नागर खण्ड · अध्याय 104
कुशेश्वर एवं लवेश्वर की प्रतिष्ठा का वर्णन
श्लोक 1 (skanda.6.104.1)
ऋषय ऊचुः । राक्षसैस्तत्र लिंगानि यानि भक्त्या समन्वितैः । स्थापितानि च माहात्म्यं तेषां सूत प्रकीर्तय
ṛṣaya ūcuḥ rākṣasaistatra liṁgāni yāni bhaktyā samanvitaiḥ sthāpitāni ca māhātmyaṁ teṣāṁ sūta prakīrtaya
ऋषियों ने कहा — हे सूत! वहाँ राक्षसों द्वारा भक्तिपूर्वक स्थापित किए गए जो लिंग हैं, उनकी महिमा बताइए।
श्लोक 2 (skanda.6.104.2)
सूत उवाच । तेषां पूजाकृते रौद्रा राक्षसा बलवत्तराः । लंकापुर्याः समायांति सदैव शतशः पुरा
sūta uvāca teṣāṁ pūjākṛte raudrā rākṣasā balavattarāḥ laṁkāpuryāḥ samāyāṁti sadaiva śataśaḥ purā
सूत जी ने कहा — उनकी पूजा के लिए पूर्वकाल में भयंकर और बलशाली राक्षस सदैव सैकड़ों की संख्या में लंकापुरी से आया करते थे।
श्लोक 3 (skanda.6.104.3)
आगच्छन्तो व्रजन्तस्ते मार्गे क्षेत्रे च तत्र च । भक्षयन्ति जनौघांश्च बालवृद्धाञ्जनानपि
āgacchanto vrajantaste mārge kṣetre ca tatra ca bhakṣayanti janaughāṁśca bālavṛddhāñjanānapi
आते-जाते वे मार्ग में और उस क्षेत्र में जन-समूहों को, बालकों और वृद्धों सहित, खा जाते थे।
श्लोक 4 (skanda.6.104.4)
ततस्ते मानवाः सर्वे प्रद्रवंतः समंततः । इतश्चेतश्च धावन्ति प्राणरक्षणतत्पराः
tataste mānavāḥ sarve pradravaṁtaḥ samaṁtataḥ itaścetaśca dhāvanti prāṇarakṣaṇatatparāḥ
तब वे सभी मनुष्य चारों ओर भागने लगते, प्राणरक्षा के लिए इधर-उधर दौड़ते हुए।
श्लोक 5 (skanda.6.104.5)
तथान्ये बहवो गत्वा ह्ययोध्याख्यां महापुरीम् । रामपुत्रं नृपश्रेष्ठं कुशं प्रोचुः सुदुःखिताः
tathānye bahavo gatvā hyayodhyākhyāṁ mahāpurīm rāmaputraṁ nṛpaśreṣṭhaṁ kuśaṁ procuḥ suduḥkhitāḥ
तथा अन्य अनेक लोगों ने अयोध्या नामक महापुरी में जाकर, अत्यंत दुःखी होकर, राम के पुत्र नृपश्रेष्ठ कुश से कहा —
श्लोक 6 (skanda.6.104.6)
तव पित्रा समं प्राप्ताः पूर्वं ये राक्षसा नृप । हाटकेश्वरजे क्षेत्रे विभीषणपुरःसराः
tava pitrā samaṁ prāptāḥ pūrvaṁ ye rākṣasā nṛpa hāṭakeśvaraje kṣetre vibhīṣaṇapuraḥsarāḥ
"हे नृप! जो राक्षस पूर्व में आपके पिता के साथ, विभीषण को आगे करके, हाटकेश्वर से उत्पन्न उस क्षेत्र में आए थे,
श्लोक 7 (skanda.6.104.7)
संस्थापितानि लिंगानि चतुर्वक्त्राणि तत्र वै । राक्षसेंद्रैः स्वमन्त्रैस्तैस्तस्य क्षेत्रस्य पश्चिमे
saṁsthāpitāni liṁgāni caturvaktrāṇi tatra vai rākṣaseṁdraiḥ svamantraistaistasya kṣetrasya paścime
उन राक्षसेन्द्रों ने अपने-अपने मंत्रों से उस क्षेत्र के पश्चिम भाग में चतुर्मुख लिंगों की स्थापना की थी।
श्लोक 8 (skanda.6.104.8)
तेनैव चानुषंगेण समागच्छंति नित्यशः । तस्मिन्क्षेत्रे प्रकुर्वंति तथा लोकस्य भक्षणम्
tenaiva cānuṣaṁgeṇa samāgacchaṁti nityaśaḥ tasminkṣetre prakurvaṁti tathā lokasya bhakṣaṇam
और उसी बहाने से वे अब सदैव आते हैं, तथा उस क्षेत्र में लोगों का भक्षण करते हैं।
श्लोक 9 (skanda.6.104.9)
यदि वा तानि लिंगानि कश्चित्संपूजयेन्नरः । सद्यो विनाशमायाति सोऽप्यनर्थो महानभूत्
yadi vā tāni liṁgāni kaścitsaṁpūjayennaraḥ sadyo vināśamāyāti so'pyanartho mahānabhūt
अथवा यदि कोई मनुष्य उन लिंगों की पूजा कर बैठे, तो वह भी तत्काल विनाश को प्राप्त होता है — यह भी एक महान अनर्थ हो गया है।
श्लोक 10 (skanda.6.104.10)
तस्माद्यदि न रक्षा नः करिष्यसि महीपते । तच्छनैर्यास्यते लोकः सर्वोऽयं संक्षयं ध्रुवम्
tasmādyadi na rakṣā naḥ kariṣyasi mahīpate tacchanairyāsyate lokaḥ sarvo'yaṁ saṁkṣayaṁ dhruvam
अतः हे महीपते! यदि आप हमारी रक्षा नहीं करेंगे, तो यह समस्त लोक धीरे-धीरे निश्चित रूप से नाश को प्राप्त होगा।
श्लोक 11 (skanda.6.104.11)
तच्च क्षेत्रं विशेषेण यत्रागच्छंति ते सदा । राक्षसाः क्रूरकर्माणो महामांसस्य लोलुपाः
tacca kṣetraṁ viśeṣeṇa yatrāgacchaṁti te sadā rākṣasāḥ krūrakarmāṇo mahāmāṁsasya lolupāḥ
और वह क्षेत्र विशेष रूप से वही है जहाँ वे सदा आते हैं — वे क्रूरकर्मा राक्षस, महामांस के लोलुप।
श्लोक 12 (skanda.6.104.12)
तच्छ्रुत्वा स नृपस्तूर्णं स्वामात्यानां न्यवेदयत् । राज्यभारं ततस्तत्र बलेन सहितो ययौ
tacchrutvā sa nṛpastūrṇaṁ svāmātyānāṁ nyavedayat rājyabhāraṁ tatastatra balena sahito yayau
यह सुनकर उस राजा ने शीघ्र ही अपने मंत्रियों को सूचित किया, और राज्य का भार सौंपकर सेना सहित वहाँ गए।
श्लोक 13 (skanda.6.104.13)
अथ प्राप्तं कुशं दृष्ट्वा हतशेषा द्विजोत्तमाः । प्रोचुस्तं भर्त्सयित्वा तु वचनैः परुषाक्षरैः
atha prāptaṁ kuśaṁ dṛṣṭvā hataśeṣā dvijottamāḥ procustaṁ bhartsayitvā tu vacanaiḥ paruṣākṣaraiḥ
तत्पश्चात् कुश को आया हुआ देखकर, बचे हुए श्रेष्ठ द्विजों ने उन्हें धिक्कारते हुए कठोर वचनों से कहा —
श्लोक 14 (skanda.6.104.14)
किमेवं क्रियते राज्यं यथा त्वं क्षत्रियाधमः । करोषि यत्र विध्वंसं राक्षसैर्नीयते जनः
kimevaṁ kriyate rājyaṁ yathā tvaṁ kṣatriyādhamaḥ karoṣi yatra vidhvaṁsaṁ rākṣasairnīyate janaḥ
"क्या इस प्रकार राज्य चलाया जाता है, कि तुम हे क्षत्रियाधम! ऐसा विध्वंस होने देते हो, जिसमें प्रजा राक्षसों द्वारा ले जाई जाती है?
