नागर खण्ड · अध्याय 99
श्रीराम के समक्ष दुर्वासा के आगमन का वर्णन
श्लोक 1 (skanda.6.99.1)
ऋषय ऊचुः॥ यदेतद्भवता प्रोक्तं तत्र रामेण निर्मितः॥ रामेश्वरस्तथा सीता तेन तत्र विनिर्मिता
ṛṣaya ūcuḥ yadetadbhavatā proktaṁ tatra rāmeṇa nirmitaḥ rāmeśvarastathā sītā tena tatra vinirmitā
ऋषियों ने कहा — आपने जो यह कहा कि वहाँ राम द्वारा रामेश्वर की स्थापना की गई, तथा सीता की मूर्ति भी उन्होंने ही वहाँ बनवाई...
श्लोक 2 (skanda.6.99.2)
तथा च लक्ष्मणार्थाय निर्मितस्तेन संश्रयः॥ एतन्महद्विरुद्धं ते प्रतिभाति वचोऽखिलम्
tathā ca lakṣmaṇārthāya nirmitastena saṁśrayaḥ etanmahadviruddhaṁ te pratibhāti vaco'khilam
...और लक्ष्मण के निमित्त भी उन्होंने वहाँ एक मंदिर बनवाया — आपकी यह सम्पूर्ण बात हमें अत्यंत परस्पर विरुद्ध प्रतीत हो रही है।
श्लोक 3 (skanda.6.99.3)
त्वया सूत पुरा प्रोक्तं रामो लक्ष्मणसंयुतः॥ सीतया सहितः प्राप्तः क्षेत्रेऽत्र प्रस्थितो वने
tvayā sūta purā proktaṁ rāmo lakṣmaṇasaṁyutaḥ sītayā sahitaḥ prāptaḥ kṣetre'tra prasthito vane
हे सूत जी! आपने पहले कहा था कि राम, लक्ष्मण और सीता सहित वन को जाते समय इस क्षेत्र में आए थे।
श्लोक 4 (skanda.6.99.4)
श्राद्धं कृत्वा गयाशीर्षे लक्ष्मणेन विरुद्ध्य च॥ पुनः संप्रस्थितोऽरण्यं क्रोधाविष्टश्च तं प्रति
śrāddhaṁ kṛtvā gayāśīrṣe lakṣmaṇena viruddhya ca punaḥ saṁprasthito'raṇyaṁ krodhāviṣṭaśca taṁ prati
और गयाशीर्ष में श्राद्ध करने के पश्चात्, लक्ष्मण से विवाद होने पर, वे क्रोधयुक्त होकर उनके प्रति पुनः वन की ओर चल पड़े थे।
श्लोक 5 (skanda.6.99.5)
यत्त्वयोक्तं तदा तेन निर्मितोऽत्र महेश्वरः॥ एतच्च सर्वमाचक्ष्व संदेहं सूतनन्दन
yattvayoktaṁ tadā tena nirmito'tra maheśvaraḥ etacca sarvamācakṣva saṁdehaṁ sūtanandana
और आपने यह भी कहा था कि उसी समय उन्होंने यहाँ महेश्वर की स्थापना की — हे सूतनंदन! हमारे इस समस्त संदेह को दूर कीजिए।
श्लोक 6 (skanda.6.99.6)
सूत उवाच॥ अत्र मे नास्ति संदेहो युष्माकं च पुनः स्थितः॥ ततो वक्ष्याम्यशेषेण श्रूयतां द्विजसत्तमाः॥ एतत्क्षेत्रं पुनश्चाद्यं न क्षयं याति कुत्रचित्
sūta uvāca atra me nāsti saṁdeho yuṣmākaṁ ca punaḥ sthitaḥ tato vakṣyāmyaśeṣeṇa śrūyatāṁ dvijasattamāḥ etatkṣetraṁ punaścādyaṁ na kṣayaṁ yāti kutracit
सूत जी ने कहा — इसमें मेरे मन में कोई संदेह नहीं है, परंतु वह पुनः तुम्हारे मन में उपस्थित हो गया है; अतः हे श्रेष्ठ द्विजो! मैं यह सब विस्तार से बताता हूँ, सुनो — यह क्षेत्र सदा एक ही आदि-स्वरूप में है, यह कहीं भी क्षय को प्राप्त नहीं होता।
