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नागर खण्ड · अध्याय 103

आनर्तक तीर्थ-कूपिका का माहात्म्य-वर्णन

अध्याय 102अध्याय-सूचीअध्याय 104

श्लोक 1 (skanda.6.103.1)

ऋषय ऊचुः । आश्चर्यं सूतपुत्रैतद्यत्त्वया परिकीर्तितम् । यत्स्थापितानि लिंगानि राक्षसैरपि वानरैः

ṛṣaya ūcuḥ āścaryaṁ sūtaputraitadyattvayā parikīrtitam yatsthāpitāni liṁgāni rākṣasairapi vānaraiḥ

ऋषियों ने कहा — हे सूतपुत्र! यह आश्चर्य है जो आपने वर्णन किया कि राक्षसों तथा वानरों ने भी लिंगों की स्थापना की।

श्लोक 2 (skanda.6.103.2)

तस्माद्विस्तरतो ब्रूहि यत्रयत्र यथायथा । तैः स्थापितानि लिंगानि येषु स्थानेषु सूतज

tasmādvistarato brūhi yatrayatra yathāyathā taiḥ sthāpitāni liṁgāni yeṣu sthāneṣu sūtaja

अतः हे सूतज! विस्तार से बताइए कि किस-किस स्थान पर, किस प्रकार, उनके द्वारा वे लिंग स्थापित किए गए।

श्लोक 3 (skanda.6.103.3)

सूत उवाच । सुग्रीवः संभ्रमित्वाथ क्षेत्रं सर्वमशेषतः । बालमंडनकं प्राप्य तत्र स्नात्वा समाहितः

sūta uvāca sugrīvaḥ saṁbhramitvātha kṣetraṁ sarvamaśeṣataḥ bālamaṁḍanakaṁ prāpya tatra snātvā samāhitaḥ

सूत जी ने कहा — सुग्रीव ने समस्त क्षेत्र में शीघ्रता से घूमकर बालमण्डनक नामक स्थान को प्राप्त किया, और वहाँ स्नान करके एकाग्रचित्त होकर,

श्लोक 4 (skanda.6.103.4)

मुखलिंगं ततस्तत्र स्थापयामास शूलिनः । तथान्यैर्वानरैः सर्वैर्मुखलिंगानि शूलिनः । स्वसंज्ञार्थं द्विजश्रेष्ठाः स्थापितानि यथेच्छया

mukhaliṁgaṁ tatastatra sthāpayāmāsa śūlinaḥ tathānyairvānaraiḥ sarvairmukhaliṁgāni śūlinaḥ svasaṁjñārthaṁ dvijaśreṣṭhāḥ sthāpitāni yathecchayā

वहाँ शूलपाणि का मुखलिंग स्थापित किया; तथा अन्य समस्त वानरों ने भी हे द्विजश्रेष्ठो! अपनी-अपनी इच्छानुसार अपने-अपने नाम से शिव के मुखलिंगों की स्थापना की।

श्लोक 5 (skanda.6.103.5)

यस्तेषां मुखलिंगानां करोति घृतकंबलम् । मकरस्थेन सूर्येण शिवलोकं स गच्छति

yasteṣāṁ mukhaliṁgānāṁ karoti ghṛtakaṁbalam makarasthena sūryeṇa śivalokaṁ sa gacchati

जो कोई इन मुखलिंगों को मकर राशि के सूर्य में घृतकम्बल अर्पित करता है, वह शिवलोक को जाता है।

श्लोक 6 (skanda.6.103.6)

ततः पश्चिमदिग्भागे तस्य क्षेत्रस्य राक्षसैः । संस्थापितानि लिङ्गानि चतुर्वक्त्राणि च द्विजाः

tataḥ paścimadigbhāge tasya kṣetrasya rākṣasaiḥ saṁsthāpitāni liṅgāni caturvaktrāṇi ca dvijāḥ

तत्पश्चात् उस क्षेत्र के पश्चिम भाग में राक्षसों ने चतुर्मुख लिंगों की स्थापना की, हे द्विजो!

श्लोक 7 (skanda.6.103.7)

रामेण पूर्वदिग्भागे प्रासादानां च पंचकम् । स्थापितं भक्तियुक्तेन सर्वपातकनाशनम्

rāmeṇa pūrvadigbhāge prāsādānāṁ ca paṁcakam sthāpitaṁ bhaktiyuktena sarvapātakanāśanam

पूर्व दिशा में राम ने भक्तियुक्त होकर पाँच प्रासादों की स्थापना की, जो समस्त पापों का नाश करने वाले हैं।

श्लोक 8 (skanda.6.103.8)

तथा दक्षिणदिग्भागे कूपिका तेन निर्मिता । आनर्त्तीयतडागस्य समीपे पापनाशनी

tathā dakṣiṇadigbhāge kūpikā tena nirmitā ānarttīyataḍāgasya samīpe pāpanāśanī

तथा दक्षिण दिशा में उन्होंने आनर्तीय तडाग के समीप एक पापनाशिनी कूपिका का निर्माण किया।

श्लोक 9 (skanda.6.103.9)

यस्तस्यां कुरुते श्राद्धं संप्राप्ते दक्षिणायने । सोऽश्वमेधफलं प्राप्य पितृलोके महीयते

yastasyāṁ kurute śrāddhaṁ saṁprāpte dakṣiṇāyane so'śvamedhaphalaṁ prāpya pitṛloke mahīyate

जो कोई दक्षिणायन के आगमन पर वहाँ श्राद्ध करता है, वह अश्वमेध का फल पाकर पितृलोक में सम्मानित होता है।

श्लोक 10 (skanda.6.103.10)

यस्तत्र दीपकं दद्यात्कार्तिके मासि च द्विजाः । न स पश्यति रौद्रांस्तान्नरकानेकविंशतिम् । न चांधो जायते क्वापि यत्रयत्र प्रजायते

yastatra dīpakaṁ dadyātkārtike māsi ca dvijāḥ na sa paśyati raudrāṁstānnarakānekaviṁśatim na cāṁdho jāyate kvāpi yatrayatra prajāyate

जो वहाँ कार्तिक मास में दीपक अर्पित करता है, हे द्विजो! वह उन इक्कीस भयंकर नरकों को नहीं देखता, तथा जहाँ भी जन्म लेता है, वहाँ अंधा नहीं होता।

श्लोक 11 (skanda.6.103.11)

ऋषय ऊचुः । आनर्त्तीयतडागं तत्केन तत्र विनिर्मितम् । किंप्रभावं च कार्त्स्न्येन सूतपुत्र प्रकीर्तय

ṛṣaya ūcuḥ ānarttīyataḍāgaṁ tatkena tatra vinirmitam kiṁprabhāvaṁ ca kārtsnyena sūtaputra prakīrtaya

ऋषियों ने कहा — हे सूतपुत्र! वह आनर्तीय तडाग किसके द्वारा वहाँ बनाया गया, तथा उसका सम्पूर्ण प्रभाव भी बताइए।

श्लोक 12 (skanda.6.103.12)

सूत उवाच । आनर्त्तीयतडागस्य महिमा द्विजसत्तमाः । एकवक्त्रेण नो शक्यो वक्तुं वर्षशतैरपि

sūta uvāca ānarttīyataḍāgasya mahimā dvijasattamāḥ ekavaktreṇa no śakyo vaktuṁ varṣaśatairapi

सूत जी ने कहा — हे द्विजसत्तमो! आनर्तीय तडाग की महिमा एक मुख से सौ वर्षों में भी नहीं कही जा सकती।

श्लोक 13 (skanda.6.103.13)

आश्विनस्य सिते पक्षे चतुर्दश्यां समाहितः । स्नात्वा देवान्पितॄंश्चैव तर्पयेद्विधिपूर्वकम्

āśvinasya site pakṣe caturdaśyāṁ samāhitaḥ snātvā devānpitṝṁścaiva tarpayedvidhipūrvakam

आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को, एकाग्रचित्त होकर स्नान करके, विधिपूर्वक देवताओं और पितरों को तर्पण देना चाहिए।

श्लोक 14 (skanda.6.103.14)