श्लोक 15 (skanda.6.104.15)
नूनं जातो न रामेण भवान्रावणसंभवः । येनोपेक्षसि सर्वान्नो राक्षसैः परिपीडितान्
nūnaṁ jāto na rāmeṇa bhavānrāvaṇasaṁbhavaḥ yenopekṣasi sarvānno rākṣasaiḥ paripīḍitān
निश्चय ही तुम राम से उत्पन्न नहीं हो, अपितु रावण से उत्पन्न प्रतीत होते हो, क्योंकि तुम राक्षसों से पीड़ित हम सबकी उपेक्षा करते हो।
श्लोक 16 (skanda.6.104.16)
सत्यमेतत्पुरा प्रोक्तं नीतिशास्त्रविचक्षणैः । यस्य वर्णस्य यो राजा स वर्णः सुखमेधते
satyametatpurā proktaṁ nītiśāstravicakṣaṇaiḥ yasya varṇasya yo rājā sa varṇaḥ sukhamedhate
यह सत्य पूर्वकाल में नीतिशास्त्र के ज्ञाताओं द्वारा कहा गया है — जैसा राजा होता है, वैसी ही प्रजा सुखी होती है।
श्लोक 17 (skanda.6.104.17)
तस्मात्त्वं राक्षसोद्भूतो राक्षसैर्द्विजसत्तमान् । उपेक्षसे ततः सर्वान्भक्ष्यमाणांस्तथापरान्
tasmāttvaṁ rākṣasodbhūto rākṣasairdvijasattamān upekṣase tataḥ sarvānbhakṣyamāṇāṁstathāparān
अतः तुम स्वयं राक्षसों से उत्पन्न होकर, राक्षसों द्वारा भक्षित होते हुए श्रेष्ठ द्विजों की तथा अन्य सभी की उपेक्षा करते हो।
श्लोक 18 (skanda.6.104.18)
आर्तानां यत्र लोकानां दोषैः पार्थिवसंभवैः । पतंत्यश्रूणि भूपृष्ठे तत्र राजा स दोषभाक्
ārtānāṁ yatra lokānāṁ doṣaiḥ pārthivasaṁbhavaiḥ pataṁtyaśrūṇi bhūpṛṣṭhe tatra rājā sa doṣabhāk
जहाँ पीड़ित लोगों के आँसू, राजा से उत्पन्न दोषों के कारण, भूतल पर गिरते हैं — वहाँ राजा स्वयं ही दोष का भागी होता है।
श्लोक 19 (skanda.6.104.19)
कुश उवाच । प्रसादः क्रियतां विप्रा न मया ज्ञातमीदृशम् । राक्षसेभ्यः समुत्पन्नो ब्राह्मणानां पराभवः
kuśa uvāca prasādaḥ kriyatāṁ viprā na mayā jñātamīdṛśam rākṣasebhyaḥ samutpanno brāhmaṇānāṁ parābhavaḥ
कुश ने कहा — हे विप्रो! प्रसन्न होइए, मुझे ऐसा ज्ञात नहीं था — यह राक्षसों से उत्पन्न ब्राह्मणों का यह पराभव।
श्लोक 20 (skanda.6.104.20)
अद्यप्रभृति यः कश्चिद्विनाशं नीयते क्वचित् । ब्राह्मणो वाऽथवाऽन्योऽपि तद्भवेन्मम पातकम्
adyaprabhṛti yaḥ kaścidvināśaṁ nīyate kvacit brāhmaṇo vā'thavā'nyo'pi tadbhavenmama pātakam
आज से लेकर, जो भी कोई, ब्राह्मण हो या अन्य कोई भी, कहीं भी विनाश को प्राप्त हो, वह मेरा ही पाप होगा।
श्लोक 21 (skanda.6.104.21)
एवमुक्त्वा ततस्तूर्णं प्रेषयामास राघवः । विभीषणाय संक्रुद्धो दूतं भयविवर्जितम्
evamuktvā tatastūrṇaṁ preṣayāmāsa rāghavaḥ vibhīṣaṇāya saṁkruddho dūtaṁ bhayavivarjitam
यह कहकर राघव ने शीघ्र ही क्रुद्ध होकर विभीषण के पास एक निर्भीक दूत भेजा।
श्लोक 22 (skanda.6.104.22)
गच्छ दूत द्रुतं गत्वा त्वया वाच्यो विभीषणः । रामोचितस्त्वया स्नेहो मया सह कृतो महान्
gaccha dūta drutaṁ gatvā tvayā vācyo vibhīṣaṇaḥ rāmocitastvayā sneho mayā saha kṛto mahān
"हे दूत! शीघ्र जाओ, और विभीषण से कहो — राम के योग्य महान स्नेह मेरे द्वारा तुम्हारे साथ किया गया था।
श्लोक 23 (skanda.6.104.23)
यद्राक्षसगणैः सार्धं मम भूमिं समंततः । त्वं क्लेशयसि दुर्बुद्धे मां विश्वास्य सुभाषितैः
yadrākṣasagaṇaiḥ sārdhaṁ mama bhūmiṁ samaṁtataḥ tvaṁ kleśayasi durbuddhe māṁ viśvāsya subhāṣitaiḥ
कि तुम राक्षसों के समूहों सहित मेरी भूमि को सर्वत्र पीड़ित करते हो, हे दुर्बुद्धे! मुझे मधुर वचनों से विश्वास दिलाकर —
श्लोक 24 (skanda.6.104.24)
मम पित्रा कृतेयं ते प्रतिष्ठा राक्षसाधम । तेन नो हन्मि ते भ्राता यथा तातेन शातितः
mama pitrā kṛteyaṁ te pratiṣṭhā rākṣasādhama tena no hanmi te bhrātā yathā tātena śātitaḥ
यह पद तुम्हें मेरे पिता द्वारा दिया गया था, हे राक्षसाधम! उसी अधिकार से मैं तुम्हें मार डालूँगा, हे भ्राता, जैसे पिता ने तुम्हारे भाई को मारा था।
श्लोक 25 (skanda.6.104.25)
विषवृक्षोऽपि यो वृद्धिं स्वयमेव प्रणीयते । कथं संछिद्यते सोऽत्र स्वयमेव मनीषिभिः
viṣavṛkṣo'pi yo vṛddhiṁ svayameva praṇīyate kathaṁ saṁchidyate so'tra svayameva manīṣibhiḥ
विषवृक्ष भी, यद्यपि वह स्वयं ही बढ़ता है, तो फिर बुद्धिमानों द्वारा वह वहीं स्वयं ही क्यों न काटा जाए?
श्लोक 26 (skanda.6.104.26)
तस्मादद्य दिनादूर्ध्वं यदि कश्चिन्निशाचरः । समुद्रस्योत्तरं पारं कथंचिदागमिष्यति
tasmādadya dinādūrdhvaṁ yadi kaścinniśācaraḥ samudrasyottaraṁ pāraṁ kathaṁcidāgamiṣyati
अतः आज के दिन से आगे, यदि कोई निशाचर किसी प्रकार समुद्र के उत्तरी तट पर आ जाए,
श्लोक 27 (skanda.6.104.27)
तदहं सत्वरं प्राप्य लंकां तव पुरीमिमाम् । ससैन्यो ध्वंसयिष्यामि तथा सर्वान्निशाचरान्
tadahaṁ satvaraṁ prāpya laṁkāṁ tava purīmimām sasainyo dhvaṁsayiṣyāmi tathā sarvānniśācarān
तो मैं शीघ्र ही तुम्हारी उस लंका नगरी में पहुँचकर, सेना सहित समस्त निशाचरों का नाश कर दूँगा।
श्लोक 28 (skanda.6.104.28)
त्वां च बद्ध्वा दृढैः पाशैर्निगडैश्च सुसंयतम् । कारासंस्थं करिष्यामि सद्य एव न संशयः
tvāṁ ca baddhvā dṛḍhaiḥ pāśairnigaḍaiśca susaṁyatam kārāsaṁsthaṁ kariṣyāmi sadya eva na saṁśayaḥ
तथा तुम्हें दृढ़ रस्सियों और बेड़ियों से बाँधकर, मैं तुम्हें तत्काल कारागार में डाल दूँगा — इसमें कोई संदेह नहीं है।
श्लोक 29 (skanda.6.104.29)
एवमुक्तस्ततो दूतो गत्वा सेतुं द्रुतं ततः । दृष्ट्वा रामेश्वरं देवं यावदग्रे व्यवस्थितः
evamuktastato dūto gatvā setuṁ drutaṁ tataḥ dṛṣṭvā rāmeśvaraṁ devaṁ yāvadagre vyavasthitaḥ
इस प्रकार आदेश पाकर वह दूत शीघ्र सेतु पर पहुँचकर, देव रामेश्वर को देखकर उनके सम्मुख खड़ा हो गया,
श्लोक 30 (skanda.6.104.30)
तावत्पृष्टो जनैः कैश्चित्कस्त्वं वत्स इहागतः । केन कार्येण नो ब्रूहि नात्र गच्छंति मानवाः
tāvatpṛṣṭo janaiḥ kaiścitkastvaṁ vatsa ihāgataḥ kena kāryeṇa no brūhi nātra gacchaṁti mānavāḥ
तभी कुछ लोगों ने उससे पूछा — हे वत्स! तुम कौन हो जो यहाँ आए हो? किस कार्य से — बताओ, क्योंकि यहाँ से आगे लोग नहीं जाते।
श्लोक 31 (skanda.6.104.31)
दूत उवाच । अहं कुशेन भूपेन विभीषणगृहं प्रति । प्रेषितः कार्यमुद्दिश्य तत्र यास्याम्यहं कथम्
dūta uvāca ahaṁ kuśena bhūpena vibhīṣaṇagṛhaṁ prati preṣitaḥ kāryamuddiśya tatra yāsyāmyahaṁ katham
दूत ने कहा — मैं राजा कुश द्वारा विभीषण के घर की ओर, किसी कार्य के उद्देश्य से भेजा गया हूँ — तो फिर मैं वहाँ कैसे जाऊँ?
