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नागर खण्ड · अध्याय 107

ब्राह्मण चित्रशर्मा द्वारा लिंग-स्थापना का वृत्तांत-वर्णन

अध्याय 106अध्याय-सूचीअध्याय 108

श्लोक 1 (skanda.6.107.1)

ऋषय ऊचुः । अष्टषष्टिरियं प्रोक्ता या त्वया सूतनन्दन । क्षेत्राणां देवदेवस्य कथं सा तत्र संस्थिता । एतत्सर्वं समाचक्ष्व परं कौतूहलं हि नः

ṛṣaya ūcuḥ aṣṭaṣaṣṭiriyaṁ proktā yā tvayā sūtanandana kṣetrāṇāṁ devadevasya kathaṁ sā tatra saṁsthitā etatsarvaṁ samācakṣva paraṁ kautūhalaṁ hi naḥ

ऋषियों ने कहा — हे सूतनन्दन! देवदेव के जो ये अड़सठ क्षेत्र आपने बताए, वे वहाँ कैसे स्थापित हुए? यह सब हमें बताइए — हमें अत्यंत कौतूहल है।

श्लोक 2 (skanda.6.107.2)

सूत उवाच । प्रश्नभारो महानेष यो भवद्भिः प्रकीर्तितः । तथापि कीर्तयिष्यामि नमस्कृत्वा पिनाकिनम्

sūta uvāca praśnabhāro mahāneṣa yo bhavadbhiḥ prakīrtitaḥ tathāpi kīrtayiṣyāmi namaskṛtvā pinākinam

सूत जी ने कहा — आपने जो यह प्रश्न किया है, वह अत्यंत भारी है; फिर भी पिनाकी को नमस्कार करके मैं इसका वर्णन करता हूँ।

श्लोक 3 (skanda.6.107.3)

चमत्कारपुरेऽवासीत्पूर्वं ब्राह्मणसत्तमः । वत्सस्यान्वयसंभूतश्चित्रशर्मा महायशाः

camatkārapure'vāsītpūrvaṁ brāhmaṇasattamaḥ vatsasyānvayasaṁbhūtaścitraśarmā mahāyaśāḥ

चमत्कारपुर में पूर्वकाल में वत्स-वंश में उत्पन्न, महायशस्वी चित्रशर्मा नामक एक श्रेष्ठ ब्राह्मण रहते थे।

श्लोक 4 (skanda.6.107.4)

तस्य बुद्धिरियं जाता पाताले हाटकेश्वरम् । अत्रानीय ततो भक्त्या पूजयामि दिवानिशम्

tasya buddhiriyaṁ jātā pātāle hāṭakeśvaram atrānīya tato bhaktyā pūjayāmi divāniśam

उनके मन में यह विचार उत्पन्न हुआ — "पाताल से हाटकेश्वर को यहाँ लाकर, मैं उसकी दिन-रात भक्तिपूर्वक पूजा करूँगा।"

श्लोक 5 (skanda.6.107.5)

एवं स निश्चयं कृत्वा तपश्चके ततः परम् । नियतो नियताहारः परां निष्ठां समाश्रितः

evaṁ sa niścayaṁ kṛtvā tapaścake tataḥ param niyato niyatāhāraḥ parāṁ niṣṭhāṁ samāśritaḥ

ऐसा निश्चय करके, उन्होंने तत्पश्चात् संयमित होकर, नियताहारी होकर, परम निष्ठा का आश्रय लेकर घोर तप किया।

श्लोक 6 (skanda.6.107.6)

तस्यापि भगवाञ्छंभुः कालेन महता ततः । संतुष्टो ब्राह्मणश्रेष्ठास्ततः प्रोवाच सादरम्

tasyāpi bhagavāñchaṁbhuḥ kālena mahatā tataḥ saṁtuṣṭo brāhmaṇaśreṣṭhāstataḥ provāca sādaram

तत्पश्चात्, हे ब्राह्मणश्रेष्ठो! दीर्घ काल बाद भगवान् शंभु उन पर संतुष्ट हो गए, और उनसे आदरपूर्वक कहा —

श्लोक 7 (skanda.6.107.7)

वरं प्रार्थय विप्रेन्द्र यत्ते मनसि वर्तते । अपि त्रैलोक्यराज्यं ते तुष्टो दास्याम्यसंशयम्

varaṁ prārthaya viprendra yatte manasi vartate api trailokyarājyaṁ te tuṣṭo dāsyāmyasaṁśayam

"हे विप्रेन्द्र! तुम्हारे मन में जो हो, वह वर मांगो; तुम पर प्रसन्न होकर मैं त्रैलोक्य का राज्य भी निःसंदेह प्रदान कर दूँगा।

श्लोक 8 (skanda.6.107.8)

तस्मात्प्रार्थय ते नित्यं यत्र चित्ते व्यवस्थितम् । दुर्लभं सर्वदेवानां मनुष्याणां विशेषतः

tasmātprārthaya te nityaṁ yatra citte vyavasthitam durlabhaṁ sarvadevānāṁ manuṣyāṇāṁ viśeṣataḥ

अतः जो सदा तुम्हारे चित्त में स्थित है, जो समस्त देवताओं के लिए भी दुर्लभ है, विशेषतः मनुष्यों के लिए, वह मांगो।

श्लोक 9 (skanda.6.107.9)

चित्रशर्मोवाच । यदि तुष्टोसि मे देव वरं चेन्मे प्रयच्छसि । तदत्रागच्छ पातालाल्लिंगरूपी सुरेश्वर

citraśarmovāca yadi tuṣṭosi me deva varaṁ cenme prayacchasi tadatrāgaccha pātālālliṁgarūpī sureśvara

चित्रशर्मा ने कहा — "हे देव! यदि आप मुझसे प्रसन्न हैं, और यदि मुझे वर देना चाहते हैं, तो हे सुरेश्वर! पाताल से यहाँ लिंगरूप में आइए।

श्लोक 10 (skanda.6.107.10)