ततो दीपोत्सवदिने श्राद्धं कृत्वा समाहितः । दामोदरं यमं पूज्य दीपं दद्यात्स्वभक्तितः

tato dīpotsavadine śrāddhaṁ kṛtvā samāhitaḥ dāmodaraṁ yamaṁ pūjya dīpaṁ dadyātsvabhaktitaḥ

तत्पश्चात् दीपोत्सव के दिन, एकाग्रचित्त होकर श्राद्ध करके, दामोदर और यम की पूजा करके, अपनी भक्ति से दीपक अर्पित करना चाहिए।

श्लोक 15 (skanda.6.103.15)

संपूज्यो धर्मराजस्तु गन्धपुष्पानुलेपनैः । माषास्तिलाश्च दातव्या गोविंदः प्रीयतामिति

saṁpūjyo dharmarājastu gandhapuṣpānulepanaiḥ māṣāstilāśca dātavyā goviṁdaḥ prīyatāmiti

धर्मराज की गंध, पुष्प तथा अनुलेपन से पूजा करनी चाहिए; उड़द और तिल का दान करना चाहिए, यह कहते हुए — गोविंद प्रसन्न हों।

श्लोक 16 (skanda.6.103.16)

तिलमाषप्रदानेन द्विजानां तर्पणेन च । यमेन सहितो देवः प्रीयते पुरुषोत्तमः

tilamāṣapradānena dvijānāṁ tarpaṇena ca yamena sahito devaḥ prīyate puruṣottamaḥ

तिल और उड़द के दान से, तथा ब्राह्मणों के तर्पण से, यम सहित पुरुषोत्तम देव प्रसन्न होते हैं।

श्लोक 17 (skanda.6.103.17)

य एवं कुरुते विप्रास्तीर्थ आनर्त संज्ञिते । सोऽश्वमेधफलं प्राप्य ब्रह्मलोके महीयते

ya evaṁ kurute viprāstīrtha ānarta saṁjñite so'śvamedhaphalaṁ prāpya brahmaloke mahīyate

हे विप्रो! जो कोई आनर्त नामक तीर्थ में यह करता है, वह अश्वमेध का फल पाकर ब्रह्मलोक में सम्मानित होता है।

श्लोक 18 (skanda.6.103.18)

यस्मिन्दिने समायातो रामस्तत्र प्रहर्षितः । तस्मिन्द्विजोत्तमैः सर्वैः प्रोक्तः सोऽभ्येत्य सादरम्

yasmindine samāyāto rāmastatra praharṣitaḥ tasmindvijottamaiḥ sarvaiḥ proktaḥ so'bhyetya sādaram

जिस दिन राम वहाँ हर्षित होकर पहुँचे, उस दिन समस्त श्रेष्ठ द्विजों ने आदरपूर्वक उनके निकट आकर उनसे कहा —

श्लोक 19 (skanda.6.103.19)

अत्रागस्त्यो मुनिश्रेष्ठस्तिष्ठते रघुनंदन । तं गत्वा पश्य विप्रेन्द्र मित्रावरुणसंभवम्

atrāgastyo muniśreṣṭhastiṣṭhate raghunaṁdana taṁ gatvā paśya viprendra mitrāvaruṇasaṁbhavam

"हे रघुनंदन! यहाँ मुनिश्रेष्ठ अगस्त्य निवास करते हैं; हे विप्रेन्द्र! जाकर मित्रा-वरुण से उत्पन्न उन्हें देखिए।"

श्लोक 20 (skanda.6.103.20)

अथ तेषां वचः श्रुत्वा रामो राजीवलोचनः । वानरै राक्षसैः सार्धं प्रहृष्टः सत्वरं ययौ

atha teṣāṁ vacaḥ śrutvā rāmo rājīvalocanaḥ vānarai rākṣasaiḥ sārdhaṁ prahṛṣṭaḥ satvaraṁ yayau

तत्पश्चात् उनके वचन सुनकर, कमलनयन राम वानरों और राक्षसों सहित हर्षित होकर शीघ्र वहाँ गए।

श्लोक 21 (skanda.6.103.21)

अष्टांगप्रणिपातेन तं प्रणम्य रघूत्तमः । परिष्वक्तो दृढं तेन सानन्देन महात्मना

aṣṭāṁgapraṇipātena taṁ praṇamya raghūttamaḥ pariṣvakto dṛḍhaṁ tena sānandena mahātmanā

अष्टांग प्रणिपात से उन्हें प्रणाम कर, रघूत्तम को उस आनंदित महात्मा ने दृढ़तापूर्वक आलिंगन किया।

श्लोक 22 (skanda.6.103.22)

नातिदूरे ततस्तस्य विनयेन समन्वितः । उपविष्टो धरापृष्ठे कृतांजलिपुटः स्थितः

nātidūre tatastasya vinayena samanvitaḥ upaviṣṭo dharāpṛṣṭhe kṛtāṁjalipuṭaḥ sthitaḥ

तत्पश्चात् विनयपूर्वक वे उनसे न अधिक दूर धरातल पर हाथ जोड़कर बैठ गए।

श्लोक 23 (skanda.6.103.23)

ततः पृष्टस्तु मुनिना कथयामास विस्तरात् । वृत्तांतं सर्वमात्मीयं स्वर्गस्य गमनं प्रति

tataḥ pṛṣṭastu muninā kathayāmāsa vistarāt vṛttāṁtaṁ sarvamātmīyaṁ svargasya gamanaṁ prati

तत्पश्चात् मुनि द्वारा पूछे जाने पर उन्होंने अपने स्वर्गगमन से सम्बंधित सम्पूर्ण वृत्तांत विस्तार से कहा —

श्लोक 24 (skanda.6.103.24)

यथा सीता परित्यक्ता यथा सौमित्रिणा कृतः । परित्यागः स्वकीयस्य संत्यक्तेन महात्मना

yathā sītā parityaktā yathā saumitriṇā kṛtaḥ parityāgaḥ svakīyasya saṁtyaktena mahātmanā

किस प्रकार सीता का परित्याग हुआ, किस प्रकार सौमित्र द्वारा अपने ही स्वजन का त्याग किया गया, उस महात्मा के द्वारा जो स्वयं त्यक्त हो चुके थे,

श्लोक 25 (skanda.6.103.25)

तथा सुग्रीवमासाद्य तथैव च विभीषणम् । संभाष्य चागमस्त्वत्र ततः पुष्पकसंस्थितिः

tathā sugrīvamāsādya tathaiva ca vibhīṣaṇam saṁbhāṣya cāgamastvatra tataḥ puṣpakasaṁsthitiḥ

तथा किस प्रकार सुग्रीव और विभीषण से मिलकर, उनसे वार्तालाप करके, वे यहाँ आए, और तत्पश्चात् पुष्पक की स्थिरता हुई।

श्लोक 26 (skanda.6.103.26)

ततोऽगस्त्यः कथाश्चित्राश्चक्रे तस्य पुरस्तदा । राजर्षीणां पुराणानां दृष्टांतैर्बहुभिर्मुनिः

tato'gastyaḥ kathāścitrāścakre tasya purastadā rājarṣīṇāṁ purāṇānāṁ dṛṣṭāṁtairbahubhirmuniḥ

तत्पश्चात् अगस्त्य ने उन्हें राजर्षियों तथा पुराणों के अनेक दृष्टांतों सहित विचित्र कथाएँ सुनाईं।

श्लोक 27 (skanda.6.103.27)

ततः कथावसाने च चलचित्तं रघूत्तमम् । विलोक्य प्रददौ तस्मै रत्नाभरणमुत्तमम्

tataḥ kathāvasāne ca calacittaṁ raghūttamam vilokya pradadau tasmai ratnābharaṇamuttamam

तत्पश्चात् कथा के अंत में, रघूत्तम के मन को विचलित हुआ देखकर, उन्होंने उन्हें एक उत्तम रत्नाभूषण प्रदान किया,

श्लोक 28 (skanda.6.103.28)

यन्न देवेषु यक्षेषु सिद्धविद्याधरेषु च । नागेषु राक्षसेन्द्रेषु मानुषेषु च का कथा

yanna deveṣu yakṣeṣu siddhavidyādhareṣu ca nāgeṣu rākṣasendreṣu mānuṣeṣu ca kā kathā

जिसके समान न देवताओं में, न यक्षों में, न सिद्ध-विद्याधरों में, न नागों में, न राक्षसराजों में है — मनुष्यों की तो बात ही क्या!

