तस्मै सर्वं गद्गदया गिरा । वाष्पपूरप्रतिच्छन्नवक्त्रो भूयो विनिःश्वसन्
sūta uvāca nivedya rāghavastasmai sarvaṁ gadgadayā girā vāṣpapūrapraticchannavaktro bhūyo viniḥśvasan
सूत जी ने कहा — गद्गद वाणी से उन्हें सब कुछ बताते हुए, आँसुओं की धारा से मुख को ढके हुए, बार-बार दीर्घ श्वास लेते हुए,
श्लोक 15 (skanda.6.101.15)
ततः प्रोवाच सत्यार्थं विभीषणकृते हितम् । तं चापि शोकसंतप्तं संबोध्य रघुनंदनः
tataḥ provāca satyārthaṁ vibhīṣaṇakṛte hitam taṁ cāpi śokasaṁtaptaṁ saṁbodhya raghunaṁdanaḥ
तब शोकसंतप्त विभीषण को सांत्वना देकर, रघुनंदन ने उनके हित के लिए सत्य वृत्तांत कहा।
श्लोक 16 (skanda.6.101.16)
अहं राज्यं परित्यज्य सांप्रतं राक्षसोत्तम । यास्यामि त्रिदिवं तूर्णं लक्ष्मणो यत्र संस्थितः
ahaṁ rājyaṁ parityajya sāṁprataṁ rākṣasottama yāsyāmi tridivaṁ tūrṇaṁ lakṣmaṇo yatra saṁsthitaḥ
[राम ने कहा—] हे राक्षसश्रेष्ठ! अब राज्य त्यागकर मैं शीघ्र ही स्वर्ग को जाऊँगा, जहाँ लक्ष्मण स्थित हैं।
श्लोक 17 (skanda.6.101.17)
न तेन रहितो मर्त्ये मुहूर्तमपि चोत्सहे । स्थातुं राक्षसशार्दूल बांधवेन महात्मना
na tena rahito martye muhūrtamapi cotsahe sthātuṁ rākṣasaśārdūla bāṁdhavena mahātmanā
हे राक्षसशार्दूल! उस महात्मा बंधु के बिना मैं क्षणभर भी मृत्युलोक में रहने का उत्साह नहीं रखता।
श्लोक 18 (skanda.6.101.18)
अहं शिक्षापणार्थाय तव प्राप्तो विभीषण । तस्मादव्यग्रचित्तेन संशृणुष्व कुरुष्व च
ahaṁ śikṣāpaṇārthāya tava prāpto vibhīṣaṇa tasmādavyagracittena saṁśṛṇuṣva kuruṣva ca
हे विभीषण! मैं तुम्हें उपदेश देने के लिए आया हूँ; अतः अव्यग्र चित्त से सुनो और वैसा ही आचरण करो।
श्लोक 19 (skanda.6.101.19)
एषा राज्योद्भवा लक्ष्मीर्मदं संजनयेन्नृणाम् । मद्यवत्स्वल्पबुद्धीनां तस्मात्कार्यो न स त्वया
eṣā rājyodbhavā lakṣmīrmadaṁ saṁjanayennṛṇām madyavatsvalpabuddhīnāṁ tasmātkāryo na sa tvayā
यह राज्य से उत्पन्न लक्ष्मी मनुष्यों में मद उत्पन्न करती है, अल्पबुद्धि वालों के लिए मद्य के समान — अतः इसका दुरुपयोग तुम्हें नहीं करना चाहिए।
श्लोक 20 (skanda.6.101.20)
शक्राद्या अमराः सर्वे त्वया पूज्याः सदैव हि । मान्याश्च येन ते राज्यं जायते शाश्वतं सदा
śakrādyā amarāḥ sarve tvayā pūjyāḥ sadaiva hi mānyāśca yena te rājyaṁ jāyate śāśvataṁ sadā
इंद्र आदि समस्त देवगण सदैव तुम्हारे द्वारा पूज्य हैं; उन्हें सम्मान देने से ही तुम्हारा राज्य सदा शाश्वत बना रहेगा।
श्लोक 21 (skanda.6.101.21)
मम सत्यं भवेद्वाक्यमेतस्मादहमागतः । प्राप्तराज्यप्रतिष्ठोऽपि तव भ्राता महाबलः
mama satyaṁ bhavedvākyametasmādahamāgataḥ prāptarājyapratiṣṭho'pi tava bhrātā mahābalaḥ
मेरा यह वचन सत्य हो — इसी हेतु मैं यहाँ आया हूँ; तुम्हारा वह महाबली भ्राता, राज्य-प्रतिष्ठा को प्राप्त करने पर भी,
श्लोक 22 (skanda.6.101.22)