श्लोक 7 (skanda.6.99.7)
अन्यस्मिन्दिवसे प्राप्ते स तदा रघुनंदनः॥ यदा विरोधमापन्नः सार्धं सौमित्रिणा सह
anyasmindivase prāpte sa tadā raghunaṁdanaḥ yadā virodhamāpannaḥ sārdhaṁ saumitriṇā saha
यह एक अन्य दिन की घटना है, जब रघुनंदन राम लक्ष्मण के साथ विवाद को प्राप्त हुए थे।
श्लोक 8 (skanda.6.99.8)
एतत्पुनर्दिनं चान्यद्यत्र तेन प्रतिष्ठितः॥ रामेश्वरः स्वयं भक्त्या दुःखितेन महात्मना
etatpunardinaṁ cānyadyatra tena pratiṣṭhitaḥ rāmeśvaraḥ svayaṁ bhaktyā duḥkhitena mahātmanā
यह एक और भिन्न दिन है, जब दुःखी हुए उस महात्मा राम ने स्वयं भक्तिपूर्वक यहाँ रामेश्वर की प्रतिष्ठा की थी।
श्लोक 9 (skanda.6.99.9)
ऋषय ऊचुः॥ अन्यस्मिन्दिवसे तत्र कस्मिन्काले रघूत्तमः॥ संप्राप्तस्तस्य किं दुःखं संजातं तत्प्रकीर्तय
ṛṣaya ūcuḥ anyasmindivase tatra kasminkāle raghūttamaḥ saṁprāptastasya kiṁ duḥkhaṁ saṁjātaṁ tatprakīrtaya
ऋषियों ने कहा — वह किस समय की घटना थी, जब रघुश्रेष्ठ राम वहाँ किसी अन्य दिन आए थे, और उन्हें कौन-सा दुःख उत्पन्न हुआ था? वह हमें बताइए।
श्लोक 10 (skanda.6.99.10)
सूत उवाच॥ कृत्वा सीतापरित्यागं रामो राजीवलोचनः॥ लोकापवादसंत्रस्तस्ततो राज्यं चकार सः
sūta uvāca kṛtvā sītāparityāgaṁ rāmo rājīvalocanaḥ lokāpavādasaṁtrastastato rājyaṁ cakāra saḥ
सूत जी ने कहा — कमलनयन राम ने लोकापवाद से भयभीत होकर सीता का परित्याग किया, और तत्पश्चात् वे राज्य करने लगे।
श्लोक 11 (skanda.6.99.11)
कृत्वा स्वर्णमयीं सीतां पत्नीं यज्ञप्रसिद्धये॥ न स चक्रे महाभागो भार्यामन्यां कथंचन
kṛtvā svarṇamayīṁ sītāṁ patnīṁ yajñaprasiddhaye na sa cakre mahābhāgo bhāryāmanyāṁ kathaṁcana
यज्ञ की सिद्धि के लिए उन्होंने सीता की एक स्वर्णमयी प्रतिमा बनाई, परंतु उस महान पुरुष ने किसी अन्य स्त्री को कभी अपनी पत्नी नहीं बनाया।
श्लोक 12 (skanda.6.99.12)
दशवर्षसहस्राणि दशवर्षशतानि च॥ ब्रह्मचर्येण चक्रे स राज्यं निहतकंटकम्
daśavarṣasahasrāṇi daśavarṣaśatāni ca brahmacaryeṇa cakre sa rājyaṁ nihatakaṁṭakam
दस हज़ार वर्ष और दस सौ वर्ष तक, ब्रह्मचर्यपूर्वक रहते हुए, उन्होंने कण्टकरहित राज्य किया।
श्लोक 13 (skanda.6.99.13)
ततो वर्षसहस्रांते प्राप्ते चैकादशे द्विजाः॥ देवदूतः समायातो रामस्य सदनं प्रति
tato varṣasahasrāṁte prāpte caikādaśe dvijāḥ devadūtaḥ samāyāto rāmasya sadanaṁ prati
हे द्विजो! तत्पश्चात् ग्यारहवें सहस्र वर्ष के समाप्त होने पर, एक देवदूत राम के भवन में आया।
श्लोक 14 (skanda.6.99.14)