श्लोक 29 (skanda.6.103.29)

यस्येन्द्रायुधसंघाश्च निष्क्रामंति सहस्रशः । रात्रौ तमिस्रपक्षेऽपि लक्ष्यतेऽर्कोपमत्विषः

yasyendrāyudhasaṁghāśca niṣkrāmaṁti sahasraśaḥ rātrau tamisrapakṣe'pi lakṣyate'rkopamatviṣaḥ

जिससे सहस्रों इंद्रधनुषी किरणें निकलती हैं; रात्रि में, कृष्णपक्ष में भी, यह सूर्य के समान चमकता हुआ दिखाई देता है।

श्लोक 30 (skanda.6.103.30)

तद्रामस्तु गृहीत्वाऽथ विस्मयोत्फुल्ललोचनः । पप्रच्छ कौतुकाविष्टः कुतस्त्वेतन्मुने तव

tadrāmastu gṛhītvā'tha vismayotphullalocanaḥ papraccha kautukāviṣṭaḥ kutastvetanmune tava

उस आभूषण को ग्रहण कर, आश्चर्य से विस्फारित नेत्रों वाले राम ने कौतूहलपूर्वक पूछा — हे मुने! यह आपको कहाँ से प्राप्त हुआ —

श्लोक 31 (skanda.6.103.31)

अत्यद्भुतकरं रत्नैर्निर्मितं तिमिरापहम् । कण्ठाभरणमाख्याहि नेदमस्ति जगत्त्रये

atyadbhutakaraṁ ratnairnirmitaṁ timirāpaham kaṇṭhābharaṇamākhyāhi nedamasti jagattraye

यह अत्यंत अद्भुत, रत्नों से निर्मित, अंधकार को दूर करने वाला कण्ठाभरण — बताइए, क्योंकि तीनों लोकों में ऐसा कुछ नहीं है।

श्लोक 32 (skanda.6.103.32)

अगस्तिरुवाच । यत्पश्यसि रघुश्रेष्ठ तडागमिदमुत्तमम् । ममाश्रमसमीपस्थं तद्देवदेवनिर्मितम्

agastiruvāca yatpaśyasi raghuśreṣṭha taḍāgamidamuttamam mamāśramasamīpasthaṁ taddevadevanirmitam

अगस्त्य ने कहा — हे रघुश्रेष्ठ! यह जो उत्तम तडाग तुम देखते हो, मेरे आश्रम के समीप स्थित, यह देवाधिदेव द्वारा निर्मित है।

श्लोक 33 (skanda.6.103.33)

तस्य तीरे मया दृष्टं यदाश्चर्यमनुत्तमम् । तत्तेऽहं संप्रवक्ष्यामि शृणुष्व रघुनन्दन

tasya tīre mayā dṛṣṭaṁ yadāścaryamanuttamam tatte'haṁ saṁpravakṣyāmi śṛṇuṣva raghunandana

उसके तट पर मैंने एक अत्यंत अनुपम आश्चर्य देखा था; वह मैं तुम्हें बताता हूँ — हे रघुनंदन! सुनो।

श्लोक 34 (skanda.6.103.34)

कदाचिद्राघवश्रेष्ठ निशीथेऽहं समुत्थितः । पश्यामि व्योममार्गेण प्रद्योतं भास्करोपमम्

kadācidrāghavaśreṣṭha niśīthe'haṁ samutthitaḥ paśyāmi vyomamārgeṇa pradyotaṁ bhāskaropamam

हे राघवश्रेष्ठ! एक बार मध्यरात्रि में उठकर, मैंने आकाशमार्ग में सूर्य के समान एक प्रकाशपुंज को देखा।

श्लोक 35 (skanda.6.103.35)

यावत्तावद्विमानं तदप्सरोगणराजितम् । तस्य मध्यगतश्चैकः पुरुषस्तरुणस्तथा । अन्धस्तत्र समारूढः स्तूयते किन्नरैर्नृपः

yāvattāvadvimānaṁ tadapsarogaṇarājitam tasya madhyagataścaikaḥ puruṣastaruṇastathā andhastatra samārūḍhaḥ stūyate kinnarairnṛpaḥ

तथा वहाँ अप्सरागणों से सुशोभित एक विमान था; उसके मध्य में एक युवा पुरुष था, जो अंधा होते हुए भी उस पर आरूढ़ था, और किन्नरों द्वारा राजा के रूप में स्तुति किया जा रहा था।

श्लोक 36 (skanda.6.103.36)

रत्नाभरणमेतच्च बिभ्रत्कण्ठे सुनिर्मलम् । द्वादशार्कप्रतीकाशं कामदेव इवापरः

ratnābharaṇametacca bibhratkaṇṭhe sunirmalam dvādaśārkapratīkāśaṁ kāmadeva ivāparaḥ

वह इसी अत्यंत निर्मल रत्नाभूषण को कण्ठ में धारण किए हुए था, जो द्वादश सूर्यों के समान प्रकाशमान था, मानो साक्षात् कामदेव हो।

श्लोक 37 (skanda.6.103.37)

अथोत्तीर्य विमानाग्र्यात्स्कंधलग्नो रघूद्वह । एकस्य देवदूतस्य सलिलांतमुपागतः

athottīrya vimānāgryātskaṁdhalagno raghūdvaha ekasya devadūtasya salilāṁtamupāgataḥ

हे रघूद्वह! तत्पश्चात् विमान के अग्रभाग से उतरकर, एक देवदूत के कंधे पर टिककर, वह जलाशय के तट तक पहुँचा।

श्लोक 38 (skanda.6.103.38)

ततश्च सलिलात्तस्मादाकृष्य च कलेवरम् । मृतकस्य ततो दंतैर्भक्षयामास सत्वरम्

tataśca salilāttasmādākṛṣya ca kalevaram mṛtakasya tato daṁtairbhakṣayāmāsa satvaram

तत्पश्चात् उस जल से एक मृत शरीर को खींचकर, उसने अपने दांतों से उसे शीघ्रता से खाना आरम्भ किया।

श्लोक 39 (skanda.6.103.39)

यथायथा महामांसं स भक्षयति राघव । तथातथा पुनः कायं तद्रूपं तत्प्रजायते

yathāyathā mahāmāṁsaṁ sa bhakṣayati rāghava tathātathā punaḥ kāyaṁ tadrūpaṁ tatprajāyate

हे राघव! जैसे-जैसे वह उस विशाल मांस को खाता गया, वैसे-वैसे उसका शरीर पुनः उसी रूप में पुनर्जीवित होता गया।

श्लोक 40 (skanda.6.103.40)

ततस्तृप्तिं चिरात्प्राप्य शुचिर्भूत्वा प्रहर्षितः । निष्क्रम्य सलिलाद्यावद्विमानमधिरोहति

tatastṛptiṁ cirātprāpya śucirbhūtvā praharṣitaḥ niṣkramya salilādyāvadvimānamadhirohati

तत्पश्चात् दीर्घ काल बाद तृप्ति प्राप्त कर, पवित्र होकर, हर्षित होकर, वह जल से निकलकर पुनः विमान पर आरूढ़ हुआ।

श्लोक 41 (skanda.6.103.41)

तावन्मया द्रुतं गत्वा स पृष्टः कौतुकान्नृपः । सेव्यमानोऽपि गन्धर्वैः समंताद्बुद्धितत्परैः

tāvanmayā drutaṁ gatvā sa pṛṣṭaḥ kautukānnṛpaḥ sevyamāno'pi gandharvaiḥ samaṁtādbuddhitatparaiḥ

तभी मैंने शीघ्रता से जाकर, कौतूहलवश उस राजा से प्रश्न किया, यद्यपि वह चारों ओर से बुद्धिमान गंधर्वों द्वारा सेवित हो रहा था।

श्लोक 42 (skanda.6.103.42)

भोभो वैमानिकश्रेष्ठ मुहूर्तं प्रतिपालय । अगस्तिर्नाम विप्रोऽहं मित्रावरुणसंभवः

bhobho vaimānikaśreṣṭha muhūrtaṁ pratipālaya agastirnāma vipro'haṁ mitrāvaruṇasaṁbhavaḥ