यत्पाताले स्थितं लिंगं ब्रह्मणा संप्रतिष्ठितम् । हाटकेश्वरसंज्ञं तु तदिहायातु सत्वरम्

yatpātāle sthitaṁ liṁgaṁ brahmaṇā saṁpratiṣṭhitam hāṭakeśvarasaṁjñaṁ tu tadihāyātu satvaram

पाताल में स्थित जो लिंग, जो ब्रह्मा द्वारा स्वयं प्रतिष्ठित है, हाटकेश्वर नाम से जाना जाता है — वह यहाँ शीघ्र आए।

श्लोक 11 (skanda.6.107.11)

श्रीभगवानुवाच । अचलं सर्वलिंगं स्यात्सर्वत्रापि द्विजोत्तम । किं पुनः प्रथमं यच्च ब्रह्मणा निर्मितं स्वयम्

śrībhagavānuvāca acalaṁ sarvaliṁgaṁ syātsarvatrāpi dvijottama kiṁ punaḥ prathamaṁ yacca brahmaṇā nirmitaṁ svayam

श्रीभगवान् ने कहा — "हे द्विजोत्तम! प्रत्येक लिंग सर्वत्र समान रूप से अचल होता है; फिर यह तो प्रथम है, जो स्वयं ब्रह्मा द्वारा निर्मित है।

श्लोक 12 (skanda.6.107.12)

तस्मात्स्थापय लिंगं तद्धाटकेन द्विजोत्तम । हाटकेश्वरसंज्ञं तु लोके ख्यातं भविष्यति

tasmātsthāpaya liṁgaṁ taddhāṭakena dvijottama hāṭakeśvarasaṁjñaṁ tu loke khyātaṁ bhaviṣyati

अतः हे द्विजोत्तम! हाटक (सुवर्ण) से उस लिंग की स्थापना करो; यह संसार में हाटकेश्वर नाम से विख्यात होगा।

श्लोक 13 (skanda.6.107.13)

सोमवारे चतुर्दश्यां शुक्लायां श्रद्धयान्वितः । यस्तद्भक्तिसमायुक्तः पूजयिष्यति मानवः

somavāre caturdaśyāṁ śuklāyāṁ śraddhayānvitaḥ yastadbhaktisamāyuktaḥ pūjayiṣyati mānavaḥ

सोमवार को, शुक्ल चतुर्दशी के दिन, श्रद्धायुक्त होकर, उसकी भक्ति से युक्त जो भी मनुष्य पूजा करेगा,

श्लोक 14 (skanda.6.107.14)

आद्यलिंगोद्भवं श्रेयः पूजया लप्स्यते द्विज । एवमुक्त्वाऽथ भगवांस्ततश्चादर्शनं गतः

ādyaliṁgodbhavaṁ śreyaḥ pūjayā lapsyate dvija evamuktvā'tha bhagavāṁstataścādarśanaṁ gataḥ

वह उस पूजा से आद्य-लिंगोद्भव श्रेय को प्राप्त करेगा, हे द्विज।" ऐसा कहकर भगवान् तत्पश्चात् अंतर्धान हो गए।

श्लोक 15 (skanda.6.107.15)

चित्रशर्माऽपि कृत्वाथ प्रासादं सुमनोहरम् । तत्र हेममयं लिंगं स्थापयामास भक्तितः

citraśarmā'pi kṛtvātha prāsādaṁ sumanoharam tatra hemamayaṁ liṁgaṁ sthāpayāmāsa bhaktitaḥ

चित्रशर्मा ने भी अत्यंत मनोहर प्रासाद बनवाकर, वहाँ भक्तिपूर्वक एक स्वर्णमय लिंग की स्थापना की।

श्लोक 16 (skanda.6.107.16)

शास्त्रोक्तेन विधानेन पूजां चक्रे च नित्यशः । ततस्त्रैलोक्यविख्यातं तल्लिंगं तत्र वै द्विजाः

śāstroktena vidhānena pūjāṁ cakre ca nityaśaḥ tatastrailokyavikhyātaṁ talliṁgaṁ tatra vai dvijāḥ

उसने शास्त्रोक्त विधान से नित्य पूजा की; तत्पश्चात्, हे द्विजो! वह लिंग वहाँ त्रिलोक-विख्यात हो गया।

श्लोक 17 (skanda.6.107.17)

दूरादभ्येत्य लोकाश्च पूजयंति ततः परम् । अथ तत्र द्विजा येऽन्ये संस्थिता गुणवत्तराः

dūrādabhyetya lokāśca pūjayaṁti tataḥ param atha tatra dvijā ye'nye saṁsthitā guṇavattarāḥ

लोग दूर-दूर से आकर उसकी पूजा करने लगे; तत्पश्चात् वहाँ स्थित अन्य गुणवान द्विजों को —

श्लोक 18 (skanda.6.107.18)

तेषां स्पर्धा ततो जाता दृष्ट्वा तस्य विचेष्टितम् । एकस्थानप्रसूतानां सर्वेषां गुणशालिनाम्

teṣāṁ spardhā tato jātā dṛṣṭvā tasya viceṣṭitam ekasthānaprasūtānāṁ sarveṣāṁ guṇaśālinām

उसका आचरण देखकर उनमें स्पर्धा उत्पन्न हुई, यद्यपि वे सभी एक ही स्थान में उत्पन्न, गुणवान थे —

श्लोक 19 (skanda.6.107.19)

अयं गुणविहीनोऽपि प्रख्यातो भुवनत्रये । हराराधनमासाद्य यस्मात्तस्माद्वयं हरम् । तदर्थे तोषयिष्यामः साम्यं येन प्रजायते

ayaṁ guṇavihīno'pi prakhyāto bhuvanatraye harārādhanamāsādya yasmāttasmādvayaṁ haram tadarthe toṣayiṣyāmaḥ sāmyaṁ yena prajāyate

"यह गुणहीन होकर भी हर की आराधना पाकर त्रिभुवन में विख्यात हो गया है; अतः हम भी उसी हेतु हर को संतुष्ट करेंगे, जिससे समानता उत्पन्न हो।"