तेनोक्तं देवराजेन प्रेषितोऽहं तवांतिकम्॥ तस्मात्कुरु समालोकं विजने त्वं मया सह
tenoktaṁ devarājena preṣito'haṁ tavāṁtikam tasmātkuru samālokaṁ vijane tvaṁ mayā saha
उसने कहा — "देवराज इंद्र द्वारा भेजा गया मैं तुम्हारे पास आया हूँ; अतः तुम मेरे साथ एकांत में विचार-विमर्श करो।"
श्लोक 15 (skanda.6.99.15)
एवमुक्तस्तदा तेन दूतेन रघुनंदनः॥ परं रहः समासाद्य मन्त्रं चक्रे ततः परम्
evamuktastadā tena dūtena raghunaṁdanaḥ paraṁ rahaḥ samāsādya mantraṁ cakre tataḥ param
उस दूत द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर रघुनंदन राम ने तत्पश्चात् एक अत्यंत एकांत स्थान में जाकर उससे विचार-विमर्श किया।
श्लोक 16 (skanda.6.99.16)
तस्यैवमुपविष्टस्य मंत्रस्थाने महात्मनः॥ बहुत्वादिष्टलोकस्य न रहस्यं प्रजायते
tasyaivamupaviṣṭasya maṁtrasthāne mahātmanaḥ bahutvādiṣṭalokasya na rahasyaṁ prajāyate
उस महात्मा राम के इस प्रकार मंत्रणा-स्थान में बैठे रहने पर भी, वहाँ उपस्थित लोगों की अधिकता के कारण, वह गुप्त-मंत्रणा गुप्त न रह सकी।
श्लोक 17 (skanda.6.99.17)
ततः कोपपरीतात्मा दूतः प्रोवाच सादरम्॥ विहस्य जनसंसर्गं दृष्ट्वैकांतेऽपि संस्थिते
tataḥ kopaparītātmā dūtaḥ provāca sādaram vihasya janasaṁsargaṁ dṛṣṭvaikāṁte'pi saṁsthite
तब क्रोध से भरे हुए उस दूत ने, एकांत होने पर भी लोगों की भीड़ देखकर, उपहास करते हुए आदरपूर्वक कहा।
श्लोक 18 (skanda.6.99.18)
यथा दंष्ट्राच्युतः सर्पो नागो वा मदवर्जितः॥ आज्ञाहीनस्तथा राजा मानवैः परिभूयते
yathā daṁṣṭrācyutaḥ sarpo nāgo vā madavarjitaḥ ājñāhīnastathā rājā mānavaiḥ paribhūyate
"जिस प्रकार दंतरहित सर्प अथवा मदरहित हाथी तिरस्कृत होता है, उसी प्रकार आज्ञा-शक्ति से रहित राजा भी मनुष्यों द्वारा तिरस्कृत होता है।"
श्लोक 19 (skanda.6.99.19)
सेयं तव रघुश्रेष्ठ नाज्ञास्ति प्रतिवेद्म्यहम्॥ शक्रालापमपि त्वं च नैकांते श्रोतुमर्हसि
seyaṁ tava raghuśreṣṭha nājñāsti prativedmyaham śakrālāpamapi tvaṁ ca naikāṁte śrotumarhasi
"हे रघुश्रेष्ठ! मैं तुम्हें सूचित करता हूँ कि तुम्हारी वह आज्ञा-शक्ति यहाँ नहीं है; तुम इंद्र की बात को भी एकांत में सुनने के योग्य प्रतीत नहीं होते।"
श्लोक 20 (skanda.6.99.20)
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा कोपसंरक्तलोचनः॥ त्रिशाखां भृकुटीं कृत्वा ततः स प्राह लक्ष्मणम्
tasya tadvacanaṁ śrutvā kopasaṁraktalocanaḥ triśākhāṁ bhṛkuṭīṁ kṛtvā tataḥ sa prāha lakṣmaṇam
उसका यह वचन सुनकर, क्रोध से लाल हुए नेत्रों वाले, त्रिशाखा भौंहें चढ़ाए हुए राम ने तत्पश्चात् लक्ष्मण से कहा।