"हे वैमानिकश्रेष्ठ! क्षणभर ठहरिए। मैं मित्रावरुण से उत्पन्न अगस्त्य नामक ब्राह्मण हूँ।"

श्लोक 43 (skanda.6.103.43)

तच्छ्रुत्वा सम्मुखो भूत्वा प्रणाममकरोत्ततः । तैश्च वैमानिकैः सार्धं सर्वैस्तैः किन्नरादिभिः

tacchrutvā sammukho bhūtvā praṇāmamakarottataḥ taiśca vaimānikaiḥ sārdhaṁ sarvaistaiḥ kinnarādibhiḥ

यह सुनकर वह मेरे सम्मुख होकर प्रणाम करने लगा, उन विमानवासियों तथा समस्त किन्नरादि के साथ।

श्लोक 44 (skanda.6.103.44)

सोऽयं राजा मया पृष्टः कृतानतिः पुरः स्थितः । कस्त्वमीदृग्वपुः श्रीमान्विमानवरमाश्रितः । सेव्यमानोऽप्सरोभिश्च गन्धर्वैः किन्नरैस्तथा

so'yaṁ rājā mayā pṛṣṭaḥ kṛtānatiḥ puraḥ sthitaḥ kastvamīdṛgvapuḥ śrīmānvimānavaramāśritaḥ sevyamāno'psarobhiśca gandharvaiḥ kinnaraistathā

"यह राजा, जिससे मैंने प्रश्न किया, प्रणाम करके मेरे सम्मुख खड़ा है — तुम कौन हो, इस प्रकार श्रीमान् स्वरूप वाले, इस उत्तम विमान पर आरूढ़, अप्सराओं, गंधर्वों और किन्नरों से सेवित,

श्लोक 45 (skanda.6.103.45)

अत्राऽऽगत्य तडागांते महामांसप्रभक्षणम् । कृतवानसि वैकल्यं कस्मात्ते दृष्टिसंभवम्

atrā''gatya taḍāgāṁte mahāmāṁsaprabhakṣaṇam kṛtavānasi vaikalyaṁ kasmātte dṛṣṭisaṁbhavam

जो यहाँ इस तडाग के तट पर आकर उस विशाल मांस को खाते हो — तथा तुम्हारी यह अंधता कैसे उत्पन्न हुई?

श्लोक 46 (skanda.6.103.46)

वैमानिक उवाच । साधु साधु मुनिश्रेष्ठ यत्त्वं प्राप्तो ममान्तिकम् । अवश्यं सानुकूलो मे विधिर्यत्त्वं समागतः

vaimānika uvāca sādhu sādhu muniśreṣṭha yattvaṁ prāpto mamāntikam avaśyaṁ sānukūlo me vidhiryattvaṁ samāgataḥ

विमानवासी ने कहा — अच्छा हुआ, हे मुनिश्रेष्ठ, कि आप मेरे निकट आए; निश्चय ही मेरे लिए भाग्य अनुकूल रहा जो आप यहाँ पधारे।

श्लोक 47 (skanda.6.103.47)

साधूनां दर्शनं पुण्यं तीर्थभूता हि साधवः । कालेन फलते तीर्थं सद्यः साधुसमागमः

sādhūnāṁ darśanaṁ puṇyaṁ tīrthabhūtā hi sādhavaḥ kālena phalate tīrthaṁ sadyaḥ sādhusamāgamaḥ

सज्जनों का दर्शन पुण्यकारी है; साधु स्वयं तीर्थस्वरूप हैं; तीर्थ काल से फल देता है, परंतु सज्जन का समागम तत्काल फल देता है।

श्लोक 48 (skanda.6.103.48)

तस्मात्सर्वं तवाख्यानं कथयामि महामुने । येन मे गर्हितं भोज्यं विभवश्च तथेदृशः

tasmātsarvaṁ tavākhyānaṁ kathayāmi mahāmune yena me garhitaṁ bhojyaṁ vibhavaśca tathedṛśaḥ

अतः हे महामुने! मैं तुम्हें अपनी सम्पूर्ण कथा सुनाता हूँ, जिसके कारण मुझे यह निंदित भोजन और ऐसी दशा प्राप्त हुई।

श्लोक 49 (skanda.6.103.49)

अहमासं पुरा राजा श्वेतो नाम महामुने । आनर्ताधिपतिः पापः सर्वलोकनिपीडकः

ahamāsaṁ purā rājā śveto nāma mahāmune ānartādhipatiḥ pāpaḥ sarvalokanipīḍakaḥ

हे महामुने! पूर्वकाल में मैं श्वेत नामक एक राजा था, आनर्त का अधिपति, पापी और समस्त लोगों को पीड़ा देने वाला।

श्लोक 50 (skanda.6.103.50)

न किंचित्प्राङ्मया दत्तं न हुतं जातवेदसि । न च रक्षा कृता लोके न त्राताः शरणागताः

na kiṁcitprāṅmayā dattaṁ na hutaṁ jātavedasi na ca rakṣā kṛtā loke na trātāḥ śaraṇāgatāḥ

मैंने पहले कभी कुछ दान नहीं दिया, न अग्नि में हवन किया; न कभी संसार में किसी की रक्षा की, न शरणागतों को त्राण दिया।

श्लोक 51 (skanda.6.103.51)

दृष्ट्वादृष्ट्वा मया रत्नं यत्किंचिद्धरणीतले । तद्वै बलाद्धृतं सर्वं सर्वेषामिह देहिनाम्

dṛṣṭvādṛṣṭvā mayā ratnaṁ yatkiṁciddharaṇītale tadvai balāddhṛtaṁ sarvaṁ sarveṣāmiha dehinām

पृथ्वी पर जो भी रत्न मुझे यहाँ-वहाँ दिखाई दिया, वह सब मैंने बलपूर्वक समस्त प्राणियों से छीन लिया।

श्लोक 52 (skanda.6.103.52)

ततः कालेन दीर्घेण जराग्रस्तस्य मे बलात् । हृतं राज्यं स्वपुत्रेण मां निर्वास्य विगर्हितम्

tataḥ kālena dīrgheṇa jarāgrastasya me balāt hṛtaṁ rājyaṁ svaputreṇa māṁ nirvāsya vigarhitam

तत्पश्चात् दीर्घ काल बाद, जब मैं वृद्धावस्था से ग्रस्त हो गया, तब मेरे ही पुत्र ने बलपूर्वक मेरा राज्य छीन लिया और मुझे अपमानित कर निर्वासित कर दिया।

श्लोक 53 (skanda.6.103.53)

ततोऽहं जरया ग्रस्तो वैराग्यं परमं गतः । समायातोऽत्र विप्रेंद्र भ्रममाण इतस्ततः

tato'haṁ jarayā grasto vairāgyaṁ paramaṁ gataḥ samāyāto'tra vipreṁdra bhramamāṇa itastataḥ

तत्पश्चात् वृद्धावस्था से ग्रस्त होकर, परम वैराग्य को प्राप्त होकर, हे विप्रेन्द्र! मैं यहाँ इधर-उधर भटकता हुआ आया।

श्लोक 54 (skanda.6.103.54)

ततः क्षुत्क्षामकण्ठोऽहं स्नात्वाऽत्र सलिले शुभे । मृतश्च संनिविष्टोऽहं क्षुधया परिपीडितः

tataḥ kṣutkṣāmakaṇṭho'haṁ snātvā'tra salile śubhe mṛtaśca saṁniviṣṭo'haṁ kṣudhayā paripīḍitaḥ

तत्पश्चात् क्षुधा से सूखे कण्ठ वाला मैं, यहाँ इस शुभ जल में स्नान करके, क्षुधा से पीड़ित होकर मृत होकर बैठ गया।

श्लोक 55 (skanda.6.103.55)

प्राविश्याऽत्र जले पुण्ये पंचत्वं समुपागतः । ततश्च तत्क्षणादेव विमानं समुपस्थितम्

prāviśyā'tra jale puṇye paṁcatvaṁ samupāgataḥ tataśca tatkṣaṇādeva vimānaṁ samupasthitam

इस पुण्य जल में प्रवेश करके मैं मृत्यु को प्राप्त हुआ; तत्पश्चात् उसी क्षण एक विमान वहाँ उपस्थित हो गया।