विनाशं सहसा प्राप्तस्तस्मान्मान्याः सुराः सदा । यदि कश्चित्समायाति मानुषोऽत्र कथंचन । मत्काय एव द्रष्टव्यः सर्वैरेव निशाचरैः
vināśaṁ sahasā prāptastasmānmānyāḥ surāḥ sadā yadi kaścitsamāyāti mānuṣo'tra kathaṁcana matkāya eva draṣṭavyaḥ sarvaireva niśācaraiḥ
वह सहसा विनाश को प्राप्त हो गया; अतः देवता सदा माननीय हैं। यदि यहाँ कोई मानव किसी प्रकार आ जाए, तो सभी राक्षसों द्वारा उसे मेरे ही शरीर के समान देखा जाना चाहिए।
श्लोक 23 (skanda.6.101.23)
तथा निशाचराः सर्वे त्वया वार्या विभीषण । मम सेतुं समुल्लंघ्य न गंतव्यं धरातले
tathā niśācarāḥ sarve tvayā vāryā vibhīṣaṇa mama setuṁ samullaṁghya na gaṁtavyaṁ dharātale
तथा हे विभीषण! तुम्हें सभी राक्षसों को रोकना होगा — वे मेरे सेतु को लांघकर पृथ्वीतल पर न जाएँ।
श्लोक 24 (skanda.6.101.24)
विभीषण उवाच । एवं विभो करिष्यामि तवादेशमसंशयम् । परं त्वया परित्यक्ते मर्त्ये मे जीवितं व्रजेत्
vibhīṣaṇa uvāca evaṁ vibho kariṣyāmi tavādeśamasaṁśayam paraṁ tvayā parityakte martye me jīvitaṁ vrajet
विभीषण ने कहा — हे विभो! ऐसा ही होगा, मैं निःसंदेह आपके आदेश का पालन करूँगा; परन्तु आपके इस मर्त्यलोक को त्याग देने पर मेरा जीवन भी चला जाएगा —
श्लोक 25 (skanda.6.101.25)
तस्मान्मामपि तत्रैव त्वं विभो नेतुमर्हसि । आत्मना सह यत्रास्ते प्राग्गतो लक्ष्मणस्तव
tasmānmāmapi tatraiva tvaṁ vibho netumarhasi ātmanā saha yatrāste prāggato lakṣmaṇastava
अतः हे विभो! आपको मुझे भी वहीं ले जाना उचित है, जहाँ आपके साथ पहले गए हुए आपके लक्ष्मण हैं।
श्लोक 26 (skanda.6.101.26)
श्रीराम उवाच । मया तेऽक्षयमादिष्टं राज्यं राक्षससत्तम । तस्मान्नार्हसि मां कर्तुं मिथ्याचारं कथंचन
śrīrāma uvāca mayā te'kṣayamādiṣṭaṁ rājyaṁ rākṣasasattama tasmānnārhasi māṁ kartuṁ mithyācāraṁ kathaṁcana
श्रीराम ने कहा — हे राक्षससत्तम! मैंने तुम्हें अक्षय राज्य प्रदान किया है; अतः तुम्हें किसी भी प्रकार मेरे वचन को मिथ्या नहीं करना चाहिए।
श्लोक 27 (skanda.6.101.27)
अहमस्मिन्स्वके सेतौ शंकरत्रितयं शुभम् । स्थापयिष्यामि कीर्त्यर्थं तत्पूज्यं भवता सदा । भक्तिमान्प्रतिसंधाय यावच्चंद्रार्कतारकम्
ahamasminsvake setau śaṁkaratritayaṁ śubham sthāpayiṣyāmi kīrtyarthaṁ tatpūjyaṁ bhavatā sadā bhaktimānpratisaṁdhāya yāvaccaṁdrārkatārakam
इस अपने सेतु पर मैं तीन शुभ शंकर-लिंगों की स्थापना करूँगा, कीर्ति के हेतु, जो भक्तिपूर्वक तुम्हारे द्वारा चंद्र-सूर्य-तारे रहने तक सदा पूज्य रहेंगे।
श्लोक 28 (skanda.6.101.28)
एवमुक्त्वा रघुश्रेष्ठो राक्षसेन्द्रं विभीषणम् । दशरात्रं तत्र तस्थौ लंकायां वानरैः सह
evamuktvā raghuśreṣṭho rākṣasendraṁ vibhīṣaṇam daśarātraṁ tatra tasthau laṁkāyāṁ vānaraiḥ saha
रघुश्रेष्ठ राम राक्षसेन्द्र विभीषण से इस प्रकार कहकर, वानरों सहित लंका में दस रात्रि तक वहीं ठहरे।