श्लोक 20 (skanda.6.107.20)

अष्टषष्टिः स्मृता लोके क्षेत्राणां शूलपाणिनः । यत्र सान्निध्यमभ्येति त्रिकालं परमेश्वरः

aṣṭaṣaṣṭiḥ smṛtā loke kṣetrāṇāṁ śūlapāṇinaḥ yatra sānnidhyamabhyeti trikālaṁ parameśvaraḥ

संसार में शूलपाणि के अड़सठ क्षेत्र स्मृत हैं, जिनमें परमेश्वर का सान्निध्य त्रिकाल रहता है।

श्लोक 21 (skanda.6.107.21)

अष्टषष्टिश्च गोत्राणामस्माकं चात्र संस्थिता । एतेन मूढमनसा सार्धं सामान्यलक्षणा

aṣṭaṣaṣṭiśca gotrāṇāmasmākaṁ cātra saṁsthitā etena mūḍhamanasā sārdhaṁ sāmānyalakṣaṇā

तथा यहाँ हमारे भी अड़सठ गोत्र स्थित हैं; इस मूढ़चित्त के साथ हमारा सामान्य लक्षण है —

श्लोक 22 (skanda.6.107.22)

तस्मादनेन चाराध्य भगवन्तं त्रिलोचनम् । तच्च लिंगं समानीतमत्र पातालसंस्थितम्

tasmādanena cārādhya bhagavantaṁ trilocanam tacca liṁgaṁ samānītamatra pātālasaṁsthitam

अतः उसी माध्यम से त्रिलोचन भगवान् की आराधना करके, वह लिंग यहाँ लाया गया, जो पाताल में स्थित था —

श्लोक 23 (skanda.6.107.23)

तथा सर्वैश्च सर्वाणि क्षेत्रलिंगानि कृत्स्नशः । आनेतव्यानि चाराध्य तपःशक्त्या महेश्वरम्

tathā sarvaiśca sarvāṇi kṣetraliṁgāni kṛtsnaśaḥ ānetavyāni cārādhya tapaḥśaktyā maheśvaram

तथा उसी प्रकार हम सब मिलकर, तपःशक्ति से महेश्वर की आराधना करके, समस्त क्षेत्र-लिंगों को यहाँ लाएँ।

श्लोक 24 (skanda.6.107.24)

एतेषां सर्वगोत्राणामानेष्यति च शंकरः । यद्गोत्रं क्षेत्रसंयुक्तं यच्चान्यद्वा भविष्यति

eteṣāṁ sarvagotrāṇāmāneṣyati ca śaṁkaraḥ yadgotraṁ kṣetrasaṁyuktaṁ yaccānyadvā bhaviṣyati

शंकर हमारे इन समस्त गोत्रों से संबंधित वस्तुओं को यहाँ लाएँगे — जो गोत्र जिस क्षेत्र से संयुक्त है, तथा जो अन्य भी होगा।

श्लोक 25 (skanda.6.107.25)

ततस्ते शर्मसंयुक्ताः सर्व एव द्विजोत्तमाः । चक्रुस्तपःक्रियां सर्वे दुष्करां सर्वजन्तुभिः

tataste śarmasaṁyuktāḥ sarva eva dvijottamāḥ cakrustapaḥkriyāṁ sarve duṣkarāṁ sarvajantubhiḥ

तत्पश्चात् वे समस्त श्रेष्ठ द्विज, इस निश्चय से युक्त होकर, सभी ने वह तप किया जो किसी भी प्राणी के लिए दुष्कर था,

श्लोक 26 (skanda.6.107.26)

जपैर्होमोपवासैश्च नियमैश्च पृथग्विधैः । बलिपूजोपहारैश्च स्नानदानादिभिस्तथा

japairhomopavāsaiśca niyamaiśca pṛthagvidhaiḥ balipūjopahāraiśca snānadānādibhistathā

जप, होम, उपवास तथा नाना नियमों से, बलि, पूजा, उपहार तथा स्नान-दान आदि से।

श्लोक 27 (skanda.6.107.27)

लिंगं संस्थाप्य देवस्य नाम्ना ख्यातं द्विजेश्वरम् । मनोहरतरे प्रोच्चे प्रासादे पर्वतोपमे

liṁgaṁ saṁsthāpya devasya nāmnā khyātaṁ dvijeśvaram manoharatare procce prāsāde parvatopame

देव के उस लिंग की स्थापना करके, जो नामतः विख्यात है, द्विजेश्वर, अत्यंत मनोहर, ऊँचे, पर्वत-सदृश प्रासाद में,

श्लोक 28 (skanda.6.107.28)

त्यक्त्वा गृहक्रियाः सर्वास्तथा यज्ञसमुद्भवाः । अन्याश्च लोकयात्रोत्थास्तोषयंति महेश्वरम्

tyaktvā gṛhakriyāḥ sarvāstathā yajñasamudbhavāḥ anyāśca lokayātrotthāstoṣayaṁti maheśvaram

गृहकार्यों को, तथा यज्ञ से उत्पन्न कार्यों को, और लोकयात्रा-संबंधी अन्य कार्यों को त्यागकर, वे महेश्वर को संतुष्ट करने में लगे।

श्लोक 29 (skanda.6.107.29)

एवमाराध्यमानोऽपि सन्तोषं परमेश्वरः । नाभ्यगच्छत्परां तुष्टिं कथंचिदपि स द्विजाः

evamārādhyamāno'pi santoṣaṁ parameśvaraḥ nābhyagacchatparāṁ tuṣṭiṁ kathaṁcidapi sa dvijāḥ

हे द्विजो! इस प्रकार आराधित होते हुए भी परमेश्वर किसी भी प्रकार परम संतोष को प्राप्त नहीं हुए।

श्लोक 30 (skanda.6.107.30)

ततो वर्षसहस्रांते समाराध्य महेश्वरम् । न च किञ्चित्फलं प्राप्ता यावत्क्रुद्धास्ततोऽखिलाः

tato varṣasahasrāṁte samārādhya maheśvaram na ca kiñcitphalaṁ prāptā yāvatkruddhāstato'khilāḥ