श्लोक 56 (skanda.6.103.56)

मामन्येन शरीरेण समादाय च किंकराः । तत्रारोप्य ततः प्राप्ता ब्रह्मणः सदनं प्रति

māmanyena śarīreṇa samādāya ca kiṁkarāḥ tatrāropya tataḥ prāptā brahmaṇaḥ sadanaṁ prati

सेवकों ने मुझे दूसरे शरीर सहित ग्रहण किया, और उस पर बिठाकर मुझे ब्रह्मा के सदन में पहुँचाया।

श्लोक 57 (skanda.6.103.57)

दिव्यमाल्यावरधरं दिव्यगन्धानुलेपनम् । दिव्याभरणसंजुष्टं स्तूयमानं च किन्नरैः

divyamālyāvaradharaṁ divyagandhānulepanam divyābharaṇasaṁjuṣṭaṁ stūyamānaṁ ca kinnaraiḥ

दिव्य माला धारण किए, दिव्य सुगंध से अनुलिप्त, दिव्य आभूषणों से सुसज्जित, तथा किन्नरों द्वारा स्तुति किया जाता हुआ —

श्लोक 58 (skanda.6.103.58)

ततो ब्रह्मसभामध्ये ह्यहं तैर्देवकिंकरैः । तादृग्रूपो विचक्षुश्च धारितो ब्रह्मणः पुरः

tato brahmasabhāmadhye hyahaṁ tairdevakiṁkaraiḥ tādṛgrūpo vicakṣuśca dhārito brahmaṇaḥ puraḥ

तत्पश्चात् ब्रह्मा की सभा के मध्य में, उन देवकिंकरों द्वारा, इस रूप वाला किंतु नेत्रहीन मैं, ब्रह्मा के सम्मुख खड़ा किया गया।

श्लोक 59 (skanda.6.103.59)

सर्वैः सभागतैर्दृष्टा विस्मितास्यैः परस्परम् । अन्यैश्च निन्दमानैश्च धिक्छब्दस्य प्रजल्पकैः

sarvaiḥ sabhāgatairdṛṣṭā vismitāsyaiḥ parasparam anyaiśca nindamānaiśca dhikchabdasya prajalpakaiḥ

सभा में उपस्थित सभी लोगों ने, परस्पर आश्चर्यचकित मुख वाले होकर, तथा अन्य लोगों ने निंदा करते हुए 'धिक्कार' शब्द कहते हुए मुझे देखा —

श्लोक 60 (skanda.6.103.60)

किंकरा ऊचुः । एष देवश्चतुर्वक्त्रः सभेयं तस्य सम्भवा । सर्वैर्देवगणैर्जुष्टा प्रणामः क्रियतामिति

kiṁkarā ūcuḥ eṣa devaścaturvaktraḥ sabheyaṁ tasya sambhavā sarvairdevagaṇairjuṣṭā praṇāmaḥ kriyatāmiti

किंकरों ने कहा — यह चतुर्मुख देव हैं; यह इनकी अपनी सभा है, जो समस्त देवगणों से सेवित है — प्रणाम किया जाए।

श्लोक 61 (skanda.6.103.61)

ततोऽहं प्रणिपत्योच्चैस्तं देवं देवसंयुतम् । उपविष्टः सभामध्ये व्रीडयाऽवनतः स्थितः

tato'haṁ praṇipatyoccaistaṁ devaṁ devasaṁyutam upaviṣṭaḥ sabhāmadhye vrīḍayā'vanataḥ sthitaḥ

तत्पश्चात् उस देवताओं से घिरे हुए देव को गहराई से प्रणाम कर, मैं लज्जा से झुका हुआ सभा के मध्य बैठ गया।

श्लोक 62 (skanda.6.103.62)

यथायथा कथास्तत्र प्रजायन्ते सभातले । देवद्विजनरेन्द्राणां धर्माख्यानानि कुंभज

yathāyathā kathāstatra prajāyante sabhātale devadvijanarendrāṇāṁ dharmākhyānāni kuṁbhaja

हे कुम्भज! जैसे-जैसे उस सभातल में देवताओं, ब्राह्मणों और राजाओं की धर्मकथाएँ उत्पन्न होती गईं,

श्लोक 63 (skanda.6.103.63)

तथातथा ममातीव क्षुद्वृद्धिं संप्रगच्छति । जाने किं भक्षयाम्याशु दृषदः काष्ठमेव वा

tathātathā mamātīva kṣudvṛddhiṁ saṁpragacchati jāne kiṁ bhakṣayāmyāśu dṛṣadaḥ kāṣṭhameva vā

वैसे-वैसे मेरी क्षुधा अत्यंत बढ़ती गई; मुझे ज्ञात नहीं था कि मैं शीघ्र ही पत्थर खाऊँगा या काष्ठ।

श्लोक 64 (skanda.6.103.64)

ततो मया प्रणम्योच्चैर्विज्ञप्तः प्रपितामहः । प्राणिपत्य मुनिश्रेष्ठ लज्जां त्यक्त्वा सुदूरतः

tato mayā praṇamyoccairvijñaptaḥ prapitāmahaḥ prāṇipatya muniśreṣṭha lajjāṁ tyaktvā sudūrataḥ

तत्पश्चात् उच्च स्वर से प्रणाम कर, हे मुनिश्रेष्ठ! मैंने लज्जा को दूर त्यागकर प्रपितामह से निवेदन किया।

श्लोक 65 (skanda.6.103.65)

क्षुधा मां बाधतेऽतीव सांप्रतं प्रपितामह । तथा पश्यामि नो किंचित्तादृग्भोज्यं प्रयच्छ मे

kṣudhā māṁ bādhate'tīva sāṁprataṁ prapitāmaha tathā paśyāmi no kiṁcittādṛgbhojyaṁ prayaccha me

"हे प्रपितामह! अभी मुझे क्षुधा अत्यंत पीड़ित कर रही है; और मुझे यहाँ वैसा कोई भोजन दिखाई नहीं देता — मुझे वह प्रदान कीजिए।"

श्लोक 66 (skanda.6.103.66)

क्षुत्पिपासादयो दोषा न विद्यंतेऽत्र ते किल । स्वर्गे स्थितस्य यच्चैतत्तत्किमेवंविधं मम

kṣutpipāsādayo doṣā na vidyaṁte'tra te kila svarge sthitasya yaccaitattatkimevaṁvidhaṁ mama

"क्षुधा-पिपासा आदि दोष तो यहाँ स्वर्ग में स्थित के लिए विद्यमान ही नहीं हैं — तो फिर मेरे साथ ऐसा क्यों है?"

श्लोक 67 (skanda.6.103.67)

पितामह उवाच । त्वया नान्नं क्वचिद्दत्तं कस्यचित्पृथिवीतले । तेनात्रापि बुभुक्षा ते वृद्धिं गच्छति दुर्मते

pitāmaha uvāca tvayā nānnaṁ kvaciddattaṁ kasyacitpṛthivītale tenātrāpi bubhukṣā te vṛddhiṁ gacchati durmate

पितामह ने कहा — तुमने पृथ्वीतल पर कभी किसी को अन्न नहीं दिया; इसीलिए हे दुर्मते! यहाँ भी तुम्हारी भूख बढ़ती जाती है।

श्लोक 68 (skanda.6.103.68)

तथा हृतानि रत्नानि यानि दृष्टिगतानि ते । चक्षुर्हीनस्ततो जातो मम लोके गतोऽपि च

tathā hṛtāni ratnāni yāni dṛṣṭigatāni te cakṣurhīnastato jāto mama loke gato'pi ca

तथा जो भी रत्न तुम्हारी दृष्टि में आए, तुमने उन्हें छीन लिया — उसी से तुम मेरे लोक में आने पर भी नेत्रहीन हो गए हो।

श्लोक 69 (skanda.6.103.69)

यस्त्वं पातकयुक्तोऽपि संप्राप्तो मम मंदिरम् । तद्वक्ष्याम्यखिलं तेऽहं शृणुष्वैकमनाः स्थितः

yastvaṁ pātakayukto'pi saṁprāpto mama maṁdiram tadvakṣyāmyakhilaṁ te'haṁ śṛṇuṣvaikamanāḥ sthitaḥ

