नागर खण्ड · अध्याय 102
हाटकेश्वर-क्षेत्र में श्रीरामचन्द्र द्वारा लक्ष्मणेश्वर आदि पंच प्रासादों के निर्माण एवं प्रतिष्ठा का वर्णन
श्लोक 1 (skanda.6.102.1)
सूत उवाच । संप्रस्थितस्य रामस्य स्वकीयं सदनं प्रति । यदाश्चर्यमभून्मार्गे श्रूयतां द्विजसत्तमाः
sūta uvāca saṁprasthitasya rāmasya svakīyaṁ sadanaṁ prati yadāścaryamabhūnmārge śrūyatāṁ dvijasattamāḥ
सूत जी ने कहा — अपने घर की ओर प्रस्थान करते हुए राम के मार्ग में जो आश्चर्य घटित हुआ, हे द्विजश्रेष्ठो! उसे सुनिए।
श्लोक 2 (skanda.6.102.2)
नभोमार्गेण गच्छत्तद्विमानं पुष्पकं द्विजाः । अकस्मादेव सञ्जातं निश्चलं चित्रकृन्नृणाम्
nabhomārgeṇa gacchattadvimānaṁ puṣpakaṁ dvijāḥ akasmādeva sañjātaṁ niścalaṁ citrakṛnnṛṇām
हे द्विजो! वह पुष्पक विमान आकाश-मार्ग से जाते हुए, अकस्मात् ही स्थिर हो गया, जिससे सबको आश्चर्य हुआ।
श्लोक 3 (skanda.6.102.3)
अथ तन्निश्चलं दृष्ट्वा पुष्पकं गगनांगणे । रामो वायुसुतस्येदं वचनं प्राह विस्मयात्
atha tanniścalaṁ dṛṣṭvā puṣpakaṁ gaganāṁgaṇe rāmo vāyusutasyedaṁ vacanaṁ prāha vismayāt
तब आकाश के आँगन में पुष्पक को स्थिर देखकर राम ने आश्चर्यचकित होकर वायुपुत्र हनुमान से यह वचन कहा —
श्लोक 4 (skanda.6.102.4)
त्वं गत्वा मारुते शीघ्रं भूमिं जानीहि कारणम् । किमेतत्पुष्पकं व्योम्नि निश्चलत्वमुपागतम्
tvaṁ gatvā mārute śīghraṁ bhūmiṁ jānīhi kāraṇam kimetatpuṣpakaṁ vyomni niścalatvamupāgatam
"हे मारुते! तुम शीघ्र जाकर पृथ्वी से इसका कारण जानो — यह पुष्पक आकाश में स्थिर क्यों हो गया है?
श्लोक 5 (skanda.6.102.5)
कदाचिद्धार्यते नास्य गतिः कुत्रापि केनचित् । ब्रह्मदृष्टिप्रसूतस्य पुष्पकस्य महात्मनः
kadāciddhāryate nāsya gatiḥ kutrāpi kenacit brahmadṛṣṭiprasūtasya puṣpakasya mahātmanaḥ
इससे पूर्व इसकी गति को कहीं भी किसी के द्वारा नहीं रोका गया — यह महात्मा पुष्पक तो ब्रह्मा की दृष्टि से उत्पन्न हुआ है।"
श्लोक 6 (skanda.6.102.6)
बाढमित्येव स प्रोच्य हनूमान्धरणीतलम् । गत्वा शीघ्रं पुनः प्राह प्रणिपत्य रघूत्तमम्
bāḍhamityeva sa procya hanūmāndharaṇītalam gatvā śīghraṁ punaḥ prāha praṇipatya raghūttamam
"अच्छा" ऐसा कहकर हनुमान् पृथ्वीतल पर उतरे, और शीघ्र जाकर, प्रणाम करके पुनः रघूत्तम से बोले —
श्लोक 7 (skanda.6.102.7)
अत्रास्याधः शुभं क्षेत्रं हाटकेश्वरसंज्ञितम् । यत्र साक्षाज्जगत्कर्ता स्वयं ब्रह्मा व्यवस्थितः
atrāsyādhaḥ śubhaṁ kṣetraṁ hāṭakeśvarasaṁjñitam yatra sākṣājjagatkartā svayaṁ brahmā vyavasthitaḥ
"इसके नीचे हाटकेश्वर नामक शुभ क्षेत्र है, जहाँ साक्षात् जगत्कर्ता ब्रह्मा स्वयं विराजमान हैं।
श्लोक 8 (skanda.6.102.8)
आदित्या वसवो रुद्रा देववैद्यौ तथाश्विनौ । तत्र तिष्ठन्ति ते सर्वे तथान्ये सिद्धकिन्नराः