श्लोक 21 (skanda.6.99.21)
ममात्र संनिविष्टस्य सहानेन प्रजल्पतः॥ यदि कश्चिन्नरो मोहादागमिष्यति लक्ष्मण॥ स्वहस्तेन न संदेहः सूदयिष्यामि तं द्रुतम्
mamātra saṁniviṣṭasya sahānena prajalpataḥ yadi kaścinnaro mohādāgamiṣyati lakṣmaṇa svahastena na saṁdehaḥ sūdayiṣyāmi taṁ drutam
"हे लक्ष्मण! यहाँ इसके साथ मंत्रणा करते हुए मेरे पास यदि मोहवश कोई भी मनुष्य आ जाएगा, तो मैं निःसंदेह अपने ही हाथ से उसे तत्काल मार डालूँगा।"
श्लोक 22 (skanda.6.99.22)
न हन्मि यदि तं प्राप्तमत्र मे दृष्टिगोचरम्॥ तन्मा भून्मे गतिः श्रेष्ठा धर्मिणां या प्रपद्यते
na hanmi yadi taṁ prāptamatra me dṛṣṭigocaram tanmā bhūnme gatiḥ śreṣṭhā dharmiṇāṁ yā prapadyate
"यदि मैं उसे, यहाँ मेरी दृष्टि के समक्ष आने पर भी, न मारूँ, तो मुझे वह श्रेष्ठ गति प्राप्त न हो, जो धर्मात्माओं को प्राप्त होती है।"
श्लोक 23 (skanda.6.99.23)
एवं ज्ञात्वा प्रयत्नेन त्वया भाव्यमसंशयम्॥ राजद्वारि यथा कश्चिन्न मया वध्यतेऽधुना
evaṁ jñātvā prayatnena tvayā bhāvyamasaṁśayam rājadvāri yathā kaścinna mayā vadhyate'dhunā
"यह जानकर तुम्हें निःसंदेह प्रयत्नपूर्वक ऐसा करना है, कि राजद्वार पर कोई भी ऐसा न आए, जिसे अभी मुझे मारना पड़े।"
श्लोक 24 (skanda.6.99.24)
तमोमित्येव संप्रोच्य लक्ष्मणः शुभलक्षणः॥ राजद्वारं समासाद्य चकार विजनं ततः
tamomityeva saṁprocya lakṣmaṇaḥ śubhalakṣaṇaḥ rājadvāraṁ samāsādya cakāra vijanaṁ tataḥ
"ऐसा ही होगा" कहकर शुभ लक्षणों वाले लक्ष्मण ने राजद्वार पर जाकर उसे तत्पश्चात् जनरहित कर दिया।
श्लोक 25 (skanda.6.99.25)
देवदूतोऽपि रामेण समं चक्रे ततः परम्॥ मंत्रं शक्रसमादिष्टं तथान्यैः स्वर्गवासिभिः
devadūto'pi rāmeṇa samaṁ cakre tataḥ param maṁtraṁ śakrasamādiṣṭaṁ tathānyaiḥ svargavāsibhiḥ
तत्पश्चात् देवदूत ने भी राम के साथ, इंद्र तथा अन्य स्वर्गवासियों द्वारा आदिष्ट उस मंत्रणा को सम्पन्न किया।
श्लोक 26 (skanda.6.99.26)
देवदूत उवाच॥ त्वं रावणविनाशार्थमवतीर्णो धरातले॥ स च व्यापादितो दुष्टः पापस्त्रैलोक्यकंटकः
devadūta uvāca tvaṁ rāvaṇavināśārthamavatīrṇo dharātale sa ca vyāpādito duṣṭaḥ pāpastrailokyakaṁṭakaḥ
देवदूत ने कहा — "तुम रावण के विनाश के लिए ही इस पृथ्वी पर अवतरित हुए थे, और उस दुष्ट, पापी, त्रिलोक के कण्टकरूप रावण का वध हो चुका है।"
श्लोक 27 (skanda.6.99.27)
कृतं सर्वं महाभाग देव कृत्यं त्वयाऽधुना॥ तस्मात्संतु सनाथास्ते देवाः शक्रपुरोगमाः
kṛtaṁ sarvaṁ mahābhāga deva kṛtyaṁ tvayā'dhunā tasmātsaṁtu sanāthāste devāḥ śakrapurogamāḥ