यद्यपि तुम पापयुक्त होकर भी मेरे मंदिर में आए हो, मैं तुम्हें सब कुछ बताऊँगा — एकाग्रचित्त होकर सुनो।

श्लोक 70 (skanda.6.103.70)

यस्मिञ्जले त्वया मुक्ताः प्राणाः पापात्मनापि च । श्वेतद्वीपपतिस्तत्र कलिकालभयातुरः

yasmiñjale tvayā muktāḥ prāṇāḥ pāpātmanāpi ca śvetadvīpapatistatra kalikālabhayāturaḥ

जिस जल में तुमने, पापात्मा होते हुए भी, अपने प्राण त्यागे — वहाँ श्वेतद्वीपपति कलिकाल के भय से आतुर होकर रहते हैं।

श्लोक 71 (skanda.6.103.71)

ततोऽस्य स्पर्शनात्सद्यो विमुक्तः सर्वपातकैः । अन्नादानात्परा पीडा जायते क्षुत्समुद्भवा

tato'sya sparśanātsadyo vimuktaḥ sarvapātakaiḥ annādānātparā pīḍā jāyate kṣutsamudbhavā

उसके स्पर्श से मनुष्य तत्काल समस्त पापों से मुक्त हो जाता है; अन्नदान न करने से क्षुधा से उत्पन्न परम पीड़ा होती है।

श्लोक 72 (skanda.6.103.72)

तथा रत्नापहारेण सञ्जाता चांधता तव । नैवान्यत्कारणं किंचित्सत्यमेतन्मयोदितम्

tathā ratnāpahāreṇa sañjātā cāṁdhatā tava naivānyatkāraṇaṁ kiṁcitsatyametanmayoditam

तथा रत्नों के अपहरण से ही तुम्हारी अंधता उत्पन्न हुई है; इसका अन्य कोई कारण नहीं है — यह मैंने सत्य कहा है।

श्लोक 73 (skanda.6.103.73)

ततो मया विधिः प्रोक्तः पुनरेव द्विजोत्तम । एषोऽपि ब्रह्मलोकस्ते नरकादतिरिच्यते । तस्मात्तत्रैव मां देव प्रेषयस्व किमत्र वै

tato mayā vidhiḥ proktaḥ punareva dvijottama eṣo'pi brahmalokaste narakādatiricyate tasmāttatraiva māṁ deva preṣayasva kimatra vai

तत्पश्चात्, हे द्विजोत्तम, मैंने पुनः यह निवेदन किया — 'यह ब्रह्मलोक भी मेरे लिए नरक से बढ़कर है। अतः हे देव! मुझे उसी स्थान पर भेज दीजिए — यहाँ मेरे लिए क्या है?'

श्लोक 74 (skanda.6.103.74)

ब्रह्मोवाच । तस्मात्तत्रैव गच्छ त्वं प्रेषितोऽसि किमत्र वै । नरके तव वासो न श्वेतद्वीपसमुद्भवम्

brahmovāca tasmāttatraiva gaccha tvaṁ preṣito'si kimatra vai narake tava vāso na śvetadvīpasamudbhavam

ब्रह्मा ने कहा — अतः तुम वहीं जाओ — तुम्हें वहीं भेजा जाता है, यहाँ तुम्हारे लिए और क्या है? तुम्हारा निवास नरक में नहीं, अपितु श्वेतद्वीप से उत्पन्न उस स्थान में होगा।

श्लोक 75 (skanda.6.103.75)

माहात्म्यं नाशमायाति शास्त्रं स्यात्सत्यवर्जितम् । तस्मात्त्वं नित्यमारूढो विमाने त्रैवसुन्दरे

māhātmyaṁ nāśamāyāti śāstraṁ syātsatyavarjitam tasmāttvaṁ nityamārūḍho vimāne traivasundare

अन्यथा माहात्म्य निष्फल हो जाएगा, और शास्त्र सत्यरहित हो जाएगा। अतः तुम सदा उस सुंदर विमान पर आरूढ़ रहोगे,

श्लोक 76 (skanda.6.103.76)

गत्वा जलाशये तस्मिन्यत्र प्राणाः समुज्झिताः । तमेव निजदेहं च भक्षयस्व यथेच्छया

gatvā jalāśaye tasminyatra prāṇāḥ samujjhitāḥ tameva nijadehaṁ ca bhakṣayasva yathecchayā

और उस जलाशय में जाकर, जहाँ तुमने अपने प्राण त्यागे थे, तुम अपने ही उस शरीर को इच्छानुसार खाओगे।

श्लोक 77 (skanda.6.103.77)

तद्भविष्यति मद्वाक्यादक्षयं जलमध्यगम् । तावत्कालं च दृष्टिस्ते भोज्यकाले भविष्यति

tadbhaviṣyati madvākyādakṣayaṁ jalamadhyagam tāvatkālaṁ ca dṛṣṭiste bhojyakāle bhaviṣyati

मेरे वचन से यह अवश्य ही उस जल के मध्य में घटित होगा; तथा केवल भोजन के समय ही तुम्हें दृष्टि प्राप्त होगी।

श्लोक 78 (skanda.6.103.78)

ततोऽहं तस्य वाक्येन दीपोत्सवदिने सदा । निशीथेऽत्र समागत्य भक्षयामि निजां तनुम्

tato'haṁ tasya vākyena dīpotsavadine sadā niśīthe'tra samāgatya bhakṣayāmi nijāṁ tanum

तत्पश्चात् उनके वचन से मैं सदा दीपोत्सव के दिन, मध्यरात्रि में यहाँ आकर अपने ही शरीर को खाता हूँ।

श्लोक 79 (skanda.6.103.79)

ततस्तृप्तिं प्रगच्छामि यावद्दैवं दिनं स्थितम् । मानुषं च तथा वर्षमीदृग्रूपो व्यवस्थितः

tatastṛptiṁ pragacchāmi yāvaddaivaṁ dinaṁ sthitam mānuṣaṁ ca tathā varṣamīdṛgrūpo vyavasthitaḥ

तत्पश्चात् मैं देवताओं के एक दिन के बराबर, अर्थात् मानव-वर्ष तक, इसी रूप में स्थित रहकर तृप्ति प्राप्त करता हूँ।

श्लोक 80 (skanda.6.103.80)

नास्त्यसाध्यं मुनिश्रेष्ठ तव किंचिज्जगत्त्रये । येनैकं चुलुकं कृत्वा निपीतः पयसां निधिः

nāstyasādhyaṁ muniśreṣṭha tava kiṁcijjagattraye yenaikaṁ culukaṁ kṛtvā nipītaḥ payasāṁ nidhiḥ

हे मुनिश्रेष्ठ! तीनों लोकों में तुम्हारे लिए कुछ भी असाध्य नहीं है — तुमने तो एक अंजलि बनाकर समुद्र को ही पी लिया था।

श्लोक 81 (skanda.6.103.81)

तस्मान्मुने दयां कृत्वा ममोपरि महत्तराम् । मामुद्धर सुदुःखार्तमस्मात्सर्वजनैर्घृणितात्

tasmānmune dayāṁ kṛtvā mamopari mahattarām māmuddhara suduḥkhārtamasmātsarvajanairghṛṇitāt

अतः हे मुने! मुझ पर महान् दया करके, समस्त जनों द्वारा घृणित इस अवस्था से, अत्यंत दुःखी मुझे उद्धार कीजिए।

श्लोक 82 (skanda.6.103.82)

तथा दृष्टिप्रदानं मे कुरुष्व मुनिसत्तम । निर्विण्णोऽस्म्यंधभावेन नान्या त्वत्तोऽस्ति मे गतिः

tathā dṛṣṭipradānaṁ me kuruṣva munisattama nirviṇṇo'smyaṁdhabhāvena nānyā tvatto'sti me gatiḥ

तथा हे मुनिसत्तम! मुझे दृष्टि भी प्रदान कीजिए; मैं इस अंधत्व से अत्यंत विरक्त हूँ — आपके अतिरिक्त मेरी कोई अन्य गति नहीं है।

श्लोक 83 (skanda.6.103.83)