तत्पश्चात् सहस्र वर्ष के अंत में महेश्वर की आराधना करके भी जब उन्हें कोई फल प्राप्त नहीं हुआ, तब वे सभी क्रुद्ध हो उठे —

श्लोक 31 (skanda.6.107.31)

अस्य मूर्खतमस्याऽपि त्वं शूलिंश्चित्रशर्मणः । सुस्तोकेनाऽपि कालेन सन्तोषं परमं गतः

asya mūrkhatamasyā'pi tvaṁ śūliṁścitraśarmaṇaḥ sustokenā'pi kālena santoṣaṁ paramaṁ gataḥ

"इस अत्यंत मूर्ख चित्रशर्मा के प्रति भी, हे शूलिन्! आप अत्यल्प समय में ही परम संतोष को प्राप्त हो गए;

श्लोक 32 (skanda.6.107.32)

वयं वार्धक्यमापन्ना बाल्यात्प्रभृति शंकरम् । पूजयन्तोऽपि नो दृष्टस्तथाऽपि परमेश्वर

vayaṁ vārdhakyamāpannā bālyātprabhṛti śaṁkaram pūjayanto'pi no dṛṣṭastathā'pi parameśvara

जबकि हम बचपन से ही शंकर की पूजा करते हुए वृद्धावस्था को प्राप्त हो गए, फिर भी हे परमेश्वर! आपके द्वारा नहीं देखे गए।

श्लोक 33 (skanda.6.107.33)

तस्मात्सर्वे प्रकर्तव्यं हव्यवाहप्रवेशनम् । अस्माभिर्निश्चयो ह्येष तवाग्रे सांप्रतं कृतः

tasmātsarve prakartavyaṁ havyavāhapraveśanam asmābhirniścayo hyeṣa tavāgre sāṁprataṁ kṛtaḥ

अतः अब हम सबको अग्नि में प्रवेश करना होगा; यही निश्चय हमने अभी आपके समक्ष किया है।

श्लोक 34 (skanda.6.107.34)

ततश्चाहृत्य काष्ठानि सर्वे ते द्विजसत्तमाः । ईश्वरं मनसि ध्यात्वा चिताश्चक्रुः पृथग्विधाः

tataścāhṛtya kāṣṭhāni sarve te dvijasattamāḥ īśvaraṁ manasi dhyātvā citāścakruḥ pṛthagvidhāḥ

तत्पश्चात् काष्ठ एकत्र करके, वे समस्त श्रेष्ठ द्विज, मन में ईश्वर का ध्यान करते हुए, नाना प्रकार की चिताएँ बनाने लगे।

श्लोक 35 (skanda.6.107.35)

तथा सर्वं क्रियाकल्पं स्नानदानादिकं च यत् । कृत्वा ते ब्राह्मणाः सर्वे सुसमिद्धहुताशनम्

tathā sarvaṁ kriyākalpaṁ snānadānādikaṁ ca yat kṛtvā te brāhmaṇāḥ sarve susamiddhahutāśanam

तथा स्नान-दान आदि समस्त क्रिया-विधि करके, उन समस्त ब्राह्मणों ने सुसमृद्ध हुताशन को प्रज्वलित किया।

श्लोक 36 (skanda.6.107.36)

यावत्कृत्वा सुतैः सार्धं प्रविशंति समाहिताः । तावत्स भगवांस्तुष्टस्तेषां संदर्शनं ययौ

yāvatkṛtvā sutaiḥ sārdhaṁ praviśaṁti samāhitāḥ tāvatsa bhagavāṁstuṣṭasteṣāṁ saṁdarśanaṁ yayau

जैसे ही वे ऐसा करके, अपने पुत्रों सहित एकाग्रचित्त होकर उसमें प्रवेश करने लगे, तभी वे संतुष्ट भगवान् उनके सम्मुख प्रकट हो गए।

श्लोक 37 (skanda.6.107.37)

अब्रवीच्च विहस्योच्चैर्मेघगम्भीरया गिरा । सर्वांस्तान्ब्राह्मणश्रेष्ठान्मृतान्संजीवयन्निव

abravīcca vihasyoccairmeghagambhīrayā girā sarvāṁstānbrāhmaṇaśreṣṭhānmṛtānsaṁjīvayanniva

तथा उच्च स्वर से हँसते हुए, मेघ के समान गंभीर वाणी में, उन समस्त ब्राह्मणश्रेष्ठों से यह कहा, मानो मृतकों को पुनर्जीवित करते हुए —

श्लोक 38 (skanda.6.107.38)

भो भो ब्राह्मणशार्दूला मा मैवं साहसं महत् । यूयं कुरुत मद्वाक्यात्संतुष्टस्य विशेषतः

bho bho brāhmaṇaśārdūlā mā maivaṁ sāhasaṁ mahat yūyaṁ kuruta madvākyātsaṁtuṣṭasya viśeṣataḥ

"हे ब्राह्मणशार्दूलो! ऐसा महान् साहस मत करो, मत करो; विशेषतः संतुष्ट हुए मेरे वचन से आचरण करो।

श्लोक 39 (skanda.6.107.39)

तस्माद्वदत यच्चित्ते युष्माकं चैव संस्थितम् । येन दत्त्वा प्रगच्छामि स्वमेव भुवनं पुनः

tasmādvadata yaccitte yuṣmākaṁ caiva saṁsthitam yena dattvā pragacchāmi svameva bhuvanaṁ punaḥ

अतः जो तुम्हारे चित्त में स्थित है, वह कहो, जिससे उसे देकर मैं पुनः अपने ही लोक को लौट सकूँ।"

श्लोक 40 (skanda.6.107.40)

ब्राह्मणा ऊचुः । अस्मिन्क्षेत्रे सुरश्रेष्ठ पुरस्यास्य च संनिधौ । क्षेत्राणामष्टषष्टिर्या धन्या संकीर्त्यते जनैः

brāhmaṇā ūcuḥ asminkṣetre suraśreṣṭha purasyāsya ca saṁnidhau kṣetrāṇāmaṣṭaṣaṣṭiryā dhanyā saṁkīrtyate janaiḥ