श्लोक 29 (skanda.6.101.29)
कुर्वन्युद्धकथाश्चित्रा याः कृताः पूर्वमेव हि । पश्यन्युद्धस्य सर्वाणि स्थानानि विविधानि च
kurvanyuddhakathāścitrā yāḥ kṛtāḥ pūrvameva hi paśyanyuddhasya sarvāṇi sthānāni vividhāni ca
पूर्व में हुए युद्ध की विचित्र कथाओं का वर्णन करते हुए, तथा युद्ध के समस्त विविध स्थानों को देखते हुए,
श्लोक 30 (skanda.6.101.30)
शंसमानः प्रवीरांस्तान्राक्षसान्बलवत्तरान् । कुम्भकर्णेन्द्रजित्पूर्वान्संख्ये चाभिमुखागतान्
śaṁsamānaḥ pravīrāṁstānrākṣasānbalavattarān kumbhakarṇendrajitpūrvānsaṁkhye cābhimukhāgatān
कुम्भकर्ण और इन्द्रजित् आदि उन बलवान राक्षस वीरों की प्रशंसा करते हुए, जो युद्ध में सम्मुख आए थे।
श्लोक 31 (skanda.6.101.31)
ततश्चैकादशे प्राप्ते दिवसे रघुनंदनः । पुष्पकं तत्समारुह्य प्रस्थितः स्वपुरीं प्रति
tataścaikādaśe prāpte divase raghunaṁdanaḥ puṣpakaṁ tatsamāruhya prasthitaḥ svapurīṁ prati
तत्पश्चात् ग्यारहवाँ दिन आने पर रघुनंदन पुष्पक पर आरूढ़ होकर अपनी नगरी की ओर चल पड़े,
श्लोक 32 (skanda.6.101.32)
वानरैस्तैः समोपेतो विभीषणपुरःसरः । ततः संस्थापयामास सेतुप्रांते महेश्वरम्
vānaraistaiḥ samopeto vibhīṣaṇapuraḥsaraḥ tataḥ saṁsthāpayāmāsa setuprāṁte maheśvaram
उन वानरों सहित, विभीषण को आगे करके; तब उन्होंने सेतु के छोर पर महेश्वर की स्थापना की।
श्लोक 33 (skanda.6.101.33)
मध्ये चैव तथादौ च श्रद्धापूतेन चेतसा । रामेश्वरत्रयं राम एवं तत्र विधाय सः
madhye caiva tathādau ca śraddhāpūtena cetasā rāmeśvaratrayaṁ rāma evaṁ tatra vidhāya saḥ
मध्य में तथा आरम्भ में भी, श्रद्धापूत हृदय से — इस प्रकार राम ने वहाँ तीनों रामेश्वरों की स्थापना करके,
श्लोक 34 (skanda.6.101.34)
सेतुबंधं तथासाद्य प्रस्थितः स्वगृहं प्रति । तावद्विभीषणेनोक्तः प्रणिपत्य मुहुर्मुहुः
setubaṁdhaṁ tathāsādya prasthitaḥ svagṛhaṁ prati tāvadvibhīṣaṇenoktaḥ praṇipatya muhurmuhuḥ
इस प्रकार सेतुबंध को पूर्ण कर, वे अपने घर की ओर चल दिए; तभी विभीषण ने बार-बार प्रणाम करके कहा —
श्लोक 35 (skanda.6.101.35)
विभीषण उवाच । अनेन सेतुमार्गेण रामेश्वरदिदृक्षया । मानवा आगमिष्यंति कौतुकाच्छ्रद्धयाविताः
vibhīṣaṇa uvāca anena setumārgeṇa rāmeśvaradidṛkṣayā mānavā āgamiṣyaṁti kautukācchraddhayāvitāḥ
विभीषण ने कहा — इस सेतु-मार्ग से, रामेश्वर के दर्शन की इच्छा से, मनुष्य कौतूहलवश तथा श्रद्धा से प्रेरित होकर आएँगे।
श्लोक 36 (skanda.6.101.36)
राक्षसानां महाराज जातिः क्रूरतमा मता । दृष्ट्वा मानुषमायांतं मांसस्येच्छा प्रजायते
rākṣasānāṁ mahārāja jātiḥ krūratamā matā dṛṣṭvā mānuṣamāyāṁtaṁ māṁsasyecchā prajāyate
हे महाराज! राक्षस जाति सबसे क्रूर मानी जाती है; किसी मनुष्य को आते देखकर उनमें मांस की इच्छा उत्पन्न हो जाती है।
श्लोक 37 (skanda.6.101.37)