"हे महाभाग! अब तुमने देवताओं का सम्पूर्ण कार्य पूर्ण कर दिया है; अतः इंद्र आदि समस्त देवता अब नाथयुक्त हों।"
श्लोक 28 (skanda.6.99.28)
यदि ते रोचते चित्ते नोपरोधेन सांप्रतम्॥ प्रसादं कुरु देवानां तस्मादागच्छ सत्वरम्॥ स्वर्गलोकं परित्यज्य मर्त्यलोकं सुनिंदितम्
yadi te rocate citte noparodhena sāṁpratam prasādaṁ kuru devānāṁ tasmādāgaccha satvaram svargalokaṁ parityajya martyalokaṁ suniṁditam
"यदि यह तुम्हारे मन को रुचिकर लगे, तो अभी बिना किसी बाधा के देवताओं पर कृपा करो; अतः इस निंदनीय मृत्युलोक को त्यागकर शीघ्र स्वर्गलोक को आ जाओ।"
श्लोक 29 (skanda.6.99.29)
सूत उवाच॥ एतस्मिन्नंतरे प्राप्तो दुर्वासा मुनिसत्तमः॥ प्रोवाचाथ क्षुधाविष्टः क्वासौ क्वासौ रघूत्तमः
sūta uvāca etasminnaṁtare prāpto durvāsā munisattamaḥ provācātha kṣudhāviṣṭaḥ kvāsau kvāsau raghūttamaḥ
सूत जी ने कहा — इसी बीच मुनिश्रेष्ठ दुर्वासा वहाँ आ पहुँचे, और क्षुधा से व्याकुल होकर बोले — "वह रघुश्रेष्ठ कहाँ है, कहाँ है?"
श्लोक 30 (skanda.6.99.30)
लक्ष्मण उवाच॥ व्यग्रः स पार्थिवश्रेष्ठो देवकार्येण केनचित्॥ तस्मादत्रैव विप्रेंद्र मुहूर्तं परिपालय
lakṣmaṇa uvāca vyagraḥ sa pārthivaśreṣṭho devakāryeṇa kenacit tasmādatraiva vipreṁdra muhūrtaṁ paripālaya
लक्ष्मण ने कहा — "हे विप्रेंद्र! वह श्रेष्ठ राजा किसी देवकार्य में व्यस्त हैं; अतः यहीं मुहूर्त भर के लिए प्रतीक्षा कीजिए।"
श्लोक 31 (skanda.6.99.31)
यावत्सांत्वयते रामो दूतं शक्रसमुद्भवम्॥ ममोपरि दयां कृत्वा विनयावनतस्य हि
yāvatsāṁtvayate rāmo dūtaṁ śakrasamudbhavam mamopari dayāṁ kṛtvā vinayāvanatasya hi
"जब तक राम इंद्र के भेजे हुए दूत को संतुष्ट कर लें — मुझ पर दया करते हुए विनम्रतापूर्वक प्रतीक्षा कीजिए।"
श्लोक 32 (skanda.6.99.32)
दुर्वासा उवाच॥ यदि यास्यति नो दृष्टिं मम द्राक्स रघूत्तमः॥ शापं दत्त्वा कुलं सर्वं तद्धक्ष्यामि न संशयः
durvāsā uvāca yadi yāsyati no dṛṣṭiṁ mama drāksa raghūttamaḥ śāpaṁ dattvā kulaṁ sarvaṁ taddhakṣyāmi na saṁśayaḥ
दुर्वासा ने कहा — "यदि वह रघुश्रेष्ठ अभी तुरंत मेरे दर्शन को नहीं आएगा, तो मैं शाप देकर उसके सम्पूर्ण कुल को निःसंदेह भस्म कर दूँगा।"
श्लोक 33 (skanda.6.99.33)
ममापि दर्शनादन्यन्न किंचिद्विद्यते गुरु॥ कृत्यं लक्ष्मण यावत्त्वमन्यन्मूढ़ प्रकत्थसे
mamāpi darśanādanyanna kiṁcidvidyate guru kṛtyaṁ lakṣmaṇa yāvattvamanyanmūr̤ha prakatthase
"हे लक्ष्मण! मेरे लिए दर्शन के अतिरिक्त कोई अन्य महत्त्वपूर्ण कार्य नहीं है; हे मूढ़! तुम व्यर्थ ही अन्य बातें क्यों कह रहे हो?"