ब्राह्मणों ने कहा — "हे सुरश्रेष्ठ! इस क्षेत्र में, तथा इस नगर के समीप, वह अड़सठ क्षेत्रों का समूह, जो लोगों द्वारा धन्य कहा जाता है —

श्लोक 41 (skanda.6.107.41)

सदाभ्यैतु समं लिंगैस्तैराद्यैः सुरसत्तम । येनामर्षप्रशांतिर्नः सर्वेषामिह जायते

sadābhyaitu samaṁ liṁgaistairādyaiḥ surasattama yenāmarṣapraśāṁtirnaḥ sarveṣāmiha jāyate

वह अपने मूल लिंगों सहित सदा यहाँ समान रूप से आ जाए, हे सुरसत्तम, जिससे हम सबका यह असंतोष पूर्णतः शांत हो जाए।

श्लोक 42 (skanda.6.107.42)

एष संस्पर्धतेऽस्माभिः सर्वैर्गुणविवर्जितः । त्वल्लिंगस्य प्रभावेन तस्मादेतत्समाचर

eṣa saṁspardhate'smābhiḥ sarvairguṇavivarjitaḥ tvalliṁgasya prabhāvena tasmādetatsamācara

यह गुणविहीन व्यक्ति केवल आपके लिंग के प्रभाव से हम सबसे स्पर्धा करता है; अतः यह हमें प्रदान कीजिए।

श्लोक 43 (skanda.6.107.43)

सूत उवाच । एतस्मिन्नंतरे विप्रो ज्ञात्वा तं वरदं हरम् । उवाच स्पर्धया युक्तश्चित्रशर्मा महेश्वरम्

sūta uvāca etasminnaṁtare vipro jñātvā taṁ varadaṁ haram uvāca spardhayā yuktaścitraśarmā maheśvaram

सूत जी ने कहा — इसी बीच, उस वरदाता हर को जानकर, ब्राह्मण चित्रशर्मा ने स्पर्धा से युक्त होकर महेश्वर से कहा —

श्लोक 44 (skanda.6.107.44)

चित्रशर्मोवाच । एतैः प्राणपरित्यागमारभ्य तदनन्तरम् । तुष्टिं नीतोऽसि देवेश कृत्वा च सुमहत्तपः

citraśarmovāca etaiḥ prāṇaparityāgamārabhya tadanantaram tuṣṭiṁ nīto'si deveśa kṛtvā ca sumahattapaḥ

चित्रशर्मा ने कहा — "इन लोगों के द्वारा, प्राण-त्याग से आरम्भ करके, तत्पश्चात्, हे देव! आप संतोष को प्राप्त हुए — महान् तप करके —

श्लोक 45 (skanda.6.107.45)

मया स्पर्द्धमानैश्च केवलं गुणगर्वितैः । तस्मादेषो न दातव्यस्त्वया किंचित्सुरेश्वर

mayā sparddhamānaiśca kevalaṁ guṇagarvitaiḥ tasmādeṣo na dātavyastvayā kiṁcitsureśvara

जबकि वे केवल अपने गुणों के अहंकार से मेरे साथ स्पर्धा करते थे; अतः हे सुरेश्वर! आपको उन्हें कुछ भी नहीं देना चाहिए।

श्लोक 46 (skanda.6.107.46)

यदि त्वं मामतिक्रम्य संप्रदास्यसि वांछितम् । एतैः पुत्रकलत्रैश्च सार्धं प्रत्यक्षतस्तव । पावकं साधयिष्यामि तस्माद्युक्तं समाचर

yadi tvaṁ māmatikramya saṁpradāsyasi vāṁchitam etaiḥ putrakalatraiśca sārdhaṁ pratyakṣatastava pāvakaṁ sādhayiṣyāmi tasmādyuktaṁ samācara

यदि आप मुझे लांघकर उन्हें इच्छित वस्तु प्रदान करेंगे, तो मैं इन अपने पुत्र-पत्नी सहित, आपके प्रत्यक्ष ही, अग्नि का आश्रय लूँगा; अतः जो उचित हो, वही कीजिए।

श्लोक 47 (skanda.6.107.47)

सूत उवाच । तस्य तद्वचनं श्रुत्वा भगवाञ्छशिशेखरः । चिन्तयामास चित्तेन किमत्र सुकृतं भवेत्

sūta uvāca tasya tadvacanaṁ śrutvā bhagavāñchaśiśekharaḥ cintayāmāsa cittena kimatra sukṛtaṁ bhavet

सूत जी ने कहा — उसके इस वचन को सुनकर, शशिशेखर भगवान् ने मन में विचार किया कि यहाँ क्या उचित उपाय हो।

श्लोक 48 (skanda.6.107.48)

एते ब्राह्मणशार्दूला विनाशं यांति मत्कृते । एषोऽपि सर्वसंसिद्धो गणतुल्यो द्विजोत्तमः

ete brāhmaṇaśārdūlā vināśaṁ yāṁti matkṛte eṣo'pi sarvasaṁsiddho gaṇatulyo dvijottamaḥ

"ये ब्राह्मणशार्दूल मेरे ही निमित्त विनाश को प्राप्त हो रहे हैं; तथा यह द्विजोत्तम भी पूर्ण सिद्ध है, मेरे गणों के समान है।

श्लोक 49 (skanda.6.107.49)

तस्माद्द्वाभ्यां मया कार्यं क्षेत्रे सौख्यं यथा भवेत् । ब्राह्मणानां विशेषेण तथा चात्र निवासिनाम्

tasmāddvābhyāṁ mayā kāryaṁ kṣetre saukhyaṁ yathā bhavet brāhmaṇānāṁ viśeṣeṇa tathā cātra nivāsinām

अतः मुझे दोनों के लिए ऐसा करना होगा, जिससे इस क्षेत्र में सुख हो — विशेषतः ब्राह्मणों के लिए, तथा यहाँ के निवासियों के लिए भी।