तस्य तद्वचनं श्रुत्वा कृपया मम मानसम् । द्रवीभूतं तदा वाक्यमवोचं तं रघूत्तम

tasya tadvacanaṁ śrutvā kṛpayā mama mānasam dravībhūtaṁ tadā vākyamavocaṁ taṁ raghūttama

उसके इस वचन को सुनकर, करुणा से मेरा मन द्रवित हो गया; तब मैंने उस समय हे रघूत्तम! यह वचन कहा —

श्लोक 84 (skanda.6.103.84)

त्वमन्ननिष्क्रयं देहि कण्ठस्थमिह भूषणम् । येन नाशं प्रयात्येषा बुभुक्षा जठरोद्भवा

tvamannaniṣkrayaṁ dehi kaṇṭhasthamiha bhūṣaṇam yena nāśaṁ prayātyeṣā bubhukṣā jaṭharodbhavā

'तुम अपने कण्ठ में स्थित इस भूषण को अन्न के मूल्य के रूप में दो, जिससे उदर से उत्पन्न यह भूख नष्ट हो जाए।

श्लोक 85 (skanda.6.103.85)

तथाऽद्यप्रभृति प्राज्ञ रत्नदीपान्सुनिर्मलान् । अत्रैव सरसस्तीरे देहि दामोदराय च

tathā'dyaprabhṛti prājña ratnadīpānsunirmalān atraiva sarasastīre dehi dāmodarāya ca

तथा हे प्राज्ञ! आज से लेकर यहाँ इस सरोवर के तट पर दामोदर को निर्मल रत्नदीप अर्पित करो,

श्लोक 86 (skanda.6.103.86)

तेन दानेन ते येन संजायते दृष्टिः शाश्वती तव निर्मला । मम वाक्यादसंदिग्धं सत्येनात्मानमालभे

tena dānena te yena saṁjāyate dṛṣṭiḥ śāśvatī tava nirmalā mama vākyādasaṁdigdhaṁ satyenātmānamālabhe

उस दान से तुम्हें निर्मल और शाश्वत दृष्टि प्राप्त होगी; मेरे वचन से निःसंदेह, मैं सत्य द्वारा इसकी प्रतिज्ञा करता हूँ।'

श्लोक 87 (skanda.6.103.87)

राजोवाच । ममोपरि दयां कृत्वा त्वमेव मुनिसत्तम । गृहाण रत्नसंभूतं कण्ठाभरणमुत्तमम्

rājovāca mamopari dayāṁ kṛtvā tvameva munisattama gṛhāṇa ratnasaṁbhūtaṁ kaṇṭhābharaṇamuttamam

राजा ने कहा — मुझ पर दया दिखाकर, हे मुनिसत्तम! तुम स्वयं ही इस उत्तम रत्नमय कण्ठाभरण को ग्रहण करो।

श्लोक 88 (skanda.6.103.88)

ततो दयाभिभूतेन मया तस्य प्रतिग्रहः । निःस्पृहेणापि संचीर्णो मुनिना रण्यवासिना

tato dayābhibhūtena mayā tasya pratigrahaḥ niḥspṛheṇāpi saṁcīrṇo muninā raṇyavāsinā

तत्पश्चात् दया से अभिभूत होकर, यद्यपि मैं वनवासी मुनि निःस्पृह था, फिर भी मैंने उससे वह भेंट स्वीकार की।

श्लोक 89 (skanda.6.103.89)

ततः प्रक्षाल्य मे पादौ यावत्तेनान्ननिष्क्रये । विभूषणमिदं दत्तं सद्भक्त्या भावितात्मने

tataḥ prakṣālya me pādau yāvattenānnaniṣkraye vibhūṣaṇamidaṁ dattaṁ sadbhaktyā bhāvitātmane

तत्पश्चात् मेरे चरण धोकर, जब तक मैंने उसे अन्न का मूल्य दिया, तब तक मैंने भावनापूर्वक इस विभूषण को उसे सद्भक्ति से प्रदान किया।

श्लोक 90 (skanda.6.103.90)

ततस्तस्य प्रणष्टा सा बुभुक्षा तत्क्षणान्नृप । संजाता परमा तृप्तिर्देवपीयूषसंभवा

tatastasya praṇaṣṭā sā bubhukṣā tatkṣaṇānnṛpa saṁjātā paramā tṛptirdevapīyūṣasaṁbhavā

तत्पश्चात् हे नृप! उसी क्षण उसकी वह क्षुधा नष्ट हो गई, और देवताओं के अमृत के समान परम तृप्ति उत्पन्न हुई।

श्लोक 91 (skanda.6.103.91)

तस्य नष्टं मृतं कायं तच्च जीर्णं पुरोद्भवम् । यदासीदक्षयं नित्यं तस्मिंस्तोये व्यवस्थितम्

tasya naṣṭaṁ mṛtaṁ kāyaṁ tacca jīrṇaṁ purodbhavam yadāsīdakṣayaṁ nityaṁ tasmiṁstoye vyavasthitam

उसका वह मृत, जीर्ण, पूर्वकाल से चला आ रहा शरीर तब नष्ट हो गया — जो उस जल में सदा अक्षय रूप से स्थित रहता था।

श्लोक 92 (skanda.6.103.92)

ततः संस्थापितस्तेन तस्मिन्स्थाने सुभक्तितः । दामोदरो रघुश्रेष्ठ कृत्वा प्रासादमुत्तमम्

tataḥ saṁsthāpitastena tasminsthāne subhaktitaḥ dāmodaro raghuśreṣṭha kṛtvā prāsādamuttamam

तत्पश्चात् उसने सुभक्तिपूर्वक उसी स्थान पर उत्तम प्रासाद बनवाकर दामोदर की स्थापना की, हे रघुश्रेष्ठ!

श्लोक 93 (skanda.6.103.93)

तस्याग्रे श्रद्धया युक्तो दीपं दद्याद्यथायथा । तथातथा भवेद्दृष्टिस्तस्य नित्यं सुनिर्मलाम्

tasyāgre śraddhayā yukto dīpaṁ dadyādyathāyathā tathātathā bhaveddṛṣṭistasya nityaṁ sunirmalām

उसके सम्मुख श्रद्धायुक्त होकर वह जैसे-जैसे दीपक अर्पित करता गया, वैसे-वैसे उसकी दृष्टि सदा अधिकाधिक निर्मल होती गई।

श्लोक 94 (skanda.6.103.94)

ततो मासात्समासाद्य दिव्यचक्षुर्महीपतिः । स बभूव नृपश्रेष्ठः स्पृहणीयतमः सताम्

tato māsātsamāsādya divyacakṣurmahīpatiḥ sa babhūva nṛpaśreṣṭhaḥ spṛhaṇīyatamaḥ satām

तत्पश्चात् एक मास में ही उस भूपति ने दिव्य नेत्र प्राप्त किए, और सज्जनों में अत्यंत वांछनीय, नृपश्रेष्ठ बन गया।

श्लोक 95 (skanda.6.103.95)

ततः प्रोवाच मां हृष्टः प्रणिपत्य कृतांजलिः । हर्षगद्गदया वाचा प्रस्थितस्त्रिदिवं प्रति

tataḥ provāca māṁ hṛṣṭaḥ praṇipatya kṛtāṁjaliḥ harṣagadgadayā vācā prasthitastridivaṁ prati

तत्पश्चात् उसने हर्षित होकर, हाथ जोड़कर, प्रणाम करके, हर्ष से गद्गद वाणी में मुझसे कहा, स्वर्ग की ओर प्रस्थान करते हुए —

श्लोक 96 (skanda.6.103.96)

त्वत्प्रसादात्प्रणष्टा मे बुभुक्षाऽतिसुदारुणा । तथा दृष्टिश्च संजाता दिव्या ब्राह्मणसत्तम

tvatprasādātpraṇaṣṭā me bubhukṣā'tisudāruṇā tathā dṛṣṭiśca saṁjātā divyā brāhmaṇasattama

"आपकी कृपा से मेरी वह अत्यंत भयंकर क्षुधा नष्ट हो गई, तथा हे ब्राह्मणसत्तम! मुझे दिव्य दृष्टि भी प्राप्त हो गई।

श्लोक 97 (skanda.6.103.97)