श्लोक 32 (skanda.6.104.32)
जना ऊचुः । नातः परं नरः कश्चिद्गन्तुं शक्तः कथंचन । भग्नः सेतुर्यतो मध्ये रामेणाक्लिष्टकर्मणा
janā ūcuḥ nātaḥ paraṁ naraḥ kaścidgantuṁ śaktaḥ kathaṁcana bhagnaḥ seturyato madhye rāmeṇākliṣṭakarmaṇā
लोगों ने कहा — इससे आगे कोई भी मनुष्य किसी प्रकार नहीं जा सकता, क्योंकि अक्लिष्टकर्मा राम द्वारा सेतु मध्य में तोड़ दिया गया है।
श्लोक 33 (skanda.6.104.33)
तस्मादत्रैव ते कार्यं सिद्धिं दूत प्रयास्यति । विभीषणकृतं सर्वं दर्शनात्तस्य रक्षसः
tasmādatraiva te kāryaṁ siddhiṁ dūta prayāsyati vibhīṣaṇakṛtaṁ sarvaṁ darśanāttasya rakṣasaḥ
अतः हे दूत! तुम्हारा कार्य यहीं सिद्ध होगा — विभीषण द्वारा सब कुछ किया जाता है, इस राक्षस-प्रभु के दर्शन मात्र से।
श्लोक 34 (skanda.6.104.34)
सर्वदा राक्षसेन्द्रोऽसौ शुभं रामेश्वरत्रयम् । त्रिकालं पूजयत्येव नियमं समुपाश्रितः
sarvadā rākṣasendro'sau śubhaṁ rāmeśvaratrayam trikālaṁ pūjayatyeva niyamaṁ samupāśritaḥ
वह राक्षसेन्द्र नियम में स्थित रहकर सदैव शुभ रामेश्वर-त्रय की त्रिकाल पूजा करता है।
श्लोक 35 (skanda.6.104.35)
लंकाद्वारे स्थितो यो वै सेतुखण्डे महेश्वरः । प्रभाते कुरुते तस्य स्वयं पूजां विभीषणः
laṁkādvāre sthito yo vai setukhaṇḍe maheśvaraḥ prabhāte kurute tasya svayaṁ pūjāṁ vibhīṣaṇaḥ
लंका के द्वार पर, सेतु के खण्ड में स्थित जो महेश्वर हैं — उनकी पूजा प्रातःकाल स्वयं विभीषण करता है।
श्लोक 36 (skanda.6.104.36)
जलमध्यगतं यच्च सेतुखंडं द्वितीयकम् । तत्र रामेश्वरो यश्च मध्याह्ने तं प्रपूजयेत्
jalamadhyagataṁ yacca setukhaṁḍaṁ dvitīyakam tatra rāmeśvaro yaśca madhyāhne taṁ prapūjayet
तथा सेतु का दूसरा खण्ड, जो जल के मध्य में स्थित है, जहाँ रामेश्वर हैं — उसकी पूजा वह मध्याह्न में करता है।
श्लोक 37 (skanda.6.104.37)
एनं देव निशीथे च सर्वदागत्य भक्तितः । संपूजयेन्न सन्देहः सत्यमेतत्प्रकीर्तितम्
enaṁ deva niśīthe ca sarvadāgatya bhaktitaḥ saṁpūjayenna sandehaḥ satyametatprakīrtitam
तथा इस देव की, सदा, मध्यरात्रि में, भक्तिपूर्वक आकर पूजा करता है — इसमें कोई संदेह नहीं है; यह सत्य ही कहा गया है।
श्लोक 38 (skanda.6.104.38)
तस्मात्तिष्ठ त्वमव्यग्रः स्थानेऽत्रैव समाहितः । यावदागमनं तस्य राक्षसस्य महात्मनः
tasmāttiṣṭha tvamavyagraḥ sthāne'traiva samāhitaḥ yāvadāgamanaṁ tasya rākṣasasya mahātmanaḥ
अतः तुम यहीं इस स्थान पर अव्यग्र और एकाग्रचित्त होकर उस महात्मा राक्षस के आगमन तक ठहरो।
श्लोक 39 (skanda.6.104.39)
तेनैव सहितः पश्चात्स्वेच्छया तस्य मन्दिरम् । प्रयास्यसि गृहं वापि स्वकीयं तद्विसर्जितः
tenaiva sahitaḥ paścātsvecchayā tasya mandiram prayāsyasi gṛhaṁ vāpi svakīyaṁ tadvisarjitaḥ
तत्पश्चात् उन्हीं के साथ तुम अपनी इच्छा से उनके मंदिर को जा सकोगे — अथवा उनसे विदा लेकर अपने घर को भी जा सकोगे।
श्लोक 40 (skanda.6.104.40)
अथ तेषां तदाकर्ण्य स दूतो हर्षसंयुतः । बाढमित्येव चोक्त्वाथ तत्र चैव व्यवस्थितः
atha teṣāṁ tadākarṇya sa dūto harṣasaṁyutaḥ bāḍhamityeva coktvātha tatra caiva vyavasthitaḥ
उनकी यह बात सुनकर, हर्षित हुआ वह दूत "अच्छा" ऐसा कहकर वहीं ठहर गया।
श्लोक 41 (skanda.6.104.41)
अथ प्राप्ते निशार्धे स राक्षसैः परिवारितः । विभीषणः समायातस्तस्मिन्नायतने शुभे
atha prāpte niśārdhe sa rākṣasaiḥ parivāritaḥ vibhīṣaṇaḥ samāyātastasminnāyatane śubhe
तत्पश्चात् मध्यरात्रि में राक्षसों से घिरे हुए विभीषण उस शुभ मंदिर में पहुँचे।
श्लोक 42 (skanda.6.104.42)
विमानवरमारूढः स्तूयमानः समन्ततः । राक्षसैर्बंदिरूपैस्तैर्गीयमानस्तथा परैः
vimānavaramārūḍhaḥ stūyamānaḥ samantataḥ rākṣasairbaṁdirūpaistairgīyamānastathā paraiḥ
उत्तम विमान पर आरूढ़, चारों ओर से स्तुति किए जाते हुए, उन बंदीरूप राक्षसों तथा अन्य लोगों द्वारा गाए जाते हुए —
श्लोक 43 (skanda.6.104.43)
उत्तीर्य च विमानाग्र्यात्कृत्वाऽथ त्रिः प्रदक्षिणाम् । रामेश्वरं प्रणम्योच्चैः स्तोत्रमेतच्चकार सः
uttīrya ca vimānāgryātkṛtvā'tha triḥ pradakṣiṇām rāmeśvaraṁ praṇamyoccaiḥ stotrametaccakāra saḥ
विमान के अग्रभाग से उतरकर, तीन बार प्रदक्षिणा करके, उसने उच्च स्वर से रामेश्वर को प्रणाम किया और यह स्तोत्र किया —
श्लोक 44 (skanda.6.104.44)
नमस्ते देवदेवेश भक्तानामभयप्रद । सर्वतः पाणिपादं ते सर्वतोक्षिशिरोमुखम्
namaste devadeveśa bhaktānāmabhayaprada sarvataḥ pāṇipādaṁ te sarvatokṣiśiromukham
"हे देवदेवेश! भक्तों को अभय देने वाले, आपको नमस्कार। आपके हाथ-पैर सर्वत्र हैं, आपके नेत्र, सिर और मुख सर्वत्र हैं।
श्लोक 45 (skanda.6.104.45)
त्वं यज्ञस्त्वं वषट्कारस्त्वं चंद्रस्त्वं प्रभाकरः । त्वं विष्णुस्त्वं चतुर्वक्त्रः शक्रस्त्वं परमेश्वरः
tvaṁ yajñastvaṁ vaṣaṭkārastvaṁ caṁdrastvaṁ prabhākaraḥ tvaṁ viṣṇustvaṁ caturvaktraḥ śakrastvaṁ parameśvaraḥ
आप ही यज्ञ हैं, आप ही वषट्कार हैं, आप ही चंद्रमा हैं, आप ही सूर्य हैं; आप ही विष्णु हैं, आप ही चतुर्मुख हैं, आप ही इंद्र हैं, आप ही परमेश्वर हैं।
श्लोक 46 (skanda.6.104.46)
यथा तिलगतं तैलं गूढं तिष्ठति सर्वदा । तथा त्वं सर्वलोकेषु गूढस्तिष्ठसि शंकर
yathā tilagataṁ tailaṁ gūḍhaṁ tiṣṭhati sarvadā tathā tvaṁ sarvalokeṣu gūḍhastiṣṭhasi śaṁkara
जैसे तिल में स्थित तेल सदा गुप्त रहता है, वैसे ही हे शंकर! आप समस्त लोकों में गुप्त रहते हैं।
श्लोक 47 (skanda.6.104.47)
यथा काष्ठगतो वह्निः संस्थितोऽपि न लक्ष्यते । मूढैः सर्वत्रसंस्थोऽपि तथा त्वं नैव लक्ष्यसे
yathā kāṣṭhagato vahniḥ saṁsthito'pi na lakṣyate mūḍhaiḥ sarvatrasaṁstho'pi tathā tvaṁ naiva lakṣyase
जैसे काष्ठ में स्थित अग्नि, विद्यमान होते हुए भी दिखाई नहीं देती, वैसे ही सर्वत्र स्थित होते हुए भी आप मूढ़ों को दिखाई नहीं देते।
