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नागर खण्ड · अध्याय 106

लुप्त तीर्थों के माहात्म्य का कथन

अध्याय 105अध्याय-सूचीअध्याय 107

श्लोक 1 (skanda.6.106.1)

ऋषय ऊचुः । भूपृष्ठे पांसुभिस्तस्मिन्प्रेतैस्तैः परिपूरिते । यानि तीर्थानि लुप्तानि लिङ्गानि च वदस्व नः

ṛṣaya ūcuḥ bhūpṛṣṭhe pāṁsubhistasminpretaistaiḥ paripūrite yāni tīrthāni luptāni liṅgāni ca vadasva naḥ

ऋषियों ने कहा — जब प्रेतों द्वारा उस भूतल को धूल से भर दिया गया, तब बताइए कि कौन-कौन से तीर्थ और लिंग लुप्त हो गए।

श्लोक 2 (skanda.6.106.2)

सूत उवाच । असंख्यातानि तीर्थानि तथा लिंगानि च द्विजाः । लोपं गतानि वक्ष्यामि प्राधान्येन प्रबोधत

sūta uvāca asaṁkhyātāni tīrthāni tathā liṁgāni ca dvijāḥ lopaṁ gatāni vakṣyāmi prādhānyena prabodhata

सूत जी ने कहा — हे द्विजो! असंख्य तीर्थ तथा लिंग लुप्त हो गए; मैं मुख्य रूप से उनका वर्णन करता हूँ — सावधान होकर सुनिए।

श्लोक 3 (skanda.6.106.3)

तत्र लोपं गतं तीर्थं चक्रतीर्थमिति स्मृतम् । यत्र चक्रं पुरा न्यस्तं विष्णुना प्रभविष्णुना

tatra lopaṁ gataṁ tīrthaṁ cakratīrthamiti smṛtam yatra cakraṁ purā nyastaṁ viṣṇunā prabhaviṣṇunā

उनमें जो तीर्थ लुप्त हुआ, वह चक्रतीर्थ नाम से स्मृत है, जहाँ प्रभविष्णु विष्णु द्वारा पूर्वकाल में चक्र रखा गया था।

श्लोक 4 (skanda.6.106.4)

मातृतीर्थं तथैवान्यत्सर्वकामप्रदं नृणाम् । यत्र ता मातरो दिव्याः कार्तिकेयप्रतिष्ठिताः

mātṛtīrthaṁ tathaivānyatsarvakāmapradaṁ nṛṇām yatra tā mātaro divyāḥ kārtikeyapratiṣṭhitāḥ

तथा इसी प्रकार एक अन्य, मातृतीर्थ, जो मनुष्यों की समस्त कामनाएँ पूर्ण करने वाला था, जहाँ कार्तिकेय द्वारा प्रतिष्ठित वे दिव्य मातृगण थीं।

श्लोक 5 (skanda.6.106.5)

मुचुकुन्दस्य राजर्षेस्तथान्यल्लिंगमुत्तमम् । तत्र लोपं गतं विप्राः सगरस्य तु भूपतेः

mucukundasya rājarṣestathānyalliṁgamuttamam tatra lopaṁ gataṁ viprāḥ sagarasya tu bhūpateḥ

तथा राजर्षि मुचुकुन्द का वह उत्तम लिंग भी, हे विप्रो! वहाँ लुप्त हो गया — तथा राजा सगर का भी।

श्लोक 6 (skanda.6.106.6)

इक्ष्वाकोर्वसुषेणस्य ककुत्स्थस्य महात्मनः । ऐलस्य चन्द्रदेवस्य काशिराजस्य सन्मतेः

ikṣvākorvasuṣeṇasya kakutsthasya mahātmanaḥ ailasya candradevasya kāśirājasya sanmateḥ

इक्ष्वाकु, वसुषेण, महात्मा ककुत्स्थ, ऐल, चंद्रदेव तथा सन्मति काशिराज के लिंग,

श्लोक 7 (skanda.6.106.7)

अग्निवेशस्य रैभ्यस्य च्यवनस्य भृगोस्तथा । आश्रमो याज्ञवल्क्यस्य तत्र लोपं समाययौ

agniveśasya raibhyasya cyavanasya bhṛgostathā āśramo yājñavalkyasya tatra lopaṁ samāyayau

