नागर खण्ड · अध्याय 98
राजस्वामी-राजवापी माहात्म्य का वर्णन
श्लोक 1 (skanda.6.98.1)
सूत उवाच॥ ततो दशरथो राजा मंत्रिभिस्तैर्विसर्जितः॥ हाटकेश्वरजं क्षेत्रं संप्राप्तो हर्षसंयुतः
sūta uvāca tato daśaratho rājā maṁtribhistairvisarjitaḥ hāṭakeśvarajaṁ kṣetraṁ saṁprāpto harṣasaṁyutaḥ
सूत जी ने कहा — तत्पश्चात् उन मंत्रियों द्वारा विदा किए गए राजा दशरथ हर्षपूर्वक हाटकेश्वर क्षेत्र में पहुँचे।
श्लोक 2 (skanda.6.98.2)
तत्रागत्य ततो देवीं पित्रा संस्थापिता पुरा॥ पूजयित्वाऽथ सद्भक्त्या स्नात्वा कुण्डे शुभोदके
tatrāgatya tato devīṁ pitrā saṁsthāpitā purā pūjayitvā'tha sadbhaktyā snātvā kuṇḍe śubhodake
वहाँ पहुँचकर उन्होंने अपने पिता द्वारा पूर्वकाल में स्थापित की गई देवी की सद्भक्तिपूर्वक पूजा की, और शुभ जलयुक्त कुण्ड में स्नान किया।
श्लोक 3 (skanda.6.98.3)
ततोऽन्यानि च मुख्यानि दृष्ट्वा चायतनानि सः॥ स्नात्वा तीर्थेष्वनेकेषु दत्त्वा दानान्यनेकशः
tato'nyāni ca mukhyāni dṛṣṭvā cāyatanāni saḥ snātvā tīrtheṣvanekeṣu dattvā dānānyanekaśaḥ
तत्पश्चात् उन्होंने अन्य मुख्य मंदिरों के दर्शन किए, अनेक तीर्थों में स्नान किया, और अनेक प्रकार के दान दिए।
श्लोक 4 (skanda.6.98.4)
प्रासादं कारयामास देवदेवस्य चक्रिणः॥ तत्र संस्थापयामास प्रतिमां वैष्णवीं शुभाम्
prāsādaṁ kārayāmāsa devadevasya cakriṇaḥ tatra saṁsthāpayāmāsa pratimāṁ vaiṣṇavīṁ śubhām
उन्होंने चक्रधारी देवाधिदेव विष्णु के लिए एक प्रासाद बनवाया, और वहाँ विष्णु की एक शुभ प्रतिमा स्थापित की।
श्लोक 5 (skanda.6.98.5)
तस्याग्रे कारयामास वापीं स्वच्छोदकान्विताम्॥ सोपानपंक्तिभिर्युक्तां साधुभिः संप्रशंसिताम्
tasyāgre kārayāmāsa vāpīṁ svacchodakānvitām sopānapaṁktibhiryuktāṁ sādhubhiḥ saṁpraśaṁsitām
उसके सामने उन्होंने स्वच्छ जल से युक्त, सीढ़ियों की पंक्तियों से सुसज्जित, तथा साधुजनों द्वारा प्रशंसित एक बावड़ी भी बनवाई।
श्लोक 6 (skanda.6.98.6)
उदकेन ततस्तस्या देवाराधनतत्परः॥ प्रकारैर्बहुभिस्तीव्रं चकार सुमहत्तपः
udakena tatastasyā devārādhanatatparaḥ prakārairbahubhistīvraṁ cakāra sumahattapaḥ
फिर उस जल से देव-आराधना में तत्पर होकर उन्होंने अनेक विधियों से अत्यंत उग्र और महान तपस्या की।
श्लोक 7 (skanda.6.98.7)
ततो वर्षशतेऽतीते तस्य तुष्टो जनार्दनः॥ विलोक्य च तपस्तीव्रं विहितं तेन भूभुजा
tato varṣaśate'tīte tasya tuṣṭo janārdanaḥ vilokya ca tapastīvraṁ vihitaṁ tena bhūbhujā
सौ वर्ष बीत जाने पर, उस राजा द्वारा की गई उग्र तपस्या को देखकर जनार्दन विष्णु उनसे प्रसन्न हो गए।
श्लोक 8 (skanda.6.98.8)
प्रोवाच दर्शनं गत्वा पक्षिराजं समाश्रितः॥ मेघगम्भीरयावाचा बहुदेवगणैर्वृतः
provāca darśanaṁ gatvā pakṣirājaṁ samāśritaḥ meghagambhīrayāvācā bahudevagaṇairvṛtaḥ