अनुज्ञां देहि मे तस्माद्येन गच्छामि सांप्रतम् । ब्रह्मलोकं मुनिश्रेष्ठ तीर्थस्यास्य प्रभावतः

anujñāṁ dehi me tasmādyena gacchāmi sāṁpratam brahmalokaṁ muniśreṣṭha tīrthasyāsya prabhāvataḥ

अतः मुझे अनुमति दीजिए, जिससे मैं अब हे मुनिश्रेष्ठ! इस तीर्थ के प्रभाव से ब्रह्मलोक को जाऊँ।

श्लोक 98 (skanda.6.103.98)

ततो मया विनिर्मुक्तः प्रणिपत्य मुहुर्मुहुः । स जगाम प्रहृष्टात्मा ब्रह्मलोकं सनातनम्

tato mayā vinirmuktaḥ praṇipatya muhurmuhuḥ sa jagāma prahṛṣṭātmā brahmalokaṁ sanātanam

तत्पश्चात् मेरे द्वारा विमुक्त होकर, बार-बार प्रणाम करके, वह प्रसन्नचित्त होकर सनातन ब्रह्मलोक को चला गया।

श्लोक 99 (skanda.6.103.99)

एवं मे भूषणमिदं जातं हस्तगतं पुरा । तव योग्यमिदं ज्ञात्वा तुभ्यं तेन निवेदितम्

evaṁ me bhūṣaṇamidaṁ jātaṁ hastagataṁ purā tava yogyamidaṁ jñātvā tubhyaṁ tena niveditam

इस प्रकार यह भूषण पूर्वकाल में मेरे हाथ में आया; तुम्हारे योग्य जानकर मैंने अब इसे तुम्हें प्रदान किया है।

श्लोक 100 (skanda.6.103.100)

ततः प्रभृति राजेंद्र समागत्यात्र मानवाः । रत्नदीपान्प्रदायोच्चैः स्नात्वाऽत्र सलिले शुभे । कार्तिके मासि निर्यांति देहांते त्रिदिवालयम्

tataḥ prabhṛti rājeṁdra samāgatyātra mānavāḥ ratnadīpānpradāyoccaiḥ snātvā'tra salile śubhe kārtike māsi niryāṁti dehāṁte tridivālayam

हे राजेन्द्र! तब से यहाँ आकर मनुष्य कार्तिक मास में इस शुभ जल में स्नान कर रत्नदीप अर्पित करके, देहांत के समय स्वर्गलोक को प्राप्त होते हैं।

श्लोक 101 (skanda.6.103.101)

ये पुनः प्राणसंत्यागं प्रकुर्वंति समाहिताः । पापात्मानोऽपि ते यांति ब्रह्मलोकं रघूत्तम

ye punaḥ prāṇasaṁtyāgaṁ prakurvaṁti samāhitāḥ pāpātmāno'pi te yāṁti brahmalokaṁ raghūttama

तथा हे रघूत्तम! जो लोग यहाँ एकाग्रचित्त होकर प्राणों का त्याग करते हैं, वे पापात्मा होते हुए भी ब्रह्मलोक को जाते हैं।

श्लोक 102 (skanda.6.103.102)

ततो दृष्ट्वा सहस्राक्षः प्रभावं तज्जलोद्भवम् । पांसुभिः पूरयामास समंताद्भयसंकुलम्

tato dṛṣṭvā sahasrākṣaḥ prabhāvaṁ tajjalodbhavam pāṁsubhiḥ pūrayāmāsa samaṁtādbhayasaṁkulam

तत्पश्चात् सहस्राक्ष (इंद्र) ने उस जल से उत्पन्न प्रभाव को देखकर, भय से व्याकुल होकर उसे चारों ओर से धूल से भर दिया।

श्लोक 103 (skanda.6.103.103)

तदद्य दिवसः प्राप्तो दीपोत्सवसमुद्भवः । सुपुण्योऽत्र ममादेशात्त्वं कुरुष्व सुकूपिकाम्

tadadya divasaḥ prāpto dīpotsavasamudbhavaḥ supuṇyo'tra mamādeśāttvaṁ kuruṣva sukūpikām

"आज वही दीपोत्सव का अत्यंत पुण्यमय दिवस प्राप्त हुआ है; मेरी आज्ञा से यहाँ एक उत्तम कूपिका का निर्माण करो।

श्लोक 104 (skanda.6.103.104)

तस्यां स्नानं विधायाथ पितॄंस्तर्पय राघव । देवस्यास्य पुरो देहि रत्नदीपमनुत्तमम्

tasyāṁ snānaṁ vidhāyātha pitṝṁstarpaya rāghava devasyāsya puro dehi ratnadīpamanuttamam

उसमें स्नान करके, हे राघव! अपने पितरों को तर्पण दो; इस देव के सम्मुख अनुपम रत्नदीप अर्पित करो।

श्लोक 105 (skanda.6.103.105)

येन संजायते सिद्धिर्ब्रह्मलोकसमुद्भवा । अनेनैव शरीरेण सत्यमेतन्मयोदितम्

yena saṁjāyate siddhirbrahmalokasamudbhavā anenaiva śarīreṇa satyametanmayoditam

इससे ब्रह्मलोक से उत्पन्न सिद्धि प्राप्त होती है — इसी शरीर से — यह मैंने सत्य कहा है।

श्लोक 106 (skanda.6.103.106)

ततस्ते राघवादेशात्सर्वे राक्षसवानराः । तस्मिन्देशे विनिदधुः कूपिकां विमलोदकाम्

tataste rāghavādeśātsarve rākṣasavānarāḥ tasmindeśe vinidadhuḥ kūpikāṁ vimalodakām

तत्पश्चात् राघव की आज्ञा से समस्त राक्षसों और वानरों ने उस स्थान पर एक निर्मल जल की कूपिका बनाई।

श्लोक 107 (skanda.6.103.107)

तत्र स्नात्वा पितॄंस्तर्प्य रत्नदीपं प्रदाय च । समस्तं कार्तिकं यावदयोध्यां प्रस्थितास्ततः

tatra snātvā pitṝṁstarpya ratnadīpaṁ pradāya ca samastaṁ kārtikaṁ yāvadayodhyāṁ prasthitāstataḥ

वहाँ स्नान करके, पितरों को तर्पण देकर, और रत्नदीप अर्पित करके, वे सम्पूर्ण कार्तिक मास तक वहाँ रहकर तत्पश्चात् अयोध्या की ओर प्रस्थान कर गए।

श्लोक 108 (skanda.6.103.108)

ततो विभीषणं मुक्त्वा हनूमंतं च वानरम् । ब्रह्मलोकं गताः सर्वे तत्तीर्थस्य प्रभावतः

tato vibhīṣaṇaṁ muktvā hanūmaṁtaṁ ca vānaram brahmalokaṁ gatāḥ sarve tattīrthasya prabhāvataḥ

तत्पश्चात् विभीषण और वानर हनुमान को छोड़कर, वे सभी उस तीर्थ के प्रभाव से ब्रह्मलोक को चले गए।

श्लोक 109 (skanda.6.103.109)

सूत उवाच । अद्यापि दीपदानं यः कुरुते तत्र सादरम् । संप्राप्ते कार्तिके मासि स्नात्वा तत्र जले शुभे । स सर्वपातकैर्मुक्तो ब्रह्मलोके महीयते

sūta uvāca adyāpi dīpadānaṁ yaḥ kurute tatra sādaram saṁprāpte kārtike māsi snātvā tatra jale śubhe sa sarvapātakairmukto brahmaloke mahīyate

सूत जी ने कहा — आज भी जो कोई वहाँ आदरपूर्वक दीपदान करता है, और कार्तिक मास आने पर वहाँ उस शुभ जल में स्नान करता है, वह समस्त पापों से मुक्त होकर ब्रह्मलोक में सम्मानित होता है।

श्लोक 110 (skanda.6.103.110)

एवं तत्र समुत्पन्नं तत्तडागं शुभावहम् । आनर्त्तीयं तथा विष्णुकूपिका सा च शोभना

evaṁ tatra samutpannaṁ tattaḍāgaṁ śubhāvaham ānarttīyaṁ tathā viṣṇukūpikā sā ca śobhanā

इस प्रकार वहाँ वह शुभदायक तडाग उत्पन्न हुआ — आनर्तीय, तथा वह सुंदर विष्णुकूपिका भी।

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