अग्निवेश, रैभ्य, च्यवन तथा भृगु के लिंग — तथा याज्ञवल्क्य का आश्रम — सब वहाँ लुप्त हो गए।

श्लोक 8 (skanda.6.106.8)

हारीतस्य महर्षेश्च हर्यश्वस्य महात्मनः । कुत्सस्य च वसिष्ठस्य नारदस्य त्रितस्य च

hārītasya maharṣeśca haryaśvasya mahātmanaḥ kutsasya ca vasiṣṭhasya nāradasya tritasya ca

महर्षि हारीत, महात्मा हर्यश्व, कुत्स, वसिष्ठ, नारद तथा त्रित के लिंग,

श्लोक 9 (skanda.6.106.9)

तथैव ऋषिपत्नीनां तत्र लिंगानि भूरिशः । कात्यायन्याश्च शांडिल्या मैत्रेय्याश्च तथा पुरा

tathaiva ṛṣipatnīnāṁ tatra liṁgāni bhūriśaḥ kātyāyanyāśca śāṁḍilyā maitreyyāśca tathā purā

तथा इसी प्रकार ऋषि-पत्नियों के भी अनेक लिंग — कात्यायनी, शांडिल्या तथा मैत्रेयी के भी, पूर्वकाल में,

श्लोक 10 (skanda.6.106.10)

अन्यासां मुनिपत्नीनां यासां संख्या न विद्यते । तत्राश्चर्यमभूदन्यत्पूर्यमाणे महीतले

anyāsāṁ munipatnīnāṁ yāsāṁ saṁkhyā na vidyate tatrāścaryamabhūdanyatpūryamāṇe mahītale

तथा अन्य मुनि-पत्नियों के भी, जिनकी गणना नहीं है — ये सब लुप्त हो गए। तत्पश्चात् वहाँ भूमि के भर जाते समय एक और आश्चर्य हुआ।

श्लोक 11 (skanda.6.106.11)

पांसुभी राक्षसैर्यैस्तैः प्रेतैर्ब्राह्मणसत्तमाः । तद्वोऽहं संप्रवक्ष्यामि श्रोतव्यं सुसमाहितैः

pāṁsubhī rākṣasairyaistaiḥ pretairbrāhmaṇasattamāḥ tadvo'haṁ saṁpravakṣyāmi śrotavyaṁ susamāhitaiḥ

उन राक्षस-प्रेतों द्वारा धूल से जो हुआ, हे ब्राह्मणसत्तमो! वह मैं तुम्हें बताता हूँ — सावधान होकर सुनिए।

श्लोक 12 (skanda.6.106.12)

दृष्ट्वा पांसुमयीं वृष्टिं मुक्तां प्रेतैः समंततः । मातृवर्गेण तेनाथ प्रमुक्तः प्रचुरोऽनिलः

dṛṣṭvā pāṁsumayīṁ vṛṣṭiṁ muktāṁ pretaiḥ samaṁtataḥ mātṛvargeṇa tenātha pramuktaḥ pracuro'nilaḥ

प्रेतों द्वारा चारों ओर छोड़ी जा रही धूल की वर्षा को देखकर, तत्पश्चात् मातृगण द्वारा एक प्रचंड वायु छोड़ी गई।

श्लोक 13 (skanda.6.106.13)

तेन पांसुकृता वृष्टिः समंतान्मथिता बहिः । तस्या भूमेः पतत्येव न किंचित्तत्र पूर्यते

tena pāṁsukṛtā vṛṣṭiḥ samaṁtānmathitā bahiḥ tasyā bhūmeḥ patatyeva na kiṁcittatra pūryate

उस वायु से धूल की वह वर्षा चारों ओर बाहर बिखर जाती है; उस भूमि पर कुछ भी नहीं गिरता, वहाँ कुछ भी नहीं भरता।

श्लोक 14 (skanda.6.106.14)

ततस्ते व्यंतराः खिन्ना निराशास्तस्य पूरणे । भूतास्तस्य पुरो गत्वा चुक्रुशुः कुशभूपतेः

tataste vyaṁtarāḥ khinnā nirāśāstasya pūraṇe bhūtāstasya puro gatvā cukruśuḥ kuśabhūpateḥ