यदा कश्चिज्जनं कश्चिद्राक्षसो भक्षयिष्यति । आज्ञाभंगो ध्रुवं भावी मम भक्तिरतस्य च
yadā kaścijjanaṁ kaścidrākṣaso bhakṣayiṣyati ājñābhaṁgo dhruvaṁ bhāvī mama bhaktiratasya ca
यदि कोई राक्षस किसी मनुष्य को खा जाए, तो निश्चय ही आपकी आज्ञा का उल्लंघन होगा और मेरी भक्ति में भी दोष लगेगा।
श्लोक 38 (skanda.6.101.38)
भविष्यंति कलौ काले दरिद्रा नृपमानवाः । तेऽत्र स्वर्णस्य लोभेन देवतादर्शनाय च
bhaviṣyaṁti kalau kāle daridrā nṛpamānavāḥ te'tra svarṇasya lobhena devatādarśanāya ca
कलियुग में दीन-दरिद्र मनुष्य सुवर्ण के लोभ से तथा देवता के दर्शन की इच्छा से यहाँ आएँगे;
श्लोक 39 (skanda.6.101.39)
नित्यं चैवागमिष्यन्ति त्यक्त्वा रक्षःकृतं भयम् । तेषां यदि वधं कश्चिद्राक्षसात्प्रापयिष्यति
nityaṁ caivāgamiṣyanti tyaktvā rakṣaḥkṛtaṁ bhayam teṣāṁ yadi vadhaṁ kaścidrākṣasātprāpayiṣyati
वे राक्षसकृत भय को त्यागकर नित्य यहाँ आते रहेंगे; और यदि कोई राक्षस उनमें से किसी का वध करा दे,
श्लोक 40 (skanda.6.101.40)
भविष्यति च मे दोषः प्रभुद्रोहोद्भवः प्रभो । तस्मात्कंचिदुपायं त्वं चिन्तयस्व यथा मम । आज्ञाभंगकृतं पापं जायते न गुरो क्वचित्
bhaviṣyati ca me doṣaḥ prabhudrohodbhavaḥ prabho tasmātkaṁcidupāyaṁ tvaṁ cintayasva yathā mama ājñābhaṁgakṛtaṁ pāpaṁ jāyate na guro kvacit
तो हे प्रभो! प्रभुद्रोह से उत्पन्न दोष मुझ पर ही लगेगा। अतः आप कोई उपाय सोचें, जिससे हे गुरो, मुझसे आज्ञा-भंग से उत्पन्न पाप कभी न हो।
श्लोक 41 (skanda.6.101.41)
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा ततः स रघुसत्तमः । बाढमित्येव चोक्त्वाथ चापं सज्जीचकार सः
tasya tadvacanaṁ śrutvā tataḥ sa raghusattamaḥ bāḍhamityeva coktvātha cāpaṁ sajjīcakāra saḥ
उनके इस वचन को सुनकर, रघुसत्तम राम ने "ऐसा ही हो" कहकर अपने धनुष को सज्जित किया।
श्लोक 42 (skanda.6.101.42)
ततस्तं कीर्तिरूपं च मध्यदेशे रघूत्तमः । अच्छिनन्निशितैर्बाणैर्दशयोजनविस्तृतम्
tatastaṁ kīrtirūpaṁ ca madhyadeśe raghūttamaḥ acchinanniśitairbāṇairdaśayojanavistṛtam
तत्पश्चात् उस कीर्तिरूप मध्यभाग को, जो दस योजन विस्तृत था, रघूत्तम ने तीक्ष्ण बाणों से काट दिया।
श्लोक 43 (skanda.6.101.43)
तेन संस्थापितो यत्र शिखरे शंकरः स्वयम् । शिखरं तत्सलिंगं च पतितं वारिधेर्जले
tena saṁsthāpito yatra śikhare śaṁkaraḥ svayam śikharaṁ tatsaliṁgaṁ ca patitaṁ vāridherjale
जिस शिखर पर स्वयं शंकर स्थापित थे, वह शिखर उस लिंग सहित समुद्र के जल में गिर पड़ा।
श्लोक 44 (skanda.6.101.44)
एवं मार्गमगम्यं तं कृत्वा सेतुसमुद्भवम् । वानरै राक्षसैः सार्धं ततः संप्रस्थितो गृहम्
evaṁ mārgamagamyaṁ taṁ kṛtvā setusamudbhavam vānarai rākṣasaiḥ sārdhaṁ tataḥ saṁprasthito gṛham
इस प्रकार सेतु के उस भाग को अगम्य बनाकर, वे वानरों और राक्षसों सहित अपने घर की ओर प्रस्थान कर गए।