श्लोक 50 (skanda.6.107.50)

ममापि सर्वदा चित्ते कृत्यमेतद्धि वर्तते । एकस्थाने करोम्येव सर्वक्षेत्राणि यानि मे

mamāpi sarvadā citte kṛtyametaddhi vartate ekasthāne karomyeva sarvakṣetrāṇi yāni me

तथा मेरे भी चित्त में सदा यह कार्य विद्यमान रहा है — कि मैं अपने समस्त क्षेत्रों को एक स्थान में एकत्र कर दूँ।

श्लोक 51 (skanda.6.107.51)

भविष्यति तथा कालो रौद्रः कलिसमुद्भवः । तत्र क्षेत्राणि तीर्थानि नाशं यास्यंति भूतले

bhaviṣyati tathā kālo raudraḥ kalisamudbhavaḥ tatra kṣetrāṇi tīrthāni nāśaṁ yāsyaṁti bhūtale

क्योंकि आगे कलियुग से उत्पन्न वह भयंकर काल आएगा, जिसमें भूतल के क्षेत्र और तीर्थ नाश को प्राप्त होंगे।

श्लोक 52 (skanda.6.107.52)

सत्तीर्थैस्तद्भयात्सर्वैः क्षेत्रमेतत्समाश्रितम् । आनयिष्याम्यहमपि स्वानि क्षेत्राणि कृत्स्नशः

sattīrthaistadbhayātsarvaiḥ kṣetrametatsamāśritam ānayiṣyāmyahamapi svāni kṣetrāṇi kṛtsnaśaḥ

उसके भय से, अपने सभी सत्य तीर्थों सहित, यह क्षेत्र आश्रय-स्थान बनेगा; मैं भी अपने समस्त क्षेत्रों को यहाँ पूर्णतः ले आऊँगा।

श्लोक 53 (skanda.6.107.53)

ततस्तं चित्रशर्माणं प्राह चेदं महेश्वरः । शृणु मद्वचनं कृत्स्नं कुरुष्व तदनंतरम्

tatastaṁ citraśarmāṇaṁ prāha cedaṁ maheśvaraḥ śṛṇu madvacanaṁ kṛtsnaṁ kuruṣva tadanaṁtaram

तत्पश्चात् महेश्वर ने चित्रशर्मा से यह कहा — "मेरा यह सम्पूर्ण वचन सुनो, और तदनुसार आचरण करो।

श्लोक 54 (skanda.6.107.54)

अत्र क्षेत्राणि सर्वाणि मदीयानि द्विजोत्तम । समागच्छंतु विप्राश्च प्रभवंतु प्रहर्षिताः

atra kṣetrāṇi sarvāṇi madīyāni dvijottama samāgacchaṁtu viprāśca prabhavaṁtu praharṣitāḥ

हे द्विजोत्तम! मेरे समस्त क्षेत्र यहीं होंगे; ब्राह्मण यहाँ आएँ, और हर्षित होकर प्रवृद्ध हों।

श्लोक 55 (skanda.6.107.55)

तवापि योग्यतां श्रेष्ठां करिष्यामि महामते । यदि मे वर्तसे वाक्ये मुक्त्वा स्पर्द्धां द्विजोद्भवाम्

tavāpi yogyatāṁ śreṣṭhāṁ kariṣyāmi mahāmate yadi me vartase vākye muktvā sparddhāṁ dvijodbhavām

हे महामते! यदि तुम मेरे वचन में स्थित रहोगे, द्विजों में उत्पन्न इस स्पर्धा को त्यागकर, तो मैं तुम्हें भी श्रेष्ठ योग्यता प्रदान करूँगा।

श्लोक 56 (skanda.6.107.56)

तुरीयमपि ते गोत्रं वेदोक्तेन क्रमेण च । आद्यतां चापि ते सर्वे कीर्तयिष्यंति ते द्विजाः

turīyamapi te gotraṁ vedoktena krameṇa ca ādyatāṁ cāpi te sarve kīrtayiṣyaṁti te dvijāḥ

वेदोक्त क्रम से तुम्हारा गोत्र भी चतुर्थ होगा; तथा ये सभी द्विज तुम्हें प्रथम कहकर कीर्तन करेंगे।

श्लोक 57 (skanda.6.107.57)

तथान्यदपि सन्मानं तव यच्छामि च द्विज । आचन्द्रार्कमसंदिग्धं पुत्रपौत्रादिकं च यत्

tathānyadapi sanmānaṁ tava yacchāmi ca dvija ācandrārkamasaṁdigdhaṁ putrapautrādikaṁ ca yat

तथा हे द्विज! मैं तुम्हें एक और सम्मान भी प्रदान करूँगा — निःसंदेह, यावत् चंद्र-सूर्य रहेंगे, तुम्हारे पुत्र-पौत्रादि के विषय में —

श्लोक 58 (skanda.6.107.58)

त्वदन्वये भविष्यंति पुत्रपौत्रास्तथा परे । कृत्ये श्राद्धे तर्पणे वा क्रियमाणे विधानतः

tvadanvaye bhaviṣyaṁti putrapautrāstathā pare kṛtye śrāddhe tarpaṇe vā kriyamāṇe vidhānataḥ

तुम्हारे वंश में जो पुत्र-पौत्र तथा अन्य होंगे, जब विधिपूर्वक श्राद्ध या तर्पण किया जाएगा —

श्लोक 59 (skanda.6.107.59)

आद्यस्य वत्ससंज्ञस्य नाम उच्चार्य गोत्रजम् । ततो नामानि चाप्येवं कीर्तयिष्यंति भक्तितः

ādyasya vatsasaṁjñasya nāma uccārya gotrajam tato nāmāni cāpyevaṁ kīrtayiṣyaṁti bhaktitaḥ

आद्य वत्स-संज्ञक के गोत्रज नाम का उच्चारण करके, तत्पश्चात् वे भक्तिपूर्वक अन्य नामों का भी कीर्तन करेंगे।