तब वे व्यंतर, उस भूमि को भरने में निराश और खिन्न होकर, कुश राजा के सम्मुख जाकर पुकार उठे —

श्लोक 15 (skanda.6.106.15)

अस्माभिर्विहिता तत्र पांसुवृष्टिर्महीपते । नीयते शतधाऽन्यत्र मातृमुक्तेन वायुना

asmābhirvihitā tatra pāṁsuvṛṣṭirmahīpate nīyate śatadhā'nyatra mātṛmuktena vāyunā

"हे महीपते! हमारे द्वारा यहाँ की गई यह धूल-वृष्टि, मातृगण द्वारा छोड़ी गई वायु से सौ प्रकार से अन्यत्र बिखर जाती है।

श्लोक 16 (skanda.6.106.16)

स त्वं तासां विघातार्थमुपायं भूप चिंतय । येन तां पांसुभिर्भूमिं पूरयामः समंततः

sa tvaṁ tāsāṁ vighātārthamupāyaṁ bhūpa ciṁtaya yena tāṁ pāṁsubhirbhūmiṁ pūrayāmaḥ samaṁtataḥ

अतः हे राजन्! आप उनके निवारण के लिए कोई उपाय सोचें, जिससे हम उस भूमि को चारों ओर से धूल से भर सकें।

श्लोक 17 (skanda.6.106.17)

तेषां तद्वचनं श्रुत्वा ततः कुशमहीपतिः । रुद्रमाराधयामास तत्क्षेत्रं प्राप्य सद्द्विजाः

teṣāṁ tadvacanaṁ śrutvā tataḥ kuśamahīpatiḥ rudramārādhayāmāsa tatkṣetraṁ prāpya saddvijāḥ

हे सद्द्विजो! उनके इस वचन को सुनकर, कुश महीपति ने उस क्षेत्र में पहुँचकर रुद्र की आराधना की।

श्लोक 18 (skanda.6.106.18)

ततस्तस्य गतस्तुष्टिं वर्षांते भगवान्हरः । प्रोवाच प्रार्थयाभीष्टं यत्ते मनसि वांछितम्

tatastasya gatastuṣṭiṁ varṣāṁte bhagavānharaḥ provāca prārthayābhīṣṭaṁ yatte manasi vāṁchitam

तत्पश्चात् एक वर्ष के अंत में भगवान् हर उन पर संतुष्ट होकर बोले — "जो तुम्हारे मन में अभिलषित हो, वह वर मांगो।"

श्लोक 19 (skanda.6.106.19)

कुश उवाच । यथा संपूर्यते चाशु पांसुभिर्भूमिमंडलम् । एतत्प्रेतप्रमुक्तैश्च प्रसादात्ते तथा कुरु

kuśa uvāca yathā saṁpūryate cāśu pāṁsubhirbhūmimaṁḍalam etatpretapramuktaiśca prasādātte tathā kuru

कुश ने कहा — "जिस प्रकार यह भूमण्डल शीघ्र ही धूल से भर जाए, इन प्रेतों द्वारा आपकी कृपा से, वैसा ही आप कीजिए।

श्लोक 20 (skanda.6.106.20)

मया प्रेतगणादेव निर्दिष्टास्तस्य पूरणे । मातृसंरक्ष्यमाणं तच्छक्यं चैतन्न पूरितुम्

mayā pretagaṇādeva nirdiṣṭāstasya pūraṇe mātṛsaṁrakṣyamāṇaṁ tacchakyaṁ caitanna pūritum

मैंने उन्हें प्रेतगण में से इसके पूरण के लिए नियुक्त किया है; परन्तु मातृगण द्वारा रक्षित होने के कारण वह भरा नहीं जा सकता।

श्लोक 21 (skanda.6.106.21)

तत्र राक्षसजैर्मंत्रैः संति लिंगानि च प्रभो । प्रतिष्ठितानि तत्स्पर्शाद्दर्शनात्स्याज्जनक्षयः

tatra rākṣasajairmaṁtraiḥ saṁti liṁgāni ca prabho pratiṣṭhitāni tatsparśāddarśanātsyājjanakṣayaḥ

हे प्रभो! वहाँ राक्षस-जनित मंत्रों से प्रतिष्ठित लिंग हैं; उनके स्पर्श या दर्शन मात्र से जनक्षय हो जाता है।