श्लोक 48 (skanda.6.104.48)
यथा दधिगतं सर्पिर्निगूढत्वेन संस्थितम् । चराचरेषु भूतेषु तथा त्वं देव संस्थितः
yathā dadhigataṁ sarpirnigūḍhatvena saṁsthitam carācareṣu bhūteṣu tathā tvaṁ deva saṁsthitaḥ
जैसे दही में स्थित घृत गुप्त रूप से रहता है, वैसे ही हे देव! आप चराचर प्राणियों में गुप्त रूप से स्थित रहते हैं।
श्लोक 49 (skanda.6.104.49)
यथा जलं धरापृष्ठात्खनन्नाप्नोति मानवः । तथा त्वां पूजयन्नित्यं मोक्षमाप्नोत्यसंशयम्
yathā jalaṁ dharāpṛṣṭhātkhanannāpnoti mānavaḥ tathā tvāṁ pūjayannityaṁ mokṣamāpnotyasaṁśayam
जैसे पृथ्वीतल को खोदता हुआ मनुष्य जल प्राप्त करता है, वैसे ही आपकी सदा पूजा करने से मोक्ष निःसंदेह प्राप्त होता है।
श्लोक 50 (skanda.6.104.50)
तावच्च दुर्लभः स्वर्गस्तावच्छूराश्च शत्रवः । यावदेव न सन्तोषं त्वं करोषि शरीरिणाम्
tāvacca durlabhaḥ svargastāvacchūrāśca śatravaḥ yāvadeva na santoṣaṁ tvaṁ karoṣi śarīriṇām
जब तक आप देहधारियों को संतोष प्रदान नहीं करते, तब तक स्वर्ग दुर्लभ रहता है, और शत्रु भी शूरवीर बने रहते हैं।
श्लोक 51 (skanda.6.104.51)
तावल्लक्ष्मीश्चला नॄणां तावद्रोगाः पृथग्विधाः । न यावद्देवदेव त्वं सन्तोषं संप्रयास्यसि
tāvallakṣmīścalā nṝṇāṁ tāvadrogāḥ pṛthagvidhāḥ na yāvaddevadeva tvaṁ santoṣaṁ saṁprayāsyasi
हे देवदेव! जब तक आप संतुष्ट नहीं होते, तब तक मनुष्यों की लक्ष्मी चंचल रहती है, और नाना प्रकार के रोग बने रहते हैं।
श्लोक 52 (skanda.6.104.52)
तावत्पुत्रोद्भवं दुःखं तथा प्रियसमुद्भवम् । यावत्त्वं देव नायासि सन्तोषं देहिनामिह
tāvatputrodbhavaṁ duḥkhaṁ tathā priyasamudbhavam yāvattvaṁ deva nāyāsi santoṣaṁ dehināmiha
हे देव! जब तक आप यहाँ देहधारियों को संतोष नहीं देते, तब तक संतानोत्पत्ति का दुःख तथा प्रियजनों से उत्पन्न दुःख बना रहता है।
श्लोक 53 (skanda.6.104.53)
एवं स्तुत्वा ततो लिंगं स्नापयित्वा यथाविधि । गन्धानुलेपनैर्दिव्यैर्मर्दयामास वै ततः
evaṁ stutvā tato liṁgaṁ snāpayitvā yathāvidhi gandhānulepanairdivyairmardayāmāsa vai tataḥ
इस प्रकार स्तुति करके, तत्पश्चात् उसने विधिपूर्वक लिंग को स्नान कराया, और दिव्य सुगंधित अनुलेपनों से उसका मर्दन किया।
श्लोक 54 (skanda.6.104.54)
पारिजातकपुष्पैश्च तथा सन्तानसम्भवैः । कल्पपादपसंभूतैस्तथा मन्दारजैरपि
pārijātakapuṣpaiśca tathā santānasambhavaiḥ kalpapādapasaṁbhūtaistathā mandārajairapi
पारिजात के पुष्पों से, तथा संतान वृक्ष से उत्पन्न, कल्पवृक्ष से उत्पन्न पुष्पों से, तथा मन्दार पुष्पों से भी,
श्लोक 55 (skanda.6.104.55)
पूजां चक्रे सुविस्तीर्णां श्रद्धया परया युतः । दिव्यैराभरणैर्भूष्य दिव्यवस्त्रैस्ततः परम्
pūjāṁ cakre suvistīrṇāṁ śraddhayā parayā yutaḥ divyairābharaṇairbhūṣya divyavastraistataḥ param
उसने अत्यंत श्रद्धा से युक्त होकर विस्तृत पूजा की, तथा दिव्य आभूषणों और दिव्य वस्त्रों से उसे सुसज्जित किया।
श्लोक 56 (skanda.6.104.56)
स च गीतं स्वयं चक्रे तालमादाय पाणिना । मूर्छातालकृतं रम्यं सप्तस्वरविराजितम्
sa ca gītaṁ svayaṁ cakre tālamādāya pāṇinā mūrchātālakṛtaṁ ramyaṁ saptasvaravirājitam
तथा उसने स्वयं अपने हाथ से ताल देते हुए गीत गाया, जो मूर्च्छना-ताल से युक्त, सप्त स्वरों से सुशोभित, अत्यंत मनोहर था,
श्लोक 57 (skanda.6.104.57)
तानयुक्त्या समोपेतं ग्रामै रागैः स्वलंकृतम् । एवं कृत्वा स शुश्रूषां तस्य देवस्य भक्तितः
tānayuktyā samopetaṁ grāmai rāgaiḥ svalaṁkṛtam evaṁ kṛtvā sa śuśrūṣāṁ tasya devasya bhaktitaḥ
स्वरों के उचित संयोजन से युक्त, नाना रागों से अलंकृत। इस प्रकार उस देव की भक्तिपूर्वक सेवा करके —
श्लोक 58 (skanda.6.104.58)
यावत्संप्रस्थितो भूयो लंकां प्रति विभीषणः । तावद्दूतोऽग्रतः स्थित्वा कुशवाक्यमुवाच ह
yāvatsaṁprasthito bhūyo laṁkāṁ prati vibhīṣaṇaḥ tāvaddūto'grataḥ sthitvā kuśavākyamuvāca ha
जैसे ही विभीषण पुनः लंका की ओर प्रस्थान करने लगे, वैसे ही दूत उनके सम्मुख खड़ा होकर कुश का वचन कहने लगा।
श्लोक 59 (skanda.6.104.59)
विशेषतस्तु तेनोक्तं यत्तस्य पुरतः पुरा । अतिकोपाभिभूतेन प्ररक्तनयनेन च
viśeṣatastu tenoktaṁ yattasya purataḥ purā atikopābhibhūtena praraktanayanena ca
विशेष रूप से उसने वह बताया जो उससे पहले, अत्यंत क्रोध से अभिभूत होकर, लाल नेत्रों सहित कहा गया था।
श्लोक 60 (skanda.6.104.60)
तच्छ्रुत्वाथ प्रणम्योच्चैर्दूतं प्राह विभीषणः । कृतांजलिपुटो भूत्वा विनयावनतः स्थितः
tacchrutvātha praṇamyoccairdūtaṁ prāha vibhīṣaṇaḥ kṛtāṁjalipuṭo bhūtvā vinayāvanataḥ sthitaḥ
यह सुनकर, उच्च स्वर से प्रणाम करके, विभीषण ने हाथ जोड़कर विनयपूर्वक झुके हुए, दूत से कहा —
श्लोक 61 (skanda.6.104.61)
यद्येवं विहितं राज्ये रामपुत्रस्य राक्षसैः । तन्नूनं तन्मया सर्वं विहितं दूतसत्तम
yadyevaṁ vihitaṁ rājye rāmaputrasya rākṣasaiḥ tannūnaṁ tanmayā sarvaṁ vihitaṁ dūtasattama
"यदि रामपुत्र के राज्य में राक्षसों द्वारा ऐसा किया गया है, तो निश्चय ही वह सब मेरे द्वारा ही किया गया है, हे दूतसत्तम।
श्लोक 62 (skanda.6.104.62)
तस्मान्महाप्रसादो मे कृतस्तेन महात्मना । कुशेन प्रेषितो यस्त्वं मम मूर्खस्य संनिधौ
tasmānmahāprasādo me kṛtastena mahātmanā kuśena preṣito yastvaṁ mama mūrkhasya saṁnidhau
अतः उस महात्मा द्वारा मुझ पर महान अनुग्रह किया गया है, कि तुम कुश द्वारा मुझ मूर्ख के समीप भेजे गए हो।
श्लोक 63 (skanda.6.104.63)
एवमुक्त्वा स तान्सर्वाञ्छोधयामास राक्षसान् । ये गत्वा भूतले मर्त्यान्ध्वंसयंति सदैव हि
evamuktvā sa tānsarvāñchodhayāmāsa rākṣasān ye gatvā bhūtale martyāndhvaṁsayaṁti sadaiva hi
यह कहकर उसने उन समस्त राक्षसों की जाँच की जो पृथ्वी पर जाकर सदैव मनुष्यों का विनाश करते हैं।