ādityā vasavo rudrā devavaidyau tathāśvinau tatra tiṣṭhanti te sarve tathānye siddhakinnarāḥ
आदित्य, वसु, रुद्र, तथा देवताओं के वैद्य दोनों अश्विनीकुमार — वे सभी वहाँ निवास करते हैं, तथा अन्य सिद्ध और किन्नर भी।
श्लोक 9 (skanda.6.102.9)
एतस्मात्कारणान्नैतदतिक्रामति पुष्पकम् । तत्क्षेत्रं निश्चलीभूतं सत्यमेतन्मयोदितम्
etasmātkāraṇānnaitadatikrāmati puṣpakam tatkṣetraṁ niścalībhūtaṁ satyametanmayoditam
इसी कारण यह पुष्पक इससे आगे नहीं जा पाता; वह क्षेत्र स्थिर हो गया है — यह मैंने सत्य कहा है।"
श्लोक 10 (skanda.6.102.10)
सूत उवाच । तस्य तद्वचनं श्रुत्वा कौतूहलसमवितः । पुष्पकं प्रेरयामास तत्क्षेत्रं प्रति राघवः
sūta uvāca tasya tadvacanaṁ śrutvā kautūhalasamavitaḥ puṣpakaṁ prerayāmāsa tatkṣetraṁ prati rāghavaḥ
सूत जी ने कहा — उनके इस वचन को सुनकर, कुतूहल से भरे हुए राघव ने पुष्पक को उस क्षेत्र की ओर प्रेरित किया।
श्लोक 11 (skanda.6.102.11)
सर्वैस्तैर्वानरैः सार्धं राक्षसैश्च पृथग्विधैः । अवतीर्य ततो हृष्टस्तस्मिन्क्षेत्रे समन्ततः
sarvaistairvānaraiḥ sārdhaṁ rākṣasaiśca pṛthagvidhaiḥ avatīrya tato hṛṣṭastasminkṣetre samantataḥ
उन सभी वानरों और नाना प्रकार के राक्षसों सहित, वे हर्षित होकर उस क्षेत्र में सर्वत्र उतरे।
श्लोक 12 (skanda.6.102.12)
तीर्थमालोकयामास पुण्यान्यायतनानि च । ततो विलोकयामास पितामहविनिर्मिताम् । चामुण्डां तत्र च स्नात्वा कुण्डे कामप्रदायिनि
tīrthamālokayāmāsa puṇyānyāyatanāni ca tato vilokayāmāsa pitāmahavinirmitām cāmuṇḍāṁ tatra ca snātvā kuṇḍe kāmapradāyini
उन्होंने पवित्र तीर्थ और पुण्य मन्दिरों का अवलोकन किया; तत्पश्चात् पितामह द्वारा निर्मित चामुण्डा को देखा, और वहाँ कामनापूर्ण करने वाले कुण्ड में स्नान किया।
श्लोक 13 (skanda.6.102.13)
ततो विलोकयामास पित्रा तस्य विनिर्मितम् । रामः स्वमिव देवेशं दृष्ट्वा देवं चतुर्भुजम्
tato vilokayāmāsa pitrā tasya vinirmitam rāmaḥ svamiva deveśaṁ dṛṣṭvā devaṁ caturbhujam
तत्पश्चात् उन्होंने अपने पिता द्वारा निर्मित चतुर्भुज देवेश को देखा, मानो राम अपने ही स्वरूप को देख रहे हों।
श्लोक 14 (skanda.6.102.14)
राजवाप्यां शुचिर्भूत्वा स्नात्वा तर्प्य निजान्पितॄन् । ततश्च चिन्तयामास क्षेत्रेऽत्र बहुपुण्यदे
rājavāpyāṁ śucirbhūtvā snātvā tarpya nijānpitṝn tataśca cintayāmāsa kṣetre'tra bahupuṇyade
राजवापी में स्नान करके पवित्र होकर तथा अपने पितरों को तर्पण देकर, तत्पश्चात् उन्होंने उस अत्यंत पुण्यदायक क्षेत्र में विचार किया —
श्लोक 15 (skanda.6.102.15)
लिंगं संस्थापयाम्येव यद्वत्तातेन केशवः । तथा मे दयितो भ्राता लक्ष्मणो दिवमाश्रितः
liṁgaṁ saṁsthāpayāmyeva yadvattātena keśavaḥ tathā me dayito bhrātā lakṣmaṇo divamāśritaḥ