श्लोक 22 (skanda.6.106.22)

अचलत्वात्तथा देव लिंगानां शास्त्रसद्भयात् । अन्यदुत्पाटनाद्यं च नैव कुर्मः कथंचन

acalatvāttathā deva liṁgānāṁ śāstrasadbhayāt anyadutpāṭanādyaṁ ca naiva kurmaḥ kathaṁcana

तथा हे देव! लिंगों की अचलता के कारण, और शास्त्र-विरुद्ध होने के भय से, हम किसी भी प्रकार उन्हें उखाड़ने आदि का कार्य नहीं करते।

श्लोक 23 (skanda.6.106.23)

तस्माल्लिंगकृतो नाशो ब्राह्मणानां तपस्विनाम् । यथा न स्यात्सुरश्रेष्ठ तथा नीतिर्विधीयताम्

tasmālliṁgakṛto nāśo brāhmaṇānāṁ tapasvinām yathā na syātsuraśreṣṭha tathā nītirvidhīyatām

अतः हे सुरश्रेष्ठ! ऐसी नीति निर्धारित की जाए, जिससे तपस्वी ब्राह्मणों का इन लिंगों से होने वाला नाश न हो।

श्लोक 24 (skanda.6.106.24)

ततश्च भगवान्रुद्रस्ताः समाहूय मातरः । प्रोवाच त्यज्यतां स्थानं भवत्यो यत्र संस्थिताः

tataśca bhagavānrudrastāḥ samāhūya mātaraḥ provāca tyajyatāṁ sthānaṁ bhavatyo yatra saṁsthitāḥ

तत्पश्चात् भगवान् रुद्र ने उन मातृगणों को बुलाकर कहा — "जिस स्थान पर आप विराजमान हैं, उसे त्याग दें।

श्लोक 25 (skanda.6.106.25)

तत्र पांसुभिरव्यग्राः करिष्यंति दिवानिशम् । प्रेताः कुशसमादेशाद्वृष्टिं लोकहिताय च

tatra pāṁsubhiravyagrāḥ kariṣyaṁti divāniśam pretāḥ kuśasamādeśādvṛṣṭiṁ lokahitāya ca

वहाँ बिना विघ्न के प्रेत, कुश की आज्ञा से, दिन-रात, लोकहित के लिए धूल की वर्षा करते रहेंगे।

श्लोक 26 (skanda.6.106.26)

मातर ऊचुः । त्यक्ष्यामश्च तवादेशात्तत्स्थानं वृषभध्वज । परं दर्शय चास्माकं किंचिदन्यत्तथाविधम्

mātara ūcuḥ tyakṣyāmaśca tavādeśāttatsthānaṁ vṛṣabhadhvaja paraṁ darśaya cāsmākaṁ kiṁcidanyattathāvidham

मातृगणों ने कहा — "हे वृषभध्वज! आपकी आज्ञा से हम उस स्थान को त्याग देंगी; परंतु हमें उसी प्रकार का कोई अन्य स्थान दिखाइए।

श्लोक 27 (skanda.6.106.27)

क्षेत्रेऽत्रैव निवत्स्यामो येन स्कन्दकृते वयम् । तेन संस्थापिताश्चात्र प्रोक्ताः स्थेयं सदा ततः

kṣetre'traiva nivatsyāmo yena skandakṛte vayam tena saṁsthāpitāścātra proktāḥ stheyaṁ sadā tataḥ

हम इसी क्षेत्र में निवास करेंगी, क्योंकि हम स्कंद के निमित्त यहाँ स्थापित की गई थीं, और कहा गया था कि हम सदा यहीं रहें।

श्लोक 28 (skanda.6.106.28)

ततः प्रोवाच भगवांस्तस्मात्स्थानान्महत्तरम् । स्थानं दास्यामि सर्वासां पृथक्त्वेन शुभावहम्

tataḥ provāca bhagavāṁstasmātsthānānmahattaram sthānaṁ dāsyāmi sarvāsāṁ pṛthaktvena śubhāvaham

तत्पश्चात् भगवान् ने कहा — "मैं तुम सबको उस स्थान से भी बड़ा, तथा शुभदायक, पृथक्-पृथक् स्थान दूँगा।