श्लोक 34 (skanda.6.99.34)
तच्छ्रुत्वा लक्ष्मणश्चित्ते चिंतयामास दुःखितः॥ वरं मे मृत्युरेकस्य मा भूयात्कुलसंक्षयः
tacchrutvā lakṣmaṇaścitte ciṁtayāmāsa duḥkhitaḥ varaṁ me mṛtyurekasya mā bhūyātkulasaṁkṣayaḥ
यह सुनकर लक्ष्मण ने दुःखी होकर अपने मन में विचार किया — "मेरे अकेले की मृत्यु ही श्रेयस्कर है, समस्त कुल का विनाश न हो।"
श्लोक 35 (skanda.6.99.35)
एवं स निश्चयं कृत्वा ततो राममुपाद्रवत्॥ उवाच दंडवद्भूमौ प्रणिपत्य कृतांजलिः
evaṁ sa niścayaṁ kṛtvā tato rāmamupādravat uvāca daṁḍavadbhūmau praṇipatya kṛtāṁjaliḥ
ऐसा निश्चय करके वह राम के पास दौड़ा गया, और भूमि पर दण्डवत् प्रणाम कर हाथ जोड़कर बोला।
श्लोक 36 (skanda.6.99.36)
दुर्वासा मुनिशार्दूलो देव ते द्वारि तिष्ठति॥ दर्शनार्थी क्षुधाविष्टः किं करोमि प्रशाधि माम्
durvāsā muniśārdūlo deva te dvāri tiṣṭhati darśanārthī kṣudhāviṣṭaḥ kiṁ karomi praśādhi mām
"हे देव! मुनिश्रेष्ठ दुर्वासा आपके द्वार पर खड़े हैं, दर्शन के इच्छुक तथा क्षुधा से व्याकुल; मुझे बताइए कि मैं क्या करूँ, मुझे आदेश दीजिए।"
श्लोक 37 (skanda.6.99.37)
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा ततो दूतमुवाच तम्॥ गत्वेमं ब्रूहि देवेशं मम वाक्यादसंशयम्॥ अहं संवत्सरस्यांत आगमिष्यामि तेंऽतिके
tasya tadvacanaṁ śrutvā tato dūtamuvāca tam gatvemaṁ brūhi deveśaṁ mama vākyādasaṁśayam ahaṁ saṁvatsarasyāṁta āgamiṣyāmi teṁ'tike
उसका यह वचन सुनकर राम ने उस दूत से कहा — "जाओ और मेरे इस वचन से निःसंदेह देवराज इंद्र से कहो — 'मैं वर्ष के अंत में तुम्हारे पास आऊँगा।'"
श्लोक 38 (skanda.6.99.38)
एवमुक्त्वा विसृज्याथ तं दूतं प्राह लक्ष्मणम्॥ प्रवेशय द्रुतं वत्स तं त्वं दुर्वाससं मुनिम्
evamuktvā visṛjyātha taṁ dūtaṁ prāha lakṣmaṇam praveśaya drutaṁ vatsa taṁ tvaṁ durvāsasaṁ munim
ऐसा कहकर, उस दूत को विदा करके, तत्पश्चात् उन्होंने लक्ष्मण से कहा — "हे वत्स! तुम शीघ्र मुनि दुर्वासा को यहाँ प्रवेश कराओ।"
श्लोक 39 (skanda.6.99.39)
ततश्चार्घ्यं च पाद्यं च गृहीत्वा सम्मुखो ययौ॥ रामदेवः प्रहृष्टात्मा सचिवैः परिवारितः
tataścārghyaṁ ca pādyaṁ ca gṛhītvā sammukho yayau rāmadevaḥ prahṛṣṭātmā sacivaiḥ parivāritaḥ
तत्पश्चात् अर्घ्य और पाद्य लेकर, अत्यंत प्रसन्नचित्त, मंत्रियों से घिरे हुए, राम स्वयं उनके सम्मुख गए।
श्लोक 40 (skanda.6.99.40)
दत्त्वार्घ्यं विधिवत्तस्य प्रणिपत्य मुहुर्मुहुः॥ प्रोवाच रामदेवोऽथ हर्षगद्गदया गिरा
dattvārghyaṁ vidhivattasya praṇipatya muhurmuhuḥ provāca rāmadevo'tha harṣagadgadayā girā