श्लोक 60 (skanda.6.107.60)

ततः संतर्पयिष्यंति पितॄनथ पितामहान् । तथान्यानपि बंधूंश्च सुहृत्संबंधिबांधवान्

tataḥ saṁtarpayiṣyaṁti pitṝnatha pitāmahān tathānyānapi baṁdhūṁśca suhṛtsaṁbaṁdhibāṁdhavān

तत्पश्चात् वे पितरों तथा पितामहों को, तथा अन्य बंधुओं, सुहृदों और सम्बंधियों को भी तृप्त करेंगे।

श्लोक 61 (skanda.6.107.61)

त्वदन्वये विना नाम्ना त्वदीयेन विमोहिताः । ये पितॄंस्तर्पयिष्यंति तेषां व्यर्थं भविष्यति

tvadanvaye vinā nāmnā tvadīyena vimohitāḥ ye pitṝṁstarpayiṣyaṁti teṣāṁ vyarthaṁ bhaviṣyati

तुम्हारे वंश में जो लोग, मोहित होकर, तुम्हारे नाम के बिना पितरों को तर्पण देंगे, उनके लिए वह व्यर्थ हो जाएगा।

श्लोक 62 (skanda.6.107.62)

श्राद्धं वा यदि वा दानं तर्पणं वा त्वदुद्भवम् । तस्मादहंकृतिं मुक्त्वा मामाराधय केवलम्

śrāddhaṁ vā yadi vā dānaṁ tarpaṇaṁ vā tvadudbhavam tasmādahaṁkṛtiṁ muktvā māmārādhaya kevalam

चाहे वह श्राद्ध हो, या दान, या तुमसे उत्पन्न तर्पण — अतः अहंकार त्यागकर, केवल मेरी ही आराधना करो,

श्लोक 63 (skanda.6.107.63)

येन सिद्धोऽपि संसिद्धिं परामाप्नोषि शाश्वतीम् । एवं संबोध्य तं विप्रं कृत्वाद्यमपि पश्चिमम्

yena siddho'pi saṁsiddhiṁ parāmāpnoṣi śāśvatīm evaṁ saṁbodhya taṁ vipraṁ kṛtvādyamapi paścimam

जिससे, सिद्ध होते हुए भी, तुम परम शाश्वत सिद्धि को प्राप्त करोगे।" इस प्रकार उस विप्र को समझाकर, उसे आद्य और अंतिम दोनों बनाकर,

श्लोक 64 (skanda.6.107.64)

ततस्तान्ब्राह्मणानाह प्रासादः क्रियतामिति । गोत्रंगोत्रं पुरस्कृत्य स्थाप्यं लिंगमनुत्तमम् । येन संक्रमणं तेषु मम संजायतेद्विजाः

tatastānbrāhmaṇānāha prāsādaḥ kriyatāmiti gotraṁgotraṁ puraskṛtya sthāpyaṁ liṁgamanuttamam yena saṁkramaṇaṁ teṣu mama saṁjāyatedvijāḥ

तत्पश्चात् उन्होंने उन ब्राह्मणों से कहा — "प्रासाद बनाए जाएँ; प्रत्येक गोत्र को आगे रखकर, प्रत्येक में एक अनुपम लिंग स्थापित किया जाए, जिससे उनमें मेरा स्वयं का संक्रमण हो सके, हे द्विजो।"

श्लोक 65 (skanda.6.107.65)

अथ ते ब्राह्मणास्तत्र भूमिभागान्मनोहरान् । दृष्ट्वादृष्ट्वा प्रचक्रुश्च प्रासादान्हर्षसंयुताः

atha te brāhmaṇāstatra bhūmibhāgānmanoharān dṛṣṭvādṛṣṭvā pracakruśca prāsādānharṣasaṁyutāḥ

तत्पश्चात् उन ब्राह्मणों ने वहाँ मनोहर भूमि-भागों को देख-देखकर, हर्षयुक्त होकर प्रासाद बनवाए,

श्लोक 66 (skanda.6.107.66)

अष्टषष्टिमितान्दिव्यान्कैलासशिखरोपमान् । तेषु संस्थापयामासु लिङ्गानि विविधानि च । क्षेत्रेक्षेत्रे च यन्नाम तत्तत्संज्ञां प्रचक्रिरे

aṣṭaṣaṣṭimitāndivyānkailāsaśikharopamān teṣu saṁsthāpayāmāsu liṅgāni vividhāni ca kṣetrekṣetre ca yannāma tattatsaṁjñāṁ pracakrire

संख्या में अड़सठ, दिव्य, कैलास-शिखर के सदृश; उनमें उन्होंने विविध लिंगों की स्थापना की, तथा प्रत्येक क्षेत्र को अपना-अपना नाम दिया।

श्लोक 67 (skanda.6.107.67)

अथ तेषां पुनर्दृष्टिं गत्वा देवस्त्रिलोचनः । प्रोवाच मधुरं वाक्यं कस्मिंश्चित्कालपर्यये । आराधितस्तपःशक्त्या लिंगसंस्थापनादनु

atha teṣāṁ punardṛṣṭiṁ gatvā devastrilocanaḥ provāca madhuraṁ vākyaṁ kasmiṁścitkālaparyaye ārādhitastapaḥśaktyā liṁgasaṁsthāpanādanu

तत्पश्चात् उन्हें पुनः देखकर, किसी काल-परिवर्तन के समय, लिंग-स्थापना के पश्चात् तपःशक्ति से आराधित त्रिलोचन देव ने मधुर वाणी में कहा —

श्लोक 68 (skanda.6.107.68)

श्रीभगवानुवाच । परितुष्टोऽस्मि विप्रेंद्रा युष्माकमहमद्य वै । एतन्मम कृतं कृत्यं भवद्भिरखिलं ततः

śrībhagavānuvāca parituṣṭo'smi vipreṁdrā yuṣmākamahamadya vai etanmama kṛtaṁ kṛtyaṁ bhavadbhirakhilaṁ tataḥ