श्लोक 29 (skanda.6.106.29)

अष्टषष्टिस्तु क्षेत्राणां मदीयानां समंततः । संस्थितास्ति महाभागा येषु मत्संस्थितिः सदा

aṣṭaṣaṣṭistu kṣetrāṇāṁ madīyānāṁ samaṁtataḥ saṁsthitāsti mahābhāgā yeṣu matsaṁsthitiḥ sadā

हे महाभागाओ! मेरे अड़सठ क्षेत्र सर्वत्र स्थित हैं, जिनमें मेरा निवास सदा रहता है।

श्लोक 30 (skanda.6.106.30)

अष्टषष्टिविभागेन भूत्वा सर्वाः पृथक्पृथक् । तेषु तिष्ठथ मद्वाक्यात्पूजामग्र्यामवाप्स्यथ

aṣṭaṣaṣṭivibhāgena bhūtvā sarvāḥ pṛthakpṛthak teṣu tiṣṭhatha madvākyātpūjāmagryāmavāpsyatha

अड़सठ भागों में विभक्त होकर, पृथक्-पृथक्, मेरे वचन से उनमें निवास करो, और तुम्हें अग्रगण्य पूजा प्राप्त होगी।

श्लोक 31 (skanda.6.106.31)

तस्य देवस्य तच्छ्रुत्वा वाक्यं ता मातरस्तदा । प्रहृष्टास्तत्परित्यज्य स्थानं स्कन्दविनिर्मितम्

tasya devasya tacchrutvā vākyaṁ tā mātarastadā prahṛṣṭāstatparityajya sthānaṁ skandavinirmitam

उस देव के इस वचन को सुनकर, वे मातृगण हर्षित होकर, स्कंद द्वारा निर्मित उस स्थान को त्यागकर,

श्लोक 32 (skanda.6.106.32)

अष्टषष्टिविभागेन भूत्वा रूपैः पृथग्विधैः । अष्टषष्टिषु क्षेत्रेषु तस्य ताः संस्थिताः सदा

aṣṭaṣaṣṭivibhāgena bhūtvā rūpaiḥ pṛthagvidhaiḥ aṣṭaṣaṣṭiṣu kṣetreṣu tasya tāḥ saṁsthitāḥ sadā

तथा अड़सठ भागों में विभक्त होकर, विविध रूपों में, उन अड़सठ क्षेत्रों में सदा के लिए स्थापित हो गईं।

श्लोक 33 (skanda.6.106.33)

ततस्ताभिर्विनिर्मुक्तं तत्सर्वं भूमिमण्डलम् । पांसुभिः पूरितं प्रेतैर्दिवारात्रमतंद्रितैः

tatastābhirvinirmuktaṁ tatsarvaṁ bhūmimaṇḍalam pāṁsubhiḥ pūritaṁ pretairdivārātramataṁdritaiḥ

तत्पश्चात् उनसे मुक्त होकर, वह सम्पूर्ण भूमण्डल अथक प्रेतों द्वारा दिन-रात धूल से भर दिया गया।

श्लोक 34 (skanda.6.106.34)

एवं तस्य वरं दत्त्वा भगवान्वृषवाहनः । जगामादर्शनं पश्चात्सार्धं सवर्गगणैर्द्विजाः

evaṁ tasya varaṁ dattvā bhagavānvṛṣavāhanaḥ jagāmādarśanaṁ paścātsārdhaṁ savargagaṇairdvijāḥ

इस प्रकार उन्हें वर देकर, वृषभवाहन भगवान् तत्पश्चात् अपने गणों सहित अंतर्धान हो गए।

श्लोक 35 (skanda.6.106.35)

कुतोऽपि ब्राह्मणैः सर्वेस्तापसैश्च प्रशंसितः । लब्धाशी प्रययौ तस्मादयोध्यानगरीं प्रति

kuto'pi brāhmaṇaiḥ sarvestāpasaiśca praśaṁsitaḥ labdhāśī prayayau tasmādayodhyānagarīṁ prati

सर्वत्र समस्त ब्राह्मणों और तपस्वियों द्वारा प्रशंसित, इच्छित वर प्राप्त कर, वे तत्पश्चात् वहाँ से अयोध्या नगरी की ओर प्रस्थान कर गए।

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