उन्हें विधिपूर्वक अर्घ्य देकर, बार-बार प्रणाम करके, राम ने हर्ष से गद्गद वाणी में कहा।
श्लोक 41 (skanda.6.99.41)
स्वागतं ते मुनिश्रेष्ठ भूयः सुस्वागतं च ते॥ एतद्राज्यममी पुत्रा विभवश्च तव प्रभो
svāgataṁ te muniśreṣṭha bhūyaḥ susvāgataṁ ca te etadrājyamamī putrā vibhavaśca tava prabho
"हे मुनिश्रेष्ठ! आपका स्वागत है, बारंबार सुस्वागत है। हे प्रभो! यह राज्य, ये पुत्र, तथा यह सम्पूर्ण वैभव आपका ही है।"
श्लोक 42 (skanda.6.99.42)
कृत्वा मम प्रसादं च गृहाण मुनिसत्तम॥ धन्योऽस्म्यनुगृहीतोऽस्मि यत्त्वं मे गृहमागतः॥ पूज्यो लोकत्रयस्यापि निःशेषतपसांनिधिः
kṛtvā mama prasādaṁ ca gṛhāṇa munisattama dhanyo'smyanugṛhīto'smi yattvaṁ me gṛhamāgataḥ pūjyo lokatrayasyāpi niḥśeṣatapasāṁnidhiḥ
"हे मुनिश्रेष्ठ! मुझ पर कृपा करके इन्हें स्वीकार कीजिए। मैं धन्य हूँ, अनुगृहीत हूँ, कि आप, जो त्रिलोक के लिए भी पूज्य हैं तथा सम्पूर्ण तपस्याओं के निधि हैं, मेरे घर पधारे हैं।"
श्लोक 43 (skanda.6.99.43)
मुनिरुवाच॥ चातुर्मास्यव्रतं कृत्वा निराहारो रघूत्तम॥ अद्य ते भवनं प्राप्य आहारार्थं बुभुक्षितः
muniruvāca cāturmāsyavrataṁ kṛtvā nirāhāro raghūttama adya te bhavanaṁ prāpya āhārārthaṁ bubhukṣitaḥ
मुनि ने कहा — "हे रघूत्तम! मैंने चातुर्मास्य व्रत करते हुए निराहार रहकर तपस्या की; आज तुम्हारे भवन में आकर मैं भोजन के लिए क्षुधातुर हूँ।"
श्लोक 44 (skanda.6.99.44)
तस्मात्त्वं यच्छ मे शीघ्रं भोजनं रघुनंदन॥ नान्येन कारणं किंचित्संन्यस्तस्य धनादिना
tasmāttvaṁ yaccha me śīghraṁ bhojanaṁ raghunaṁdana nānyena kāraṇaṁ kiṁcitsaṁnyastasya dhanādinā
"अतः हे रघुनंदन! मुझे शीघ्र भोजन दो; एक संन्यासी को धन आदि किसी अन्य कारण से कोई प्रयोजन नहीं है।"
श्लोक 45 (skanda.6.99.45)
ततस्तं भोजयामास श्रद्धापूतेन चेतसा॥ स्वयमेवाग्रतः स्थित्वा मृष्टान्नैर्विविधैः शुभैः
tatastaṁ bhojayāmāsa śraddhāpūtena cetasā svayamevāgrataḥ sthitvā mṛṣṭānnairvividhaiḥ śubhaiḥ
तत्पश्चात् राम ने श्रद्धा से पवित्र हुए हृदय से, स्वयं उनके समक्ष खड़े होकर, विविध प्रकार के शुभ और स्वादिष्ट अन्न से उन्हें भोजन कराया।
श्लोक 46 (skanda.6.99.46)
लेह्यैश्चोष्यैस्तथा चर्व्यैः खाद्यैरेव पृथग्विधैः॥ यावदिच्छा मुनेस्तस्य तथान्नैर्विविधैरपि
lehyaiścoṣyaistathā carvyaiḥ khādyaireva pṛthagvidhaiḥ yāvadicchā munestasya tathānnairvividhairapi
लेह्य, चूष्य, चर्व्य तथा खाद्य आदि विविध प्रकार के भोज्य पदार्थों से, उस मुनि की इच्छा जितनी थी, उतने ही विविध अन्न से भी उन्होंने उन्हें तृप्त किया।