"जिस प्रकार मेरे पिता ने केशव की स्थापना की, उसी प्रकार मैं भी यहाँ लिंग की स्थापना करूँगा; तथा जिस प्रकार मेरे प्रिय भ्राता लक्ष्मण स्वर्ग को गए हैं —
श्लोक 16 (skanda.6.102.16)
यस्तस्य नामनिर्दिष्टं लिंगं संस्थापयाम्यहम् । तं चापि मूर्तिमंतं च सीतया सहितं शुभम् । क्षेत्रे मेध्यतमे चात्र तथात्मानं दृषन्मयम्
yastasya nāmanirdiṣṭaṁ liṁgaṁ saṁsthāpayāmyaham taṁ cāpi mūrtimaṁtaṁ ca sītayā sahitaṁ śubham kṣetre medhyatame cātra tathātmānaṁ dṛṣanmayam
उसी प्रकार यहाँ उनके नाम से निर्दिष्ट लिंग की मैं स्थापना करूँगा, उनकी मूर्तिमान् शुभ आकृति सीता सहित, तथा अपने ही स्वरूप को भी पाषाणमय बनाकर, इस क्षेत्र के परम पवित्र स्थान में।"
श्लोक 17 (skanda.6.102.17)
एवं स निश्चयं कृत्वा प्रासादानां च पंचकम् । स्थापयामास सद्भक्त्या रामः शस्त्रभृतां वरः
evaṁ sa niścayaṁ kṛtvā prāsādānāṁ ca paṁcakam sthāpayāmāsa sadbhaktyā rāmaḥ śastrabhṛtāṁ varaḥ
ऐसा निश्चय करके, शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ राम ने सच्ची भक्ति से पाँच प्रासादों की स्थापना की।
श्लोक 18 (skanda.6.102.18)
ततस्ते वानराः सर्वे राक्षसाश्च विशेषतः । लिंगानि स्थापयामासुः स्वानिस्वानि पृथक्पृथक्
tataste vānarāḥ sarve rākṣasāśca viśeṣataḥ liṁgāni sthāpayāmāsuḥ svānisvāni pṛthakpṛthak
तत्पश्चात् उन समस्त वानरों तथा विशेषतः राक्षसों ने भी अपने-अपने पृथक् लिंगों की स्थापना की।
श्लोक 19 (skanda.6.102.19)
तत्रैव सुचिरं कालं स्थितास्ते श्रद्धयाऽन्विताः । ततो जग्मुरयोध्यायां विमानवरमाश्रिताः
tatraiva suciraṁ kālaṁ sthitāste śraddhayā'nvitāḥ tato jagmurayodhyāyāṁ vimānavaramāśritāḥ
वे सभी वहाँ श्रद्धायुक्त होकर दीर्घ काल तक ठहरे रहे; तत्पश्चात् वे उत्तम विमान पर आरूढ़ होकर अयोध्या को गए।
श्लोक 20 (skanda.6.102.20)
एतद्वः सर्वमाख्यातं यथा रामेश्वरो महान् । लक्ष्मणेश्वरसंयुक्तस्तस्मिंस्तीर्थे सुशोभने
etadvaḥ sarvamākhyātaṁ yathā rāmeśvaro mahān lakṣmaṇeśvarasaṁyuktastasmiṁstīrthe suśobhane
यह सब आपको बता दिया गया — किस प्रकार महान् रामेश्वर लक्ष्मणेश्वर सहित उस अत्यंत सुंदर तीर्थ में विराजमान हैं।
श्लोक 21 (skanda.6.102.21)
यस्तौ प्रातः समुत्थाय सदा पश्यति मानवः । स कृत्स्नं फलमाप्नोति श्रुते रामायणेऽत्र यत्
yastau prātaḥ samutthāya sadā paśyati mānavaḥ sa kṛtsnaṁ phalamāpnoti śrute rāmāyaṇe'tra yat
जो मनुष्य प्रातः उठकर सदा उन दोनों का दर्शन करता है, वह यहाँ रामायण के श्रवण का सम्पूर्ण फल प्राप्त करता है।
श्लोक 22 (skanda.6.102.22)
अथाष्टम्यां चतुर्दश्यां यो रामचरितं पठेत् । तदग्रे वाजिमेधस्य स कृत्स्नं लभते फलम्
athāṣṭamyāṁ caturdaśyāṁ yo rāmacaritaṁ paṭhet tadagre vājimedhasya sa kṛtsnaṁ labhate phalam
तथा जो अष्टमी या चतुर्दशी को यहाँ रामचरित का पाठ करता है, वह उससे अश्वमेध यज्ञ का सम्पूर्ण फल प्राप्त करता है।