नागर खण्ड · अध्याय 105
राक्षस-लिंगों द्वारा विनाश का वर्णन
श्लोक 1 (skanda.6.105.1)
सूत उवाच । अथ प्राप्ते दिनाधीशे तुलायां द्विजसत्तमाः । प्रेता लिंगोद्भवां भूमिं पूरयामासुरेव हि
sūta uvāca atha prāpte dinādhīśe tulāyāṁ dvijasattamāḥ pretā liṁgodbhavāṁ bhūmiṁ pūrayāmāsureva hi
सूत जी ने कहा — हे द्विजसत्तमो! तत्पश्चात् जब दिनाधीश सूर्य तुला राशि में आया, तब प्रेतों ने उस भूमि को, जहाँ लिंग उत्पन्न हुए थे, भर दिया।
श्लोक 2 (skanda.6.105.2)
यत्किंचित्तत्र संस्थं तु आद्यतीर्थं सुरालयम् । तत्सर्वं व्यन्तरैस्तैश्च पांसुभिः परिपूरितम्
yatkiṁcittatra saṁsthaṁ tu ādyatīrthaṁ surālayam tatsarvaṁ vyantaraistaiśca pāṁsubhiḥ paripūritam
वहाँ जो कुछ भी स्थित था — मूल तीर्थ, देवालय — वह सब उन व्यंतरों द्वारा धूल से पूर्णतः भर दिया गया।
श्लोक 3 (skanda.6.105.3)
ततः क्षेमं समुत्पन्नं क्षेत्रे तत्र द्विजोत्तमाः । अन्येषामपि लोकानां लिंगैस्तैर्लुप्तिमागतैः
tataḥ kṣemaṁ samutpannaṁ kṣetre tatra dvijottamāḥ anyeṣāmapi lokānāṁ liṁgaistairluptimāgataiḥ
हे द्विजोत्तमो! तत्पश्चात् उस क्षेत्र में कुशलता उत्पन्न हुई, जब अन्य लोकों के भी वे लिंग लुप्त हो गए।
श्लोक 4 (skanda.6.105.4)
कस्यचित्त्वथ कालस्य बृहदश्वो महीपतिः । शाल्वदेशात्समायातः कस्मिश्चिद्युगपर्यये
kasyacittvatha kālasya bṛhadaśvo mahīpatiḥ śālvadeśātsamāyātaḥ kasmiścidyugaparyaye
तत्पश्चात् कुछ काल बीतने पर, किसी युग-परिवर्तन के समय, बृहदश्व नामक राजा शाल्व देश से वहाँ आए।
श्लोक 5 (skanda.6.105.5)
स दृष्ट्वा विपुलां भूमिं प्रासादैः परिवर्जिताम् । प्रासादार्थं मतिं चक्रे तत्र क्षेत्रे द्विजोत्तमाः
sa dṛṣṭvā vipulāṁ bhūmiṁ prāsādaiḥ parivarjitām prāsādārthaṁ matiṁ cakre tatra kṣetre dvijottamāḥ
हे द्विजोत्तमो! उस विशाल भूमि को प्रासादों से रहित देखकर, उन्होंने उस क्षेत्र में प्रासाद बनाने का विचार किया।
श्लोक 6 (skanda.6.105.6)
शिल्पिनश्च समाहूयानेकांस्तत्र सहस्रशः । शोधयामास तां भूमिमधस्ताद्बहुविस्तृताम्
śilpinaśca samāhūyānekāṁstatra sahasraśaḥ śodhayāmāsa tāṁ bhūmimadhastādbahuvistṛtām
वहाँ हजारों शिल्पियों को बुलाकर, उन्होंने उस विस्तृत भूमि को नीचे से खुदवाकर शुद्ध कराया।
श्लोक 7 (skanda.6.105.7)
भूमौ निखन्यमानायां ततो लिंगानि भूरिशः । चतुर्वक्त्राणि तान्येव यांति दृष्टेश्च गोचरम्
bhūmau nikhanyamānāyāṁ tato liṁgāni bhūriśaḥ caturvaktrāṇi tānyeva yāṁti dṛṣṭeśca gocaram
भूमि को खोदते समय, तब अनेक चतुर्मुख लिंग दृष्टिगोचर होने लगे।
श्लोक 8 (skanda.6.105.8)
ततः स पार्थिवस्तैश्च लिंगैर्दृष्ट्वा वृतां भुवम् । तत्क्षणान्मृत्युमापन्नः शिल्पिभिश्च समन्वितः
tataḥ sa pārthivastaiśca liṁgairdṛṣṭvā vṛtāṁ bhuvam tatkṣaṇānmṛtyumāpannaḥ śilpibhiśca samanvitaḥ
तब उस राजा ने उन लिंगों से घिरी हुई भूमि को देखकर, उसी क्षण अपने शिल्पियों सहित मृत्यु को प्राप्त कर लिया।
श्लोक 9 (skanda.6.105.9)
ततःप्रभृति नो तत्र कश्चिन्मर्त्यो महीतले । प्रासादं कुरुते भीत्या तडागं कूपमेव च
tataḥprabhṛti no tatra kaścinmartyo mahītale prāsādaṁ kurute bhītyā taḍāgaṁ kūpameva ca
तब से लेकर आज तक, उस भूतल पर भय के कारण कोई भी मनुष्य वहाँ प्रासाद, तडाग अथवा कूप भी नहीं बनवाता।