श्लोक 64 (skanda.6.104.64)
ततस्तत्रैव चानीय तस्य दूतस्य संनिधौ । प्रत्येकं तानुवाचेदं कोपादश्रूणि चोत्सृजन्
tatastatraiva cānīya tasya dūtasya saṁnidhau pratyekaṁ tānuvācedaṁ kopādaśrūṇi cotsṛjan
तत्पश्चात् उन्हें वहीं दूत के समक्ष लाकर, क्रोध से आँसू बहाते हुए उसने उनमें से प्रत्येक से यह कहा —
श्लोक 65 (skanda.6.104.65)
यैः कृतो जनविध्वंसो राक्षसैः सुदुरात्मभिः । राज्ये कुशस्य संप्राप्तैः प्रभोर्मम महात्मनः
yaiḥ kṛto janavidhvaṁso rākṣasaiḥ sudurātmabhiḥ rājye kuśasya saṁprāptaiḥ prabhormama mahātmanaḥ
"जिन दुरात्मा राक्षसों द्वारा यह लोगों का विनाश किया गया, मेरे प्रभु उस महात्मा कुश के राज्य में —
श्लोक 66 (skanda.6.104.66)
ते सर्वे व्यंतरा रौद्राः प्रभवंतु सुदुःखिताः । लंकाद्वारगता नित्यं क्षुत्पिपासानिपीडिताः
te sarve vyaṁtarā raudrāḥ prabhavaṁtu suduḥkhitāḥ laṁkādvāragatā nityaṁ kṣutpipāsānipīḍitāḥ
वे सभी अत्यंत दुःखी, भयंकर व्यंतर बन जाएँ, जो सदा लंका के द्वार पर रहते हुए क्षुधा-पिपासा से पीड़ित हों,
श्लोक 67 (skanda.6.104.67)
सर्वभोगपरित्यक्ताः शीतातपसहिष्णवः । श्लेष्ममूत्रकृताहारा निन्द्याः सर्वजनस्य च
sarvabhogaparityaktāḥ śītātapasahiṣṇavaḥ śleṣmamūtrakṛtāhārā nindyāḥ sarvajanasya ca
समस्त भोगों से रहित, शीत-आतप को सहते हुए, कफ और मूत्र का आहार करते हुए, समस्त जनों द्वारा निंदित हों।
श्लोक 68 (skanda.6.104.68)
एवं दत्त्वाथ तेषां स शापं राक्षससत्तमः । ततः प्राह च तं दूतं पुनरेव कृतांजलिः
evaṁ dattvātha teṣāṁ sa śāpaṁ rākṣasasattamaḥ tataḥ prāha ca taṁ dūtaṁ punareva kṛtāṁjaliḥ
इस प्रकार उन्हें शाप देकर, उस राक्षससत्तम ने पुनः हाथ जोड़कर दूत से कहा —
श्लोक 69 (skanda.6.104.69)
अद्यप्रभृति नो कश्चिद्राक्षसः संप्रयास्यति । तस्माद्वाच्यो रघुश्रेष्ठो मद्वाक्यात्स कुशस्त्वया । क्षम्यतामपराधो मे यदज्ञानादयंकृतः
adyaprabhṛti no kaścidrākṣasaḥ saṁprayāsyati tasmādvācyo raghuśreṣṭho madvākyātsa kuśastvayā kṣamyatāmaparādho me yadajñānādayaṁkṛtaḥ
"आज से लेकर, अब कोई भी राक्षस वहाँ नहीं जाएगा; अतः मेरे वचन से रघुश्रेष्ठ कुश से कहो कि मेरा जो अपराध अज्ञानवश हुआ, वह क्षमा किया जाए —
श्लोक 70 (skanda.6.104.70)
राक्षसैर्दुष्टजातीयैर्महामांसस्यलोलुपैः । कृतश्च निग्रहस्तेषां प्रत्यक्षं तव दूत यः
rākṣasairduṣṭajātīyairmahāmāṁsasyalolupaiḥ kṛtaśca nigrahasteṣāṁ pratyakṣaṁ tava dūta yaḥ
दुष्ट जाति के, महामांस के लोलुप उन राक्षसों का, तुम्हारे समक्ष ही, हे दूत, दण्ड दिया गया है।
श्लोक 71 (skanda.6.104.71)
यदन्यदपि कृत्यं स्याद्दैवं वा मानुषं च वा । मम भृत्यस्य तत्सर्वं कथनीयमशंकितम्
yadanyadapi kṛtyaṁ syāddaivaṁ vā mānuṣaṁ ca vā mama bhṛtyasya tatsarvaṁ kathanīyamaśaṁkitam
तथा जो भी अन्य कार्य हो, चाहे वह दैवी हो या मानवी, वह सब निःशंक होकर मुझ भृत्य से कहा जाए।
श्लोक 72 (skanda.6.104.72)
दूत उवाच । यानि तत्र च लिंगानि राक्षसैर्निर्मितानि च । तानि गत्वा स्वयं शीघ्रं त्वमुत्पाटय राक्षस
dūta uvāca yāni tatra ca liṁgāni rākṣasairnirmitāni ca tāni gatvā svayaṁ śīghraṁ tvamutpāṭaya rākṣasa
दूत ने कहा — वहाँ राक्षसों द्वारा जो लिंग स्थापित किए गए हैं — हे राक्षस! तुम स्वयं शीघ्र जाकर उन्हें उखाड़ दो।
श्लोक 73 (skanda.6.104.73)
एतदेव परं कृत्यं सर्वलोकसुखावहम् । स्थापितानि च यान्येव मंत्रै राक्षससंभवैः
etadeva paraṁ kṛtyaṁ sarvalokasukhāvaham sthāpitāni ca yānyeva maṁtrai rākṣasasaṁbhavaiḥ
यही सर्वश्रेष्ठ कार्य है, जो समस्त लोगों को सुख देने वाला है — वे लिंग जो राक्षस-जनित मंत्रों से स्थापित किए गए थे,
श्लोक 74 (skanda.6.104.74)
संपूजितानि रक्षोभिश्चतुर्वक्त्राणि राक्षस । अजानन्मानवः कश्चिद्यदि पूजां समाचरेत्
saṁpūjitāni rakṣobhiścaturvaktrāṇi rākṣasa ajānanmānavaḥ kaścidyadi pūjāṁ samācaret
राक्षसों द्वारा पूजित, चतुर्मुख, हे राक्षस — यदि कोई मनुष्य अनजाने में उनकी पूजा कर बैठे,
श्लोक 75 (skanda.6.104.75)
तत्क्षणान्नाशमायाति एतद्दृष्टं मया स्वयम् । एतस्मात्कारणाद्वच्मि त्वामहं राक्षसाधिप । तैः स्थितैर्भूतले लिंगैः स्थिताः सर्वे निशाचराः
tatkṣaṇānnāśamāyāti etaddṛṣṭaṁ mayā svayam etasmātkāraṇādvacmi tvāmahaṁ rākṣasādhipa taiḥ sthitairbhūtale liṁgaiḥ sthitāḥ sarve niśācarāḥ
वह उसी क्षण विनाश को प्राप्त होता है — यह मैंने स्वयं देखा है। इसी कारण मैं तुमसे कहता हूँ, हे राक्षसाधिप — जब तक वे लिंग पृथ्वी पर स्थित हैं, तब तक समस्त निशाचर भी वहीं स्थित रहते हैं।
श्लोक 76 (skanda.6.104.76)
विभीषण उवाच । मया पूर्वं प्रतिज्ञातं रामस्य पुरतः किल । रामेश्वरमतिक्रम्य न गतव्यं धरातले
vibhīṣaṇa uvāca mayā pūrvaṁ pratijñātaṁ rāmasya purataḥ kila rāmeśvaramatikramya na gatavyaṁ dharātale
विभीषण ने कहा — मैंने पूर्वकाल में राम के समक्ष प्रतिज्ञा की थी कि रामेश्वर को लांघकर मैं पृथ्वीतल पर कभी नहीं जाऊँगा।
श्लोक 77 (skanda.6.104.77)
अन्यच्च कारणं दूत प्रोक्तमत्र मनीषिभिः । दुःस्थितं सुस्थितं वापि शिवलिंगं न चालयेत्
anyacca kāraṇaṁ dūta proktamatra manīṣibhiḥ duḥsthitaṁ susthitaṁ vāpi śivaliṁgaṁ na cālayet
तथा हे दूत! यहाँ बुद्धिमानों द्वारा एक और भी कारण कहा गया है — शिवलिंग को, चाहे वह ठीक स्थान पर हो या न हो, कभी नहीं हिलाना चाहिए।
श्लोक 78 (skanda.6.104.78)
तत्कथं तत्र गत्वाऽथ लिंगभेदं करोम्यहम् । स्वयं माहेश्वरो भूत्वा प्रतिज्ञाय च वै स्वयम्
tatkathaṁ tatra gatvā'tha liṁgabhedaṁ karomyaham svayaṁ māheśvaro bhūtvā pratijñāya ca vai svayam
तो फिर मैं वहाँ जाकर लिंगों को कैसे खण्डित करूँ, जबकि मैं स्वयं माहेश्वर होकर स्वयं ही यह प्रतिज्ञा कर चुका हूँ?