पक्षिराज गरुड़ पर आरूढ़ होकर, अनेक देवगणों से घिरे हुए, मेघ के समान गम्भीर वाणी में उन्होंने राजा को दर्शन देकर कहा।
श्लोक 9 (skanda.6.98.9)
श्रीविष्णुरुवाच॥ परितुष्टोऽस्मि ते वत्स वरं वरय सुव्रत॥ अपि ते दुर्लभं काममहं दास्यामि कृत्स्नशः
śrīviṣṇuruvāca parituṣṭo'smi te vatsa varaṁ varaya suvrata api te durlabhaṁ kāmamahaṁ dāsyāmi kṛtsnaśaḥ
श्रीविष्णु ने कहा — "हे वत्स! हे उत्तम व्रतधारी! मैं तुमसे संतुष्ट हूँ; वर माँगो। तुम्हारी अभिलाषा चाहे कितनी भी दुर्लभ क्यों न हो, मैं उसे पूर्ण रूप से प्रदान करूँगा।"
श्लोक 10 (skanda.6.98.10)
राजोवाच॥ पुत्रार्थोऽयं समारंभो मया देव कृतोऽखिलः॥ तपसो देहि मे पुत्रांस्तस्माद्वंशविवृद्धिदान्
rājovāca putrārtho'yaṁ samāraṁbho mayā deva kṛto'khilaḥ tapaso dehi me putrāṁstasmādvaṁśavivṛddhidān
राजा ने कहा — "हे देव! मैंने यह सम्पूर्ण उद्यम पुत्र-प्राप्ति के लिए ही किया है; अतः मुझे इस तपस्या के फलस्वरूप वंश की वृद्धि करने वाले पुत्र प्रदान कीजिए।"
श्लोक 11 (skanda.6.98.11)
अन्यत्सर्वं सुराधीश ध्रुवमस्ति गृहे स्थितम्॥ प्रसादात्तव यत्किंचिद्वैभवं विद्यते मम
anyatsarvaṁ surādhīśa dhruvamasti gṛhe sthitam prasādāttava yatkiṁcidvaibhavaṁ vidyate mama
"हे देवाधीश! अन्य सब कुछ आपकी कृपा से मेरे घर में सुनिश्चित रूप से विद्यमान है; जो भी वैभव मेरे पास है, वह सब आपकी ही कृपा से है।"
श्लोक 12 (skanda.6.98.12)
विष्णुरुवाच॥ अहं तव गृहे राजन्स्वयमेव न संशयः॥ अवतारं करिष्यामि कृत्वा रूपचतुष्टयम्
viṣṇuruvāca ahaṁ tava gṛhe rājansvayameva na saṁśayaḥ avatāraṁ kariṣyāmi kṛtvā rūpacatuṣṭayam
विष्णु ने कहा — "हे राजन्! मैं स्वयं ही, निःसंदेह, चार रूपों में अवतार लेकर तुम्हारे घर में जन्म लूँगा।"
श्लोक 13 (skanda.6.98.13)
देवकार्याय तस्मात्त्वं गृहं गत्वा महीपते॥ कुरु राज्यं यथान्यायं पितृपैतामहं महत्
devakāryāya tasmāttvaṁ gṛhaṁ gatvā mahīpate kuru rājyaṁ yathānyāyaṁ pitṛpaitāmahaṁ mahat
"यह देवकार्य के लिए होगा; अतः हे राजन्! अपने घर जाओ और अपने पिता तथा पितामह से प्राप्त इस महान राज्य का न्यायपूर्वक शासन करो।"
श्लोक 14 (skanda.6.98.14)
तथेयं या त्वया वापी निर्मिता विमलोदका॥ राजवापीति विख्याता लोके सेयं भविष्यति
tatheyaṁ yā tvayā vāpī nirmitā vimalodakā rājavāpīti vikhyātā loke seyaṁ bhaviṣyati
"तथा तुम्हारे द्वारा निर्मित निर्मल जल से युक्त यह बावड़ी भी संसार में 'राजवापी' के नाम से प्रसिद्ध होगी।"
श्लोक 15 (skanda.6.98.15)
अस्यां स्नात्वा नरो भक्त्या य एनां पूजयिष्यति॥ श्रद्धया परया युक्तः संप्राप्ते पंचमीदिने
asyāṁ snātvā naro bhaktyā ya enāṁ pūjayiṣyati śraddhayā parayā yuktaḥ saṁprāpte paṁcamīdine
"जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इसमें स्नान कर, परम श्रद्धा से युक्त होकर, पंचमी के दिन इसकी पूजा करेगा..."