श्रीभगवान् ने कहा — "हे विप्रेन्द्रो! आज मैं आप सबसे पूर्णतः संतुष्ट हूँ; मेरा यह कार्य आपके द्वारा सम्पूर्णतः सम्पन्न हुआ है।

श्लोक 69 (skanda.6.107.69)

अस्मदीयानि लिंगानि क्षेत्राणि च कलेर्भयात् । ततो मान्याश्च मे यूयं नान्यैरेतद्भविष्यति

asmadīyāni liṁgāni kṣetrāṇi ca kalerbhayāt tato mānyāśca me yūyaṁ nānyairetadbhaviṣyati

ये मेरे लिंग तथा ये क्षेत्र कलिकाल के भय से यहाँ एकत्र किए गए; अतः आप मुझसे सम्मानित होंगे — यह अन्यों द्वारा नहीं हो सकेगा।

श्लोक 70 (skanda.6.107.70)

तस्माच्चित्तस्थितं शीघ्रं प्रार्थयंतु द्विजोत्तमाः । संप्रयच्छामि येनाशु यद्यपि स्यात्सुदुर्लभम्

tasmāccittasthitaṁ śīghraṁ prārthayaṁtu dvijottamāḥ saṁprayacchāmi yenāśu yadyapi syātsudurlabham

अतः हे द्विजोत्तमो! जो तुम्हारे चित्त में स्थित है, वह शीघ्र मांगो; मैं उसे तुरंत प्रदान करूँगा, चाहे वह कितना ही दुर्लभ क्यों न हो।

श्लोक 71 (skanda.6.107.71)

ब्राह्मणा ऊचुः । यदि देव प्रसन्नस्त्वमस्माकं च सुरेश्वर । पश्चिमश्चित्रशर्मा च यथाद्यो भवता कृतः

brāhmaṇā ūcuḥ yadi deva prasannastvamasmākaṁ ca sureśvara paścimaścitraśarmā ca yathādyo bhavatā kṛtaḥ

ब्राह्मणों ने कहा — "हे देव, हे सुरेश्वर! यदि आप हम पर प्रसन्न हैं, तो जिस प्रकार चित्रशर्मा को आपने प्रथम बनाया था, उसी प्रकार अब वह अंतिम बने —

श्लोक 72 (skanda.6.107.72)

अस्मदीयं सदा नाम कीर्तनीयमसंशयम् । श्राद्धकृत्येषु सर्वेषु यथा तेन समा वयम् । भवामस्त्वत्प्रसादेन सांप्रतं चित्रशर्मणा

asmadīyaṁ sadā nāma kīrtanīyamasaṁśayam śrāddhakṛtyeṣu sarveṣu yathā tena samā vayam bhavāmastvatprasādena sāṁprataṁ citraśarmaṇā

और हमारा भी नाम सदा कीर्तनीय हो, निःसंदेह, समस्त श्राद्ध-कृत्यों में, जिससे हम आपकी कृपा से अब चित्रशर्मा के समान हो जाएँ।

श्लोक 73 (skanda.6.107.73)

श्रीभगवानुवाच । युष्माकमपि ये केचिद्वशं यास्यंति मानवाः । युवानः शास्त्रसंयुक्ता वेदविद्याविशारदाः

śrībhagavānuvāca yuṣmākamapi ye kecidvaśaṁ yāsyaṁti mānavāḥ yuvānaḥ śāstrasaṁyuktā vedavidyāviśāradāḥ

श्रीभगवान् ने कहा — "तुम्हारे ही कुल में जो भी मनुष्य तुम्हारे अधीन होंगे — शास्त्रयुक्त, वेदविद्या में निपुण युवा —

श्लोक 74 (skanda.6.107.74)

आनयिष्यथ तान्यूयमामुष्यायणसंज्ञितान् । नित्यं स्थिताश्च ते क्षेत्रे श्राद्धस्याक्षय्यकारकाः

ānayiṣyatha tānyūyamāmuṣyāyaṇasaṁjñitān nityaṁ sthitāśca te kṣetre śrāddhasyākṣayyakārakāḥ

उन्हें तुम यहाँ 'आमुष्यायण' नामक संज्ञा से लाओगे; तथा इस क्षेत्र में सदा स्थित रहकर, वे अक्षय श्राद्ध के करने वाले होंगे।

श्लोक 75 (skanda.6.107.75)

एवमुक्त्वाथ देवेशस्ततश्चादर्शनं गतः । तेऽपि विप्राः सुसंतुष्टास्तत्र स्थाने व्यवस्थिताः

evamuktvātha deveśastataścādarśanaṁ gataḥ te'pi viprāḥ susaṁtuṣṭāstatra sthāne vyavasthitāḥ

यह कहकर देवेश तत्पश्चात् अंतर्धान हो गए; वे ब्राह्मण भी अत्यंत संतुष्ट होकर उसी स्थान में स्थित रहे।

श्लोक 76 (skanda.6.107.76)

एवं तत्र समस्तानि क्षेत्राण्यायतनानि च । कलिभीतानि विप्रेंद्रा निवसंति सदैव हि

evaṁ tatra samastāni kṣetrāṇyāyatanāni ca kalibhītāni vipreṁdrā nivasaṁti sadaiva hi

हे विप्रेन्द्रो! इस प्रकार वहाँ के समस्त क्षेत्र और मन्दिर, कलि से भयभीत होकर, सदा वहाँ निवास करते हैं।

श्लोक 77 (skanda.6.107.77)

एवं ते ब्राह्मणाः प्राप्य सिद्धिं चेश्वरपूजनात् । ख्याताः सर्वत्र भुवने श्राद्धस्याक्षय्यकारकाः

evaṁ te brāhmaṇāḥ prāpya siddhiṁ ceśvarapūjanāt khyātāḥ sarvatra bhuvane śrāddhasyākṣayyakārakāḥ

इस प्रकार वे ब्राह्मण ईश्वर-पूजन से सिद्धि को प्राप्त कर, संसार में सर्वत्र अक्षय श्राद्ध के करने वाले के रूप में विख्यात हुए।

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