श्लोक 79 (skanda.6.104.79)
तस्मात्प्रसादनीयस्ते मद्वाक्यात्स नराधिपः । यद्युक्तं मया प्रोक्तं तत्त्वं कुरु विनिग्रहम्
tasmātprasādanīyaste madvākyātsa narādhipaḥ yadyuktaṁ mayā proktaṁ tattvaṁ kuru vinigraham
अतः मेरे वचन से उस राजा को प्रसन्न किया जाए; जो मैंने उचित कहा है, उसका निग्रह तुम स्वयं करो।
श्लोक 80 (skanda.6.104.80)
एवमुक्त्वाथ तं दूतं रत्नैः सागरसंभवैः । प्रभूतैर्भूषयित्वाऽथ विससर्ज नृपं प्रति
evamuktvātha taṁ dūtaṁ ratnaiḥ sāgarasaṁbhavaiḥ prabhūtairbhūṣayitvā'tha visasarja nṛpaṁ prati
यह कहकर, उसने तत्पश्चात् समुद्र से उत्पन्न प्रचुर रत्नों से दूत को सम्मानित किया, और उसे राजा के पास वापस भेज दिया।
श्लोक 81 (skanda.6.104.81)
अथ ते राक्षसास्तेन शप्ताः प्रोचुः सुदुःखिताः । कुरु शापस्य मोक्षं नः सर्वेषां राक्षसेश्वर
atha te rākṣasāstena śaptāḥ procuḥ suduḥkhitāḥ kuru śāpasya mokṣaṁ naḥ sarveṣāṁ rākṣaseśvara
तब उन शापित राक्षसों ने अत्यंत दुःखी होकर कहा — हे राक्षसेश्वर! हम सबको इस शाप से मुक्ति दीजिए।
श्लोक 82 (skanda.6.104.82)
विभीषण उवाच । नाहं करोमि भूयोऽपि युष्माकं राक्षसाधमाः । अनुग्रहं प्रशप्तानां वंचकानां विशेषतः
vibhīṣaṇa uvāca nāhaṁ karomi bhūyo'pi yuṣmākaṁ rākṣasādhamāḥ anugrahaṁ praśaptānāṁ vaṁcakānāṁ viśeṣataḥ
विभीषण ने कहा — हे राक्षसाधमो! मैं तुम पर पुनः कभी अनुग्रह नहीं करूँगा — विशेषतः शापित छलियों पर।
श्लोक 83 (skanda.6.104.83)
तस्मात्सोऽपि रघुश्रेष्ठः प्रसादं वः करिष्यति । मम वाक्यादसंदिग्धं कालः कश्चित्प्रतीक्ष्यताम्
tasmātso'pi raghuśreṣṭhaḥ prasādaṁ vaḥ kariṣyati mama vākyādasaṁdigdhaṁ kālaḥ kaścitpratīkṣyatām
अतः वह रघुश्रेष्ठ स्वयं ही तुम पर कृपा करेगा; मेरे वचन से निःसंदेह कुछ समय प्रतीक्षा करो।
श्लोक 84 (skanda.6.104.84)
एवमुक्त्वाऽथ रक्षेन्द्रः प्रेषयामास सत्वरम् । दूतं कुशमहीपस्य मानुषं देवपूजकम्
evamuktvā'tha rakṣendraḥ preṣayāmāsa satvaram dūtaṁ kuśamahīpasya mānuṣaṁ devapūjakam
यह कहकर उस राक्षसेन्द्र ने शीघ्र ही राजा कुश के पास एक देवपूजक मानव दूत भेजा —
श्लोक 85 (skanda.6.104.85)
गत्वा ब्रूहि कुशं भूपं सत्वरं वचनान्मम । एतेषां मत्प्रशप्तानां राक्षसानां दुरात्मनाम् । अनुग्रहं कुरु विभो दीनानां भोजनाय वै
gatvā brūhi kuśaṁ bhūpaṁ satvaraṁ vacanānmama eteṣāṁ matpraśaptānāṁ rākṣasānāṁ durātmanām anugrahaṁ kuru vibho dīnānāṁ bhojanāya vai
"जाकर मेरे वचन से राजा कुश से तुरंत कहो — हे विभो! मेरे द्वारा शापित इन दुरात्मा राक्षसों पर, दीनों के भोजन के लिए, अनुग्रह कीजिए।
श्लोक 86 (skanda.6.104.86)
एवमुक्तस्ततस्तेन इतो दूतेन संयुतः । कुशस्तेन विनिर्यातः सत्वरं द्विजसत्तमाः
evamuktastatastena ito dūtena saṁyutaḥ kuśastena viniryātaḥ satvaraṁ dvijasattamāḥ
इस प्रकार आदेश पाकर, उस दूत के साथ हे द्विजसत्तमो! कुश शीघ्र ही वहाँ से चल पड़े।
श्लोक 87 (skanda.6.104.87)
ततो गत्वा द्रुतं दूतः कुशं प्रोवाच सादरम् । प्रणिपत्य यथान्यायं विनयावनतः स्थितः
tato gatvā drutaṁ dūtaḥ kuśaṁ provāca sādaram praṇipatya yathānyāyaṁ vinayāvanataḥ sthitaḥ
तत्पश्चात् शीघ्र जाकर, दूत ने आदरपूर्वक कुश से कहा, यथोचित प्रणाम करके, विनयपूर्वक झुककर खड़ा हुआ।
श्लोक 88 (skanda.6.104.88)
विभीषणो मया दृष्टो देवे रामेश्वरे विभो । पूजार्थं तत्र चायातो राक्षसैर्बहुभिर्वृतः
vibhīṣaṇo mayā dṛṣṭo deve rāmeśvare vibho pūjārthaṁ tatra cāyāto rākṣasairbahubhirvṛtaḥ
"हे विभो! मैंने विभीषण को देव रामेश्वर के पास देखा, वे वहाँ अनेक राक्षसों से घिरे हुए पूजा के लिए आए थे।
श्लोक 89 (skanda.6.104.89)
प्रोक्तो मया भवद्वाक्यमशेषं रघुनन्दन । श्रुतं तेनापि तत्सर्वं विनयावनतेन च
prokto mayā bhavadvākyamaśeṣaṁ raghunandana śrutaṁ tenāpi tatsarvaṁ vinayāvanatena ca
हे रघुनंदन! मैंने उनसे आपका सम्पूर्ण वचन कहा, और उन्होंने भी विनयपूर्वक झुककर वह सब सुना।
श्लोक 90 (skanda.6.104.90)
अजानतः प्रभो तस्य राक्षसैः सुदुरात्मभिः । प्रजैवं पीडिता भूमौ महामांसस्य लोलुपैः
ajānataḥ prabho tasya rākṣasaiḥ sudurātmabhiḥ prajaivaṁ pīḍitā bhūmau mahāmāṁsasya lolupaiḥ
'हे प्रभो! मुझे ज्ञात हुए बिना ही, महामांस के लोलुप दुरात्मा राक्षसों द्वारा भूतल पर प्रजा इस प्रकार पीड़ित की गई —
श्लोक 91 (skanda.6.104.91)
तच्छ्रुत्वा मन्मुखात्तेन सर्वेषां निग्रहः कृतः । यैः कृतं कदनं भूमौ तव पार्थिवसत्तम । कृतास्ते व्यन्तराः सर्वे पापाहारविहारिणः
tacchrutvā manmukhāttena sarveṣāṁ nigrahaḥ kṛtaḥ yaiḥ kṛtaṁ kadanaṁ bhūmau tava pārthivasattama kṛtāste vyantarāḥ sarve pāpāhāravihāriṇaḥ
यह सुनकर मैंने अपने ही मुख से उन सबका निग्रह किया — हे राजसत्तम! जिन्होंने आपकी भूमि पर यह उत्पात मचाया था — मैंने उन सबको पापाहारी व्यंतर बना दिया।
श्लोक 92 (skanda.6.104.92)
भविष्यथ तथा यूयं क्षुत्पिपासानिपीडिताः । तैः सर्वैः प्रार्थितः सोऽपि भूयोभूयः प्रणम्य तम्
bhaviṣyatha tathā yūyaṁ kṣutpipāsānipīḍitāḥ taiḥ sarvaiḥ prārthitaḥ so'pi bhūyobhūyaḥ praṇamya tam
'तुम सब क्षुधा-पिपासा से पीड़ित हो जाओगे' — ऐसा कहकर, तथा उन सभी ने उनसे प्रार्थना करते हुए बार-बार प्रणाम किया —
श्लोक 93 (skanda.6.104.93)
शप्ताः सर्वे वयं तावत्प्रसादं कुरु तद्विभो । ते तेनाथ ततः प्रोक्ता नाहं वो राक्षसाधमाः
śaptāḥ sarve vayaṁ tāvatprasādaṁ kuru tadvibho te tenātha tataḥ proktā nāhaṁ vo rākṣasādhamāḥ
'हम सब शापित हो गए हैं — अब हे विभो! हम पर अनुग्रह कीजिए।' तत्पश्चात् उसने उनसे कहा — 'मैं तुम पर, हे राक्षसाधमो, अनुग्रह नहीं करूँगा।
श्लोक 94 (skanda.6.104.94)
अनुग्रहं करिष्यामि न दास्यामि च भोजनम् । कुशादेशान्मया सर्वे यूयं पापसमन्विताः
anugrahaṁ kariṣyāmi na dāsyāmi ca bhojanam kuśādeśānmayā sarve yūyaṁ pāpasamanvitāḥ
मैं अनुग्रह नहीं करूँगा, और न ही तुम्हें भोजन दूँगा; कुश की आज्ञा से तुम सब, पापयुक्त होकर,