श्लोक 16 (skanda.6.98.16)
ततः करिष्यति श्राद्धं यावत्संवत्सरं नृप॥ अपुत्रः प्राप्स्यते पुत्रान्वंशवृद्धिकरान्स हि
tataḥ kariṣyati śrāddhaṁ yāvatsaṁvatsaraṁ nṛpa aputraḥ prāpsyate putrānvaṁśavṛddhikarānsa hi
"...और तत्पश्चात् एक वर्ष तक श्राद्ध करता रहेगा, हे राजन्! वह पुत्रहीन भी वंश-वृद्धि करने वाले पुत्रों को प्राप्त करेगा।"
श्लोक 17 (skanda.6.98.17)
एवमुक्त्वा स भगवांस्ततश्चादर्शनं गतः॥ प्रहृष्टवदनो भूत्वा सोऽपि राजा ययौ गृहम्
evamuktvā sa bhagavāṁstataścādarśanaṁ gataḥ prahṛṣṭavadano bhūtvā so'pi rājā yayau gṛham
ऐसा कहकर वे भगवान अंतर्धान हो गए, और वह राजा भी प्रसन्न मुख होकर अपने घर लौट गया।
श्लोक 18 (skanda.6.98.18)
ततः स्तोकेन कालेन तस्य पुत्रचतुष्टयम्॥ संजातं लोके विख्यातं कलत्रत्रितयस्य च
tataḥ stokena kālena tasya putracatuṣṭayam saṁjātaṁ loke vikhyātaṁ kalatratritayasya ca
तत्पश्चात् थोड़े ही समय में उसकी तीन पत्नियों से चार पुत्र उत्पन्न हुए, जो संसार में विख्यात हुए।
श्लोक 19 (skanda.6.98.19)
कौशल्यानाम विख्याता तस्य भार्या सुशोभना॥ ज्येष्ठा तस्यां सुतो जज्ञे रामाख्यः प्रथमः सुतः
kauśalyānāma vikhyātā tasya bhāryā suśobhanā jyeṣṭhā tasyāṁ suto jajñe rāmākhyaḥ prathamaḥ sutaḥ
कौशल्या नाम से विख्यात उसकी सुंदर ज्येष्ठा पत्नी से उनका प्रथम पुत्र, राम नामक, उत्पन्न हुआ।
श्लोक 20 (skanda.6.98.20)
तथान्या कैकयी नाम तस्य भार्या कनिष्ठिका॥ भरतो नाम विख्यातस्तस्याः पुत्रोऽभवत्त्वसौ
tathānyā kaikayī nāma tasya bhāryā kaniṣṭhikā bharato nāma vikhyātastasyāḥ putro'bhavattvasau
और उसकी कनिष्ठा पत्नी, कैकेयी नाम से विख्यात, से भरत नामक पुत्र उत्पन्न हुआ।
श्लोक 21 (skanda.6.98.21)
सुमित्राख्या तथा चान्या पत्नी या मध्यमा स्थिता॥ शत्रुघ्नलक्ष्मणौ पुत्रौ तस्यां जातौ महाबलौ
sumitrākhyā tathā cānyā patnī yā madhyamā sthitā śatrughnalakṣmaṇau putrau tasyāṁ jātau mahābalau
तथा सुमित्रा नामक जो उनकी मध्यमा पत्नी थी, उससे शत्रुघ्न और लक्ष्मण नामक दोनों महाबली पुत्र उत्पन्न हुए।
श्लोक 22 (skanda.6.98.22)
तथान्या कन्यका चैका बभूव वरवर्णिनी॥ ददौ यां पुत्रहीनस्य लोमपादस्य भूपतेः
tathānyā kanyakā caikā babhūva varavarṇinī dadau yāṁ putrahīnasya lomapādasya bhūpateḥ
और एक अत्यंत सुंदर कन्या भी उत्पन्न हुई, जिसे उन्होंने पुत्रहीन राजा लोमपाद को दे दिया।
श्लोक 23 (skanda.6.98.23)
आनृण्यं भूपतिः प्राप्य एवं दशरथस्तदा॥ पितॄणां प्रययौ स्वर्गं कृतकृत्यस्तथा द्विजाः
ānṛṇyaṁ bhūpatiḥ prāpya evaṁ daśarathastadā pitṝṇāṁ prayayau svargaṁ kṛtakṛtyastathā dvijāḥ
हे द्विजो! इस प्रकार अपने पितरों के ऋण से मुक्त होकर, राजा दशरथ कृतकृत्य होकर स्वर्ग को गए।
श्लोक 24 (skanda.6.98.24)
अथ राजाऽभवद्रामः सार्वभौमस्ततः परम्॥ रावणो येन दुर्धर्षो निहतो देवकंटकः
atha rājā'bhavadrāmaḥ sārvabhaumastataḥ param rāvaṇo yena durdharṣo nihato devakaṁṭakaḥ
तत्पश्चात् राम सार्वभौम सम्राट बने, जिन्होंने देवताओं के लिए कंटकस्वरूप, दुर्धर्ष रावण का वध किया।
श्लोक 25 (skanda.6.98.25)
येन रामेश्वरश्चात्र निर्मितो लक्ष्मणेश्वरः॥ सीतादेवी तथा मूर्ता येन चात्र प्रतिष्ठिता
yena rāmeśvaraścātra nirmito lakṣmaṇeśvaraḥ sītādevī tathā mūrtā yena cātra pratiṣṭhitā
उन्हीं के द्वारा यहाँ रामेश्वर और लक्ष्मणेश्वर की स्थापना की गई, तथा उन्होंने ही यहाँ सीता देवी की मूर्ति भी प्रतिष्ठित की।