श्लोक 95 (skanda.6.104.95)
निगृहीताः स युष्माकं प्रसादं प्रकरिष्यति । तदर्थं प्रेषितो दूतस्त्वत्सकाशं महीपते
nigṛhītāḥ sa yuṣmākaṁ prasādaṁ prakariṣyati tadarthaṁ preṣito dūtastvatsakāśaṁ mahīpate
निगृहीत किए गए हो; वही तुम्हें अनुग्रह प्रदान करेगा। उसी हेतु, हे महीपते, तुम्हारे पास एक दूत भेजा गया है।
श्लोक 96 (skanda.6.104.96)
रक्षसा तेन यद्युक्तमखिलं तत्त्वमाचर । किं वा ते बहुनोक्तेन नास्ति भक्तस्तथाविधः । भक्तिशक्तिसमोपेतो यथा ते स विभीषणः
rakṣasā tena yadyuktamakhilaṁ tattvamācara kiṁ vā te bahunoktena nāsti bhaktastathāvidhaḥ bhaktiśaktisamopeto yathā te sa vibhīṣaṇaḥ
'इस राक्षस ने जो भी उचित निवेदन किया है, वह सब करो; अधिक कहने से क्या लाभ? भक्ति-शक्ति से युक्त उस विभीषण जैसा भक्त कोई और नहीं है।'
श्लोक 97 (skanda.6.104.97)
अद्यप्रभृति नो भूमौ विचरिष्यंति राक्षसाः । तस्य वाक्यादसंदेहं त्वं राजन्सुखभाग्भव
adyaprabhṛti no bhūmau vicariṣyaṁti rākṣasāḥ tasya vākyādasaṁdehaṁ tvaṁ rājansukhabhāgbhava
आज से लेकर राक्षस पृथ्वी पर विचरण नहीं करेंगे; उनके वचन से निःसंदेह, हे राजन्! आप सुखी रहें।
श्लोक 98 (skanda.6.104.98)
लिंगानां च कृते राजन्विज्ञप्तं तेन रक्षसा । न मया चात्र राजेंद्र आगन्तव्यं कथंचन । रामदेवस्य वाक्येन जंबुद्वीपे न मे गतिः
liṁgānāṁ ca kṛte rājanvijñaptaṁ tena rakṣasā na mayā cātra rājeṁdra āgantavyaṁ kathaṁcana rāmadevasya vākyena jaṁbudvīpe na me gatiḥ
तथा हे राजन्! लिंगों के विषय में इस राक्षस ने यह निवेदन किया — 'हे राजेन्द्र! मैं स्वयं वहाँ कभी नहीं आऊँगा; रामदेव के वचन से जम्बूद्वीप में मेरी गति नहीं है।
श्लोक 99 (skanda.6.104.99)
अत्र स्थितस्य यत्कृत्यं दैवं वा मानुषं च वा । तवादेशं करिष्यामि यद्यपि स्यात्सुदुष्करम्
atra sthitasya yatkṛtyaṁ daivaṁ vā mānuṣaṁ ca vā tavādeśaṁ kariṣyāmi yadyapi syātsuduṣkaram
फिर भी यहाँ जो कुछ भी करना हो, चाहे दैवी हो या मानवी, मैं तुम्हारे आदेश का पालन करूँगा, चाहे वह कितना ही कठिन क्यों न हो।
श्लोक 100 (skanda.6.104.100)
तस्मात्तेन महाराज रामेश्वरप्रपूजकः । मनुष्यः प्रेषितो दूतो यस्तं पश्य महीपते
tasmāttena mahārāja rāmeśvaraprapūjakaḥ manuṣyaḥ preṣito dūto yastaṁ paśya mahīpate
अतः हे महाराज! उसी ने रामेश्वर के इस पूजक मानव दूत को भेजा है — हे महीपते! उसे देखिए।
श्लोक 101 (skanda.6.104.101)
अथ तस्य समादेशाड्ढौकनीयैः पृथग्विधैः । सहितः स समायातो दूतो रक्षेंद्रनोदितः
atha tasya samādeśāḍḍhaukanīyaiḥ pṛthagvidhaiḥ sahitaḥ sa samāyāto dūto rakṣeṁdranoditaḥ
तत्पश्चात् उनकी आज्ञा से, राक्षसेन्द्र द्वारा भेजा गया वह दूत, विविध भेंटों सहित वहाँ पहुँचा।
श्लोक 102 (skanda.6.104.102)
धात्रीफलप्रमाणानां तेन प्रस्थास्त्रयोदश । मौक्तिकानां समानीताः कृते तस्य महीपतेः
dhātrīphalapramāṇānāṁ tena prasthāstrayodaśa mauktikānāṁ samānītāḥ kṛte tasya mahīpateḥ
आँवले के फल के बराबर आकार के मोतियों के तेरह प्रस्थ उसके द्वारा उस भूपति के लिए लाए गए।
श्लोक 103 (skanda.6.104.103)
वैडूर्याणां मरकतानां मणीनां च द्विजोत्तमाः । जात्यानां षोडश द्रोणाः समानीताः सुनिर्मलाः
vaiḍūryāṇāṁ marakatānāṁ maṇīnāṁ ca dvijottamāḥ jātyānāṁ ṣoḍaśa droṇāḥ samānītāḥ sunirmalāḥ
हे द्विजोत्तमो! वैडूर्य, मरकत तथा मणियों के, उत्तम जाति के सोलह द्रोण, अत्यंत निर्मल, लाए गए।
श्लोक 104 (skanda.6.104.104)
अग्निशौचानि वस्त्राणि तथा देवमयानि च । असंख्यातानि वै हेम जात्यं संख्याविवर्जितम्
agniśaucāni vastrāṇi tathā devamayāni ca asaṁkhyātāni vai hema jātyaṁ saṁkhyāvivarjitam
अग्निशुद्ध वस्त्र, तथा दिव्य पदार्थों से बने वस्त्र भी, तथा असंख्य उत्तम स्वर्ण, जिसकी गणना नहीं हो सकती —
श्लोक 105 (skanda.6.104.105)
तत्सर्वं दर्शयित्वाथ कुशाय सुमहात्मने । कृत्वा प्रदक्षिणं पश्चात्प्रणाममकरोद्द्विजाः
tatsarvaṁ darśayitvātha kuśāya sumahātmane kṛtvā pradakṣiṇaṁ paścātpraṇāmamakaroddvijāḥ
वह सब कुछ उस महात्मा कुश को दिखाकर, तत्पश्चात् उसने उनकी प्रदक्षिणा करके, हे द्विजो! प्रणाम किया।
श्लोक 106 (skanda.6.104.106)
एष पार्थिवशार्दूल राक्षसेन्द्रो विभीषणः । प्रणामं कुरुते भक्त्या मन्मुखेनेदमब्रवीत्
eṣa pārthivaśārdūla rākṣasendro vibhīṣaṇaḥ praṇāmaṁ kurute bhaktyā manmukhenedamabravīt
"हे पार्थिवशार्दूल! यह राक्षसेन्द्र विभीषण भक्तिपूर्वक प्रणाम अर्पित करते हैं, तथा मेरे मुख से यह कहा —
श्लोक 107 (skanda.6.104.107)
प्रसादात्ते पितुः क्षेमं मम राज्ये महीपते । एष तिष्ठाम्यहं नित्यं पूजयंस्ते पितुर्हरम्
prasādātte pituḥ kṣemaṁ mama rājye mahīpate eṣa tiṣṭhāmyahaṁ nityaṁ pūjayaṁste piturharam
'हे महीपते! आपके पिता की कृपा से मेरे राज्य में सब कुशल है; मैं यहाँ सदा आपके पिता के हर की पूजा करते हुए स्थित रहता हूँ।
श्लोक 108 (skanda.6.104.108)
मम राजन्नविज्ञातैर्यदि तैः सुदुरात्मभिः । महीतले कृतं किंचिद्विरुद्धं क्षम्यतां मम
mama rājannavijñātairyadi taiḥ sudurātmabhiḥ mahītale kṛtaṁ kiṁcidviruddhaṁ kṣamyatāṁ mama
हे राजन्! यदि मेरी अनजान में उन दुरात्माओं द्वारा भूतल पर कुछ विपरीत किया गया हो, तो वह मुझसे क्षमा कर दिया जाए।
श्लोक 109 (skanda.6.104.109)
एते ये राक्षसाः शप्तास्तवार्थाय मया प्रभो । एतेषां प्रेतरूपाणां त्वमाहारं प्रकीर्तय
ete ye rākṣasāḥ śaptāstavārthāya mayā prabho eteṣāṁ pretarūpāṇāṁ tvamāhāraṁ prakīrtaya
हे प्रभो! ये जो राक्षस मेरे द्वारा आपके ही हेतु शापित किए गए, इन प्रेतरूपी राक्षसों का आहार क्या हो, वह आप बताइए।
श्लोक 110 (skanda.6.104.110)
कुश उवाच । ममादेशात्समागत्य तेऽत्र लिंगानि कृत्स्नशः । पूरयंतु प्रयत्नेन पांसुभिः सर्वतोदिशम्
kuśa uvāca mamādeśātsamāgatya te'tra liṁgāni kṛtsnaśaḥ pūrayaṁtu prayatnena pāṁsubhiḥ sarvatodiśam
कुश ने कहा — मेरी आज्ञा से वे यहाँ आकर, यत्नपूर्वक इन लिंगों को चारों ओर से धूल से भर दें।
श्लोक 111 (skanda.6.104.111)
ततस्तु भोजनं तेषां यद्भविष्यति भूतले । तद्वक्ष्यामि स्थिरो भूत्वा शृणु देवप्रपूजक
tatastu bhojanaṁ teṣāṁ yadbhaviṣyati bhūtale tadvakṣyāmi sthiro bhūtvā śṛṇu devaprapūjaka
तत्पश्चात् पृथ्वी पर उनका भोजन क्या होगा, वह मैं बताता हूँ — हे देवपूजक! स्थिर होकर सुनो।
श्लोक 112 (skanda.6.104.112)
तुलागते सदादित्ये तैरागत्य धरातले । विहर्तव्यं प्रयत्नेन यावद्वृश्चिकदर्शनम्
tulāgate sadāditye tairāgatya dharātale vihartavyaṁ prayatnena yāvadvṛścikadarśanam
जब सूर्य तुला राशि में हो, तब वे यत्नपूर्वक पृथ्वी पर आकर विचरण करें, यावत् वृश्चिक राशि का दर्शन न हो।
श्लोक 113 (skanda.6.104.113)
तत्र यैर्न कृतं श्राद्धं प्रेतपक्षे नराधमैः । कन्यास्थे वा रवौ यावन्न तुलांतगतिर्भवेत्
tatra yairna kṛtaṁ śrāddhaṁ pretapakṣe narādhamaiḥ kanyāsthe vā ravau yāvanna tulāṁtagatirbhavet
वहाँ जिन नराधमों ने पितृपक्ष में, अथवा कन्या राशि के सूर्य के समय, तुला की अंतिम स्थिति तक श्राद्ध नहीं किया,
श्लोक 114 (skanda.6.104.114)
ज्वररूपैस्तदंगस्थैर्भक्ष्यमन्नं पृथग्विधम् । ममादेशादसंदिग्धं मासमेकं निशाचरैः
jvararūpaistadaṁgasthairbhakṣyamannaṁ pṛthagvidham mamādeśādasaṁdigdhaṁ māsamekaṁ niśācaraiḥ
उनका वह अन्न, नाना रूपों में, ज्वररूप से उनके शरीर में स्थित होकर, मेरी आज्ञा से एक मास तक निशाचरों द्वारा निःसंदेह भक्षण किया जाए।
श्लोक 115 (skanda.6.104.115)
विधिहीनं च यैर्दत्तं भुक्तं च विधिवर्जितम् । श्राद्धं वा मानुषैः सेव्या ज्वररूपैश्च ते सदा
vidhihīnaṁ ca yairdattaṁ bhuktaṁ ca vidhivarjitam śrāddhaṁ vā mānuṣaiḥ sevyā jvararūpaiśca te sadā
तथा जो विधिरहित दिया गया, और जो विधिवर्जित भोगा गया — ऐसे मनुष्यों का श्राद्ध सदा ज्वररूप में उनके द्वारा भोगा जाए।
श्लोक 116 (skanda.6.104.116)
एवं वाच्यास्त्वया सर्वे प्रेतास्ते मद्वचोऽखिलम् । तस्मादागत्य कुर्वंतु कार्तिके मासि मद्वचः
evaṁ vācyāstvayā sarve pretāste madvaco'khilam tasmādāgatya kurvaṁtu kārtike māsi madvacaḥ
इस प्रकार तुम इन सभी प्रेतों को मेरा यह सम्पूर्ण वचन कहो; अतः वे यहाँ आकर कार्तिक मास में मेरे वचन का पालन करें।
श्लोक 117 (skanda.6.104.117)
तथा दूत त्वया वाच्यो मम वाक्याद्विभीषणः । प्रमादाद्यन्मया प्रोक्तं परुषं वचनं तव
tathā dūta tvayā vācyo mama vākyādvibhīṣaṇaḥ pramādādyanmayā proktaṁ paruṣaṁ vacanaṁ tava
तथा हे दूत! मेरे वचन से विभीषण को यह भी कहो कि जो कठोर वचन मैंने प्रमादवश तुम्हारे विषय में कहे,
श्लोक 118 (skanda.6.104.118)
जानाम्यहं महाभाग न तेऽस्ति विकृतिः क्वचित् । परिक्लिष्टं जनं दृष्ट्वा मयैतद्व्याहृतं वचः
jānāmyahaṁ mahābhāga na te'sti vikṛtiḥ kvacit parikliṣṭaṁ janaṁ dṛṣṭvā mayaitadvyāhṛtaṁ vacaḥ
हे महाभाग! मुझे ज्ञात है कि तुझमें कोई विकृति नहीं है; अपनी पीड़ित प्रजा को देखकर ही मैंने यह वचन कहा था।
श्लोक 119 (skanda.6.104.119)
राक्षसेन्द्रे स्थिते भूमौ त्वयि जानाम्यहं सदा । तिष्ठते जनको मह्यं रामः शस्त्रभृतां वरः
rākṣasendre sthite bhūmau tvayi jānāmyahaṁ sadā tiṣṭhate janako mahyaṁ rāmaḥ śastrabhṛtāṁ varaḥ
राक्षसेन्द्र! तुम्हारे भूतल पर स्थित रहते हुए, मैं सदा जानता हूँ कि मेरे पिता, शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ राम, स्वयं ही उपस्थित हैं।
श्लोक 120 (skanda.6.104.120)
एवमुक्त्वा ततो दूतं पूजयामास राघवः । वस्त्रैर्बहुविधै रत्नैर्नद्युत्थैश्च पृथग्विधैः
evamuktvā tato dūtaṁ pūjayāmāsa rāghavaḥ vastrairbahuvidhai ratnairnadyutthaiśca pṛthagvidhaiḥ
यह कहकर, राघव ने तत्पश्चात् नाना प्रकार के वस्त्रों तथा नदियों से उत्पन्न विविध रत्नों से दूत को सम्मानित किया।
श्लोक 121 (skanda.6.104.121)
विभीषणकृते पश्चात्प्रेषयामास राघवः । ढौकनीयान्यनेकानि यानि संति च तत्र वै
vibhīṣaṇakṛte paścātpreṣayāmāsa rāghavaḥ ḍhaukanīyānyanekāni yāni saṁti ca tatra vai
तत्पश्चात् विभीषण के लिए राघव ने वहाँ जितनी भी अनेक भेंटें उपलब्ध थीं, वे सब भेजीं।
श्लोक 122 (skanda.6.104.122)
सूत उवाच । एवं स सुखसंयुक्तान्कृत्वा सर्वान्द्विजोत्तमान् । एतत्सर्वं ददौ पश्चात्तेभ्यो मुक्तादिकं नृपः
sūta uvāca evaṁ sa sukhasaṁyuktānkṛtvā sarvāndvijottamān etatsarvaṁ dadau paścāttebhyo muktādikaṁ nṛpaḥ
सूत जी ने कहा — इस प्रकार समस्त श्रेष्ठ द्विजों को सुखयुक्त करके, राजा ने तत्पश्चात् उन्हें यह सब — मोती आदि — प्रदान किया।
श्लोक 123 (skanda.6.104.123)
ढौकनीयं तथाऽऽयातं तल्लंकायाः पृथग्विधम् । शासनानि तथान्यानि गजाश्वसहितानि च
ḍhaukanīyaṁ tathā''yātaṁ tallaṁkāyāḥ pṛthagvidham śāsanāni tathānyāni gajāśvasahitāni ca
तथा लंका से आई हुई विविध भेंटें, तथा अन्य आज्ञापत्र भी, हाथी-घोड़ों सहित,
श्लोक 124 (skanda.6.104.124)
पत्तनानि विचित्राणि ग्रामाणि नगराणि च । यच्चान्यद्वांछितं येन तद्दत्तं तेन तस्य वै
pattanāni vicitrāṇi grāmāṇi nagarāṇi ca yaccānyadvāṁchitaṁ yena taddattaṁ tena tasya vai
विचित्र नगर, ग्राम और पत्तन — जिस किसी को जो भी अन्य वांछित था, वह उसे प्रदान किया गया।
श्लोक 125 (skanda.6.104.125)
ततः कुशेश्वरं देवं विधाय च लवेश्वरम् । स्वां तनुं च महाभागौ भ्रातरौ तौ रघूत्तमौ
tataḥ kuśeśvaraṁ devaṁ vidhāya ca laveśvaram svāṁ tanuṁ ca mahābhāgau bhrātarau tau raghūttamau
तत्पश्चात् कुशेश्वर देव तथा लवेश्वर की, तथा अपने स्वयं के स्वरूपों की भी स्थापना कर, वे दोनों महाभाग रघुश्रेष्ठ भ्राता,
श्लोक 126 (skanda.6.104.126)
निवेद्य ब्राह्मणेन्द्राणां कृत्वा वृत्तिं यथोचिताम् । अयोध्यां नगरीं तूर्णं कृतकृत्यौ विनिर्गतौ
nivedya brāhmaṇendrāṇāṁ kṛtvā vṛttiṁ yathocitām ayodhyāṁ nagarīṁ tūrṇaṁ kṛtakṛtyau vinirgatau
उन्हें श्रेष्ठ ब्राह्मणों को सौंपकर, तथा उचित वृत्ति की व्यवस्था करके, कृतकृत्य होकर शीघ्र अयोध्या नगरी की ओर प्रस्थान कर गए।